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Sukta 3.1
Viśvāmitra (traditional for RV 3.1, Agni hymn)
Agni
Triṣṭubh (standard for many Agni hymns in this section; verify by critical meter count)
This hymn to Agni presents him as the luminous priest and messenger who makes the sacrifice effective, brings the gods near, and establishes peace and right order. Agni is praised in many cosmic forms—born in the Waters, rising like a swift tawny steed, and releasing the “cows” (rays/wealth)—while the seer asks for lasting prosperity, harmony, and victorious offspring.
Mantra 1
सोमस्य मा तवसं वक्ष्यग्ने वह्निं चकर्थ विदथे यजध्यै । देवाँ अच्छा दीद्यद्युञ्जे अद्रिं शमाये अग्ने तन्वं जुषस्व ॥
अग्नि, सोम का वो मज़ा हमारे लिए ले आ। तू ने आग तैयार की है यज्ञ के लिए। चमक के तू देवताओं को बुलाता है और पत्थर जोड़ता है सोम निकालने के लिए। अग्नि, शांति के लिए हमारे शरीर को अपना ले।
Mantra 2
प्राञ्चं यज्ञं चकृम वर्धतां गीः समिद्भिरग्निं नमसा दुवस्यन् । दिवः शशासुर्विदथा कवीनां गृत्साय चित्तवसे गातुमीषुः ॥
हम ने यज्ञ शुरू कर दिया है, अब बोलने की शक्ति बढ़ती रहे। लकड़ी जला के हम अग्नि की पूजा करते हैं, सिर झुका के। रिशियों ने आसमान से यह सब बातें सीखी हैं। गृत्समद के लिए भी रास्ता खुला है आगे बढ़ने का।
Mantra 3
मयो दधे मेधिरः पूतदक्षो दिवः सुबन्धुर्जनुषा पृथिव्याः । अविन्दन्नु दर्शतमप्स्वन्तर्देवासो अग्निमपसि स्वसॄणाम् ॥
वो हमें खुशी देता है, समझदार है, और उसका काम साफ है। आसमान का रिश्तेदार है, धरती से पैदा हुआ। देवताओं ने पानी में छुपा हुआ अग्नि ढूंढ लिया, जैसे कोई छुपा हुआ चिराग मिल गया हो।
Mantra 4
अवर्धयन्त्सुभगं सप्त यह्वीः श्वेतं जज्ञानमरुषं महित्वा । शिशुं न जातमभ्यारुरश्वा देवासो अग्निं जनिमन्वपुष्यन् ॥
सात नदियों ने उसको बड़ा किया। पैदालते ही वो सफेद था और चमक रहा था। जैसे घोड़े नया बच्चा देख के दौड़ते हैं, वैसे ही देवता अग्नि के पास गए और उसको बड़ा किया।
Mantra 5
शुक्रेभिरङ्गै रज आततन्वान्क्रतुं पुनानः कविभिः पवित्रैः । शोचिर्वसानः पर्यायुरपां श्रियो मिमीते बृहतीरनूनाः ॥
अग्नि चमके हुए अंगों के साथ आसमान में फैलता है। वो रिशियों के साथ मिलके इंसान के मन को साफ करता है। आग पहने हुए, वो पानी की जान बन जाता है। वो पानी की चमक को नापता है, वो चमक बहुत बड़ी है, कभी खत्म नहीं होती।
Mantra 6
वव्राजा सीमनदतीरदब्धा दिवो यह्वीरवसाना अनग्नाः । सना अत्र युवतयः सयोनीरेकं गर्भं दधिरे सप्त वाणीः ॥
वो चमकते हुए चले, आवाज़ करके, आसमान की ताकतवर शक्तियाँ, बिना आग के बह रही हैं। यहाँ पुराने ज़माने से ये शक्तियाँ एक ही गर्भ में रहती हैं। सात आवाज़ें एक ही चीज़ को छुपा के रखती हैं, एक आग का बीज जो सच है।
Mantra 7
स्तीर्णा अस्य संहतो विश्वरूपा घृतस्य योनौ स्रवथे मधूनाम् । अस्थुरत्र धेनवः पिन्वमाना मही दस्मस्य मातरा समीची ॥
उसके लिए बहुत सारी शक्तियाँ फैली हुई हैं, सब मिलकर। चमकते प्रकाश के गर्भ में मीठा रस बहता है। यहाँ पोषक धारें खड़ी हैं, बरकत से भरी हुई। ये दोनों बड़ी माएँ चमत्कार करने वाले की साथ में चलती हैं।
