Adhyaya 3
Ashramavasika ParvaAdhyaya 3105 Verses

Adhyaya 3

धृतराष्ट्रस्य पाण्डवेषु प्रीति-वृत्तान्तः | Dhṛtarāṣṭra’s Affectionate Disposition toward the Pāṇḍavas

Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Yudhiṣṭhira Saṃbandha (Post-war Court Concord Episode)

Vaiśaṃpāyana describes a phase of court harmony after the war. The aged Dhṛtarāṣṭra, “kurukulodvaha,” perceives no displeasure in the Pāṇḍava princes’ conduct and becomes pleased with their disciplined public life (sadvṛtti). Gāndhārī, identified as Saubaleyī, softens her grief and shows steady affection toward the Pāṇḍavas as though they were her own sons. Yudhiṣṭhira (Dharmarāja) consistently performs only what is agreeable toward Dhṛtarāṣṭra, honoring both Dhṛtarāṣṭra’s and Gāndhārī’s wishes in matters great or small. Dhṛtarāṣṭra’s satisfaction is paired with private remorse when remembering his misguided son. The chapter also presents Dhṛtarāṣṭra’s daily ritual routine—rising early, japa, engaging Brahmins, offering into the fire—directed toward blessings for the Pāṇḍavas’ longevity and invincibility. Socially, the king becomes widely dear to Brahmins, elders, Kṣatriyas, and other communities, while Yudhiṣṭhira suppresses public blame for past wrongs, and others refrain from criticizing Dhṛtarāṣṭra or Duryodhana out of fear of Yudhiṣṭhira’s disapproval. Finally, the text notes affective asymmetry: Bhīma remains inwardly distressed when seeing Dhṛtarāṣṭra, and Dhṛtarāṣṭra follows Yudhiṣṭhira outwardly while remaining emotionally withdrawn.

Chapter Arc: कौरव-वंश के विनाश के बाद हस्तिनापुर के महल में धृतराष्ट्र के मन में पुरानी स्मृतियाँ और भीम के प्रति दबा हुआ रोष फिर जाग उठता है; उसी क्षण वन-गमन का विचार एक कठोर, पर अनिवार्य निर्णय बनकर उभरता है। → धृतराष्ट्र और गान्धारी वन में जाने की अनुमति/अनुज्ञा माँगते हैं; युधिष्ठिर, कुन्ती और अन्य जन कर्तव्य, अपराध-बोध, और वृद्धों के प्रति श्रद्धा के बीच फँस जाते हैं। भीम के भीतर धृतराष्ट्र के प्रति पुराना आक्रोश (दुष्टवद्-हृदय) चुपचाप सुलगता रहता है, जबकि गान्धारी अपने शोक को दबाकर रोते लोगों को रोकती है। → गान्धारी का निर्णायक निवेदन—‘वे सब युद्ध में सम्मुख मारे गये, शस्त्रधारियों के लोकों को गये; अब मुझे वन-तप में जाने की अनुमति दो’—और धृतराष्ट्र का कठोर आग्रह युधिष्ठिर को भीतर तक कंपा देता है; धर्मराज हाथ जोड़कर मौन हो जाते हैं। → धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को ‘शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, धर्मवत्सल’ कहकर राजधर्म का स्मरण कराते हैं और बताते हैं कि राजा होने से तपस्या के फल का भी भाग मिलता है—कल्याण का भी, अकल्याण का भी। अंततः वन-गमन की अनुमति का मार्ग बनता है; संजय जैसे सेवक साथ जाने की भूमिका में आते हैं। → वन-प्रस्थान का निर्णय हो चुका है, पर भीतर की आग—भीम का असंतोष, युधिष्ठिर का भय, और धृतराष्ट्र-गान्धारी का शोक—अभी शांत नहीं; आगे आश्रम-जीवन में यह तनाव किस रूप में फूटेगा?

Shlokas

Verse 1

/ अपर बक। ] अति्शा:< तृतीयो<थध्याय: 04% 3 तराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्छिर और कुन्ती आदिका दु:खी होना वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरस्य नृपतेर्दुर्योधनपितुस्तदा । नान्तरं ददृशू राज्ये पुरुषा: प्रणयं प्रति,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा युधिष्ठिर और धूृतराष्ट्रमें जो पारस्परिक प्रेम था, उसमें राज्यके लोगोंने कभी कोई अन्तर नहीं देखा

毗舍波耶那说:“噢,阇那美阇耶!当时国中之人丝毫不见由提施提罗王与持国——都利约陀那之父——之间的相互情爱有任何差别。”

Verse 2

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ,यदा तु कौरवो राजा पुत्र सस्मार दुर्मतिम्‌ । तदा भीम हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिव: राजन! परंतु वे कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र जब अपने दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधनका स्मरण करते थे, तब मन-ही-मन भीमसेनका अनिष्ट-चिन्तन किया करते थे

毗舍波耶那说:然而,每当俱卢王持国忆起他那心术不正的儿子都利约陀那之时——噢,大王——他便在心中暗自盘算,要加害于毗摩塞那。

Verse 3

तथैव भीमसेनो<पि धृतराष्ट्र जनाधिपम्‌ । नामर्षयत राजेन्द्र सदैव दुष्टवद्भधृदा,राजेन्द्र! उसी प्रकार भीमसेन भी सदा ही राजा धृतराष्ट्रके प्रति अपने मनमें दुर्भावना रखते थे। वे कभी उन्हें क्षमा नहीं कर पाते थे इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिवेंदे तृतीयो<5ध्याय:

毗舍波耶那说:同样地,毗摩塞那也无法宽恕持国——人中之主。噢,诸王之最!他总在心中把持国视作恶人一般,难以放下由往昔罪愆所生的怨恨。

Verse 4

अप्रकाशान्यप्रियाणि चकारास्य वृकोदर: । जआज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतज्ै: पुरुषै: सदा

毗耶娑波耶那说:毗摩(弗利科达罗)为他做了许多本应讳莫如深、且令人不快却不得不为之事;他又确保诸般命令都被如法执行——常借助那些忠诚可靠、铭记本分之人。

Verse 5

भीमसेन गुप्त रीतिसे धृतराष्ट्रको अप्रिय लगनेवाले काम किया करते थे तथा अपने द्वारा नियुक्त किये हुए कृतज्ञ पुरुषोंसे उनकी आज्ञा भी भंग करा दिया करते थे ।। स्मरन्‌ दुर्मन्त्रितं तस्य वृत्तान्यप्यस्य कानिचित्‌ | अथ भीम: सुहन्मध्ये बाहुशब्दं तथाकरोत्‌,प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीम: स परुषं वच: । राजा धृतराष्ट्रकी जो दुष्टतापूर्ण मन्त्रणाएँ होती थीं और तदनुसार ही जो उनके कई दुर्बर्ताव हुए थे, उन्हें सदा भीमसेन याद रखते थे। एक दिन अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने अपने मित्रोंके बीचमें बारंबार अपनी भुजाओंपर ताल ठोंका और धुृतराष्ट्र एवं गान्धारीको सुनाते हुए रोषपूर्वक यह कठोर वचन कहा। वे अपने शत्रु दुर्योधन, कर्ण और दुःशासनको याद करके यों कहने लगे--

