
Śalya-hatānantarāṇi: Madrarāja-padānugānāṃ praskandana and the Pandava counter-encirclement (शल्यहतानन्तराणि—मद्रराजपदानुगानां प्रस्कन्दनम्)
Upa-parva: Madrarāja-padānugānāṃ praskandana (After Śalya’s fall: the Madra contingent’s assault and Duryodhana’s attempted restraint)
Saṃjaya reports that, after Śalya’s death, seven hundred Madra-following charioteers surge forward in great force. Duryodhana, elevated on an elephant and marked by royal insignia, repeatedly forbids their advance, yet the warriors—intent on killing Yudhiṣṭhira—enter the Pandava host and engage with loud bowstrings and close combat. Hearing of Śalya’s fall and Yudhiṣṭhira’s distress, Arjuna arrives with the Gāṇḍīva; Bhīma, the Mādrī sons, Sātyaki, the Draupadeyas, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, and allied Pañcālas form a protective ring around Yudhiṣṭhira and churn the enemy ranks. Duryodhana’s inability to enforce restraint prompts Śakuni’s counsel: assemble with cavalry, chariots, and elephants to protect the endangered Madra force and fight in coordinated solidarity. The Kaurava side advances with a tumult of commands; the Pandavas meet them in a central formation, and the Madra contingent is quickly cut down. The battlefield is described through dismemberment imagery, broken chariots, fallen horses, and ominous signs (a great meteor crossing the sun). Seeing the Madra force destroyed and Śalya fallen, Duryodhana’s army becomes disoriented and turns away, fleeing under pressure from resolute Pandava archers.
Chapter Arc: शल्य, क्षत्रियर्षभ, मेघ-गर्जन-सा शरवर्षा बरसाते हुए पाण्डव-पक्ष की अग्रपंक्ति पर टूट पड़ता है—युद्धभूमि पर एक क्षण को लगता है मानो इन्द्र का वज्रवर्ष उतर आया हो। → शल्य सात्यकि को दस बाणों से, भीमसेन और सहदेव को तीन-तीन से और युधिष्ठिर को भी पीड़ित कर पाण्डव-सेना की धुरी हिला देता है; उसके तीक्ष्ण प्रहार आयुधों सहित भुजाएँ और ध्वज काटते हैं, और रणभूमि कुश-बिछी वेदी-सी योद्धाओं से पट जाती है। मुहूर्त भर में वह संज्ञा पाकर क्रोध-रक्त नेत्रों से और भी उग्र हो उठता है, मानो सहस्रनेत्र की प्रतिमा। → युधिष्ठिर शल्य के सामने धर्म-बल और राज-धैर्य को शस्त्र बनाकर निर्णायक प्रहार करते हैं; भीमसेन शल्य के घोड़ों और सारथि को लक्ष्य कर रथ-बल तोड़ते हैं। शल्य का तेज क्षण भर सांवर्तक-अग्नि-सा दीखता है, पर उसी ज्वाला के बीच उसका विनाश-काल उपस्थित होता है—मद्रराज का पतन युद्ध की दिशा पलट देता है। → शल्य तथा उसके भाई का वध हो जाता है; कृतवर्मा (हार्दिक्य) भीषण दबाव में रथ बदलकर पीछे हटता है। पाण्डव-पक्ष, जो अभी-अभी शरवर्षा में डगमगा रहा था, शल्य-पतन के साथ पुनः संगठित होकर बढ़त ले लेता है। → कौरव-पक्ष का एक और स्तम्भ गिर चुका है—अब अगला सेनापति कौन, और दुर्योधन की अंतिम आशा किस पर टिकेगी?
Verse 1
/ ऑपन--माजल छा ्-जस:अ सप्तदशो< ध्याय: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय संजय उवाच अथान्यद् धनुरादाय बलवान वेगवत्तरम् | युधिष्ठिरं मद्रपतिर्भित््वा सिंह इवानदत्,संजय कहते हैं--राजन्! तदनन्तर बलवान मद्रराज शल्य दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष हाथमें लेकर युधिष्ठिरको घायल करके सिंहके समान गर्जने लगे
三阇耶说道:随后,摩陀罗(Madra)之王沙利耶(Śalya)力大无比,另取一张更为迅疾的弓,射伤坚战(Yudhiṣṭhira),并如狮子般咆哮。
Verse 2
ततः स शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् । अभ्यवर्षदमेयात्मा क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभ:,तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न क्षत्रियशिरोमणि शल्य वर्षा करनेवाले मेघके समान क्षत्रियवीरोंपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे
三阇耶说道:于是,那位刹帝利中的雄牛,精神不可测量,向诸武士倾洒箭雨,如同载雨之云倾注甘霖。此景凸显战势的凶猛推进:武艺与意志奔涌向前,而杀伐的伦理重负则隐含在刹帝利履行战斗职责的法度之中。
Verse 3
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा भीमसेन त्रिभि: शरै: । सहदेवं त्रिभिरविंद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडयत्,उन्होंने सात्यकिको दस, भीमसेनको तीन तथा सहदेवको भी तीन बाणोंसे घायल करके युधिष्ठिरको भी पीड़ित कर दिया
三阇耶说道:他以十箭射中萨提耶吉,以三箭射中毗摩塞那,又以三箭射中萨诃提婆;并且进一步逼迫折磨坚战(尤提施提罗)——使战场的重压更深地落在般度诸子身上。
Verse 4
तांस्तानन्यान् महेष्वासान् साश्वान् सरथकूबरान् | अर्दयामास विशिखैरुल्काभिरिव कुञ्जरान्,जैसे शिकारी जलते हुए काष्ठोंसे हाथियोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार वे दूसरे-दूसरे महाधनुर्धर वीरोंको भी घोड़े, रथ और कूबरोंसहित अपने बाणोंद्वारा पीड़ित करने लगे
随后,他又以箭矢摧逼其余那些善使大弓的勇士——连同战马、战车与车辕——如猎人以燃烧的木炬折磨群象一般。
Verse 5
कुण्जरान् कुण्जरारोहानश्चानश्वप्रयायिन: । रथांश्ष रथिन: सार्थ जघान रथिनां वर:,रथियोंमें श्रेष्ठ शल्यने हाथियों और हाथीसवारोंको, घोड़ों और घुड़सवारोंको तथा रथों और रथियोंको एक साथ ही नष्ट कर दिया
三阇耶说道:战车武士之最的沙利耶,一击之间便斩落群象与象骑、战马与骑士,以及战车与御者——以压倒性的威势劈开战阵。
Verse 6
बाहुंश्विच्छेद तरसा सायुधान् केतनानि च । चकार च महीं योधैस्तीर्णा वेदीं कुशैरिव,उन्होंने आयुधोंसहित भुजाओं और ध्वजोंको वेगपूर्वक काट डाला और पृथ्वीपर उसी प्रकार योद्धाओंकी लाशें बिछा दीं, जैसे वेदीपर कुश बिछाये जाते हैं
三阇耶说道:他以迅猛之势斩断战士仍握兵刃的臂膀,又砍倒他们的旗幡。继而使大地遍布倒下的勇士——如祭坛上铺陈的库沙草一般。
Verse 7
तथा तमरिसैन्यानि घ्नन्तं मृत्युमिवान्तकम् । परिवद्र॒र्भुशं क्रुद्धा: पाण्डुपाउ्चालसोमका:
三阇耶说道:即便如此,当他如死亡本身一般——如阎摩、终结者——屠戮敌军之时,般度诸子、般遮罗人与娑摩迦人怒火炽盛,从四面八方合围而上。
Verse 8
