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सोपान-१: ‘भक्ति का बीज’—जगत् की पीड़ा, अपमान, वैराग्य और शरणागति से मन की भूमि तैयार होती है। इस खंड-खंड कथा में सती का संकट, यज्ञ-ध्वंस, और पार्वती-जन्म दिखाकर तुलसीदास यह स्थापित करते हैं कि ईश्वर-सम्बन्ध (विशेषतः शिव-राम-नाम) सामाजिक प्रतिष्ठा/यज्ञ-वैभव से ऊपर है। यह ‘अहंकार-क्षय’ का द्वार है: दच्छ के अभिमान के प्रतिपक्ष में सती की निष्ठा, और फिर उमा में स्थिर ‘शिव-पद अनुराग’—यही आगे राम-भक्ति के अवतरण हेतु मानस-भूमि को निर्मल करता है।
अयं अंशः बालकाण्डस्य तस्मिन् प्रवाहे यत्र रामकथायाः ‘ऐतिहासिक’ प्रवेशात् पूर्वं शैव-वैष्णव-समन्वयस्य आधारः स्थाप्यते। रस-रचनायां करुणः (सत्याḥ असह्यः अन्तर्दाहः, जाति-अवमाननात् ‘दारुणं दुःखम्’), रौद्रः (यज्ञ-ध्वंसः, वीरभद्र-कोपः), शान्तश्च (समाधि-त्यागानन्तरं शिवस्य ‘राम-नाम’ स्मरणम्) इति क्रमिकः आरोहः। दक्षस्य अभिमानः ‘यज्ञ-केन्द्रित-कर्मकाण्डस्य’ प्रतीकः; तस्य विपरीते ‘नाम-स्मरणम्’ तथा ‘ईश्वर-अपमान-असह्यता’ भक्ति-नीतेः मानदण्डः। तुलसीदासः अत्र वैदिक-यज्ञ-वैभवं न निराकरोति, किन्तु अहंकार-आश्रिते सति तं पतनशीलं दर्शयति। सत्याḥ ‘जनम-जनम शिव-पद-अनुरागः’ इति वर-याचनं अग्रे उमा-तपः, ततः रामावतार-परक-भक्ति-सोपानाय अध्यात्म-भूमिकां करोति: देह-गर्वः भिद्यताम्, नाम-आश्रयः जाग्रतु, प्रेम-निष्ठा स्थिरा भवतु।
Verse 123 (दोहा/सोरठा)
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।
pitā bhavana utsava parama jaun prabhu āyasu hoi | tau mai jāũ kṛpāyatana sādara dekhana soi ||61||
यदि प्रभोः अनुमत्या मम पितृगेहे महोत्सवो भवेत्, तदा अहं सादरं गत्वा तमेव प्रभुं—करुणाधामानं—द्रष्टुं यास्यामि।
Verse 124 (चौपाई)
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।। दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।। ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।। जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।। जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा।। तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।। भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।। कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।
kahehu nīka morehũ mana bhāvā | yaha anucita nahĩ nevata paṭhāvā || daccha sakala nija sutā bolāī | hamarẽ bayara tumhau bisarāī || brahma-sabhā̃ ham sana dukhu mānā | tehi tẽ ajahũ karahĩ apamānā || jaũ binu bolẽ jāhu bhavānī | rahai na sīlu sanehu na kānī || jadapi mitra prabhu pitu gura gehā | jāia bina bolehũ na sãdehā || tadapi birodha māna jahã koī | tahā̃ gaẽ kalyānu na hoī || bhā̃ti aneka sãbhu samujhāvā | bhāvī basa na gyānu ura āvā || kaha prabhu jāhu jo binahĩ bolāẽ | nahĩ bhali bāta hamāre bhāẽ ||
भवत्या उक्तं सुन्दरं मम मनः अपि रोचते, निमन्त्रणं विना गमनं न उचितम्। दक्षः सर्वाः स्वकन्याः आहूतवान्, मम शत्रुतां त्वमपि विस्मृतवती। ब्रह्मसभायां मया सह दुःखं मनस्वी, ततोऽद्यापि अपमानं करोति। यदि निमन्त्रणं विना गच्छसि भवानि, न शीलं न स्नेहो न लज्जापि वर्तते। मित्रः प्रभुः पिता गुरुर्वा गृहम्, निमन्त्रणं विना गमने न सन्देहः। तथापि यत्र विरोधः मन्यते, तत्र गमनेन कल्याणं न भवति। अनेकप्रकारैः शम्भुः समुदाचारं बोधितवान्, भाविन्या वशीभूतायाः ज्ञानं हृदये नागतम्। प्रभुः अवदत्, यदि निमन्त्रिता न सति गच्छसि, इयं वृत्तिः मम मते शोभना नास्ति।
Verse 125 (दोहा/सोरठा)
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।
