
Chapter Arc: युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं—दुर्वासा के प्रसाद से जो अद्भुत प्रसंग घटा, उसमें भगवान शंकर का माहात्म्य, उनके नाम और उनका महान सौभाग्य क्या है; वे उसे विस्तार से जानना चाहते हैं। → वायुदेव (वक्ता-रूप में) कपर्दी रुद्र को नमस्कार कर उस दिव्य आख्यान का आरम्भ करते हैं: देवगण एक संकट में घिरते हैं, असुर-बल बढ़ता है, और देवताओं की सभा में रुद्र की शरणागति का भाव तीव्र होता जाता है; साथ ही देवताओं के भीतर अहं और ईर्ष्या की रेखाएँ भी उभरती हैं। → इन्द्र ईर्ष्यावश वज्र से प्रहार करना चाहते हैं, पर वह दिव्य बालक/ईश्वर-तत्त्व वज्र को स्तम्भित कर देता है; समस्त देवता और प्रजापति भी उस भुवनेश्वर को पहचान नहीं पाते और विस्मय में डूब जाते हैं—यहीं रुद्र की अचिन्त्य सत्ता का प्रत्यक्ष उद्घाटन होता है। → देवगण रुद्र की सर्वरूपता का स्तवन करते हैं—वह एक भी हैं, दो भी, अनेक भी; शत, सहस्र, शतसहस्र रूपों में व्याप्त हैं। अंततः देवता रुद्र से प्रार्थना करते हैं कि वे दैत्यों का संहार कर लोकों की रक्षा करें और धर्म-व्यवस्था को स्थिर करें। → देवताओं की याचना के बाद रुद्र की प्रत्युत्तर-क्रिया और दैत्यों के विनाश का अगला चरण आगे के प्रसंग की ओर संकेत करता है।
Verse 1
नफमशा+ (0) अमन न षष्टर्याधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शड्करके माहात्म्यका वर्णन युधिछिर उवाच दुर्वासस: प्रसादात् ते यत् तदा मधुसूदन । अवाप्तमिह विज्ञान तन्मे व्याख्यातुमरहसि
犹提施提罗说道:“摩杜苏达那啊,当时你在此世间因杜尔婆萨的恩泽而获得的那份殊胜洞见,请为我详尽开示。”
Verse 2
महाभाग्यं च यत् तस्य नामानि च महात्मन: । तत् त्वत्तो ज्ञातुमिच्छामि सर्व मतिमतां वर
犹提施提罗说道:“智慧者中最胜的奎师那啊,我愿从你处如实知晓那位大魂者非凡的福运,以及他的诸名号。请将这一切为我详尽说明。”
Verse 3
वायुदेव उवाच हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने । यदवाप्तं मया राजन् श्रेयो यच्चार्जितं यश:
风神伐由说道:“来吧,国王啊!我将向你叙述——先向卡帕尔丁(湿婆,结发之主)恭敬顶礼——我所获得的真正善果,以及我所赢得的声名。”
Verse 4
प्रयत: प्रातरुत्थाय यदधीये विशाम्पते । प्राज्जलि: शतरुद्रीयं तन््मे निगदत: शृणु
伐由说道:“人民之主啊,我每日黎明即起,摄持心意与诸根,合掌诵读并研习《娑多卢陀利耶》(Śatarudrīya)。且听我如今向你宣说。”
Verse 5
प्रजापतिस्तत् ससृजे तपसो<न्ते महातपा: । शड्करस्त्वसृजत् तात प्रजा: स्थावरजड़मा:,तात! महातपस्वी प्रजापतिने तपस्याके अन्तमें उस शतरुद्रियकी रचना की और शंकरजीने समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की
伐由说道:“在苦行圆满之际,大苦行者生主(Prajāpati)使那(神圣的仪轨言辞)得以出现。随后,商羯罗啊,亲爱的,他又生出世间众生——不动者与动者皆然。”
Verse 6
नास्ति किंचित् परं भूतं महादेवाद् विशाम्पते । इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः
伐由说道:“人民之主啊,在这三界之中,绝无任何存在高于大天(Mahādeva)。因为他确是万有众生所由生起的本源。”
Verse 7
न चैवोत्सहते स्थातु कश्रिदग्रे महात्मन: । न हि भूतं सम॑ तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते,उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है
伐由说道:“无人敢在那位大魂者面前挺立。诚然,遍及三界,绝无与他相等的存在。”
Verse 8
गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रव:ः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च
风神伐由说道:在战场上,当他震怒之时,单凭他的气息与芬芳,敌军便会昏厥失神;他们仿佛已被杀灭,战栗不止,继而倒伏于地。
Verse 9
घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम् | श्रुत्वा विशीर्येद् हृदयं देवानामपि संयुगे,संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है
