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सोपान-आरम्भ: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘विवेक की पहली सीढ़ी’। बालकाण्ड में जगत-रचना, संत-समागम, और कथा-श्रवण की पात्रता गढ़ी जाती है। यहाँ मनुष्य-मन (राजा) के भीतर कपट, अहं, भय, और मोक्ष-आकांक्षा का प्रथम मन्थन होता है—जिससे शरणागति (हरि-आश्रय) की दिशा खुलती है।
अत्र रस-प्रधानता ‘नीति-रसस्य’ तथा ‘भय-करुणयोः’ संयोगेन निर्मीयते, यस्योपरि ‘शान्त’ लक्ष्य-छाया वर्तते। राज्ञः विनयः, मृदु-वाणी, अमरत्व-राज्य-लालसा च साधक-मनसः कामना-ग्रन्थिं दर्शयति; तत्रैव ‘कपट-मुनेः’ मधुर-भाषणम्, शास्त्रीय-उद्धरण-सदृशं तपः-प्रताप-वर्णनम्, ब्राह्मण-कोप-भयश्च—एतत् सर्वं मायायाः उपदेशक-रूपं प्रकाशयति। तुलसी अत्र लोक-मान्यतां (लोक-मान्यता अनल-समा) तथा बाह्य-सुबेष-भ्रमं (तुलसी-दृष्ट्वा सुबेषं मुह्यन्ति) तीक्ष्ण-व्यङ्ग्येन स्थापयित्वा ‘विवेकं’ जागरयति। बालकाण्डस्य सोपान-भूमिरियं—कथा-श्रवणात् पूर्वं पात्रता: कपट-परीक्षा, विनय-परिष्कारः, हरि-आश्रयस्य अनिवार्यत्व-बोधश्च।
Verse 338 (दोहा/सोरठा)
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु॥ लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥161(क)॥
aba lagi mohi na mileu kou maiṁ na janāuṁ kāhu | lokamānyatā anala sama kari tapa kānana dāhu ||161(ka)||
अद्यावधि न कश्चिद् मया सम्यगभिज्ञेयः प्राप्तः; न कस्यचिद् अहं स्वात्मानं प्रकाशयामि। यतः लौकिकप्रशंसा वह्निसदृशी—यदा तामेव लक्ष्यं करोषि, तदा सा तपोवनमेव दहति॥
Verse 339 (चौपाई)
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।। प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।। तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।। अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।। जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।। देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।। नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।। कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
tāteṁ guputa rahuṁ jaga māhīṁ | hari taji kimapi prayojana nāhīṁ || prabhu jānata saba binahiṁ janāeṁ | kahahu kavani sidhi loka rijhāeṁ || tumha suci sumati parama priya moreṁ | prīti pratīti mohi para toreṁ || aba jauṁ tāta durāuṁ tohī | dāruṇa doṣa ghaṭai ati mohī || jimi jimi tāpasu kathai udāsā | timi timi nṛpahi upaja bisvāsā || dekhā svabasa karma mana bānī | taba bolā tāpasa bagadhyānī || nāma hamāra ekatanu bhāī | suni nṛpa bole puni siru nāī || kahahu nāma kara aratha bakhānī | mohi sevaka ati āpana jānī ||
अतः जगति गोपनीयो वर्ते। हरिं विना किमपि प्रयोजनं नास्ति। प्रभुः सर्वं अनकथितमपि जानाति। केन सिद्धिना लोकं रञ्जयति इति वद। त्वं शुचिः सुमतिश्च मम परमप्रियः। तव प्रीतिः प्रतीतिश्च मयि अवलम्बते। यदि अधुना तात त्वां गोपयामि। भयंकरः दोषः मम अतिशयेन भविष्यति। यथा यथा तापसः उदासीनवचनं वदति। तथा तथा नृपस्य विश्वासः वर्धते। तस्य कर्मणि मनसि वाचि च स्वातन्त्र्यं दृष्ट्वा। तापसः बकध्यानी अवदत्। मम नाम एकतनुः भ्राता। श्रुत्वा नृपः पुनः शिरसा नत्वा अवदत्। नाम्नः अर्थं कथय। मां सेवकं अतिस्वीयं ज्ञात्वा।
Verse 340 (दोहा/सोरठा)
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि। नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।
ādisṛṣṭi upajī jabahiṃ taba utpati bhai mori | nāma ekatanu hetu tehi deha na dharī bahori ||162||
यदा प्रथमा सृष्टिः समुत्पन्ना तदैव ममापि सम्भवोऽभवत्। एकदेहस्य नाम्नः कृते ततः परं पुनर्देहं न जग्राहम्॥
Verse 341 (चौपाई)
