
Śiva’s Battlefield Manifestation and Vyāsa’s Śatarudrīya Exposition (शिवप्रादुर्भावः शतरुद्रीयव्याख्यानम्)
Upa-parva: Droṇa-vadha-anantara Śiva-stuti (Post-Droṇa Episode: Arjuna’s Vision and Vyāsa’s Śiva Discourse)
Dhṛtarāṣṭra asks Sañjaya what occurred after Droṇa’s fall. Sañjaya reports that, amid the Kauravas’ disarray, Arjuna witnesses a radiant, fire-like person moving ahead of him, brandishing a blazing trident; in the direction that figure advances, Arjuna’s opponents break and fall, while Arjuna’s own arrows seem to follow behind. Arjuna asks the unexpectedly arrived Vyāsa to identify this ‘supreme person.’ Vyāsa declares the figure to be Śaṅkara—Īśāna, Mahādeva—describing his forms, attendants (pārṣadas), and unrivaled power in the three worlds. Vyāsa then unfolds an extended litany of Rudra’s names and attributes, recounts emblematic deeds (notably the disruption of Dakṣa’s sacrifice and the destruction of the three asura cities), and articulates Śiva’s cosmic identifications (time, death, elements, deities) and salvific capacity for those who take refuge. The discourse includes a phalaśruti-like promise: hearing/reciting this fourfold stotra (Śatarudrīya) is portrayed as purificatory and success-conferring. Vyāsa concludes by urging Arjuna to proceed without fear of defeat, given divine support, and then departs.
Chapter Arc: द्रोण-पर्व के रण-कोलाहल में कौरवों के छः श्रेष्ठ रथी—दुर्योधन, दुःशासन, द्रोण, कर्ण, शल्य और शकुनि—एक साथ संगठित होकर सात्यकि को लक्ष्य बनाते हैं; मानो एक ही शिकार पर छह सिंह टूट पड़ें। → स्वर्ण-रजत-विभूषित रथों, घुड़सवारों और गजों की परिक्रमा में सात्यकि को ‘कोष्ठबद्ध’ कर दिया जाता है; सिंहनाद और तर्जना के बीच चारों ओर से बाण-वर्षा होती है। रणभूमि कटे हुए भुजाओं और अंगों से भर उठती है—हाथी-सूँड़-सी मोटी भुजाएँ सर्पों-सी बिखरी दिखती हैं। इसी उथल-पुथल में धृष्टद्युम्न अपनी प्रचण्ड गति से सेना को द्रवित करता हुआ आगे बढ़ता है। → उलूक (शकुनि-पुत्र) घायल होकर भी श्रीकृष्ण पर प्रहार का साहस करता है और पृथ्वी को भर देने वाला नाद करता है; उसी क्षण शकुनि अपने रथ से कूदकर उलूक के रथ पर चढ़ जाता है—पिता-पुत्र का यह संयोग कौरव-पक्ष की जिद और प्रतिशोध को एकाग्र कर देता है। → धृष्टद्युम्न शत्रु-सेना को भगाकर देव-समूह में इन्द्र की भाँति शोभित होता है; पाण्डव-पक्ष में शंखनाद उठता है—यमौ (नकुल-सहदेव), युयुधान (सात्यकि) और भीमसेन सहित प्रमुख वीर अपनी ध्वनि से मनोबल को स्थिर करते हैं। थके हुए अर्जुन भी विशाल क्षय करते हुए कौरव-प्रतिकार को रोकते हैं। → रण का पलड़ा क्षणिक रूप से पाण्डवों की ओर झुकता है, पर कौरवों के शीर्ष रथियों का संगठित दबाव बना रहता है—अगला प्रहार किस पर टूटेगा, यह अनिश्चित है।
Verse 1
अत-४#-#का+ - दुर्योधन
قال سنجيا: «أيها الملك، بعد ذلك اندفع أولئك المحاربون جميعًا، وقد سكروا بجنون المعركة، مسرعين إلى الأمام. ولما لم يطيقوا الإهانة واشتعلوا غضبًا، هجموا نحو عربة يويوذانا (ساتياكي).»
Verse 2
ते रथै: कल्पितै राजन हेमरूप्यविभूषितै: । सादिभिश्न गजैश्लैव परिवद्रु: समन््तत:ः,नरेश्वर! उन्होंने सोने-चाँदीसे विभूषित एवं सुसज्जित रथों, घुड़सवारों और हाथियोंके द्वारा चारों ओरसे सात्यकिको घेर लिया
قال سنجيا: أيها الملك، لقد أحاطوا بساتياكي من كل جانب بعربات مُحكمة التجهيز مزدانة بالذهب والفضة، ومعها الفرسان والفيلة.
Verse 3
अथीैनं कोष्ठकीकृत्य सर्वतस्ते महारथा: । सिंहनादांस्ततश्नक्रुस्तर्जयन्ति सम सात्यकिम्,इस प्रकार सब ओरसे सात्यकिको कोष्ठबद्ध-सा करके वे महारथी योद्धा सिंहनाद करने और उन्हें डाँट बताने लगे
قال سنجيا: ثم إن أولئك المقاتلين العظام على العربات ضيّقوا على ساتياكي من كل جانب كأنهم يحبسونه في حظيرة محكمة؛ ورفعوا زئيرًا كزئير الأسود، وأخذوا معًا يرهِبونه ويسخرون منه.
Verse 4
ते भ्यवर्षञछरैस्तीक्ष्णै: सात्यकिं सत्यविक्रमम् । त्वरमाणा महावीरा माधवस्य वधैषिण:
قال سنجيا: ثم إن أولئك الأبطال العظام، وقد استعجلوا وتشوّفوا إلى قتل ساتياكي صاحب البأس الحق—ظانّين أن في ذلك طعنًا في قضية ماذافا—أمطروه بوابلٍ من السهام الحادّة.