忆起持国王那出自恶谋的计策,以及他往昔的若干罪行,毗摩再也按捺不住胸中怨愤。于是他在同伴之间反复拍击自己的双臂,声如雷震;并且——要让持国与甘陀利听见——毗摩怒火炽盛,说出了严厉刻薄之言。想到仇敌难敌、迦尔纳与杜沙萨那,他便以那般口气开言。

Verse 6

संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षण: । स्मृत्वा दुर्योधन शत्रुं कर्णदुःशासनावपि

毗耶娑波耶那说:一听到持国与甘陀利的消息,那原本不怀怨者也被激起波澜;而当他忆及仇敌——难敌,以及迦尔纳与杜沙萨那——心念又回到旧日的仇恨之中。

Verse 7

अन्धस्य नृपते: पुत्रा मया परिघबाहुना

毗耶娑波耶那说:“那盲王之子,皆为我所击倒——我之双臂,犹如铁杵。”

Verse 8

इमौ तौ परिघप्रख्यौ भुजी मम दुरासदौ,ययोरन्तरमासाद्य धार्तराष्ट्रा: क्षयं गता: । “देखो, ये हैं मेरे दोनों परिघके समान सुदृढ़ एवं दुर्जय बाहुदण्ड; जिनके बीचमें पड़कर धृतराष्ट्रके बेटे पिस गये हैं

毗耶娑波耶那说:“看吧——我这双臂,强悍如铁杵,凶猛而不可当;落入其间,持国之子便被碾碎,走向毁灭。”

Verse 9

ताविमौ चन्दनेनाक्तौ चन्दनाहाौं च मे भुजी

毗舍波耶那说:“我这两臂如今已涂抹檀香,满身皆是檀香的芬芳。”

Verse 10

एताश्चान्याश्व विविधा: शल्यभूता नराधिप:

毗舍波耶那说:“而这些连同其他种种苦恼,仿佛倒刺般扎在国王身上——从内里刺痛、折磨着他。”

Verse 11

वृकोदरस्य ता वाच: श्रुत्वा निर्वेदमागमत्‌ । ये तथा और भी नाना प्रकारकी भीमसेनकी कही हुई कठोर बातें जो हृदयमें काँटोंके समान कसक पैदा करनेवाली थीं, राजा धृतराष्ट्रने सुनीं। सुनकर उन्हें बड़ा खेद हुआ ।। १० ई | सा च बुद्धिमती देवी कालपर्यायवेदिनी

毗舍波耶那说:听到弗利寇达罗(毗摩)那番话,国王持国(Dhṛtarāṣṭra)心生深切悔恨,亦起厌离之意。毗摩的严厉言辞如荆棘刺心,使持国痛感懊悔。

Verse 12

ततः पज्चदशे वर्षे समतीते नराधिप:

随后,十五年已然圆满过去,国王——人中之主——便进入了故事的下一阶段。

Verse 13

नान्वबुध्यत तद्‌ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:

毗舍波耶那说:当时,昆蒂之子、国王由提施提罗并未完全领会其中所暗示之意。

Verse 14

माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्त तस्यान्ववर्तताम्‌

而摩德丽的两位儿子,皆明达于法(dharma),使其心意与他相契,行止与志向皆随其所导。

Verse 15

राज्ञस्तु चित्त रक्षन्तौ नोचतु: किंचिदप्रियम्‌ । धर्मके ज्ञाता माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव सदा राजा धृतराष्ट्रके मनो$नुकूल ही बर्ताव करते थे। वे उनका मन रखते हुए कभी कोई अप्रिय बात नहीं कहते थे ।। ततः समानयामास धृतराष्ट्र: सुहृज्जनम्‌

毗湿摩波耶那说道:摩德丽之子那俱罗与娑诃提婆,通晓法(dharma),常以能令持国王(Dhṛtarāṣṭra)欢心之道行事;他们护持他的情绪,从不对他说一句尖刻或逆耳之言。随后,持国王召集了他那群怀善意的亲友。

Verse 16

धृतराष्ट उवाच विदितं भवतामेतद्‌ यथा वृत्त: कुरुक्षय:

持国王说道:“此事你们早已知晓——俱卢一族的覆灭是如何发生的。”

Verse 17

योऊहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम्‌

持国王说道:“我——愚昧而判断败坏——竟成了在自家亲族之中滋长恐惧的人。”

Verse 18

यच्चाहं वासुदेवस्य नाऔ्रैषं वाक्यमर्थवत्‌

持国王说道:“而我没有听从婆苏提婆(Vāsudeva)那切中要义的劝诫。”在这番自白中,他承认了道德上的过失:因拒绝与法(dharma)相契的明智忠告,他助长了走向毁灭的进程,如今只能背负悔恨的重担。

Verse 19

वध्यतां साध्वयं पाप: सामात्य इति दुर्मति: । पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभि:

持国王说道:“确实,这个罪人心智邪恶,本应当与其群臣一并处死。然而我被对儿子的爱所蒙蔽,竟拒绝了智者所说的有益忠告。”

Verse 20

मैंने वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णकी अर्थभरी बातें नहीं सुनी। मनीषी पुरुषोंने मुझे यह हितकी बात बतायी थी कि इस खोटी बुद्धिवाले पापी दुर्योधनको मन्त्रियोंसहित मार डाला जाय, इसीमें संसारका हित है; किंतु पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर मैंने ऐसा नहीं किया ।। विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च । पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना

持国王说道:“我一次又一次受人劝谏——维度罗、毗湿摩、德罗那、克利波;而在每一步上,又有蒙福的大魂毗耶娑相告。然而我并未真正听从那些关于正法的沉重言辞。智者曾告诉我何为利于世间:应当将那心智乖僻的罪人难敌,与其群臣一并诛杀——唯有如此方为天下之公利。可我被对儿子的执爱所制,终究没有这样做。”

Verse 21

यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु

持国王说道:“至于我对般度诸子——那些具德的大士——所做的一切……”

Verse 22

न दत्तवान्‌ श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम्‌ । महात्मा पाण्डव गुणवान्‌ हैं तथापि उनके बाप-दादोंकी यह उज्ज्वल सम्पत्ति भी मैंने उन्हें नहीं दी ।। विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रज:

持国王说道:“我没有把那本属祖传、属于其父与祖父的灿然富贵,赐予那高贵而具德的般度之子。纵然我眼见诸王的覆亡正在展开,我仍将其扣留;而持杵者(婆罗罗摩)的兄长也在旁目睹。”

Verse 23

सो5हमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनस्तदा

持国王说道:“因此,在那时我从自身摒弃了那些虚妄之念——那些自欺——并将其舍弃。”

Verse 24

विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पज्चदशेउद्य वै

持国王说道:“然而我看得格外分明——确实,就在今日,在这第十五年里。”

Verse 25

चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे,कभी चौथे समय (अर्थात्‌ दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात्‌ चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा-सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं। अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ

持国王说道:“有时我只在既定的第四时段进食,有时只在第八时段——不过是为熄灭饥饿之火,我只吃一点点。唯有王后甘陀利知晓我这般持戒;其余众人都以为我每日都吃一顿饱食。”

