Adhyaya 189
Vana ParvaAdhyaya 189152 Verses

Adhyaya 189

कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः (Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yuga-Dharma Upadeśa (Prophecy and Royal Ethics Episode)

This chapter continues Mārkaṇḍeya’s account of cyclical time and social restoration. He describes a future re-establishment of order: the protection of the earth for the twice-born, the performance of a great horse-sacrifice, and the installation of auspicious boundaries (maryādā) said to be primordial in origin. The narrative includes a program of security and pacification—suppression of predatory bands and the placement of emblems and weapons in conquered regions as signs of stabilized rule—culminating in the decline of adharma and the increase of dharma when the Kṛta age is attained. Mārkaṇḍeya outlines markers of societal flourishing: ritual activity, public works, thriving agriculture across seasons, and a varṇa-based division of duties presented as normative for that age. The discourse then pivots to direct counsel: Yudhiṣṭhira is urged to resolve dharma-doubt by aligning himself with dharma, practicing compassion, protecting subjects as one’s own children, honoring ancestors and deities, correcting errors through proper giving, and avoiding contempt toward Brahmins. The frame closes with Yudhiṣṭhira’s assent and the listeners’ astonishment at the purāṇic instruction.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष महर्षि मार्कण्डेय काल-चक्र का द्वार खोलते हैं—चारों युगों की वर्ष-संख्या, ब्रह्मा के दिन-रात का मान, और वह अद्भुत तथ्य कि प्रलय के महाशून्य में भी एक साक्षी बना रहता है। → वर्णाश्रम-धर्म के ढहने का चित्र उभरता है: कलियुग में क्षत्रिय-वैश्य विकर्म में पड़ते हैं, अल्पायु और स्वल्पबल हो जाते हैं; ब्राह्मण बाह्य वेश से मुनि-सा कपट धारण कर जीविका के लिए अधर्म का सहारा लेते हैं। समाज का ताना-बाना उलटता जाता है और नैतिक दिशा धुँधली पड़ती जाती है। → प्रलय का दृश्य: जब लोक देव-दानव-समेत शून्य हो जाते हैं, तब भी मार्कण्डेय का दीर्घजीवी अस्तित्व बना रहता है—और वे उस परम रहस्य के निकट पहुँचते हैं जहाँ ब्रह्मा के दिन-रात में समस्त विश्व का परिवर्तन होता है। इस विराट विनाश के बीच एक दिव्य बालक का दर्शन होता है—लाल-लाल तलवों और कोमल अँगुलियों वाला—जिसे मार्कण्डेय श्रद्धा से मस्तक पर उठाकर प्रणाम करते हैं। → महर्षि काल-मान (युग, सहस्रयुग, ब्राह्म-अहः) का विधान स्थापित करते हैं और कलियुग के लक्षणों द्वारा यह बोध देते हैं कि धर्म का क्षय भी नियति के चक्र में आता है; फिर भी साक्षी-चेतना और परम सत्ता का संकेत प्रलय में भी बना रहता है। → दिव्य बालक का रहस्य—वह कौन है और प्रलय के पार किस सत्य की ओर संकेत करता है—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न हुक है 7 अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको ४ (02०8 कुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्‌ । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिषिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया--

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ବିନୟସମ୍ପନ୍ନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯଶସ୍ବୀ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ ମୁନିଙ୍କୁ ପୁନର୍ବାର ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 2

नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह सम: कश्रिदायुष्मान्‌ दृश्यते तव,“महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता

ହେ ମହାମୁନି! ଆପଣ ଯୁଗସହସ୍ରାନ୍ତରେ ଘଟୁଥିବା ଅନେକ ମହାପ୍ରଳୟର ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖିଛନ୍ତି; ଏହି ଲୋକରେ ଆପଣଙ୍କ ସମାନ ଦୀର୍ଘାୟୁ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ।

Verse 3

वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेषछ्ठिनम्‌ । न ते$स्ति सदृश: ककश्रिदायुषा ब्रह्मवित्तम,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है

ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହର୍ଷେ! ପରମେଷ୍ଠୀ ମହାତ୍ମା ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି, ଆୟୁଷ୍ୟରେ ଆପଣଙ୍କ ସମାନ କେହି ନାହିଁ।

Verse 4

अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन्‌ देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे,ब्रह्म! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं

ହେ ବିପ୍ର! ପ୍ରଳୟକାଳରେ ଏହି ଲୋକ—ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ସହିତ—ଦେବ ଓ ଦାନବଶୂନ୍ୟ ହୋଇଯାଏ; ସେତେବେଳେ କେବଳ ଆପଣ ହିଁ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ସନ୍ନିଧିରେ ରହି ତାଙ୍କୁ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ସେବା କରନ୍ତି।

Verse 5

प्रलये चापि निर्वत्ति प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेक: सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପ୍ରଳୟ ଶାନ୍ତ ହେଲାପରେ ଏବଂ ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମା ଜାଗ୍ରତ ହେଲେ, ହେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି, ସୃଷ୍ଟି ହେଉଥିବା ସମସ୍ତ ଭୂତଜୀବକୁ ଏଠାରେ କେବଳ ଆପଣ ହିଁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖନ୍ତି।

Verse 6

चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत्‌ परमेछ्िना । वायुभूता दिश: कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्तत:,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବିପ୍ରର୍ଷି, ପ୍ରଳୟ ପରେ ପରମେଷ୍ଠୀ ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମା ଜାଗ୍ରତ ହୋଇ ସମସ୍ତ ଦିଗକୁ ବାୟୁରୂପ କରନ୍ତି ଏବଂ ସେହି ବାୟୁଦ୍ୱାରା ଜଳରାଶିକୁ ଏଠି-ସେଠି ଛିଟାଇ ଶୁଷ୍କ ସ୍ଥାନ ସୃଷ୍ଟି କରନ୍ତି। ତାପରେ ସେ ଯଥାବିଧି ଚାରି ପ୍ରକାର ଜୀବ—ଜରାୟୁଜ, ଅଣ୍ଡଜ, ସ୍ୱେଦଜ ଓ ଉଦ୍ଭିଜ୍ଜ—ସୃଷ୍ଟି କରନ୍ତି; ସେଇ ଆଦିସୃଷ୍ଟିକୁ ଆରମ୍ଭରେ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ କେବଳ ଆପଣ ହିଁ ଦେଖନ୍ତି।

Verse 7

त्वया लोकगुरु: साक्षात्‌ सर्वलोकपितामह: । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात्‌ लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्‌की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଆପଣ ତାଙ୍କୁ ନିମିତ୍ତ କରି ଏକାଗ୍ର ସମାଧିଦ୍ୱାରା ସାକ୍ଷାତ୍ ଲୋକଗୁରୁ, ସର୍ବଲୋକର ପିତାମହ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କୁ ଆରାଧନା କରିଛନ୍ତି।

Verse 8

स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश: । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात्‌ लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्‌की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବିପ୍ର, ଆପଣ ଯାହା ଅନେକଥର ସାଧନ କରିଛନ୍ତି ତାହାର ପ୍ରମାଣ ଆପଣ ନିଜେ। ଘୋର ତପସ୍ୟାରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଆପଣ ତପୋବଳଦ୍ୱାରା ସୃଷ୍ଟିଶକ୍ତିଧର ପ୍ରଜାପତିମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କରିଛନ୍ତି।

Verse 9

नारायणाड्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेडतिपठ्यसे । भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्व विश्वकृत्‌,आप भगवान्‌ नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्‌का अनेक बार साक्षात्कार किया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଆପଣ ନାରାୟଣସଦୃଶ ବୋଲି ପ୍ରଖ୍ୟାତ, ଏବଂ ପରଲୋକରେ ଆପଣଙ୍କ ମହିମା ସର୍ବତ୍ର ପାଠିତ ହୁଏ। ବୈରାଗ୍ୟ ଓ ଅଭ୍ୟାସରୁ ଲଭ୍ୟ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟିଦ୍ୱାରା, ଯୋଗବଳେ ହୃଦୟକମଳର କର୍ଣ୍ଣିକାକୁ ଉଦ୍ଘାଟିତ କରି, ବିଶ୍ୱକର୍ତ୍ତା ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କୁ ଆପଣ ଅନେକଥର ସାକ୍ଷାତ୍ କରିଛନ୍ତି।

Verse 10

कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्यण: कामरूपिण: । रत्नालंकारयोगाशभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा,आप भगवान्‌ नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्‌का अनेक बार साक्षात्कार किया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୂର୍ବେ ତୁମେ ବୈରାଗ୍ୟ ଓ ଅଭ୍ୟାସରୁ ଜନିତ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟିଦ୍ୱାରା ହୃଦୟ-ପଦ୍ମର କର୍ଣ୍ଣିକାର ସେଇ ଅଦ୍ଭୁତ, ଅଲୌକିକ ଉଦ୍ଘାଟନ ଦେଖିଥିଲ—ଯାହା ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ରୂପ ଧାରଣ କରୁଥିବା ସର୍ବବ୍ୟାପୀ ବ୍ରହ୍ମଙ୍କ ସାକ୍ଷାତ୍କାରକୁ ପ୍ରକାଶ କରେ, ରତ୍ନମୟ ତେଜରେ ଭୂଷିତ ଜଗତ୍କାରଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ। ତେଣୁ ନାରାୟଣଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ବସୁଥିବା ଭକ୍ତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ପରଲୋକରେ ସର୍ବତ୍ର ତୁମ ମହିମା ଗାୟନ ହୁଏ।

Verse 11

तस्मात्‌ तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । नत्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात्‌ परमेछ्चिन:,इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्ष! इसमें भगवान्‌ परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है

ଏହିହେତୁ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ ଋଷିବର! ସମସ୍ତଙ୍କ ଅନ୍ତ କରୁଥିବା ମୃତ୍ୟୁ ଓ ଦେହକୁ ଜର୍ଜର କରୁଥିବା ଜରା—ଏ ଦୁହେଁ ତୁମକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରେନାହିଁ। ଏହା ପରମେଷ୍ଠୀ (ବ୍ରହ୍ମା)ଙ୍କ କୃପାପ୍ରସାଦର ଫଳ।

Verse 12

यदा नैवं रविनग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्ष नैवोर्वी शेष भवति किंचन,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମହାପ୍ରଳୟ ସମୟରେ ଯେତେବେଳେ ନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ରହେ, ନ ଅଗ୍ନି, ନ ବାୟୁ, ନ ଚନ୍ଦ୍ର; ନ ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ଶେଷ ରହେ, ନ ପୃଥିବୀ—କିଛିମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ରହେନାହିଁ। ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତ ଚରାଚର ଜଗତ୍ ସେଇ ଏକାର୍ଣ୍ଣବର ଜଳରେ ଡୁବି ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଯାଏ; ଦେବ ଓ ଅସୁର ନଶ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି; ବଡ଼ ବଡ଼ ନାଗମାନେ ମଧ୍ୟ ସଂହାରିତ ହୁଅନ୍ତି। ସେ ସମୟରେ ପଦ୍ମ ଓ ଉତ୍ପଳରେ ନିବାସ ଓ ଶୟନ କରୁଥିବା, ଅମିତାତ୍ମା ସର୍ବଭୂତେଶ୍ୱର ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ରହି କେବଳ ତୁମେ ହିଁ ତାଙ୍କୁ ଉପାସନା କର।