“而在战阵交击之中,若听见他那可怖的咆哮——深沉如雷云轰鸣——纵然诸天之心,也可能为之碎裂。”
Verse 10
यांश्व घोरेण रूपेण पश्येत् क्रुद्ध/ पिनाकधृत् | न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगा:
凡被执持“毗那迦”神弓之主在震怒时、以可怖形相所注视者,世间无有能立于其前者:非天神,非阿修罗,非乾闼婆,亦非龙蛇之族。
Verse 11
प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया
风神说道:当生主达叉(Dakṣa)举行祭祀之时,仪式方才开端,愤怒的商羯罗(Śaṅkara)便无畏而立;他以箭矢洞穿祭仪,又自弓上连发利箭,并以深沉之声发出狮子般的咆哮——宣告那已沦为对神圣秩序与敬礼之冒犯的祭礼走向崩塌。
Verse 12
विव्याध कुपितो यज्ञ निर्भयस्तु भवस्तदा । धनुषा बाणमुत्यज्य सघोषं विननाद च
当时,婆婆(Bhava)震怒而无所畏惧,以箭矢洞穿祭礼;继而自弓上放出利箭,并发出轰然巨响。
Verse 13
प्रजापतेश्व॒ दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ
当生主达克沙正在举行铺陈宏大的祭祀之时,诸天却得不到安宁——既无安宁,又从何得平静?当祭坛骤然被箭矢贯穿,而大自在天(摩诃湿婆)震怒之际,可怜的天众便陷入深深的忧惧与沮丧之中。
Verse 14
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोका: समाकुला: । बभूवुरवशा: पार्थ विषेदुश्च सुरसुरा:,पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये
随着他弓弦一声雷霆般的震响,诸世界尽皆骚动。噢,帕尔塔啊,四方众生因恐惧而无力自持,连诸天与阿修罗也沉入沮丧——仅此一声,便显出压倒性的威势。
Verse 15
आपक्षुक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा । व्यद्रवन् गिरयश्चापि द्यौ: पफाल च सर्वश:,समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा
海洋与诸水剧烈翻搅;大地震颤;群山仿佛融化奔走;连苍穹也似向四方裂开。
Verse 16
अन्धेन तमसा लोका:ः प्रावृता न चकाशिरे । प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत
诸世界被浓重的黑暗所笼罩,不复光明。噢,婆罗多啊,诸天体——行星与群星——的灿然光辉也与太阳一同从视野中消失。
Verse 17
भृशं भीतास्तत: शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च । ऋषय: सर्वभूतानामात्मनश्न हितैषिण:,सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे
诸仙人惊惧万分,便行息灾之仪,诵吉祥祝祷之辞。为求一切众生之安乐——亦为自身之安稳——他们以这些安抚之举,欲避祸患,复归秩序。
Verse 18
ततः सो<भ्यद्रवद् देवान् रुद्रो रौद्रपराक्रम: । भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत्,तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये
随即,威势凶猛可怖的鲁陀罗冲向诸天。盛怒之下,他一击便毁去了婆伽神的双眼。
Verse 19
पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वित: । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत्,फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला
随后,他怒气冲天,徒步追赶普尚神。普尚正食用祭祀的普罗陀沙时,鲁陀罗击碎了他的牙齿。
Verse 20
ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमाना: सम शड्करम् | पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम्
于是诸神战栗不已,向商羯罗顶礼。与此同时,鲁陀罗又一次搭上一支炽燃如火、锋利如刃的箭。
Verse 21
रुद्रस्य विक्रमं दृष्टवा भीता देवा: सहर्षिभि: । ततः प्रसादयामासु: शर्व ते विबुधोत्तमा:,रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्या उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान् शिवको प्रसन्न किया
诸神与众仙见鲁陀罗威势无匹,皆惊惧战栗。于是天众之首便设法安抚舍婆(湿婆),求得其欢心与恩许。
Verse 22
जेपुश्न शतरुद्रीयं देवा: कृत्वाउ्जलिं तदा । संस्तूयमानस्त्रिदशै: प्रससाद महेश्वर:,उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओं के द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये
当时诸神合掌恭敬,开始诵念《娑多鲁陀利耶》圣颂。三十三天众齐声赞颂之下,大自在天(摩醯首罗)心生欢喜,遂垂恩而悦。
Verse 23
रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्ट ते त्वकल्पयन् | भयेन त्रिदशा राजन् शरणं च प्रपेदिरे
风神伐由说道:“大王,诸天因恐惧而投奔鲁陀罗(商羯罗)求庇护。随后他们在祭祀中为他划定一份独特而尊贵的份额——将祭余之物尽皆归属鲁陀罗。”