Verse 26

तृष्णाविनयनं भुज्जे गान्धारी वेद तन्‍्मम । करोत्याहारमिति मां सर्व: परिजन: सदा,कभी चौथे समय (अर्थात्‌ दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात्‌ चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा-सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं। अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ

持国王说道:“为降伏贪欲,我只略进薄食;此事唯甘陀利知晓。所有侍从总以为我每日都吃得饱足。有时我只在第四更——也就是两日之后——吃一点;有时只在第八更——也就是四日之后——吃一点,不过是为熄灭饥饿之火。”

Verse 27

युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डव: । भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृत:

持国王说道:“因惧怕坚战,那个般度之子深受煎熬。他卧于裸地之上,专注诵念与苦行,身披鹿皮,枕卧于库沙草。”

Verse 28

हतं शतं तु पुत्राणां ययोर्युद्धेधपलायिनाम्‌

持国王说道:“在那场战斗中,我整整一百个儿子被杀——正是那些在战阵当前却成了逃兵、转身奔逃的人。”

Verse 29

इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरव:

说罢这些,俱卢族之王(持国,Dhṛtarāṣṭra)又继续对法王(坚战,Yudhiṣṭhira)开口——延续那场沉重而充满道义张力的对话:关乎责任、悔恨,以及转入林中遁世之途。

Verse 30

सुखमस्म्युषित: पुत्र त्ववा सुपरिपालित:

持国说道:“吾儿,我在此安适而居,蒙你周全照料,谨慎护持。”

Verse 31

प्रकृष्ट च यया पुत्र पुण्यं चीर्ण यथाबलम्‌

持国说道:“并且,吾儿,由她(那位夫人)尽其所能修持,积聚了殊胜的功德。”

Verse 32

द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिण:,“कुरुनन्दन! जिन्होंने द्रौपदीके साथ अत्याचार किया, तुम्हारे ऐश्वर्यका अपहरण किया, वे क्रूरकर्मी मेरे पुत्र क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये हैं। अब उनके लिये कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं दिखायी देती है

“俱卢之喜啊!那些凌辱德罗帕蒂、夺去你王权与荣华的人——那些残酷之徒,我的儿子们——已依刹帝利之法在战场上伏诛。如今,我看不出还需为他们再做什么。”

Verse 33

समतीता नृशंसास्ते स्वधर्मेण हता युधि । न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन,“कुरुनन्दन! जिन्होंने द्रौपदीके साथ अत्याचार किया, तुम्हारे ऐश्वर्यका अपहरण किया, वे क्रूरकर्मी मेरे पुत्र क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये हैं। अब उनके लिये कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं दिखायी देती है

“俱卢之喜啊,那些残忍之人如今已成过往;他们依其自身的刹帝利之法死于战阵。我看不出还须为他们再作什么。”

Verse 34

सर्वे शस्त्रभूृतां लोकान्‌ गतास्तेडभिमुखं हता: । आत्मनस्तु हित॑ पुण्यं प्रतिकर्तव्यमद्य वै

凡在迎敌之际被杀者,皆已往赴赐予执兵之人的诸界。至于我,凡对我自身灵魂真正有益、具功德之事,如今必须着手——就在今日。

Verse 35

त्वं तु शस्त्रभतां श्रेष्ठ सततं धर्मवत्सल:,“तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है। इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा

而你,乃执兵之士中最为卓越者,恒常爱护正法。君王于一切众生,如尊师般应受敬仰。故我向你提出此请。勇士啊,得你许可之后,我便将入林而去。

Verse 36

राजा गुरु: प्राणभृतां तस्मादेतद्‌ ब्रवीम्यहम्‌ । अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम्‌,“तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है। इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा

持国王说道:“君王于一切众生,如尊师般应受敬仰;因此我才说出此请。勇士啊,得你许可之后,我将入林求依。”

Verse 37

चीरवल्कलभूद्‌ राजन्‌ गान्धार्या सहितोडनया । तवाशिष: प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचर:,“राजन! वहाँ मैं चीर और वल्कल धारण करके इस गान्धारीके साथ वनमें विचरूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा

持国王说道:“大王啊,我将与无瑕的甘陀利同往,披树皮衣、着敝布,成为林中行者。居于森林之中,我仍将不断赐予你祝福。”

Verse 38

उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ । पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय वयसो<न्ते वनं नूप,“तात! भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! हमारे कुलके सभी राजाओंके लिये यही उचित है कि वे अन्तिम अवस्थामें पुत्रोंको राज्य देकर स्वयं वनमें पधारें

持国王说道:“孩子啊,婆罗多族中的雄牛啊,这正是我族相宜之法:我族诸王,既将王权托付于诸子,至暮年便当入林而去。如此退隐,乃是尊奉达摩——及时交付责任,松解对权势的执著,并使心转向苦行与终极安乐。”

Verse 39

तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारो5पि वा वसन्‌ । पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तप: परम्‌,“वीर! वहाँ मैं वायु पीकर अथवा उपवास करके रहूँगा तथा अपनी इस धर्मपत्नीके साथ उत्तम तपस्या करूँगा

持国王说道:“勇士啊,在那里我将或以风为食,或甚至彻底绝食而住;并与我这位守法忠贞的妻子一道,修行至高的苦行。”

Verse 40

त्वं चापि फलभाक्‌ तात तपस: पार्थिवो हासि । फलभाजो हि राजान: कल्याणस्येतरस्य वा,“बेटा! तुम भी उस तपस्याके उत्तम फलके भागी बनोगे; क्योंकि तुम राजा हो और राजा अपने राज्यके भीतर होनेवाले भले-बुरे सभी कर्मोंके फलभागी होते हैं!

持国王说道:“亲爱的儿子,你也将分享此苦行的殊胜果报,因为你是国王。国王确实会分担其国土之内所发生一切之结果——无论吉祥或不祥。”

Verse 41

युधिछिर उवाच नमां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दु:खिते नृप । धिड्मामस्तु सुदुर्बुद्धि राज्यसक्तं प्रमादिनम्‌,युधिष्ठिरने कहा--महाराज! आप यहाँ रहकर इस प्रकार दुःख उठा रहे थे और मुझे इसकी जानकारी न हो सकी, इसलिये अब यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता। हाय! मेरी बुद्धि कितनी खराब है? मुझ-जैसे प्रमादी और राज्यासक्त पुरुषको धिक्कार है

坚战说道:“大王啊,这王国再不能使我欢喜,因为您在此如此受苦,而我竟毫不知情。可耻啊我自己——我的判断何其卑劣!愿对我这般疏忽、贪恋王权之人加以谴责。”

Verse 42

यो5हं भवन्‍न्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भूशम्‌ । जिताहारं क्षितिशयं न विन्दे भ्रातृभि: सह,आप दुःखसे आतुर और उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल होकर पृथ्वीपर शयन कर रहे हैं तथा भोजनपर भी संयम कर लिया है और मैं भाइयोंसहित आपकी इस अवस्थाका पता ही न पा सका

