
Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
Upa-parva: Vāraṇāvata-gamana (Pāṇḍava-pravāsa) Episode
Vaiśaṃpāyana reports that Duryodhana gradually consolidates key constituencies through material incentives and honorific gestures. Skilled ministers, acting under Dhṛtarāṣṭra’s direction, repeatedly describe Vāraṇāvata as exceptionally delightful and prosperous, emphasizing its festivals, beauty, and abundance. As these reports circulate, a plan forms for the Pāṇḍavas’ travel to Vāraṇāvata. Dhṛtarāṣṭra addresses the Pāṇḍavas, presenting the journey as an opportunity to enjoy the festivities with attendants, distribute gifts to Brahmins and singers, and return happily to Hāstinapura afterward. Yudhiṣṭhira understands Dhṛtarāṣṭra’s intent and acknowledges his own lack of supportive power, yet replies with formal acceptance. He then informs senior figures—Bhīṣma, Vidura, Droṇa, Bāhlika, Somadatta, Kṛpa, and Gāndhārī—stating that they will reside in Vāraṇāvata by the king’s command. The elders respond with auspicious blessings for safe passage and protection from misfortune. After performing customary rites and completing preparations, the Pāṇḍavas depart for Vāraṇāvata, explicitly linked to the pursuit of political security and eventual restoration of status.
Chapter Arc: गौतमगोत्रीय शरद्वान के वंश-प्रसंग से कथा धनुर्वेद और ब्राह्मतेज की पृष्ठभूमि रचती है—और उसी धरातल पर द्रोण–द्रुपद की मित्रता का स्मरण उभरता है। → पंचालराज द्रुपद, द्रोण के प्रेमपूर्ण मित्र-वचनों को सुनकर भी ऐश्वर्य-मद में भर उठता है; क्रोध से भौंहें टेढ़ी, नेत्र रक्त—वह मित्रता की समानता पर प्रश्न उठाता है: ‘जो श्रोत्रिय नहीं, वह श्रोत्रिय का मित्र कैसे? जो राजा नहीं, वह राजा का मित्र कैसे?’ इस अपमान से द्रोण का मन्यु भीतर-भीतर जलने लगता है। → द्रुपद का कटु निषेध—मित्रता को पद-प्रतिष्ठा की कसौटी पर तोलना—द्रोण के भीतर प्रतिशोध का संकल्प पक्का कर देता है; वह समझ लेता है कि अब न्याय/प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना केवल शक्ति-साधना और राजाश्रय से होगी। → द्रोण अपने जीवन को नए लक्ष्य पर मोड़ता है: पुत्र अश्वत्थामा (कृपी से) की प्राप्ति और भविष्य की सिद्धि के लिए वह राजकीय संरक्षण खोजने लगता है; द्रुपद के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर वह उसी ‘प्रिय सखा’ के पास जाने का निश्चय करता है, पर अब भाव मित्रता का नहीं—प्रतिज्ञा का है। → कुमारों से संवाद के बाद द्रोण उन्हें भीष्म के पास भेजने का संकेत देता है—अब प्रश्न यह है कि भीष्म द्रोण को किस रूप में स्वीकार करेंगे: आचार्य, शरणागत, या भविष्य के युद्ध-यंत्र के रूप में?
Verse 1
ऑपन--माज बक। चॉ-ज:ड: - गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वानूको भी गौतम कहा जाता था। - धर्नुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं--मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त तथा मन्त्रमुक्त। छोड़े जानेवाले बाण आदिको "मुक्त! कहते हैं। जिन्हें हाथमें लेकर प्रहार किया जाय, उन खड़्ग आदिको “अमुक्त” कहते हैं। जिस अस्त्रको चलाने और समेटनेकी कला मालूम हो, वह अस्त्र 'मुक्तामुक्तर कहलाता है। जिसे मन्त्र पढ़कर चला तो दिया जाय किंतु उसके उपसंहारकी विधि मालूम न हो, वह अस्त्र 'मन्त्रमुक्त' कहा गया है, शस्त्र, अस्त्र, प्रत्यस्त्र और परमास्त्र--ये भी धरनुर्वेदके चार भेद हैं। इसी प्रकार आदान, संधान, विमोक्ष और संहार--इन चार क्रियाओंके भेदसे भी धनुर्वेदके चार भेद होते हैं। त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: द्रोणका द्रुपदसे तिरस्कृत हो हस्तिनापुरमें आना, राजकुमारोंसे उनकी भेंट, उनकी बीटा* और अँगूठीको कुएँमेंसे निकालना एवं भीष्मका उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाज: प्रतापवान् | अनब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रतापी द्रोण राजा ट्रपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले--'राजन! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ പ്രതാപശാലിയായ ഭാരദ്വാജപുത്രൻ ദ്രോണൻ രാജാവ് ദ്രുപദനെ സമീപിച്ച് പറഞ്ഞു—“രാജാവേ, ഇവിടെ എന്നെ നിന്റെ സുഹൃത്തായി അറിയുക; നിന്നെ കാണാനാണ് ഞാൻ വന്നത്.”
