ततो ऽस्य स्रवति प्रज्ञा गिरेः पादाद् इवोदकम् मनसः पूर्वम् आदद्यात् कूर्माणाम् इव मत्स्यहा //
यहाँ मूल संस्कृत श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘50’ संख्या दी गई है। कृपया श्लोक का पाठ भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।