坚战说道:“我与诸弟一同寻觅,却未能找到您;那时您为忧苦所逼,因断食而消瘦,卧于裸地,并以严厉的节食自持。我竟未得知您的境况,本身便足以令我悔恨。”

Verse 43

अहो<स्मि वज्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना । विश्वासयित्वा पूर्व मां यदिदं दुःखमश्लुथा:,अहो! आपने अपने विचारोंको छिपाकर मुझ मूर्खको अबतक धोखेमें ही डाल रखा था; क्‍योंकि पहले मुझे यह विश्वास दिलाकर कि मैं सुखी हूँ, आप आजतक यह दुःख भोगते रहे

坚战说道:“唉!我这愚人竟被您那深藏不露的谋虑所蒙蔽。您先使我相信我安然无忧,而您却一直独自承受这般痛苦至今。”

Verse 44

कि मे राज्येन भोगैर्वा कि यज्ञै: कि सुखेन वा । यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान्‌

尤提士提罗说道:“王权于我何用?享乐于我何用?祭祀于我何用?连幸福本身又有何用——只因我之故,噢,大地的守护者,你竟遭受了这些苦痛?”

Verse 45

महाराज! इस राज्यसे, इन भोगोंसे, इन यज्ञोंसे अथवा इस सुख-सामग्रीसे मुझे क्या लाभ हुआ? जब कि मेरे ही पास रहकर आपको इतने दुःख उठाने पड़े ।। पीडित॑ं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च । अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर,जनेश्वर! आप दुःखी होकर जो ऐसी बात कह रहे हैं, इससे मैं उस समस्त राज्यको और अपनेको भी दुःखित समझता हूँ

尤提士提罗说道:“噢,大王,这王国、这些享受、这些祭祀、乃至这一切安乐的陈设,于我有何利益?当你即便在我身旁,也不得不忍受如此深重的苦难。又,噢,人中之主,听你在悲痛中说出这样的话,我便觉得整个王国,甚至我自己,也都同受其苦。”

Verse 46

भवान्‌ पिता भवान्‌ माता भवान्‌ नः परमो गुरु: । भवता विप्रहीणा वै क्व नु तिष्ठामहे वयम्‌,आप ही हमारे पिता, आप ही माता और आप ही हमारे परम गुरु हैं। आपसे विलग होकर हम कहाँ रहेंगे

尤提士提罗说道:“你是我们的父,你是我们的母,你是我们至上的导师。若失去你——与您分离——我们究竟还能立足于何处?”

Verse 47

औरसो भवतः: पुत्रो युयुत्सुर्न॒पसत्तम । अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान्‌,नृपश्रेष्ठी महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें। मैं ही वनको चला जाऊँगा। पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः आप भी मुझे न जलाइये

尤提士提罗说道:“噢,诸王之最,尤尤图苏是你的亲生之子。让他为王吧,噢,大王——或由你择其所当者而立之,或你亲自统御此国。至于我,我将入林而去。父亲啊,我早已被耻辱之火灼烧;莫再焚我一次。”

Verse 48

अहूं वन॑ गमिष्यामि भवानू्‌ राज्यं प्रशासतु । न मामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमहसि,नृपश्रेष्ठी महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें। मैं ही वनको चला जाऊँगा। पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः आप भी मुझे न जलाइये

尤提士提罗说道:“我将前往森林;你当治理王国。我已被恶名之火灼伤——莫再焚我一次,噢,诸王之最,伟大的君王。”

Verse 49

नाहं राजा भवान्‌ राजा भवत:ः परवानहम्‌ । कथं गुरु त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे,मैं राजा नहीं, आप ही राजा हैं। मैं तो आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ। आप धर्मके ज्ञाता गुरु हैं। मैं आपको कैसे आज्ञा दे सकता हूँ

尤提士提罗说道:“我不是国王;你才是国王。我只是居于你的权威之下。此时此地,我怎敢擅自准许你——我的师长、通晓法(Dharma)之人——去做什么呢?”

Verse 50

न मन्युहदि न: कश्चित्‌ सुयोधनकृतेडनघ । भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिता:,निष्पाप नरेश! दुर्योधनने जो कुछ किया है, उसके लिये हमारे हृदयमें तनिक भी क्रोध नहीं है। जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। हम और दूसरे लोग उसीसे मोहित थे

尤提士提罗说道:“无罪之人啊,我们心中对苏优陀那(难敌,Duryodhana)所作之事,连一丝愤怒也没有。因为所发生的一切,确是命定要以那样的方式发生;我们以及其他人,也都被那命运与境遇之力所迷惑。”

Verse 51

वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादय: । गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम,जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं। मेरे लिये गान्धारी और कुन्तीमें कोई अन्तर नहीं है

尤提士提罗说道:“我们也是你的儿子,正如难敌(Duryodhana)等人曾是你的儿子一样。在我看来,甘陀梨与昆蒂并无分别。”

Verse 52

स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि | पृष्ठतस्त्वनुयास्थामि सत्यमात्मानमालभे,राजन्‌! यदि आप मुझे छोड़कर चले जायूँगे तो मैं अपनी सौगन्ध खाकर सत्य कहता हूँ कि मैं भी आपके पीछे-पीछे चल दूँगा

尤提士提罗说道:“诸王之最啊,若你离去而弃我于后,我以自身起誓,说的皆是真言:我必追随在你身后,步步相随,王啊。”

Verse 53

इयं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला । भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत्‌,आपके त्याग देनेपर यह धन-धान्यसे परिपूर्ण समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका राज्य भी मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता

尤提士提罗说道:“即便这大地——为海洋所环绕、财富充盈——若失去你,也不能给我带来丝毫欢喜。没有你的在场,连王权本身于我亦变得寡淡而无意义。”

Verse 54

भवदीयमिदं सर्व शिरसा त्वां प्रसादये । त्वदधीना: सम राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वर:,राजेन्द्र! यह सब कुछ आपका है। मैं आपके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रार्थना करता हूँ कि आप प्रसन्न हो जाइये। हम सब लोग आपके अधीन हैं। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये

尤提士提罗说道:“这一切都属于您。我俯首于您的足下,恳求您垂恩开颜。我们众人皆在您的权柄之下,哦,大王;愿您心中的热恼——那深藏的忧虑——得以消散。”

Verse 55

भवितव्यमनुप्राप्तो मन्ये त्वं वसुधाधिप । दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्षिष्ये मनसो ज्वरम्‌,पृथ्वीनाथ! मैं समझता हूँ कि आप भवितव्यताके वशमें पड़ गये थे। यदि सौभाग्यवश मुझे आपकी सेवाका अवसर मिलता रहा तो मेरी मानसिक चिन्ता दूर हो जायगी

尤提士提罗说道:“大地之主啊,我以为您是被既定的命运所追及。若蒙福分,我仍得以继续侍奉您,我心中的热恼便可解脱。”

Verse 56

धृतराष्ट उवाच तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन । उचितं च कुले5स्माकमरण्यगमन प्रभो,धृतराष्ट्र बोले--बेटा! कुरुनन्दन! अब मेरा मन तपस्यामें ही लग रहा है। प्रभो! जीवनकी अन्तिम अवस्थामें वनको जाना हमारे कुलके लिये उचित भी है

