
Gandhamādana-praveśa and the Sudden Storm (गन्धमादनप्रवेशः — चण्डवातवर्षवर्णनम्)
Upa-parva: Gandhamādana-gamana (Pandavas’ entry into Gandhamādana)
Vaiśaṃpāyana reports that armed, capable warriors escort eminent brāhmaṇas as the Pandavas, with Draupadī, advance toward Gandhamādana. On the mountain they observe rivers, lakes, forests, shaded trees, and ever-flowering, ever-fruiting tracts frequented by divine and sage-like beings. Sustaining themselves on roots and fruits, they traverse uneven, hazardous terrain while observing diverse wildlife. Upon entering Gandhamādana, a violent wind and heavy rain arise; dust and leaf-laden debris obscure earth and sky, disrupting visibility and communication. Stones and pulverized grit are driven by the wind; trees crack and fall with loud reports, generating confusion and fear. The party searches by touch for nearby trees, anthills, and uneven ground to take shelter. Bhīma raises his bow and draws Draupadī close, bracing beside a tree; Yudhiṣṭhira and Dhaumya conceal themselves in the forest; Sahadeva secures agnihotra implements; Nakula, other brāhmaṇas, and the ascetic Lomaśa shelter among trees. As the wind subsides, rain intensifies into stone-mixed torrents and foaming, turbulent flows that surge loudly and uproot vegetation. When wind and rain cease and sunlight returns, the group regathers and resumes the ascent toward Gandhamādana.
Chapter Arc: गन्धमादन-प्रवेश के पवित्र पथ पर लोमश ऋषि पाण्डवों को दिव्य मन्दराचल की ओर ले चलते हैं और कहते हैं—यह देव-निवास और पुण्यात्मा ऋषियों का निवास-स्थान है; अतः मन को समाहित कर, उद्वेग त्याग कर चलो। → मार्ग की दिव्यता के साथ उसका भय भी बढ़ता है—देव-प्रदेश में प्रवेश के लिए संयम, विनय और शुद्ध आचरण अनिवार्य है। पाण्डव लोमश के वचन सुनकर ‘आकाशगंगा’ (गंगा) को प्रणाम करते हैं; यात्रा अब केवल भूगोल नहीं, तप और पात्रता की परीक्षा बन जाती है। → लोमश के उपदेश के बीच पृथ्वी-देवी की व्यथा का प्रसंग उभरता है—भारी भार से पीड़ित वसुधा नारायण की शरण में जाती है; वहीं वराह-रूप द्वारा वसुधा-उद्धार का महात्म्य और नरकासुर-वध की कथा का संकेत देव-शक्ति के निर्णायक हस्तक्षेप को चरम बिन्दु बनाता है। → कथा-श्रवण से पाण्डवों का चित्त स्थिर और प्रहृष्ट होता है; वे लोमश-निर्दिष्ट पथ पर शीघ्र आगे बढ़ते हैं—तीर्थयात्रा का उद्देश्य (शुद्धि, धैर्य, और देव-आश्रय) पुनः दृढ़ हो जाता है। → देव-निवास की सीमा पर पहुँचकर आगे के दिव्य आश्रमों/तीर्थों और वहाँ की परीक्षाओं का संकेत—अगले चरण में गन्धमादन के भीतर कौन-सा अद्भुत दर्शन या विघ्न प्रतीक्षा कर रहा है?
Verse 1
अपर अप हूँ... आपके अप: द्विचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना लोगश उवाच द्रष्टार: पर्वता: सर्वे नद्य: सपुरकानना: । तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करै:,लोमशजीने कहा--तीर्थदर्शी पाण्डुकुमारो! तुमने सब पर्वतोंके दर्शन कर लिये। नगरों और वनोंसहित नदियोंका भी अवलोकन किया। शोभाशाली तीर्थोंके भी दर्शन किये और उन सबके जलका अपने हाथोंसे स्पर्श भी कर लिया
Lomaśa berkata: “Wahai putra Pāṇḍu, engkau telah menyaksikan semua gunung; engkau pun telah meninjau sungai-sungai beserta kota-kota dan rimba di sekitarnya. Engkau telah mengunjungi tīrtha-tīrtha yang mulia, bahkan menyentuh airnya dengan tanganmu sendiri.”
Verse 2
पर्वतं मन्दरं दिव्यमेष पन्था: प्रयास्यति । समाहिता निरुद्धिग्ना: सर्वे भवत पाण्डवा:,पाण्डवो! यह मार्ग दिव्य मन्दराचलकी ओर जायगा। अब तुम सब लोग उद्धेगशून्य और एकाग्रचित्त हो जाओ। यह देवताओंका निवासस्थान है, जिसपर तुम्हें चलना होगा। यहाँ पुण्यकर्म करनेवाले दिव्य ऋषियोंका भी निवास है
Jalan ini menuju Gunung Mandara yang ilahi. Karena itu, wahai para Pāṇḍava, jadilah kalian semua teguh dalam batin dan bebas dari kegelisahan.