Verse 24
तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञ: संधितो5भवत् । यद् यच्चापद्वतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत्
当(商羯罗)因此而欢悦时,那场祭祀便得以复原并圆满完成。其间凡被毁坏之物,他都使之如旧复生,丝毫不差。
Verse 25
असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवर्तां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम्
风神伐由说道:“在远古之时,强盛的阿修罗拥有三座在空中行移的坚固天城。其一为铁所铸,其二为银所成,其三则以金打造。”
Verse 26
नाशकत् तानि मघवा जेतु सर्वायुधैरपि । अथ सर्वेडमरा रुद्रं जग्मु: शरणमर्दिता:
摩伽婆(因陀罗)纵使动用一切兵器,也不能征服那些城池。于是诸天尽皆困厄受迫,前往鲁陀罗处求取庇护。
Verse 27
तत ऊचुर्महात्मानो देवा: सर्वे समागता: । रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशव: सर्वकर्मसु
于是诸神皆为大心之众,聚集而言:“噢,鲁陀罗啊,在一切祭仪与诸般事业之中,供祭之兽将变得凶暴难驯。”
Verse 28
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम्
如是受请,湿婆应允道:“如是。”随即他以毗湿奴为至上之箭,以阿耆尼为箭之锐锋,以毗婆斯瓦特·阎摩为箭羽,使诸吠陀为弓,以伽耶特丽为上妙弓弦,并立梵天为御者。诸力各安其职之后,他以那支具三节、三刃之箭,洞穿三城,使之崩坠。
Verse 29
शल्यमरग्निं तथा कृत्वा पुड्खं वैवस्वतं यमम् । वेदान् कृत्वा धनु: सर्वान् ज्यां च सावित्रिमुत्तमाम्
风神伐由说道:“他以火神为箭之锐首,以毗婆斯瓦特·阎摩为箭羽;以诸吠陀为弓,以至上的娑毗特丽(伽耶特丽)为弓弦。湿婆以‘如是’允其所请,令诸神力各司其职,遂以那三节三刃之矢,贯穿并粉碎三城。”
Verse 30
ब्रहद्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वश:ः । त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः
风神伐由说道:“他立梵天为御者,令诸力各安其职;随后湿婆以那支三节三刃之箭,洞穿并粉碎那三座城。”
Verse 31
शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा । तेडसुरा: सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत
风神伐由说道:“仅以一箭——光辉如日,炽烈如劫尽之火——鲁陀罗啊,婆罗多之子,他将彼处阿修罗连同其坚固城垒尽皆焚为灰烬。”
Verse 32
तं चैवाड्कगतं दृष्टवा बालं पजचशिखं पुन: । उमा जिज्ञासमाना वै को<यमित्यब्रवीत् तदा
她又见他化现为一名五绺发髻的孩童,坐在自己膝上;乌玛渴求明了真相,当即问诸天神:“此人是谁?”
Verse 33
असूयतश्च शक्रस्य वज्ेण प्रहरिष्यत: । स वज्ं स्तम्भयामास त॑ बाहुं परिघोपमम्
风神伐由说道:当释迦(因陀罗)被嫉妒攫住,正要举起金刚雷霆下击之时,那少年竟使他那持金刚的臂膀——粗壮可怖,如铁杵一般——连同雷霆一并凝住,动弹不得。
Verse 34
न सम्बुबुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम् । सप्रजापतय: सर्वे तस्मिन् मुमुहुरी श्चरे,समस्त देवता और प्रजापति उन भुवनेश्वर महादेवजीको न पहचान सके। सबको उन ईश्वरके विषयमें मोह छा गया
风神伐由说道:连诸天也未能认出那位世间之主。众神与诸生主(般阇波提)尽皆迷惘,对那至上主宰的真实本性陷入幻惑。
Verse 35
ततो ध्यात्वा च भगवान् ब्रह्मा तममितौजसम् | अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम्
随后,尊贵的梵天入定观照,认出了那位威光无量的主宰。既知“此者为最上”,便向乌玛之夫(湿婆)俯首礼拜。
Verse 36
ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुरा: । बभूव स तदा बाहुर्बलहन्तुर्यथा पुरा,तत्पश्चात् उन देवताओंने उमादेवी और भगवान् रुद्रको प्रसन्न किया। तब इन्द्रकी वह बाँह पूर्ववत् हो गयी
于是诸神设法取悦乌玛与鲁陀罗。蒙其恩泽,那只曾摧折力量的臂膀,便复归如初。
Verse 37
स चापि ब्राह्माणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान् द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत्,वे ही पराक्रमी महादेव दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें मेरे घरके भीतर दीर्घकालतक टिके रहे
而那位大能者又化作婆罗门之身,名为杜尔瓦萨,在我位于堕罗伐底(德瓦拉迦)的家中久住多时。
Verse 38
विप्रकारान् प्रयुद्धक्ते सम सुबहून् मम वेश्मनि । तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान्