इस प्रकार मृत्यु और यमराजके समान शत्रुसेनाका संहार करनेवाले राजा शल्यको अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पाण्डव, पांचाल तथा सोमकयोद्धाओंने चारों ओरसे घेर लिया ।। त॑ भीमसेनश्न शिनेश्न नप्ता माद्रयाश्न पुत्रौ पुरुषप्रवीरी । समागतं भीमबलेन राज्ञा पर्याप्तमन्योन्यमथाह्दयन्त,भीमसेन, शिनिपौत्र सात्यकि और माद्रीके पुत्र नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव--ये भयंकर बलशाली राजा युधिष्ठिरके साथ भिड़े हुए सामर्थ्यशाली वीर शल्यको परस्पर युद्धके लिये ललकारने लगे
三阇耶说道:于是,般度五子与般遮罗、娑摩迦诸军同怀炽烈之怒,从四面合围沙利耶王;此人屠灭敌军,犹如死神与阎摩。其后,毗摩塞那、尸尼之孙萨底耶迦,以及摩德丽的两位人中俊杰——那俱罗与娑诃提婆——随同雄力无比的尤提施提罗王一齐逼近,彼此呼喝挑战那全然堪战的沙利耶,欲在战阵拥挤之中与之单骑决斗。
Verse 9
ततस्तु शूरा: समरे नरेन्द्र नरेश्वरं प्राप्य युधां वरिष्ठम् आवार्य चैनं समरे नृवीरा जघ्नु: शरै: पत्रिभिरुग्रवेगै:,नरेन्द्र! तत्पश्चात् वे शौर्यशाली नरवीर योद्धाओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर शल्यको रोककर समरभूमिमें भयंकर वेगशाली बाणोंद्वारा घायल करने लगे
其后,陛下,战场上的勇士们逼近那位人主沙利耶——战斗中最为卓绝者;他们在阵中拦住他,以羽翎利箭、挟可怖之势疾射,使其负伤。
Verse 10
संरक्षितो भीमसेनेन राजा माद्रीसुता भ्यामथ माधवेन । मद्राधिपं पत्रिभिरुग्रवेगै: स्तनान्तरे धर्मसुतो निजघ्ने,धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भीमसेन, नकुल-सहदेव तथा सात्यकिसे सुरक्षित हो मद्रराज शल्यकी छातीमें उग्रवेगशाली बाणोंद्वारा प्रहार किया
三阇耶说道:达摩之子尤提施提罗王在毗摩塞那、摩德丽二子(那俱罗与娑诃提婆)以及摩陀婆之盟友萨底耶迦的护卫下,以迅猛如雷的利箭射中摩陀罗之主沙利耶的胸膛。
Verse 11
ततो रणे तावकानां रथौघा: समीक्ष्य मद्राधिपतिं शरार्तम् | पर्यावद्रु: प्रवरास्ते सुसज्जा दुर्योधनस्यानुमते पुरस्तात्,तब रणभूमिमें मद्रराजको बाणोंसे पीड़ित देख आपके श्रेष्ठ रथी योद्धा दुर्योधनकी आज्ञासे सुसज्जित हो उन्हें घेरकर युधिष्ठिरके आगे खड़े हो गये
随后在战场上,你方见摩陀罗之主被箭所伤,便有最精锐的车战勇士奉都罗约陀那之命,整装疾驰而来,环护其周,并列阵立于尤提施提罗之前。
Verse 12
ततो द्रुतं मद्रजनाधिपो रणे युधिष्ठिरं सप्तभिरभ्यविद्धयत् । त॑ चापि पार्थो नवभि: पृषत्कै- विंव्याध राजंस्तुमुले महात्मा,इसके बाद मद्रराजने संग्राममें तुरंत ही सात बाणोंसे युधिष्ठिरको बींध डाला। राजन! उस तुमुल युद्धमें महात्मा युधिष्ठिरने भी नौ बाणोंसे शल्यको घायल कर दिया
随后,摩陀罗之主在战阵中迅疾以七箭射中尤提施提罗。王啊,在那喧腾激烈的交锋里,大心的尤提施提罗亦以九矢反刺沙利耶,使其受创。
Verse 13
आकर्णपूर्णायतसम्प्रयुक्तै: शरैस्तदा संयति तैलधौतै: । अन्योन्यमाच्छादयतां महारथौ मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्ष,मद्रराज शल्य और युधिष्ठिर दोनों महारथी कानतक खींचकर छोड़े गये और तेलमें धोये हुए बाणोंद्वारा उस समय युद्धमें एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे
三阇耶说道:当时在激战之中,两位大车战士——摩陀罗之主沙利耶与坚战——把弓弦拉至耳畔,满弓放箭;箭杆光润,宛如油洗。凭借这些锋利的飞矢,他们彼此以箭雨遮蔽,互相压制,争相以不绝的箭幕淹没对方。
Verse 14
ततस्तु तूर्ण समरे महारथौ परस्परस्यान्तरमीक्षमाणौ । शरैर्भुशं विव्यधतुर्नुपोत्तमौ महाबलौ शत्रुभिरप्रधृष्यौ,वे दोनों महारथी समरभूमिमें एक-दूसरेपर प्रहार करनेका अवसर देख रहे थे। दोनों ही शत्रुओंके लिये अजेय, महाबलवान् तथा राजाओंमें श्रेष्ठ थे। अतः: बड़ी उतावलीके साथ बाणोंद्वारा एक-दूसरेको गहरी चोट पहुँचाने लगे
三阇耶说道:随后在战阵之中,两位大车战士彼此窥伺破绽,迅疾以箭反复穿刺对方。二人皆为诸王之最,力大无比,敌人难以撼动;因此怀着急切而坚决的意志,在争胜之战里互致深创。
Verse 15
तयोर्धनुज्यातलनि:स्वनो महान् महेन्द्रवजञाशनितुल्यनि:स्वन: । परस्परं बाणगणैर्महात्मनो: प्रवर्षतोर्मद्रपपाण्डुवीरयो:
三阇耶说道:在那两位大心之士——摩陀罗王与般度勇士——彼此以箭群如雨倾泻之时,响起了震天巨声:弓弦的轰鸣与激响,宛如因陀罗金刚雷霆的崩裂之声。
Verse 16
परस्पर बाणोंकी वर्षा करते हुए महामना मद्रराज तथा पाण्डववीर युधिष्ठिरके धनुषकी प्रत्यंचाका महान् शब्द इन्द्रके वजकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ता था ।। तौ चेरतुर्व्याप्रशिशुप्रकाशौ महावनेष्वामिषगृद्धिनाविव । विषाणिनौ नागवराविवोभौ ततक्षतु: संयति जातदर्पो,उन दोनोंका घमण्ड बढ़ा हुआ था। वे दोनों मांसके लोभसे महान् वनमें जूझते हुए व्याप्रके दो बच्चोंके समान तथा दाँतोवाले दो बड़े-बड़े गजराजोंकी भाँति युद्धस्थलमें परस्पर आघात करने लगे
三阇耶说道:当那高心的摩陀罗王与般度勇士坚战彼此倾泻箭雨时,他们弓弦的巨响宛如因陀罗金刚的雷霆轰鸣。战意与傲气激荡,两人周旋冲突,如大林中为求血食而搏斗的两只虎崽;又如两头长牙的象王,在战场上一次又一次相互撞击、猛力攻伐。
Verse 17
ततस्तु मद्राधिपतिर्महात्मा युधिष्ठिरं भीमबलं प्रसहा । विव्याध वीरं हृदये5तिवेगं शरेण सूर्याग्निसमप्र भेण,इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि शल्यवधे सप्तदशोडथध्याय:
三阇耶说道:随后,摩陀罗之主、伟大的沙利耶以强力压制,向那位英雄坚战——其力如毗摩——心口处射入一箭;此箭疾飞如电,光焰炽盛,宛如太阳与烈火。
Verse 18
तत्पश्चात् महामना मद्रराज शल्यने सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी बाणसे अत्यन्त वेगवान् और भयंकर बलशाली वीर युधिष्ठिरकी छातीमें चोट पहुँचायी ।। ततो5तिविद्धो5थ युधिष्ठिरोडपि सुसम्प्रयुक्तेन शरेण राजन । जघान मद्राधिपतिं महात्मा मुर्दें च लेभे ऋषभ: कुरूणाम्,राजन! उससे अत्यन्त घायल होनेपर भी कुरुकुल-शिरोमणि महात्मा युधिष्ठिरने अच्छी तरह चलाये हुए बाणके द्वारा मद्रराज शल्यको आहत (एवं मूर्च्छित) कर दिया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई
其后,摩陀罗王舍利耶,心怀宏大,光辉如日如火,以一支迅疾、可怖、蕴满劲力之箭,击中勇士由提施提罗的胸膛。由提施提罗虽被深深贯穿,仍以俱卢之雄牛之姿,放出一矢,准而有度,射中摩陀罗之主,使其昏眩倒地。
Verse 19
ततो मुहूर्तादिव पार्थिवेन्द्रो लब्ध्वा संज्ञां क्रोधसंरक्तनेत्र: । शतेन पार्थ त्वरितो जघान सहसनेत्रप्रतिमप्रभाव:,तब इन्द्रके समान प्रभावशाली राजा शल्यने दो ही घड़ीमें होशमें आकर क्रोधसे लाल आँखें करके बड़ी उतावलीके साथ युधिष्ठिरको सौ बाण मारे
随即,仿佛只过了片刻,诸王之主便恢复了神识。怒火使其双目赤红,威光如千眼因陀罗;他急速地以百箭齐发,猛击帕尔塔(由提施提罗)。
Verse 20
त्वरंस्ततो धर्मसुतो महात्मा शल्यस्य कोपान्नवभि: पृषत्कै: । भित्त्वा हुरस्तपनीयं च वर्म जघान षड्भिस्त्वपरै: पृषत्कैः,इसके बाद धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरने कुपित हो शीघ्रतापूर्वक नौ बाण मारकर राजा शल्यकी छाती और उनके सुवर्णमय कवचको विदीर्ण कर दिया। फिर छः: बाण और मारे
随后,法之子由提施提罗,大心之王,因舍利耶之怒而自亦奋起,急射九矢,洞穿其胸,并裂开其金甲;继而又连发六箭。
Verse 21
ततस्तु मद्राधिपति: प्रकृष्टें भधनुर्विकृष्य व्यसृजत् पृषत्कान् | द्वाभ्यां शराभ्यां च तथैव राज्ञ- श्रिच्छेद चापं कुरुपुड्वस्य,तदनन्तर मद्रराजने अपने उत्तम धनुषको खींचकर बहुत-से बाण छोड़े। उन्होंने दो बाणोंसे कुरुकुलशिरोमणि राजा युधिष्ठिरके धनुषको काट दिया