持国王说道:“亲爱的孩子,库鲁族的荣光啊,如今我的心已安住于苦行修持。主上啊,对于走到人生最后阶段的人,入林而居也正合我族的传统与本分。”

Verse 57

चिरमस्म्युषित: पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वया । वृद्ध मामप्यनुज्ञातुमर्हसि त्वं नराधिप,पुत्र! नरेश्वर! मैं दीर्घकालतक तुम्हारे पास रह चुका और तुमने भी बहुत दिनोंतक मेरी सेवा-शुश्रूषा की। अब मेरी वृद्धावस्था आ गयी। अब तो मुझे वनमें जानेकी अनुमति देनी ही चाहिये

持国王说道:“孩子啊,人中王者,我与你同住已久,你也久以至诚侍奉我。如今老迈已临我身;因此,统御众人的君王啊,你也当准许我——前往森林而去。”

Verse 58

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञज्जलिम्‌ | उवाच वचन राजा धृतराष्ट्रोम्बिकासुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठछिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठे रहे। अम्बिकानन्दन राजा धुृतराष्ट्रने उनसे उपर्युक्त बात कहकर महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्यसे कहा--“मैं आपलोगोंके द्वारा राजा युधिष्ठिरको समझाना चाहता हूँ

毗湿摩波耶那说道:说罢这些话,安比迦之子持国王便转而对法王(尤提士提罗)开口;尤提士提罗浑身战栗,合掌端坐,恭敬聆听。此情此景显出劝诫与责任的沉重:见正义之君为此震动,老王遂续言,并召来大德三阇耶与大车战士克利帕阿阇梨,欲借他们之力开导、劝服尤提士提罗。

Verse 59

संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम्‌ | अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्धिर्वसुधाधिपम्‌

毗舍婆耶那说道:“在此处,我愿借助诸位之力,温言劝导大地之主——并同那高贵的三阇耶与伟大的战车勇士克利波一道。”

Verse 60

म्लायते मे मनो हीद॑ मुखं च परिशुष्यति । वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह,“एक तो मेरी वृद्धावस्था और दूसरे बोलनेका परिश्रम, इन कारणोंसे मेरा जी घबरा रहा है और मुँह सूखा जाता है”

毗舍婆耶那说道:“此时此地,我心神渐衰,口舌亦枯。年迈沉重,又因言说劳顿,我只觉气力正在流失。”

Verse 61

इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धों राजा कुरूद्वह: । गान्धारीं शिश्रिये धीमान्‌ सहसैव गतासुवत्‌,ऐसा कहकर धर्मात्मा बूढ़े राजा कुरुकुलशिरोमणि बुद्धिमान धृतराष्ट्रने सहसा ही निर्जीवकी भाँति गान्धारीका सहारा ले लिया

说罢,那具法性之老王——库鲁之冠、智者持国——立刻倚靠甘陀梨,骤然间仿佛失却生气一般。

Verse 62

3 ॥ है के १) ल्‍ |] 5) गः हि है| 02) १ | + त॑ तु दृष्टवा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम्‌ । आर्ति राजागमत्‌ तीव्रां कौन्तेय: परवीरहा,कुरुराज धृतराष्ट्रको संज्ञाहीन-सा बैठा देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार राजा युथधिष्ठिरको बड़ा दुःख हुआ

见那库鲁王端坐其间,宛若失却知觉,昆蒂之子——尤提士提罗,诛灭敌方勇士者——顿为剧痛所攫。

Verse 63

युधिष्ठिर उदाच यस्य नागसहस्रेण शतसंख्येन वै बलम्‌ । सो<थयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत्‌,युधिष्ठिरने कहा--ओह! जिसमें एक लाख हाथियोंके समान बल था, वे ही ये राजा धृतराष्ट्र आज प्राणहीन-से होकर स्त्रीका सहारा लिये सो रहे हैं

尤提士提罗说道:“唉!那力量曾被计作十万象之雄者——此刻持国王却如同无生之躯,唯有依凭一位妇人而卧。此乃时轮所致的翻覆:权势与王权终将消散,依赖取代了骄矜。”

Verse 64

आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा | चूर्णीकृता बलवता सो5बलामा॒श्रित: स्त्रियम्‌,जिन बलवान नरेशने पहले भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाको चूर्ण कर डाला था, वे आज अबला नारीके सहारे पड़े हैं

毗舍波耶那说:昔日那位以巨力将毗摩塞那的铁像碾成粉末的人——如今这同一位强者,却要倚赖一位柔弱女子的扶持而立。

Verse 65

धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग्॒‌ बुद्धि धिक्‌ च मे श्रुतम्‌ यत्कृते पृथिवीपाल: शेतेडयमतथोचित:,मुझे धर्मका कोई ज्ञान नहीं है। मुझे धिक्कार है। मेरी बुद्धि और विद्याको भी धिक्कार है, जिसके कारण ये महाराज इस समय अपने लिये अयोग्य अवस्थामें पड़े हुए हैं

毗舍波耶那说:“惭愧于我,这不识达摩之人!惭愧于我的才智,也惭愧于我的学识——正因我之故,这位护持大地的君王,如今竟躺在不配于他的境地。”

Verse 66

अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुद्धक्तेड्यं गान्धारी च यशस्विनी,प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीम: स परुषं वच: । राजा धृतराष्ट्रकी जो दुष्टतापूर्ण मन्त्रणाएँ होती थीं और तदनुसार ही जो उनके कई दुर्बर्ताव हुए थे, उन्हें सदा भीमसेन याद रखते थे। एक दिन अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने अपने मित्रोंके बीचमें बारंबार अपनी भुजाओंपर ताल ठोंका और धुृतराष्ट्र एवं गान्धारीको सुनाते हुए रोषपूर्वक यह कठोर वचन कहा। वे अपने शत्रु दुर्योधन, कर्ण और दुःशासनको याद करके यों कहने लगे-- यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धुृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा

毗舍波耶那说:“我也要像这位长者、我的尊师一样守斋。若今日持国王(Dhṛtarāṣṭra)与声名显赫的甘达丽(Gāndhārī)不进食,那么我也将如这些可敬的长辈一般绝食。”于是毗摩——仍记着因持国王偏私而起的苛刻谋议与诸多不义——在怒潮中说出了这番严厉之言。

Verse 67

वैशम्पायन उवाच ततो<स्य पाणिना राजन्‌ जलशीतेन पाण्डव: । उरो मुखं च शनकै: पर्यमार्जत धर्मवित्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! यह कहकर धर्मके ज्ञाता पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने जलसे शीतल किये हुए हाथसे धृतराष्ट्रकी छाती और मुहको धीरे-धीरे पोंछा

毗舍波耶那说:于是,王啊,那位通晓达摩的般度之子,用被清水沁凉的手,轻轻拭去持国王的胸前与面上的污痕。

Verse 68

तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना । पाणिस्पर्शेन राज्ञ: स राजा संज्ञामवाप ह,महाराज युधिष्ठिरके रत्नौषधिसम्पन्न उस पवित्र एवं सुगन्धित कर-स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रकी चेतना लौट आयी