Verse 5
तान् दृष्टवा पततस्तूर्ण शैनेय: परवीरहा । प्रत्यगृह्नान्महाबाहु: प्रमुऊचन् विशिखान् बहून्
قال سنجيا: لما رآهم يندفعون مسرعين، واجههم شَينيَة ساتياكي—قاتل أبطال الأعداء—مواجهةً مباشرة. فاستقبلهم ذلك العظيمُ الساعدين بإطلاق وابلٍ من السهام، يردّ القوةَ بقوةٍ منضبطة وسط مقتضيات ساحة القتال.
Verse 6
तत्र वीरो महेष्वास: सात्यकिर्युद्धदुर्मद: । निचकर्त शिरांस्युग्रै: शरै: संनतपर्वभि:,वहाँ महाधनुर्धर रणदुर्मद वीर सात्यकिने झुकी हुई गाँठवाले भयंकर बाणोंद्वारा बहुतेरे शत्रु-योद्धाओंके मस्तक काट डाले
قال سنجيا: هناك كان ساتياكي البطل—راميًا بارعًا، مخمورًا بسُعار القتال—يقطع رؤوس كثير من الأعداء بسهامٍ ضاريةٍ ذات عُقَدٍ منحنية، فيُسقطهم وسط عنف الحرب الذي لا يلين.
Verse 7
हस्तिहस्तान् हयग्रीवा बाहुनपि च सायुधान् | क्षुरप्रै: शातयामास तावकानां स माधव:
قال سنجيا: إن مَادهافا (كريشنا)، بسهامٍ حادّة كالموسى، قطع خراطيم الفيلة كأنها أيدٍ، وقطع أعناق الخيل، بل وبتر أذرع المحاربين مع أسلحتهم—فحطّم بذلك قوة القتال في جندك. ويُبرز المشهد أخلاق الحرب القاتمة: فالمهارة والعزم لا يُستعملان للهوٍ، بل لتعطيل قدرة العدو على الإيذاء تعطيلًا حاسمًا، فيما تكشف الدمويّة الثمنَ الرهيب لصراعٍ تحرّكه الأدهرما (adharma).
Verse 8
पतितैश्नामरैश्वैव श्वेतच्छत्रैश्ष भारत । बभूव धरणी पूर्णा नक्षत्रैद्यौरिव प्रभो,भरतनन्दन! प्रभो! वहाँ गिरे हुए चामरों और श्वेत छत्रोंसे भरी हुई भूमि नक्षत्रोंसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी
قال سنجيا: يا بهاراتا، لقد امتلأت الأرض بمراوح ذَنَب الياك الساقطة وبالمظلات الملكية البيضاء المطروحة. يا مولاي، يا بهجة آل بهاراتا، بدا وجه الأرض كسماءٍ مرصّعة بالنجوم.
Verse 9
एतेषां युयुधानेन युध्यतां युधि भारत । बभूव तुमुल: शब्द: प्रेतानां क्रनदतामिव,भारत! युद्धस्थलमें युयुधानके साथ जूझते हुए इन योद्धाओंका भयंकर आर्तनाद प्रेतोंके करुण-क्रन्दन-सा प्रतीत होता था
قال سنجيا: يا بهاراتا، حين كان هؤلاء المحاربون يقاتلون في ساحة الوغى ضد يويودهانا، ارتفع ضجيجٌ مروّعٌ مضطرب—كأنه نواحُ الموتى الحزين.
Verse 10
तेन शब्देन महता पूरिताभूद् वसुन्धरा । रात्रि: समभवच्चैव तीव्ररूपा भयावहा,उस महान् कोलाहलसे भरी हुई वह रणभूमि और रात्रि अत्यन्त उग्र एवं भयंकर जान पड़ती थी
قال سنجيا: بذلك الزئير الهائل بدا كأن الأرض كلها قد امتلأت وغمرها الصوت. ثم أقبل الليل عليهم شديد الهيئة، محمّلًا بالرعب—فجعل ساحة القتال، في أعقاب ذلك الضجيج، أشدَّ فظاعةً وهولًا.
Verse 11
दीर्यमाणं बल॑ दृष्टवा युयुधानशराहतम् । श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे लोमहर्षणे
قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى جيشه وقد اضطرب وتفكك، وقد أصابته سهام يويودھانا (ساتياكي)، وسمع في جوف منتصف الليل المروّع هديرًا عظيمًا يقشعرّ له البدن، كرّر دوريوذانا—وهو خيرُ فرسان العجلات—على سائقه مرارًا: «سُقْ خيولي إلى الموضع الذي يعلو منه هذا الصخب.»
Verse 12
सुतस्तवाब्रवीद् राजन् सारथिं रथिनां वर: । यत्रैष शब्दस्तत्राश्वांश्वोदयेति पुनः पुन:
قال سنجيا: أيها الملك، إن ابنك—وهو أبرعُ فرسان العجلات—خاطب سائقه مرارًا: «سُقِ الخيل إلى الموضع الذي يعلو فيه هذا الضجيج.»
Verse 13
तेन संचोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् | सूत: संचोदयामास युयुधानरथं प्रति,उसका आदेश पाकर सारथिने उन श्रेष्ठ घोड़ोंको सात्यकिके रथकी ओर हाँक दिया
فلمّا حثّه على ذلك، اندفع السائق يقود تلك الخيول الممتازة إلى الأمام، موجّهًا العجلة نحو عربة يويودھانا (ساتياكي).
Verse 14
ततो दुर्योधन: क्रुद्धो दृढ्धन्वा जितक्लम: । शीघ्रहस्तश्चित्रयोधी युयुधानमुपाद्रवत्
قال سنجيا: ثم إن دوريوذانا، وقد اشتعل غضبًا—ثابتًا في رميه بالقوس، لا يعتريه كلل، سريع اليد، يقاتل بحيلٍ شتّى—اندفع مهاجمًا يويودھانا (ساتياكي).