Verse 13

तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजड़मे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେତେବେଳେ ଏହି ଲୋକ ଏକାର୍ଣ୍ଣବ ହୋଇଯାଏ ଓ ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ସବୁ ନଶ୍ଟ ହୁଏ; ଯେତେବେଳେ ଦେବ-ଅସୁର ଗଣ ଧ୍ୱଂସ ହୁଏ ଓ ମହାନାଗମାନେ ମଧ୍ୟ ସମୂଳେ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି—ସେଇ ମହାପ୍ରଳୟରେ ନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ରହେ, ନ ଅଗ୍ନି, ନ ବାୟୁ, ନ ଚନ୍ଦ୍ର; ନ ଅନ୍ତରିକ୍ଷ, ନ ପୃଥିବୀ—କିଛିମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ରହେନାହିଁ। ତେବେ ସମସ୍ତ ଚରାଚର ସେଇ ଏକ ଜଳରାଶିରେ ଡୁବି ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଯାଏ। ସେ ସମୟରେ ଅମିତାତ୍ମା ବ୍ରହ୍ମା ମାତ୍ର ଅବସ୍ଥିତ ରହନ୍ତି, ଏବଂ ତାଙ୍କର ଭକ୍ତି-ଉପାସନା ହିଁ ଶେଷ ରହିଯାଏ।

Verse 14

शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम्‌ | त्वमेक: सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत्‌ उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं

ପଦ୍ମ ଓ ଉତ୍ପଳର ନିକେତନରେ ଶୟନ କରୁଥିବା, ଅମିତାତ୍ମା ସର୍ବଭୂତେଶ୍ୱର ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କୁ ତୁମେ ଏକା ହିଁ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ ରହି ସେବା-ଉପାସନା କର।

Verse 15

एतत्‌ प्रत्यक्षत: सर्व पूर्व वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम्‌,द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ

ହେ ଦ୍ୱିଜୋତ୍ତମ! ଏହି ସମସ୍ତ ପୁରାତନ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଆପଣଙ୍କୁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଅନୁଭବରେ ଜଣା। ତେଣୁ ସମସ୍ତଙ୍କର କାରଣ—କାଳ ଓ ପରିସ୍ଥିତି—ବ୍ୟାଖ୍ୟା କରୁଥିବା କଥା ଆପଣଙ୍କ ମୁଖରୁ ଶୁଣିବାକୁ ମୁଁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 16

अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित्‌ सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'

ହେ ଦ୍ୱିଜୋତ୍ତମ, ବିପ୍ରବର! ଅନେକ ଯୁଗରେ ଆପଣ ଏକା ହୋଇ ବାରମ୍ବାର ଅନେକ କିଛି ଦେଖି ଅନୁଭବ କରିଛନ୍ତି। ସମସ୍ତ ଲୋକରେ, କୌଣସି କାଳରେ ମଧ୍ୟ, ଆପଣଙ୍କୁ ଅଜଣା ଏମିତି କିଛି ନାହିଁ।

Verse 17

मार्कण्डेय उदाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च

ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଭଲ, ଶୁଣ; ମୁଁ ତୁମକୁ ଏହା ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବି। ପ୍ରଥମେ ସ୍ୱୟଂଭୂ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ, ଆଦିପୁରୁଷଙ୍କୁ—ଯିଏ ଶାଶ୍ୱତ ଓ ଅବ୍ୟୟ—ନମସ୍କାର କରି ମୁଁ ଆରମ୍ଭ କରୁଛି।

Verse 18

अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघत्र पीतवासा जनार्दन:

ଅବ୍ୟକ୍ତ, ଅତିସୂକ୍ଷ୍ମ, ନିର୍ଗୁଣ ଏବଂ ତଥାପି ସମସ୍ତ ଗୁଣର ଆଧାର—ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର, ପୀତବାସ ଧାରଣ କରିଥିବା ସେଇ ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଏହି।

Verse 19

एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत्‌ प्रभु: । अचिन्त्यं महदाश्चर्य पवित्रमिति चोच्यते

ସେଇ କର୍ତ୍ତା ଓ ସେଇ ବିକର୍ତ୍ତା—ଯିଏ ଫଳକୁ ପରିବର୍ତ୍ତନ କରି ବିଧାନ କରନ୍ତି। ସେ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କର ଅନ୍ତରାତ୍ମା, ଭୂତକୃତ୍, ପ୍ରଭୁ। ତାଙ୍କୁ ଅଚିନ୍ତ୍ୟ, ମହା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଓ ପବିତ୍ର ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 20

मार्कण्डेयजी बोले--राजन! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान्‌ जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान्‌ आश्वर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ।। १७ -7१९ || अनादिनिधनं भूत॑ विश्वमव्ययमक्षयम्‌ | एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे,इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଅନାଦି ଓ ଅନନ୍ତ; ସେଇ ଏହି ବିଶ୍ୱ—ଅବ୍ୟୟ ଓ ଅକ୍ଷୟ। ସେଇ ଏକମାତ୍ର କର୍ତ୍ତା; ତାଙ୍କୁ ଅନ୍ୟ କେହି କର୍ତ୍ତା କରେନାହିଁ। ଏବଂ ପୁରୁଷାର୍ଥ-ପ୍ରାପ୍ତିରେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ କାରଣ।

Verse 21

यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न त॑ विदुः । सर्वमाश्नर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ଏହି ପୁରୁଷ ସତ୍ୟରେ ତତ୍ତ୍ୱକୁ ଜାଣେ, ତେବେ ବେଦମାନେ ମଧ୍ୟ ତାକୁ ‘ଜାଣି’ ପାରନ୍ତି ନାହିଁ; ତାହାର ଅବସ୍ଥା ଅତିସୂକ୍ଷ୍ମ ଓ ଅଗୋଚର। ହେ ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏ ସବୁ ନିଶ୍ଚୟ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟମୟ, କାରଣ ସେ ସଂସାର-ବ୍ୟବହାରରୁ ନିବୃତ୍ତ ହୋଇ ବିରକ୍ତିରେ ଅବସ୍ଥିତ।

Verse 22

चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत्‌ कृतं युगम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଚାରି ହଜାର ବର୍ଷକୁ ସେହି କୃତ (ସତ୍ୟ) ଯୁଗ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 23

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध: । चार हजार दिव्य वर्षोका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ।। २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହି ଯୁଗର ସନ୍ଧ୍ୟା ଶତ (ଦିବ୍ୟ) ବର୍ଷର; ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି। ଏହିପରି ଚାରି ହଜାର ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷକୁ ସତ୍ୟଯୁଗ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ଆରମ୍ଭ ଓ ଶେଷର ସନ୍ଧ୍ୟା-ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ପାଇଁ ଶତ-ଶତ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ ଯୋଗ କଲେ ମୋଟ ଅଠଚାଳିଶ ଶତ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ ହୁଏ। ତାପରେ ଏଠାରେ ତ୍ରେତାଯୁଗର ଅବଧି ତିନି ହଜାର (ଦିବ୍ୟ) ବର୍ଷ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।

Verse 24

तथा वर्षसहसे द्वे द्वापरं परिमाणत:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହିପରି ପରିମାଣ ଅନୁସାରେ ଦ୍ୱାପର ଯୁଗ ଦୁଇ ହଜାର ବର୍ଷର।

Verse 25

सहस्रमेकं वर्षाणां तत: कलियुगं स्मृतम्‌,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାହା ପରେ କଳିଯୁଗ ଏକ ହଜାର ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବୋଲି ସ୍ମୃତ। ତାହା ପରେ ତାହାର ସନ୍ଧ୍ୟା ଶତବର୍ଷ ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ମଧ୍ୟ ଶତବର୍ଷ ଘୋଷିତ। ଏହିପରି କଳିଯୁଗ ସମୁଦାୟ ବାରଶେ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ; ସନ୍ଧ୍ୟା ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶର ପ୍ରମାଣ ସମାନ ବୋଲି ଧାରଣ କର।

Verse 26

तस्य वर्षशतं संधि: संध्यांशश्व॒ ततः परम्‌ | संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो

ତାହାର (ଯୁଗର) ସନ୍ଧି ଶତବର୍ଷ, ଏବଂ ତାହା ପରେ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ମଧ୍ୟ ଶତବର୍ଷ। ସନ୍ଧି ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶର ପ୍ରମାଣ ସମାନ ବୋଲି ଧାରଣ କର।

Verse 27

क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम्‌ । एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता,कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है

କଳିଯୁଗ କ୍ଷୀଣ ହୋଇ ସମାପ୍ତ ହେଲେ ପୁନଃ କୃତ (ସତ୍ୟ) ଯୁଗ ପ୍ରବର୍ତ୍ତେ। ଏହିପରି ‘ବାରହଜାର’ (ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ) ନାମକ ଯୁଗଚକ୍ର—ଚତୁର୍ଯୁଗୀ—ପରିକୀର୍ତ୍ତିତ।

Verse 28

एतत्‌ सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाह्नतम्‌ । विश्व हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते

ଏହିପରି ସହସ୍ର-ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ତୃତ ଏହି ମହାନ୍ ବ୍ରାହ୍ମ (ବ୍ରହ୍ମ-ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ) ବର୍ଣ୍ଣନା ଉଦାହୃତ ହୋଇଛି। କାରଣ ବ୍ରହ୍ମଭବନରେ ଅବସ୍ଥିତ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱ ସର୍ବଦିଗରେ ଘୂରି ଘୂରି ପରିବର୍ତ୍ତିତ ହୁଏ।

Verse 29

अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ

କିନ୍ତୁ ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯୁଗାନ୍ତେ ଅଳ୍ପ ସମୟ ମାତ୍ର ଅବଶିଷ୍ଟ ଥିବାବେଳେ,

Verse 30

सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशो5नृतवादिन: । यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସହସ୍ର ବର୍ଷର ଶେଷେ ପ୍ରାୟ ସମସ୍ତ ମନୁଷ୍ୟ ଅନୃତବାଦୀ ହୋଇଯାନ୍ତି। ହେ ପାର୍ଥ! ସେ ସମୟରେ ଯଜ୍ଞ ମଧ୍ୟ କେବଳ ପ୍ରତିନିଧି-କର୍ମ ହୋଇଯାଏ, ଦାନ ମଧ୍ୟ ତେଣୁହି ପ୍ରତିନିଧିମାତ୍ର ରହିଯାଏ।

Verse 31

व्रतप्रतिनिधिश्वैव तस्मिन्‌ काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात्‌ यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं || २९-३० $ ।। ब्राह्मणा: शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जका:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ସମୟରେ ବ୍ରତମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କେବଳ ପ୍ରତିନିଧି-ଆଚାର ପ୍ରଚଳିତ ହୁଏ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଶୂଦ୍ରକର୍ମ କରନ୍ତି ଏବଂ ଶୂଦ୍ରମାନେ ଧନାର୍ଜନରେ ଲଗ୍ନ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 32

निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କଲିଯୁଗର ଶେଷ ଭାଗରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଯଜ୍ଞ ଓ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଛାଡ଼ିଦେବେ; ଦଣ୍ଡ ଓ ମୃଗଚର୍ମକୁ ମଧ୍ୟ ପରିତ୍ୟାଗ କରିବେ। ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଅଭକ୍ଷ୍ୟର ବିଚାର ଛାଡ଼ି ସେମାନେ ସବୁକିଛି ଖାଇବା-ପିଇବାକୁ ଲାଗିବେ। ତାତ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଜପରୁ ଦୂରେ ହଟିବେ, ଶୂଦ୍ରମାନେ ବୈଦିକ ମନ୍ତ୍ରଜପରେ ଲଗ୍ନ ହେବେ।

Verse 33

ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्न॒ भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କଲିଯୁଗରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସର୍ବଭକ୍ଷୀ ହେବେ; ଯାହା ମିଳିବ ସେହି ଖାଇବେ। ତାତ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଜପହୀନ ହେବେ ଏବଂ ଶୂଦ୍ରମାନେ ଜପପରାୟଣ ହେବେ।

Verse 34

विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत्‌ । बहवो म्लेच्छराजान: पृथिव्यां मनुजाधिप,नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯେତେବେଳେ ଲୋକଙ୍କର ଭାବନା ଓ ଆଚରଣ ବିପରୀତ ହୋଇଯାଏ, ସେହିଟା ହିଁ କ୍ଷୟର ପୂର୍ବଲକ୍ଷଣ। ହେ ମନୁଜାଧିପ! ସେ ସମୟରେ ପୃଥିବୀରେ ବହୁ ମ୍ଲେଚ୍ଛ ରାଜା ଶାସନ କରିବାକୁ ଲାଗନ୍ତି।

