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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘संशय-निवृत्ति’। बालकाण्ड में जगत-इतिहास और अवतार-कारण एक साथ रखकर तुलसी यह दिखाते हैं कि मुक्ति का प्रथम पायदान है—भगवत्-प्रतिज्ञा पर भरोसा, तथा भोग/राज्य/वरदान को भी ‘चरण-रति’ में रूपान्तरित कर देना। यहाँ दम्पति (सतरूपा–मनु) का वर-प्रार्थन प्रसंग साधक को सिखाता है कि सर्वोच्च वर है—विवेक, भक्ति, और चरण-स्नेह; बाकी सब उसी के अधीन हैं।
अत्र खण्ड-एकांशे रस-केन्द्रं ‘शान्त-करुण’ इति, यस्मिन् ‘अद्भुत’ (अवतार-प्रतिज्ञा) दीप्तिः वर्तते। शतरूपायाः विनय-युक्ता धृष्टता—“त्वं ब्रह्मादि-जनकः”—भक्तस्य अन्तःकरणे उद्भवमानं धर्म-सम्मतं संशयं रूपयति: सर्व-समर्थः प्रभुः किं खलु ‘निज-भक्त-हिताय’ पुत्र-रूपेण भवेत्? तुलसी अत्र निर्गुण-ब्रह्मणः सर्वव्यापकत्वम् (अन्तर्यामित्वम्) सगुण-लीला-वाक्येन (“एवमस्तु”) संयोजयति। ‘मणि-विना फणिः/जल-विना मीना’ इत्यादि उपमानैः प्राण-आश्रय-भावः तीव्रः—जीवनस्यार्थः प्रभु-आश्रयः। अनन्तरं प्रतापभानु-प्रसङ्गस्य आरम्भः ‘इतिहास’रूपेण—राज्य-वैभवम्, दानम्, धर्मः, ततः मृगया-भ्रमश्च—एतद् दर्शयितुं यत् केवलं नीति-कर्म न पर्याप्तम्; विवेक-रहितोऽहङ्कारः पतन-कारणम्। एवं बालकाण्डस्यायं भागः साधकं प्रथम-सोपाने स्थिरीकरोति—वरदानमपि तदैव कल्याणकरं यदा भक्ति-विवेक-परिणतं भवति।
Verse 318 (दोहा/सोरठा)
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि। होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।।
tahā̃ kari bhoga bisāla tāta gaũ kachu kāla puni | hoihahu avadha bhuāla taba maĩ hoba tumhāra suta ||151||
“तत्र किञ्चित्कालं विपुलान् भोगान् अनुभूय, प्रिय पितः, पुनरहं गमिष्यामि। यदा त्वम् अवधराजो भविष्यसि, तदा अहं तव पुत्रो भविष्यामि।”
Verse 319 (चौपाई)
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।। अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता।। जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी।। आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।। पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा।। पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना।। दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।। समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।।
icchāmaya narabeṣa saṁvāreṁ | hoihaũ pragaṭa niketa tumhāre || aṁsanha sahita deha dhari tātā | karihaũ carita bhagata sukhadātā || je suni sādara nara baṛabhāgī | bhava tarihahiṁ mamatā mada tyāgī || ādisakti jehiṁ jaga upajāyā | sou avatarihi mori yaha māyā || purauba maiṁ abhilāṣa tumhārā | satya satya pana satya hamārā || puni puni asa kahi kṛpānidhānā | antaradhāna bhae bhagavānā || daṁpati ura dhari bhagata kṛpālā | tehiṁ āśrama nivase kachu kālā || samaya pāi tanu taji anayāsā | jāi kīnha amarāvati bāsā ||