kahi dekhā hara jatana bahu rahai na daccha-kumāri | die mukhya gana saṅga taba bidā kīnha tripurāri ||62||
इति भाषित्वा हरः पश्यति स्म—बहुभिरपि प्रयत्नैः दक्षदुहिता न निवार्यते। ततः त्रिपुरारिः शिवः प्रमुखान् गणान् सहचरान् नियुक्त्वा विधिवत् तस्यै प्रस्थानानुज्ञां ददौ।
Verse 126 (चौपाई)
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।। सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।। दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।। सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।। तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।। पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा।। जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।। समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।
pitā bhavana jaba gaī bhavānī. daccha trāsa kāhũ na sanamānī.. sādara bhalēhĩ milī eka mātā. bhaginī̃ milī̃ bahuta musukātā.. daccha na kachu pūchī kusalātā. satihi biloki jarē saba gātā.. satī̃ jāi dēkhēu taba jāgā. katahũ na dīkha saṃbhu kara bhāgā.. taba citta caṛhēu jō saṅkara kahēū. prabhu apamānu samujhi ura dahēū.. pāchila dukhu na hṛdayã asa byāpā. jasa yaha bhayau mahā paritāpā.. jadyapi jaga dāruna dukha nānā. saba tē̃ kaṭhina jāti avamānā.. samujhi sō satihi bhayau ati krōdhā. bahu bidhi jananī̃ kīnha prabōdhā..
यदा भवानी पितुर्गृहमगच्छत्, दक्षभयान्न कश्चिन्नमस्कृतवान्। सादरं च माता तामभिमिलत्, भगिन्यश्च बहुशः स्मितवत्योऽभवन्। दक्षः शुभं न पप्रच्छ, सतीं वीक्ष्य सर्वाङ्गं दह्यते स्म। सती गत्वा परिदृष्टवती, न कुत्रापि शम्भोर्भागो दृश्यते। तदा शङ्करप्रतिवचनं स्मृतवती, प्रभोरपमानं बुद्ध्वा हृदयं दग्धमभूत्। पूर्वं नैवंविधः शोको हृदयमाविष्टवान्, यथेदं महत्परितापं जातम्। यद्यपि जगति बहवो दारुणा दुःखाः सन्ति, तथापि जातेरवमानः सर्वाधिकः कठिनः। इदं दृष्ट्वा सती क्रोधपरिप्लुता जाता, माता बहुविधं प्रबोधं दत्तवती।
Verse 127 (दोहा/सोरठा)
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।63।।
siva apamānu na jāi sahi hṛdayã na hoi prabodha | sakala sabahi haṭhi haṭaki taba bolī̃ bacana sa-krodha ||63||
शिवस्यापमानं न सोढुं शक्यं; हृदये तेषां धैर्यस्य शान्तो बोधो नावतस्थे। अथ सर्वे तत्रस्थाः क्रोधदग्धाः, दुराग्रहात् पुरतः प्रसृत्य, रोषपूर्णानि वचनानि प्राहुः।
Verse 128 (चौपाई)
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।। सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।। संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।। काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।। जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।। पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।। तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।। अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा।।
sunahu sabhāsada sakala munindā. kahī sunī jinha śaṅkara nindā.. so phalu turata lahaba saba kāhū̃. bhalī bhā̃ti pachitāba pitāhū̃.. santa sambhu śrīpati apabādā. suni-a jahā̃ tahā̃ asi marajādā.. kāṭi-a tāsu jībha jo basāī. śravaṇa mūdi na ta cali-a parāī.. jagadātamā mahesu purārī. jagata janaka saba ke hitakārī.. pitā mandamati nindata tehī. daccha śukra sambhava yaha dehī.. tajihaũ turata deha tehi hetū. ura dhari candramauli bṛṣaketū.. asa kahi joga agini tanu jārā. bhayau sakala makha hāhākārā..