Verse 3
अयं देवनिवासो वै गन्तव्यो वो भविष्यति । ऋषीणां चैव दिव्यानां निवास: पुण्यकर्मणाम्,पाण्डवो! यह मार्ग दिव्य मन्दराचलकी ओर जायगा। अब तुम सब लोग उद्धेगशून्य और एकाग्रचित्त हो जाओ। यह देवताओंका निवासस्थान है, जिसपर तुम्हें चलना होगा। यहाँ पुण्यकर्म करनेवाले दिव्य ऋषियोंका भी निवास है
Inilah benar-benar kediaman para dewa; inilah jalan yang harus kalian tempuh. Ini pula tempat tinggal para ṛṣi yang bercahaya—mereka yang hidupnya ditopang oleh kebajikan dan karma suci.
Verse 4
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी । बदरीप्रभवा राजन् देवर्षिगणसेविता,सौम्य स्वभाववाले नरेश! यह कल्याणमय जलसे भरी हुई पुण्यस्वरूपा महानदी अलकनन्दा (गंगा) प्रवाहित होती है, जो देवर्षियोंके समुदायसे सेवित है। इसका प्रादुर्भाव बदरिकाश्रमसे ही हुआ है
Lomaśa berkata: “Wahai raja yang berhati lembut, sungai agung ini suci, penuh air yang membawa keberkahan, dan terus mengalir. Ia bersumber dari Badarī (Badarikāśrama) dan dilayani serta dimuliakan oleh rombongan para resi ilahi.”
Verse 5
एषा वैहायसैर्नित्यं बालखिल्यैर्महात्मभि: । अर्चिता चोपयाता च गन्धर्वैश्न महात्मभि:,आकाशचारी महात्मा बालखिल्य तथा महामना गन्धर्वगण भी नित्य इसके तटपर आते-जाते हैं और इसकी पूजा करते हैं
“Para resi agung Bālakhilya yang melintas di angkasa senantiasa memuja tempat suci ini dan datang-pergi ke tepinya; demikian pula para Gandharva yang mulia, yang secara teratur berkunjung dan bersembahyang di sini.”
Verse 6
अत्र साम सम गायन्ति सामगा: पुण्यनि:स्वना: | मरीचि: पुलहश्चैव भुगुश्चैवाड्धिरास्तथा,सामगान करनेवाले विद्वान् वेदमन्त्रोंकी पुण्यमयी ध्वनि फैलाते हुए यहाँ सामवेदकी ऋचाओंका गान करते हैं। मरीचि, पुलह, भूगु तथा अंगिरा भी यहाँ जप एवं स्वाध्याय करते हैं
“Di sini para pelantun Sāma yang bersuara suci dan membawa berkah menyanyikan kidung-kidung Sāmaveda, menebarkan gema sakral ke segala penjuru. Di sini pula para resi Marīci, Pulaha, Bhṛgu, dan Aṅgiras tekun dalam japa serta swādhyāya.”
Verse 7
अत्राह्निकं सुरश्रेष्ठो जपते समरुदूगण: । साध्याक्षैवाश्विनौ चैव परिधावन्ति तं॑ तदा,देवश्रेष्ठ इन्द्र भी मरुदुगणोंके साथ यहाँ आकर प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करते हैं। उस समय साध्य तथा अश्विनीकुमार भी उनकी परिचर्यामें रहते हैं
“Di sini, yang termulia di antara para dewa—Indra—melakukan japa harian (āhnika) dengan tertib, ditemani rombongan Marut. Pada saat itu para Sādhya dan kedua Aśvin pun hadir melayaninya, bergerak ke sana kemari dalam bakti.”
Verse 8
चन्द्रमा: सह सूर्येण ज्योतींषि च ग्रहै: सह । अहोरात्रविभागेन नदीमेनामनुव्रजन्,चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र भी दिन-रातके विभागपूर्वक इस पुण्य नदीकी यात्रा करते हैं
Lomaśa berkata: “Bulan bersama Matahari—dan cahaya-cahaya langit lainnya beserta planet-planet—mengikuti aliran sungai suci ini menurut tatanan pembagian siang dan malam.”
Verse 9
एतस्या: सलिल मूर्थ्नि वृषाडुक: पर्यधारयत् । गड़ाद्वारे महाभाग येन लोकस्थितिर्भवेत्,महाभाग! गंगाद्वार (हरिद्वार)-में साक्षात् भगवान् शंकरने इसके पावन जलको अपने मस्तकपर धारण किया है, जिससे जगत्की रक्षा हो
Di Gaṅgādvāra (Haridvāra), Bhagavān Śaṅkara yang mulia menanggung di atas kepalanya air suci sungai ini, agar keteguhan dan perlindungan dunia tetap terjaga.
Verse 10
एतां भगवतीं देवीं भवन्त: सर्व एव हि । प्रयतेनात्मना तात प्रतिगम्याभिवादत,तात! तुम सब लोग मनको संयममें रखते हुए इस ऐश्वर्यशालिनी दिव्य नदीके तटपर चलकर इसे सादर प्रणाम करो
Wahai anakku, kalian semua hendaknya dengan batin yang terkendali mendatangi tepi sang Dewi yang mulia ini—sungai ilahi—dan menyampaikan sembah hormat.
Verse 11
तस्य तद् वचन श्रुत्वा लोमशस्य महात्मन: । आकाशगड्जां प्रयता: पाण्डवास्ते5भ्यवादयन्,महात्मा लोमशका यह वचन सुनकर सब पाण्डवोंने संयतचित्तसे भगवती आकाशगंगा (अलकनन्दा) को प्रणाम किया
Mendengar sabda Mahātmā Lomasha itu, para Pāṇḍava dengan hati yang tertata dan penuh hormat bersujud kepada Gaṅgā surgawi, Ālakanandā.