"इच्छामयं नरवेषं धृत्वा, तव निकेतने प्राकट्यं भविष्यति। अंशैः सह देहं धृत्वा तात, भक्तसुखदायकचरितानि करिष्यामि। ये श्रद्धया शृण्वन्ति ते महाभागिनः, भवसागरं तरिष्यन्ति, ममतामदं त्यक्त्वा। आदिशक्तिः यया जगदुत्पादितं, सापि अवतरिष्यति, इयं मम माया। तवाभिलाषं पूरयिष्यामि, सत्यं सत्यं मम सत्यप्रतिज्ञा।" एवं पुनः पुनः कृत्वा करुणानिधिः भगवान् अन्तर्धानं जगाम। दम्पती भक्तकृपालं हृदि धृत्वा तस्मिन्नाश्रमे कालं न्यवसताम्। समयं प्राप्य शरीरं त्यक्त्वा अनायासेन अमरावत्यां वासं कृतवन्तौ।
Verse 320 (दोहा/सोरठा)
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु। भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।।152।।
yaha itihāsa punīta ati umahi kahī bṛṣaketu | bharadvāja sunu apara puni rāma janama kara hetu ||152||
एतत् परमपावनं चरितं बृहस्पतिकेतुः (शिवः) उमायै कथितवान्। अधुना, हे भारद्वाज, भूयः शृणु; रामावतारस्य कारणं प्रयोजनं च तेऽहं वक्ष्यामि।
Verse 321 (चौपाई)
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।। बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू।। धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना।। तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।। राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही।। अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा।। भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती।। जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा।।
sunu muni kathā punīta purānī | jo girijā prati saṃbhu bakhānī || bisva bidita eka kaikaya desū | satyaketū tahã basai naresū || dharama dhuraṃdhara nīti nidhānā | teja pratāpa sīla balavānā || tehi kẽ bhae jugala suta bīrā | saba guna dhāma mahā ranadhīrā || rāja dhanī jo jeṭha suta āhī | nāma pratāpabhānu asa tāhī || apara sutahi arimardana nāmā | bhujabala atula acala saṃgrāmā || bhāihi bhāihi parama samītī | sakala doṣa chala barajita prītī || jeṭhe sutahi rāja nṛpa dīnhā | hari hita āpu gavana bana kīnhā ||
मुने, शृणु पुण्यपुराणीं कथां, यां शम्भुः गिरिजां प्रति अवदत्। विश्वविदितः एकः कैकयदेशः, तत्र सत्यकेतुः नृपो वसति स्म। धर्मधुरंधरः, नीतिनिधिः, तेजःप्रतापशीलबलवान्। तस्य द्वौ वीरौ पुत्रौ अजायतां, सर्वगुणधामनौ, महारणधीरौ। ज्येष्ठः पुत्रः राज्यभारसमर्थः, प्रतापभानुरिति नाम। अपरः पुत्रः अरिमर्दन इति नाम, भुजबलातुलः, संग्रामाचलः। भ्रातृभ्यां परमसख्यं, सर्वदोषछलवर्जितप्रीतिः। ज्येष्ठाय पुत्राय राज्यं दत्त्वा, कनिष्ठः हरिहिताय स्वयं वनं गतवान्।
Verse 322 (दोहा/सोरठा)
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस। प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस।।153।।
jaba pratāpa-rabi bhayu nṛpa phirī dohāī desa | prajā pāla ati beda-bidhi katahū̃ nahī̃ agha lesa ||153||
यदा नृपस्य सूर्यसमप्रभा महिमा प्रतिष्ठितोऽभवत्, तदा पुनः सर्वदेशे घोषणाः प्रववृधुः। स वैदिकविधिमनुसृत्य प्रजाः सम्यक् पालयामास; कुत्रापि पापस्य लेशोऽपि न दृश्यते स्म।
Verse 323 (चौपाई)