शृणुत सभासदः सकलमुनीन्द्राः, यैः शङ्करनिन्दा उक्ता श्रुता वा। ते सर्वे तत्फलं तत्क्षणालभन्त, पिता अपि बहुशः पश्चात्तापं करिष्यति। सन्तं शम्भुं श्रीपतिं च अपवादयितुं यत्र तत्र श्रुत्वा इयमेव मर्यादा। जिह्वां छिनत्ति यस्तां धारयति, कर्णौ पिधाय न च तत्र गच्छति। महेशः जगदात्मा पुरारिः, जगतः पिता सर्वहितकारी। पिता मन्दमतिस्तं निन्दति, दक्षबीजेनेदं शरीरं सम्पन्नम्। तन्निमित्तमहं शरीरं त्यक्ष्यामि इति चन्द्रमौलिं वृषकेतुं च हृदि धृत्वा। इत्युक्त्वा योगाग्निना शरीरं दग्धवती, सकलमखे हाहाकारो जातः।
Verse 129 (दोहा/सोरठा)
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।
satī maranu suni sambhu gana lage karana makha khīsa | jagya bidhansa biloki bhṛgu racchā kīnhi munīsa ||64||
सत्याः मरणवार्तां श्रुत्वा शम्भोर्गणाः यज्ञं विनाशयितुं तं परिहासेनाभ्यपतन्। यज्ञे विध्वस्ते दृश्ये, भृगुर्मुनिवरः—ऋषीणां श्रेष्ठः—तस्य रक्षणं कर्तुं प्रववृते।
Verse 130 (चौपाई)
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।। जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।। भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।। यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी।। सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।। तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।। जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई।। जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।
samācāra saba śaṅkara pāe | bīrabhadru kari kopa paṭhāe || jagya bidhaṁsa jāi tinh kīnhā | sakala suranha bidhivata phalu dīnhā || bhe jagabidita daccha gati soī | jasi kachu saṁbhu bimukha kai hoī || yaha itihāsa sakala jaga jānī | tāte maiṁ saṁchepa bakhānī || satīṁ marata hari sana baru māgā | janama janama siva pada anurāgā || tehi kārana himagiri gṛha jāī | janamīṁ pārabatī tanu pāī || jaba teṁ umā saila gṛha jāīṁ | sakala siddhi saṁpati tahaṁ chāī || jahaṁ tahaṁ muninha su-āśrama kīnhe | ucita bāsa hima bhūdhara dīnhe ||
समाचारं सर्वं शङ्करः प्राप्तवान्, क्रोधेन वीरभद्रं प्रेषितवान्। यज्ञविध्वंसं कृत्वा तत्र गतवान्, सकलदेवेभ्यः विधिवत्फलं दत्तवान्। दक्षस्य गतिरियं जगति विख्याता जाता, यथा शम्भुविमुखस्य भवति। इतिहासमिमं सकलजगति जानन्ति, अतः संक्षेपेण वर्णयामि। सती म्रियमाणा हरिं प्रार्थितवती, जन्मशः शिवपादयोः अनुरागो भवतु इति। तन्निमित्तं हिमगिरेः गृहं गता, पार्वतीतनुं प्राप्य जन्म लेभे। तदनन्तरं उमा शैलगृहं याता, सकलसिद्धिसम्पत्तिस्तत्र छायां दधति। मुनयः तत्र तत्र सुआश्रमानकार्षुः, हिमभूधरः उचितवासान्ददौ।
Verse 131 (दोहा/सोरठा)
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।
sadā sumana phala sahita saba druma nava nānā jāti | pragaṭīṁ sundara saila para mani ākara bahu bhā̃ti ||65||
सदा तरवो वरपुष्पफलैः परिपूर्णा बभूवुः—नूतनैर्नानाविधैर्बहुभिश्च; रम्ये च गिरिवरे नानाविधरत्ननिधयः प्रादुरभवन्।
Verse 132 (चौपाई)
सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।। सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।। सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ।। नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।। नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए।। सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।। नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।। निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना।।
