
Duryodhana Seeks Droṇa’s Counsel; Imperative to Protect Jayadratha; Pāñcāla Assault on Duryodhana
Upa-parva: Saindhava-rakṣaṇa (Defense of Jayadratha) Episode
Saṃjaya reports that, as the army is disrupted and Arjuna moves against Jayadratha with Bhīma and Sātyaki, Duryodhana rapidly approaches Droṇa, agitated and red-eyed, questioning how Droṇa could be ‘surpassed’ if Arjuna and the others have broken through. Droṇa replies that the situation is complex: with Kṛṣṇa and Arjuna pressing forward, the Kaurava host is effectively seized from front and rear. Droṇa identifies the immediate operational duty as safeguarding Jayadratha from Arjuna’s anger, comparing the battlefield to a decisive dice-wager—where victory and defeat are now determined by this single stake. He instructs Duryodhana to go personally to reinforce the defenders of Jayadratha, while Droṇa remains to contain the Pāñcālas and allied forces. The narrative then depicts Yudhāmanyu and Uttamaujā (as Arjuna’s wheel-guards) engaging Duryodhana: volleys of arrows, the killing of horses and charioteers, a transition to mace action, destruction of a chariot, Duryodhana’s remounting on another ratha, and the Pāñcāla leaders returning to pursue Arjuna—highlighting rapid tactical adaptation amid command objectives.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रणभूमि का दृश्य सुनाते हैं—दुर्योधन स्वयं रथ बढ़ाकर कृष्ण-सारथी अर्जुन के सम्मुख आता है, मानो राजसिंह अपने भाग्य से भिड़ने चला हो। → दुर्योधन तीव्र बाण-वर्षा करता है; वह वासुदेव के वक्षस्थल को भी बाणों से बेधता और रथ के प्रतोद को काट गिराता है। अर्जुन शांत-चित्त होकर शिलाशित, सान-चढ़े बाणों से प्रत्युत्तर देता है; दोनों ओर से शस्त्र-प्रहारों की झड़ी लगती है। दुर्योधन के पक्ष के रथ, हाथी, घोड़े और पदाति-समूह धनंजय को घेरने दौड़ते हैं। → घेराबंदी के बीच अर्जुन अपने अस्त्र-वीर्य से कौरव-वरूथिनी को चीर देता है—शतशः रथ और द्विप गिरते हैं; पर साथ ही अस्त्र-प्रतिअस्त्र का उत्कर्ष दिखता है, जहाँ अश्वत्थामा ‘सर्वास्त्रधातक’ से अर्जुन के बाणों को काट देता है और युद्ध एक क्षण को भयावह तकनीकी शिखर पर पहुँचता है। → कृष्ण अर्जुन का धैर्य और गाण्डीव-बल जाँचते/उत्साह बढ़ाते हैं—‘पहले जैसा बल है न?’—और अर्जुन पुनः संगठित होकर शत्रु-समूह को पीछे ढकेलता है। दुर्योधन फिर भी विषधर-सदृश बाणों से कृष्ण-अर्जुन को घायल कर अपनी जिद और राजधर्म-हठ का परिचय देता है। → अस्त्र का पुनः प्रयोग स्वयं-विनाशक हो सकता है—यह चेतावनी (कि दो बार प्रयोग करने पर अस्त्र अपने ही पक्ष को मार डालेगा) अगले क्षणों में युद्ध को किस सीमा तक ले जाएगी, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं) ््ज-्अ ्ःः छा अकाल त्रयधिकशततमो<ध्याय: दुर्योधन और अर्जुनका युद्ध तथा दुर्योधनकी पराजय संजय उवाच एवमुकक््त्वार्जुनं राजा त्रिभिमर्मातिगै: शरै: । अभ्यविध्यन्महावेगैश्षतुर्भि श्वतुरो हयान्
قال سنجيا: «يا أيها الملك، لما قال دوريودھانا ذلك لأرجونا، أصابه بثلاثة سهام بالغة السرعة، نافذة إلى المقاتل؛ ثم بأربعة نبالٍ قوية جرح خيول أرجونا الأربع كذلك.»
Verse 2
वासुदेवं च दशभश्रि: प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे | प्रतोद॑ चास्य भल्लेन छित्त्वा भूमावपातयत्,इसी प्रकार दस बाण मारकर उसने श्रीकृष्णकी भी छाती छेद डाली और एक भल्लसे उनके चाबुकको काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया
قال سنجيا: وضرب فاسوديفا (كريشنا) أيضًا بعشرة سهام، نافذةً في موضع الصدر؛ وبسهمٍ قاطع من نوع «بهلّا» قطع سوطه وألقاه إلى الأرض. ويُبرز هذا المشهد ضراوة القتال: فحتى كريشنا—وهو لا يقاتل بسلاح—يصير هدفًا، وتُهاجَم أدوات السائق لتعطيل السيطرة وأداء الواجب في ساحة المعركة.
