
Jayadrathasya śoka-bhaya-vilāpaḥ — Droṇena āśvāsanaṃ ca (Jayadratha’s lament and Droṇa’s reassurance)
Upa-parva: Jayadratha-trasāsa–Droṇa-upasaṅgama (Episode: Jayadratha’s fear and consultation with Droṇa)
Saṃjaya reports that Jayadratha, informed by scouts of the Pāṇḍava outcry, rises in distress and enters the royal assembly overwhelmed by grief and fear, anticipating Arjuna’s promised retaliation. He speaks with shame and anxiety, proposing withdrawal for self-preservation, yet also requests protection from the assembled Kaurava leaders, arguing that if many kings stand together they should be able to shield him even from Arjuna. Duryodhana replies by listing prominent allies and asserting that substantial forces will be deployed for Jayadratha’s defense, urging him to abandon fear. Subsequently, Jayadratha accompanies Duryodhana to Droṇa at night, performs formal approach and inquiry, and asks for a technical comparison of his own and Arjuna’s martial capacities (range, lightness, accuracy, firmness of aim). Droṇa answers that their instruction was comparable, but Arjuna surpasses due to disciplined integration (yoga) and habituation to hardship; nevertheless, Jayadratha should not panic because Droṇa promises protection and the creation of a battle-formation difficult for Arjuna to penetrate. Droṇa concludes with a reflective counsel on impermanence, the inevitability of death for all factions, and the kṣatriya’s attainment of exalted worlds through steadfast adherence to duty. Reassured, Jayadratha dispels fear and resolves to fight.
Chapter Arc: अभिमन्यु-वध के शोक से दग्ध युधिष्ठिर के शिविर में व्यास का आगमन होता है—राजा शोक में डूबा है, पर ऋषि का आगमन किसी गूढ़ उपदेश का संकेत देता है। → युधिष्ठिर व्यास की विधिवत पूजा कर बैठाते हैं और फिर टूटकर अपने भतीजे/पुत्रतुल्य अभिमन्यु के वध का वृत्तान्त कहते हैं—कैसे अनेक ‘अधर्मयुक्त’ महारथियों ने उसे घेरकर, उपाय-हीन अवस्था में, बालक होते हुए भी परवीरहा को रण में गिरा दिया। → व्यास युधिष्ठिर को शोक-बन्धन से छुड़ाने हेतु ‘मृत्यु की उत्पत्ति’ का ‘उत्तम’ आख्यान सुनाते हैं—एक प्राचीन कृतयुगीन प्रसंग (राजा अकम्पन आदि) के माध्यम से मृत्यु के विधान, उसके कारण और उसकी अनिवार्यता का रहस्य खोलते हैं; वर्णन में जगत् के दाह/ज्वालामाला से व्याप्त होने जैसी प्रलय-छवियाँ उभरती हैं। → कथा-उपदेश का लक्ष्य स्पष्ट होता है: युधिष्ठिर स्नेह-बन्धनजन्य दुःख से मुक्त हों, मृत्यु को दैवी-नियम के रूप में समझें, और शोक को धर्म-स्थैर्य में रूपान्तरित करें। → व्यास द्वारा मृत्यु-तत्त्व का आख्यान आगे भी विस्तार माँगता है—युधिष्ठिर का शोक क्या सचमुच शान्त होगा, और युद्ध-धर्म के कठोर निर्णयों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) अपर बक। हक २ 2 द्विपञ्चाशत्तमो<5 ध्याय: विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन-नारद-संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना संजय उवाच अथैनं विलपन्तं त॑ कुन्तीपुत्र॑ युधिष्ठिरम् । कृष्णद्वैपायनस्तत्र आजगाम महानृषि:
قال سنجيا: ثمّ بينما كان يودهيشثيرا ابن كونتي ينوح، أقبل إلى هناك الحكيم العظيم كريشنا-دڤايبايانا (فياسا) فوافاه. ويتحوّل المشهد من حزن ساحة القتال إلى حضور سلطة روحية، مشيرًا إلى أنّ الأسى لا يُلاقى بالعاطفة وحدها، بل بالبصيرة في الدارما وبالأسباب العميقة للموت والقدر.