毗舍波耶那说:因国王那只手的触碰——清净而芬芳,且具如宝药般的灵效——持国王便恢复了知觉。

Verse 69

धृतराष्ट्र रवाच स्पृश मां पाणिना भूय: परिष्वज च पाण्डव | जीवामीवातिसंस्पर्शात्‌ तव राजीवलोचन,धृतराष्ट्र बोले--कमलनयन पाण्डुनन्दन! तुम फिरसे मेरे शरीरपर अपना हाथ फेरो और मुझे छातीसे लगा लो। तुम्हारे सुखदायक स्पर्शसे मानो मेरे शरीरमें प्राण आ जाते हैं

持国王说道:“噢,般度之子,莲华眼者!请再以手抚触我的身躯,并将我拥入胸前。因你这安慰的触碰,仿佛我的身中又有生命回转。”

Verse 70

मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप । पाणिशभ्यां हि परिस्प्रष्टं प्रीणनं हि महन्मम,नरेश्वर! मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना चाहता हूँ और अपने दोनों हाथोंसे तुम्हें स्पर्श करनेकी इच्छा रखता हूँ। इससे मुझे परम तृप्ति मिल रही है

持国王说道:“噢,人中之主,我愿嗅闻你的头顶,并以双手将你周身抚触。于我而言,这是一种极大的欢喜与深深的满足。”

Verse 71

अष्टमो हाद्य कालोडयमाहारस्य कृतस्य मे । येनाहं कुरुशार्टूल शकनोमि न विचेष्टितुम्‌,पिछले दिनों जब मैंने भोजन किया था, तबसे आज यह आठवाँ समय--चौथा दिन पूरा हो गया है। कुरुश्रेष्ठ इसीसे शिथिल होकर मैं कोई चेष्टा नहीं कर पाता

持国王说道:“自我上次进食至今,已历八个时段——也就是整整四日已过。噢,俱卢之虎,因饥乏我已衰弱,不能再作任何努力。”

Verse 72

व्यायामश्नायमत्यर्थ कृतस्त्वामभियाचता । ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम्‌,तात! तुमसे अनुरोध करनेके लिये बोलते समय मुझे बड़ा भारी परिश्रम करना पड़ा है। अत: क्षीणशक्ति होकर मैं अचेत-सा हो गया था

持国王说道:“孩子啊,我在向你开口请求之时,已不得不竭力过甚。于是心神疲惫,气力衰竭,几如昏厥无知。”

Verse 73

तवामृतरसप्रख्यं हस्तस्पर्शमिमं प्रभो । लब्ध्वा संजीवितो5स्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह,प्रभो! तुम्हारे हाथोंका यह स्पर्श अमृत-रसके समान शीतल एवं सुखद है। कुरुकुलनाथ! इसे पाकर मुझमें नया जीवन आ गया है, मैं ऐसा मानता हूँ

持国王说道:“噢,主上,你手的触感如甘露一般——清凉而深慰。噢,俱卢族的擎柱,得此抚触,我自觉仿佛重获新生。”

Verse 74

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौन्तेय: पित्रा ज्येष्ठेन भारत । पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात्‌ तं शनैस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! अपने ज्येष्ठ पितृव्य धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बड़े सस्‍्नेहके साथ उनके समस्त अंगोंपर धीरे-धीरे हाथ फेरा

毗湿摩波耶那说道:噢,婆罗多!当年长的叔父(持国王·Dhṛtarāṣṭra)如此言毕,昆蒂之子坚战(Yudhiṣṭhira)因深情善意所动,便以恭敬而温柔之态,缓缓以手抚过他全身诸肢体。

Verse 75

उपलभ्य ततः प्राणान्‌ धृतराष्ट्रो महीपति: । बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूथ्न्याजिप्रत पाण्डवम्‌,उनके स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रके शरीरमें मानो नूतन प्राण आ गये और उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे युधिष्ठिरको छातीसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा

随后,持国王·Dhṛtarāṣṭra仿佛因那触摸而重得生气,便以双臂紧紧拥抱般度子(坚战·Yudhiṣṭhira),将他揽入胸前,并嗅其头顶。此举涌现出父爱与和解之意:纵经战祸摧残,法(dharma)仍可借慈悲、克制与修复亲缘而显现。

Verse 76

नीता लोकममुं सर्वे नानाशस्त्रास्त्रयोधिन: । “मित्रो! मेरी भुजाएँ परिघके समान सुदृढ़ हैं। मैंने ही उस अंधे राजाके समस्त पुत्रोंको, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्ध करते थे, यमलोकका अतिथि बनाया है,विदुरादयश्च ते सर्वे रुरुदुर्द:खिता भूशम्‌ । अतिदुः:खात्‌ तु राजानं नोचु: किंचन पाण्डवम्‌ यह करुण दृश्य देखकर विदुर आदि सब लोग अत्यन्त दुःखी हो रोने लगे। अधिक दुःखके कारण वे लोग पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिससे कुछ न बोले

毗湿摩波耶那说道:那些善于以种种兵刃与飞矢作战的勇士,尽皆被送往彼世。见此凄怆景象,毗度罗等人悲恸难当,痛哭不已;哀伤压顶,他们对般度王(坚战)竟一句话也说不出来。

Verse 77

गान्धारी त्वेव धर्मज्ञा मनसोद्धहती भृशम्‌ । दुःखान्यधारयद्‌ राजन्‌ मैवमित्येव चाब्रवीत्‌

毗湿摩波耶那说道:然而甘陀利虽通晓法(dharma),内心仍被深深震撼。噢,大王!她强忍诸般悲苦,不断说道:“莫要如此;切莫这样做。”

Verse 78

धर्मको जाननेवाली गान्धारी अपने मनमें दुःखका बड़ा भारी बोझ ढो रही थी। उसने दुःखोंको मनमें ही दबा लिया और रोते हुए लोगोंसे कहा--'ऐसा न करो” ।। इतरास्तु स्त्रिय: सर्वा: कुन्त्या सह सुदुःखिता: । नेत्रारागतविक्लेदै: परिवार्य स्थिता5भवन्‌,कुन्तीके साथ कुरुकुलकी अन्य स्त्रियाँ भी अत्यन्त दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई उन्हें घेरकर खड़ी हो गयीं

其余诸女与昆蒂一道,皆为悲痛所压倒。泪水盈眶,湿润双目,她们环立在她周围——这是共同哀悼、克制忍受的图景,面对那不可挽回的失落。

Verse 79

अथाब्रवीत्‌ पुनर्वाक्यं धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम्‌ । अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ,तदनन्तर धृतराष्ट्रने पुन: युधिष्ठिससे कहा--'राजन्‌! भरतश्रेष्ठ! मुझे तपस्याके लिये अनुमति दे दो

于是,持国王又一次对坚战说道:“大王啊,婆罗多族中的雄牛啊,请准许我离去,去过苦行(tapas)的生活。”