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।। तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।। करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।। उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।। सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ।। कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।
jani ācaruja karahu mana māhīṁ | suta tapa teṁ durlabha kachu nāhīṁ || tapabala teṁ jaga sṛjai bidhātā | tapabala biṣṇu bhae paritrātā || tapabala saṁbhu karahiṁ saṁghārā | tapa teṁ agama na kachu saṁsārā || bhayu nṛpahi suni ati anurāgā | kathā purātana kahai so lāgā || karama dharama itihāsa anekā | karai nirūpana birati bibekā || udabhava pālana pralaya kahānī | kahesi amita ācaraja bakhānī || suni mahip tāpasa basa bhayū | āpana nāma kahata taba layū || kaha tāpasa nṛpa jānaūṁ tohī | kīṇhehu kapaṭa lāga bhala mohī ||
मनसि आश्चर्यं मा कुरु। सुतार्थं तपसा दुर्लभं किमपि नास्ति। तपोबलेन विधाता जगत् सृजति। तपोबलेन विष्णुः परित्राता बभूव। तपोबलेन शम्भुः संहारं करोति। तपसा जगति अगम्यं किमपि नास्ति। इदं श्रुत्वा नृपः अत्यनुरागमाप। पुरातनीं कथां कथयितुं प्रारभत। धर्मं इतिहासं च अनेकान्। वैराग्यं विवेकं च निरूपयति। उत्पत्तिं पालनं प्रलयं च कथयति। अमितानि आश्चर्याणि वर्णयति। श्रुत्वा नृपः तापसस्य वशं गतः। स्वनाम कथयित्वा तदा निर्गतः। तापसः अवदत् नृप त्वां जानामि। तव कपटः मम हृदयं प्रीतिमाप।
Verse 342 (दोहा/सोरठा)
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप। मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव।।163।।
sunu mahīsa asi nīti jahã-tahã nāma na kahahĩ nṛpa | mo-hi to-hi para ati prīti soi caturatā bicāri tava ||163||
शृणु महेश! नीतिरियं—नृपाः सर्वत्र यदृच्छया पवित्रं नाम न उच्चरन्ति। तथापि त्वयि ममातिशयः स्नेहः; एष एव तव यथार्थो नयः प्रज्ञा च, यदि सम्यक् विमृशसि॥
Verse 343 (चौपाई)
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।। गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।। देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।। उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।। अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।। सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।। कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।। प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
nāma tumhār pratāpa dinesā | satyaketu tava pitā naresā || gura prasāda saba jāni-a rājā | kahi-a na āpana jāni akā-jā || dekhi tāta tava sahaja sudhāī | prīti pratīti nīti nipunāī || upaji pari mamatā mana moreṁ | kahauṁ kathā nija pūche toreṁ || aba prasanna maiṁ saṁsaya nāhīṁ | māgu jo bhūpa bhāva mana māhīṁ || suni subacana bhūpati haraṣānā | gahi pada binaya kīnhi bidhi nānā || kṛpāsiṁdhu muni darasana toreṁ | cāri padāratha karatala moreṁ || prabhūhi tathāpi prasanna bilokī | māgi agama bara houṁ asokī ||
तव नाम प्रतापदिनेशः। सत्यकेतुः तव पिता नरेशः। गुरोः प्रसादेन सर्वं ज्ञेयं नृप। स्वयं ज्ञात्वा अकारणं मा वद। तात तव सहजसुधां दृष्ट्वा। प्रीतिं प्रतीतिं नीतिनिपुणतां च। मम मनसि ममता उत्पन्ना। त्वया पृष्टः कथां वदामि। अधुना प्रसन्नोऽस्मि सन्देहो नास्ति। मनसि यद्भावं भूप तं माङ्ग्यताम्। सुवचनं श्रुत्वा भूपतिः हर्षितः। पादौ गृहीत्वा बहुविधं प्रार्थयत्। कृपासिन्धो मुने तव दर्शनेन। चत्वारः पुरुषार्थाः करतलगताः। प्रभुः तथापि प्रसन्नतरं दृष्ट्वा। अगम्यं वरं याचे येन शोकरहितः स्याम्।
Verse 344 (दोहा/सोरठा)
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
jarā marana dukha rahita tanu samara jitai jani kou | eka-chhatra ripu-hīna mahi rāja kalapa sata hou ||164||
तस्य देहो जरामृत्युशोकवर्जितो भवतु; संग्रामे तं कश्चन न जयतु। शतयुगपर्यन्तं पृथिवीं स एकच्छत्रेण निरुपद्रवः, शत्रुवर्जितः, अधिराज्येन पालयतु॥