Verse 2
अर्चयित्वा यथान्यायमुपविष्टं युधिष्ठिर: । अब्रवीच्छोकसंतप्तो भ्रातु: पुत्रवधेन च,उस समय युधिष्ठिरने उनकी यथायोग्य पूजा की और जब वे बैठ गये, तब भतीजेके वधसे शोकसंतप्त हो युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले--
فلما أكرمه يودهيشثيرا على الوجه اللائق وفق العرف، جلس. ثم وقد أحرقت قلبه لوعةُ الحزن—ولا سيما لأن ابن أخيه، ابنَ أخيه من أخيه، قد قُتل—خاطبه بهذه الكلمات.
Verse 3
अधर्मयुक्तैर्बहुभि: परिवार्य महारथै: । युध्यमानो महेष्वासै: सौभद्रो निहतो रणे
قال سنجيا: لقد أُحيط ابنُ سوبهادرا من كل جانب بكثير من عظماء فرسان المركبات الذين اتخذوا سُبلًا لا تقوم على الدارما؛ ومع أنه كان يقاتل بين رماةٍ أشدّاء، فقد قُتل في المعركة. ويُبرز الخبرُ الخللَ الأخلاقي: بطلٌ وحيد أُسقط بهجومٍ جماعيّ جرى على خلاف الدارما.
Verse 4
बालश्न बालबुद्धिश्न सौभद्र: परवीरहा । अनुपायेन संग्रामे युध्यमानो विशेषत:
قال سنجيا: «إن ساوبهادرا (أبهِمنيو)—وهو بعدُ غلام، له إدراك الغلمان—كان مع ذلك قاتلًا لأبطال الأعداء. غير أنه في هذه المعركة كان يقاتل في حالٍ شديدة الحرج، يفتقر إلى الوسائل اللائقة وإلى العون والسند.»
Verse 5
मया प्रोक्त: स संग्रामे द्वारं संजनयस्व नः । प्रविष्टेड भ्यन्तरे तस्मिन् सैन्धवेन निवारिता:
قال سانجيا: «لقد دللتُه في خِضَمِّ المعركة على “الباب” — أي الفتحة التي يمكن لقواتنا أن تنفذ منها. ولكن لما دخلنا إلى داخل ذلك التشكيل، اعترضنا سايندهافا وأوقفنا وكبّل تقدّمنا.»
Verse 6
“मैंने युद्धस्थलमें उससे कहा था कि तुम व्यूहमें हमारे प्रवेशके लिये द्वार बना दो। तब वह द्वार बनाकर भीतर प्रविष्ट हो गया और जब हमलोग उसी द्वारसे व्यूहमें प्रवेश करने लगे, उस समय सिंधुराज जयद्रथने हमें रोक दिया ।।
قال سانجيا: «في ساحة القتال قلتُ له: “اصنع بابًا في صفِّ المعركة لكي ندخل.” ففتح ثغرةً ودخل إلى الداخل. وحين بدأنا نحن أيضًا ندخل من ذلك الباب بعينه، عندئذٍ أوقفنا جايادراثا، ملك السِّندهو. إن الذين يحيون بالحرب ينبغي أن يبتغوا قتالًا عادلًا—مبارزةً بين أنداد. لكن ما فعله العدو على هذا النحو ليس حربًا متكافئة قط. فالكشاتريا الذين يراهنون بأرواحهم في الميدان يجب أن يقاتلوا بطلًا مُجهَّزًا مثلهم؛ والطريقة التي قاتلوا بها أبهيمانيو لا يمكن أن تُسمّى مساواةً أبدًا.»