Verse 3
त॑ चतुर्दशभि: पार्थश्रित्रपुड्खै: शिलाशितै: । अविध्यत् तूर्णमव्यग्रस्ते चा भ्रश्यन्त वर्मणि
قال سنجيا: غيرَ مضطربٍ وسريعًا، ضربه أرجونا بأربعَ عشرةَ سَهْمًا—مَسنونةً بالحجر ومُزدانةً بريشٍ متنوّع. غير أنّ تلك النِّبال، لمّا لامست دِرعَ دوريودhana، انزلقت وسقطت، مُظهِرةً أنّ القوّةَ وحدَها، إن لم تجد موضعَ ضعفٍ، لا تَنفُذُ إلى عدوٍّ مُحكَمِ الدِّفاع في أخلاقِ الحربِ القاسية.
Verse 4
तेषां नैष्फल्यमालोक्य पुनर्नव च पञ्च च । प्राहिणोन्निशितान् बाणांस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मण:,उन्हें निष्फल हुआ देख अर्जुनने पुनः चौदह तीखे बाण चलाये; परंतु वे भी कवचसे फिसल गये
قال سنجيا: لمّا رأى أن المحاولة قد ذهبت سُدى، أطلق ثانيةً أربعَ عشرةَ سَهْمًا حادًّا؛ غير أنّها هي الأخرى انزلقت عن الدِّرع ولم تُحدِث أثرًا. ويُبرز هذا الموضع أنّ في القتال لا يكفي بذلُ الجهد وحده—فالحمايةُ والاستعدادُ والحدودُ التي تفرضها الظروف قد تجعل حتى الفعلَ الماهرَ عديمَ الجدوى.
Verse 5
अष्टाविंशांस्तु तान् बाणानस्तान् विप्रेक्ष्य निष्फलान् । अब्रवीत् परवीरघ्न: कृष्णो<र्जुनमिदं वच:
قال سنجيا: لمّا رأى أن تلك الأسهم الثمانيَ والعشرين التي أُطلقت قد ذهبت هباءً، خاطب كṛṣṇa—قاتل أبطال العدو—أرجونا بهذه الكلمات. ويُبرز هذا الموقف خُلُقَ إعادة التقدير بصفاءٍ في ساحة الحرب: فإذا أخفق السعي، فلا يُصرّ المرءُ عميانًا، بل يَستجيبُ بالمشورة والخطة وثبات المقصد.
Verse 6
अदृष्टपूर्व पश्यामि शिलानामिव सर्पणम् | त्वया सम्प्रेषिता: पार्थ नार्थ कुर्वन्ति पत्रिण:
قال سنجيا: «يا بارثا، إنّي اليوم أرى ما لم أره قطّ من قبل—كأنّ الحجارةَ نفسها قد أخذت تَسير. إنّ السهامَ التي أرسلتَها لا تُؤدّي غايتها.»
Verse 7
कच्चिद् गाण्डीवज: प्राणस्तथैव भरतर्षभ । मुशिश्व ते यथापूर्व भुजयोश्व॒ बलं तव,“भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे गाण्डीव-धनुषकी शक्ति पहले-जैसी ही है न? तुम्हारी मुट्ठी एवं बाहुबल भी पूर्ववत् हैं न?
قال سنجيا: «يا ثورَ آلِ بهاراتا، أترى حياةَ حاملِ غانديڤا ونشاطَه ما زالا كما كانا من قبل؟ أقبضتُك وقوّةُ ذراعيك، أهما كذلك على ما كانا عليه؟»
Verse 8
न वा कच्चिदयं काल: प्राप्त: स्यादद्य पश्चिम: । तव चैवास्य शत्रोश्व॒ तनन््ममाचक्ष्व पृच्छत:,“आज तुम्हारी और तुम्हारे इस शत्रुकी अन्तिम भेंटका समय नहीं आया है क्या? मैं जो पूछता हूँ, उसका उत्तर दो
قال سَنجايا: «أترى أن الساعة الأخيرة قد حلّت اليوم—لك ولعدوّك هذا؟ أخبرني صراحةً عمّا أسألك.»
Verse 9
विस्मयो मे महान् पार्थ तव दृष्टवा शरानिमान् | व्यर्थान् निपतितान् संख्ये दुर्योधनरथं प्रति
قال سَنجايا: «يا بارثا، إن دهشتي لعظيمة إذ أرى سهامك هذه تسقط عبثًا في خضمّ القتال، موجَّهةً نحو عربة دوريوذانا. أن سهام ابن كونتي لا تؤثّر فيه—لَمنعطفٌ مدهش في هذه الحرب.»