Verse 12
अभिवाद्य च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिण: । पुन: प्रयाता: संहृष्टा: सर्वे्रषिगणै: सह,प्रणाम करके धर्मका आचरण करनेवाले वे समस्त पाण्डव पुनः सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंके साथ हर्षपूर्वक आगे बढ़े
Setelah menyampaikan penghormatan, semua Pāṇḍava yang teguh dalam dharma pun berangkat lagi dengan hati bersukacita, bersama seluruh rombongan para resi.
Verse 13
ततो दूरात् प्रकाशन्तं पाण्डुरं मेरुसंनिभम् | ददृशुस्ते नरश्रेष्ठा विकीर्ण सर्वतोदिशम्,तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक श्वेत पर्वत-सा देखा जो मेरुगिरिके समान दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था। वह सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखरा जान पड़ता था
Kemudian, para Pāṇḍava—yang terbaik di antara manusia—melihat dari kejauhan suatu hamparan putih pucat yang bersinar jelas, laksana Gunung Meru, seakan terbentang ke segala penjuru.
Verse 14
तान् प्रष्टकामान् विज्ञाय पाण्डवान् स तु लोमश: । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञ: शृणुध्वं पाण्डुनन्दना:,लोमशजी ताड़ गये कि पाण्डवलोग उस श्वेत पर्वताकार वस्तुके विषयमें कुछ पूछना चाहते हैं, तब प्रवचनकी कला जाननेवाले उन महर्षिने कहा--*पाण्डवो! सुनो
Mengetahui bahwa para Pāṇḍava hendak bertanya tentang hal itu, resi Lomaśa—yang mahir merangkai ujaran yang tepat—berkata: “Dengarkanlah, wahai putra-putra Pāṇḍu.”
Verse 15
एतद् विकीर्ण सुश्रीमत् कैलासशिखरोपमम् । यत् पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम्,“नरश्रेष्ठ यह जो सब ओर बिखरी हुई कैलासशिखरके समान सुन्दर प्रकाशयुक्त पर्वताकार वस्तु देख रहे हो, ये सब विशालकाय नरकासुरकी हडियाँ हैं। पर्वत और शिलाखण्डोंपर स्थित होनेके कारण ये भी पर्वतके समान ही प्रतीत होती हैं
Lomaśa berkata: “Wahai insan terbaik, apa yang kau lihat berserakan di segala arah—bercahaya, elok laksana puncak Kailāsa, dan terbaring di sana seperti gunung—itulah gundukan besar yang tampak menyerupai gunung.”
Verse 16
एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मन: । पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम्,“नरश्रेष्ठ यह जो सब ओर बिखरी हुई कैलासशिखरके समान सुन्दर प्रकाशयुक्त पर्वताकार वस्तु देख रहे हो, ये सब विशालकाय नरकासुरकी हडियाँ हैं। पर्वत और शिलाखण्डोंपर स्थित होनेके कारण ये भी पर्वतके समान ही प्रतीत होती हैं
Lomaśa berkata: “Wahai insan terbaik, inilah tulang-belulang Daitya agung Narakāsura. Karena bersandar pada gunung dan bongkah-bongkah batu, ia berkilau dan tampak laksana gunung itu sendiri.”
Verse 17
पुरातनेन देवेन विष्णुना परमात्मना | दैत्यो विनिहतस्तेन सुरराजहितैषिणा,“पुरातन परमात्मा श्रीविष्णुदेवने देवराज इन्द्रका हित करनेकी इच्छासे उस दैत्यका वध किया था
Daitya itu dibunuh oleh Dewa purba, Viṣṇu Sang Paramātman, demi mengupayakan kesejahteraan raja para dewa, Indra.
Verse 18
दशवर्षसहस््त्राणि तपस्तप्यन् महामना: । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तप:स्वाध्यायविक्रमात्,“वह महामना दैत्य दस हजार वर्षोतक कठोर तपस्या करके तप, स्वाध्याय और पराक्रमसे इन्द्रका स्थान लेना चाहता था
Ia yang berhati besar bertapa selama sepuluh ribu tahun, dan dengan daya tapa, swādhyāya, serta keberaniannya, ia menginginkan kedudukan Indra.
Verse 19
तपोबलेन महता बाहुवेगबलेन च । नित्यमेव दुराधर्षो धर्षयन् स दिते: सुत:,“अपने महान् तपोबल तथा वेगयुक्त बाहुबलसे वह देवताओंके लिये सदा अजेय बना रहता था और स्वयं सब देवताओंको सताया करता था
Dengan kekuatan tapa yang amat besar dan daya dorong lengan yang dahsyat, putra Diti itu senantiasa sukar ditaklukkan. Ia terus-menerus tak terkalahkan bagi para dewa dan, karena congkak akan kekuatannya, selalu mengusik serta menindas mereka.
