नवद्वारं पुरं कृत्वा हंसो हि नियतो वशी ईदृशः सर्वभूतस्य स्थावरस्य चरस्य च //
यहाँ श्लोक-संख्या 33 का निर्देश है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है।