Verse 35

मृषानुशासिन: पापा मृषावादपरायणा: । आन्ध्रा: शका: पुलिन्दाश्न यवनाश्न नराधिपा:,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଛଳରେ ଶାସନ କରୁଥିବା, ପାପୀ ଓ ମିଥ୍ୟାରେ ଆସକ୍ତ ରାଜାମାନେ ଉଦୟ ହେବେ। ସେ ସମୟରେ ଆନ୍ଧ୍ର, ଶକ, ପୁଲିନ୍ଦ ଓ ଯବନ ରାଜା ହେବେ।

Verse 36

काम्बोजा बाह्लिका: शूरास्तथा5<5भीरा नरोत्तम | न तदा ब्राह्मण: कश्रनित्‌ स्वधर्ममुपजीवति,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନରୋତ୍ତମ! ସେ ସମୟରେ କାମ୍ବୋଜ, ବାହ୍ଲୀକ ଓ ତଥା ଶୂର ଆଭୀରମାନେ ଶାସନ କରିବେ। ତେବେ କୌଣସି ବ୍ରାହ୍ମଣ ନିଜ ସ୍ୱଧର୍ମରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଇ ପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 37

क्षत्रियाश्षापि वैश्याश्ष विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:,नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ! କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ବୈଶ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ବିକର୍ମରେ ପଡ଼ି ନିଜ ନିଜ ଧର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରିବେ। ଲୋକେ ଅଲ୍ପାୟୁ ହେବେ; ତାଙ୍କର ବଳ କମିବ, ତେଜ ଓ ପରାକ୍ରମ ମଧ୍ୟ ହ୍ରାସ ପାଇବ।

Verse 38

अल्पसाराल्पदेहाश्व॒ तथा सत्याल्पभाषिण: । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिश:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात्‌ आप कहकर सम्बोधन करेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟମାନେ ଅଲ୍ପସାର ଓ ଦୁର୍ବଳ ଦେହବାନ୍ ହେବେ, ତାଙ୍କର କଥାରେ ସତ୍ୟର ଅଂଶ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅଳ୍ପ ରହିବ। ଅନେକ ଜନପଦ ପ୍ରାୟ ଜନଶୂନ୍ୟ ହେବ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦିଗ ମୃଗ ଓ ହିଂସ୍ର ବ୍ୟାଳରେ ଆବୃତ ହେବ।

Verse 39

युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिन: । भोवादिनस्तथा शाद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिन:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात्‌ आप कहकर सम्बोधन करेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଗାନ୍ତ ସମୀପ ଆସିଲେ ଅନୁଭବ ବିନା ଲୋକେ ବ୍ୟର୍ଥରେ ବ୍ରହ୍ମବାଦ କହିବେ। ଶୂଦ୍ରମାନେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ‘ଭୋ’ ବୋଲି ଡାକିବେ, ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଶୂଦ୍ରମାନଙ୍କୁ ‘ଆର୍ୟ’ ବୋଲି ସମ୍ବୋଧନ କରିବେ।

Verse 40

युगान्ते मनुजव्याप्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्न सर्वगन्धा विशाम्पते,पुरुषसिंह राजन! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ଯୁଗାନ୍ତେ ନାନାପ୍ରକାର ଜୀବଜନ୍ତୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଅନ୍ତି। ହେ ପ୍ରଜାପତି, ହେ ପୁରୁଷସିଂହ, ହେ ରାଜନ—ସେତେବେଳେ ଘ୍ରାଣଶକ୍ତି ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସୁଗନ୍ଧ ଯଥାର୍ଥରେ ଅନୁଭୂତ ହୁଏ ନାହିଁ; ସମସ୍ତ ଗନ୍ଧର ପ୍ରଭାବ ମ୍ଲାନ ହୋଇଯାଏ।

Verse 41

रसाश्च मनुजव्यात्र न तथा स्वादुयोगिन: । बहुप्रजा हस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता: । मुखे भगा: स्त्रियो राजन्‌ भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्‌! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ରସଯୁକ୍ତ ଖାଦ୍ୟପଦାର୍ଥମାନେ ମଧ୍ୟ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ମାଧୁର୍ୟ ଓ ହିତକର ସ୍ୱାଦ ଧାରଣ କରିବେ ନାହିଁ। ହେ ରାଜନ! ଯୁଗକ୍ଷୟେ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ହ୍ରସ୍ୱଦେହୀ, ବହୁସନ୍ତାନପ୍ରସୂ, କିନ୍ତୁ ଶୀଳ-ସଦାଚାରବିହୀନ ହେବେ; ଏବଂ ସେମାନେ ମୁଖେ ସଦା କାମବିଷୟକ, ବ୍ୟଭିଚାରସମ୍ବନ୍ଧୀୟ କଥା ହିଁ କହିବେ।

Verse 42

अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्षतुष्पथा: । केशशूला: स्त्रियो राजन्‌ भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्‌! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ରାଜନ! ଯୁଗକ୍ଷୟେ ଜନପଦମାନେ ଅଟ୍ଟଶୂଳରେ ବିଦ୍ଧ ହୋଇଥିବା ପରି ବ୍ୟଥିତ ହେବେ; ଚତୁଷ୍ପଥମାନେ ‘ଶିବଶୂଳ’ ସଦୃଶ ଅପଶକୁନଚିହ୍ନରେ ଚିହ୍ନିତ ହେବେ; ଏବଂ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ‘କେଶଶୂଳ’ ପୀଡ଼ାରେ ଭୁଗିବେ। ଏହିସବୁ ଯୁଗାନ୍ତର ଦୁଃଖଦ ଲକ୍ଷଣ।

Verse 43

अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ଜନାଧିପ! ଯୁଗାନ୍ତେ ଗାଈମାନେ ଅତ୍ୟଳ୍ପ ଦୁଧ ଦେବେ। ବୃକ୍ଷମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଳ୍ପ ପୁଷ୍ପ-ଫଳ ଧାରଣ କରିବେ; ଶୁଭ ପକ୍ଷୀଠାରୁ କାଉମାନେ ଅଧିକ ବସିବେ। ଏହିପରି ଶ୍ରୀ ଓ ଶୌଚର କ୍ଷୟ ହୋଇ ଅଶୁଭର ପ୍ରାବଳ୍ୟ ବଢ଼ିବ।

Verse 44

ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम्‌ । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्नन्ति वै द्विजा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ପୃଥିବୀପାଳ! ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାର କଳଙ୍କରେ ଲିପ୍ତ ଏବଂ ମିଥ୍ୟା ନିନ୍ଦା କରୁଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଦ୍ୱିଜମାନେ ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି। ଏହା ଧର୍ମକ୍ଷୟର ଲକ୍ଷଣ—ଲୋଭବଶେ ଧର୍ମଧାରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ପତନ ପାଆନ୍ତି।

Verse 45

लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता: । भिक्षार्थ पृथिवीपाल चज्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:,राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଲୋଭ ଓ ମୋହରେ ଆବୃତ, ମିଥ୍ୟାଧର୍ମର ଧ୍ୱଜ ଢାଙ୍କିଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କେବଳ ଭିକ୍ଷା ମାଗିବେ ନୁହେଁ; ଭିକ୍ଷାର ନାମରେ ସମସ୍ତ ଦିଗର ଲୋକଙ୍କୁ ଉତ୍ପୀଡ଼ନ ଓ ଦମନ କରିବେ।

Verse 46

करभारभयाद्‌ भीता गृहस्था: परिमोषका: | मुनिच्छञाकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविन:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭାରୀ ଭାର ବୋହିବାର ଭୟରେ ଭୀତ ସେଇ ଲୁଟେରାମାନେ ଗୃହସ୍ଥର ବେଶ ଧାରଣ କରୁଥିଲେ। ମୁନିର ଛଦ୍ମ ଆକୃତିରେ ଲୁଚି ଥାଇ ବାଣିଜ୍ୟକୁ ଜୀବିକା କରି—ସେଇ ଆଡ଼ରେ ଚୋରି-ଲୁଟ କରୁଥିଲେ।

Verse 47

अर्थलोभान्नरव्याप्र तथा च ब्रह्म॒चारिण:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧନଲୋଭରେ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ବ୍ୟଗ୍ର ହୋଇ ଲୌକିକ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଲାଗିପଡ଼ନ୍ତି; ସେହିପରି ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟବ୍ରତୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ଅଶାନ୍ତ ପ୍ରବୃତ୍ତିରେ ଟାଣି ନିଆଯାଇପାରନ୍ତି।

Verse 48

आश्रमेषु वृथाचारा: पानपा गुरुतल्पगा: । इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଆଶ୍ରମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ କିଛି ଲୋକଙ୍କ ଆଚାର ନିରର୍ଥକ ହେବ—ମଦ୍ୟପାନକାରୀ ଓ ଗୁରୁତଳ୍ପଗାମୀ। ଏଠାରେ ସେମାନେ କେବଳ ଲୌକିକ ଲାଭକୁ ଚାହିବେ, ମାଂସ ଓ ରକ୍ତର ବୃଦ୍ଧିକୁ ହିଁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିବେ।

Verse 49

नरश्रेष्ठल धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मांमें ही लगे रहेंगे ।। बहुपाषण्डसंकीर्णा: परान्नगुणवादिन: । आश्रमा मनुजव्यात्र भविष्यन्ति युगक्षये,नरश्रेष्ठ) युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମନୁଜବ୍ୟାଘ୍ର! ଯୁଗକ୍ଷୟକାଳେ ସମସ୍ତ ଆଶ୍ରମ ନାନା ପ୍ରକାର ପାଷଣ୍ଡରେ ସଂକୀର୍ଣ୍ଣ ହେବ। ଲୋକେ ପରାନ୍ନର ଗୁଣଗାନ କରି ତାହାକୁ ହିଁ ଧାଉଥିବେ; ଆଶ୍ରମଧର୍ମର ସାର ଶୁଷ୍କ ହୋଇ, ଅନ୍ତର୍ସଂଯମର ସ୍ଥାନେ ବାହ୍ୟଚିହ୍ନ, ଭୋକ ଓ ଦମ୍ଭ ବସିବ।

Verse 50

यर्थर्तुवर्षी भगवान्‌ न तथा पाकशासन: । न चापि सर्वबीजानि सम्यगू रोहन्ति भारत,भगवान्‌ इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे

ଯେପରି ଋତୁକାଳରେ ଯଥାସମୟରେ ବର୍ଷା ହେବା ଭଗବାନଙ୍କ ନିୟମ, ସେପରି ପାକଶାସନ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସମୟରେ ଜଳବର୍ଷା କରିବା ଉଚିତ। ହେ ଭାରତ! ସେ ଯଦି ଠିକ୍ ସମୟରେ ବର୍ଷା ନ କରନ୍ତି, ତେବେ ପୃଥିବୀରେ ବୁଣା ସମସ୍ତ ବୀଜ ମଧ୍ୟ ଭଲଭାବେ ଅଙ୍କୁରିତ ହେବ ନାହିଁ।

Verse 51

हिंसाभिरामश्न जनस्तथा सम्पद्यते5शुचि: । अधर्मफलमत्यर्थ तदा भवति चानघ,कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा

କଳିଯୁଗରେ ଲୋକେ ହିଂସାରେ ହିଁ ସୁଖ ମାନିବେ ଏବଂ ଆଚରଣରେ ଅପବିତ୍ର ହେବେ। ହେ ନିଷ୍ପାପ! ସେ ସମୟରେ ଅଧର୍ମର ଫଳ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଅଧିକ—ପ୍ରବଳ ଓ ବିପୁଳ—ହେବ।

Verse 52

तदा च पृथिवीपाल यो भवेद्‌ धर्मसंयुतः । अल्पायु: स हि मन्तव्यो न हि धर्मो5स्ति कश्नन,भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा

ତେବେ, ହେ ଭୂପାଳ! ଯେ ରାଜା ଧର୍ମସଂଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଅଟୁଟ ରହିବେ, ସେ ଅଳ୍ପାୟୁ ବୋଲି ମନାଯିବେ; କାରଣ ସେ ସମୟରେ କୌଣସି ଧର୍ମ ଟିକି ରହିବ ନାହିଁ।

Verse 53

भूयिष्ठं कूटमानैश्व पण्यं विक्रीणते जना: । वणिजकश्न नरव्यात्र बहुमाया भवन्त्युत,लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठीी उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे

ସେ ସମୟରେ ଲୋକେ ଅଧିକାଂଶ ଭୁଲ ମାପ-ତୋଳ ଦ୍ୱାରା ପଣ୍ୟ ବିକ୍ରି କରିବେ। ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ବଣିକମାନେ ମଧ୍ୟ ବହୁ ପ୍ରକାର ମାୟା-ଛଳରେ ପାରଙ୍ଗତ, ଧୂର୍ତ୍ତ ହେବେ।

Verse 54

धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान्‌ वर्धते जन: । धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्ष बली तथा,धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान्‌ होगा

ଧର୍ମନିଷ୍ଠମାନେ ଅବହେଳିତ ହୋଇ କ୍ଷୀଣ ହେବେ, ଏବଂ ଅଧିକ ପାପୀ ଲୋକେ ବଢ଼ିବେ ଓ ଫଳିବେ। ଧର୍ମର ବଳ ହ୍ରାସ ପାଇବ, ଅଧର୍ମ ହିଁ ବଳବାନ୍ ହେବ।

Verse 55

अल्पायुषो दरिद्राश्न॒ धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुष: समृद्धाश्व विधर्माणो युगक्षये,युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଗାନ୍ତେ ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଳ୍ପାୟୁ ଓ ଦରିଦ୍ର ଭାବେ ଦେଖାଯିବେ; ଏବଂ ଧର୍ମବିରୋଧୀମାନେ ଦୀର୍ଘାୟୁ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ଭାବେ ଦେଖାଯିବେ।

Verse 56

नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठिरुपायैश्व प्रजा व्यवहरन्त्युत,युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯୁଗାନ୍ତେ ନଗରମାନଙ୍କର ବିହାର-ଉଦ୍ୟାନରେ ଧର୍ମଚ୍ୟୁତ ଲୋକେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଆଶ୍ରୟ କରିବେ; ଏବଂ ଅଧର୍ମୀ ଉପାୟରେ ପ୍ରଜାଙ୍କ ସହ ଦୁର୍ବ୍ୟବହାର କରିବେ।

Verse 57

संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याब्यमदान्विता: । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ, ଅଳ୍ପ ଧନ ସଞ୍ଚୟ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ସମୃଦ୍ଧିର ମଦରେ ଉନ୍ମତ୍ତ ହୁଅନ୍ତି। ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସରେ ନିକ୍ଷେପ (ଧରୋହର) ଭାବେ ରଖା ଧନକୁ ଅନେକେ ପରସ୍ପର ମିଶି ହଡ଼ପ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତି ଓ ନିର୍ଲଜ୍ଜ ହୋଇ କହନ୍ତି—‘ଏଠାରେ ତୁମର କିଛି ନାହିଁ।’

Verse 58

हर्तु व्यवसिता राजन्‌ पापाचारसमन्विता: । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ, ପାପାଚାରରେ ଲିପ୍ତ ଓ ହଡ଼ପ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିବା ନିର୍ଲଜ୍ଜ ମନୁଷ୍ୟମାନେ ‘ଏହା ଏଠାରେ ନାହିଁ’ ବୋଲି ମଧ୍ୟ କହିବେ।

Verse 59

पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणो5थ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते,मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟଭକ୍ଷୀ ସତ୍ତ୍ୱ—ପକ୍ଷୀ ଓ ମୃଗମାନେ ମଧ୍ୟ—ନଗରମାନଙ୍କର ବିହାର-ଉଦ୍ୟାନରେ ଏବଂ ଚୈତ୍ୟ-ଦେଉଳରେ ମଧ୍ୟ ଶୋଇ ରହିବେ।

Verse 60

सप्तवर्षष्टवर्षाश्च स्त्रियों गर्भधरा नूप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्र: प्रजायते,राजन! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ସେହି ଯୁଗାନ୍ତର ଅବନତିକାଳରେ ସାତ-ଆଠ ବର୍ଷର କନ୍ୟାମାନେ ମଧ୍ୟ ଗର୍ଭଧାରଣ କରିବେ, ଏବଂ ଦଶ-ବାରହ ବର୍ଷର ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମିବ।

Verse 61

भवन्ति षोडशे वर्षे नरा: पलितिनस्तथा । आयु:क्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते,सोलहवें वर्षमें मनुष्योंक बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଷୋଳ ବର୍ଷରେ ମଧ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କର କେଶ ପାକିଯିବ; ଏବଂ ମନୁଷ୍ୟର ଆୟୁ ଶୀଘ୍ର କ୍ଷୟ ପାଇ ଅଚିରେ ଶେଷ ହେବ।

Verse 62

क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिन: । तरुणानां च यच्छीलं तद्‌ वृद्धेषु प्रजायते,महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका- सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ସେତେବେଳେ ଯୁବମାନେ ଅଳ୍ପାୟୁ ହେବେ ଏବଂ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ପରି ଶୀଳ-ସ୍ୱଭାବ ଧାରଣ କରିବେ; ଯୁବମାନଙ୍କର ଯେ ଶୀଳ ହେବା ଉଚିତ, ସେହି ଶୀଳ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜନ୍ମିବ।

Verse 63

विपरीतास्तदा नार्यो वज्चयित्वारहत: पतीन्‌ | व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासै: पशुभिरेव च,उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେତେବେଳେ ବିପରୀତ ସ୍ୱଭାବର ନାରୀମାନେ ନିଜ ଯୋଗ୍ୟ ପତିମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଠକି ଦୁଶ୍ଶୀଳ ହେବେ, ଏବଂ ଦାସମାନଙ୍କ ସହିତ, ଏପରିକି ପଶୁମାନଙ୍କ ସହିତ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟଭିଚାର କରିବେ।

Verse 64

वीरपत्न्यस्तथा नार्य: संश्रयन्ति नरान्‌ नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान्‌ व्यभिचरन्त्युत,राजन! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ନୃପ, ବୀରପୁରୁଷମାନଙ୍କର ପତ୍ନୀମାନେ ମଧ୍ୟ ପରପୁରୁଷଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେବେ; ଏବଂ ପତି ଜୀବିତ ଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ବ୍ୟଭିଚାର କରିବେ।

Verse 65

तस्मिन्‌ युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुष: क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी,महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोतक वृष्टि बंद हो जाती है

ହେ ମହାରାଜ! ସହସ୍ର ଯୁଗର ଅନ୍ତ ସମୟ ଆସି ଆୟୁଷ୍ୟ କ୍ଷୟ ଦିଗକୁ ଯାଉଥିବାବେଳେ, ବହୁବର୍ଷୀୟ ଅନାବୃଷ୍ଟି ହୁଏ—ବର୍ଷା ଅନେକ ବର୍ଷ ଧରି ବନ୍ଦ ହୋଇଯାଏ।

Verse 66

ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते,पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं

ତାପରେ, ହେ ପୃଥିବୀପତେ! ଅଳ୍ପବଳ ଥିବା ସେହି ପ୍ରାଣୀମାନେ କ୍ଷୁଧାରେ ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ପୃଥିବୀରେ ଅଧିକାଂଶ ନାଶକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 67

ततो दिनकरेदीप्तै: सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिल ॑ सर्व समुद्रेषु सरित्सु च,नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं

ତାପରେ, ହେ ମନୁଜାଧିପ! ଦୀପ୍ତିମାନ ସାତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ନିଜ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ତେଜରେ ସମୁଦ୍ର ଓ ନଦୀମାନଙ୍କର ସମସ୍ତ ଜଳକୁ ଶୋଷି ନେଇଥାନ୍ତି।

Verse 68

यच्च काष्ठ॑ तृणं चापि शुष्कं चार्द्र च भारत । सर्व तद्‌ भस्मसाद्‌ भूत॑ दृश्यते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं

ହେ ଭାରତ! କାଠ ଓ ତୃଣ—ଶୁଷ୍କ ହେଉ କି ଆର୍ଦ୍ର—ସବୁକିଛି ଭସ୍ମ ହୋଇ ଦେଖାଯାଏ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ!

Verse 69

तत: संवर्तको वह्निवायुना सह भारत | लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम्‌,भारत! इसके बाद '“संवर्तक” नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है

ତାପରେ, ହେ ଭାରତ! ପୂର୍ବେ ସାତ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଯେଉଁ ଲୋକମାନଙ୍କର ଜଳକୁ ଶୋଷି ଦେଇଥିଲେ, ସେହି ଲୋକମାନଙ୍କୁ ବାୟୁ ସହିତ ପ୍ରଳୟକାଳୀନ ‘ସଂବର୍ତ୍ତକ’ ଅଗ୍ନି ଆବିଷ୍ଟ କରି ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରସାରିତ ହୁଏ।

Verse 70

ततः स पृथिवीं भिनत्त्वा प्रविश्य च रसातलम्‌ । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्‌,तत्पश्चात्‌ पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान्‌ भय उपस्थित कर देती है

ତାପରେ ସେ ପୃଥିବୀକୁ ଭେଦି ରସାତଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଦେବ, ଦାନବ ଓ ଯକ୍ଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହାଭୟ ସୃଷ୍ଟି କରେ।

Verse 71

निर्दहन्‌ नागलोकं च यच्च किज्चित्‌ क्षिताविह । अधस्तात्‌ पृथिवीपाल सर्व नाशयते क्षणात्‌,राजन्‌! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है

ହେ ରାଜନ୍! ସେ ନାଗଲୋକକୁ ଦହି ଦେଇ, ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଯାହା କିଛି ଅଛି ଓ ତାହାର ତଳେ ଯାହା କିଛି ଅଛି—ସବୁକୁ କ୍ଷଣମାତ୍ରେ ନଷ୍ଟ କରିଦିଏ।

Verse 72

ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोडनल:,इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है

ତାପରେ ଅମଙ୍ଗଳକାରୀ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ବାୟୁ ଉଠେ ଏବଂ ସହିତେ ସଂବର୍ତ୍ତକ ଅଗ୍ନି; ଦୁହେଁ ମିଶି ବାଇଶ ହଜାର ଯୋଜନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ତୃତ ଅଞ୍ଚଳକୁ ଦହି ଭସ୍ମ କରିଦିଅନ୍ତି।

Verse 73

सदेवासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम्‌ । ततो दहति दीप्त: स सर्वमेव जगद्‌ विभु:,इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है

ତାପରେ ସର୍ବତ୍ର ବ୍ୟାପିଥିବା ସେ ଦୀପ୍ତ ଅଗ୍ନି ଦେବ, ଅସୁର, ଗନ୍ଧର୍ବ, ଯକ୍ଷ, ନାଗ ଓ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କ ସହିତ ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ଦହି ଭସ୍ମ କରିଦିଏ।

Verse 74

ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिता: । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शना:,इसके बाद आकाशमें महान्‌ मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है

ତାପରେ ଆକାଶରେ ଅଦ୍ଭୁତ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖାଯାଏ—ହାତୀମାନଙ୍କ ଝୁଣ୍ଡ ପରି ବିଶାଳ, ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ବିଜୁଳିର ମାଳାରେ ଭୂଷିତ ମହାମେଘମାନେ ଉଠିଆସନ୍ତି।