风神伐由说道:“就在我自己的居所之中,许多婆罗门对我犯下过失,甚至以敌意相向。虽其所为极难忍受,我仍以宽宏之心忍耐,并加以赦宥。”
Verse 39
स वै रुद्र: स च शिव: सो<ग्नि: सर्व: स सर्वजित् | स चैवेन्द्रश्न वायुश्न सोडश्चिनौ स च विद्युत:
风神伐由说道:“他确是鲁陀罗;他亦是湿婆。他是阿耆尼,是遍在的实相,是征服一切者。他是因陀罗,也是伐由;他是双生的阿湿毗尼,也是闪电。”
Verse 40
स चन्द्रमा: स चेशान: स सूर्यो वरुणश्न सः । स काल: सोडन््तको मृत्यु: स यमो रात्र्यहानि च
风神伐由宣告:“他是月与伊沙那;他是日与伐楼那。他就是时间本身,是终结者,是死亡;他是阎摩,也是昼夜交替的节律。”
Verse 41
मासार्धमासा ऋतव: संध्ये संवत्सरश्न सः । स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित्,मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर भी वे ही हैं। वे ही धाता, विधाता, विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं
风神伐由宣告:“时间的尺度——月、半月、季节、晨昏交界与一年——皆唯彼至上者而已。他是达塔与维达塔,是毗湿伐羯摩(宇宙的工匠),亦是全知者。”
Verse 42
नक्षत्राणि गृहाश्वैव दिशो5थ प्रदिशस्तथा । विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान् परमद्युति:,नक्षत्र, गृह, दिशा, विदिशा भी वे ही हैं। वे ही विश्वरूप, अप्रमेयात्मा, षड़्विध ऐश्वर्यसे युक्त एवं परम तेजस्वी हैं
风神伐由说道:“唯有他是群星与天界宫宇;他是诸方与诸隅亦然。那位具福的至上主——以宇宙为形,其自性不可度量,其光辉至极——遍入这一切,作为它们内在的真实。”
Verse 43
एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि । शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा,उनके एक, दो, अनेक, सौ, हजार और लाखों रूप हैं
风神(Vāyu)说道:“唯有彼一者,或现一相,或现二相,或现多相;亦复现百相、千相,乃至十万相。”
Verse 44
ईदृश: स महादेवो भूयश्वष भगवानत: । न हि शक््या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि,भगवान् महादेव ऐसे प्रभावशाली हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर हैं। सैकड़ों वर्षोमें भी उनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता
风神(Vāyu)说道:“此即大自在天(Mahādeva)之如是;然其伟大更过于此。纵使穷尽百年之言辞,亦不能尽述其功德。”
Verse 103
कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागता: । पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें
当执持频那迦(Pināka)之鲁陀罗(Rudra)震怒,以可怖之相注视于人时,纵其心亦将碎裂成片。于此世间,若世尊商羯罗(Śaṅkara)发怒,即便天神、阿修罗、乾闼婆与龙族奔逃入洞穴藏匿,也不得安宁。
Verse 159
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुवासाकी भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,神圣《摩诃婆罗多》阿努沙娑那篇(Anuśāsana Parva)之“布施法”(Dāna-dharma)中,题为《杜尔瓦萨的施食》(“Durvāsā’s Alms”)的第一百五十九章圆满结束。
Verse 160
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ईश्वरप्रशंसा नाम षष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपववके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ईश्चषरकी प्रशंसा नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ
如是,在《圣摩诃婆罗多》之阿努沙娑那篇(Anuśāsana Parva)“布施法”(Dāna-dharma)中,题为《赞颂主宰》(“Praise of the Lord”)的第一百六十章告终。
Verse 276
जहि दैत्यान् सह पुरैलोंकांस्त्रायस्व मानद | तदनन्तर वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण महामना देवताओंने रुद्रदेवसे कहा--“भगवन् रुद्र! पशुतुल्य असुर हमारे समस्त कर्मोंके लिये भयंकर हो गये हैं और भविष्यमें भी ये हमें भय देते रहेंगे। अत: मानद! हमारी प्रार्थना है कि आप तीनों पुरोंसहित समस्त दैत्योंका नाश और लोकोंकी रक्षा करें"
风神伐由说道:“当诛灭诸代底耶,并连同他们的城邑;护持诸世界吧,赐荣誉者!” 随后,凡已至彼处的一切大心诸天,便对鲁陀罗说道:“吉祥的鲁陀罗啊!这些如兽般的阿修罗,已成我们一切神圣事业与祭仪的可怖祸患;将来亦必继续威胁我们。故此,尊贵者,我们恳请你:连同三座城一并毁灭诸代底耶,并护佑诸世界。”