然而随后,摩陀罗之主拉满其上乘之弓,连放众箭;又以两矢斩断俱卢族之冠冕——由提施提罗王的弓。
Verse 22
नवं ततो<न्यत् समरे प्रगृहा राजा धनुर्घोरतरं महात्मा । शल्यं तु विव्याध शरै: समन्ताद् यथा महेन्द्रो नमुचिं शिताग्रै:,तब महात्मा राजा युधिष्छिरने समरांगणमें दूसरे नये और अत्यन्त भयंकर धनुषको हाथमें लेकर तीखी धारवाले बाणोंसे शल्यको उसी प्रकार सब ओरसे घायल कर दिया, जैसे देवराज इन्द्रने नमुचिको
三阇耶曰:其时,在战阵之中,那高贵的王又执起另一张新弓,比先前更为可怖;他以锋锐之箭从四面八方射伤舍利耶,正如大因陀罗昔日以利矢洞穿那牟支一般。
Verse 23
ततस्तु शल्यो नवश्रि: पृषत्कै- भीमस्य राज्ञश्वच युधिष्ठिरस्य । निकृत्य रौक्मे पटुवर्मणी तयो- विंदारयामास भुजौ महात्मा,तब महामनस्वी शल्यने नौ बाणोंसे भीमसेन तथा राजा युधिष्ठिरके सोनेके सुदृढ़ कवचोंको काटकर उन दोनोंकी भुजाओंको विदीर्ण कर डाला
三阇耶说道:随后,沙利耶——新近焕发荣光——以箭矢猛击;他斩破毗摩与国王由提施提罗坚固的金甲,那位大心之士撕裂了二人的臂膀。在战场冷酷的法则中,武勇与决断正是借此等一击而显露;而其所带来的痛苦,也昭示了战争可怖的代价。
Verse 24
ततो<5परेण ज्वलनार्कतेजसा क्षुरेण राज्ञो धनुरुन्ममाथ । कृपश्च तस्यैव जघान सूतं षड्भि: शरै: सोडभिमुख: पपात,इसके बाद अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी क्षुरके द्वारा उन्होंने राजा युधिष्ठिरके धनुषको मथित कर दिया। फिर कृपाचार्यने भी छ: बाणोंसे उन्हींके सारथिको मार डाला। सारथि उनके सामने ही पृथ्वीपर गिर पड़ा
随后,他以一支刃如剃刀、光焰如火与太阳的利箭,击碎了由提施提罗王的弓。克利波也以六箭射杀了那位国王的御者;车夫就在王的面前坠地而亡。此景凸显战阵无情的机括:折其兵器、夺其倚仗,以废其战力,即便所击并非主将本身。
Verse 25
मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरस्य शरैश्नतुर्भि्निजघान वाहान् | वाहांश्व हत्वा व्यकरोन्महात्मा योधक्षयं धर्मसुतस्य राज्ञ:,तत्पश्चात् मद्रराजने चार बाणोंसे युधिष्ठिरके चारों घोड़ोंका भी संहार कर डाला। घोड़ोंको मारकर महामनस्वी शल्यने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके योद्धाओंका विनाश आरम्भ कर दिया
三阇耶说道:摩陀罗之主也以四箭射倒了由提施提罗的四匹战马。杀尽马匹之后,那位大心的沙利耶便着手摧毁法子王由提施提罗的诸军士——此举并非只攻其身,而是夺其机动与护卫,从而更深地加重了战争的道德重压。
Verse 26
(यददभुतं कर्म न शक््यमन्यै: सुदुःसहं तत् कृतवन्तमेकम् । शल्यं नरेन्द्रस्य विषण्णभावाद् विचिन्तयामास मृदड़केतु: ।। किमेतदिन्द्रावरजस्य वाक्यं मोघं भवत्यद्य विधेबलेन । जहीति शल्यं हावदत् तदाजौ न लोकनाथस्य वचो<न््यथा स्यात् ।।) जो अद्भुत एवं दुःसह कार्य दूसरे किसीसे नहीं हो सकता, वही एकमात्र शल्यने राजा युधिष्ठिरके प्रति कर दिखाया। इससे मृदंगचिह्लित ध्वजवाले युधिष्ठिर विषादग्रस्त हो इस प्रकार चिन्ता करने लगे--'“क्या आज दैवबलसे इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्णकी बात झूठी हो जायगी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “आप युद्धमें शल्यको मार डालिये” उन जगदीश्वरका कथन व्यर्थ तो नहीं होना चाहिये। तथा कृते राजनि भीमसेनो मद्राधिपस्थाथ ततो महात्मा । छित्त्वा धनुर्वेगवता शरेण द्वाभ्यामविध्यत् सुभुशं नरेन्द्रम,जब मद्रराज शल्यने राजा युधिष्ठिरकी ऐसी दशा कर दी, तब महामनस्वी भीमसेनने एक वेगवान् बाणद्वारा उनके धनुषको काट दिया और दो बाणोंसे उन नरेशको भी अत्यन्त घायल कर दिया
三阇耶说道:见到沙利耶独自完成了奇绝而几乎令人难以承受的壮举——非他人所能为——旗帜上绘有鼓徽的由提施提罗陷入沮丧,心中思量道:“难道今日因命运之力,因陀罗之弟、世间之主克里希那的话竟要落空吗?他在战场上明言:‘当诛沙利耶。’世界之主的训示不应成空,更不应反其所言。”
Verse 27
तथापरेणास्य जहार यन्तुः कायाच्छिर: संहननीयमध्यात् । जघान चाश्चां श्वतुरः सुशीघ्र॑ तथा भृशं कुपितो भीमसेन:
三阇耶说道:随后,御者又以一击,从颈间将其首级与躯体斩离。毗摩塞那怒火炽盛,也迅疾击倒那四匹战马。此景昭示战争无情的推进:愤怒驱使迅猛而决绝的杀戮,连战阵的支撑之物——御者与马匹——也被尽数剪除,只为彻底废去敌手。
Verse 28
तत्पश्चात् अधिक क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने दूसरे बाणसे शल्यके सारथिका मस्तक उसके धड़से अलग कर दिया और उनके चारों घोड़ोंको भी शीघ्र ही मार डाला ।। तमग्रणी: सर्वधनुर्धराणा- मेकं॑ चरन्तं समरे5तिवेगम् । भीम: शतेन व्यकिरच्छराणां माद्रीपुत्र: सहदेवस्तथैव,इसके बाद सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य भीमसेन तथा माद्रीकुमार सहदेवने समरांगणमें बड़े वेगसे एकाकी विचरनेवाले शल्यपर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा की
其后,毗摩塞那怒火炽盛,以第二箭斩断沙利耶御者之首,使之与躯干分离,又迅疾射杀其车前四马。继而,诸弓手之冠的毗摩与摩德丽之子萨诃提婆,向那在战场上以惊人速度独自驰突的沙利耶倾泻百箭,如雨而下。
Verse 29
तै: सायकैर्मोहितं वीक्ष्य शल्यं भीम: शरैरस्य चकर्त वर्म | स भीमसेनेन निकृत्तवर्मा मद्राधिपश्चर्म सहस्रतारम्,उन बाणोंसे शल्यको मोहित हुआ देख भीमसेनने उनके कवचको भी काट डाला। भीमसेनके द्वारा अपना कवच कट जानेपर भयंकर बलशाली महामनस्वी मद्रराज शल्य सहस््र तारोंके चिहसे सुशोभित ढाल और तलवार लेकर उस रथसे कूद पड़े और कुन्तीपुत्रकी ओर दौड़े। उन्होंने नकुलके रथका हरसा काटकर युधिष्ठिरपर धावा किया
三阇耶曰:见沙利耶为那些箭矢所惑,毗摩以箭簇斩裂其甲胄。甲胄既被毗摩塞那削断,摩陀罗之主沙利耶——力猛而志高——执一面镶有千钉之盾与一柄利剑,自战车跃下,直扑昆蒂之子而去。
Verse 30
प्रगृह्दा खड॒गं च रथान्महात्मा प्रस्कन्द्य कुन्तीसुतमभ्यधावत् । छित्त्वा रथेषां नकुलस्य सो5थ युधिष्ठिरें भीमबलो<5भ्यधावत्,उन बाणोंसे शल्यको मोहित हुआ देख भीमसेनने उनके कवचको भी काट डाला। भीमसेनके द्वारा अपना कवच कट जानेपर भयंकर बलशाली महामनस्वी मद्रराज शल्य सहस््र तारोंके चिहसे सुशोभित ढाल और तलवार लेकर उस रथसे कूद पड़े और कुन्तीपुत्रकी ओर दौड़े। उन्होंने नकुलके रथका हरसा काटकर युधिष्ठिरपर धावा किया
三阇耶曰:沙利耶这位高魂之士执剑在手,自战车跃下,奔向昆蒂之子。继而他斩断那俱罗战车之具,这位臂力雄强的战士又径直冲向坚战(尤提士提罗)。
Verse 31
त॑ चापि राजानमथोत्पतन्तं क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम् । धृष्टझ्ुम्नो द्रौपदेया: शिखण्डी शिनेश्व नप्ता सहसा परीयु:,क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उछलकर आनेवाले राजा शल्यको धूृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र शिखण्डी तथा सात्यकिने सहसा चारों ओरसे घेर लिया
三阇耶曰:他们也一齐扑向沙利耶王;他怒而跃起,冲来如同死神亲临。德里什塔丢摩那、德罗帕蒂诸子、尸佉安丁以及萨底耶吉之孙,倏然从四面将他围住。
Verse 32