Verse 2
इत्येवमुक्त: सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वर: । भारद्वाजेन पाज्चालो नामृष्यत वचो<5स्य तत्,मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश ट्रपद उनकी इस बातको सह न सके
സുഹൃദ്ഭാവത്തോടെ ദ്രോണൻ പ്രീതിപൂർവ്വം ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ, പാഞ്ചാലരാജാവായ ദ്രുപദന് ഭാരദ്വാജപുത്രന്റെ ആ വാക്കുകൾ സഹിക്കാനായില്ല.
Verse 3
सक्रोधामर्षजिद्दय भ्रू: कषघायीकृतलोचन: । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम्,क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले
കോപവും അപമാനബോധവും കൊണ്ട് അവന്റെ ഭ്രൂകൾ ചുളിഞ്ഞു, കണ്ണുകൾ ചുവന്നു; ഐശ്വര്യമദത്തിൽ മത്തനായ രാജാവ് ദ്രോണനോട് ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു.
Verse 4
हुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं॑ सखा ते5हमिति द्विज,द्रपदने कहा--ब्रह्मन! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य--अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है। तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ
ദ്രുപദൻ പറഞ്ഞു—“ബ്രാഹ്മണാ, നിന്റെ ബുദ്ധി അപക്വമാണ്; യോജ്യമായ മര്യാദയോട് ഒത്തുപോകുന്നില്ല. അതുകൊണ്ടാണ് നീ ധൃഷ്ടതയോടെ എന്നോട് ‘ഹേ ദ്വിജാ, ഞാൻ നിന്റെ സുഹൃത്ത്’ എന്നു പറയുന്നത്.”
Verse 5
न हि रज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतै:,ओ मूढ़! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती
ഓ മന്ദബുദ്ധിയേ! മഹാപ്രതാപികളായ രാജാക്കന്മാർ നിനക്കുപോലെ ശ്രീഹീനനും ധനച്യുതനുമായ മനുഷ്യരുമായി ഒരിക്കലും സൗഹൃദം സ്ഥാപിക്കുകയില്ല.
Verse 6
सौह्दान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यत: । सौद्ददं मे त्वया हयासीत् पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्,समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय मैं और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे
കാലം കടന്നുപോകുമ്പോൾ മനുഷ്യൻ ജീർണ്ണിക്കുന്നതുപോലെ സൗഹൃദബന്ധവും ജീർണ്ണിക്കുന്നു. മുമ്പ് നിനക്കൊപ്പമുള്ള എന്റെ സൗഹൃദം സാമർത്ഥ്യത്തിന്റെ ബന്ധമായിരുന്നു—അന്ന് നീയും ഞാനും ശക്തിയിൽ സമന്മാരായിരുന്നു.
Verse 7
न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो होन॑ विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत,लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है
ഈ ലോകത്ത് ആരുടെയും ഹൃദയത്തിൽ സൗഹൃദം അജരമായി നിലനിൽക്കില്ല. കാലം സുഹൃത്തുകളെ വേർപെടുത്തും; ക്രോധവും മനുഷ്യനെ സൗഹൃദത്തിൽ നിന്ന് അകറ്റിക്കൊണ്ടുപോകും.