Verse 345 (चौपाई)
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।। कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।। तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।। जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।। चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।। बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।। हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।। तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।
kaha tāpasa nṛpa aisei hoū | kārana eka kaṭhina sunu soū || kālau tua pada nāihi sīsā | eka bipra-kula chāḍi mahīsā || tapa-bala bipra sadā bariārā | tinh ke kopa na kou rakhavārā || jaũ bipranha saba karahu naresā | tau tua basa bidhi biṣṇu mahesā || cala na brahma-kula sana bariāī | satya kahauँ dou bhujā uṭhāī || bipra śrāpa binu sunu mahipālā | tora nāsa nahi kavanehu kālā || haraṣeu rāu bacana suni tāsū | nātha na hoi mora aba nāsū || tava prasāda prabhu kṛpānidhānā | mo kahuँ sarba kāla kalyānā ||
तापसः अवदत् नृप तथास्तु। एकं कठिनं कारणं शृणु। कालोऽपि तव पादौ शिरसा नमति। एकं ब्राह्मणकुलं विहाय महीपते। तपोबलेन ब्राह्मणः सदा भयंकरः। तेषां कोपात् रक्षको नास्ति। यदि नरेश ब्राह्मणान् सर्वान् अनुगृह्णासि। तदा तव वशे ब्रह्मा विष्णुः महेशः च। ब्राह्मणकुलेन सह अतिशयेन वर्तितुं न युक्तम्। सत्यं वदामि उभे भुजे उत्थाप्य। भूमिपाल शृणु ब्राह्मणशापं विना। तव नाशः कदापि न भविष्यति। इदं वचनं श्रुत्वा राजा हर्षितः। नाथ मम नाशो न भविष्यति। तव प्रसादेन प्रभो कृपानिधान। मम सर्वदा कल्याणं भवतु।
Verse 346 (दोहा/सोरठा)
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।।
evam astu kahi kapaṭa-muni bolā kuṭila bahori | milaba hamāra bhulāba nija kahahu ta hamahi na khori ||165||
ततः स धूर्ततपस्वी पुनरपि कपटाभिप्रायः प्राह—“एवमस्तु। मम त्वया सह समागमप्रतिज्ञा विस्मृता; तत् व्यवस्था ब्रूहि, यथा मम भागो न नश्येत्॥”
Verse 347 (चौपाई)
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।। छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।। यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।। आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।। सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।। राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।। एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।।
tāteṁ maiṁ tohi barajauṁ rājā | kaheṁ kathā tava param akāzā || chaṭheṁ śravaṇa yaha parata kahānī | nāsa tumhāra satya mama bānī || yaha pragaṭeṁ athavā dvija-śrāpā | nāsa tora sunu bhānu-pratāpā || āna upāyaṁ nidhana tava nāhīṁ | jauṁ hari hara kopahiṁ mana māhīṁ || satya nātha pada gahi nṛpa bhāṣā | dvija gura kopa kahahu ko rākhā || rākhai gura jauṁ kopa bidhātā | gura birodha nahiṁ kou jaga trātā || jauṁ na calaba hama kahe tumhāreṁ | hou nāsa nahiṁ soca hamāreṁ || ekahiṁ ḍara ḍarapata mana morā | prabhu mahideva śrāpa ati ghorā ||
अतः नृप त्वां निषिधामि। इमां कथां वदितुं तव अयुक्तम्। षष्ठवारं श्रुत्वा इमां कथाम्। तव नाशः अवश्यं भविष्यति मम वचनं सत्यम्। प्रकटमिदं भवतु अथवा द्विजशापः भवतु। तव नाशः निश्चितः शृणु भानुप्रताप। अन्योपायेन तव मरणं नास्ति। हरिहरौ यदि मनसि कुपितौ स्तः। सत्यं नाथ पादौ गृहीत्वा नृपः वदति। द्विजगुरोः कोपं को रक्षति। यदि गुरोः कोपं विधाता अपि न रक्षति। गुरुविरोधिनं जगति त्राता नास्ति। यदि त्वया कथितवत् न चलामि। नाशो भवतु मम चिन्ता नास्ति। एकेन भयेन मम मनः कम्पते। प्रभु महादेवस्य शापः अतिभयंकरः।
Verse 348 (दोहा/सोरठा)
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ। तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ।।166।।