अथास्य चर्माप्रतिमं न््यकृन्तद् भीमो महात्मा नवश्रि: पृषत्कै: । खडगं च भल्लैर्निचकर्त मुष्टौ नदन प्रहृष्टस्तव सैन्यमध्ये,महामना भीमने नौ बाणोंसे उनकी अनुपम ढालके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर आपकी सेनाके बीचमें बड़े हर्षके साथ गर्जना करते हुए उहोंने अनेक भल्लोंद्वारा उनकी तलवारकी मुट्ठी भी काट डाली
三阇耶曰:于是,毗摩这位大魂之雄、光辉常新者,以锐箭将那无比之盾斩成碎片。又在你军阵之中,他欢然咆哮,以锋利的婆罗(bhalla)箭矢斩断其剑柄。
Verse 33
तत् कर्म भीमस्य समीक्ष्य हृष्टा- स््ते पाण्डवानां प्रवरा रथौघा: । नादं च चक्रुर्भुशमुत्स्मयन्तः शड्खांश्व दध्मु: शशिसंनिकाशान्,भीमसेनका यह बना देखकर पाण्डवदलके श्रेष्ठ रथी बड़े प्रसन्न हुए और वे हँसते हुए जोर-जोरसे सिं करने तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल शंख बजाने लगे
三阇耶说:见到毗摩所行此举,般度诸王中最杰出的战车勇士皆欣然振奋。众人开怀而笑,发出震天怒吼,又吹响明亮如月的海螺号——在战阵重压之中,这是重燃勇气与同心之志的欢腾信号。
Verse 34
तेनाथ शब्देन विभीषणेन तथाभितप्तं बलमप्रधृष्यम् कांदिग्भूतं रुधिरेणो क्षिताडूं विसंज्ञकल्पं च तदा विषण्णम्,उस भयानक शब्दसे संतप्त हो अजेय कौरवसेना विषादग्रस्त एवं अचेत-सी हो गयी। वह खूनसे लथपथ हो अज्ञात दिशाओंकी ओर भागने लगी
三阇耶说:那可怖的怒吼击中并灼烧人心,使原本似乎不可攻破的大军顿时陷入混乱。浑身血污,众人恍若失神,意气消沉,惊惶奔逃,竟不知该往何方而去。
Verse 35
स मद्रराज: सहसा विकीर्णो भीमाग्रगै: पाण्डवयो धमुख्यै: । युधिष्ठटिरस्याभिमुखं जवेन सिंहो यथा मृगहेतो: प्रयात:,भीम जिनके अगुआ थे, उन पाण्डवपक्षके प्रमुख वीरोंद्वारा बाणोंसे आच्छादित किये गये मद्रराज शल्य सहसा बड़े वेगसे युधिष्ठिरकी ओर दौड़े, मानो कोई सिंह किसी मृगको पकड़नेके लिये झपटा हो
三阇耶说:摩陀罗之王沙利耶——忽被以毗摩为首的般度诸勇士之箭雨所覆——猛然加速,直扑由提施提罗,如雄狮跃起擒取猎物。
Verse 36
स धर्मराजो निहताश्वसूत: क्रोधेन दीप्तो ज्वलनप्रकाश: । दृष्टवा च मद्राधिपतिं सम तूर्ण समभ्यधावत् तमरिं बलेन,धर्मराज युधिष्ठिरके घोड़े और सारथि मारे गये थे, इसलिये वे क्रोधसे उद्दीप्त हो प्रज्वलित अग्निके समान जान पढ़ते थे। उन्होंने अपने शत्रु मद्रराज शल्यको देखकर उनपर बलपूर्वक आक्रमण किया
三阇耶说:法王由提施提罗的战马与御者已被杀,他怒焰腾起,如烈火炽然。见到摩陀罗之主沙利耶,他便迅疾而强势地冲向那敌人。
Verse 37
गोविन्दवाक्यं त्वरितं विचिन्त्य दश्ने मतिं शल्यविनाशनाय । स धर्मराजो निहताश्वसूतो रथे तिष्ठन् शक्तिमेवा भ्यकाड्क्षत्,उस समय श्रीकृष्णके वचनको स्मरण करके उन्होंने शीघ्र ही शल्यको मार डालनेका निश्चय किया। धर्मराजके घोड़े और सारथि तो मारे ही जा चुके थे केवल रथ शेष था; अतः उसीपर खड़े होकर उन्होंने शल्यपर शक्तिके ही प्रयोगका विचार किया
忆起瞿文陀(克里希那)之言并迅速思量,法王坚定了毁灭沙利耶的决心。他的战马与御者既已被杀,只剩战车;他立于车上,定意以“沙克提”长枪之器对付沙利耶。
Verse 38
तच्चापि शल्यस्य निशम्य कर्म महात्मनो भागमथावशिष्टम् । कृत्वा मन: शल्यवधे महात्मा यथोक्तमिन्द्रावरजस्य चक्रे,महात्मा युधिष्ठिरने महामना शल्यके पूर्वोक्त कर्मको देख-सुनकर और उन्हें अपना ही भाग अवशिष्ट जानकर, जैसा श्रीकृष्णने कहा था उसके अनुसार शल्यके वधका संकल्प किया
三阇耶说道:听闻大士沙利耶的那番作为,又明白如今所余之事已成自己命定之分,尊贵的尤提史提罗便将心志系于诛杀沙利耶。他一如因陀罗之弟黑天(奎师那)所教而行——决然不移,承担战争加诸其身的法义重担。
Verse 39
स धर्मराजो मणिहेमदण्डां जग्राह शक्ति कनकप्रकाशाम् | नेत्रे च दीप्ते सहसा विवृत्य मद्राधिपं क्रुद्धमना निरैक्षत्,धर्मराजने मणि और सुवर्णमय दण्डसे युक्त तथा सोनेके समान प्रकाशित होनेवाली शक्ति हाथमें ली और मन-ही-मन कुपित हो सहसा रोषसे जलती हुई आँखें फाड़कर मद्रराज शल्यकी ओर देखा
三阇耶说道:法王尤提史提罗执起那柄“沙克提”长枪,枪柲嵌以宝珠与黄金,光耀如熔金。随即他双目骤然大张,怒焰灼灼,含愤凝视摩陀罗之主沙利耶。
Verse 40
निरीक्षितो5सौ नरदेव राज्ञा पूतात्मना निर्हटकल्मषेण । आसीजन्न यद् भस्मसान्मद्रराज- स्तदद्भुतं मे प्रतिभाति राजन्
三阇耶说道:大王啊,那摩陀罗之主在那位心灵清净、驱尽垢染的王者注视之下,竟未坐于灰烬之上。此事在我看来,大王,实为奇异。
Verse 41
नरदेव! पापरहित, पवित्र अन्तःकरणवाले, राजा युधिष्ठिरके रोषपूर्वक देखनेपर भी मद्रराज शल्य जलकर भस्म नहीं हो गये, यह मुझे अद्भुत बात जान पड़ती है ।। ततस्तु शक्ति रुचिरोग्रदण्डां मणिप्रवेकोज्ज्वलितां प्रदीप्ताम् । चिक्षेप वेगात् सुभृशं महात्मा मद्राधिपाय प्रवर: कुरूणाम्,तदनन्तर कौरवशिरोमणि महात्मा युधिष्ठिरने सुन्दर एवं भयंकर दण्डवाली तथा उत्तम मणियोंसे जटित होनेके कारण प्रज्वलित दिखायी देनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको मद्रराज शल्यके ऊपर बड़े वेगसे चलाया
三阇耶说道:“大王啊,在我看来实在奇异:即便尤提史提罗——无罪而心地清净——含怒注视摩陀罗之主沙利耶,沙利耶也未被焚尽化为灰烬。随后,那位大士、俱卢族之最的尤提史提罗,以极猛之势将那炽燃的沙克提长枪掷向沙利耶——枪柲既美且厉,因镶嵌上等宝珠而光焰更盛。”
Verse 42
दीप्तामथैनां प्रहितां बलेन सविस्फुलिज्रां सहसा पतन्तीम् । प्रैक्षन्त सर्वे कुरव: समेता दिवो युगान्ते महतीमिवोल्काम्,बलपूर्वक फेंकी जानेसे प्रज्वलित हुई तथा आगकी चिनगारियाँ छोड़ती हुई उस शक्तिको, वहाँ आये हुए समस्त कौरवोंने प्रलयकालमें आकाशसे गिरनेवाली बड़ी भारी उल्काके समान सहसा शल्यपर गिरती देखा
三阇耶说道:于是,众俱卢将士齐聚观望那柄炽燃的沙克提,被巨力掷出,火星四溅,倏然坠落——宛如劫末之时自天而降的巨大陨星——直扑沙利耶而去。
Verse 43
तां कालरात्रीमिव पाशहस्तां यमस्य धात्रीमिव चोग्ररूपाम् | स ब्रह्मुदण्डप्रतिमाममोधां ससर्ज यत्तो युधि धर्मराज:,वह शक्ति पाश हाथमें लिये हुए कालरात्रिके समान उग्र, यमराजकी धायके समान भयंकर तथा ब्रह्मदण्डके समान अमोघ थी। धर्मराजने बड़े यत्न और सावधानीके साथ युद्धमें उसका प्रयोग किया था
三阇耶说道:那件兵器——如同手执绳索的迦罗罗底丽,又如阎摩那凶猛的乳母——形相可怖,且如梵天之杖般无不中的。达摩罗阇在战场上以极大的力气与谨慎的决断将其掷出。
Verse 44
गन्धसत्रगग्रयासनपान भो ज नै- रभ्यर्चितां पाण्डुसुतै: प्रयत्नात् । सांवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं कृत्यामथर्वाज्धिरसीमिवोग्राम्,पाण्डवोंने गन्ध (चन्दन), माला, उत्तम आसन, पेयपदार्थ और भोजन आदि अर्पण करके सदा प्रयत्नपूर्वक उसकी पूजा की थी। वह प्रलयकालिक संवर्तक नामक अग्निके समान प्रज्वलित होती और अथर्वांगिरस मन्त्रोंसे प्रकट की गयी कृत्याके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी
三阇耶说道:般度之子以不懈之力常常供奉她,献上香料(如檀香)、花鬘、上等座具、饮品与食物。她燃炽如宇宙毁灭时的三末伐多迦之火,又极其可怖——如同由阿闼婆—安吉罗娑真言所召出的“克利底耶”(咒术所化的毁灭之灵)。
Verse 45