Verse 7
तेनास्मि भृशसंतप्त: शोकबाष्पसमाकुल: । शमं नैवाधिगच्छामि चिन्तयान: पुनः पुनः,“इसीलिये मैं अत्यन्त संतप्त हूँ, शोकाश्रुओंसे मेरे नेत्र भरे हुए हैं। मैं बारंबार चिन्तामग्न होकर शान्ति नहीं पा रहा हूँ!
يقول سانجيا: «لذلك أنا معذَّب أشدَّ العذاب؛ يغمرني الحزن والدموع فلا أبلغ سكينة. مرارًا وتكرارًا أسقط في تفكّرٍ قَلِق، ولا يأتي إليّ السلام.»
Verse 8
संजय उवाच तं तथा विलपन्तं वै शोकव्याकुलमानसम् | उवाच भगवान् व्यासो युधिष्ठिरमिदं वच:
قال سانجيا: «أيها الملك، وبينما كان يودهيشثيرا ينوح على هذا النحو وقلبه مضطرب بالحزن، خاطبه الحكيم الجليل فياسا بهذه الكلمات.»
Verse 9
व्यास उवाच युधिष्ठिर महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद | व्यसनेषु न मुहान्ति त्वादृशा भरतर्षभ
قال فياسا: «يا يودهيشثيرا، يا ذا الحكمة العظمى والعارف بجميع الشاسترا، يا ثورَ سلالة بهاراتا—إن أمثالك لا يفقدون صفاء البصيرة ولا يقعون في الوهم حين تنزل الشدائد.»
Verse 10
स्वर्गमेष गत: शूर: शत्रून् हत्वा बहून् रणे अबालसदूशं कर्म कृत्वा वै पुरुषोत्तम:
قال فياسا: إن هذا المحارب البطل قد مضى إلى السماء بعدما قتل أعداءً كثيرين في ساحة القتال. ولأنه أتى بعملٍ من البأس يفوق ما يُنتظر من فتى، فقد بلغ ذلك الرجل الأسمى—أبهيمانيو—طريق العالم السماوي. ولا يصوّر البيت موته خسارةً مجردة، بل خاتمةً مشحونةً بالمعنى الأخلاقي لواجب الكشترية: الشجاعة، والثبات، والتضحية في حربٍ عادلة.
Verse 11
अनतिक्रमणीयो वै विधिरेष युधिष्छिर । देवदानवगन्धर्वान् मृत्युर्हदरति भारत
قال فياسا: «يا يودهيشثيرا، إن هذا القضاء من سنن القدر لا يُتجاوز حقًّا. فالموت يختطف حتى الآلهة والدانافا والغاندهرفا—يا بهاراتا.»
Verse 12
भरतनन्दन युधिष्ठिर! यह विधाताका विधान है। इसका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। मृत्यु देवताओं, दानवों तथा गन्धर्वोंके भी प्राण हर लेती है ।।
قال يودهيشثيرا: «أيها الحكيم، إن هؤلاء الملوك العظام—حماة الأرض—ممدّدون على وجه التراب. قُتلوا في قلب الجموع، وصار لهم الآن اسم واحد لا غير: “موتى”، يرقدون على الأرض.»
Verse 13
नागायुतबलाश्षान्ये वायुवेगबलास्तथा । त एते निहता: संख्ये तुल्यरूपा नरैर्नरा:
كان فيهم ملوكٌ تبلغ قوتهم قوةَ عشرة آلاف فيل، وفيهم من كانت سرعته وبأسه كالرّيح. غير أنّهم جميعًا—إنسانًا بعد إنسان—قُتلوا في المعركة بأيدي بشرٍ مثلهم، فاستووا الآن في الهيئة.
Verse 14
नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे क्वचित् । विक्रमेणोपसम्पन्नास्तपोबलसमन्विता:
قال يودهيشثيرا: «في ساحة القتال لا أرى، في أي وقت، قاتلًا بعينه لهؤلاء الأحياء. إنهم موفورون بالبأس، مسنودون بقوةٍ مولودةٍ من الزهد والتقشّف (tapas)؛ ولذلك يبدو أنه لا يمكن تعيين فاعلٍ واحد على أنه القاتل.»