Verse 15
ततः पूर्णायतोत्सृष्टे: शरैः शोणितभोजनै: । दुर्योधन द्वादशभिर्माधव: प्रत्यविध्यत,तब मधुवंशी युयुधानने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बारह रक्तभोजी बाणोंद्वारा दुर्योधनको घायल कर दिया
قال سانجيا: ثم إنّ ماذافا، وقد مدَّ القوس إلى أقصاه، أطلق سهامًا كأنها شاربةٌ للدم، فأصاب دريودhana باثني عشر سهمًا منها.
Verse 16
दुर्योधनस्तेन तथा पूर्वमेवार्दित: शरै: | शैनेयं दशभिर्बाणै: प्रत्यविध्यदमर्षित:,सात्यकिने जब पहले ही अपने बाणोंसे दुर्योधनको पीड़ित कर दिया, तब उसने भी अमर्षमें भरकर उन्हें दस बाण मारे
قال سانجيا: إنّ دريودhana، وقد كان قد أُصيب من قبل بتلك السهام وتألم، اشتعل غضبًا، فطعن شَينِيَة بعشرة سهام ردًّا عليه.
Verse 17
ततः समभवद् युद्ध तुमुलं भरतर्षभ । पज्चालानां च सर्वेषां भरतानां च दारुणम्,भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर समस्त पांचालों और भरतवंशियोंका वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा
قال سانجيا: ثم قامت معركةٌ صاخبةٌ رهيبةُ الشدة بين جميع البانشالا وجميع البهاراتا، يا ثورَ البهاراتا.
Verse 18
शैनेयस्तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्र महारथम् । सायकानामशीत्या तु विव्याधोरसि भारत
قال سانجيا: وفي غمار القتال، وقد استبدّ الغضبُ بشَينِيَة، أصاب ابنَك—ذلك المَهارَثَ، فارسَ العربة العظيم—بثمانين سهمًا، نافذةً في صدره، يا بهاراتا.
Verse 19
भारत! रणभूमिमें कुपित हुए सात्यकिने आपके महारथी पुत्रकी छातीमें अस्सी सायकोंद्वारा प्रहार किया ।।
قال سانجيا: ثم في تلك المعركة، أصاب ساتياكي خيلَ خصمه بسهامه فأرداها، مُرسِلًا إياها إلى دار يَما. وبسهمٍ مُريَّشٍ سريع أسقط السائقَ أيضًا، فهَوَى في الحال من العربة.
Verse 20
हताश्वे तु रथे तिष्ठन् पुत्रस्तव विशाम्पते । मुमोच निशितान् बाणान् शैनेयस्य रथं प्रति
قال سَنجايا: يا سيّدَ الناس! مع أنّ خيلَ مركبته قد قُتلت، فإنّ ابنَك ثبتَ قائمًا على العربة وأطلق سهامًا حادّة نحو عربة شَيْنَيَة (Śaineya).
Verse 21
प्रजानाथ! तब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथपर खड़ा हो सात्यकिके रथकी ओर पैने बाण छोड़ने लगा ।।
قال سَنجايا: أيها الملك، في خِضَمّ القتال قطع شَيْنَيَة (سَاتْيَكِي، Sātyaki) —كالمُتقِن البارع في السلاح— تلك السهام الخمسين التي أطلقها ابنُك في المعركة.
Verse 22
अथापरेण भल्लेन मुष्टिदेशे महद् धनु: । चिच्छेद तरसा युद्धे तव पुत्रस्य माधव:
قال سَنجايا: ثم بسهمٍ حادٍّ آخر قطع مَادهافا (كِرِشْنَة، Kṛṣṇa) سريعًا، في خِضَمّ القتال، قوسَ ابنِك العظيم من الموضع الذي كان يمسكه بيده.
Verse 23
विरथो विधनुष्कश्न सर्वलोकेश्वर: प्रभु: । आरुरोह रथं तूर्ण भास्वरं कृतवर्मण:,तब सम्पूर्ण जगत्का स्वामी शक्तिशाली वीर दुर्योधन धनुष और रथसे हीन होकर तुरंत ही कृतवर्माके तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो गया
قال سَنجايا: عندئذٍ إنّ دُريودَهَنَة—وهو سيّدٌ جليلٌ قويّ، مشهورٌ كحاكمٍ بين الناس—وجد نفسَه بلا عربةٍ وبلا قوس؛ وفي تلك اللحظة من الضعف أسرع فاعتلى عربةَ كِرِتَفَرْمَن (Kṛtavarman) المتلألئة.
Verse 24
दुर्योधने परावृत्ते शैनेयस्तव वाहिनीम् | द्रावयामास विशिखैर्निशामध्ये विशाम्पते,प्रजानाथ! उस आधीरातके समय दुर्योधनके पराड्मुख हो जानेपर सात्यकिने आपकी सेनाको अपने बाणोंद्वारा खदेड़ना आरम्भ किया
قال سَنجايا: يا سيّدَ الرجال! في جوفِ الليل، لمّا ولّى دُريودَهَنَة مُرتدًّا، شرع شَيْنَيَة (سَاتْيَكِي، Sātyaki) يطرد جيشَك بوابلٍ من السهام.
Verse 25
शकुनिश्चार्जुनं राजन् परिवार्य समन्तत:ः । रथैरनेकसाहसैर्गजैश्ञापि सहस्रश:
قال سنجيا: أيها الملك، إن شكوني قد طوّق أرجونا من كل جانب—يضيق عليه بآلافٍ كثيرة من المركبات الحربية، ومعها الفيلة أيضًا بالآلاف.