Verse 20
स तु तस्य बल ज्ञात्वा धर्मे च चरितव्रतम् । भयाभिभूत: संविग्न: शक्र आसीत् तदानघ,“निष्पाप युधिष्ठिर! नरकासुर बलवान तो था ही, धर्मके लिये भी उसने कितने ही उत्तम व्रतोंका आचरण किया था, यह सब जानकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, वे घबरा उठे
Namun ketika Śakra (Indra) mengetahui kekuatan raksasa itu, serta laku tapa dan kaul yang ia jalankan dengan setia demi dharma, ia diliputi ketakutan dan menjadi sangat gelisah pada saat itu. Wahai Yudhiṣṭhira yang tanpa noda, sebab Narakāsura bukan hanya perkasa, melainkan juga menempuh banyak laku suci demi kebenaran—itulah yang membuat Indra gentar.
Verse 21
तेन संचिन्तितो देवो मनसा विष्णुरव्यय: । सर्वत्रग: प्रभु: श्रीमानागतश्न स्थितो बभौ,“तब उन्होंने मन-ही-मन अविनाशी भगवान् विष्णुका चिन्तन किया, उनके स्मरण करते ही सर्वव्यापी भगवान् श्रीपति वहाँ उपस्थित हो प्रकाशित हुए
Maka ia pun merenungkan dalam batin Tuhan Viṣṇu yang tak binasa. Begitu diingat, Sang Mahahadir—penguasa yang mulia dan bersemayam dalam kemuliaan—seketika datang dan menampakkan diri, berdiri di sana dalam cahaya kewibawaan.
Verse 22
ऋषयश्चापि त॑ सर्वे तुष्ठवुश्न दिवौकस: । त॑ दृष्टवा ज्वलमानश्रीर्भगवान् हव्यवाहन:
Maka semua resi, dan para dewa pun, memujinya dengan sukacita. Melihatnya bersinar dengan kemuliaan yang menyala-nyala, Bhagavān Havyavāhana (Agni), pembawa persembahan yajña, pun menyambutnya dengan hormat.
Verse 23
नष्टतेजा: समभवत् तस्य तेजो5भिभर्त्सित: | त॑ दृष्टवा वरदं देवं विष्णुं देवगणेश्वरम्
Melihat-Nya, sinarnya pun padam; kemegahan yang dahulu ia banggakan seakan ditegur dan ditundukkan. Ketika ia berhadapan dengan dewa pemberi anugerah—Viṣṇu, penguasa para dewa—tiada lagi tempat bagi kesombongan untuk bertahan.
Verse 24
प्राउजलि: प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य च वज्रञभृत् । प्राह वाक््यं ततस्तत्त्वं यतस्तस्य भयं भवेत्
Dengan kedua telapak tangan dirapatkan penuh hormat, ia menunduk dan memberi sembah. Lalu Vajra-bhṛt (Indra) mengucapkan kata-kata yang teguh dalam kebenaran—tepat menyentuh pokok perkara yang darinya rasa takut dapat timbul baginya.
Verse 25
“उस समय सभी देवताओं तथा ऋषियोंने उनकी स्तुति की। उन्हें देखते ही प्रज्वलित कान्तिसे सुशोभित भगवान् अग्निदेवका तेज नष्ट-सा हो गया। वे श्रीहरिके तेजसे तिरस्कृत हो गये। समस्त देवसमुदायके स्वामी एवं वरदायक भगवान् विष्णुका दर्शन करके वज्रधारी इन्द्रने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बार-बार मस्तक झुकाया। तदनन्तर वे सारी बातें भगवानसे कह सुनायीं, जिनके कारण उन्हें उस दैत्यसे भय हो रहा था” | २२-- २४ ।। विष्णुरुवाच जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नकात् ततः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तप:सिद्धेन कर्मणा,तब भगवान् विष्णुने कहा--इन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हें दैत्यराज नरकासुरसे भय प्राप्त हुआ है। वह अपने तपःसिद्ध कर्मोद्वारा इन्द्रपदको लेना चाहता है
Pada saat itu para dewa dan para resi memujinya. Namun begitu mereka memandang Sang Bhagavān yang berhiaskan sinar menyala, bahkan kilau Agni yang laksana api pun seakan memudar—tertinggal oleh keagungan cahaya Śrī Hari. Melihat Viṣṇu, penguasa dan pemberi anugerah bagi seluruh kaum dewa, Indra sang pemegang vajra bersujud dengan tangan terkatup, berulang kali menundukkan kepala. Lalu ia menyampaikan kepada Tuhan segala perkara yang membuatnya gentar terhadap sang asura itu. Viṣṇu bersabda: “Śakra, Aku mengetahui ketakutanmu—yang timbul karena raja asura Naraka. Dengan daya yang diperoleh dari tapa dan perbuatan yang telah sempurna, ia berhasrat merebut kedudukan Indra.”
Verse 26
सो5हमेनं तव प्रीत्या तप:सिद्धमपि ध्रुवम् । वियुनज्मि देहाद् देवेन्द्र मुहूर्त प्रतिपालय,देवेन्द्र! यद्यपि तपस्याद्वारा उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है तो भी मैं तुम्हारे प्रेमवश निश्चय ही उस दैत्यको मार डालूगा, तुम थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो
“Karena itu, wahai Indra, demi kasih-Ku kepadamu, meski ia telah meraih keberhasilan melalui tapa, Aku pasti akan memisahkannya dari tubuhnya. Tunggu sekejap lagi, wahai raja para dewa.”
Verse 27
तस्य विष्णुर्महातेजा: पाणिना चेतनां हरत् । स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः,ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् विष्णुने हाथसे मारकर उस दैत्यके प्राण हर लिये और वह वच्रके मारे हुए गिरिराजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा
Setelah berkata demikian, Viṣṇu yang mahacemerlang menamparnya dengan tangan-Nya dan merenggut napas hidup sang asura. Seketika ia roboh ke bumi, laksana raja gunung yang dihantam vajra.