ईशानहेतो: प्रतिनिर्मितां तां त्वष्टा रिपूणामसुदेहभक्ष्याम् । भूम्यन्तरिक्षादिजलाशयानि प्रसहा भूतानि निहन्तुमीशाम्,त्वष्टा प्रजापति (विश्वकर्मा)-ने भगवान् शंकरके लिये उस शक्तिका निर्माण किया था। वह शत्रुओंके प्राण और शरीरको अपना ग्रास बना लेनेवाली थी तथा जल, थल एवं आकाश आदियमें रहनेवाले प्राणियोंको भी बलपूर्वक मार डालनेमें समर्थ थी
三阇耶说道:为伊沙那(湿婆)之故,工巧神特瓦什特利(生主、毗首羯磨)重新铸成那股威力。它能吞噬敌人的性命之息与形体,又能以暴烈之势毁灭居于大地、空中与水域的一切众生。
Verse 46
घण्टापताकामणिवज्जभाजं वैदूर्यचित्रां तपनीयदण्डाम् । त्वष्टा प्रयत्नान्नियमेन क्लृप्तां ब्रह्मद्विषामन्तकरीममोघाम्,उसमें छोटी-छोटी घंटियाँ और पताकाएँ लगी थीं, मणि और हीरे जड़े गये थे, वैदूर्यमणिके द्वारा उसे चित्रित किया गया था। उस शक्तिका दण्ड तपाये हुए सुवर्णका बना था। विश्वकर्माने नियमपूर्वक रहकर बड़े प्रयत्नसे उसको बनाया था। वह ब्रह्मद्रोहियोंका विनाश करनेवाली तथा लक्ष्य वेधनेमें अचूक थी
三阇耶说道:“其上缀有细小铃铛与飘扬旌幡,镶嵌宝石与金刚钻,并以吠琉璃(vaidūrya)错饰成纹;其杆以精炼之金铸就。特瓦什特利以戒律自持、竭力锻造,使之无不中的——专为毁灭敌视梵(神圣秩序与灵性真理)之人,击中目标从不差失。”
Verse 47
बलप्रयत्नादधिरूढवेगां मन्त्रैश्न घोरैरभिमन्त्रय यत्नात् । ससर्ज मार्गेण च तां परेण वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम्,बल और प्रयत्नके द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था, युधिष्ठिरने उस समय मद्रराजका वध करनेके लिये उसे घोर मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके उत्तम मार्गके द्वारा प्रयत्नपूर्वक छोड़ा था
三阇耶说道:凭借力量与竭力,它的速度已增至凶猛之极。其时,欲取摩陀罗之主性命的由提湿提罗,谨慎以可怖真言为之加持,循最善之轨道,怀着明确而审慎的意志将其放出。
Verse 48
हतो$सि पापेत्यभिगर्जमानो रुद्रोडन्धकायान्तकरं यथेषुम् प्रसार्य बाहुं सुदृढं सुपार्णि क्रोधेन नृत्यन्निव धर्मराज:,जैसे रुद्रने अन्धकासुरपर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा था, उसी प्रकार क्रोधसे नृत्य-सा करते हुए धर्मराज युधिष्ठिरने सुन्दर हाथवाली अपनी सुदृढ़ बाँह फैलाकर वह शक्ति शल्यपर चला दी और गरजते हुए कहा--'ओ पापी! तू मारा गया”
Sañjaya said: Roaring, “You are slain, O sinner!”, Dharmarāja Yudhiṣṭhira—his arm outstretched, firm and well-aimed—hurled his spear at Śalya, just as Rudra once loosed a life-ending arrow at Andhaka. In his wrath he seemed to dance, embodying the grim moral tension of war where righteous duty is carried out through terrible violence.
Verse 49
(स्फुरत्प्रभामण्डलमंशुजालै- धर्मात्मनो मद्रविनाशकाले । पुरत्रयप्रोत्सरणे पुरस्ता- न्याहेश्वरं रूपमभूत् तदानीम् ।।) पूर्वकालमें त्रिपुरोंका विनाश करते समय भगवान् महेश्वरका जैसा स्वरूप प्रकट हुआ था, वैसा ही शल्यके संहारकालमें उस समय धर्मात्मा युधिष्ठिरका रूप जान पड़ता था। वे अपने किरणसमूहोंसे प्रभाका पुंज बिखेर रहे थे। तां सर्वशक्त्या प्रहितां सुशक्ति युधिष्ठिरेणाप्रतिवार्यवीर्याम् । प्रतिग्रहायाभिननर्द शल्य: सम्यग्घुतामग्निरिवाज्यधाराम्,युधिष्ठिरने उस उत्तम शक्तिको अपना सारा बल लगाकर चलाया था। इसके सिवा, उसके बल और प्रभावको रोकना किसीके लिये भी असम्भव था तो भी उसकी चोट सहनेके लिये मद्रराज शल्य गरज उठे, मानो हवन की हुई घृतधाराको ग्रहण करनेके लिये अग्निदेव प्रज्वलित हो उठे हों
Sañjaya said: At the time of destroying Śalya, the righteous Yudhiṣṭhira appeared with a blazing halo and a net of rays—like the very form of Lord Maheśvara that once manifested in the ancient destruction of the three cities (Tripura). Then Yudhiṣṭhira hurled that excellent spear with all his strength; its force and efficacy were irresistible. Yet King Śalya roared to receive the blow, like fire flaring up to accept a well-offered stream of ghee in sacrifice.
Verse 50
सा तस्य मर्माणि विदार्य शुभ्र- मुरो विशालं च तथैव भित्त्वा विवेश गां तोयमिवाप्रसक्ता यशो विशाल नृपतेर्दहन्ती,परंतु वह शक्ति राजा शल्यके मर्मस्थानोंको विदीर्ण करके उनके उज्ज्वल एवं विशाल वक्ष:स्थलको चीरती तथा विस्तृत यशको दग्ध करती हुई जलकी भाँति धरतीमें समा गयी। उसकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती थी
Sañjaya said: That bright spear, having torn through his vital points and likewise cleaving his broad, shining chest, sank into the earth like water that meets no obstruction—burning away the king’s vast fame. Its course was nowhere checked.
Verse 51
नासाक्षिकर्णास्यविनि:सृतेन प्रस्यन्दता च व्रणसम्भवेन । संसिक्तगात्रो रुधिरेण सो5भूत् क्रौज्चो यथा स्कन्दहतो महाद्रि:,जैसे कार्तिकेयकी शक्तिसे आहत हुआ महापर्वत क्रौंच गेरूमिश्रित झरनोंके जलसे भीग गया था, उसी प्रकार नाक, आँख, कान और मुखसे निकले तथा घावोंसे बहते हुए खूनसे शल्यका सारा शरीर नहा गया
Sañjaya said: His whole body became drenched in blood—blood issuing from his nose, eyes, ears, and mouth, and blood streaming from the wounds. He looked like the great mountain Krauñca, soaked by reddish torrents, when it was struck down by Skanda. The image underscores the brutal cost of war: even the mighty are reduced to helpless suffering, and violence leaves no room for dignity or restraint.
Verse 52
प्रसार्य बाहू च रथाद् गतो गां संछिजन्नवर्मा कुरुनन्दनेन | महेन्द्रवाहप्रतिमो महात्मा वज्राहतं शुद्रमिवाचलस्य,कुरुनन्दन! भीमसेनने जिनके कवचको छिज्न-भिन्न कर डाला था, वे इन्द्रके ऐरावत हाथीके समान विशालकाय राजा शल्य दोनों बाहें फैलाकर वज्जके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति रथसे पृथ्वीपर गिर पड़े
Sañjaya said: Spreading out his arms, King Śalya fell from his chariot onto the earth, his armor torn and shattered by Bhīmasena, O scion of the Kurus. That great-souled warrior, huge like Indra’s mount Airāvata, collapsed like a mountain-peak struck by the thunderbolt—an image of how, in war, even the mighty are brought down when their protection and pride are broken.