Verse 26
तथा हयसहसैश्न नानाशस्त्रैरवाकिरत् । राजन! उधर शकुनिने कई हजार रथों
قال سنجيا: وعلى النحو نفسه، وبخيول لا تُحصى وبأسلحة شتى، أمطروه بوابلٍ من المقذوفات. أيها الملك، إن شكوني، بعدما أحاط بأرجونا من كل جانب بآلافٍ كثيرة من المركبات، وبآلافٍ من الفيلة، وبآلافٍ من الخيل، بدأ يصبّ عليه مطرًا عاصفًا من الأسلحة المتنوعة. وهكذا وُجِّهت كل الأسلحة العظمى نحو أرجونا.
Verse 27
तान्यर्जुन: सहस्राणि रथवारणवाजिनाम्
قال سنجيا: إن أرجونا صرع أولئك الآلاف—من المركبات والفيلة والخيل—ومضى يضغط ساحة القتال بقوة لا تلين.
Verse 28
ततस्तु समरे शूर: शकुनि: सीबलस्तदा
قال سنجيا: ثم في خضمّ المعركة تقدّم شكوني الشجاع، من سلالة ساوبالا.
Verse 29
विव्याध निशितैर्बाणैरर्जुनं प्रहसन्निव । पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम्
قال سنجيا: مبتسمًا كأنه يسخر، طعن أرجونا بسهامٍ حادّة؛ ثم عاد فأمطره بمئة سهم أخرى، فكبح ذلك المحارب العظيم على العربة وحاصره.
Verse 30
उस समय समरभूमिमें सुबलकुमार शूरवीर शकुनिने हँसते हुए-से तीखे बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला। फिर सौ बाण मारकर उनके विशाल रथको अवरुद्ध कर दिया ।।
قال سانجيا: عندئذٍ في ساحة القتال بدا شكوني—الباسل ابن سُوفَلا—كأنه يضحك وهو يطعن أرجونا بسهامٍ حادّة. ثم أمطره بمئة سهمٍ فكبح حركة عربة أرجونا العظيمة. غير أنّ أرجونا، يا بهارتا، ردّ في المعركة فأصاب شكوني بعشرين سهمًا، وضرب سائر الرماة العظام بثلاثة سهامٍ لكلّ واحد—جزاءً بمثلٍ، يحفظ شريعة المحارب في ردٍّ موزونٍ ماهر وسط فوضى الحرب.
Verse 31
निवार्य तान् बाणगणैर्युधि राजन् धनंजय: । जघान तावकान् योधान् वज्रपाणिरिवासुरान्
قال سانجيا: أيها الملك، في أتون القتال كان دهننجايا (أرجونا) يصدّ أولئك المحاربين بوابلٍ من السهام، ثم يصرع مقاتليك—كما يُهلك إندرا، صاحب الصاعقة (فجرپاني)، جموعَ الأسورا.
Verse 32
भुजैश्छिन्नैर्महीपाल हस्तिहस्तोपमैर्मथे । समाकीर्णा मही भाति पज्चास्यैरिव पन्नगै:
قال سانجيا: أيها الملك، كان ميدان القتال مغطّى بأذرعٍ مقطوعة غليظة كخراطيم الفيلة، حتى بدت الأرض كأنها مكسوّة بأفاعٍ ذات خمس رؤوس.
Verse 33
शिरोभि: सकिरीटैश्व सुनसैश्चारुकुण्डलै: । संदष्टौष्ठ पुटै: क्रुद्धस्तथैवोद्धूतलोचनै:
قال سانجيا: وعلى ساحة القتال كانت الرؤوس المقطوعة ملقاة—لا تزال مزدانة بتيجانٍ لامعة، وأنوفٍ حسنة، وأقراطٍ بهيّة. كانت الشفاه مشدودة بين الأسنان من فرط الغضب، والعيون جامدة في تحديقٍ شرسٍ مذهول. وهكذا غدت رؤوس الكشاتريا، التي كانت تُقرن بالكلام النبيل والزينة الملكية، رموزًا قاتمة لكلفة الحرب، فحوّلت «بهاء» الميدان إلى محاكاةٍ مرعبة للجمال.
Verse 34
निष्कचूडामणिधरै: क्षत्रियाणां प्रियंवदै: । पड़कजैरिव विन्यस्तै: पतितैर्विबभौ मही
قال سانجيا: لقد أضاءت الأرض برؤوس الكشاتريا الساقطة—أولئك الذين كانوا يتحلّون بالذهب وجواهر العُرف، ويُعرفون بعذوبة الكلام—مبعثرةً كأن زهور اللوتس قد نُثرت على التراب. وتزيد هذه الصورة من مرارة مفارقة الحرب: فالمزيّنون المهذّبون يُختزلون إلى غنائم بلا روح، و«جمال» الميدان ليس إلا مشهدًا كئيبًا مثقلًا بالمعنى الأخلاقي، مولودًا من الذبح.
Verse 35
कृत्वा तत् कर्म बीभत्सुरुग्रमुग्रपराक्रम: । विव्याध शकुनिं भूय: पञ्चभिननतपर्वभि:
قال سنجيا: بعدما أتى أرجونا بذلك الفعل المروّع، وهو الشديد البأس عظيم السطوة في القتال، عاد فطعن شكوني مرة أخرى بخمسة سهامٍ صلبة المفاصل لا تنثني، دافعًا الهجوم قدمًا في زخم المعركة الكالح.
Verse 36
अताडयदुलूकं च त्रिभिरेव तथा शरै: । भयंकर पराक्रमी अर्जुनने वह वीरोचित कर्म करके झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा पुनः शकुनिको घायल किया। साथ ही तीन बाणोंसे उलूकको भी व्यथित कर दिया ।।
قال سنجيا: إن أرجونا، البطل المهيب، ضرب أولوكا كذلك بثلاثة سهامٍ لا غير. وأولوكا، على الرغم من جراحه، ردّ بإطلاق السهام على فاسوديفا (كريشنا). ويُبرز هذا المقطع تبادل الضربات الذي لا يهدأ في الحرب—بسالةٌ تقابلها بسالة—كما يسلّط الضوء على التوتر الأخلاقي في القتال، إذ يواصل الجريح عدوانه، ويغدو سائق العربة (الحضور الهادي) هدفًا مباشرًا.
