तत्र युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत् ततः शून्यागाराणि चैकाग्रो निवासार्थम् उपक्रमेत् //
236.62 का मूल श्लोक न होने से उसका तात्पर्य निश्चित नहीं किया जा सकता; इसलिए अनुवाद संभव नहीं।