Verse 28
तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै । इदं द्वितीयमपरं विष्णो: कर्म प्रकाशते,इस प्रकार मायाद्वारा मारे गये उस दैत्यकी हड्डियोंका यह समूह दिखायी देता है। अब मैं भगवान् विष्णुका यह दूसरा पराक्रम बता रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान है
Inilah tumpukan tulang belulang makhluk yang benar-benar dibinasakan oleh daya māyā. Sekarang akan kuceritakan perbuatan Viṣṇu yang lain, yang kedua—sebuah laku agung yang termasyhur dan nyata di segala penjuru.
Verse 29
नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता । पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृद्धिणा,एक समय सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें ड्रबकर अदृश्य हो गयी, पातालमें डूब गयी। उस समय भगवान् विष्णुने पर्वतशिखरके सदृश एक दाँतवाले वाराहका रूप धारण करके पुनः इसका उद्धार किया था
Pada suatu masa seluruh Vasumatī lenyap—tenggelam dan terbenam ke Pātāla. Maka Sang Bhagavān, mengambil wujud Varāha bertaring satu, mengangkatnya kembali dan memulihkannya.
Verse 30
युधिछिर उवाच भगवन् विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः । कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये। जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhagavān, ceritakanlah kisah ini dengan rinci sesuai kebenaran. Bagaimana Vasumatī lenyap saat itu, dan dengan cara apa Sang Penguasa para dewa mengembalikannya?”
Verse 31
योजनानां शतं ब्रह्मन् पुनरुद्धरिता तदा | केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी श्लुवा,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये। जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया?
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Brahmana, saat itu Bumi diangkat kembali dari kedalaman seratus yojana. Dengan sarana apa dan dengan cara bagaimana Dharaṇī, penopang dunia, ditegakkan kembali dengan kokoh?”
Verse 32
शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी । कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता,सम्पूर्ण शस्योंका उत्पादन करनेवाली यह कल्याणमयी महाभागा वसुधादेवी किसके प्रभावसे सैकड़ों योजन नीचे धँस गयी थी
Yudhiṣṭhira berkata: “Dewi Bumi yang suci dan amat beruntung ini—yang menumbuhkan segala tanaman pangan—oleh pengaruh siapakah ia turun hingga seratus yojana?”
Verse 33
केन तद् वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मन: । एतत् सर्व यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम | श्रोतुं विस्तरश: सर्व त्वं हि तस्य प्रतिश्रय:,परमात्माके उस अद्भुत पराक्रमका दर्शन (ज्ञान) किसने कराया था? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप इस वृत्तान्तके आश्रय (ज्ञाता) हैं
Yudhiṣṭhira berkata: “Oleh siapakah seluruh perwujudan daya perkasa Sang Paramātman itu disingkapkan? Wahai yang terbaik di antara para dwija, aku ingin mendengar semuanya seturut hakikatnya, dengan selengkap-lengkapnya; sebab engkaulah sandaran yang sahih bagi kisah itu.”
Verse 34
लोगमश उवाच यत् ते$हं परिपृष्टो5स्मि कथामेतां युधिष्िर । तत् सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषत:,लोमशजीने कहा--युधिष्ठिर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे प्रश्न किया है, वह कथा --वह सारा वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, सुनो
Lomaśa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, engkau telah menanyakan kepadaku kisah ini. Maka dengarkanlah dariku, ketika aku menuturkannya di sini—seluruh riwayatnya dengan lengkap.”
Verse 35
पुरा कृतयुगे तात वर्तमाने भयंकरे । यमत्वं कारयामास आदिदेव: पुरातन:,तात! इस कल्पके प्रथम सत्ययुगकी बात है, एक समय बड़ी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी। उस समय आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् श्रीहरि ही यमराजका भी कार्य सम्पन्न करते थे
Lomaśa berkata: “Wahai anakku, pada zaman purba di Kṛta Yuga, ketika suatu krisis yang mengerikan telah timbul, Dewa Purba—Tuhan Yang Tertua—sendiri membuat tugas dan jabatan Yama dijalankan.”
Verse 36
यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमत: । न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाप्युत
Lomaśa berkata: “Ketika Sang Dewa di atas para dewa—Tuhan yang bijaksana itu—menjalankan tugas Yama, di sana tak seorang pun sungguh mati, dan tak seorang pun sungguh lahir; namun dalam tampak duniawi, seolah-olah semuanya terjadi.”
Verse 37
युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् देवदेव भगवान् श्रीहरिके यमराजका कार्य सँभालते समय किसी भी प्राणीकी मृत्यु नहीं होती थी; परंतु उत्पत्तिका कार्य पूर्ववत् चलता रहा ।। वर्धन्ते पक्षिसंघाश्व तथा पशुगवेडकम् | गवाश्चं च मृगाश्नचैव सर्वे ते पिशिताशना:,फिर तो पक्षियोंके समूह बढ़ने लगे। गाय, बैल, भेड़-बकरे आदि पशु, घोड़े, मृग तथा मांसाहारी जीव सभी बढ़ने लगे
Lomaśa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ketika Hari—Dewa di atas para dewa, yang maha bijaksana—mengambil alih tugas Yama, tak satu pun makhluk mengalami kematian; namun pekerjaan kelahiran tetap berlangsung seperti sediakala. Maka kawanan burung pun bertambah, demikian pula ternak—sapi dan lembu—serta hewan lain, kuda, rusa; bahkan semua makhluk, termasuk pemakan daging, kian berlipat jumlahnya.”