Verse 15
इन प्राणशक्तिसम्पन्न वीरोंका युद्धमें कहीं कोई वध करनेवाला मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि ये सब-के-सब पराक्रमसे सम्पन्न और तपोबलसे संयुक्त थे ।।
قال يودهيشثيرا: «في ساحة القتال لم أرَ أحدًا يقدر حقًّا على قتل هؤلاء الأبطال؛ إذ كانوا جميعًا ممتلئين بقوة الحياة، موفورين بالبأس، ومحصَّنين بقدرة الزهد والتقشّف. وهؤلاء الملوك الحكماء أنفسهم، الذين كان في قلوبهم على الدوام عزمٌ ثابت: “لا بد أن أغلب الآخر”، ها هم الآن مطروحون على الأرض—قُتلوا في الحرب بعد أن انقضى الأجل المقدر لهم.»
Verse 16
मृता इति च शब्दो<यं वर्तते च ततो<र्थवत् । इमे मृता महीपाला: प्रायशो भीमविक्रमा:
«إن لفظ “الميت” يُستعمل حقًّا، ولذلك فهو يحمل معناه الصحيح. هؤلاء الملوك قد ماتوا—وأكثرهم محاربون رهيبو البأس.»
Verse 17
अतः इनके विषयमें “मृत” शब्द सार्थक हो रहा है। ये भयंकर पराक्रमी भूमिपाल प्राय: “मर गये” कहे जाते हैं ।।
قال يودهيشثيرا: «لذلك يغدو لفظ “الميت” في شأنهم صادقًا تمام الصدق. أولئك الأبطال، وقد سُلبوا الحركة والكبرياء، وقعوا تحت سلطان العدو. أما أبناء الملوك، إذ اشتعلوا غضبًا، فقد اندفعوا إلى فم فايشفانارا—إلى نار السهام—ولذلك يُقال عنهم، في الحقيقة، إنهم “موتى”.»
Verse 18
अत्र मे संशय: प्राप्त: कुतः संज्ञा मृता इति । कस्य मृत्यु: कुतो मृत्यु: केन मृत्युरिमा: प्रजा:
قال يودهيشثيرا: «لقد عرض لي هنا شكّ: كيف يُقال عن المرء إنه “ميت”؟ لمن تكون هذه “الموتة”؟ ومن أين يأتي الموت؟ وبأي وسيلة تُساق هذه الكائنات إلى الموت؟»
Verse 19
हरत्यमरसंकाश तनमे ब्रूहि पितामह । मुझे संदेह होता है कि इन्हें 'मर गये” ऐसा क्यों कहा जाता है? मृत्यु किसकी होती है? किस निमित्तसे होती है? तथा वह किसलिये इन प्रजाओं (प्राणियों) का अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! ये सब बातें आप मुझे बताइये ।।
قال يودهيشثيرا: «يا بيتامها، يا من يشبه نورُه نورَ الخالدين، أخبرني. يداخلني الشك: لِمَ يُقال عنهم “ماتوا”؟ لمن تكون الموتة؟ وبأي سبب تقع؟ ولماذا تسلب هذه الرعية—هذه الكائنات—أرواحها؟ بيّن لي ذلك كله.» قال سانجيا: وبينما كان يودهيشثيرا ابن كونتي يسأل على هذا النحو، قال الحكيم الجليل فياسا كلماتٍ مطمئنة، ليشدّ بها قلبه وسط الشك والحزن.
Verse 20
व्यास उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अकम्पनस्य कथितं नारदेन पुरा नृप
قال فياسا: «هنا أيضًا، أيها الملك، يستشهد الحكماء بسابقةٍ تاريخيةٍ قديمة. وهذه الرواية العتيقة قد قصّها نارادا في الزمن السالف على الملك أكامبانا».