Verse 10
वज्राशनिसमा घोरा: परकायावभेदिन: । शरा: कुर्वन्ति ते नार्थ पार्थ काद्य विडम्बना
قال سَنجايا: «يا بارثا، إن سهامك—المروِّعة كالصاعقة والبرق، المشهورة بتمزيق أجساد الأعداء—لا تُحدث اليوم أثرًا البتّة. أيُّ سخريةٍ غريبةٍ هذه؟»
Verse 11
अर्जुन बोले--श्रीकृष्ण! मेरा तो यह विश्वास है कि दुर्योधनको द्रोणाचार्यने अभेद्य कवच बाँधकर उसमें यह अद्भुत शक्ति स्थापित कर दी है। यह कवचधारणा मेरे अस्त्रोंके लिये अभेद्य है
قال أرجونا: «يا شري كريشنا، إنّي على يقينٍ بأن دروناآچاريا قد شدّ على دوريوذانا درعًا لا يُخترق، وأقام فيه قوّةً عجيبة. ومع هذا الدرع صار بعيد المنال عن أسلحتي.»
Verse 12
अस्मिन्नन्तहितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि । एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात्
قال أرجونا: «يا كريشنا، في هذا الدرع قوةُ العوالم الثلاثة مستترة. إن درونا وحده يعلم هذا العلم السرّي، وأنا لم أعرفه إلا بتعلّمي على يد ذلك المعلّم الأسمى.»
Verse 13
अजुन उवाच द्रोणेनैषा मति: कृष्ण धार्तराष्ट्रे निवेशिता । अभेद्या हि ममास्त्राणामेषा कवचधारणा
قال أرجونا: «يا كريشنا، إنّ هذه الحيلة قد غرسها درونا في ابن دريتاراشترا. هذا الدرع الذي يلبسه لا تُثقبه أسلحتي. لا يمكن تمزيق هذه الصفيحة بالسهام على أي وجه؛ بل إنّ إندرا نفسه—مَغَهَفَت—لا يستطيع شقَّه في ساحة القتال، ولا حتى بصاعقته (الفَجْرَة).»
Verse 14
जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहयसे कथम् । यद् वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते
قال أرجونا: «يا كريشنا، وأنت حقًّا تعلم كل شيء، فكيف تُوقعني في الحيرة؟ يا كيشافا، ما وقع في العوالم الثلاثة وما يقع الآن—كلّه معلوم لديك. يا مدهوسودانا، لا أحد يعلم كما تعلم.»
Verse 15
तथा भविष्यद् यच्चैव तत् सर्व विदितं तव । न व्विदं वेद वै कश्चिद् यथा त्वं मधुसूदन
قال أرجونا: «وما سيأتي في المستقبل، وكل ما سواه—كلّه معلوم لديك. حقًّا لا أحد يعلم كما تعلم، يا مدهوسودانا. ومع ذلك، وأنت تعلم كل شيء، لِمَ تُلقي بي في الوهم والحيرة؟»
Verse 16
एष दुर्योधन: कृष्ण द्रोणेन विहितामिमाम् | तिष्ठत्यभीतवत् संख्ये बिभ्रत् कवचधारणाम्
قال أرجونا: «يا كريشنا، ها هو دُريودhana واقفٌ—حاملاً تَقلُّدَ هذه الدرع التي رتّبها له درونا على وجهٍ مُستوفٍ للطقس—يثبت في ساحة القتال كأنه لا يعرف الخوف.»
Verse 17
यत्त्वत्र विहित॑ कार्य नैष तद् वेत्ति माधव | स्त्रीवदेष बिभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम्
قال أرجونا: «يا مَادهافا، إنه لا يفهم الواجب المقرون هنا بارتداء هذه الدرع. وكامرأةٍ لا تتخذ من الحُليّ إلا زينة، كذلك يحمل هذه الدرع المحكمة كشيءٍ اتخذه من غيره—من غير أن يدري ما يلازمها من التزام.»
Verse 18
पश्य बल्ोश्व मे वीर्य धनुषश्न जनार्दन । पराजयिष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम्,जनार्दन! अब आप मेरी भुजाओं और धनुषका बल देखिये। मैं कवचसे सुरक्षित होनेपर भी दुर्योधनको पराजित कर दूँगा
قال أرجونا: «يا جاناردانا، انظر قوة ذراعيّ وبأس قوسي. سأهزم ذلك الكاورافي، وإن كان محميًّا بدرعه».
Verse 19
इदमड्िरसे प्रादाद् देवेशो वर्म भास्वरम् | तस्माद् बृहस्पति: प्राप ततः प्राप पुरंदर:
قال أرجونا: «إن ربَّ الآلهة وهب هذا الدرع المتلألئ لأنْغِيراس. ومن أنْغِيراس وصل إلى بْرِهَسْبَتِي، ثم من بْرِهَسْبَتِي انتقل إلى بوراندارا (إندرا).»