saritā saba punita jalu bahahīṁ | khaga mr̥ga madhupa sukhī saba rahahīṁ || sahaja bayaru saba jīvanha tyāgā | giri para sakala karahiṁ anurāgā || soha saila girijā gr̥ha āeṁ | jimi janu rāma-bhagati ke pāeṁ || nita nūtana maṅgala gr̥ha tāsū | brahmādika gāvahiṁ jasu jāsū || nārada samācāra saba pāe | kautukahīṁ giri gehi sidhāe || sailarāja baṛa ādara kīnhā | pada pakhāri bara āsanu dīnhā || nāri sahita muni pada siru nāvā | carana salila sabu bhavanu siṁcāvā || nija saubhāgya bahuta giri baranā | sutā boli melī muni caranā ||
सरितः सर्वाः पवित्रं जलं वहन्ति, खगमृगमधुपाः सर्वे सुखेन तिष्ठन्ति। सहजं वैरं सर्वजीवाः त्यक्तवन्तः, गिरौ सर्वे अनुरागं कुर्वन्ति। सा शैलः गिरिजागृहमागतायां शोभते स्म, यथा रामभक्तेः पादपद्मं प्राप्तवता। नित्यं नूतनमङ्गलं गृहे तस्य, ब्रह्मादयः तस्य यशः गायन्ति। नारदः समाचारं सर्वं प्राप्तवान्, कौतूहलेन गिरिगेहं प्रस्थितः। शैलराजः बहुमानं कृतवान्, पादप्रक्षालनं कृत्वा आसनं दत्तवान्। नारीसहितः मुनिपादौ शिरसा नमत्, चरणजलेन समग्रं भवनं सिञ्चितवान्। स्वसौभाग्यं बहु वर्णितवान्, सुतां प्राह, मुनिचरणयोः स्थापितवान्।
Verse 133 (दोहा/सोरठा)
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।। कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
trikālagya sarbagya tumha gati sarbatra tumhāri || kahahu sutā ke doṣa guna munibara hṛdayã bicāri ||66||
त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ सर्वत्र तव एव गतिरन्तोऽपि च। वद, हे दुहितः—तस्याः का दोषा गुणाश्च के? हे मुनीन्द्र, हृदि विचिन्त्य ब्रूहि।
Verse 134 (चौपाई)
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।। सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।। सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।। सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।। होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।। एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा।। सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी।। अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।
kaha muni bihasi gūṛha mṛdu bānī | sutā tumhāri sakala guna khānī || sundara sahaja susīla sayānī | nāma umā aṁbikā bhavānī || saba lacchana saṁpanna kumārī | hoihi saṁtata piyahi piārī || sadā acala ehi kara ahi-vātā | ehi teṁ jasu paihahiṁ pitu mātā || hoihi pūjya sakala jaga māhīṁ | ehi sevata kachu durlabha nāhīṁ || ehi kara nāmu sumiri saṁsārā | triy caṛhahahiṁ patibrata asi-dhārā || saila sulacchana sutā tumhārī | sunahu je aba avaguna dui cārī || aguna amāna mātu pitu hīnā | udāsīna saba saṁsaya chīnā ||
मुनिर्विहस्य गूढां मृदुवाणीमुवाच, सुता तव सकलगुणखानी। सुन्दरी सहजसुशीला सयाना, नाम उमा अम्बिका भवानी। सर्वलक्षणसम्पन्ना कुमारी, पतिं प्रति सदा प्रिया भविष्यति। अचला सौभाग्यवती भविष्यति, अनया पितरौ यशः प्राप्स्यतः। सकलजगति पूज्या भविष्यति, एवं सेवमानाय किमपि दुर्लभं नास्ति। अस्याः नाम स्मरन्तः संसारे स्त्रियः पतिव्रताधारां आरोहयिष्यन्ति। शैलसुलक्षणा सुता तव, शृणु अद्य अवगुणान् द्विचत्वारः। अगुणा अमाना मातापितृहीना, उदासीना सर्वसंशयच्छिन्ना।
Verse 135 (दोहा/सोरठा)
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।। अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।