Verse 75

केचिन्नीलोत्पलश्यामा: केचित्‌ कुमुदसंनि भा: । केचित्‌ किज्जल्कसंकाशा: केचित्‌ पीता: पयोधरा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କେତେକ ମେଘ ନୀଳୋତ୍ପଳ ସମ ଶ୍ୟାମ, କେତେକ କୁମୁଦ-ପୁଷ୍ପ ସମ ଶ୍ୱେତ। କେତେକ ପରାଗ-ବର୍ଣ୍ଣ ସଦୃଶ ଦୀପ୍ତ, ଆଉ କେତେକ ଜଳଧର ହଳଦୀ ସମ ପୀତ ଦିଶନ୍ତି।

Verse 76

केचिद्धारिद्रसंकाशा: कारण्डवनिभास्तथा । केचित्‌ कमलपत्राभा: केचिद्धिड्डुलसप्रभा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କେତେକ ମେଘ ହଳଦୀ ସଦୃଶ ପୀତ, କେତେକ କାରଣ୍ଡବ ପକ୍ଷୀ ସଦୃଶ ଦିଶୁଥିଲେ। କେତେକ କମଳପତ୍ର ସମ ଦୀପ୍ତ, ଆଉ କେତେକ ହିଙ୍ଗୁଳ (ସିନ୍ଦୂର) ସମ ଅରୁଣ ପ୍ରଭାଯୁକ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 77

केचित्‌ पुरवराकारा: केचिद्‌ गजकुलोपमा: । केचिदञ्जनसंकाशा: केचिन्मकरसंनिभा:,कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କେତେକର ଆକାର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନଗର ସଦୃଶ, କେତେକ ଗଜକୁଳ (ହାତୀ ଝୁଣ୍ଡ) ସମ। କେତେକ ଅଞ୍ଜନ (କାଜଳ) ସମ କୃଷ୍ଣ, ଆଉ କେତେକ ମକର (ମଗର) ସଦୃଶ ଆକୃତିବାନ।

Verse 78

विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्‌,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ବିଦ୍ୟୁତ୍-ମାଳାରେ ଶୋଭିତ ଘନ ମେଘ ଉଠିଆସନ୍ତି। ଭୟଙ୍କର ଗର୍ଜନାରେ ସେମାନଙ୍କ ରୂପ ଆଉ ଭୟାବହ ହୁଏ। ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ଜଳଧର ବିସ୍ତାରିତ ହୋଇ ସମଗ୍ର ନଭସ୍ତଳକୁ ଢାଙ୍କି ଦିଅନ୍ତି।

Verse 79

तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता,महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें ड्ूबकर सब ओरसे भर जाती है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ସେମାନେ ବର୍ଷା କଲେ ପର୍ବତ, ବନ ଓ ଖଣି ସହିତ ଏହି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀ ଉଦ୍ଧତ ଜଳପ୍ରବାହର ରାଶିରେ ପ୍ଲାବିତ ହୋଇ ସବୁ ଦିଗରୁ ପୂରିଯାଏ।

Verse 80

ततस्ते जलदा घोरा राविण: पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिता: परमेछ्िना,पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं

ତେବେ, ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ, ବିଧାତାଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ଚାଲିତ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଗର୍ଜନକାରୀ ମେଘମାନେ ଶୀଘ୍ର ସବୁ ଦିଗରେ ବର୍ଷା କରି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜଳରେ ପ୍ଲାବିତ କରିଦେଲେ।

Verse 81

वर्षमाणा महत्‌ तोयं पूरयन्तो वसुंधराम्‌ । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम्‌,महान्‌ जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं

ମହା ଜଳରାଶି ବର୍ଷା କରି ବସୁନ୍ଧରାକୁ ଜଳରେ ପୂରଣ କରୁଥିବା ସେଇ ମେଘମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଘୋର, ଅଶିବ ଓ ରୌଦ୍ର ଅଗ୍ନିକୁ ମଧ୍ୟ ନିବାଇ ଦେଲେ।

Verse 82

ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभि: पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना,तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं

ତାପରେ ପ୍ରଳୟକାଳରେ, ମହାତ୍ମାଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ ସେଇ ପୟୋଧର ମେଘମାନେ ପୃଥିବୀକୁ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ କରିବା ପାଇଁ ଦ୍ୱାଦଶ ବର୍ଷ ଧରି ଅବିରତ ଧାରାବାହିକ ବର୍ଷା କଲେ।

Verse 83

ततः समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति,भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है

ହେ ଭାରତ, ତାପରେ ସମୁଦ୍ର ନିଜ ତଟସୀମା ଅତିକ୍ରମ କରେ; ପର୍ବତମାନେ ଭିଦୀର୍ଣ୍ଣ ହୁଅନ୍ତି, ଏବଂ ପୃଥିବୀ ଜଳରେ ନିମଜ୍ଜିତ ହୋଇଯାଏ।

Verse 84

सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम्‌ । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:,तत्पश्चात्‌ समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं

ତାପରେ, ସବୁ ଦିଗରେ ହଠାତ୍ ଭ୍ରାନ୍ତ ହୋଇ ସେଇ ମେଘମାନେ ନଭମଣ୍ଡଳକୁ ଘେରି ଆବୃତ କରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ବାୟୁର ପ୍ରଚଣ୍ଡ ବେଗର ଆଘାତରେ ଛିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ ହୋଇ ଶୀଘ୍ର ଅଦୃଶ୍ୟ ହୋଇଯାନ୍ତି।

Verse 85

ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूमनुजाधिप । आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत,नरेश्वरर इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं

ତାପରେ, ହେ ନରାଧିପ, ସେଇ ଘୋର ବାୟୁକୁ ପଦ୍ମନିବାସୀ ଆଦିଦେବ ସ୍ୱୟଂଭୂ ବ୍ରହ୍ମା ଗିଳି ନେଲେ; ତାହା ପାନ କରି, ହେ ଭାରତ, ସେ ନିଦ୍ରାରେ ଲୀନ ହେଲେ।

Verse 86

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजड्रमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ

ସେଇ ଘୋର ଏକାର୍ଣ୍ଣବରେ, ଯେତେବେଳେ ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ସମସ୍ତ ସୃଷ୍ଟି ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା, ଦେବାସୁର ଗଣ ଲୟ ହୋଇଗଲେ, ଏବଂ ଯକ୍ଷ-ରାକ୍ଷସ ମଧ୍ୟ ନ ଥିଲେ—ସେତେବେଳେ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ବିସ୍ତାର ଶୂନ୍ୟ ହୋଇ ରହିଲା।

Verse 87

निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन्‌ भ्रमाम्पेकोडहमाहत:,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ

ହେ ମହୀପାଳ, ଏହି ଲୋକରେ ନ ମନୁଷ୍ୟ ଥିଲେ, ନ ପଶୁପକ୍ଷୀ, ନ ବୃକ୍ଷ; ଅନ୍ତରିକ୍ଷର ସତ୍ତାମାନେ ମଧ୍ୟ ନ ଥିଲେ—ସେପରି ଅବସ୍ଥାରେ ମୁଁ ଏକା, ଆହତ ମନେ କରି, ଏଦିକ-ସେଦିକ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିଲି।

Verse 88

एकार्णवे जले घोरे विचरन्‌ पार्थिवोत्तम | अपश्यन्‌ सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:,नृपश्रेष्ठी एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई

ହେ ପାର୍ଥିବୋତ୍ତମ, ସେଇ ଘୋର ଏକାର୍ଣ୍ଣବ ଜଳରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବାବେଳେ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ କୌଣସି ପ୍ରାଣୀକୁ ଦେଖିଲି ନାହିଁ, ସେତେବେଳେ ମୋତେ ଭୟଙ୍କର ବ୍ୟାକୁଳତା ହେଲା।

Verse 89

ततः सुदीर्घ गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:,नरेश्वरर उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला

ତାପରେ, ହେ ନରାଧିପ, ମୁଁ ଅଲସତା ବିନା ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଦୀର୍ଘ ଦୂର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପ୍ଲବମାନ ହୋଇ ଗଲି; କିନ୍ତୁ ଶେଷରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରାନ୍ତ ହେଲି, ଏବଂ କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ଶରଣ ମିଳିଲା ନାହିଁ।

Verse 90

ततः कदाचित्‌ पश्यामि तस्मिन्‌ सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते,राजन्‌! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा

ତାପରେ ଏକଦିନ, ହେ ପୃଥିବୀପତି ରାଜନ, ସେହି ବିଶାଳ ଜଳସଞ୍ଚୟରେ ମୁଁ ଏକ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମହାନ୍ ଓ ବିସ୍ତୃତ ବଟବୃକ୍ଷ ଦେଖିଲି।

Verse 91

शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यड्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे

ହେ ନରାଧିପ, ହେ ପୃଥିବୀପାଳ! ସେହି ବୃକ୍ଷର ବିସ୍ତୃତ ଶାଖାରେ ଦିବ୍ୟ ଆସ୍ତରଣରେ ଆବୃତ ଏକ ପର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଥିଲା।

Verse 92

उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसद्शाननम्‌ | फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे

ହେ ମହାରାଜ, ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ସେଠାରେ ଏକ ବାଳକକୁ ଉପବିଷ୍ଟ ଦେଖିଲି—ତାହାର ମୁଖ ପଦ୍ମ ଓ ଇନ୍ଦୁ ସଦୃଶ ମନୋହର, ଏବଂ ତାହାର ନୟନ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ ପଦ୍ମଦଳ ସମାନ ବିଶାଳ।

Verse 93

ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत्‌ | कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते,पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा--'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?”

ହେ ପୃଥିବୀପାଳ! ତାହାକୁ ଦେଖି ମୋତେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିସ୍ମୟ ହେଲା। ମୁଁ ଭାବିଲି—“ଲୋକ ନାଶକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଥିବାବେଳେ ଏହି ଶିଶୁ ଏଠାରେ କିପରି ଶୋଇଛି?”

Verse 94

तपसा चिन्तयंश्वापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप,नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका

ହେ ନରାଧିପ! ତପସ୍ୟା ସହ ଧ୍ୟାନ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଶିଶୁ ବିଷୟରେ ମୁଁ କିଛି ମଧ୍ୟ ଜାଣିପାରିଲି ନାହିଁ; ଭୂତ, ଭବ୍ୟ (ବର୍ତ୍ତମାନ) ଓ ଭବିଷ୍ୟ—ତିନି କାଳ ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ।

Verse 95

अतसीपुष्पवर्णा भ: श्रीवत्सकृतभूषण: । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे,उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात्‌ लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାହାର ଦେହକାନ୍ତି ଅତସୀ ଫୁଲର ବର୍ଣ୍ଣ ପରି ଶ୍ୟାମ-ନୀଳ ଥିଲା। ତାହାର ବକ୍ଷସ୍ଥଳ ଶ୍ରୀବତ୍ସଚିହ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଥିଲା। ସେ ସମୟରେ ସେ ମୋତେ ସାକ୍ଷାତ୍ ଲକ୍ଷ୍ମୀଙ୍କ ନିବାସସ୍ଥାନ ପରି ପ୍ରତୀତ ହେଲା।

Verse 96

ततो मामब्रवीद्‌ बाल: स पद्मनिभलोचन: । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्‌ वाक्‍्यं श्रुतिसुखावहम्‌

ତାପରେ ସେ ଦ୍ୟୁତିମାନ ବାଳକ—ପଦ୍ମସଦୃଶ ନୟନବାନ୍ ଓ ଶ୍ରୀବତ୍ସଧାରୀ—ମୋତେ ଶ୍ରବଣସୁଖଦ ବଚନ କହିଲା।

Verse 97

जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाड्क्षिणम्‌ । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव

“ମୁଁ ଜାଣେ, ତୁମେ ପରିଶ୍ରାନ୍ତ; ତେଣୁ ତୁମେ ବିଶ୍ରାମ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରୁଛ। ହେ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ, ହେ ଭାର୍ଗବ—ଯେତେଦିନ ଇଚ୍ଛା, ଏଠାରେ ରୁହ।”