Verse 21
स चापि राजा राजेन्द्र पुत्रव्यसनमुत्तमम् । अप्रसह्यृतमं लोके प्राप्तवानिति मे मति:
قال فياسا: «يا ملك الملوك، إن ذلك الحاكم أيضًا ابتُلي بأفدح المصائب—لوعة الفقد بسبب ابنه. وفي تقديري، ليس في هذا العالم حزنٌ أشدُّ احتمالًا من خراب الولد أو فقدانه.»
Verse 22
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मृत्यो: प्रभवमुत्तमम् । ततस्त्वं मोक्ष्यसे दुःखात् स्नेहबन्धनसंश्रयात्
قال فياسا: «لذلك سأُبيّن لك الآن الرواية الجليلة عن منشأ الموت. فإذا سمعتها تحرّرت من الحزن الناشئ عن الاحتماء بقيود التعلّق.»
Verse 23
समस्तपापराशिष्नं शृणु कीर्तयतो मम । धन्यमाख्यानमायुष्यं शोकषघ्नं पुष्टिवर्धनम्
«أصغِ إليّ وأنا أرويه: إن هذه الحكاية المباركة تلتهم كتلة الآثام المتراكمة. وهي ميمونة، باعثة على طول العمر، مُذهِبة للحزن، مُنمِّية للقوة والعافية.»
Verse 24
पवित्रमरिसंघघ्नं मड़लानां च मड़लम् । यथैव वेदाध्ययनमुपाख्यानमिदं तथा
قال فياسا: «إن هذه الرواية الطاهرة تُهلك جموع الأعداء، وهي أسمى البركات بين البركات. وينبغي أن تُعدّ بمنزلة دراسة الفيدا.»
Verse 25
यह उपाख्यान समस्त पापराशिका नाश करने-वाला है। मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। यह धन और आयुको बढ़ानेवाला, शोकनाशक, पपुष्टिवर्धक, पवित्र, शत्रुसमूहका निवारक और मंगलकारी कार्योंमें सबसे अधिक मंगलकारक है। जैसे वेदोंका स्वाध्याय पुण्यदायक होता है, उसी प्रकार यह उपाख्यान भी है ।।
قال فياسا: إن هذه الحكاية المقدّسة تُبيد كتلةَ الآثام المتراكمة. سأقصّها—فاستمع. إنها تزيد المال وطول العمر، وتبدّد الحزن، وتنمّي القوّة والعافية، وتطهّر، وتدفع جموع الأعداء، وهي في جملة الأعمال المباركة أبركُها. وكما أن تلاوة الفيدا ودراستها تُكسب المرءَ ثوابًا، كذلك هذه الرواية. لذلك، أيها الملك العظيم، ينبغي لأفضل الملوك الذين يبتغون أبناءً طوال الأعمار، والملكَ والرخاءَ أن يواظبوا على سماع هذا التاريخ كل صباح.
Verse 26
पुरा कृतयुगे तात आसीद् राजा हाुकम्पन: । स शत्रुवशमापतन्नो मध्ये संग्राममूर्थनि,तात! प्राचीनकालकी बात है, सत्ययुगमें अकम्पन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे युद्धमें शत्रुओंके वशमें पड़ गये
قال فياسا: «في الأزمنة السحيقة، يا بُنيّ، في عصر كِرتا، كان هناك ملكٌ مشهور يُدعى أكمبَنا. وفي قلب المعركة، عند ذروة القتال ولحظته الحرجة، وقع تحت سلطان أعدائه.»
Verse 27
तस्य पुत्रो हरिनाम नारायणसमो बले । श्रीमान् कृतास्त्रो मेधावी युधि शक्रोपमो बली
قال فياسا: «وكان له ابنٌ يُدعى هَري، يساوي نارايَنا في القوّة؛ ذو بهاءٍ ونعمة، مكتمل التدريب في فنون السلاح، ذكيّ الفؤاد، وفي ساحة القتال شديد البأس كشاكرَ (إندرا).»