Verse 53
बाहू प्रसार्याभिमुखो धर्मराजस्य मद्रराट् । ततो निपतितो भूमाविन्द्रध्वज इवोच्छित:,मद्रराज शल्य धर्मराज युधिष्ठिरके सामने ही अपनी दोनों भुजाओंको फैलाकर ऊँचे इन्द्रध्वजके समान धराशायी हो गये
三阇耶说道:面对法王坚战,摩陀罗之王伸展双臂;随即倒落于地,宛如高耸的因陀罗旗幡轰然倾塌。
Verse 54
स तथा भिन्नसर्वाज्रो रुधिरेण समुक्षित: । प्रत्युदूगत इव प्रेम्णा भूम्या स नरपुज्भव:
三阇耶说道:于是那人中雄牛,周身碎裂、血流浸透;当他坠落于地时,仿佛大地因爱而起,迎接并承受了他。
Verse 55
प्रियया कान्तया कान्त: पतमान इवोरसि । उनके सारे अंग विदीर्ण हो गये थे तथा वे खूनसे नहा उठे थे। जैसे प्रियतमा कामिनी अपने वक्ष:स्थलपर गिरनेकी इच्छावाले प्रियतमका प्रेमपूर्वक स्वागत करती है, उसी प्रकार पृथ्वीने अपने ऊपर गिरते हुए नरश्रेष्ठ शल्यको मानो प्रेमपूर्वक आगे बढ़कर अपनाया था ।। चिरं भुक्त्वा वसुमतीं प्रियां कान्तामिव प्रभु:
三阇耶说道:如同爱侣将情人迎入胸怀,大地也仿佛张开怀抱,接住坠落的舍利耶。那位强大的主宰,久享此大地如同挚爱的妻子,如今终归回到她的拥抱之中。
Verse 56
धर्म्ये धर्मात्मना युद्धे निहतो धर्मसूनुना
三阇耶说道:在这合乎正法的战斗中,他被法之子所诛。
Verse 57
शकक््त्या विभिन्नह्नदयं विप्रविद्धायुधध्वजम्
三阇耶说道:以长枪贯刺,他的心被劈裂;他的兵刃与战旗也被击中,粉碎而倒。
Verse 58
ततो युधिष्ठिरश्नापमादायेन्द्रधनुष्प्रभम्
三阇耶说道:于是,坚战举起一张光辉如因陀罗虹霓的神弓——这昭示他在战争重压之中,仍决意以王者之责行事。
Verse 59
व्यधमद् द्विषत: संख्ये खगराडिव पन्नगान् | देहान् सुनिशितैर्भल्लै रिपूर्णां नाशयन् क्षणात्
三阇耶说道:在战阵拥迫之中,他击溃诸敌,如鸟王迦楼罗扑杀群蛇。以锋利如刃的箭镞,他顷刻间毁灭仇敌之躯——此乃战争无情奔涌之象:武勇以迅疾而决断的伤害为度,而非以慈悲为衡。
Verse 60
तदनन्तर युधिष्छिरने इन्द्रधनुषके समान कान्तिमान् दूसरा धनुष लेकर सर्पोका संहार करनेवाले गरुड़की भाँति युद्धस्थलमें तीखे भल्लोंद्वारा शत्रुओंके शरीरोंका नाश करते हुए क्षणभरमें उन सबका विध्वंस कर दिया ।। ततः पार्थस्य बाणौघैरावृता: सैनिकास्तव । निमीलिताक्षा: क्षिण्वन्तो भृशमन्योन्यमर्दिता:
三阇耶说道:其后,坚战又执一张虹光灿然的长弓,在战场上如迦楼罗灭蛇般驰骋。以锋利的阔刃箭,他摧毁敌军之躯,顷刻之间使其尽皆覆灭。随后,你的士卒被帕尔塔(阿周那)的箭雨所遮蔽,半闭双目,痛苦不堪、气力衰竭,在惊惶中彼此推挤践踏。
Verse 61
ततः: शल्ये निपतिते मद्रराजानुजो युवा
三阇耶说道:随后,当沙利耶已然倒下,摩陀罗王(沙利耶)的年轻弟弟挺身而出——这预示着战局阴沉的更迭:亲缘与职责驱使武士踏入亡者之位。
Verse 62
विव्याध च नरश्रेष्ठो नाराचैर्बहुभिस्त्वरन्
三阇耶说道:于是那位人中翘楚以迅疾的决断,连发多支那罗遮箭,洞穿其敌——此乃战争不息之势:技勇与急迫驱使厮杀滚滚向前。
Verse 63
त॑ विव्याधाशुगै: षड्भिर्धर्मराजस्त्वरन्निव
三阇耶说道:随后,法王(坚战,Yudhiṣṭhira)仿佛急迫赶赴要务一般,以六支迅疾之箭贯穿他们——在战争的道义重压之下,仍显出克制而有纪律的力量。
Verse 64
कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च । तब धर्मराजने उसे शीघ्रतापूर्वक छः: बाणोंसे बींध डाला तथा दो क्षुरोंसे उसके धनुष और ध्वजको काट दिया ।। ततो<स्य दीप्यमानेन सुदृढेन शितेन च
三阇耶说道:坚战以两支刃如剃刀之箭,迅疾斩断对手之弓,又削落其旗幡。继而以一支炽然如焰、发力沉稳而锋锐的箭矢,继续逼迫进攻——显出王者的自律与决断:心无恶意,却在战事所迫时毫不迟疑。
Verse 65
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरच्छिर: । तत्पश्चात् एक चमकीले, सुदृढ़ और तीखे भल्लसे सामने खड़े हुए उस राजकुमारके मस्तकको काट गिराया ।। ६४ $ ।। सकुण्डलं तद् ददृशे पतमानं शिरो रथात्
三阇耶说道:他随即看见那颗头颅——耳环仍在——自战车上坠落。此句凸显战场暴力的冷峻终局:王者的徽饰与私人的佩饰,皆不能遮护人免于战争的后果。
Verse 66
तस्यापकृत्तशीर्ष तु शरीरं पतितं रथात्
三阇耶说道:他的身躯——头颅已被斩落——从战车上坠下。此句冷峻地昭示:战争之暴行一旦铸成,后果便不可逆转。
Verse 67
विचित्रकवचे तस्मिन् हते मद्रनूपानुजे
三阇耶说道:当那位披着奇异甲胄的勇士——摩陀罗王之弟——被诛杀之时,战局因一位显赫的俱卢盟友的陨落而转折;这表明在战争中,再强的护佑与名望,也难以逃避命运与往昔业行的果报。
Verse 68
शल्यानुजं हतं दृष्टवा तावकास्त्यक्तजीविता:
三阇耶说道:见到沙利耶的幼弟被杀,俱卢军诸勇士顿失求生之志——哀恸击心,希冀崩塌,在战争的屠戮之中几近绝望。
Verse 69
तांस्तथा भज्यमानांस्तु कौरवान् भरतर्षभ
三阇耶说道:“噢,婆罗多族中的雄牛啊,那些俱卢人——在战场上如此被击碎、被摧折……”
Verse 70
तमायान्तं महेष्वासं दुष्प्रसहूं दुरासदम्
三阇耶说道:“见他逼近——强弓大射的神射手,难以压服、不可强攻——(仅其逼近之势,便令人心生战栗)。”
Verse 71
तौ समेतौ महात्मानौ वा्ष्णेयौ वरवाजिनौ
三阇耶说道:那两位瓦尔什涅耶的豪杰,心怀伟大,乘着良驹,相向而至——在战争沉重的道义之下,英武与高贵于此汇合成景。
Verse 72
इषुभिर्विमलाभासैश्छादयन्तौ परस्परम्
三阇耶说道:二人以洁净无瑕、光辉闪耀的箭雨互相覆盖;箭矢往来稠密,竟似彼此遮蔽。此偈凸显战斗无情的对等往复:武艺与意志呈现为不断续的较量,而非一方对另一方的单向压迫。
Verse 73
चापमार्गबलोदधूतान् मार्गणान् वृष्णिसिंहयो:
三阇耶说道:诸箭由弓力所驱,循其飞行之道放出,疾驰射向弗利什尼族那狮子般的英雄——此乃战势无休无止之象:技艺与威力推动兵刃,直指己方最前列的护卫者。
Verse 74
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्षास्य त्रिभि: शरै:
三阇耶说道:他以十箭贯穿萨底耶迦,又以三矢射中其马——意在折断这战士的机动之势,并在残酷的战场算计中进一步压迫取利。
Verse 75
चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा । कृतवर्माने दस बाणोंसे सात्यकिको तथा तीनसे उनके घोड़ोंको घायल करके झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उनके धनुषको भी काट दिया || ७४ ई || तन्निकृत्तं धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुज्गभव:
三阇耶说道:哈尔迪迦(克利多伐尔摩)以一支节段弯曲之箭,一举斩断萨底耶迦之弓。继而又以十箭射中萨底耶迦,并以三矢伤其马;随后再以一矢命中要害,再度截断其弓。那张上乘之弓既已被断,萨底耶迦——尸尼族之翘楚——弃弓于旁,仍整肃心志以续战,显出战场之势不息:推动每一次交锋的,是技艺与坚忍,而非怒火一端。
Verse 76
तदादाय धनु: श्रेष्ठ वरिष्ठ: सर्वधन्विनाम्
三阇耶说道:他执起那张最上之弓——诸弓手兵器之冠——这位弓术第一者遂整备而动,昭示战事阴沉之法(dharma)所要求的决断与武人之责。
Verse 77
ततो रथं युगेषां च च्छित्त्वा भल्लै: सुसंयतै:
随后,他以瞄准精确的婆罗(bhalla)利箭,斩断战车,并截其轭具及诸般连接之物,使敌在战阵之中失却机动——此举使较量不再只是技艺的炫示,而转入战争严酷的伦理:摧毁敌人作战之具,遂成胜负关键。
Verse 78
ततस्तं विरथं दृष्टवा कृप: शारद्वत: प्रभो
三阇耶说道:于是,见他已失战车,克利波——沙罗陀婆多之子——(对大王)开口说道;战场上残酷的转折,既显出武士的脆弱,也显出战争中职责的无情催逼。
Verse 79
अपोवाह तत): क्षिप्रं रथमारोप्य वीर्यवान् | प्रभो! कृतवर्माको रथहीन हुआ देख शरद्वानके पराक्रमी पुत्र कृपाचार्य उसे शीघ्र ही अपने रथपर बिठाकर वहाँसे दूर हटा ले गये || ७८ $ ।। मद्रराजे हते राजन् विरथे कृतवर्मणि
三阇耶说道:“大王啊,摩陀罗之主既已被杀,克利多跋摩那又失了战车;英勇的克利波立刻将他扶上自己的车,带他撤离那处。”
Verse 80
तत् परे नान्वबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृते
三阇耶说道:然而对阵一方并不能清楚看见发生了什么,因为大军被尘土的云雾所笼罩。在战争的道德迷雾中——混乱横行、视线受蔽——正确的判断变得艰难,行动更多被局势驱使,而非由明辨引领。
Verse 81
ततो मुहूर्तात् तेडपश्यन् रजो भीम॑ समुत्थितम्
随后,过了片刻,他们看见一团可怖的尘云腾起——这是战场上的凶兆,预示着大军的逼近或调动,也使正在展开的屠戮更添沉重的道德负担。
Verse 82
ततो दुर्योधनो दृष्टवा भग्नं स्वबलमन्तिकात्
三阇耶说道:这时,杜律约陀那近处望见己军已被击溃,败亡的冷酷现实直击其心。此刻昭示:当由“非正法”(adharma)驱动的野心遭遇战争的报应时,骄矜与对蛮力的倚仗终将崩塌。