Mantra 8
बभ्राणः सूनो सहसो व्यद्यौद्दधानः शुक्रा रभसा वपूंषि । श्चोतन्ति धारा मधुनो घृतस्य वृषा यत्र वावृधे काव्येन ॥
चमकता हुआ, बल का बेटा, वो चारों तरफ फैलता है। वो चमक और तेज़ी के साथ आता है। धारों से शहद और घी जैसा मीठा रस टपकता है। वो बैल वहाँ बड़ा होता है रिशि की शक्ति से।
Mantra 9
पितुश्चिदूधर्जनुषा विवेद व्यस्य धारा असृजद्वि धेनाः । गुहा चरन्तं सखिभिः शिवेभिर्दिवो यह्वीभिर्न गुहा बभूव ॥
वो बाप का स्थान भी जानता है, जनम से। उसने अपनी धारें छोड़ दी हैं, पोषक शक्तियाँ आज़ाद कर दी हैं। वो छुपा के घूमता है अपने अच्छे दोस्तों के साथ, आसमान की ताकतों के साथ, अब वो छुपा नहीं रहा।
Mantra 10
पितुश्च गर्भं जनितुश्च बभ्रे पूर्वीरेको अधयत्पीप्यानाः । वृष्णे सपत्नी शुचये सबन्धू उभे अस्मै मनुष्ये नि पाहि ॥
अग्नि ने बाप और पैदा करने वाले दोनों का बीज अपने पास लिया। वो अकेला है, लेकिन उसने बहुत सारी शक्तियों को पानी पिलाया है। दो बहनें हैं जो एक दूसरे की रिवल हैं, दोनों एक ही बैल के लिए हैं। दोनों साफ हैं, दोनों के अपने लोग हैं। इन दोनों की मदद से यह इंसान सही जगह पर रहे।
Mantra 11
उरौ महाँ अनिबाधे ववर्धापो अग्निं यशसः सं हि पूर्वीः । ऋतस्य योनावशयद्दमूना जामीनामग्निरपसि स्वसॄणाम् ॥
वो बड़े खुले जगह में बढ़ा है, जहाँ कोई रोक नहीं सकता। पानी ने अपनी पुरानी ताकत अग्नि में डाल दी है। वो सच्चाई के गर्भ में रहता है, घर में बसने वाला। अग्नि अपनी बहनों के काम में लगा है।
Mantra 12
अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनां दिदृक्षेयः सूनवे भाऋजीकः । उदुस्रिया जनिता यो जजानापां गर्भो नृतमो यह्वो अग्निः ॥
अग्नि तेज़ घोड़े जैसा है, बड़ी लड़ाई में पीला चमकता हुआ। उसे देखना चाहिए, वो चमकदार बेटा है। उसने चमकदे हुए जानवरों को उठाया है। वो उन्हे पैदा करने वाला है, पानी का बीज। अग्नि सबसे बड़ा मर्द है, बड़ी ताकत वाला।
Mantra 13
अपां गर्भं दर्शतमोषधीनां वना जजान सुभगा विरूपम् । देवासश्चिन्मनसा सं हि जग्मुः पनिष्ठं जातं तवसं दुवस्यन् ॥
यह पानी का बीज है जो दिखता है, और पेड़ों की ग्रोथ है। आसमान के जंगल ने इसको पैदा किया, जो भगवान की दया से बना है। भगवान भी अपने मन से मिल के आए हैं। इस पैदा होने वाली चीज़ की सेवा करने के लिए, जो बहुत ताकतवर है।
Mantra 14
बृहन्त इद्भानवो भाऋजीकमग्निं सचन्त विद्युतो न शुक्राः । गुहेव वृद्धं सदसि स्वे अन्तरपार ऊर्वे अमृतं दुहानाः ॥
बड़े बड़े चमकदार किरण अग्नि से जुड़ गए हैं, बिजली की तरह चमकते हुए। वो छुपे कमरे में बड़ा हुआ है, अपनी जगह के अंदर। वो बड़े खुले एरिया में अमृत निकाल रहे हैं।
Mantra 15
ईळे च त्वा यजमानो हविर्भिरीळे सखित्वं सुमतिं निकामः । देवैरवो मिमीहि सं जरित्रे रक्षा च नो दम्येभिरनीकैः ॥
मैन अग्नि को समर्पित होके पूजा करता हूँ। मैन उनकी दोस्ती माँगता हूँ और उनका आशीर्वाद चाहता हूँ। देवियों के साथ मिलके हम गाने वाले लोगों के लिए मदद बनाओ। और अपने घर के रूप से हमारी रक्षा करो।
Mantra 16
उपक्षेतारस्तव सुप्रणीतेऽग्ने विश्वानि धन्या दधानाः । सुरेतसा श्रवसा तुञ्जमाना अभि ष्याम पृतनायूँरदेवान् ॥
