हानेनाभिविकल्पानां नराणां संचयेन च शरीराणाम् अजस्याहुर् हंसत्वं पारदर्शिनः //
इस अध्याय का चौंतीसवाँ श्लोक पवित्र अर्थ देने वाला माना गया है।