Verse 38
तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्न परंतप | सहस्रशो हायुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा,शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ जैसे बरसातमें पानी बढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य भी हजार एवं दस हजार गुनी संख्यामें बढ़ने लगे
Lomaśa berkata: “Demikian pula, wahai harimau di antara manusia, penakluk musuh: sebagaimana air meluap pada musim hujan, demikianlah manusia pun mulai bertambah—beribu-ribu dan berpuluh ribu.”
Verse 39
एतस्मिन् संकुले तात वर्तमाने भयंकरे | अतिभाराद् वसुमती योजनानां शतं गता,तात! इस प्रकार सब प्राणियोंकी वृद्धि होनेसे जब बड़ी भयंकर अवस्था आ गयी तब अत्यन्त भारसे दबकर यह पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी
Lomāśa berkata: “Anakku, ketika dunia ini jatuh ke dalam keadaan yang kacau dan mengerikan, Bumi—terhimpit oleh beban yang berlebihan—tenggelam seratus yojana ke bawah.”
Verse 40
सा वै व्यथितसर्वाज्डी भारेणाक्रान्तचेतना । नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता,भारी भारके कारण पृथ्वी देवीके सम्पूर्ण अंगोंमें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उसकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अतः वह सर्वश्रेष्ठ देवता भगवान् नारायणकी शरणमें गयी
Seluruh tubuh Dewi Bumi dilanda nyeri, dan kesadarannya tertindih oleh beban yang menghimpit. Maka ia berserah diri dan mencari perlindungan pada Nārāyaṇa, dewa tertinggi.
Verse 41
पृथिव्युवाच भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिछ्ेयं सुचिरं त्विह । भारेणास्मि समाक्रान्ता न शकनोमि सम वर्तितुम्,पृथ्वी बोली--भगवन्! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं दीर्घ कालतक यहाँ स्थिर रह सकूँ। इस समय मैं भारसे इतनी दब गयी हूँ कि जीवन धारण नहीं कर सकती
Bumi berkata: “Wahai Bhagavan, dengan anugerah-Mu semoga aku dapat tetap tegak di sini untuk waktu yang lama. Aku terhimpit oleh beban; aku tak lagi mampu bertahan seimbang dan berjalan seperti sediakala.”
Verse 42
ममेम॑ भगवन् भार व्यपनेतुं त्वमहसि । शरणागतास्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो,भगवन्! मेरे इस भारको आप दूर करनेकी कृपा करें। देव! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। विभो! मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये
“Wahai Bhagavan, hanya Engkau yang patut menyingkirkan beban ini dariku. Wahai Dewa, aku datang berlindung kepada-Mu; wahai Yang Mahakuasa, anugerahkanlah rahmat-Mu kepadaku.”
Verse 43
तस्यास्तद् वचन श्रुत्वा भगवानक्षर: प्रभु: | प्रोवाच वचन हद्ृष्ट: श्रव्याक्षरसमीरितम्,पृथ्वीका यह वचन सुनकर अविनाशी भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर श्रवणमधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें कहा
Mendengar kata-katanya, Sang Bhagavan—Tuhan yang tak binasa dan berdaulat—menjadi berkenan. Dengan hati gembira Ia pun bertutur dalam ujaran yang manis, tersusun dari suku kata yang sedap didengar.
Verse 44
विष्णुरुवाच न ते महि भयं कार्य भारातें वसुधारिणि । अहमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि,भगवान् विष्णु बोले--वसुधे! तू भारसे पीड़ित है; किंतु अब उसके लिये भय न कर। मैं अभी ऐसा उपाय करता हूँ जिससे तू हलकी हो जायगी
Viṣṇu bersabda: “Wahai Bumi, penyangga segala beban, janganlah gentar meski engkau terhimpit oleh beratnya beban. Aku akan segera bertindak sedemikian rupa sehingga engkau menjadi ringan kembali.”
Verse 45
लोमश उवाच सतां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् | ततो वराह: संवृत्त एकशुड्रो महाद्युति:,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! पर्वतरूपी कुण्डलोंसे विभूषित वसुधादेवीको विदा करके महातेजस्वी भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण कर लिया। उस समय उनके एक ही दाँत था, जो पर्वत-शिखरके समान सुशोभित होता था
Lomaśa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira! Setelah mempersilakan Bumi—seakan berhias anting-anting berupa gunung—berlalu, Tuhan Viṣṇu yang mahacemerlang menjelma sebagai Varāha. Dalam wujud itu Ia memiliki satu taring saja, elok laksana puncak gunung.”
Verse 46
रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव । धूमं च ज्वलयॉल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत,वे अपने लाल-लाल नेत्रोंसे मानो भय उत्पन्न कर रहे थे और अपनी अंगकान्तिसे धूम प्रकट करते हुए उस स्थानपर बढ़ने लगे
Dengan kedua mata memerah seakan menimbulkan gentar, dan dengan sinar tubuhnya yang menyala seolah menyalakan asap, ia maju di tempat itu dan kian membesar wibawanya.