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।। सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा।। सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा।। सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।। बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।। जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई।। सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें।। सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला।।
nṛpa hitakāraka saciva sayānā | nāma dharmaruci śukra samānā || saciva sayāna bandhu balabīrā | āpu pratāpapuñja raṇadhīrā || sena saṅga caturaṅga apārā | amita subhaṭa saba samara jujhārā || sena biloki rāu haraṣānā | aru bāje gahagahe nisānā || bijaya hetu kaṭakaī banāī | sudina sādhi nṛpa caleu bajāī || jaṁha taṁha parīṁ aneka larāīṁ | jīte sakala bhūpa bariāī || sapta dīpa bhujabala basa kīnhe | lai lai daṇḍa chāḍi nṛpa dīnhe || sakala avani maṇḍala tehi kālā | eka pratāpabhānu mahipālā ||
नृपस्य हितकारकः पण्डितः सचिवः आसीत्, धर्मरुचिरिति नाम, शुक्रसमाननीतिः। सचिवः पण्डितः, तस्य बन्धुः बलवीरः, नृपः स्वयं प्रतापपुञ्जः रणधीरः। चतुरङ्गबलेन सह अपारसेना, अमिताः शूराः, सर्वे समरयोद्धारः। सेनां दृष्ट्वा नृपः प्रहृष्टः, भेरीशङ्खनादाः गहगहाः अभवन्। विजयाय सेनां व्यूह्य, शुभदिने नृपः बज्रघोषैः सह प्रस्थितवान्। बहुत्र युद्धानि जातानि, सर्वान् भूपान् वरीयसा जितवान्। भुजबलेन सप्तद्वीपान् वशीकृत्य, दण्डं गृहीत्वा त्यक्त्वा नृपेभ्यः प्रत्यानीतवान्। तस्मिन्काले सकलावनीमण्डले एकः प्रतापभानुः महीपालः आसीत्।
Verse 324 (दोहा/सोरठा)
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु। अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।।
svabasu bisva kari bāhubala nija pura kīnha prabesu | aratha dharama kāmādi sukha sevai samayaṁ naresu ||154||
भुजबलात् स्ववशं कृत्वा सकलं जगत्, नृपो निजराजधानीं प्रविवेश। ततः कालेन विधिना च स अर्थं धर्मं चान्वतिष्ठत्, कामादीन् धर्म्यभोगान् च भुङ्क्ते स्म—राजोचितं सुखं आस्वादयन्।
Verse 325 (चौपाई)
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।। सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी।। सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती।। गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।। भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।। दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना।। नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।। बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।।
bhūpa pratāpa-bhānu bala pāī. kāma-dhenu bhai bhūmi suhāī.. saba dukha barajita prajā sukhārī. dharama-sīla sundara nara nārī.. saciva dharama-ruci hari-pada prītī. nṛpa-hita hetu sikhava nita nītī.. guru sura santa pitara mahi-devā. karai sadā nṛpa saba kai sevā.. bhūpa dharama je beda bakhāne. sakala karai sādara sukha māne.. dina prati deha bibidha bidhi dānā. sunahu sāstra bara beda purānā.. nānā bāpīṁ kūpa taṛāgā. sumana bāṭikā sundara bāgā.. bipra-bhavana sura-bhavana suhāe. saba tīrathanha bicitra banāe..