Verse 8
मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्,इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे-- इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी
ഇങ്ങനെ ജീർണ്ണിച്ച സൗഹൃദത്തെ ആശ്രയിക്കരുത്; ‘നാം ഇരുവരും സുഹൃത്തുക്കൾ’ എന്ന ഭാവം ഹൃദയത്തിൽ നിന്ന് നീക്കുക. ഹേ ദ്വിജശ്രേഷ്ഠാ! മുമ്പ് നിനക്കൊപ്പമുള്ള എന്റെ സൗഹൃദം സ്വാർത്ഥബന്ധിതമായിരുന്നു—ഒരുമിച്ച് കളിക്കുക, പഠിക്കുക മുതലായ നേട്ടങ്ങൾക്കായി.
Verse 9
न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुष: सखा । न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते,सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवानका, मूर्ख विद्वान्का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो
സത്യം ഇതാണ്—ദരിദ്രന് ധനവാന്റെ കൂട്ടുകാരനാകാൻ കഴിയില്ല; അവിദ്വാൻ വിദ്വാന്റെ കൂട്ടുകാരനാകാൻ കഴിയില്ല; ഭീരുവിന് ശൂരന്റെ കൂട്ടുകാരനാകാൻ കഴിയില്ല. അപ്പോൾ പഴയകാല സൗഹൃദത്തിൽ എന്ത് ആശ്രയം?
Verse 10
ययोरेव सम॑ वित्तं ययोरेव सम॑ श्रुतम् । तयोरविवाह: सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयो:,जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान् और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती
ധനം സമവും ശ്രുതം (വിദ്യ) സമവുമായവർക്കിടയിലാണ് വിവാഹവും സൗഹൃദവും യഥാർത്ഥമായി നിലനിൽക്കുന്നത്. പുഷ്ടനും അപുഷ്ടനും—സമൃദ്ധനും ദരിദ്രനും—ഇവർക്കിടയിൽ സത്യസൗഹൃദം ദീർഘകാലം നിലനിൽക്കില്ല.
Verse 11
नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते,जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो?
ശ്രോത്രിയനല്ലാത്തവന് ശ്രോത്രിയന്റെ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല; രഥിയല്ലാത്തവന് രഥിയുടെ കൂട്ടുകാരനാകാൻ കഴിയില്ല; അതുപോലെ രാജാവല്ലാത്തവന് ഒരു രാജാവിന്റെ യഥാർത്ഥ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല. പിന്നെ നീ പഴയ സൗഹൃദം എന്തിന് ഓർമ്മിപ്പിക്കുന്നു?
Verse 12
वैशग्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान् | मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिष्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഹേ ജനമേജയ! ദ്രുപദൻ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ പ്രതാപവാനായ ഭാരദ്വാജപുത്രൻ ദ്രോണൻ ക്രോധത്തിൽ മുങ്ങിപ്പോയി. അല്പനേരം ചിന്തയിൽ ലീനനായി, അവന്റെ മനസ്സ് വൈരാഗ്യത്തോടെ നിറഞ്ഞു.
Verse 13
स विनिश्ित्य मनसा पाज्चालं प्रति बुद्धिमान् जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा द्रुपदके यों कहनेपर प्रतापी द्रोण क्रोधसे जल उठे और दो घड़ीतक गहरी चिन्तामें डूबे रहे। वे बुद्धिमान् तो थे ही, पांचालनरेशसे बदला लेनेके विषयमें मन-ही-मन कुछ निश्चय करके कौरवोंकी राजधानी हस्तिनापुर नगरमें चले गये
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ബുദ്ധിമാനായ ദ്രോണൻ പാഞ്ചാലാധിപനോടു പ്രതികാരം ചെയ്യുവാൻ മനസ്സിൽ ദൃഢനിശ്ചയം ഉറപ്പാക്കി, കുരുശ്രേഷ്ഠരുടെ നഗരമായ നാഗസാഹ്വയം—ഹസ്തിനാപുരം—വഴി പുറപ്പെട്ടു.
Verse 14
स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजो5वसत् तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तम:,हस्तिनापुरमें पहुँचकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके घरमें गुप्तरूपसे निवास करने लगे
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—നാഗപുരം (ഹസ്തിനാപുരം) എത്തി, ദ്വിജശ്രേഷ്ഠനായ ഭാരദ്വാജപുത്രൻ ദ്രോണൻ ഗൗതമവംശജനായ കൃപന്റെ വസതിയിൽ മറഞ്ഞുകഴിഞ്ഞ് താമസിച്ചു.