Verse 28
राजाके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि। वह बलमें भगवान् नारायणके समान था। वह अस्त्रविद्यामें पारंगत, मेधावी, श्रीसम्पन्न तथा युद्धमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी था ।।
قال فياسا: كان للملك ابنٌ يُدعى هَري، شُبِّهت قوّته بقوّة الربّ نارايَنا. كان تامَّ الإحاطة بعلم السلاح، حادَّ الذكاء، ذا بهاءٍ وحظّ، وفي الحرب كانت شجاعته كإندرا. فإذا ما أُحيط في ساحة القتال مرارًا بأعدائه، أمطر على مقاتلي الصفّ الآخر وعلى راكبي الفيلة آلافَ السهام مرةً بعد مرة—يواجه التطويق لا بالهلع، بل بمهارةٍ قتاليةٍ منضبطة.
Verse 29
स कर्म दुष्करं कृत्वा संग्रामे शत्रुतापन: । शन्रुभिर्निहतः संख्ये पृतनायां युधिछ्ठिर
قال فياسا: يا يودهيشتِهيرا، بعدما أتى في ساحة القتال فعلًا عسيرًا لا يكاد يُنال، فإن ذلك البطل—الذي كان يُلهب أعداءه—قُتل أخيرًا هناك بأيديهم، في خضمّ الجيش، وسط ازدحام المعركة.
Verse 30
स राजा प्रेतकृत्यानि तस्य कृत्वा शुचान्वित: । शोचन्नहनि रात्रौ च नालभत् सुखमात्मन:
قال فياسا: إنّ ذلك الملك، بعدما أتمّ له شعائر الجنازة، غمره الحزن غمراً. كان ينوح نهاراً وليلاً، فلم يجد في نفسه عزاءً البتّة.
Verse 31
तस्य शोकं विदित्वा तु पुत्रव्यसनसम्भवम् । आजगामाथ देवर्षिनरिदो5स्थ समीपतः,राजा अकम्पनको अपने पुत्रकी मृत्युसे महान् शोक हो रहा है, यह जानकर देवर्षि नारद उनके समीप आये
فلما علم أن حزن الملك إنما نشأ من مصيبة موت ابنه، أقبل الحكيم الإلهي نارادا ودنا منه.
Verse 32
स तु राजा महाभागो दृष्ट्वा देवर्षिसत्तमम् | पूजयित्वा यथान्यायं कथामकथयत् तदा
حينئذٍ إنّ ذلك الملك السعيد الحظ، لما رأى أرفعَ الحكماء الإلهيين، أكرمه على مقتضى السنن والآداب؛ ثم قصّ عليه في تلك الساعة خبرَ مقتل ابنه.
Verse 33
तस्य सर्व समाचष्ट यथावृत्तं नरेश्वर: । शत्रुभिर्विजयं संख्ये पुत्रस्य च वधं तथा,राजाने क्रमश: शत्रुओंकी विजय और युद्धस्थलमें अपने पुत्रके मारे जानेका सब समाचार उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया
ثم أخبره ملكُ الناس بكل شيء كما وقع: كيف غلب الأعداء في المعركة، وكيف قُتل ابنه كذلك.
Verse 34
मम पुत्रो महावीर्य इन्द्रविष्णुसमद्युति: । शत्रुभिरबहुभि: संख्ये पराक्रम्य हतो बली
قال فياسا: «كان ابني بطلاً عظيم البأس، متلألئاً كإندرا وفيشنو. غير أنّ أعداءً كثيرين في ساحة القتال اجتمعوا، وضَمّوا بأسهم بعضَه إلى بعض، فصرعوا ذلك القويّ.»
Verse 35
क एष मृत्युर्भगवन् किंवीर्यबलपौरुष: । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं मतिमतां वर
قال فياسا: «يا أيها المبارك، من هذا الموت؟ وما قدرته وقوته وبأسه الرجولي؟ يا أفضل الحكماء، إني أريد أن أسمع حقيقة ذلك على ما هو عليه في طبيعته.»