jogī jaṭila akāma mana nagana amaṅgala beṣa || asa svāmī ehi kahaṁ milihi parī hasta asi rekh ||67||
योगी जटाधरः, निर्वासनचित्तमिवाभिमन्यते; नग्नोऽपि च दुष्टलक्षणरूपः—कथं स सत्गुरुं कदाचिदपि प्राप्नुयात्? तस्य हस्तरेखासु सा गतिः न लिखिता।
Verse 136 (चौपाई)
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।। नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना।। सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।। होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।। उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।। जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई।। झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी।। उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।
suni muni girā satya jiyã jānī | dukha daṁpatihi umā haraṣānī || nārada-hũ yaha bheda na jānā | dasā eka samujhaba bilagānā || sakala sakhī̃ girijā giri mainā | pulaka sarīra bhare jala nainā || hoi na mṛṣā devarṣi bhāṣā | umā so bacanu hṛdayã dhari rākhā || upajeu siva pada kamala sanehū | milana kaṭhina mana bhā sandehū || jāni ku-avasaru prīti durāī | sakhī uchaṅga baiṭhī puni jāī || jhūṭhi na hoi devarṣi bānī | socahi daṁpati sakhī̃ sayānī || ura dhari dhīra kahai girirāū | kahahu nātha kā kari'a upāū ||
मुनेवाक्यं श्रुत्वा सत्यमिति हृदये ज्ञातवती, दम्पत्योः शोको हर्षं जगाम। नारदोऽपि एतन्न जानाति, दशैका विलग्ना इव प्रतीयते। सखीसहिता गिरिजा गिरिमैना, पुलकितशरीरा जलपूर्णनयनाः। देवर्षेवाक्यं मृषा न भवति, उमा तद्वचनं हृदि धृतवती। शिवपादकमलयोः स्नेहः समुत्पन्नः, मिलनं कठिनमिति मनसि संशयो जातः। अकालं ज्ञात्वा प्रीतिं गोपयामास, सखी पुनराश्रित्य उपविष्टा। देवर्षेवाक्यं मृषा न भवितुमर्हति, दम्पती सख्यः सयानाः चिन्तयन्ति। उरसि धैर्यं धृत्वा गिरिराज उवाच, नाथ किं कर्तव्यमिति ब्रूहि।
Verse 137 (दोहा/सोरठा)
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।
kaha munīsa himavanta sunu jo bidhi likhā lilāra | deva danuja nara nāga muni kou na meṭanihāra ||68||
तदा मुनीश्वर उवाच—“हे हिमवान्, शृणु; विधात्रा यद् भाले लिखितं, तद् देवो वा दैत्यो वा मनुष्यो वा नागो वा, ऋषिरपि वा—कोऽपि तद् अपाकर्तुं न शक्नोति।”
Verse 138 (चौपाई)
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।। जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं।। जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने।। जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।। जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं।। भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं।। सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।। समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।
tadapi eka maiṁ kahauṁ upāī. hoi karai jauṁ daiu sahāī.. jasa baru maiṁ baraneuṁ tumha pāhīṁ. milahi umahi tasa saṁsaya nāhīṁ.. je-je bara ke doṣa bakhāne. te saba siva pahi maiṁ anumāne.. jauṁ bibāhu saṅkara sana hoī. doṣau guna sama kaha sabu koī.. jauṁ ahi seja sayana hari karahīṁ. budha kachu tinh kara doṣu na dharahīṁ.. bhānu kṛsānu sarba rasa khāhīṁ. tinh kahaṁ manda kahata kou nāhīṁ.. subha aru asubha salila saba bahī. surasari kou apunīta na kahī.. samaratha kahuṁ nahiṁ doṣu gosāī. rabi pāvaka surasari kī nāī..