hohiṃ bipra basa kavan bidhi kahahu kṛpā kari sou | tumha taji dīnadayāla nija hitū na dekhauṃ kouṃ ||166||
कृपया मे ब्रूहि—केन उपायेन ब्राह्मणो भवदधीनो भवेत्? दीनदयालो त्वत्तोऽन्यं न पश्यामि, यः मम निःश्रेयसं साधयेत्॥
Verse 349 (चौपाई)
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।। अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।। मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।। आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।। जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू।। सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।। बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।। जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।।
sunu nṛpa bibidha jatan jaga māhīṁ. kaṣṭa-sādhya puni hohiṁ ki nāhīṁ.. ahei eka ati sugama upāī. tahāṁ parantu eka kaṭhināī.. mama ādhīna juguti nṛpa soī. mora jāba tava nagara na hoī.. āju lageṁ aru jaba teṁ bhayūṁ. kāhū ke gṛha grāma na gayūṁ.. jaũ na jāũ tava hoi akājū. banā āi asamañjasa ājū.. suni mahīsa बोलेu mṛdu bānī. nātha nigama asi nīti bakhānī.. baṛe saneha laghunha para karahīṁ. giri nija sirani sadā tṛna dharahīṁ.. jaladhi agādha mauli baha phenū. santata dharani dharata sira renū..
नृप शृणु जगति बहूनि उपायान् प्रयतन्ते। कष्टसाध्याः ते सिद्ध्यन्ति वा न इति न ज्ञायते। अस्ति एकः अतिसुगमः उपायः। तत्र तु एका कठिनता अस्ति। सा युक्तिः नृप मम अधीना। यदि अहं गच्छामि तव नगरं मम न भविष्यति। अद्यपर्यन्तं यदा अभवं तदा। कस्यापि गृहं ग्रामं न गतवानस्मि। यदि न गच्छामि तव अकार्यं भविष्यति। अतः अद्य असमञ्जसः आगतः। इदं श्रुत्वा महीशः मृदुवाचा अवदत्। नाथ निगमः एवं नीतिं वदति। महान्तः लघुभ्यः स्नेहं कुर्वन्ति। गिरिः स्वशिरसि सदा तृणं धरति। अगाधः सागरः फेनं शिरसि वहति। धरणी सदा रेणुं शिरसि धरति।
Verse 350 (दोहा/सोरठा)
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल। मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।
asa kahi gahe naresa pada svāmī hohu kṛpāla | mohi lāgi dukha sahia prabhu sajjana dīnadayāla ||167||
इति वदन् स नृपपादौ जग्राह—“स्वामिन् प्रभो, प्रसादं कुरु। मदर्थं, हे दीनानुकम्पिन् उदार, एतत् दुःखं सहस्व॥”
Verse 351 (चौपाई)
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।। सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।। अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।। जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।। जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई।। अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।। पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।। जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।।
jāni nṛpahi āpana ādhīnā | bolā tāpasa kapaṭa prabīnā || satya kahauṁ bhūpati sunu tohī | jaga nāhina durlabha kachu mohī || avasi kāja maiṁ karihauṁ torā | mana tana bacana bhagata taiṁ morā || joga juguti tapa mantra prabhāū | phalai tabahiṁ jaba kari-a durāū || jauṁ naresa maiṁ karauṁ rasoī | tumha parusahu mohi jāna na koī || anna so joi-joi bhojana karaī | soi-soi tava āyasu anusaraī || puni tin̐ha ke gṛha jev̐i joū | tava basa hoi bhūpa sunu soū || jāi upāya racahu nṛpa ehū | saṁbata bhari saṅkalapa karehū ||
नृपं स्वाधीनं ज्ञात्वा तापसः कपटप्रवीणः अभाषत। सत्यं वदामि नृपते शृणु मे जगति न किञ्चिद्दुर्लभं मम। अवश्यं तव कार्यं करिष्यामि मनसा वाचा कर्मणा भक्तोऽस्मि ते। योगो युक्तिस्तपो मन्त्रप्रभावः फलति तदैव यदा गोप्यते। यदि नृप सुधापचो भवामि त्वमेव भुञ्जीथा मम हस्तान्नं न कश्चिज्जानातु। यो यदन्नं भुङ्क्ते स स तवाज्ञामनुसरति। पुनश्च ये तेषां गृहेषु भुञ्जते तेऽपि नृप तव वशं गच्छन्ति। गच्छ नृप उपायं विधत्स्व संवत्सरं यावत्संकल्पं कुरु।