प्रतापभानुः भूपः बलं प्राप्य, भूमिं सुशोभनां कृतवान्, सा कामधेनुरिव अभवत्। सर्वदुःखवर्जिता प्रजा सुखिनः, धर्मशीलाः सुन्दराः नरनार्यः। सचिवः धर्मरुचिः हरिपादप्रीतिः, नृपहिताय नित्यं नीतिं बोधयति स्म। गुरुः सुराः सन्तः पितरः ब्राह्मणाः, तेषां सर्वेषां नृपः सदा सेवां करोति स्म। भूपः धर्मान् ये वेदाः वदन्ति, सर्वान् सादरं करोति, सुखेन मन्यते। दिने दिने विविधविधिदानं करोति, शास्त्राणि वेदान् पुराणानि शृणोति। नानाबापीकूपतडागाः, सुमनोवाटिकाः सुन्दरबागाः। ब्राह्मणभवनानि देवभवनानि सुशोभनानि, सर्वतीर्थेषु विचित्राणि निर्मितानि।
Verse 326 (दोहा/सोरठा)
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग। बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग।।155।।
jaṁh lagi kahe purāna śruti eka-eka saba jāga | bāra sahastra sahastra nṛpa kiē sahita anurāga ||155||
यावत् पुराणश्रुत्योः कथ्यते, लोके प्रसिद्धं यत् किञ्चिदाख्यानं तत् सर्वम्—पुनः पुनः सहस्रसहस्रशः नृपाः समुत्थापिताः, स्नेहयुक्ता अपि (धर्मे भगवति च) बभूवुः।
Verse 327 (चौपाई)
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।। करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी।। चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा।। बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ।। फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू।। बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं।। कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई।। घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ।।
hṛdayaṁ na kachu phala anusandhānā. bhūpa bibekī parama sujānā.. karai je dharama karama mana bānī. bāsudeva arpita nṛpa gyānī.. caṛhi bara bāji bāra eka rājā. mṛgayā kara saba sāji samājā.. biṁdhyācala gabhīra bana gayū. mṛga punīta bahu mārat bhayū.. phirata bipina nṛpa dīkha barāhū. janu bana dureu sasi-hi grasi rāhū.. baṛa bidhu nahi samāta mukha māhīṁ. manahuṁ krodha-basa ugilata nāhīṁ.. kola karāla dasana chabi gāī. tanu bisāla pīvara adhikāī.. ghuru-ghurāta haya ārau pāeṁ. cakita bilokata kāna uṭhāeṁ..
हृदि न किञ्चित्फलमन्विष्य, भूपः विवेकी परमसुज्ञः आसीत्। यद्यद्धर्मकर्म मनसा वाचा करोति, तत्सर्वं वासुदेवाय अर्पयति स्म। वरबाजिं आरुह्य एकदा राजा, मृगयां कर्तुं सर्वसाजसमाजं कृत्वा प्रस्थितवान्। विन्ध्याचलगभीरवनं गतवान्, बहून् पुण्यमृगान् मारितवान्। विपिने भ्रमन् नृपः वराहं दृष्टवान्, इव वने राहुः शशिं ग्रसति। बृहत्वराहः मुखे न समाति, मनः क्रोधवशं गत्वा न उगिलति। कोलकरालदशनछविः, तनुः विशालः पीवरः अधिकः। घुरुघुराति, हयः अपि पादौ ताडयति, चकितं विलोकते, कर्णौ उत्थापयति।
Verse 328 (दोहा/सोरठा)
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु। चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।
nīla mahīdhara śikhara sama dekhi bisāla barāhu | capari caleu haya suṭuki nṛpa hā̃ki na hoi nibāhu ||156||
तं महावराहं दृष्ट्वा—श्यामवर्णं महागिरिशिखरप्रख्यम्—नृपो झटिति निर्जगाम। स अश्वं प्रचोदयामास, अतिवेगेन च धावितवान् यथा निग्रहोऽपि न शक्यते स्म।
Verse 329 (चौपाई)
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।। तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना।। तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।। प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।। गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू।। अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।। कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा।। अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई।।
āvata dekhi adhika rava bājī. caleu barāha maruta gati bhājī.. turata kīnha nṛpa sara saṁdhānā. mahi mili gayau bilokata bānā.. taki-taki tīra mahīsa calāvā. kari chala suara sarīra bacāvā.. pragaṭata durata jāi mṛga bhāgā. risa basa bhūpa caleu saṅga lāgā.. gayau dūri ghana gahana barāhū. jahã nāhina gaja bāji nibāhū.. ati akela bana bipula kalesū. tadapi na mṛga maga tajai naresū.. kola biloki bhūpa baṛa dhīrā. bhāgi paiṭha giriguhā̃ gabhīrā.. agama dekhi nṛpa ati pachitāī. phireu mahābana pareu bhulāī..