अग्नि, हम तुम्हारे पास रहना चाहते हैं। तुम्हारा साथ लेकर हम सारी खुशियाँ पाना चाहते हैं। तुम्हारी ताकत और नाम के साथ आगे बढ़के हम उनको हराना चाहते हैं जो भगवान के बिना लड़ाई ढूंढते हैं।
Mantra 17
आ देवानामभवः केतुरग्ने मन्द्रो विश्वानि काव्यानि विद्वान् । प्रति मर्ताँ अवासयो दमूना अनु देवान्रथिरो यासि साधन् ॥
अग्नि, तुम देवियों के लिए चमकने वाला दिया बन गए हो। तुम खुश रहते हो और सारी ज्ञानी बातें जानते हो। तुम इंसानों को भगवान के घर की तरफ ले जाते हो। जैसे कोई ड्राइवर, तुम देवियों के साथ चलके काम पूरा करते हो।
Mantra 18
नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन् । घृतप्रतीक उर्विया व्यद्यौदग्निर्विश्वानि काव्यानि विद्वान् ॥
वो घर में बैठ गए, जो इंसानों के बीच अमर हैं। राजा की तरह वो सब काम करते हैं। घी जैसी चमक से वो चारों तरफ चमके। अग्नि जो सारी ज्ञानी बातें जानते हैं।
Mantra 19
आ नो गहि सख्येभिः शिवेभिर्महान्महीभिरूतिभिः सरण्यन् । अस्मे रयिं बहुलं संतरुत्रं सुवाचं भागं यशसं कृधी नः ॥
हमें मिलने आ, अच्छे दोस्त की तरह। बड़ी मदद कर, हमें सेफ रख। हमें धन दे, बहुत सारा। हमें अच्छा हिस्सा दे, जिसका सब लोग नाम लें।
Mantra 20
एता ते अग्ने जनिमा सनानि प्र पूर्व्याय नूतनानि वोचम् । महान्ति वृष्णे सवना कृतेमा जन्मञ्जन्मन्निहितो जातवेदाः ॥
अग्नि, ये तेरी पुरानी जन्में हैं। मैं नयी भी बताता हूँ। तेरे लिए बड़ी पूजा होती है। हर जनम में जातवेद अंदर छुपा होता है, जलने के लिए।
Mantra 21
जन्मञ्जन्मन्निहितो जातवेदा विश्वामित्रेभिरिध्यते अजस्रः । तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम ॥
हर जन्म में अग्नि अंदर छुपा होता है। विश्वामित्र रिषि उसे लगातार जलाते रहते हैं। हम उस अग्नि की अच्छी नज़र में रहें। हमारा दिल खुश रहे और मन साफ रहे।
Mantra 22
इमं यज्ञं सहसावन्त्वं नो देवत्रा धेहि सुक्रतो रराणः । प्र यंसि होतर्बृहतीरिषो नोऽग्ने महि द्रविणमा यजस्व ॥
हे अग्नि, तू बलवान है। इस यज्ञ को भगवान की तरफ ले जा। तू खुश हो के हमारे लिए अच्छा सोच। हमें बड़े-बड़े आशीर्वाद दे। हे अग्नि, हमारे लिए बड़ा धन ला।
Mantra 23
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध । स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे ॥
हे अग्नि, जो लोग पुकारते हैं उनकी सुन। इला के लिए हमेशा के लिए धन और गाय मिल जाए। हमारे घर बेटा हो जो जीत कर आए। हे अग्नि, यह तेरी अच्छी नज़र हो हमपे।
It praises Agni as the power that makes sacrifice work: he carries offerings, brings the gods close, and turns ritual action into peace, prosperity, and protection.
It points to Agni’s hidden, cosmic origin—fire existing in subtle form within waters and creation—showing that the ritual flame reflects a universal principle.
Harmony (śam), lasting wealth and radiance symbolized by the “cow,” and a strong, victorious child—ending with a request for Agni’s favorable guidance (sumati).
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