Verse 352 (दोहा/सोरठा)
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार। मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार।।168।।
nita nūtana dvija sahasa sata barehu sahita parivāra | maiṁ tumhare saṅkalapa lagi dinahiṁ kariba jevanāra ||168||
प्रतिदिनं नवतया सहस्रं शतं च ब्राह्मणान् स्वकुटुम्बैः सह भोजय। तव व्रतनिश्चयस्य सिद्ध्यर्थं दिवाभोजनव्यवस्थां अहं करिष्यामि॥
Verse 353 (चौपाई)
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।। करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा।। और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ।। तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।। तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना।। मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।। गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।। मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता।।
ehi bidhi bhūpa kaṣṭa ati thorẽ। hoihahiṁ sakala bipra basa torẽ॥ karihahiṁ bipra homa makha sevā। tehiṁ prasaṅga sahajehiṁ basa devā॥ aura eka tohi kahauṁ lakhāū। maiṁ ehi beṣa na āuba kāū॥ tumhare uparohita kahuँ rāyā। hari ānaba maiṁ kari nija māyā॥ tapabala tehi kari āpu samānā। rakhihauँ ihā̃ baraṣa paravānā॥ maiṁ dhari tāsu beṣu sunu rājā। saba bidhi tora saṁvāraबा kājā॥ gai nisi bahuta sayana aba kīje। mohi tohi bhūpa bheṁṭa dina tīje॥ maiṁ tapabala tohi turaga sametā। pahū̃cehauँ sovatahi niketā॥
एवं नृप तव कष्टं स्वल्पं भविष्यति सर्वे ब्राह्मणास्तव वशं गमिष्यन्ति। होमयज्ञसेवाः करिष्यन्ति तत्प्रसङ्गेण देवाः स्वयमेव वशं गमिष्यन्ति। अपरं च ते वदामि स्पष्टमनेन वेषेण न कस्यापि पुरतो भविष्यामि। तव पुरोहितं हरिष्यामि नृप स्वमायया। तपोबलेन तमात्मनि समावेश्य वर्षं यावतिह स्थापयिष्यामि। तस्यैव वेषं धृत्वा नृप शृणु सर्वप्रकारेण तव कार्यं सम्पादयिष्यामि। रात्रिः सुगता शयनं कुरु तृतीये दिवसे नृप मया सह मेलनं भविष्यति। तपोबलेन तवाश्वेन सह त्वां सुप्तमेव निकेतनं प्रापयिष्यामि।
Verse 354 (दोहा/सोरठा)
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि। जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि।।169।।
maĩ āuba soi beṣu dhari pahicānehū taba mohi | jaba ekānta bolāi saba kathā sunāvaũ tohi ||169||
तस्मिन्नेव वेषेऽहं आगमिष्यामि; तदा मां त्वं प्रत्यभिजानीहि। यदा त्वां रहसि पृथक् आह्वयामि, तदा सर्वं वृत्तान्तं ते कथयिष्यामि॥
Verse 355 (चौपाई)
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।। श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।। कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।। परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।। तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।। प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।। तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।। जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।।
sayana kīnha nṛpa āyasu mānī. āsana jāi baiṭha chala-gyānī.. śramita bhūpa nidrā ati āī. so kimi sova soca adhikāī.. kālaketu nisi-cara tahaṁ āvā. jehiṁ sūkāra hoi nṛpahi bhulāvā.. parama mitra tāpasa nṛpa kerā. jānai so ati kapaṭa ghanerā.. tehi ke sata suta aru dasa bhāī. khala ati ajaya deva dukhadāī.. prathamahĩ bhūpa samara saba māre. bipra santa sura dekhi dukhāre.. tehiṁ khala pāchila bayaru saṁbharā. tāpasa nṛpa mili mantra bicārā.. jehi ripu chaya soi racenhĩ upāū. bhāvī basa na jāna kachu rāū..