आगच्छन्तं महारवबाजिं दृष्ट्वा, वराहः मारुतगत्या भ्रष्टः। तत्क्षणात् नृपः शरं सन्धानं कृतवान्, भूमौ मिलित्वा गतः बाणं विलोकयन्। तक्त्वा तक्त्वा तीराणि महीषं प्रहरति, छलं कृत्वा सुवरः शरीरं रक्षति। प्रगटीभूतः दुरतः मृगः भ्रष्टः, रोषवशं भूपः अनुगतः। दूरं गतः घनगहनवराहः, यत्र नास्ति गजबाजिनिबाहः। अत्यन्तकेवलवने विपुलक्लेशः, तथापि न मृगमार्गं नृपः न त्यजति। कोलं विलोक्य भूपः बृहत्धीरः, भ्रष्ट्वा गिरिगुहां गभीरां प्रविष्टः। अगमं दृष्ट्वा नृपः अतिपश्चात्तापः, महावने भ्रष्टः परेभूलः सञ्जातः।
Verse 330 (दोहा/सोरठा)
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत। खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत।।157।।
kheda khinna chuddhita tṛṣita rājā bāji sameta | khojata byākula sarita sara jala binu bhayu aceta ||157||
दुःखक्लान्तो निरुत्साहः क्षुत्पिपासाभितप्तो नृपः साश्वः सन्त्रस्तचित्तः पर्यटन् अन्वेषणं चकार। नदीं न सरः, न जलं किञ्चिदपि अलभमानः, अन्ते मूर्च्छितः पपात।
Verse 331 (चौपाई)
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।। जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।। समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।। गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी।। रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा।। तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा।। राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना।। उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा।।
phirata bipina āśrama eka dekhā | tahã̐ basa nṛpati kapaṭa munibeṣā || jāsu desa nṛpa līnha chaṛāī | samara sena taji gayau parāī || samaya pratāpabhānu kara jānī | āpana ati asamaya anumānī || gayau na gṛha mana bahuta galānī | milā na rājahi nṛpa abhimānī || risa ura māri raṅka jimi rājā | bipina basai tāpasa keṃ sājā || tāsu samīpa gavana nṛpa kīnhā | yaha pratāparabi tehi taba cīnhā || rāu tṛṣita nahi so pahicānā | dekhi subeṣa mahāmuni jānā || utari turaga teṃ kīnha pranāmā | parama catura na kaheu nija nāmā ||
वने भ्रमन्नश्रममेकमपश्यत्। तत्र नृपो वसति कपटमुनिवेषधारी। यस्य देशं परनृपो जहार। सेनां त्यक्त्वा रणे परदेशमगात्। प्रतापभानोः समयमाज्ञाय। स्वकीयमत्यसमयमनुमान्य। न गृहमगात् मनसि बहुग्लान्या। न च राज्यं प्राप्तवानभिमानी नृपः। क्रोधं हृदि निधाय रंक इव राजानमिच्छन्। वने वसति तापसवेषेण। तस्य समीपं नृपो जगाम। प्रतापरविः तं तदा अजानात्। तृषितो नृपः तं नाजानात्। सुवेषं दृष्ट्वा महामुनिममन्यत। तुरगादवतीर्य प्रणाममकरोत्। परमचतुरः स्वनाम न कथयामास।
Verse 332 (दोहा/सोरठा)
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ। मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।।
bhūpati tṛṣita biloki tehiṁ sarabaru dīnha dekhāi | majjana pāna sameta haya kīnha nṛpati haraṣāi ||158||
तृष्णया पीडितं नृपतिं दृष्ट्वा स तस्मै सरोवरं दर्शयामास। नृपो हृष्टहृदयः तत्र स्नात्वा पीत्वा च यथेष्टं तृप्तिमगात्॥
Verse 333 (चौपाई)
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।। आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।। को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें।। चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें।। नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।। फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई।। हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।। कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा।।
gai śrama sakala sukhī nṛpa bhayū. nija āśrama tāpasa lai gayū.. āsana dīnha asta rabi jānī. puni tāpasa boleu mṛdu bānī.. ko tumha kasa bana phirahu akelẽ. sundara jubā jīva parahẽlẽ.. cakrabarti ke lacchana torẽ. dekhata dayā lāgi ati morẽ.. nāma pratāpabhānu avanīsā. tāsu saciva maiṁ sunahu munīsā.. phirata ahērẽ pareuṁ bhulāī. baṛe bhāga dekhuṁ pada āī.. hama kahaँ durlabha darasa tumhārā. jānata hauṁ kachu bhala honihārā.. kaha muni tāta bhayau aँdhiyārā. jojana sattari nagaru tumhārā..