Verse 20
पुनर्ददौ सुरपतिर्महां वर्म ससंग्रहम् । दैवं यद्यस्य वर्मतद् ब्रह्मणा वा स्वयं कृतम्
قال أرجونا: «ثم إن ربَّ الآلهة منح مرةً أخرى درعًا عظيمًا تامَّ الأجزاء، ذا قوةٍ إلهية؛ بل إن ذلك الدرع إمّا سماويٌّ بطبيعته، وإمّا أن برهما قد صنعه بيده.»
Verse 21
संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनो बाणमभिमन्त्रय व्यकर्षयत्
قال سانجيا: لما قال ذلك، قدّس أرجونا سهمه بتعويذةٍ (مانترا)، ثم جذبه إلى الوراء متهيئًا للرمي.
Verse 22
मानवास्त्रेण मानार्हस्ती क्ष्णावरण भेदिना । संजय कहते हैं--राजन! ऐसा कहकर माननीय अर्जुनने कठोर आवरणका भेदन करनेवाले मानवास्त्रसे अपने बाणोंको अभिमन्त्रित करके धनुषकी डोरीको खींचा ।।
قال سانجيا: «أيها الملك! لما قال ذلك، قام أرجونا الموقَّر بتعويذ سهامه بـ(مانافاسترا) Mānavāstra، وهو سلاحٌ نافذٌ يشقّ حتى الدروع الصلبة، ثم شدَّ وتر القوس. وبينما كان يشدّه، انشدّت السهام الموضوعة في وسط القوس إحكامًا، متهيئةً للانطلاق.»
Verse 23
तान् निकृत्तानिषून् दृष्टवा दूरतो ब्रह्म॒वादिना
قال سانجيا: لما رأى من بعيد أولئك المحاربين وقد قُطِعوا وسقطوا بلا حياة، روى الراوي الناطق بكلام البراهمة (سانجيا) المآل الكئيب للمعركة—صورة تُبرز كيف أن البأس الحربي، إذا لم تُقِمْهُ كوابحُ الضبط، ينقلب سريعًا إلى خسارة لا رجعة فيها.
Verse 24
न्यवेदयत् केशवाय विस्मित: श्वेतवाहन: । ब्रह्मवादी अश्वत्थामाके द्वारा दूरसे ही काट दिये गये उन बाणोंको देखकर श्वेतवाहन अर्जुन चकित हो उठे और श्रीकृष्णको सूचित करते हुए बोले-- || २३ ई ।।
قال سانجيا: إن أرجونا—صاحب العربة المجرورة بالجياد البيض—دهش فأخبر كيشافا بالأمر، وقال: «يا جاناردانا، لا أستطيع أن أستعمل هذا السلاح مرةً ثانية.» وفي المناخ الأخلاقي للحرب تُبرز كلمات أرجونا ضبطَ المحارب وصدقه: فحتى في الشدة يعترف بحدود قوته ويلتمس الرأي السديد من كṛṣṇa بدل أن يتحرك بدافع الكِبر أو اليأس.
Verse 25
ततो दुर्योधन: कृष्णौ नवभिर्नवशभि: शरै:
قال سانجيا: ثم إن دوريوذانا، وهو يدفع القتال إلى مزيد من الشدة، أصاب «الكريشنَين» بتسعة سهام—فعلٌ يعكس تصاعد الحرب بلا هوادة، حيث يُعامَل حتى الحلفاء الموقَّرون كأهداف حين تنهار قيودُ الكفّ.
Verse 26
भूय एवाभ्यवर्षच्च समरे कृष्णपाण्डवौ
قال سانجيا: ثم عاد، في خضمّ المعركة، فأمطر كṛṣṇa والپاندڤا (أرجونا) بوابلٍ شديد من السهام. ولما رأى جنودُك تجددَ عاصفة النبال تلك، غمرهم الفرح العظيم؛ فأخذوا يقرعون الآلات ويطلقون زئيرًا كزئير الأسود—مُظهِرين كيف أن المعنويات في الحرب كثيرًا ما تنتفخ عند مشاهد البأس، فيما يظل الثمن الأخلاقي للعنف يتراكم.
Verse 27
शरवर्षेण महता ततो<5हृष्पन्त तावका: । चक्रुर्वादित्रनिनदान् सिंहनादरवांस्तथा
قال سانجيا: عندئذٍ، بتلك السحابة العظيمة من السهام، امتلأ محاربوك نشوةً وحماسة. فأحدثوا دويَّ الآلات، وزأروا كذلك زئيرًا كزئير الأسود—مبتهجين باندفاع المعركة وبالميزة التي بدا أنهم نالوها في الميدان.