Verse 37
अर्जुन: शकुनेश्चापं सायकैरच्छिनद् रणे
قال سنجيا: في خضمّ المعركة قطع أرجونا قوس شكوني بسهامه—فعلٌ يثبت مهارةً قتاليةً منضبطة، ويُظهر قصدًا أخلاقيًا هو تعطيل قدرة الخصم على الإيذاء بدل الانغماس في قسوةٍ لا حاجة لها.
Verse 38
ततो रथादवप्लुत्य सौबलो भरतर्षभ
قال سنجيا: ثم إن السوبالا (شكوني) قفز من عربته—يا ثورَ آلِ بهاراتا—وأقدم على الفعل، في تحوّلٍ مفاجئ من قتال العربات إلى مواجهةٍ قريبة وسط اضطراب الميدان.
Verse 39
तावेकरथमारूढौ पितापुत्रौ महारथौ
قال سنجيا: إنهما—الأب والابن، وكلاهما من عظماء فرسان العربات—ركبا عربةً واحدة معًا، يتحركان كأنهما جسدٌ واحد في زحمة القتال. ويُبرز هذا السطر رباط النسب والواجب، حتى حين تُكره الحرب ذوي القربى على الفعل بعزمٍ منضبط تحت وطأة التوتر الأخلاقي.
Verse 40
तौ तु विद्ध्वा महाराज पाण्डवो निशितै:शरै:
قال سانجيا: أيها الملك العظيم، إنّ الباندَفيّ، بعدما أصاب ذينك الاثنين بسهامٍ حادّة كالموسى، مضى يدفع المعركة إلى الأمام—صورةٌ لعزمٍ قتاليّ لا يلين في خضمّ واجبات الحرب القاتمة.
Verse 41
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्तत:
قال سانجيا: «كما تُبعثر الريحُ السحابَ في كلّ الجهات…»—في تصويرٍ لتفرّق الصفوف واضطراب الميدان فجأةً، حيث يُكسَر حتى الأقوياء بقوى تتجاوز قدرتهم على الضبط، ويُحَسّ ثِقَلُ الحرب الأخلاقي في هشاشة التشكيلات والأرواح.
Verse 42
तद् बल॑ भरतश्रेष्ठ वध्यमानं तदा निशि
قال سانجيا: «يا خيرَ آلِ بهاراتا، إنّ ذلك الجيش، وهو يُقطَّع ويُباد في ظلمة الليل…» (والسردُ يتابع)، مُظهِرًا التوتّرَ الأخلاقيَّ الكئيبَ لمذبحةٍ ليلية وسط فوضى الحرب.
Verse 43
उत्सृज्य वाहान् समरे चोदयन्तस्तथा परे
قال سانجيا: في تلك المعركة، ترك بعضُهم مطاياهم، بينما ظلّ آخرون—ومن الجانب المقابل أيضًا—يسوقون خيولهم إلى الأمام، ماضين وسط فوضى الحرب.
Verse 44
विजित्य समरे योधांस्तावकान् भरतर्षभ
قال سانجيا: «يا ثورَ آلِ بهاراتا، بعدما غلبتَ محاربيك في ساحة القتال…»
Verse 45
धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणं विद्ध्वा त्रिभि: शरै:
قال سانجيا: أيها الملك، إن دْهْرِشْتَديومْنَةَ، بعدما أصاب دْرونا بثلاثة سهام، شدّد الهجوم—وهو مشهد يبرز اندفاع المعركة الكئيب، حيث يُعامَل حتى المعلّم الأجلّ كمقاتلٍ متى ما جرى تجاوز حدود الحرب.
Verse 46
तन्निधाय धनुर्भूमौ द्रोण: क्षत्रियमर्दन:
قال سانجيا: بعدما وضع دْرونا—ساحقَ المحاربين—قوسَه على الأرض، توقّف هنيهة؛ وهي إشارة إلى تحوّلٍ حاسم في المناخ الأخلاقي والعاطفي للمعركة: فإلقاء السلاح لحظةً يلمّح إلى الإعياء، أو ضبط النفس، أو انطواءٍ إلى الداخل وسط مطالب واجب الكشاتريا التي لا تهدأ.
Verse 47
धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगै:
قال سانجيا: ثم إن دْرونا، إذ أصاب دْهْرِشْتَديومْنَةَ بسبعة سهامٍ سريعة الطيران، دفع القتال إلى الأمام—فعلٌ يعكس شراسة الحرب التي لا تعرف التوقّف، شراسةً يمليها الواجب، حيث تُستعمل براعة السلاح بلا مهلة ضد خصمٍ من الصفّ الأول.
Verse 48
त॑ निवार्य शरैस्तूर्ण धृष्टद्युम्नो महारथ:
قال سانجيا: فبادر دْهْرِشْتَديومْنَةُ—المحارب العظيم على العربة—إلى صدّها بوابلٍ من السهام، فكبح الاندفاع وأبقاه بعيداً. وفي المناخ الأخلاقي للمعركة يبرز هذا السطر ضبطَ النفس المنظّم والمسؤوليةَ التكتيكية: تُواجَه القوةُ بقوةٍ محسوبة لحماية الصفّ وإقامة واجب القائد.