Verse 47
स गृहीत्वा वसुमतीं शृज्जेणैकेन भास्वता । योजनानां शतं वीर समुद्धरति सो$क्षर:,वीर युधिष्ठिर! अविनाशी भगवान् विष्णुने अपने एक ही तेजस्वी दाँतके द्वारा पृथ्वीको थामकर उसे सौ योजन ऊपर उठा दिया
Wahai pahlawan Yudhiṣṭhira! Tuhan Viṣṇu yang tak binasa, dengan satu taringnya yang bercahaya, menggenggam Bumi dan mengangkatnya seratus yojana ke atas.
Verse 48
तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षो भ: समजायत । देवा: संक्षुभिता: सर्वे ऋषयश्न तपोधना:
Ketika Bumi sedang diangkat (diselamatkan), timbullah guncangan besar. Semua dewa menjadi gelisah, demikian pula para ṛṣi yang kaya akan harta tapa.
Verse 49
पृथ्वीको उठाते समय सब ओर भारी हलचल मच गयी। सम्पूर्ण देवता तथा तपस्वी ऋषि क्षुब्ध हो उठे ।। हाहाभूतम भूत् सर्व त्रिदिवं व्योम भूस्तथा । न पर्यवस्थित: कश्चिद् देवो वा मानुषो5पि वा,स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये। उस समय वे अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे
Lomaśa berkata: Ketika bumi sedang diangkat, guncangan dahsyat timbul ke segala arah. Para dewa dan para resi pertapa pun terguncang. Teriakan cemas menyebar di surga, di wilayah antara, dan di bumi; tak seorang pun—dewa maupun manusia—mampu tetap teguh. Maka banyak dewa dan resi mendatangi Brahmā sebagai tempat berlindung. Saat itu ia duduk di singgasananya, bercahaya oleh kemilau ilahi—laksana wibawa tenang di tengah kegaduhan semesta.
Verse 50
ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया । देवा: सर्षिगणाश्वैव उपतस्थुरनेकश:,स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये। उस समय वे अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे
Kemudian para dewa, bersama rombongan para ṛṣi, mendatangi Brahmā yang tengah duduk—seakan menyala oleh kemegahan dan sinar kemuliaan.
Verse 51
उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् | भूत्वा प्राजजलय: सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा,लोकसाक्षी देवेश्वर ब्रह्माके निकट पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा--
Lalu, setelah mendekati Brahmā—Penguasa para dewa, saksi segala dunia—mereka semua berdiri dengan kedua telapak tangan dirapatkan, dan pada saat itu menyampaikan permohonan mereka.
Verse 52
लोकाः: संक्षुभिता: सर्वे व्याकुलं च चराचरम् । समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते,'देवेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें हलचल मच गयी है। चर और अचर सभी प्राणी व्याकुल हैं। समुद्रोंमें बड़ा भारी क्षोभ दिखायी दे रहा है
“Wahai Penguasa para dewa! Semua dunia telah terguncang; segala yang bergerak maupun tak bergerak menjadi gelisah. Bahkan lautan pun tampak bergolak hebat, wahai raja para Tridaśa.”
Verse 53
सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । किमेतद् कि प्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् । अख्यातु नो भवान् शीघ्र विसंज्ञा: स्मेह सर्वश:,“यह सारी पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, अब यह किसके प्रभावसे कौन-सी अद्भुत घटना घटित हो रही है जिससे सारा संसार व्याकुल हो उठा है। आप शीजत्र हमें इसका कारण बताइये। हम सब लोग अचेत-से हो रहे हैं"
“Seluruh bumi ini telah turun seratus yojana. Apakah ini—oleh kuasa siapa peristiwa menakjubkan ini terjadi hingga segenap jagat menjadi gelisah? Mohon segera jelaskan sebabnya kepada kami; kami semua di sini seakan kehilangan kesadaran.”
Verse 54
ब्रह्मोवाच असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित् | श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेडमरा:,ब्रह्माजीने कहा--देवताओ! तुम्हें असुरोंस कभी और कोई भय नहीं है। यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो। वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है
Brahmā bersabda: “Wahai para dewa yang abadi, kalian tidak perlu takut kepada para Asura—di mana pun, kapan pun. Dengarkan sebab mengapa keguncangan ini timbul. Oleh daya Tuhan Nārāyaṇa, Yang Mahamelingkupi dan tak binasa, kegelisahan ini tampak di alam surga.”
Verse 55
योअसौ सर्वत्रग: श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थित:। तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते,ब्रह्माजीने कहा--देवताओ! तुम्हें असुरोंस कभी और कोई भय नहीं है। यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो। वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है
Tuhan yang mulia itu—yang hadir di mana-mana, berhakikat tak binasa, dan bersemayam sebagai Diri Semesta—oleh kekuatan-Nya keguncangan di Tridiva (surga para dewa) ini menjadi nyata.
Verse 56
यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना,यह सारी पृथ्वी, जो सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, इसे परमात्मा श्रीविष्णुने पुनः ऊपर उठाया है
Seluruh Bumi ini, yang telah tenggelam seratus yojana, kembali diangkat oleh Viṣṇu, Sang Paramātman.