Verse 28
ततः क्रुद्धो रणे पार्थ: सृक्किणी परिसंलिहन् । नापश्यच्च ततोअस्याजूं यन्न स्याद् वर्मरक्षितम्
قال سانجيا: ثمّ في خِضَمِّ المعركة، اشتعل بارثا (أرجونا) غضبًا، فلحسَ زوايا فمه. ولم يُبصر في خصمه عضوًا واحدًا غيرَ مصونٍ بالدِّرع—إذ لم يجد موضعًا مكشوفًا يضربه، انحدَّ غضبه إلى عزمٍ قاتمٍ داخل أخلاق الحرب القاسية.
Verse 29
ततो<स्य निशितैर्बाणै: सुमुक्तैरन््तकोपमै: । हयांश्वकार निर्देहानुभौ च पार्ष्णिसारथी
قال سانجيا: ثم إن أرجونا، بسهامٍ حادّةٍ أُطلقت بإحكام، مروِّعةٍ كالموت نفسه، صرع خيولَ دُريودَهَنَ الأربعة، وقتل كذلك حارسي مؤخرة العربة، فتركهم جثثًا هامدة. ووفق أخلاق الميدان القاسية، كان القصد تعطيل حركة العدوّ وحمايته لا مجرد الانسياق إلى حقدٍ شخصي—غير أنّ ذلك يزيد عنف الحرب الذي لا فكاك منه.
Verse 30
धनुरस्याच्छिनत् तूर्ण हस्तावापं च वीर्यवान् । रथं च शकलीकर्तु सव्यसाची प्रचक्रमे,तत्पश्चात् पराक्रमी सव्यसाची अर्जुनने तुरंत ही उसके धनुष और दस्तानेको काट दिया और रथको टूक-टूक करना आरम्भ किया
قال سانجيا: إن أرجونا الجبّار، المشهور بلقب سافياساشي، قطع سريعًا قوس خصمه وقطع كذلك واقيات يديه؛ ثم شرع يُحطّم العربة إلى قطع. ويُبرز المشهد كفاءة المهارة القتالية بلا رحمة—إذ تُستعمل البراعة لتعطيل قدرة العدو على القتال، فيما يثقل عبء الحرب الأخلاقي على كل فعل.
Verse 31
दुर्योधनं च बाणाभ्यां तीक्ष्णाभ्यां विरथीकृतम् । आविषध्यद्धस्ततलयोरुभयोरर्जुनस्तदा
قال سانجيا: ثم ضرب أرجونا دُريودَهَنَ—وقد كان قد جُعل بلا عربة بسهمين حادّين—حتى ثُقبت راحتا يديه كلتاهما. وهكذا يشتدّ الضغط الأخلاقي في القتال، إذ يُعطَّل العدو عن مواصلة الحرب بدل السعي إلى قتلةٍ استعراضية.
Verse 32
उस समय पार्थने रथहीन हुए दुर्योधनकी दोनों हथेलियोंमें दो पैने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ।।
قال سانجيا: في ذلك الحين أصاب بارثا دُريودَهَنَ الذي صار بلا عربة، بسهمين حادّين فأحدث جرحًا غائرًا في راحتي يديه كلتيهما. ثم إن ابنَ كونتي، العارفَ بحسن التدبير ومواضع الحيلة، ضرب بسهامه اللحمَ الرقيق تحت أظفار دُريودَهَنَ. فإذ عُذِّب بالألم واضطربت روحه، مال دُريودَهَنَ إلى الفرار من ساحة القتال—مُظهِرًا أن في أخلاق الحرب الوحشية قد تنهار عزيمةُ أشدّ المحاربين بأسًا حين يطغى عذاب الجسد على الشجاعة والواجب.
Verse 33
त॑ कृच्छामापदं प्राप्तं दृष्टयवा परमधन्विन: । समापेतु: परीप्सन्तो धनंजयशरार्दितम्,धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए दुर्योधनको भारी विपत्तिमें पड़ा हुआ देख श्रेष्ठ धनुर्धर योद्धा उसकी रक्षाके लिये आ पहुँचे
قال سانجيا: لما رأوا دوريودhana واقعًا في محنةٍ شديدة، مُعذَّبًا بسهام دهنانجايا (أرجونا)، أسرع أمهرُ الرماة إليه، قاصدين حمايته وانتشاله وسط زحام المعركة وضغطها.
Verse 34
त॑ रथैर्बहुसाहस्रै: कल्पितै: कुञ्जरैहयै: । पदात्योघैश्व संरब्धै: परिवद्रुर्थन॑जयम्,उन्होंने कई हजार रथों, सजे-सजाये हाथियों, घोड़ों तथा रोषमें भरे हुए पैदल सैनिकोंद्वारा अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया
قال سانجيا: ثم جاءوا بآلاف العربات، وبالفيلة والخيول المصطفّة بإحكام، وبجماعاتٍ هادرة من المشاة الغاضبين؛ فاندفعوا وأحاطوا بدهنانجايا (أرجونا) من كل جانب.