Verse 83
पाण्डवान् सरथान् दृष्टवा धृष्टद्ुम्नं च पार्षतम्
三阇耶说道:见到乘战车列阵的般度诸子,又见帕尔沙塔(德鲁帕达)之子持军统帅德里什塔杜姆那,战场景象立刻转入战争迫在眉睫的道德压力——敌对统领已然分明,皆整装待战;在不可避免的杀伐之中,责任与谋略相互冲撞。
Verse 84
त॑ परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम्
三阇耶说道:敌方的战士们不敢逼近他,仿佛死神亲临其前。此刻昭示:在战斗的狂怒中,一名可怖的勇士足以化作不可逃避的报应,使久经沙场之人亦心志动摇。
Verse 85
ततो युधिष्िरो राजा त्वरमाणो महारथ:,तब महारथी राजा युधिष्ठिरने बड़ी उतावलीके साथ चार बाण मारकर कृतवमकि चारों घोड़ोंका संहार कर डाला तथा छ: तेज धारवाले भल्लोंसे कृपाचार्यको भी घायल कर दिया
三阇耶说道:于是大车战士、国王由提施提罗怀着急迫的决断,四箭齐发,射杀了克利塔跋摩的四匹战马;又以六支锋利如剃刀的“婆罗”(bhalla)箭矢刺伤了德高望重的师长克利波。战阵逼迫之下,纵然是奉持正法的君王,也不得不施以迅疾而果断的杀伐;然而叙事仍让道德的紧张清晰可见——当长者与师长也因战争之必然而成为箭靶。
Verse 86
चतुर्भिनिजघानाश्चान् पत्रिभि: कृतवर्मण: । विव्याध गौतमं चापि षड्भिर्भल्लै: सुतेजनै:,तब महारथी राजा युधिष्ठिरने बड़ी उतावलीके साथ चार बाण मारकर कृतवमकि चारों घोड़ोंका संहार कर डाला तथा छ: तेज धारवाले भल्लोंसे कृपाचार्यको भी घायल कर दिया
三阇耶说道:由提施提罗王以四箭射杀了克利塔跋摩的四匹战马;又以六支锋锐的“婆罗”(bhalla)箭矢刺中乔多摩(克利波),使其负伤。此景凸显战场“不得不然”的阴沉伦理:即便沉稳的君王,也被迫以果断的杀伐去遏止强敌。
Verse 87
अश्वत्थामा ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम् तमपोवाह हार्दिक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात्,इसके बाद अभश्व॒त्थामा अपने रथके द्वारा घोड़ोंके मारे जानेसे रथहीन हुए कृतवर्माको राजा युधिष्ठिरके पाससे दूर हटा ले गया
三阇耶说道:其后,阿湿婆他摩乘自己的战车,将哈尔迪迦(克利塔跋摩)从由提施提罗王身旁拖离——哈尔迪迦的战马已被射杀,遂成无车之人。战势逼迫之中,此举显出同袍的当下之责:护全盟友性命,在其暴露脆弱之时将他带回安全之处。
Verse 88
ततः शारद्वत: षडडश्नि: प्रत्यविद्धयद् युधिष्ठिरम् । विव्याध चाश्वान्निशितैस्तस्याष्टाभि: शिलीमुखै:,तब कृपाचार्यने छः बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला और आठ पैने बाणोंसे उनके घोड़ोंको भी घायल कर दिया
随即,舍罗陀婆多(克利帕)以六支箭射中王者由提施提罗;又以八支锋利如芦苇之箭贯穿由提施提罗的战马——在严酷的战场法则中,此举不仅针对武士本身,更意在夺其机动与指挥之势,于战阵之中使其失其所凭。
Verse 89
एवमेतन्महाराज युद्धशेषमवर्तत । तव दुर्मन्त्रिते राजन् सह पुत्रस्य भारत,महाराज! भरतवंशी नरेश! इस प्रकार पुत्रसहित आपकी कुमन्त्रणासे इस युद्धका अन्त हुआ
三阇耶曰:“正是如此,大王:战争所余与最终结局,便这样发生了。大王,婆罗多之后,此战因汝失策之谋而终——并连同汝子一并招致。”
Verse 90
तस्मिन् महेष्वासवरे विशस्ते संग्राममध्ये कुरुपुड्रवेन । पार्था: समेता: परमप्रहृष्टा: शड्खान् प्रदध्मुर्ठतमीक्ष्य शल्यम्,कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिरके द्वारा युद्धमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर शल्यके मारे जानेपर कुन्तीके सभी पुत्र एकत्र हो अत्यन्त हर्षमें भर गये और शल्यको मारा गया देख शंख बजाने लगे
三阇耶曰:当那位大弓手之最、沙利耶,在战阵中央为库鲁之雄所诛时,帕尔塔诸子齐集一处,欢欣至极;见沙利耶倒地,便齐吹海螺,声震四野。
Verse 91
युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ पुरा कृते वृत्रवधे यथेन्द्रम् । चक्रुश्न नानाविधवाद्यशब्दान् निनादयन्तो वसुधां समेता:,जैसे पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध करनेपर देवताओंने इन्द्रकी स्तुति की थी, उसी प्रकार सब पाण्डवोंने रणभूमिमें युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए वे सब लोग नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि फैलाने लगे
三阇耶曰:正如往昔诸天在诛灭弗栗多罗之后赞颂因陀罗一般,战场之上,众般度五子亦盛赞由提施提罗;他们聚集一处,鸣奏种种战乐,使大地回响震动。
Verse 563
सम्यग्घुत इव स्विष्ट: प्रशान्तो 5ग्निरिवा ध्वरे । उस धर्मानुकूल युद्धमें धर्मात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा मारे गये राजा शल्य यज्ञमें विधिपूर्वक घीकी आहुति पाकर शान्त होनेवाली “स्विष्टकृत्” अग्निके समान सर्वथा शान्त हो गये
三阇耶曰:在那依于法(dharma)而行的战争中,沙利耶王为正义的由提施提罗——法之子——所杀,遂归于彻底的寂静,犹如祭祀之火名“斯维什塔克利特”(Sviṣṭakṛt),在仪轨中酥油如法奉献后便安息平定。
Verse 573
संशान्तमपि मद्रेशं लक्ष्मीनैंव विमुड्चति । शक्तिने राजा शल्यके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर डाला था, उनके आयुध तथा ध्वज छिन्न-भिन्न हो बिखरे पड़े थे और वे सदाके लिये शान्त हो गये थे तो भी मद्रराजको लक्ष्मी (शोभा या कान्ति) छोड़ नहीं रही थी
三阇耶说道:纵然摩陀罗之主已永远沉寂——生命终绝——吉祥天女拉克什弥、王者荣光之辉耀,仍未离弃于他。此偈显明:战士之王的尊严,甚至在死亡中亦可昭然可见。
Verse 603
क्षरन्तो रुधिरं देहैविपन्नायुधजीविता: । युधिष्ठिरके बाणसमूहोंसे आच्छादित हुए आपके सैनिकोंने आँखें मीच लीं और आपसमें ही एक-दूसरेको घायल करके वे अत्यन्त पीड़ित हो गये। उस समय शरीरोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए वे अपने अस्त्र-शस्त्र और जीवनसे भी हाथ धो बैठे
三阇耶说道:被由提湿提罗射出的箭雨所覆盖,你的士卒因恐惧与迷乱而紧闭双目。在战阵拥挤之中,他们竟相互误伤,痛苦至极。鲜血自躯体奔流;既失兵刃,又失求生之志,仿佛同时被夺去臂膀与性命。
Verse 616
भ्रातुस्तुल्यो गुणै: सर्वे रथी पाण्डवम भ्ययात् । तदनन्तर, मद्रराज शल्यके मारे जानेपर उनका छोटा भाई, जो अभी नवयुवक था और सभी गुणोंमें अपने भाईकी ही समानता करता था, रथपर आरूढ़ हो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर चढ़ आया
三阇耶说道:摩陀罗王沙利耶被杀之后,他的幼弟——虽尚年轻,却在诸般德行上与兄长无异——登上战车,向般度之子、般度族的由提湿提罗冲杀而来。
Verse 623
हतस्यापचितिं भ्रातुश्निकीर्षय्युद्धदुर्मद: । मारे गये भाईका प्रतिशोध लेनेकी इच्छासे वह रणदुर्मद नरश्रेष्ठ वीर बड़ी उतावलीके साथ उन्हें बहुत-से नाराचोंद्वारा घायल करने लगा
三阇耶说道:为报兄长之仇而立誓,又被战场的狂傲所煽动,那位人中最胜、骁勇于战的英雄急切地以无数那罗遮箭矢射伤他们。
Verse 656
पुण्यक्षयमनुप्राप्य पतन् स्वर्गादिव च्युतः । पुण्य समाप्त होनेपर स्वर्गसे भ्रष्ट हो नीचे गिरनेवाले जीवकी भाँति उसका वह कुण्डलसहित मस्तक रथसे भूतलपर गिरता देखा गया
三阇耶说道:如同众生福德既尽,便从天界坠落一般,他那仍佩耳环的头颅,被人看见自战车上落下,坠于大地。
Verse 663
रुधिरेणावसिक्ताडुं दृष्टवा सैन्यमभज्यत । फिर खूनसे लथपथ हुआ उसका शरीर भी, जिसका सिर काट लिया गया था, रथसे नीचे गिर पड़ा। उसे देखकर आपकी सेनामें भगदड़ मच गयी
Sañjaya said: Seeing that body, its limbs drenched in blood, the army broke ranks and fell into panic—an ominous sign of collapsing morale amid the brutal ethics of war, where even the sight of a fallen warrior can shatter collective resolve.