क्षणं गत्वा नृपः सर्वश्रान्तिमुक्तः सुखी बभूव। तापसः तं स्वाश्रममनयत्। अस्तं गतं रविमाज्ञाय आसनं दत्त्वा। पुनस्तापसः मृदुवाचा अवदत्। को भवान् किं कारणेन वने एकाकी भ्रमसि। सुन्दरः युवा जीवरहस्यमिव। चक्रवर्तिलक्षणानि तव दृश्यन्ते। दृष्ट्वा महती करुणा हृदि जायते। प्रतापभानुरिति नाम श्रुतं ते अवनीपते। अहं तस्य मन्त्री शृणु मुनिश्रेष्ठ। मृगयां भ्रमन् मार्गं भ्रष्टवानस्मि। महता भाग्येन तव पादौ प्राप्तवानस्मि। मह्यं तव दर्शनं दुर्लभम्। किञ्चिद्भद्रं भविष्यतीति जानामि। मुनिरुवाच पुत्र तमो भवति। तव नगरं सप्ततिर्योजनानि दूरे।
Verse 334 (दोहा/सोरठा)
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान। बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।। तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।।
nisā ghora gambhīra bana pantha na sunahu sujāna | basahu āju asa jāni tumha jāehu hota bihāna ||159(ka)|| tulasī jasi bhavatabyatā taisī milai sahāi | āpunu āvai tāhi paiṁ tāhi tahāṁ lai jāi ||159(kha)||
“रात्रिः घोराऽस्ति, वनमार्गश्च गहनोऽतिदुर्गमः—हे प्राज्ञ, मन्त्रं मा परिभव। अद्यात्रैव तिष्ठ; एतद् विद्धि—प्रभाते गन्तुं शक्यसे॥ इति तुलसीदासः—यादृशं भाग्यं यथा च धर्मयोग्यता, तादृशी सहाय्यता लभ्यते। पात्राय स्वयमेवोपकारः समायाति; स तमुपगम्य तस्य यथास्थानं नयति॥”
Verse 335 (चौपाई)
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।। नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।। पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।। मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।। तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।। बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।। समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।। सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।
bhalehi nātha āyasu dhari sīsā | bā̃dhi turaga taru baiṭha mahīsā || nṛpa bahu bhā̃tī prasaṁseu tāhī | carana baṁdī nija bhāgya sarāhī || puni bole mṛdu girā suhāī | jāni pitā prabhu karaũ ḍhiṭhāī || mohi munīsa suta sevaka jānī | nātha nāma nija kahahu bakhānī || tehi na jāna nṛpa nṛpahi so jānā | bhūpa suhṛda so kapaṭa sayānā || bairī puni chatrī puni rājā | chala bala kīnha cahai nija kājā || samujhi rāja-sukha dukhita arātī | avā̃ anala iva sulagai chātī || sarala bacana nṛpa ke suni kānā | bayara sãbhāri hṛdayã haraṣānā ||