Verse 36
तस्य तद् वचन श्रुत्वा नारदो वरद: प्रभु: । आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं महत्,राजाकी यह बात सुनकर वर देनेमें समर्थ एवं प्रभावशाली नारदजीने यह पुत्रशोकनाशक उत्तम उपाख्यान कहना आरम्भ किया
فلما سمع ناردَة—وهو عظيم الشأن قادر على منح العطايا—تلك الكلمات، شرع يروي هذا الخبر الجليل، حكاية سامية وُضعت لتبديد حزن فقد الابن.
Verse 37
नारद उवाच शृणु राजन् महाबाहो आख्यानं बहुविस्तरम् । यथावृत्तं श्रुतं चैव मयापि वसुधाधिप
قال ناردَة: «اسمع يا أيها الملك عظيم الساعدين. سأشرع الآن في رواية مفصّلة واسعة. يا ربّ الأرض، لقد سمعتُ أنا أيضاً—كما وقع تماماً—الخبر الصادق عن كيف حلّت وفاة ابنِك. فأصغِ جيداً وأنا أسردها.»
Verse 38
प्रजा: सृष्टवा तदा ब्रह्मा आदिसगे पितामह: । असंद्वतं महातेजा दृष्टवा जगदिदं प्रभु:
قال ناردَة: في بدء الخلق، لما أوجد الجدّ الأكبر براهما الكائنات، أبصر هذا العالم غاصّاً بالأحياء من غير أن تكون قد وُضعت سنّةٌ للانحلال والفناء. فلما رأى الكون كذلك—ممتلئاً بالحياة ولم تمسّه يد الموت—داخل الربَّ العظيمَ التجلّي قلقٌ، وأخذ يتفكّر: كيف تُقام ضرورةُ الهلاك لتكون للخلق كوابح، فلا يغدو الخلق عبئاً منفلتاً على نفسه؟
Verse 39
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति पार्थिव । चिन्तयन्न हासौ वेद संहारं वसुधाधिप
قال ناردَة: «يا أيها الملك، يا ربّ الأرض، لقد نشأت في نفسه هواجس عظيمة بشأن كيف يُجلب الفناء. ومع أنه أعمل الفكر عميقاً، لم يهتدِ إلى وسيلة للهلاك. إذ في زمن الخلق الأول كان الجدّ الأكبر براهما—عظيم التجلّي بالغ القدرة—قد أوجد كثرة الكائنات ولم يسنّ لهم شريعةً للانتهاء. فلما رأى العالم كلَّه مكتظّاً بالأحياء وخالياً من الموت، اضطرب باحثاً عن سبيلٍ يُدخل الفناء الضروري. غير أنه، بعد طول تأمّل، لم يجد براهما طريقةً يُنهى بها أمرُ الكائنات.»
Verse 40
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योडग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो व्याप्ता: सान्तर्देशा दिधक्षता
أيها الملك العظيم! من شدة غضب براهما انبثقت النار من حواسه—كالأذن والعين وسائر المدارك. وكانت تلك النار تريد إحراق العالم، فانتشرت فملأت الجهات كلها والجهات الفرعية (زوايا الأفق).
Verse 41
ततो दिवं भुवं चैव ज्वालामालासमाकुलम् | चराचरं जगत् सर्व ददाह भगवान् प्रभु:
ثم امتلأت السماء والأرض من كل جانب بأطواقٍ من ألسنة اللهب المتأججة. وأخذ الرب أغني—القادر على إحراق كل شيء، ذو القوة العظمى—مدفوعًا باندفاع غضبٍ شديد، يُفزع الكائنات، ويشرع في إحراق العالم كله، المتحرك والساكن. فهلكت بسبب ذلك مخلوقات كثيرة، ثابتةً وجائلة.