Verse 57
तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षो भ: समजायत । एवं भवन्न्तो जानन्तु छिद्यतां संशयश्व व:,इस पृथ्वीका उद्धार करते समय ही सब ओर यह महान क्षोभ प्रकट हुआ है। इस प्रकार तुम्हें इस विश्वव्यापी हलचलका यथार्थ कारण ज्ञात होना और तुम्हारा आन्तरिक संशय दूर हो जाना चाहिये
Ketika ia (Bumi) sedang diangkat, terjadilah guncangan besar ke segala arah. Maka ketahuilah oleh kalian semua: inilah sebab sejati dari kegelisahan yang meliputi dunia; biarlah keraguan dalam hati kalian terputus.
Verse 58
देवा ऊचु क्व तद् भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् । त॑ देशं भगवन् ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम्,देवता बोले--भगवन्! वे वाराहरूपधारी भगवान् प्रसन्न-से होकर कहाँ पृथ्वीका उद्धार कर रहे हैं, उस प्रदेशका पता हमें बताइये; हम सब लोग वहाँ जायँगे
Para dewa berkata: “Di manakah Sang Wujud itu yang dengan sukacita dan daya gagah mengangkat Bumi? Wahai Yang Mulia, sebutkanlah wilayah itu; kami semua hendak pergi ke sana.”
Verse 59
ब्रह्मोवाच हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् | एषोअत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्ण: सम्प्रकाशते,ब्रह्माजीनी कहा--देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं। वहीं उनका दर्शन करो। उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं। भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्धासित होते हैं
Brahmā berkata: “Kalau begitu, pergilah; semoga kebaikan menyertai kalian. Lihatlah Dia yang berdiri menampakkan diri di Nandana. Di sini sungguh Tuhan Yang Mulia, gemilang dan bercahaya, tampak sebagai Suparṇa, sang makhluk bersayap ilahi.”
Verse 60
वाराहेणैव रूपेण भगवॉँल्लोकभावन: । कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन्,ब्रह्माजीनी कहा--देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं। वहीं उनका दर्शन करो। उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं। भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्धासित होते हैं
Lomaśa berkata: “Tuhan Yang Mulia, penopang dan pelindung dunia-dunia, tampak dalam wujud Varāha. Saat mengangkat permukaan bumi, Ia menyala laksana api pralaya pada akhir zaman.”
Verse 61
एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते । पश्यध्वं विबुधा: सर्वे भूतमेतदनामयम्,इनके वक्षःस्थलमें स्पष्टरूपसे श्रीवत्सचिह्न प्रकाशित हो रहा है। देवताओ! ये रोग- शोकसे रहित साक्षात् भगवान् ही वाराहरूपसे प्रकट हुए हैं, तुम सब लोग इनका दर्शन करो
Lomaśa berkata: “Di dadanya tampak jelas tanda Śrīvatsa yang berkilau. Wahai para dewa, pandanglah semuanya—wujud ini hadir tanpa cela dan tanpa derita; Dialah Tuhan sendiri yang menampakkan diri sebagai Varāha. Lihatlah Dia.”
Verse 62
लोगश उवाच ततो दृष्टवा महात्मान श्रुत्वा चामन्त्रय चामरा: । पितामहं पुरस्कृत्य जम्मुर्देवा यथागतम्,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठटिर! तदनन्तर देवताओंने जाकर वाराहरूपधारी परमात्मा श्रीविष्णुका दर्शन किया, उनकी महिमा सुनी और उनकी आज्ञा लेकर वे ब्रह्माजीको आगे करके जैसे आये थे वैसे लौट गये
Lomaśa berkata: “Kemudian para dewa, setelah memandang Sang Mahātmā dan mendengar kemuliaan-Nya, serta menerima izin-Nya, menempatkan Brahmā—Sang Kakek Agung—di depan, lalu berangkat pulang sebagaimana mereka datang.”
Verse 63
वैशग्पायन उवाच श्रुत्वा तु तां कथां सर्वे पाण्डवा जनमेजय । लोमशादेशितेनाशु पथा जम्मु: प्रहृष्टटत्,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! यह कथा सुनकर सब पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और लोमशजीके बताये हुए मार्गसे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ गये
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, setelah mendengar kisah itu, semua Pāṇḍava sangat bersukacita; dan mengikuti jalan yang segera ditunjukkan oleh resi Lomaśa, mereka pun berangkat cepat dengan hati terangkat.”
Verse 141
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापवरमें लोगशती र्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ इकलीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, bagian Tīrtha-yātrā Parva—dalam kisah ziarah suci yang dituturkan Lomāśa—berakhirlah bab ke-141 yang membahas masuknya ke Gandhamādana.
Verse 142
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे द्विचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशती र्थयात्राके प्रस॑ंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, bagian Tīrtha-yātrā Parva—dalam ziarah suci Lomāśa—berakhirlah bab ke-142 mengenai masuknya ke Gandhamādana.
The ethical tension is operational rather than deliberative: how leaders protect dependents and preserve group integrity when visibility, communication, and mobility collapse under a sudden natural hazard.
Disciplined response to crisis—prioritizing shelter, safeguarding vulnerable members, and maintaining composure—outperforms impulsive action when conditions prevent reliable perception and coordination.
No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative documentation of conduct-in-crisis and as a transitional set-piece that underscores readiness and cohesion during the exile journey.