तथापि एकमुपायं वदामि, दैवसहाय्येन सिद्धं भविष्यति। यथा वरं वर्णितवानस्मि भवते, तथा उमा तं प्राप्स्यति नात्र संशयः। ये ये वरदोषाः वर्णिताः, ते सर्वे शिवे एव अनुमिताः। यदि शङ्करेण सह विवाहो भवति, दोषगुणौ समानौ इति सर्वे वदन्ति। हरिः शेषशयने शेते, बुधाः तत्र दोषं न आरोपयन्ति। भानुः कृशानुः सर्वरसान् खादतः, तथापि कश्चिन्नीच इति न वदति। शुभाशुभं जलं सर्वं वहति, सुरसरितां कश्चिदपवित्रं न वदति। समर्थे दोषो नास्ति गोसाई, रविपावकसुरसरितां न्यायेन।
Verse 139 (दोहा/सोरठा)
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान। परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।
jaũ asa hisiṣā karahiṃ nara jaṛi bibeka abhimāna | parahiṃ kalapa bhari naraka mahũ jīva ki īsa samāna ||69||
ये जना स्वविवेकगर्वेण मन्दीभूता ईर्ष्याम् आचरन्ति, ते ये आत्मानं भगवता समं मन्यन्ते—ते कल्पपर्यन्तं नरके पतन्ति।
Verse 140 (चौपाई)
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।। सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें।। संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।। दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।। जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।। जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।। बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन।। इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।
surasari jala kṛta bāruṇi jānā | kabahũ na santa karahĩ tehi pānā || surasari milẽ so pāvana jaisẽ | īsa anīsahi antara taisẽ || sambhu sahaja samaratha bhagavānā | ehi bibāhã saba bidhi kalyānā || durārādhya pai ahahĩ mahesū | āsutoṣa puni kiẽ kalesū || jaũ tapu karai kumāri tumhārī | bhāviu meṭi sakahĩ tripurārī || jadyapi bara aneka jaga māhī̃ | ehi kahã siva taji dūsara nāhī̃ || bara dāyaka pranatārati bhanjana | kṛpāsindhu sevaka mana rañjana || icchita phala binu siva avarādhe | lahia na koṭi joga japa sādhẽ ||
सुरसरिजलं वारुणीमिव मत्वा, सन्तः कदापि तत्पानं न कुर्वन्ति। सुरसर्या संसर्गात्सर्वं पवित्रं भवति, ईशानीशयोरन्तरं तथैव। शम्भुः सहजसमर्थो भगवान्, अस्मिन् विवाहे सर्वकल्याणमस्ति। दुराराध्यो महेशः, तथापि आशुतोषः, किन्तु क्लेशं सहितव्यम्। यदि कुमारी तपः करोति, त्रिपुरारी भाविनमपि नाशयितुं शक्नोति। यद्यपि जगति वरा बहवः सन्ति, अत्र शिवं विहाय अन्यो नास्ति। वरदाता प्रणतार्तिभञ्जनः, कृपासिन्धुः सेवकमनरञ्जनः। शिवमनाश्रित्य इष्टफलं न लभ्यते, कोटियोगजपसाधनैरपि।
Verse 141 (दोहा/सोरठा)
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस। होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
asa kahi nārada sumiri hari girijahi dīnhi asīsa | hoihi yaha kalyāna aba saṃsaya tajahu girīsa ||70||
इति ब्रुवन् नारदः स्वान्तःस्थितं हरिं स्मरन् गिरिजां प्रति वरं ददौ— “अद्यैव ते शुभसिद्धिः नूनं भविष्यति; हे गिरीशे, संशयं जहि।”
Verse 142 (चौपाई)
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।। पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।। जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा।। न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी।। जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू।। सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।। अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।। बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।
kahi asa brahmabhavana muni gayau. āgila carita sunahu jasa bhayau.. patihi ekānta pāi kaha mainā. nātha na maiṁ samujhe muni bainā.. jauṁ gharu baru kulu hoi anūpā. kari-a bibāhu sutā anurūpā.. na ta kanyā baru rahau kuārī. kaṁta umā mama prāṇa-piārī.. jauṁ na milahi baru girijahi jogū. giri jaṛ sahaja kahihi sabu logū.. soi bicāri pati karehu bibāhū. jehiṁ na bahori hoi ura dāhū.. asa kahi pari carana dhari sīsā. बोले सहित saneha girīsā.. baru pāvaka pragaṭai sasi māhīṁ. nārada bacanu anyathā nāhīṁ..