Verse 49
व्यधमत् कौरवीं सेनामासुरीं मघवानिव । महारथी धृष्टद्युम्नने तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको रोककर कौरव-सेनाका उसी प्रकार विनाश आरम्भ किया, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं ।।
قال سانجيا: إن دْهْرِشْتَديومْنَةَ، ذلك المها-راثي، بعدما كبح دْروناجاريا سريعاً بسهامه هو، شرع يسحق جيش الكورافا—كما يُهلك مَغَهافان (إندرا) جندَ الأسورا. ويصوّر هذا البيت هجومه لا كغضبٍ مجرّد، بل كفعلٍ حاسم داخل التوتر الأخلاقي للحرب: تقييدُ معلّمٍ محاربٍ رهيب، وتحويلُ زخم المعركة نحو تدمير القوة المقابلة.
Verse 50
उभयो: सेनयोर्मथ्ये नराश्रृद्धिपवाहिनी
قال سانجيا: بين الجيشين اندفع سيلٌ بشريّ—تيّارٌ من المحاربين لا يفتأ يتعاظم—يضغط متقدّمًا إلى قلب المعركة.
Verse 51
द्रावयित्वा तु तत् सैन्यं धृष्टद्युम्न: प्रतापवान्
قال سانجيا: وبعد أن بدّد ذلك الجيش وأوقعه في الهزيمة، اندفع دْهْرِشْتَديومنَ الشجاع—متّقدًا ببأس القتال—فأجبر القوات المعادية على الفرار، ودفع المعركة إلى الأمام بزخم الحرب الكالح.
Verse 52
अथ दथ्मुर्महाशड्खान् धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ
قال سانجيا: ثم نفخ دْهْرِشْتَديومنَ وشِخَنْدِن في صدفتيهما العظيمتين، فدوّى نداء العزم والاستعداد، فيما كانت حركة القتال تمضي دافعةً إلى الأمام.
Verse 53
जित्वा रथसहस््राणि तावकानां महारथा: । सिंहनादरवांश्वक्रु: पाण्डवा जितकाशिन:
قال سانجيا: وبعد أن قهروا آلاف العربات الحربية من جانبكم، أطلق عظماءُ فرسانِ العربة من آل باندافا—متهلّلين بالنصر—زئيرًا كزئير الأسود، يا سيّدَ الشعب. وفي الإطار الأخلاقي للملحمة، لا يدلّ هذا الصياح على كبرياءٍ مجرّد، بل على اندفاع المعنويات بعد اجتياز قوةٍ طاغية، فيزيد من زخم الحرب التراجيدي حيث تتصادم البسالة والواجب مع خرابٍ يتعاظم.
Verse 54
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च रणोत्कटा: । तथा द्रोणस्य शूरस्य द्रौणेश्वैव विशाम्पते
قال سانجيا: يا سيّدَ الشعب، يا ملكَ الرجال—أمام عيني ابنك (دوريودhana)، وأمام كَرْنَة، وكذلك أمام دْرونا البطل وابن دْرونا (أشْوَتْثامَن)، قام عظماءُ فرسانِ العربة من آل باندافا—وقد استبدّ بهم جنونُ القتال—بتشتيت آلاف مقاتليك من أهل العربات، ثم زأروا كزئير الأسود في الظفر. ويُبرز هذا المشهد كيف يمكن لبأس الحرب وزخمها أن يقلبا ثقة القادة المشهورين، مذكّرًا السامع بأن القوة بلا سندٍ من الاستقامة واهنةٌ وسط الاضطراب الأخلاقي لساحة القتال.
Verse 171
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهاراتا» المباركة، ضمن «بارفا درونا»—وخاصة في فصل «مقتل غَطوتكچا»—يُختَتم هنا الفصل الحادي والسبعون بعد المئة، واصفًا قتال الليل والمعمعة الملتبسة المتشابكة. وتُشير خاتمة الفصل هذه إلى منعطفٍ في السرد: فبعد وطأة الصراع الأخلاقي في حربٍ تُخاض في الظلام، وبعد فوضى القتال المحموم، يُغلق النص الفصل إغلاقًا رسميًا، مؤكّدًا أن اضطراب الحرب يشتدّ حين تُدار في العتمة والهيجان.
Verse 263
अर्जुन योधयन्ति स्म क्षत्रिया: कालचोदिता: । वे कालप्रेरित क्षत्रिय अर्जुनपर बड़े-बड़े अस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उनके साथ युद्ध करने लगे
قال سنجيا: مدفوعين بقهر «كالا»—الزمن—اندفع محاربو الكشاتريا على أرجونا واشتبكوا معه، يمطرونه بوابلٍ من المقاذيف العظيمة؛ صورةٌ لحربٍ تُساق فيها إرادة البشر إلى زخمٍ أوسع، قدريّ، نحو الهلاك.
Verse 366
ननाद च महानादं पूरयन्निव मेदिनीम् | इस प्रकार घायल होनेपर उलूकने भगवान् श्रीकृष्णपर प्रहार किया और पृथ्वीको गुँजाते हुए-से बड़े जोरसे गर्जना की
قال سنجيا: أطلق زئيرًا عظيمًا كأنه يملأ الأرض كلّها رجعًا. وعلى الرغم من جراحه، ضرب أولوكا «بهغافان» شري كريشنا، وصرخ صرخةً مدوّية حتى خُيّل أن الأرض نفسها ترعد—صورةٌ لوحشية الحرب، حيث يفيض الغضب والتبجّح رغم الإصابة، في تضادٍّ صارخ مع سكينة كريشنا وثباته الدارمي وسط العنف.
Verse 373
निनन््ये च चतुरो वाहान् यमस्य सदन प्रति । उस समय अर्जुनने रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा शकुनिका धनुष काट दिया और उसके चारों घोड़ोंको भी यमलोक भेज दिया
قال سنجيا: في لهيب المعركة قطع أرجونا بقِسِيِّ سهامه قوسَ شكوني، ثم أرسل خيوله الأربعة إلى دار يَما—صورةٌ لفعلٍ حربيٍّ خاطفٍ حاسم، حيث تغدو المهارة في القتال أداةً للموت المحتوم في ساحة الوغى.