Verse 35
अथ नार्जुनगोविन्दौ न रथो वा व्यदृश्यत | अस्त्रवर्षण महता जनौघैश्वापि संवृती,उस समय बड़ी भारी बाण-वर्षा और जनसमुदायसे घिरे हुए अर्जुन, श्रीकृष्ण और उनका रथ--इनमेैंसे कोई भी दिखायी नहीं देता था
قال سانجيا: عندئذٍ لم يُرَ أرجونا ولا غوڤيندا (كريشنا)، ولا حتى عربتهما، إذ غمرتهما تمامًا زخةٌ هائلة من المقذوفات، وغطّتهما جموعُ المحاربين المتلاطمة.
Verse 36
ततोडर्जुनो<स्त्रवीर्येण निजघ्ने तां वरूथिनीम् । तत्र व्यज्रीकृता: पेतु: शतशो<5थ रथद्विपा:
قال سانجيا: ثم إن أرجونا، ببأس أسلحته، حطّم ذلك الصفّ القتالي. وهناك سقطت مئاتُ العربات والفيلة إلى الأرض، وقد تكسّرت أعضاؤها وتبعثرت عُدّتها.
Verse 37
ते हता हन्यमानाश्र न्यगृह्लंस्तं रथोत्तमम् । स रथस्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रे समन््तत:
قال سانجيا: ومع أن كثيرين منهم قُتلوا وآخرين كانوا لا يزالون يُصرَعون، فإن جنود الكورو مع ذلك كبحوا ذلك الفارسَ الأعظم على العربة. وهكذا توقفت عربة أرجونا، مطوَّقة من كل جانب على مسافة تقارب كروشا واحدة.
Verse 38
ततोर्जुनं वृष्णिवीरस्त्वरितो वाक्यमब्रवीत् । भनुर्विस्फारयात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्बुजम्,तब वृष्णिवीर श्रीकृष्णने तुरंत ही अर्जुनसे कहा--'तुम जोर-जोरसे धनुषको खींचो और मैं अपना शंख बजाऊँगा”
قال سَنجايا: عندئذٍ خاطب بطلُ آلِ فِرِشْنِي أرجونا على عَجَلٍ قائلاً: «اشدد قوسَك بكل ما أوتيتَ من قوة؛ وأنا سأنفخ في صَدَفتي». وفي خضمّ العبء الأخلاقي للمعركة، ينسّق أمرُ كريشنا بين العزم والإشارة—فيحوّل الشجاعة الفردية إلى فعلٍ منضبطٍ موافقٍ للواجب الذي اختاراه في الحرب.
Verse 39
ततो विस्फार्य बलवदू गाण्डीवं जध्निवान् रिपून् | महता शरवर्षेण तलशब्देन चार्जुन:
قال سَنجايا: فلما سمع ذلك، شدّ أرجونا قوسَ غانديفا شدّاً شديداً وبدأ يصرع الأعداء—مُنهالاً بوابلٍ عظيمٍ من السهام، تصاحبه طَقّةٌ حادّة من كفّه. وفي المناخ الأخلاقي للحرب، يصوّر البيت فعلَ أرجونا بوصفه إنفاذاً حازماً لواجب المحارب: قوةٌ قاطعة موجَّهة إلى خصومٍ مسلّحين في قلب المعركة، لا قسوةً شخصية بل قتالاً منضبطاً.
Verse 40
पाञज्चजन्यं च बलवान् दध्मौ तारेण केशव: । रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्ता: प्रस्विन्ननदनो भूशम्
قال سَنجايا: نفخ كيشافا القوي في صَدَفة بانْجَجَنْيَا بنغمةٍ حادّةٍ عالية. وقد غشّى الغبارُ أطرافَ جفنيه، وتلألأ وجهُه بقطرات العرق الكثيرة—علاماتِ الشدّة والاستعجال في ساحة القتال، حتى لمن يقوم مقام السائق والهادي.
Verse 41
(तेनाच्युतोष्ठयुगपूरितमारुतेन शंखान्तरोदरविवृद्धविनि:सृतेन । नादेन सासुरवियत्सुरलोकपाल- मुद्विग्नमीश्वर जगत् स्फुटतीव सर्वम् ।।
قال سَنجايا: لما دخل النَّفَسُ الممتلئ بين شفتي أَچْيُوتا إلى جوف الصدفة، فانتفخ في داخلها ثم اندفع خارجاً زئيراً عميقاً مدوّياً، بدا أن العالم كلَّه—مع أقاليم الأسورا، والفضاء الأوسط، وسماء الآلهة، وحتى حرّاس الجهات—يرتجف خوفاً كأنه ينشقّ. وقد فزع جنودُ العدو من نفخة الصدفة ومن طنين القوس، فسقطوا على الأرض—الواهنُ منهم والشديدُ سواء. ويُبرز هذا المقطع كيف أن حضور القائد البارّ وعزيمته قد يزلزلان ثقة جيشٍ جائر قبل أن تتلاقى الأسلحة.
