मुनय ऊचुः तव वक्त्राब्धिसंभूतम् अमृतं वाङ्मयं मुने पिबतां नो द्विजश्रेष्ठ न तृप्तिर् इह दृश्यते //
यहाँ अध्याय 236 आरम्भ होता है; श्लोक संख्या 1 का निर्देश है, पर मूल पाठ उपलब्ध नहीं।