अद्भुतानि रसः स्पर्शः शीतोष्णमारुताकृतिः प्रतिभान् उपसर्गाश् च प्रतिसंगृह्य योगतः //
इस अध्याय का अट्ठावनवाँ श्लोक (५८) समापन-क्रम में इस प्रकार निर्दिष्ट है।