Verse 386
उलूकस्य रथं तूर्णमारुरोह विशाम्पते । प्रजापालक भरतश्रेष्ठ! तब सुबलपुत्र शकुनि अपने रथसे कूदकर तुरंत ही उलूकके रथपर जा चढ़ा
قال سنجيا: يا سيّد الناس، يا حامي الرعية، يا خيرَ آلِ بهاراتا—عندئذٍ قفز شكوني ابن سوبالا من عربته، ومن غير إبطاءٍ اعتلى عربة أولوكا. وفي ضغط الحرب يدلّ هذا الانتقال السريع بين العربات على تنسيقٍ تكتيكيٍّ عاجل، وعلى استعدادٍ لترك الموضع الشخصي طلبًا لميزةٍ فورية.
Verse 396
पार्थ सिषिचतुर्बाणैर्गिरिं मेघाविवाम्बुभि: । एक रथपर आरूढ़ हुए पिता और पुत्र दोनों महारथियोंने अर्जुनपर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे दो मेघखण्ड अपने जलसे किसी पर्वतको सींच रहे हों
قال سنجيا: إن الأب والابن—وكلاهما من عظماء المقاتلين، وقد اعتليا عربةً واحدة—أخذا يُغرقان بارثا (أرجونا) بوابلٍ من السهام، كما تسقي كتلتان من السحاب جبلاً بمطرهما. وتُبرز الصورة كيف أنّ صخب الحرب يطمس رابطة القرابة وضبط النفس، فلا يبقى إلا عزمُ القتال، ويغدو أرجونا بؤرةَ عنفٍ مُركَّزٍ مُنسَّق.
Verse 403
विद्रावयंस्तव चमूं शतशो व्यधमच्छरै: । महाराज! परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनने उन दोनोंको तीखे बाणोंसे घायल करके आपकी सेनाको भगाते हुए उसे सैकड़ों बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया
قال سنجيا: أيها الملك! غير أنّ أرجونا ابن باندو جرح ذينك الاثنين بسهامٍ حادّة، ثم وهو يطرد جندك إلى الفرار مزّق صفوف الجيش بمئات النبال حتى تفتّتت. ويكشف المشهد أخلاق الحرب الكئيبة: تُعرَض البراعة بمهارةٍ منضبطة، لكنها تتجلّى وسط ضرورة العنف المأساوية وانهيار الجيوش أمام تدبيرٍ أرفع.
Verse 416
विच्छिन्नानि तथा राजन् बलान्यासन् विशाम्पते । प्रजापालक नरेश! जैसे हवा बादलोंको चारों ओर उड़ा देती है, उसी प्रकार अर्जुनने आपकी सेनाओं को छिजन्न-भिन्न कर दिया
قال سنجيا: «أيها الملك، يا سيدَ الرعية، لقد تكسّرت قواتك وتفرّقت على هذا النحو. وكما تذرّي الريحُ السحابَ في كل جهة، كذلك شتّت أرجونا جيوشك، فتركها شظايا مبعثرة وصفوفاً مضطربة».
Verse 426
प्रदुद्राव दिश: सर्वा वीक्षमाणं भयार्दितम् । भरतश्रेष्ठ उस समय रात्रिमें अर्जुनद्वारा मारी जाती हुई आपकी सेना भयसे पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखती हुई भाग चली
قال سنجيا: وقد أنهكهم الخوف، أخذ الجيش يلتفت إلى كل جهة يلتمس مأمناً، ثم انكسر وفرّ من كل صوب. وفي تلك الليلة، إذ كان أرجونا يصرعهم، استولى الذعر عليهم، فتداعى النظام وتحول الصف إلى هزيمةٍ يائسة.
Verse 433
सम्भ्रान्ता: पर्यधावन्त तस्मिंस्तमसि दारुणे | कुछ लोग अपने वाहनोंको समरांगणमें ही छोड़कर भाग चले। दूसरे लोग उन्हें तेजीसे हॉँकते हुए भागे और कितने ही सैनिक भ्रान्त होकर उस दारुण अन्धकारमें चारों ओर चक्कर काटते रहे
قال سنجيا: في ذلك الظلام الرهيب، أخذ المحاربون، وقد استبدّ بهم الفزع والاضطراب، يهرولون في كل اتجاه. فمنهم من ترك عربته ومركوبه في ساحة القتال وفرّ؛ ومنهم من اندفع بمركبته بأقصى سرعة طلباً للنجاة؛ وكثيرون، وقد تاهت عقولهم، ظلّوا يدورون بلا وجهة في العتمة القاسية—مُظهرين كيف يذيب الخوفُ الانضباطَ والنظامَ في الحرب.
Verse 443
दभ्मतुर्मुदिती शड्खौ वासुदेवधनंजयौ । भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें आपके योद्धाओंको जीतकर प्रसन्नतासे भरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन अपना-अपना शंख बजाने लगे
قال سانجيا: يا خيرَ آلِ بهاراتا! في ساحة القتال، بعدما غلب فاسوديفا (شري كريشنا) ودهاننجايا (أرجونا) محاربيك، امتلآ فرحًا ونفخ كلٌّ منهما في صَدَفته. ولم يكن ذلك الصوتُ مجردَ علامةِ ظفر، بل إعلانًا مقصودًا عن العزم والغايةِ العادلة، وسط الثقل الأخلاقي للحرب.
Verse 453
चिच्छेद धनुषस्तूर्ण ज्यां शरेण शितेन ह । महाराज! उधर धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींधकर तुरंत ही तीखे बाणसे उनके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली
قال سانجيا: أيها الملك! هناك أصاب دْرِشْتَديومنَ دْرونَآتشاريا بثلاثة سهام، ثم في اللحظة نفسها قطع بسهمٍ حادٍّ وترَ قوسه. وفي توتر الحرب الأخلاقي يدلّ هذا الفعل على استعجالٍ تكتيكي—لنزع سلاح معلّمٍ محاربٍ رهيب كي يُكفَّ مزيدٌ من القتل—غير أنه يبرز أيضًا ضرورة العنف المأساوية حين يُنازَع الدَّرما في ساحة القتال.