श्रेयः नाथ आज्ञा मम शिरसि। तुरगं वृक्षे बद्ध्वा महीषारूढः उपविशत्। नृपः तं बहुधा प्रशशंस। चरणौ नमस्कृत्य स्वभाग्यमशंसत। पुनर्मृदुगिरा सुहायया अवदत्। पितरं प्रभुं ज्ञात्वा धृष्टो भवामि। मां मुनेः पुत्रं सेवकं ज्ञात्वा। नाथ स्वनाम कथय। नृपः तं नाजानात्। सः तु नृपं जज्ञौ। मित्रवेषी कपटी पण्डितः। शत्रुः क्षत्रियः नृपश्च। कपटेन बलेन च स्वकार्यं सिद्धयितुमिच्छति। राजसुखं स्मृत्वा शत्रुः दुखितो बभूव। अग्निना इव हृदयं दह्यते। नृपस्य सरलवचनानि श्रुत्वा। वैरं हृदि संस्मृत्य हर्षमाप।
Verse 336 (दोहा/सोरठा)
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति।।160।।
kapaṭ bori bānī mṛdula boleu juguti sameta | nāma hamāra bhikhāri aba nirdhana rahita niketi ||160||
सर्वकपटं निमज्ज्य स मृदुवचो यथोचितकौशलयुक्तं जगाद—“मम नाम ‘भिक्षुकः’; अद्यारभ्याहं दरिद्रोऽस्मि, निरालयश्च।”॥
Verse 337 (चौपाई)
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।। सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।। तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।। तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।। जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।। सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।। सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।। सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।
kaha nṛpa je bigyāna nidhānā | tumha sārikhē galita abhimānā || sadā rahahi apanapau durāēṁ | saba bidhi kusala ku-bēṣa banāēṁ || tēhi tēṁ kahahi santa śruti ṭērēṁ | parama akiñcana priya hari केरēṁ || tumha sama adhana bhikhāri agēhā | hōta birañci sivahi sandēhā || jōsi-sōsi tava carana namāmī | mō para kṛpā kari-a aba svāmī || sahaja prīti bhūpati kai dēkhī | āpu biṣaya bisvāsa bisēṣī || saba prakāra rājahi apanāī | bōlēu adhika sanēha janāī || sunu satibhāu kahuṁ mahipālā | ihāṁ basata bītē bahu kālā ||
नृप उवाच विज्ञाननिधानं त्वाम्। त्वदादीनामभिमानः गलितः। सदा स्वप्रशंसां गोपयन्ति। सर्वप्रकारेण कुशलं वेषं धारयन्ति। अतः सन्तः श्रुतयश्च वदन्ति। परमकिञ्चनाः हरेः प्रियाः। त्वदृशो निर्धनाः गृहहीनाः भिक्षुकाः। ब्रह्मणं शिवं च सन्देहे पातयन्ति। यथायोग्यं तव चरणौ नमामि। अधुना स्वामिन् मयि कृपां कुरु। नृपः तस्य सहजप्रीतिमवेक्षत। आत्मविषये विशेषविश्वासं च। सर्वप्रकारेण नृपं स्वीयममन्यत। अधिकस्नेहं प्रकटयन् अवदत्। शृणु भूमिपाल वदामि सत्यभावम्। अत्र बहुकालं वसामि।