Verse 673
हाहाकार प्रकुर्वाणा: कुरवो<भिप्रदुद्रुवु: । मद्रनरेशका वह छोटा भाई विचित्र कवचसे सुशोभित था, उसके मारे जानेपर समस्त कौरव हाहाकार करते हुए भाग चले
Sañjaya said: The Kauravas, raising a loud cry of lamentation, fled in panic. With the fall of the Madra king’s younger brother—resplendent in wondrous armor—their morale broke, revealing how the death of a prominent warrior can unravel an army’s resolve amid the ethical chaos of war.
Verse 683
वित्रेसु: पाण्डवभयादू रजोध्यस्तास्तदा भूृशम् । शल्यके भाईको मारा गया देख धूलिधूसरित हुए आपके सारे सैनिक पाण्डुपुत्रके भयसे जीवनकी आशा छोड़कर अत्यन्त त्रस्त हो गये
Sañjaya said: Stricken with fear of the Pāṇḍavas, the troops were then utterly shaken; covered in dust, they lost hope of life and fell into extreme panic as the battle’s tide turned against them.
Verse 696
शिनेर्नप्ता किरन् बाणैरभ्यवर्तत सात्यकि: । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भागते हुए उन कौरव-योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा करते हुए शिनिपौत्र सात्यकि उनका पीछा करने लगे
Sanjaya said: O best of the Bharatas, Sātyaki—the grandson of Śini—advanced, scattering a shower of arrows. As the Kaurava warriors fled, he pursued them relentlessly, raining shafts upon them, pressing the rout without letting fear or disorder turn him from his martial duty.
Verse 703
हार्दिक्यस्त्वरितो राजन प्रत्यगृह्नादभीतवत् | राजन! दुःसह एवं दुर्जय महाधनुर्धर सात्यकिको आक्रमण करते देख कृतवर्माने शीघ्रतापूर्वक एक निर्भय वीरकी भाँति उन्हें रोका
Sañjaya said: O King, Hārdikya (Kṛtavarmā), acting swiftly, checked the oncoming assault without fear. Seeing Sātyaki—formidable, hard to withstand, and difficult to conquer, a great wielder of the bow—advance to attack, Kṛtavarmā restrained him like a brave warrior, steady in the face of danger.
Verse 713
हार्दिक्य: सात्यकिश्रैव सिंहाविव बलोत्कटौ । श्रेष्ठ घोड़ोंवाले वे महामनस्वी वृष्णिवंशी वीर सात्यकि और कृतवर्मा दो बलोन्मत्त सिंहोंके समान एक-दूसरेसे भिड़ गये
三阇耶说道:哈尔迪迦(克利多伐摩)与萨底耶迦——二人皆如猛狮般凶勇强盛——这两位出自弗利什尼族的高魂英雄,乘着良马,彼此冲锋,正面相撞,展开近身激战。
Verse 723
अर्चिर्भिरिव सूर्यस्य दिवाकरसमप्रभौ । सूर्यके समान तेजस्वी वे दोनों वीर दिनकरकी किरणोंके सदृश निर्मल कान्तिवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे
三阇耶说道:如同太阳炽烈的光芒,那两位英雄——辉耀不亚于“造昼者”——以箭矢相互遮蔽;箭杆清光灿然,宛若日轮自身的光束。
Verse 736
आकाशगानपश्याम पतड्जनिव शीघ्रगान् । वृष्णिवंशके उन दोनों सिंहोंके धनुषद्वारा बलपूर्वक चलाये हुए शीघ्रगामी बाणोंको हमने टिड्डीदलोंके समान आकाशमें व्याप्त हुआ देखा था
三阇耶说道:我们看见天空中那些疾飞的箭矢——由弗利什尼族那两位如狮般的英雄以强力自弓上放出——遍布长空,宛如蝗群四散蔽天。
Verse 753
अन्यदादत्त वेगेन वेगवत्तरमायुधम् | उस कटे हुए श्रेष्ठ धनुषको फेंककर शिनिप्रवर सात्यकिने उससे भी अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष शीघ्रतापूर्वक हाथमें ले लिया
三阇耶说道:他将那张被斩断的上等弓掷开;尸尼族之冠——萨底耶迦——立刻又执起另一张弓,其劲力与迅疾更胜先前。
Verse 766
हार्दिक्यं दशभिर्बाणै: प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । उस श्रेष्ठ धनुषको लेकर सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें दस बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी
三阇耶说道:萨底耶迦,诸弓手之最,执起上等之弓,以十箭深深贯入哈尔迪迦(克利多伐摩)的胸前,造成重创。
Verse 776
अश्वांस्तस्थावधीत् तूर्णमुभौ च पार्ष्णिसारथी । तत्पश्चात् सुसंयत भल्लोंके प्रहारसे उसके रथ, जूए और ईषादण्ड (हरसे)-को काटकर शीघ्र ही घोड़ों तथा दोनों पारशश्वरक्षकोंको भी मार डाला
三阇耶说道:他稳立不动,迅疾击杀了战马,又斩落了守在战车后部的两名随从。继而以锋利如剃刀、连发而至且指向精准的箭矢,截断了敌手的战车、轭具与车辕;随即毫不迟疑,又将战马与后部的两名御者一并诛杀。
Verse 796
दुर्योधनबलं सर्व पुनरासीत् पराड्मुखम् । राजन्! जब मद्रराज मारे गये और कृतवर्मा भी रथहीन हो गया, तब दुर्योधनकी सारी सेना पुनः युद्धसे मुँह मोड़कर भागने लगी
三阇耶说道:大王啊,难敌的全军又一次背离战斗。摩陀罗王既已被杀,克利多跋摩亦失其战车之时,难敌军心崩解,转面离阵,遂开始奔逃。
Verse 806
बल॑ तु हतभूयिष्ठं तत् तदा55सीत् पराड्म्मुखम् । परंतु वहाँ सब ओर धूल छा रही थी, इसलिये शत्रुओंको इस बातका पता न चला। अधिकांश योद्धाओंके मारे जानेसे उस समय वह सारी सेना युद्धसे विमुख हो गयी थी
三阇耶说道:当时那支军队,其大半兵力已被歼灭,便转身背离战斗。然而尘土四起、弥漫四方,敌人未能清楚察觉其变。多数勇士既已阵亡,全军遂心胆俱丧,从战场上退却。
Verse 813
विविधै: शोणितस्रावै: प्रशान्तं पुरुषर्षभ । पुरुषप्रवर! तदनन्तर दो ही घड़ीमें उन सबने देखा कि धरतीकी जो धूल ऊपर उड़ रही थी, वह नाना प्रकारके रक्तका स्रोत बहनेसे शान्त हो गयी है
三阇耶说道:“人中雄牛、至上之士啊!不久之后——仅在两伽提之内——众人便看见,大地上腾起的尘埃已然平息,因为各色血流以不同的方式奔涌成渠。”
Verse 826
जवेनापतत: पार्थनिक: सर्वानवारयत् | उस समय दुर्योधनने यह देखकर कि मेरी सेना मेरे पाससे भाग गयी है, वेगसे आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवयोद्धाओंको अकेले ही रोका
三阇耶说道:那位帕尔塔一方的勇士以迅猛之势阻住了众人。其时,难敌见我军已从他身旁溃散奔逃,便独自一人挡住所有疾冲而来的般度勇士。
Verse 833
आनर्त च दुराधर्ष शितैर्बाणैरवारयत् । रथसहित पाण्डवोंको, ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको तथा दुर्जय वीर आनर्तनरेशको सामने देखकर उसने तीखे बाणोंद्वारा उन सबको आगे बढ़नेसे रोक दिया
三阇耶说道:他见阿那尔塔王强悍难当,又见般度五子乘车而来,并有德鲁帕陀之子持军的提湿陀昙那随行,便以锐利之箭遏止其前进。凭借锋锐箭矢之威,他将众人尽皆阻于前,不许再逼近,显出战场严酷之律:勇武与勇武相抗,亦以勇武相制。
Verse 843
अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्यो5पि न्यवर्तत । जैसे मरणधर्मा मनुष्य पास आयी हुई अपनी मौतको नहीं टाल सकते, उसी प्रकार वे शत्रुपक्षके सैनिक दुर्योधनको लाँधघकर आगे न बढ़ सके। इसी समय कृतवर्मा भी दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः वहीं लौट आया
三阇耶说道:于是哈尔迪迦(克利多跋摩)登上另一辆战车,又一次折返。正如必死之人无法驱退已逼近的死亡,敌军诸勇士也不能越过都利约陀那而向前推进。就在那一刻,克利多跋摩亦登上第二辆战车,再度回到原处。
Verse 5536
सर्वैरज्जै: समाश्शलिष्य प्रसुप्त इव चाभवत् | प्रियतमा कान्ताकी भाँति इस वसुधाका चिरकालतक उपभोग करनेके पश्चात् राजा शल्य मानो अपने सम्पूर्ण अंगोंस उसका आलिंगन करके सो गये थे
三阇耶说道:以四肢百骸拥抱大地之后,沙利耶王便如沉睡一般。正如久享欢爱后拥抱至爱的妻子,那意象昭示:他在长久占有并经历王权与疆土之后,如今静卧不动,仿佛已将世界尽抱于怀,而后放下,归于安息。
The dilemma concerns rājadharma versus warrior impulse: whether obedience to a ruler’s restraint should override factional rage and retaliatory intent, especially when acting may endanger allies and accelerate collapse.
Strategic action without discipline is self-defeating: authority must be matched by internal restraint and coordinated purpose, or collective energy becomes a force of disintegration rather than protection.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is descriptive and diagnostic—showing how the breakdown of command and cohesion operates as a narrative indicator of impending defeat.