Verse 463
आददेअन्यद् धनु: शूरो वेगवत् सारवत्तरम् । तब क्षत्रियमर्दन शूरवीर द्रोणाचार्यने उस धनुषको भूमिपर रखकर दूसरा अत्यन्त प्रबल और वेगशाली धनुष हाथमें लिया
قال سانجيا: إن ذلك البطل تناول قوسًا آخر—أشدَّ قوةً وأسرعَ اندفاعًا وأصلحَ للقتال. فوضع السلاح السابق جانبًا، واختار وسيلةً أقوى لمواصلة المعركة، مُظهرًا تصاعدًا لا يهدأ هو من سمات الحرب التي تُعدّ حقًّا حين يثبت الواجب ويغدو النزاع بلا هوادة.
Verse 473
सारथिं पजञ्चभिर्बाणै राजन् विव्याध संयुगे । राजन! तत्पश्चात द्रोणने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्मको सात बाणोंसे बींधकर उनके सारथिको पाँच बाँणोंसे घायल कर दिया
قال سانجيا: أيها الملك! في خضمّ القتال طعن السائق بخمسة سهام. ثم إن دْرونَةَ ثقب دْرِشْتَديومنَ بسبعة سهام، وأصاب سائقه بخمسة سهام. وتُبرز هذه الحادثة كيف أن المقاتلين، في لهيب الحرب، لا يضربون البطلَ الرئيس وحده، بل يضربون أيضًا أعوانَ آلة القتال—كاشفين توترًا أخلاقيًا قاتمًا بين ضرورة السلاح ومثال السلوك القويم.
Verse 493
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरड्)िणी । माननीय नरेश! इस प्रकार जब आपके पुत्रकी उस सेनाका वध होने लगा, तब वहाँ रक्तराशिके प्रवाहसे तरंगित होनेवाली एक भयंकर नदी बह चली
قال سانجيا: «هناك ابتدأ نهرٌ مروّعٌ يجري، أمواجه من سيول الدم. أيها الملك الموقَّر، لما بدأ ذبحُ جيش ابنك على هذا النحو، بدا كأن ساحة القتال نفسها تُفيض مجرىً مفزعًا، يتموّج بتيار الدم المتراكم.»
Verse 503
यथा वैतरणी राजन् यमराजपुरं प्रति । राजन! दोनों सेनाओंके बीचमें बहनेवाली वह नदी मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको भी बहाये लिये जाती थी, मानो वैतरणी नदी यमराजपुरीकी ओर जा रही हो
قال سانجيا: «أيها الملك، كما يجري نهر ڤيتارَني نحو مدينة يَمَ، كذلك كان ذلك النهر الجاري بين الجيشين يجرف الرجال والخيول والفيلة، محوِّلًا ساحة القتال إلى معبرٍ نحو الموت ذاته».
Verse 513
अभ्यराजत तेजस्वी शक्रो देवगणेष्विव । उस सेनाको भगाकर प्रतापी धृष्टद्युम्न देवताओंके समूहमें तेजस्वी इन्द्रके समान सुशोभित होने लगे
قال سانجيا: «إن دْهريشتاديومنَ المتلألئ الشجاع، بعدما بدّد ذلك الجيش وأوقعه في الهزيمة، أشرق كإندرا بين جموع الآلهة. فقد كسر صفوف العدو وشتّت قواهم، ثم برز في وسط رجاله ببريقٍ آمرٍ كالبريق الذي يتجلّى به إندرا بين السماويّين.»
Verse 523
यमौ च युयुधानश्च पाण्डवश्व वृकोदर: । तदनन्तर धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल, सहदेव, सात्यकि तथा पाण्डुपुत्र भीमसेनने भी अपने महान् शंखको बजाया
قال سانجيا: ثم نفخ التوأمان (ناكولا وسهاديفا)، ويويودھانا (ساتياكي)، والپاندڤا فْرِكودارا (بيما) في أصدافهم العظيمة. وبعدهم نفخ دْهريشتاديومنَ، وشيخَنْدي، وناكولا، وسهاديفا، وساتياكي، وبيماسينا ابن پاندو، في أصدافهم الجبّارة كذلك. وكان دويّ الأصداف إعلانًا للعزم والوحدة في ساحة القتال.
Verse 2736
प्रत्यवारयदायस्त: प्रकुर्वन् विपुलं क्षयम् । यद्यपि अर्जुन कौरव-सेनाका महान् संहार करते-करते थक गये थे, तो भी उन्होंने उन सहसौरों रथों, हाथियों और घुड़सवारोंकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया
قال سانجيا: «مع أن أرجونا قد أضناه الإعياء وهو يُوقع مرارًا مقتلةً عظيمة في جيش الكورڤا، فإنه مع ذلك كبح تقدّم تلك الآلاف من العربات والفيلة والفرسان. وحتى في الإنهاك لم تَفْتُر عزيمته؛ بل ظلّ يصدّ اندفاع العدو إلى الأمام، مؤديًا واجب المحارب وسط قسوة ضرورة ساحة القتال.»
Arjuna confronts attribution: whether battlefield success is solely personal agency or requires recognition of a larger, supra-human causality; the chapter resolves this by framing victory as compatible with effort but illuminated by divine support.
The chapter teaches that disciplined action benefits from epistemic humility and refuge in a stabilizing metaphysical order; devotion functions as an interpretive ethic that restrains ego and contextualizes power.
Yes. The discourse presents the Śatarudrīya-style stotra as purifying and success-conferring: hearing/reciting it is described as removing faults and fear and as leading to honor in Rudra’s sphere after overcoming adversities.
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