Verse 98

मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान्‌ बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा--'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वास: प्रसादस्ते कृतो मया,“'मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୋତେ ବିସ୍ମୟରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖି, ସେ ପଦ୍ମସଦୃଶ ନୟନବାନ୍, ଶ୍ରୀବତ୍ସଧାରୀ, ଦ୍ୟୁତିମାନ ବାଳକ ଶ୍ରବଣସୁଖଦ ବଚନରେ ଏପରି କହିଲା—“ଭୃଗୁବଂଶୀୟ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ! ମୁଁ ତୁମକୁ ଜାଣେ। ତୁମେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପରିଶ୍ରାନ୍ତ ଓ ବିଶ୍ରାମ ଚାହୁଁଛ। ଯେତେଦିନ ଇଚ୍ଛା, ଏଠାରେ ବସ।” ପୁଣି ସେ କହିଲା—“ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମୋ ଶରୀରର ଅଭ୍ୟନ୍ତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରି ବିଶ୍ରାମ କର। ସେଠାରେ ତୁମ ବାସ ପାଇଁ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି; ମୁଁ ତୁମପ୍ରତି ପ୍ରସାଦ କରିଛି।”

Verse 99

ततो बालेन तेनैवमुक्तस्थासीत्‌ तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत,उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେ ବାଳକ ଏପରି କହିବା ସହିତ, ସେହି କ୍ଷଣରେ ମୋର ଦୀର୍ଘ ଜୀବନ ପ୍ରତି ଏବଂ ମନୁଷ୍ୟତ୍ୱ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଗଭୀର ନିର୍ବେଦ ଓ ବୈରାଗ୍ୟ ଜାଗ୍ରତ ହେଲା।

Verse 100

ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम्‌ । तस्याहमवशो वकत्रे दैवयोगात्‌ प्रवेशित:,तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया

ତାପରେ ସେଇ ବାଳକ ହଠାତ୍ ନିଜ ମୁହଁ ବିଶାଳ କରି ଖୋଲିଲା। ଏବଂ ଦୈବଯୋଗରେ ମୁଁ—ଅବଶ, ଯେନ ଜୋରକରି—ତାହାର ମୁହଁଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରିଗଲି।

Verse 101

ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णा कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम्‌,राजन! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी

ହେ ମନୁଜାଧିପ! ତାହାରେ ପ୍ରବେଶ କରିବାମାତ୍ରେ ମୁଁ ହଠାତ୍ ସେଇ ବାଳକର ଉଦରଭିତରେ ପହଞ୍ଚିଗଲି। ସେଠାରେ ରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ନଗରରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ମୁଁ ଦେଖିଲି।

Verse 102

गड्डां शतद्रं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम्‌ । चर्मण्वतीं वेत्रवर्ती चन्द्रभागां सरस्वतीम्‌,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତାପରେ ମୁଁ ସେଇ ମହାତ୍ମା ବାଳକର ଉଦରଭିତରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲି। ବିଚରଣ କରୁ କରୁ ସେଠାରେ ଗଙ୍ଗା, ଶତଦ୍ରୁ, ସୀତା, ଯମୁନା, କୌଶିକୀ, ଚର୍ମଣ୍ୱତୀ, ୱେତ୍ରବତୀ, ଚନ୍ଦ୍ରଭାଗା ଓ ସରସ୍ୱତୀ—ଏହି ପବିତ୍ର ନଦୀମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲି।

Verse 103

सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ମୁଁ ସିନ୍ଧୁ, ବିପାଶା ଓ ଗୋଦାବରୀ ନଦୀକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି; ଏହିପରି ବସ୍ୱୋକସାରା, ନଲିନୀ ଓ ନର୍ମଦାକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 104

नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम्‌ । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम्‌,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

ସେଠାରେ ମୁଁ ତାମ୍ରା ନଦୀ, ୱେଣା, ଶୁଭାବହ ପୁଣ୍ୟତୋୟା—ପବିତ୍ର ଜଳବତୀ ସେଇ ନଦୀ—ଏବଂ ସୁୱେଣା, କୃଷ୍ଣୱେଣା, ମହାନଦୀ ଇରାମାକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 105

वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम्‌ । शोणं च पुरुषव्याप्र विशल्यां किम्पुनामपि,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ, ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ମୁଁ ବିତସ୍ତା, ମହାନଦୀ କାବେରୀ, ଶୋଣ, ବିଶଲ୍ୟା ଏବଂ କିମ୍ପୁନା ନଦୀକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 106

एताश्षान्याश्व नद्यो5हं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन्‌ प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मन:,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा

ନରୋତ୍ତମ! ସେଇ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉଦର ମଧ୍ୟରେ ପରିଭ୍ରମଣ କରି ମୁଁ ଏହି ସମସ୍ତ ନଦୀ ଏବଂ ପୃଥିବୀରେ ବହୁଥିବା ଅନ୍ୟ ନଦୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 107

ततः समुद्र पश्यामि यादोगणनिषेवितम्‌ । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्‌,शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा

ତାପରେ, ଅମିତ୍ରଘ୍ନ! ଜଳଚରଗଣ ଯେଉଁଥିରେ ନିଷେବିତ, ଅଗାଧ ଜଳର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନିଧି ଏବଂ ରତ୍ନାକର ସମୁଦ୍ରକୁ ମୁଁ ଦେଖିଲି।

Verse 108

तत्र पश्यामि गगन चन्द्रसूर्यविराजितम्‌ । जाज्वल्यमानं तेजोभि: पावकार्कसमप्रभम्‌,वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था

ସେଠାରେ ମୁଁ ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟରେ ବିରାଜିତ ଆକାଶମଣ୍ଡଳକୁ ଦେଖିଲି; ତାହା ଅନନ୍ତ ତେଜରେ ଜ୍ୱଳିତ ଥିଲା ଏବଂ ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା।

Verse 109

पश्यामि च महीं राजन्‌ काननैरुपशोभिताम्‌ । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसड्कुलाम्‌ ।) यजन्ते हि तदा राजन्‌ ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:,राजन! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्‌ यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे

ରାଜନ! ମୁଁ ସେଇ ଭୂମିକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି—ବହୁ କାନନରେ ଶୋଭିତ, ପର୍ବତ-ବନ-ଦ୍ୱୀପରେ ଚିହ୍ନିତ, ଏବଂ ଶତଶଃ ସରିତା-ପ୍ରବାହରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ। ସେ ସମୟରେ, ରାଜନ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଅନେକ ମଖ ଦ୍ୱାରା ଯଜ୍ଞପୁରୁଷ ଦେବଙ୍କୁ ସମ୍ୟକ୍ ଆରାଧନା କରୁଥିଲେ।

Verse 110

क्षत्रियाश्ष प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै: । वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप,नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोकी प्रजाका अनुरंजन करते--सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ଅନୁରଞ୍ଜିତ କରି ନିଜ ଧର୍ମ ପାଳନ କରୁଥିଲେ, ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସୁଖୀ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ରଖୁଥିଲେ। ଏବଂ ହେ ନରାଧିପ! ବୈଶ୍ୟମାନେ ନ୍ୟାୟ ଓ ବିଧିଅନୁସାରେ କୃଷି ଓ ବାଣିଜ୍ୟ କରାଉଥିଲେ।

Verse 111

शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा । ततः परिपतन्‌ राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ସମୟରେ ଶୂଦ୍ରମାନେ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ସେବା-ଶୁଶ୍ରୂଷାରେ ନିରତ ଥିଲେ। ତାପରେ, ହେ ରାଜନ୍! ସେଇ ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉଦରଭିତରେ ମୁଁ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିବାବେଳେ ଅନେକ ପର୍ବତ ଦେଖିଲି— ହିମବାନ୍, ହେମକୂଟ, ନିଷଧ, ରଜତକାନ୍ତିଯୁକ୍ତ ଶ୍ୱେତଗିରି, ଗନ୍ଧମାଦନ, ମନ୍ଦରାଚଳ, ମହାଗିରି ନୀଳ, ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ମେରୁ, ମହେନ୍ଦ୍ର, ଉତ୍ତମ ବିନ୍ଧ୍ୟ, ମଲୟ ଓ ପାରିୟାତ୍ର— ଏବଂ ଆଉ ଅନେକ; ସମସ୍ତେ ନାନାରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ। ସେଠାରେ ଘୁରୁଥିବାବେଳେ ସିଂହ, ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ବରାହ ଆଦି ପଶୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 112

हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम्‌ । निषध॑ चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ମୁଁ ହିମବାନ୍‌କୁ ଦେଖୁଛି ଏବଂ ହେମକୂଟ ପର୍ବତକୁ ମଧ୍ୟ; ନିଷଧକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି, ଏବଂ ରଜତକାନ୍ତିଯୁକ୍ତ ଶ୍ୱେତକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି।

Verse 113

पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम्‌ । मन्दरं मनुजव्याप्र नीलं चापि महागिरिम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ହେ ମହୀପାଳ! ମୁଁ ଗନ୍ଧମାଦନ ପର୍ବତକୁ ଦେଖୁଛି; ଏବଂ ହେ ମନୁଜବ୍ୟାଘ୍ର! ମନ୍ଦରକୁ ଓ ମହାଗିରି ନୀଳକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି।

Verse 114

पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम्‌ | महेन्द्र चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्‌,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ହେ ମହାରାଜ! ମୁଁ କନକପର୍ବତ ମେରୁକୁ ଦେଖୁଛି; ମହେନ୍ଦ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି, ଏବଂ ଉତ୍ତମ ପର୍ବତ ବିନ୍ଧ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି।

Verse 115

मलयं चापि पश्यामि पारियात्र च पर्वतम्‌ | एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ମଲୟ ପର୍ବତଶ୍ରେଣୀ ଓ ପାରିୟାତ୍ର ପର୍ବତକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଛି; ଏହାଛଡ଼ା ପୃଥିବୀକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ଅନେକ ଅନ୍ୟ ପର୍ବତମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ। ସେଇ ମହାତ୍ମା ଶିଶୁର ଉଦରଭିତରେ ଭ୍ରମଣ କରି ଆଗକୁ ବଢ଼ୁଥିବାବେଳେ ହିମବାନ, ହେମକୂଟ, ନିଷଧ, ରଜତଯୁକ୍ତ ଶ୍ୱେତଗିରି, ଗନ୍ଧମାଦନ, ମନ୍ଦରାଚଳ, ନୀଳ ମହାଗିରି, ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ମେରୁ, ମହେନ୍ଦ୍ର, ଉତ୍ତମ ବିନ୍ଧ୍ୟ, ମଲୟ ଓ ପାରିୟାତ୍ର—ଏସବୁ ପର୍ବତ ମୋତେ ଦୃଶ୍ୟମାନ ହେଲା। ସମସ୍ତେ ନାନାପ୍ରକାର ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଥିଲେ।

Verse 116

तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता: । सिंहान्‌ व्याप्रान्‌ वराहांश्न॒ पश्यामि मनुजाधिप,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्‌, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे

ତାହାର ଉଦରଭିତରେ ମୁଁ ସମସ୍ତକୁ ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଦେଖିଲି। ହେ ମନୁଜାଧିପ! ସେଠାରେ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିବାବେଳେ ମୁଁ ସିଂହ, ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ବରାହମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 117

पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्‌ पर्यचरं तदा,पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा

ହେ ଜଗତୀପତେ! ପୃଥିବୀରେ ଯେତେ ସତ୍ତ୍ୱ ଅଛନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସେଠାରେ ଦେଖି ମୁଁ ସେ ସମୟରେ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିଲି।

Verse 118

कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्ट: संचरन्‌ दिश: । शक्रादींश्वापि पश्यामि कृत्स्नान्‌ देवगणानहम्‌,नरश्रेष्ठ उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए

ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ସେଇ ଶିଶୁର ଉଦରରେ ପ୍ରବେଶ କରି ମୁଁ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ସଞ୍ଚରଣ କଲି; ଏବଂ ସେଠାରେ ଇନ୍ଦ୍ର ଆଦି ସମଗ୍ର ଦେବଗଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି।

Verse 119

साध्यान्‌ रुद्रांस्तथा5<दित्यान्‌ गुह्मकान्‌ पितरस्तदा । सर्पान्‌ नागान्‌ सुपर्णाश्च वसूनप्यश्चिनावपि,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତେ! ମୁଁ ସାଧ୍ୟ, ରୁଦ୍ର ଓ ଆଦିତ୍ୟ; ଗୁହ୍ୟକ ଓ ପିତୃଗଣ; ସର୍ପ, ନାଗ ଓ ସୁପର୍ଣ୍ଣ; ବସୁମାନେ ଏବଂ ଅଶ୍ୱିନୀକୁମାର ଦ୍ୱୟକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ଗନ୍ଧର୍ବ, ଅପ୍ସରା, ଯକ୍ଷ ଓ ଋଷିମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦର୍ଶନ କଲି। ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବମାନଙ୍କ ଦଳ, ସିଂହିକାର ପୁତ୍ର—ରାହୁ ଆଦି—ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଦେବଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ହେ ନୃପ! ଏହି ଲୋକରେ ମୁଁ ଯେ କିଛି ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ଦେଖିଥିଲି, ସେ ସମସ୍ତ ତାହା ମହାତ୍ମାଙ୍କ କୁକ୍ଷିରେ ମୋତେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ହେଲା। ଏବଂ ମହାରାଜ, ମୁଁ ପ୍ରତିଦିନ ଫଳାହାର କରି ଏହି ସମଗ୍ର ଲୋକରେ ଭ୍ରମଣ କରୁଛି।

Verse 120

गन्धर्वाप्सरसो यक्षानषींश्वैव महीपते । देत्यदानवसड्घांश्व नागांश्न मनुजाधिप,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମହୀପତେ, ମନୁଜାଧିପ, ପୃଥ୍ୱୀପତେ! ମୁଁ ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରା, ଯକ୍ଷ ଓ ଋଷି; ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବମାନଙ୍କ ସମୂହ; ଏବଂ ନାଗମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ସାଧ୍ୟ, ରୁଦ୍ର, ଆଦିତ୍ୟ, ଗୁହ୍ୟକ, ପିତୃଗଣ; ସର୍ପ ଓ ନାଗ, ସୁପର୍ଣ୍ଣ, ବସୁ, ଅଶ୍ୱିନୀକୁମାରଦ୍ୱୟ; ଗନ୍ଧର୍ବ, ଅପ୍ସରା, ଯକ୍ଷ ଓ ଅନେକ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ଦର୍ଶନ କଲି। ସିଂହିକାର ପୁତ୍ର (ରାହୁ ଆଦି) ଓ ଅନ୍ୟ ଦେବଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ରାଜନ! ଏହି ଲୋକରେ ମୁଁ ଯେଉଁ ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ସବୁ ଦେଖିଥିଲି, ସେସବୁ ତାହା ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉଦରରେ ମୋତେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ହେଲା। ମହାରାଜ! ମୁଁ ପ୍ରତିଦିନ ଫଳାହାର କରି ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ଭ୍ରମଣ କରୁଛି।

Verse 121

सिंहिकातनयांश्वापि ये चान्ये सुरशत्रव: । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्‌,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ମୁଁ ସିଂହିକାର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଦେବଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ଏହି ଲୋକରେ ମୁଁ ଯେଉଁ କିଛି କେବେ ଦେଖିଥିଲି—ସ୍ଥାବର ହେଉ କି ଜଙ୍ଗମ—ହେ ପୃଥ୍ୱୀପତେ! ସେସବୁ ତାହା ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉଦରରେ ମୋତେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ହେଲା। ମୁଁ ସାଧ୍ୟ, ରୁଦ୍ର, ଆଦିତ୍ୟ, ଗୁହ୍ୟକ, ପିତୃଗଣ; ସର୍ପ ଓ ନାଗ, ସୁପର୍ଣ୍ଣ, ବସୁ, ଅଶ୍ୱିନୀଦ୍ୱୟ; ଗନ୍ଧର୍ବ, ଅପ୍ସରା, ଯକ୍ଷ ଓ ଋଷିମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲି। ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବ ସମୂହ, ନାଗ, ସିଂହିକାର ପୁତ୍ର (ରାହୁ ଆଦି) ଓ ଅନ୍ୟ ଦେବଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ରାଜନ! ମୁଁ ଯେ ସମଗ୍ର ସତ୍ତା-ବିସ୍ତାର ଦେଖିଥିଲି, ସେସବୁ ତାଙ୍କ ଭିତରେ ଏକତ୍ରିତ ହୋଇଥିବା ପରି ମୋତେ ଲାଗିଲା। ଏବଂ, ହେ ମହାରାଜ, ମୁଁ ପ୍ରତିଦିନ ଫଳାହାର କରି ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ଭ୍ରମଣ କରୁଥିଲି।

Verse 122

सर्व पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन: । चरमाण: फलाहार: कृत्स्नं जगदिदं विभो,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्‌! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ରାଜନ! ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଉଦରରେ ମୁଁ ସବୁକିଛି ଦେଖୁଛି। ହେ ବିଭୋ, ହେ ପୃଥ୍ୱୀପତେ! ଫଳାହାର କରି ଭ୍ରମଣ କରୁଥିବାବେଳେ ମୁଁ ସେଠାରେ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ଦେଖିଲି।

Verse 123

अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम्‌ । न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन,उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षमे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେହି ବାଳକର ଶରୀର ଭିତରେ ମୁଁ ଶତବର୍ଷରୁ ଅଧିକ ସମୟ ଭ୍ରମଣ କଲି; ତଥାପି କେବେ ତାହାର ଦେହର ଶେଷ ସୀମା ଦେଖିପାରିଲି ନାହିଁ।

Verse 124

सततं धावमानश्ष्‌ चिन्तयानो विशाम्पते । (भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान्‌ बहून्‌ ।) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन्‌ महात्मन:,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ମୁଁ ନିରନ୍ତର ଦୌଡ଼ୁଥିଲି ଏବଂ ଚିନ୍ତାରେ ଆକୁଳ ଥିଲି। ହେ ମହୀପାଳ! ସେଠାରେ ଅନେକ ବର୍ଷ ଭ୍ରମଣ କଲେ ମଧ୍ୟ, ରାଜନ, ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଦେହର ଶେଷ ସୀମା ମୋତେ ମିଳିଲା ନାହିଁ। ତେବେ, ହେ ରାଜନ, ମନ-ବାଣୀ-କର୍ମ ଦ୍ୱାରା—ବିଧିପୂର୍ବକ—ମୁଁ ସେହି ବରଦାୟକ ଓ ବରେଣ୍ୟ ଦେବତାଙ୍କ ଶରଣ ନେଲି।

Verse 125

ततस्तमेव शरणं गतो<5स्मि विधिवत्‌ तदा । वरेण्यं वरदं देव॑ं मनसा कर्मणैव च,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली

ତେବେ ମୁଁ ବିଧିପୂର୍ବକ ସେହି ବରେଣ୍ୟ, ବରଦାତା ଦେବଙ୍କ ଶରଣ ଗଲି—ମନରେ ମଧ୍ୟ, କର୍ମରେ ମଧ୍ୟ। ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ମୁଁ ନିରନ୍ତର ଧାଉଥିଲି ଓ ଚିନ୍ତାକୁଳ ଥିଲି; ଏବଂ ବହୁ ବର୍ଷ ଭ୍ରମଣ କରିଲେ ମଧ୍ୟ ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଦେହର ଅନ୍ତ ମିଳିଲା ନାହିଁ, ତେବେ ମନ, ବାକ୍, କ୍ରିୟା ଦ୍ୱାରା ସେହି ବରଦାତା, ପରମ ପୂଜ୍ୟ ଦେବଙ୍କୁ ମୁଁ ବିଧିମତେ ଶରଣାଗତ ହେଲି।

Verse 126

ततो<5हं सहसा राजन्‌ वायुवेगेन नि:सृतः । महात्मनो मुखात्‌ तस्य विवृतात्‌ पुरुषोत्तम,पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया

ତାପରେ, ହେ ରାଜନ, ମୁଁ ସହସା ବାୟୁବେଗରେ ସେହି ମହାତ୍ମାଙ୍କ ଖୋଲା ମୁଖମାର୍ଗ ଦ୍ୱାରା ବାହାରକୁ ନିଷ୍କ୍ରମଣ କଲି। ପୁରୁଷରତ୍ନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତାଙ୍କ ଶରଣ ନେଇମାତ୍ରେ ମୁଁ ଏଭଳି ଶୀଘ୍ର ବାହାରିଆସିଲି।

Verse 127

ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत्‌,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत्‌ बैठा हुआ है

ତାପରେ, ହେ ବିଶାମ୍ପତେ, ବାହାରକୁ ଆସି ମୁଁ ଦେଖିଲି—ସେହି ବଟବୃକ୍ଷର ସେହି ଶାଖାରେ, ସେହି ବାଳକବେଷରେ, ସେହି ମନୁଜଶାର୍ଦୂଳ ପୂର୍ବବତ୍ ବସିଛି; ଯେନେ ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ନିଜ ଉଦରେ ଧାରଣ କରିଛି।

Verse 128

तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम्‌ | आसीन तं॑ नरव्याप्र पश्याम्यमिततेजसम्‌,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत्‌ बैठा हुआ है

ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର, ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜନ! ବାହାରକୁ ଆସି ମୁଁ ଦେଖିଲି—ସେହି ବାଳକବେଷରେ, ଶ୍ରୀବତ୍ସଚିହ୍ନଯୁକ୍ତ, ଅମିତ ତେଜସ୍ବୀ ସେହି ବାଳକକୁ; ସେ ସେହି ବଟବୃକ୍ଷର ଶାଖାରେ ପୂର୍ବବତ୍ ବସିଥିଲା, ଯେନେ ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ନିଜ ଉଦରେ ଧାରଣ କରିଛି।

Verse 129

ततो मामब्रवीद्‌ बाल: स प्रीत: प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्‌ पीतवासा महाद्युति:,तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान्‌ उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा--

ତାପରେ ସେହି ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ, ପୀତାମ୍ବରଧାରୀ, ଶ୍ରୀବତ୍ସଚିହ୍ନରେ ଭୂଷିତ କାନ୍ତିମାନ ବାଳକ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ, ଯେନେ ହସୁଥିବା ପରି, ମୋତେ କହିଲା।

Verse 130

अपीदानीं शरीरेडस्मिन्‌ मामके मुनिसत्तम | उषितस्त्व॑ सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे,“'मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ”

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ! ତୁମେ କି ଏବେ ମୋର ଏହି ଶରୀର ଭିତରେ ବସି ସୁବିଶ୍ରାନ୍ତ ହୋଇଛ? ମୋତେ କୁହ।

Verse 131

मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्‌,फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଅଳ୍ପକ୍ଷଣ ପରେ ମୋ ମନରେ ପୁନଃ ଏକ ନୂତନ ଦୃଷ୍ଟି ଉଦିତ ହେଲା; ତାହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ନିଜକୁ ମାୟାରୁ ମୁକ୍ତ ଓ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଚେତନାସମ୍ପନ୍ନ—ମନ ପୁନଃ ସ୍ଥିର—ଦେଖିଲି।

Verse 132

तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिषछ्ितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरड्जुलीभिविराजितौ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହେ ତାତ! ତାହାର ପାଦଦ୍ୱୟ—ତାମ୍ରବର୍ଣ୍ଣ ତଳସହ—ଦୃଢ଼ଭାବେ ସ୍ଥିତ ଥିଲା। ସୁଗଠିତ ଓ ମନୋହର, କୋମଳ ରକ୍ତାଭ ଆଙ୍ଗୁଳିମାନେ ତାହାକୁ ଶୋଭା ଦେଉଥିଲେ।