इत्युक्त्वा मुनिर्ब्रह्मभवनं जगाम, अग्रिमचरितं शृणु यथाभवत्। पतिमेकान्ते प्राप्य मैनोवाच, नाथ नाहं मुनिवचनं जानामि। यदि गृहं वरः कुलं चानुपमं, तर्हि सुतां विवाहय अनुरूपेण। अन्यथा कन्या कुमारी तिष्ठतु, कान्ता उमा मम प्राणप्रिया। यदि गिरिजायै योग्यो वरो न मिलति, गिरिजडाः इति सर्वे वक्ष्यन्ति। तं विचार्य पतिः विवाहं करोतु, येन पुनर्न हृदयदाहो भवेत्। इत्युक्त्वा चरणौ पतिता शिरसा धृतवती, गिरीशः स्नेहेन उवाच। वरं पावकः शशिमध्ये प्रकाशेत, नारदवचनं अन्यथा न भविष्यति।
मुख्य भक्ति-शिक्षा यह है कि ईश्वर-सम्बन्ध (विशेषतः शिव-राम-नाम) किसी भी सामाजिक प्रतिष्ठा, कुल-मान, या यज्ञ-वैभव से ऊपर है। ‘शिव-अपमान-असह्यता’ भक्ति की कसौटी बनती है—जहाँ भगवान/भगवत्-जन की निन्दा सहना अधर्म है। बाह्य कर्मकाण्ड का मूल्य तभी है जब वह अहंकार-रहित हो; अन्यथा वह पतन का कारण बनता है। सती की ‘जनम-जनम सिव पद अनुराग’ की आकांक्षा भक्ति को निरन्तर, जन्मातीत निष्ठा के रूप में स्थापित करती है; और शिव का शोक ‘राम-नाम’ में शान्त होकर दिखाता है कि नाम-स्मरण दुःख-निवारक, समन्वयकारी (शैव-वैष्णव) और शरणागति का सर्वोच्च साधन है।
यह अंश बालकाण्ड की उस धारा में है जहाँ रामकथा के ‘ऐतिहासिक’ प्रवेश से पहले शैव-वैष्णव-समन्वय की नींव रखी जाती है। रस-रचना में करुण (सती का असह्य अंतर्दाह, जाति-अवमानना का ‘दारुन दुख’), रौद्र (यज्ञ-ध्वंस, वीरभद्र का कोप), और शान्त (समाधि-त्याग के बाद शिव का ‘राम नाम’ स्मरण) का क्रमिक आरोह है। दच्छ का अभिमान ‘यज्ञ-केन्द्रित कर्मकाण्ड’ का प्रतीक बनता है; उसके बरक्स ‘नाम-स्मरण’ और ‘ईश्वर-अपमान-असह्यता’ भक्ति-नीति का मानदण्ड। तुलसीदास यहाँ वैदिक यज्ञ-वैभव को नकारते नहीं, पर उसे अहंकार-आश्रित होने पर पतनशील दिखाते हैं। सती का ‘जनम-जनम सिव पद अनुराग’ वर माँगना आगे उमा-तप और अंततः रामावतार-परक भक्ति-सोपान के लिए अध्यात्म-भूमिका है: देह-गर्व टूटे, नाम-आश्रय जगे, और प्रेम-निष्ठा स्थिर हो।
करुण से रौद्र और अंततः शान्त-भक्ति तक क्रमिक आरोह। आरम्भ में सती का अंतर्दाह—पिता के अपमान, सामाजिक प्रतिष्ठा और यज्ञ-वैभव के बीच ‘शिव-निन्दा’ सह न पाने की विवशता (करुण/विषाद)। फिर यज्ञ-स्थल की स्मृति/परिणामों से उभरता आक्रोश—दच्छ के अभिमान का प्रतिघात, यज्ञ-ध्वंस की पृष्ठभूमि (रौद्र/वीर)। अंत में शिव का वैराग्य-गहन शोक, समाधि-त्याग के बाद ‘राम-नाम’ की ओर मन का स्थिर होना—दुःख का रूपान्तरण शरणागति और नाम-आश्रय में (शान्त/भक्ति-रस)।
परम्परानुसार शिव-अपमान-निवारण, नाम-निष्ठा की दृढ़ता, और अहंकार-क्षय का फल कहा जाता है। ‘राम नाम’ का शिव-स्मरण सुनकर श्रोता के भीतर शैव-वैष्णव-भेद मिटता है और भक्ति में स्थैर्य आता है—यही इस अंश की साधना-फलश्रुति मानी जाती है।
सामान्यतः शैव-वैष्णव समन्वय हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-सम्पुट) या ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप-सम्पुट लोक-परम्परा में जोड़ा जाता है; मानस-पाठ में अधिक प्रचलित नाम-सम्पुट ही माना जाता है।
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