नृपो आज्ञां प्रतिपद्य शयानः छलज्ञः आसने उपविष्टः। श्रान्तस्य नृपस्य निद्राऽतिशयेनागच्छत्कथं तु सुप्तः स्यात्सन्तापो ह्यतिवर्धते। तत्र कालकेतुर्निशाचर आगच्छत्स सूकररूपेण नृपं भ्रामयितुं। स परममित्रत्वेन तापसवेषेण नृपस्य आसीत्तं च घनीभूतकपटं विद्धि। तस्य सप्त पुत्राः दश च भ्रातरः आसन्दुष्टाः सुरदुःखदायकाः अजेयाश्च। प्रथमं नृपः समरे सर्वानहनत्ब्राह्मणाः साधवः सुराश्च दृष्ट्वा दुःखिताः। स दुष्टः पूर्ववैरं स्मृत्वा तापसेन सह नृपेण मन्त्रं व्याचचक्षे। शत्रोर्विनाशायोपायं व्यधत्स्तथापि भाव्यवशान्नृपो न किञ्चिदप्यजानात्।
Verse 356 (दोहा/सोरठा)
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।
ripu tejasī akela api laghu kari gani-a na tāhu | ajahũ det dukha rabi sasihi sira avaseṣita rāhu ||170||
एकाकी अपि बलसम्पन्नः शत्रुः क्षुद्र इति न गणनीयः। अद्यापि राहोः शेषः उच्चैः स्थितौ सूर्यचन्द्रमसौ पीडयति॥
Verse 357 (चौपाई)
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।। मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई।। अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।। परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।। कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई।। तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।। भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।। नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।।
tāpasa nṛpa nija sakhahi nihārī | haraṣi mileu uṭhi bhayu sukhārī || mitrahi kahi saba kathā sunāī | jātudhāna bolā sukha pāī || aba sādheuṁ ripu sunahu naresā | jauṁ tumha kīnha mora upadesā || parihari soca rahahu tumha soī | binu auṣadha biādhi bidhi khoī || kula sameta ripu mūla bahāī | cauthē divasa milaba maiṁ āī || tāpasa nṛpahi bahuta paritoṣī | calā mahā-kapaṭī ati-roṣī || bhānu-pratāpahi bāji sametā | pahuṁcāesi chana mājha niketā || nṛpahi nāri paiṁ sayana karāī | haya-gṛhaṁ bāṁdhesi bāji banāī ||
तापसः नृपस्य मित्रं दृष्ट्वा हर्षेणोत्थाय मिलितः प्रीतिमानभवत्। मित्रमिति कथय्य सर्वं वृत्तान्तं न्यवेदयत्ततो राक्षसः प्रीतमनाः अभाषत। अद्य शत्रुं साधितवानस्मि नृप शृणु यदि ममोपदेशमनुसृष्टवानसि। शोकं त्यक्त्वा शयस्व औषधमन्तरेण विधाता व्याधिं नाशयति। कुलेन सह शत्रुर्मूलेनोन्मूलितः चतुर्थे दिवसे पुनर्मेलनं भविष्यति। इति नृपं प्रीतिमानं कृत्वा महाकपटी क्रोधेण समन्वितः प्रत्यगच्छत्। भानुप्रतापमश्वेन सह क्षणेन निकेतनं प्रापयामास। नृपं स्त्रीपार्श्वे शयानं विधाय अश्वं तुरगगृहे बबन्ध।