Verse 133

दृष्टवा परिमितं तस्य प्रभावममितौजस:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया

ସେ ଅମିତଔଜସ୍‌ ସତ୍ତ୍ୱର ମର୍ଯ୍ୟାଦିତ ତଥାପି ଅଦ୍ଭୁତ ପ୍ରଭାବକୁ ଦେଖି, ଏବଂ ସେ ଅନନ୍ତ ତେଜସ୍ୱୀ ଶିଶୁକୁ ନିହାରି, ମୁଁ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ତାହାର ସମୀପକୁ ଗଲି। ବିନୟରେ ହାତ ଯୋଡ଼ି, ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କର ଅନ୍ତରାତ୍ମା ସେ କମଳଲୋଚନ ଦେବଙ୍କୁ ମୁଁ ଦର୍ଶନ କଲି।

Verse 134

विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचन:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया

ବିନୟରେ ହାତ ଯୋଡ଼ି, ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ସମୀପକୁ ଯାଇ, ମୁଁ ସେ କମଳଲୋଚନ ଦେବଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲି—ଯିଏ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କର ଅନ୍ତରାତ୍ମା।

Verse 135

तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमन्रुवम्‌ । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्‌,फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा--देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ

ତେବେ ମୁଁ କରଯୋଡ଼ି ନମସ୍କାର କରି ଏହିପରି କହିଲି— “ଦେବ! ଆପଣଙ୍କୁ ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଏହି ଉତ୍ତମ ମାୟାକୁ ଜାଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।”

Verse 136

आस्थयेनानुप्रविष्टो5हं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान्‌ सर्वान्‌ समस्तान्‌ जठरे हि ते,'भगवन्‌! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोका अवलोकन किया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଭଗବନ୍! ଆପଣଙ୍କ ମୁଖମାର୍ଗରେ ଆପଣଙ୍କ ଶରୀରରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ଆପଣଙ୍କ ଜଠରରେ ସମଗ୍ର ଜଗତ୍—ସବୁକିଛି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣରୂପେ—ମୁଁ ଦେଖିଛି।”

Verse 137

तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसा: । यक्षगन्धर्वनागाश्न जगत्‌ स्थावरजड्रमम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଦେବ! ଆପଣଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ଶରୀରରେ ଦେବତା, ଦାନବ ଓ ରାକ୍ଷସ; ଯକ୍ଷ, ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ନାଗମାନେ ମଧ୍ୟ—ଏବଂ ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ସମଗ୍ର ଜଗତ୍—ବିଦ୍ୟମାନ।”

Verse 138

“देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत्‌ विद्यमान है ।। त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । ट्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:,'प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଦେବ! ଆପଣଙ୍କ ଶରୀରରେ ଦେବତା, ଦାନବ, ଯକ୍ଷ, ରାକ୍ଷସ, ଗନ୍ଧର୍ବ, ନାଗ ଏବଂ ସ୍ଥାବର-ଜଙ୍ଗମ ସମଗ୍ର ଜଗତ୍ ବିଦ୍ୟମାନ। ଆଉ ହେ ଦେବ! ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରସାଦରୁ ମୋର ସ୍ମୃତି ନଷ୍ଟ ହୋଇନାହିଁ; ଆପଣଙ୍କ ଅନ୍ତଃଶରୀରରେ ନିରନ୍ତର ଶୀଘ୍ର ଗତିରେ ଘୂରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ହେ ପ୍ରଭୁ, ମୋର ସ୍ମରଣଶକ୍ତି କ୍ଷୀଣ ହୋଇନାହିଁ।”

Verse 139

निर्गतो5हमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम्‌,“महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ମହାପ୍ରଭୋ! ମୋର ନିଜର କୌଣସି ଇଚ୍ଛା ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ, କେବଳ ଆପଣଙ୍କ ଇଚ୍ଛାରେ ମୁଁ ବାହାରିଆସିଛି। ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ! ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅନିନ୍ଦ୍ୟ ଓ ସର୍ବୋତ୍କୃଷ୍ଟ ଆପଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।”

Verse 140

इह भूत्वा शिशु: साक्षात्‌ कि भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमहसि,“आप इस सम्पूर्ण जगत्‌को पी करके यहाँ साक्षात्‌ बालकवेषमें क्‍यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें

ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ ପାନ କରି, ଆପଣ ଏଠାରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଶିଶୁରୂପେ କାହିଁକି ଅବସ୍ଥିତ? କୃପାକରି ଏ ସବୁ କଥା କହନ୍ତୁ।

Verse 141

किमर्थ च जगत्‌ सर्व शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम,“अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?

ଅନଘ! କେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତ ଆପଣଙ୍କ ଶରୀରରେ ଅବସ୍ଥିତ? ଶତ୍ରୁଦମନ! ଏହି ପ୍ରକଟ ରୂପରେ ଆପଣ ଏଠାରେ କେତେକାଳ ରହିବେ?

Verse 142

एतदिच्छामि देवेश श्रोतु ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्‌,'देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ

ଦେବେଶ! କମଳପତ୍ରାକ୍ଷ! ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ସହଜ ଜିଜ୍ଞାସାରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ, ମୁଁ ଆପଣଙ୍କଠାରୁ ଏ ସବୁ କଥା ଯଥାର୍ଥଭାବେ ବିସ୍ତାରରେ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।

Verse 143

महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्‌ प्रभो । इत्युक्त: स मया श्रीमान्‌ देवदेवो महाद्युति: । सान्त्वयन्‌ मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,'प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।” मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान्‌ मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले

ମୁଁ କହିଲି—“ପ୍ରଭୋ! ମୁଁ ଯାହା ଦେଖିଛି, ତାହା ମହାନ୍ ଓ ଅଚିନ୍ତ୍ୟ।” ଏପରି କହିବା ପରେ, ମହାଦ୍ୟୁତି ଦେବଦେବ, ଶ୍ରୀମାନ୍—ବକ୍ତାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଭଗବାନ ମୋତେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 187

इस प्रकार श्रीम्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वनें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ମାର୍କଣ୍ଡେୟସମାସ୍ୟାପର୍ବରେ ମତ୍ସ୍ୟୋପାଖ୍ୟାନ-ବିଷୟକ ଏକଶେ ସତାଶୀତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 188

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବର ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟାପର୍ବରେ ଏକଶେ ଅଠାଶିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 213

आदितो मनुजव्याप्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये । ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलय होनेके पश्चात्‌ इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्वर्यमय जगत्‌ पुनः उत्पन्न हो जाता है

ହେ ମନୁଜବ୍ୟାଘ୍ର! ସମଗ୍ର ଜଗତର କ୍ଷୟର ଆଦିରୁ ସେଇ ଅନ୍ତର୍ୟାମୀ ପରମାତ୍ମା ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଜାଣନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କୁ ବେଦମାନେ ମଧ୍ୟ ଜାଣିପାରନ୍ତି ନାହିଁ। ହେ ନୃପଶିରୋମଣି, ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସମଗ୍ର ଜଗତ ପ୍ରଳୟ ପରେ ସେଇ ଆଦିଭୂତ ପରମେଶ୍ୱରଙ୍କୁ ନିମିତ୍ତ କରି ଏହି ଆଶ୍ଚର୍ୟମୟ ଜଗତ ପୁନଃ ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ।

Verse 236

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्व॒ ततः: परम्‌ । तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତ୍ରେତାୟୁଗ ତିନି ହଜାର ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷର ବୋଲି କୀର୍ତ୍ତିତ। ତାହାର ସନ୍ଧ୍ୟା ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ମଧ୍ୟ ସମ ପରିମାଣ—ପ୍ରତ୍ୟେକ ତିନିଶେ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ। ଏହିପରି ସନ୍ଧ୍ୟା-ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ସହିତ ସେ ଯୁଗ ଛତ୍ତିଶେ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷର ହୁଏ।

Verse 246

तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्ष तथाविध: । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अत: सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦ୍ୱାପରୟୁଗର ସନ୍ଧ୍ୟା ଦୁଇଶେ (ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ) ଏବଂ ସନ୍ଧ୍ୟାଂଶ ମଧ୍ୟ ସେହି ପରିମାଣର। ଦ୍ୱାପର ଦୁଇ ହଜାର ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷର ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ଆରମ୍ଭ ଓ ଶେଷରେ ଦୁଇଶେ କରି ଯୋଗ ହେଲେ ମୋଟ ଚବିଶେ ଦିବ୍ୟ ବର୍ଷ ହୁଏ।

Verse 283

लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं त॑ विदुर्बुधा: । नरश्रेष्ठ] एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत्‌ ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान्‌ पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ମନୁଜବ୍ୟାଘ୍ର! ବୁଦ୍ଧିମାନମାନେ ଏହାକୁ ଲୋକମାନଙ୍କର ପ୍ରଳୟ ବୋଲି ଜାଣନ୍ତି। ହେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏକ ହଜାର ଚତୁର୍ୟୁଗ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେଲେ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କର ଗୋଟିଏ ଦିନ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୁଏ। ଏହି ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଦିନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମାତ୍ର ଅବସ୍ଥିତ ରହେ; ଦିନ ଶେଷ ହେଲେ ଏହା ନଶିଯାଏ—ଏହିକୁ ଲୋକପ୍ରଳୟ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।

Verse 316

क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शाद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं

ଯୁଗ ଅତିବାହିତ ହୋଇ ଯୁଗାନ୍ତ ଆସିଲେ ଏଠାରେ ଲୋକେ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମ ଅବଲମ୍ବନ କରି ଜୀବିକା ଚାଲାଇବାକୁ ଲାଗନ୍ତି; ଏହାରେ ବର୍ଣ୍ଣଧର୍ମର ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ ହୋଇ ଆଚାରର ସଂକର ହୁଏ।

Verse 463

मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजा: । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायाँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे

ସେହି ଯୁଗରେ ଦ୍ୱିଜମାନେ ମଧ୍ୟ କପଟରେ ନଖ ଓ କେଶ ଧାରଣ କରିବେ—କେବଳ ଦେଖାଦେଖି ପାଇଁ। ଗୃହସ୍ଥାଶ୍ରମର ଭାରକୁ ଭୟ କରି ଲୋକେ ଲୁଟେରା ହେବେ; ମୁନି-ସଦୃଶ ପାଖଣ୍ଡୀ ବେଶ ଧରି ବୈଶ୍ୟବୃତ୍ତିରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଇବେ ଏବଂ ମିଥ୍ୟା ଆଡମ୍ବର ପାଇଁ ନଖ ଓ ଦାଢ଼ି-ମୁଛ ବଢ଼ାଇବେ।

Verse 1323

प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा हभिवन्दितौ | तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया

ମୁଁ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଧରି ମସ୍ତକରେ ପ୍ରଣାମ କଲି। ପରେ, ତାତ, ସେହି ବାଳକର ସୁନ୍ଦର ଓ ସୁପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଚରଣ—କୋମଳ ରକ୍ତିମ ଅଙ୍ଗୁଳିରେ ଶୋଭିତ ଏବଂ ଲାଲ ତଳପାଦ ଥିବା—ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଧରି ମୋ ମସ୍ତକରେ ରଖି ମୁଁ ବିନୟରେ ନତ ହେଲି।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks how to remain established in dharma while protecting subjects and acting in the world without deviating from svadharma; the response frames doubt itself as a risk to dharmic stability when it becomes excessive suspicion toward sound counsel.

Govern through compassion and protection as if subjects were one’s own children; correct missteps through appropriate giving; honor ancestors and deities; and maintain disciplined respect toward learned authorities, treating dharma as the ruler’s continuous inner alignment in thought, speech, and action.

Yes. The chapter explicitly frames the discourse as conveying past and future knowledge remembered from Vāyu-proclaimed tradition and r̥ṣi-praised purāṇic material, and it closes by noting the audience’s astonishment at the purāṇa-style exposition—signaling its didactic and archival intent.