भक्ति-शिक्षा का केंद्र यह है कि ‘श्रेष्ठ वर’ बाह्य उपलब्धि नहीं, बल्कि विवेक-सहित चरण-स्नेह है। सतरूपा की विनय-युक्त ढिठाई साधक को सिखाती है कि प्रभु से निकटता का अधिकार प्रेम देता है—प्रश्न भी भक्ति का अंग बन सकता है, यदि उसमें अहं नहीं। ‘एवमस्तु’ का आश्वासन बताता है कि भगवत्-प्रतिज्ञा पर भरोसा ही प्रथम सोपान है; निर्गुण अंतर्यामी भी भक्त-हित के लिए सगुण संबंध स्वीकार करता है। उपमानों द्वारा निष्कर्ष: प्रभु-आश्रय के बिना जीवन ‘मणि बिना फणि’ और ‘जल बिना मीना’ समान है—अर्थात भक्ति जीवन-धर्म है। प्रतापभानु-प्रसंग का आरम्भ चेताता है कि दान-धर्म-राज्य भी यदि भक्ति-विवेक से न जुड़ें तो अहंकार उन्हें पतन का कारण बना देता है; इसलिए हर वरदान को ‘चरण-रति’ में रूपान्तरित करना ही सुरक्षित साधना है।
इस खंड-एकांश में रस का केंद्र ‘शान्त’ और ‘करुण’ है, जिसके भीतर ‘अद्भुत’ (अवतार-प्रतिज्ञा) की चमक है। सतरूपा की विनय-युक्त ढिठाई—“तुम ब्रह्मादि जनक”—भक्त के भीतर उठने वाले धर्म-सम्मत संशय को रूप देती है: सर्वसमर्थ प्रभु क्या सचमुच ‘निज-भक्त-हित’ के लिए पुत्र बनेंगे? तुलसी यहाँ निर्गुण-ब्रह्म की सर्वव्यापकता (अंतर्यामी) को सगुण-लीला के वचन (एवमस्तु) से जोड़ते हैं। ‘मनि बिनु फनि/जल बिनु मीना’ जैसे उपमानों द्वारा प्राण-आश्रय का भाव तीव्र होता है—जीवन का अर्थ प्रभु-आश्रय। इसके बाद प्रतापभानु-प्रसंग का आरम्भ ‘इतिहास’ बनकर आता है: राज्य-वैभव, दान, धर्म, और फिर मृगया-भ्रम—यह दिखाने को कि केवल नीति/कर्म पर्याप्त नहीं; विवेक-रहित अहंकार पतन का कारण बनता है। इस प्रकार बालकाण्ड का यह भाग साधक को पहले पायदान पर स्थिर करता है: वरदान भी तभी कल्याणकारी है जब वह भक्ति-विवेक में परिणत हो।
आरम्भ ‘शान्त’ रस से होता है—सतरूपा–मनु की तप-निष्ठा और प्रभु-सम्मुख विनय। फिर ‘करुण’ का उभार आता है: भक्त का अस्तित्व-आश्रय भाव (मनि बिनु फनि/जल बिनु मीना) और यह पीड़ा कि प्रभु-वियोग में जीवन निरर्थक है। इसी करुण के भीतर ‘अद्भुत’ की चमक—निर्गुण, सर्वव्यापक अंतर्यामी का सगुण-लीला में उतरने का वचन; ‘एवमस्तु’ से संशय-निवृत्ति और आश्वासन। इसके बाद भाव-धारा ‘शान्त’ में स्थिर होकर ‘इतिहास-प्रवेश’ करती है: प्रतापभानु-प्रसंग का आरम्भ एक चेतावनी-स्वर बनता है, जहाँ राज्य-वैभव/दान/धर्म के बावजूद विवेक-रहित अहंकार और मृगया-भ्रम से पतन की भूमिका बनती है—रस में ‘शान्त’ के साथ ‘भयानक/बीभत्स’ की हल्की छाया (आगामी अनर्थ का संकेत)।
परम्परानुसार मनु–सतरूपा प्रसंग का पाठ ‘विवेक-वृद्धि, संशय-निवृत्ति, और दाम्पत्य/गृहस्थ-धर्म में भगवत्-आश्रय’ को पुष्ट करता है। प्रतापभानु-प्रसंग का श्रवण ‘अहंकार-नाश’ और ‘कपट-मुनि/माया-जाल से सावधानी’ की बुद्धि देता है—अर्थात् भक्ति-सोपान पर गिरने से बचाता है।
सामान्य मानस-परम्परा में ‘राम-नाम’ संकीर्तन-सम्पुट (जैसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’) या ‘सीताराम’ जप-सम्पुट जोड़ा जाता है। विशेषतः ‘चरण-सनेहु/भक्ति/विवेक’ वाले पदों पर ‘राम’ नाम-सम्पुट को साधक-समाज उपयोगी मानता है।
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