धृतराष्ट्रस्य पाण्डवेषु प्रीति-वृत्तान्तः | Dhṛtarāṣṭra’s Affectionate Disposition toward the Pāṇḍavas
धर्मपुत्र: स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम् । शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत्,अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले--
dharmaputraḥ svapitaraṃ pariṣvajya mahāprabhum | śokajaṃ bāṣpam utsṛjya punar vacanam abravīt ||
毗耶娑波衍那说:法之子(坚战)拥抱了那位伟大的尊长——如父之长者——流下悲伤的泪水,随后又开口说道。
वैशम्पायन उवाच