(1) विनय का शुद्ध अर्थ: बाह्य झुकना नहीं, अहं-त्याग और सत्य-आश्रय की तैयारी—राजा का भूमि पर बैठना ‘दास्य-भाव’ का बीज है। (2) विवेक-दीप: ‘सुबेष’ और वाणी की मधुरता से सत्य नहीं तय होता; कपटमुनि के माध्यम से तुलसी चेताते हैं कि माया अक्सर धर्म-भाषा में आती है। (3) भय से भक्ति नहीं, शरण से भक्ति: ब्राह्मण-कोप/लोक-मत का आतंक साधक को भ्रमित करता है; वास्तविक रक्षा हरि-आश्रय में है। (4) कामना-ग्रन्थि का अनावरण: अमरत्व-राज्य की चाह दिखाती है कि साधना में भी भोग-इच्छा छिपी रह सकती है—इसे पहचानना ही पहली सीढ़ी है। (5) कथा-श्रवण की पात्रता: कपट का परीक्षण, विनय का परिष्कार, और अंतःकरण की निर्मलता—यही ‘सोपान-आरम्भ’ में भक्ति के जन्म का आधार है।
इस अंश में रस-प्रधानता ‘नीति-रसा’ और ‘भय-करुण’ के संयोग से बनती है, जिसके ऊपर ‘शान्त’ का लक्ष्य-छाया रहती है। राजा की विनय, मृदु-वाणी, और अमरत्व-राज्य की चाह एक साधक-मन की कामना-ग्रन्थि दिखाती है; वहीं ‘कपटमुनि’ का मधुर भाषण, शास्त्रीय-उद्धरण-सा तप-प्रताप-वर्णन, और ब्राह्मण-कोप का भय—यह सब माया के उपदेशक-रूप को उजागर करता है। तुलसी यहाँ लोक-मान्यता (लोकमान्यता अनल सम) और बाह्य-सुबेष के धोखे (तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं) को तीखे व्यंग्य में रखकर ‘विवेक’ जगाते हैं। बालकाण्ड की सोपान-भूमि यही है: कथा-श्रवण से पहले पात्रता—कपट का परीक्षण, विनय का परिष्कार, और हरि-आश्रय की अनिवार्यता का बोध।
आरम्भ में ‘नीति-रसा’ का संयमित स्वर—राजा की विनय, आज्ञापालन और शिष्टाचार (मृदु-वाणी, सेवा-भाव) से वातावरण स्थिर व मर्यादित है। फिर ‘भय-करुण’ का उदय—कपटमुनि के मधुर परन्तु छल-भरे उपदेश, तप-प्रताप के शास्त्रीय-उद्धरण-जैसे वर्णन, और ‘ब्राह्मण-कोप/लोक-मान्यता’ के डर से राजा के भीतर आशंका, दीनता और आत्मरक्षा-प्रवृत्ति बढ़ती है। मध्य भाग में ‘मोह-रसा’ की छाया—अमरत्व-राज्य/दीर्घ-भोग की कामना साधक-मन की कामना-ग्रन्थि बनकर उभरती है, विवेक को ढँकती है। अंततः लक्ष्य-छाया ‘शान्त’ की ओर संकेत—तुलसी का व्यंग्यात्मक विवेक-बोध (बाह्य-सुबेष का धोखा, लोक-मत का अनल) मन में जागरण कराता है कि स्थिर आश्रय केवल हरि-शरणागति है; कथा-श्रवण की पात्रता का बीज यहीं पड़ता है।
परम्परागत समझ में यह अंश ‘कपट-भेद’ और ‘विवेक-जागरण’ का फल देता है—बाह्य-वेष, मधुर-वाणी, और लोक-मान्यता के दबाव से साधक बचता है; गुरु/द्विज-अपमान से निवृत्ति और हरि-आश्रय की दृढ़ता बढ़ती है।
सामान्य सत्संग-परम्परा में कपट-निवारण/शरणागति हेतु “श्रीराम जय राम जय जय राम” या “राम राम” नाम-संपुट जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परम्पराएँ विनय-स्थलों पर “सियाराम” का संकीर्तन-संपुट भी रखती हैं।
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