Verse 42
ततो हतानि भूतानि चराणि स्थावराणि च । महता क्रोधवेगेन त्रासयन्निव वीर्यवान्
ثم سقطت مخلوقات كثيرة، متحركةً وساكنة. وباندفاع غضبٍ عظيم بدا ذلك الجبار كأنه يُرعِب الجميع. وما إن تلا ذلك حتى انتشرت ألسنة نارٍ ضارية في كل مكان عبر السماء والأرض. وشرع إله النار الموقَّر، القادر على إحراق كل شيء، ذو القوة الهائلة، مدفوعًا بقوة الغضب العظيم، في لَسع العالم كله—المتحرك والجامد—كأنه يجعل جميع الكائنات ترتعد. فهلكت أحياء لا تُحصى، ثابتةً وجائلة.
Verse 43
ततो रुद्रो जटी स्थाणुर्निशाचरपतिह्हर: । जगाम शरणं देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्,तत्पश्चात् राक्षसोंके स्वामी जटाधारी दुःखहारी स्थाणु नामधारी भगवान् रुद्र परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये
ثم إن رودرا—ذو الشعر المعقود (جاتا)، الثابت (ستھانو)، مُزيل الكرب، وسيد الكائنات التي تجوب الليل—مضى يلتمس الملجأ عند الإله براهما، البرامِشْثِن، المُدبِّر الأعلى.
Verse 44
तस्मिन्नापतिते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया । अब्रवीत् परमो देवो ज्वलजन्निव महामुनि:
ولما قدم ستھانو (رودرا) إلى هناك، رغبةً في خير المخلوقات، تكلّم الحكيم الإلهي الأعلى—براهما—متوهّجًا كأنه يشتعل بنورٍ باطني، فقال—
Verse 45
कि कुर्म: काम॑ कामा्ह कामाज्जातो<सि पुत्रक | करिष्यामि प्रियं सर्व ब्रूहि स्थाणो यदिच्छसि
قال نارادا: «ماذا أصنع لك؟ يا بُنيَّ الحبيب، لقد نشأتَ من رغبة نفسي وقصدي. فقل لي، يا سْثَانُو، ماذا تشتهي؛ فسأُنجز لك كلَّ ما يسرّك سرورًا تامًّا».
Verse 51
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें युधिष्टिप्रलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ويختم سَنْجَيا قائلاً: هكذا ينتهي الفصل الحادي والخمسون من «دروṇa پرفا» في «الشري مهابهارتا»، ضمن مقطع مقتل أبهيمانيو، وهو الفصل الخاص بندبة يودهيشثيرا. وتؤكد صيغة الختام الثقل الأخلاقي للحزن في الحرب: فحتى الأبرار تهتز نفوسهم، ويغدو الأسى عدسة تُرى بها كلفة الأدهرما وهشاشة واجب الإنسان.
Verse 52
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमो5ध्याय:
هكذا ينتهي الفصل الثاني والخمسون من «دروṇa پرفا» في «الشري مهابهارتا»، ضمن القسم المتعلق بمقتل أبهيمانيو. وتُشير خاتمةُ الفصل إلى انقضاء وحدةٍ سردية، وتُذكِّر السامع بأن رواية الحرب في الملحمة مؤطَّرة بوصفها تاريخًا أخلاقيًّا: فموتُ الفتى البطل أبهيمانيو منعطفٌ أخلاقي جسيم، تُصبح معه أسئلةُ القتال العادل، والمسؤولية الجماعية، وكلفة الأدهرما في الحرب أسئلةً لا مفرّ منها.
Jayadratha faces a dharma-adjacent crisis of courage: whether to prioritize self-preservation (flight/withdrawal) or remain within the warrior code and coalition expectations despite a credible threat from Arjuna’s vow.
Droṇa reframes fear through disciplined duty: adhere to svadharma, rely on competent strategy and collective protection, and remember impermanence—since all parties are subject to time, one should act with resolve rather than panic.
No formal phalaśruti is stated; the chapter’s meta-level framing functions through Droṇa’s anityatā reflection, positioning the episode as an ethical lens on how counsel and duty operate under the inevitability of mortality.
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