Verse 42
तैरविमुक्तो रथो रेजे वाय्वीरित इवाम्बुद: । जयद्रथस्य गोप्तारस्तत: क्षुब्धा: सहानुगा:
قال سَنجايا: لما انفلتت عربة أرجونا من طوقهم، أشرقت كغيمةٍ يسوقها الريح. فلما رأى ذلك حماةُ جَيدَرَثا—مع أتباعهم—اضطربوا واهتزّت نفوسهم، إذ انكسر الساتر الذي كانوا يتّكلون عليه.
Verse 43
ते दृष्टवा सहसा पार्थ गोप्तार: सैन्धवस्य तु । चक्कुर्नादान् महेष्वासा: कम्पयन्तो वसुंधराम्
قال سنجيا: لما رأى حماةُ جَيَدْرَثَةِ المعيَّنون فجأةً أرجونا، أطلق الرماةُ العظامُ صيحاتِ حربٍ مدوّيةً في الحال، كأنهم يُرجِفون الأرضَ نفسها—إعلانًا لعزمهم على ستره وحمايته وملاقاة أرجونا وجهًا لوجه في زحمة القتال.
Verse 44
बाणशब्दरवांश्रोग्रान् विमिश्रान शड्खनिःस्वनै: । प्रादुश्चक्रुमहात्मान: सिंहनादरवानपि,उन महामनस्वी वीरोंने शंखध्वनिसे मिले हुए बाणजनित भयंकर शब्दों और सिंहनादको भी प्रकट किया
قال سنجيا: إن أولئك المحاربين ذوي النفوس السامية أظهروا هديرًا شرسًا تولّد من صليل السهام، ممتزجًا بنفخ الصدَف، وأطلقوا كذلك صيحاتِ قتالٍ مدوّيةً كزئير الأسد.
Verse 45
त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां समुत्थितम् | प्रदध्मतु: शड्खवरौ वासुदेवधनंजयौ,आपके सैनिकोंद्वारा किये हुए उस भयंकर कोलाहलको सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुनने अपने श्रेष्ठ शंखोंको बजाया
قال سنجيا: لما سمع فاسوديفا (كريشنا) ودهانَنْجَيا (أرجونا) ذلك الهدير الرهيب الذي أثارته جيوشك، نفخا في صدفتيهما الممتازتين—إشارةً جوابيةً إلى الثبات والعزم، وثقةٍ بالحق وسط ضجيج الحرب.
Verse 46
तेन शब्देन महता पूरितेयं वसुंधरा । सशैला सार्णवद्वीपा सपाताला विशाम्पते,प्रजानाथ! उस महान् शब्दसे पर्वत, समुद्र, द्वीप और पातालसहित यह सारी पृथ्वी गूँज उठी
قال سنجيا: بذلك الصوت العظيم، يا سيدَ الناس، دوّت الأرضُ كلها—بجبالها وبحارها وجزرها، وحتى عوالمها السفلى (باتالا).
Verse 47
स शब्दो भरतश्रेष्ठ व्याप्य सर्वा दिशो दश । प्रतिसस्वान तत्रैव कुरुपाण्डवयोर्बले
قال سنجيا: يا خيرَ آلِ بهاراتا، إن ذلك الصوت انتشر في الجهات العشر، ثم ارتدّ صداه هناك في الميدان نفسه مرارًا وتكرارًا بين جيشي الكورو والپاندڤا.
Verse 48
भरतश्रेष्ठ)] वह शब्द सम्पूर्ण दसों दिशाओंमें व्याप्त होकर वहीं कौरव-पाण्डव सेनाओंमें प्रतिध्वनित होता रहा ।। तावका रथिनस्तत्र दृष्टवा कृष्णधनंजयौ । सम्भ्रमं परमं प्राप्तास्त्वरमाणा महारथा:
يا خيرَ آلِ بهاراتا، لقد انتشر ذلك الصوت في الجهات العشر كلّها، وظلّ يتردّد صداه في صفوف جيشي الكورَڤا والباندَڤا. فلمّا رأى فرسانُ العربات من الكورَڤا—أولئك الأبطال العظام—كريشنا ودهانَنْجَيا (أرجونا) هناك، استولى عليهم فزعٌ بالغ، فاندفعوا مسرعين إلى الأمام في اضطراب.