Verse 80

ग्लायते मे मनस्तात भूयो भूय: प्रजल्पत: । न मामतः: परं पुत्र परिक्लेष्टमिहाहसि,“तात! बार-बार बोलनेसे मेरा जी घबराता है, अतः बेटा! अब मुझे अधिक कष्टमें न डालो”

毗耶娑波衍那说:“孩子啊,你一再絮语,使我心神疲惫。因此,儿啊,在此不要再加重我的烦扰了。”

Verse 81

तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा ब्रुवति पाण्डवम्‌ । सर्वेषामेव योधानामार्तनादो महानभूत्‌,कौरवराज धुृतराष्ट्र जब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिससे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित हुए समस्त योद्धा महान्‌ आर्तनाद (हाहाकार) करने लगे

毗耶娑波衍那说:当那位俱卢之主如此对般度之子说话时,在场的所有武士都发出了一阵巨大的哀号。

Verse 82

दृष्टवा कृशं विवर्ण च राजानमतथोचितम्‌ । उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारणम्‌,अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले--

坚战见持国王形容枯槁、面色惨白,因绝食而疲惫不堪,几乎只剩皮包骨,处境全然不配其王者之尊;这位法之子被悲痛所压倒,泪随哀恸而下,便对他说道。

Verse 83

धर्मपुत्र: स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम्‌ । शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत्‌,अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले--

毗耶娑波衍那说:法之子(坚战)拥抱了那位伟大的尊长——如父之长者——流下悲伤的泪水,随后又开口说道。

Verse 84

न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा । यथा तव प्रियं राज॑ंश्विकीर्षामि परंतप,'नरश्रेष्ठ! मैं न तो जीवन चाहता हूँ न पृथ्वीका राज्य। परंतप नरेश! जिस तरह भी आपका प्रिय हो, वही मैं करना चाहता हूँ

毗舍波耶那说道:“噢,人中至杰者,我既不求生,也不求统御大地之权。噢,焚敌之王——凡你所珍爱者,唯此我愿奉行。”

Verse 85

यदि चाहमनुग्राह्मो भवतो दयितो5पि वा । क्रियतां तावदाहारस्ततो वेत्स्याम्यहं परम्‌

毗舍波耶那说道:“若我确是你愿施恩之人——若我确为你所钟爱——那么先命人备食并进食。其后,我自会明了接下来当行之事(以及更高的道路)。”

Verse 86

“यदि आप मुझे अपनी कृपाका पात्र समझते हों और यदि मैं आपका प्रिय होऊँ तो मेरी प्रार्थनासे इस समय भोजन कीजिये। इसके बाद मैं आगेकी बात सोचूँगा” ।। ततो<ब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम्‌ । अनुज्ञातस्त्वया पुत्र भुउ्जीयामिति कामये,तब महातेजस्वी धृतराष्ट्रने युधिष्ठिससे कहा--“बेटा! तुम मुझे वनमें जानेकी अनुमति दे दो तो मैं भोजन करूँ; यही मेरी इच्छा है”

“若你视我为当受恩泽之人,若我确为你所爱之人,那么请依我所求,此刻先用食。其后我再思量后事。” 随后,大威光的持国对坚战说道:“孩子啊,若你准我入林而去,我方才进食——此乃我之所愿。”

Verse 87

इति ब्रुवति राजेन्द्रे धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम्‌ । ऋषि: सत्यवतीपुत्रो व्यासो<भ्येत्य वचो<ब्रवीत्‌,महाराज धृतराष्ट्र युधिष्ठिससे ये बातें कह ही रहे थे कि सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार कहने लगे

当持国王正如此对坚战说话时,圣者毗耶娑——萨蒂娅伐蒂之子——来到那里,开口对他们说道。

Verse 93

याभ्यां दुर्योधनो नीत: क्षयं ससुतबान्धव: । 'ये मेरी दोनों भुजाएँ चन्दनसे चर्चित एवं चन्दन लगानेके ही योग्य हैं, जिनके द्वारा पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दुर्योधन नष्ट कर दिया गया”

毗舍波耶那说道:“正是凭那双臂——昔日自以为只配涂抹檀香膏的那双臂——杜尤陀那王被引向毁灭,连同其子嗣与宗亲尽皆同亡。”

Verse 116

गान्धारी सर्वधर्मज्ञा तान्यलीकानि शुश्रुवे । समयके उलट-फेरको समझने और समस्त धर्मोको जाननेवाली बुद्धिमती गान्धारी देवीने भी इन कठोर वचनोंको सुना था

毗舍波耶那说:甘陀丽聪慧明达,通晓诸法与达摩,也听见了那些虚妄而刻薄的言辞——她看出了本应如是之理被扭曲,亦洞察其背后潜藏的道德紊乱。

Verse 126

राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडित: । उस समयतक उन्हें राजा युधिष्ठिरके आश्रयमें रहते पंद्रह वर्ष व्यतीत हो चुके थे। पंद्रहवाँ वर्ष बीतनेपर भीमसेनके वाग्बाणोंसे पीड़ित हुए राजा धृतराष्ट्रको खेद एवं वैराग्य हुआ

毗舍波耶那说:国王持国(Dhṛtarāṣṭra)被毗摩那如箭矢般锐利的言辞所折磨,遂陷入深沉的悔恨与离欲之心。虽在坚战(Yudhiṣṭhira)王的庇护下度过了十五年,他仍屡被毗摩塞那的口舌之刺所伤;而由此痛楚,他心中生起对世间执著的疲厌与转离。

Verse 136

श्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी । कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरो इस बातकी जानकारी नहीं थी। अर्जुन, कुन्ती तथा यशस्विनी द्रौपदीको भी इसका पता नहीं था

毗舍波耶那说:无论是白马(Śvetāśva),还是昆蒂,还是声名卓著的德劳帕迪,都不知此事。昆蒂之子坚战王亦毫无所闻;阿周那、昆蒂与著名的德劳帕迪也同样蒙在鼓里。

Verse 156

वाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान्‌ भृशम्‌ | तदनन्तर धृतराष्ट्रने अपने मित्रोंको बुलवाया और नेत्रोंमें आँसू भरकर अत्यन्त गद्गद वाणीमें इस प्रकार कहा

毗舍波耶那说:他泪雾蒙眼,哽咽失声,却仍以极大的迫切与沉重对众人说出这些话。其后,持国召来同伴,在悲恸压身之际,如是开口。

Verse 163

ममापराधात्‌ तत्‌ सर्वमनुज्ञातं च कौरवै: । धृतराष्ट्र बोले--मित्रो! आपलोगोंको यह मालूम ही है कि कौरववंशका विनाश किस प्रकार हुआ है। समस्त कौरव इस बातको जानते हैं कि मेरे ही अपराधसे सारा अनर्थ हुआ है

持国说道:“这一切皆因我之过而起——而诸拘卢(Kaurava)亦曾默许并赞同。”在这番忏白中,他承担了这场浩劫的道德责任,同时也承认其族裔的集体共犯:任由非达摩(adharma)不受约束地蔓延。

Verse 173

दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्ये5 भ्यषेचयम्‌ । दुर्योधनकी बुद्धिमें दुष्टता भरी थी। वह जाति-भाइयोंका भय बढ़ानेवाला था तो भी मुझ मूर्खने उसे कौरवोंके राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया

持国王说道:“我曾为难敌行灌顶礼,立他为俱卢族(Kaurava)的主宰。纵然他的心智浸透邪恶,又是那使自家亲族恐惧加深之人,我——愚昧的我——仍将他祝圣,安置在俱卢的王座之上。”

Verse 223

एतच्छेयस्तु परमममन्यत जनार्दन: । समस्त राजाओंका विनाश देखते हुए गदाग्रज भगवान्‌ श्रीकृष्णने यही परम कल्याणकारी माना कि मैं पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दूँ; परंतु मैं वैसा नहीं कर सका

持国王说道:“阇那尔达那(克里希那)判定此举为至上之善。目睹众多国王的覆灭,圣主室利·克里希那——持钺杵者之兄——认为最为有益者,乃是我应将王国归还般度五子。然而我终究未能如此行事。”

Verse 236

हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रश: । इस तरह अपनी की हुई हजारों भूलें मैं अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो इस समय काँटोंके समान कसक पैदा करती हैं

持国王说道:“在我心中,我背负着千百桩自己所犯的过失——如今它们如倒刺般扎入其间,时时刺我,痛楚不息。”

Verse 243

अस्य पापस्य शुद्धयर्थ नियतो5स्मि सुदुर्मति: । विशेषत: पंद्रहवें वर्षमें आज मुझ दुर्बुद्धिकी आँखें खुली हैं और अब मैं इस पापकी शुद्धिके लिये नियमका पालन करने लगा हूँ

持国王说道:“为净除此罪,我——虽心智迷误——如今已自缚于戒律与修持。终于,我的眼目得以开启;我已开始遵行克制之法,使这过恶得以洗净。”

Verse 273

नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी । लोग युधिष्ठटिरके भयसे मेरे पास आते हैं। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे आराम देनेके लिये अत्यन्त चिन्तित रहते हैं। मैं और यशस्विनी गान्धारी दोनों नियम-पालनके व्याजसे मृगचर्म पहन कुशासनपर बैठकर मन्त्रजप करते और भूमिपर सोते हैं

持国王说道:“借口奉行戒律,声名卓著的甘陀利与我,过着如苦行者般的生活。人们因惧怕由提希提罗而来见我;而般度之子由提希提罗也深切挂念,要使我得以安适。然而甘陀利与我,仿佛守持誓愿一般,披鹿皮,坐于库沙草席之上,诵念圣咒,并卧睡于裸露的大地。”

Verse 283

नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्म हि ते विदुः । हम दोनोंके युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सौ पुत्र मारे गये हैं, किंतु उनके लिये मुझे दुःख नहीं है; क्योंकि वे क्षत्रिय-धर्मको जानते थे (और उसीके अनुसार उन्होंने युद्धमें प्राण-त्याग किया है)

持国王说道:“我并不为此悲恸,因为他们懂得刹帝利之义。纵然我那一百个儿子——战阵之中从不背敌而退的人——尽皆被杀,我也不为他们哀伤;因为他们明白武士之法,并依此舍弃了性命。”

Verse 296

भद्रं ते यादवीमातर्वचश्षेद॑ निबोध मे । अपने सुहृदोंसे ऐसा कहकर धृतराष्ट्र राजा युधिष्ठिससे बोले--“कुन्तीनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी यह बात सुनो

持国王说道:“雅度族之母啊,愿吉祥临于你;请以信心聆听我的话。”他又如此告诫左右众人,随后持国王对坚战说道:“昆蒂之子啊,愿你蒙福。听我所言。”

Verse 303

महादानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनः पुनः । “बेटा! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। मैंने बड़े-बड़े दान दिये हैं और बारंबार श्राद्धकर्मोंका अनुष्ठान किया है

持国王说道:“孩子啊,蒙你庇护,我在此过得颇为安适。我曾施行大布施,又一再举行施罗陀(śrāddha)祭祖之礼。”

Verse 316

गान्धारी हतपुत्रेयं धैयेंणोदीक्षते च माम्‌ । “पुत्र! जिसने अपनी शक्तिके अनुसार उत्कृष्ट पुण्यका अनुष्ठान किया है और जिसके सौ पुत्र मारे गये हैं, वही यह गान्धारीदेवी धैर्यपूर्वक मेरी देख-भाल करती है

持国王说道:“这位甘陀利——虽已丧子——仍以坚忍与耐心侍奉我。她尽其所能修行殊胜功德,纵然百子尽殁,依旧以不动的自制照料着我。”

Verse 343

गान्धार्याश्रैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमरहसि । “वे सब युद्धमें सम्मुख मारे गये हैं, अतः शस्त्रधारियोंको मिलनेवाले लोकोंमें गये हैं। राजेन्द्र! अब तो मुझे और गान्धारीदेवीको अपने हितके लिये पवित्र तप करना है; अतः इसके लिये हमें अनुमति दो

持国王说道:“诸王之最啊,请准许我与甘陀利。我们的儿子们皆在战场上迎敌而死,因此得至持兵而亡者所应得的诸天界。如今,为了我们自身的最高利益,甘陀利与我必须修行净化的苦行;故请允准我们如此行。”

Verse 559

वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठछिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठे रहे। अम्बिकानन्दन राजा धुृतराष्ट्रने उनसे उपर्युक्त बात कहकर महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्यसे कहा--“मैं आपलोगोंके द्वारा राजा युधिष्ठिरको समझाना चाहता हूँ

毗湿摩波耶那说道:“大王啊!听到持国王(Dhṛtarāṣṭra)这番话,奉持正法的尤提士提罗(Yudhiṣṭhira)不禁战栗;他合掌而坐,默然无言。随后,安毗迦之子持国王对尤提士提罗说罢,便转向高德的三阇耶(Sañjaya)与伟大的战车勇士克利帕阿阇黎(Kṛpācārya)说道:‘我愿借助你们,劝诫尤提士提罗王。’”

Verse 2036

संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते च माम्‌ । विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा भगवान्‌ व्यास, संजय और गान्धारी देवीने भी मुझे पग-पगपर उचित सलाह दी, किंतु मैंने किसीकी बात नहीं मानी। यह भूल मुझे सदा संताप देती रहती है

持国王说道:“因三阇耶,也因甘陀丽,这悔恨在我心中灼烧。毗度罗、毗湿摩、德罗纳阿阇黎、克利帕、伟大的薄伽梵毗耶娑,以及三阇耶与王后甘陀丽,步步都赐我恰当的劝告;然而我谁的话也不肯听。那过失至今仍不断折磨着我。”

Frequently Asked Questions

The dilemma is how a victorious ruler should treat defeated elders implicated in prior wrongdoing: Yudhiṣṭhira chooses disciplined restraint and honor, prioritizing social stability without publicly reopening accusations.

Ritual purity and intentional benevolence (japa, homa, blessings for opponents-turned-dependents) are portrayed as instruments of ethical repair, indicating that governance includes inner regulation and public reconciliation, not only administration.

No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s meta-function is implicit—positioning reconciliation, restraint, and ritualized goodwill as preparatory virtues for the epic’s later renunciatory and concluding movements.