Verse 49
आपके रथी और महारथी वहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनको उपस्थित देख बड़े भारी उद्वेगमें पड़कर उतावले हो उठे ।।
قال سنجيا: ثم إنّ محاربيك، لمّا رأوا الجليلين—كريشنا وأرجونا—قائمين هناك في دروعهما، اندفعوا نحوهما غاضبين. وكأنّ الأمر عجيبٌ حقًّا: ففي لهيب الحرب دفعتهم الهياجَةُ والسخطُ إلى أن يهجموا على الزوج الذي كانت هيبته وحدها كفيلةً بأن تزلزل شجاعة أعظم المقاتلين.
Verse 102
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनवचनविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا تنتهي في «المهابهاراتا المباركة» من «دروṇa پرفا»، ضمن قسم «مقتل جايدَرَثا»، الفصلُ الثاني بعد المئة، المتعلّقُ بكلام دُريودَهَنا.
Verse 103
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनपराजये त्रयधिकशततमो<ध्याय:
قال سنجيا: وهكذا، في «المهابهاراتا المباركة»، ضمن «دروṇa پرفا»—وخاصةً في قسم «مقتل جايدَرَثا»—ينتهي الفصلُ الثالث بعد المئة، المعنونُ بهزيمة دُريودَهَنا.
Verse 203
नैनं गोप्स्यति दुर्बुद्धिमद्य बाणहतं मया । फिर देवराज इन्द्रने विधि एवं रहस्यसहित वह कवच मुझे प्रदान किया। यदि दुर्योधनका यह कवच देवताओंद्वारा निर्मित हो अथवा स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ हो तो भी आज मेरे बाणोंद्वारा मारे गये इस दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह बचा नहीं सकेगा
قال أرجونا: «اليوم، وقد صرعتُ هذا السيّئَ الرأي بسهامي، فلن تنفعه حمايةٌ كائنةً ما كانت. ولو كانت دروعُه قد مُنحت له بأمرٍ سرّي من إندرا، أو صاغتها الآلهة، أو صنعها براهما نفسه، فلن تقدر على أن تقيَ دُريودَهَنا عاقبةَ أفعاله في هذه المعركة.»
Verse 226
तानस्यास्त्रेण चिच्छेद दौणि: सर्वास्त्रधातिना । धनुषके बीचमें रखकर अर्जुनके द्वारा खींचे जानेवाले उन बाणोंको अभ्वत्थामाने सर्वस्त्रधातक अस्त्रके द्वारा काट डाला
قال سنجيا: ثم إن ابن درونا (أشڤتّامان)، وقد استعمل السلاح المسمّى «سرفاسترادهاتين» (Sarvāstradhātin)، قطع تلك السهام—السهام التي كان أرجونا يشدّها ويطلقها وقوسه ثابت بين يديه. ويُبرز هذا المشهد تصاعدَ المبارزة بين المهارة ونقيضها في الحرب، حيث تُجابَه القوةُ بالقوة، وتكمنُ المعضلةُ الأخلاقيةُ في أن براعةَ القتال قد تحمي، وقد تُضاعفُ الدمار في آنٍ واحد.
Verse 246
अस्त्र मामेव हन्याद्धि हन्याच्चापि बल॑ मम । “जनार्दन! इस अस्त्रका मैं दो बार प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेपर यह मुझे ही मार डालेगा और मेरी सेनाका भी संहार कर देगा'
قال سنجيا: «إن هذا السلاح سيصيبني أنا نفسي حقًّا، وسيُهلك كذلك جندي وقوتي. لذلك، يا جناردانا، لا أستطيع أن أستعمل هذا المقذوف مرةً ثانية؛ فلو فعلتُ لارتدّ عليّ وجلب الخراب على جانبي أيضًا».
Verse 253
अविध्यत रणे राजन् शरैराशीविषोपमै: । राजन्! इसी समय दुर्योधनने रणक्षेत्रमें विषधर सर्पके समान भयंकर नौ-नौ बाणोंसे श्रीकृष्ण और अर्जुनको घायल कर दिया
قال سنجيا: أيها الملك، في غمرة القتال أصاب بسهام كالأفاعي السامة. وفي تلك اللحظة بعينها جرح دوريودھانا، في ساحة الحرب، شري كريشنا وأرجونا بتسعٍ وتسعٍ من النبال المروّعة. وتُبيّن الآية كيف تُضخّم الحرب الغضبَ والمهارة حتى يغدوا أدواتٍ للأذى، فتختبر ضبط النفس والاستقامة وسط الفوضى.
The dilemma is the conflict between reputation and responsibility: Duryodhana interprets breakthrough as Droṇa’s failure, while Droṇa argues that dharma in command requires triage—accepting partial losses to prevent a catastrophic objective (Jayadratha’s fall).
Under high uncertainty, ethical action often takes the form of disciplined prioritization: define the decisive stake, allocate roles, and act promptly, while recognizing that outcomes (jaya/ajaya) remain contingent.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary operates indirectly through Droṇa’s dice-wager analogy, emphasizing interpretive awareness of how prior actions and policies shape present consequences.
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