Verse 15
ततो<स्य तनुज: पार्थान् कृपस्यानन्तरं प्रभु: । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जना:,वहाँ उनके पुत्र शक्तिशाली अभश्व॒त्थामा कृपाचार्यके बाद पाण्डवोंको स्वयं ही अस्त्रविद्याकी शिक्षा देने लगे; किंतु लोग उन्हें पहचान न सके
അപ്പോൾ അവന്റെ പുത്രൻ—പരാക്രമശാലിയായ അശ്വത്താമാവ്—കൃപാചാര്യനുശേഷം സ്വയം പാർത്ഥന്മാർക്ക് അസ്ത്രവിദ്യ പഠിപ്പിക്കാൻ തുടങ്ങി; എന്നാൽ ജനങ്ങൾ അവന്റെ യഥാർത്ഥത തിരിച്ചറിഞ്ഞില്ല.
Verse 16
एवं स तत्र गूढात्मा कंचित् कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्प समेता गजसाह्दयात्,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी
ഇങ്ങനെ ദ്രോണൻ അവിടെ ആത്മാവിൽ ഗൂഢനായി കുറെകാലം പാർത്തു. പിന്നെ ഒരു ദിവസം ഗജസാഹ്വയം (ഹസ്തിനാപുരം) നിന്നു പുറപ്പെട്ടു കൗരവ-പാണ്ഡവ കുമാരന്മാർ എല്ലാവരും ആനന്ദത്തോടെ ഒന്നിച്ചു ചേർന്നു.
Verse 17
क्रीडन्तो वीटया तत्र वीरा: पर्यचरन् मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा,इस प्रकार द्रोणने वहाँ अपने आपको छिपाये रखकर कुछ कालतक निवास किया। तदनन्तर एक दिन कौरव-पाण्डव सभी वीर कुमार हस्तिनापुरसे बाहर निकलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मिलकर वहाँ गुल्ली-डंडा खेलने लगे। उस समय खेलमें लगे हुए उन कुमारोंकी वह बीटा कुएँमें गिर पड़ी
അവിടെ ആ വീര കുമാരന്മാർ വീടാ (കളിക്കോൽ/ഗുള്ളി) കൊണ്ട് ആനന്ദത്തോടെ കളിച്ചു നടന്നു. കളിയിൽ മുഴുകിയിരിക്കെ അവരുടെ ആ വീടാ കിണറ്റിൽ വീണുപോയി.
Verse 18
ततस्ते यत्नमातिष्ठन् वीटामुद्धर्तुमादृता: । नच ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये,तब वे उस बीटाको निकालनेके लिये बड़ी तत्परताके साथ प्रयत्नमें लग गये; परंतु उसे प्राप्त करनेका कोई भी उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया
അപ്പോൾ അവർ ആ വീടാ പുറത്തെടുക്കാൻ ഉത്സാഹത്തോടെ ശ്രമിച്ചു; എന്നാൽ അത് ലഭ്യമാക്കാൻ യാതൊരു മാർഗവും അവർക്കു തോന്നിയില്ല.
Verse 19
ततोडन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनतानना: । तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन्,इस कारण लज्जासे नतमस्तक होकर वे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे। गुल्ली निकालनेका कोई उपाय न मिलनेके कारण वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये
അപ്പോൾ ലജ്ജയാൽ മുഖം താഴ്ത്തി അവർ പരസ്പരം നോക്കി. അതിന് മാർഗം കണ്ടെത്താനാകാതെ അവർ അത്യന്തം വ്യാകുലരായി.
Verse 20
ते5पश्यन् ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम् । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम्,इसी समय उन्होंने एक श्याम वर्णके ब्राह्मणको थोड़ी ही दूरपर बैठे देखा, जो अग्निहोत्र करके किसी प्रयोजनसे वहाँ रुके हुए थे। वे आपत्तिग्रस्त जान पड़ते थे। उनके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीर अत्यन्त दुर्बल था
അപ്പോൾ അവർ അകലെയല്ലാതെ ഒരു ശ്യാമവർണ്ണനായ ബ്രാഹ്മണനെ അവിടെ ഇരിക്കുന്നതായി കണ്ടു—അവൻ അഗ്നിഹോത്രം നിർവഹിച്ചു ഏതോ ആവശ്യാർത്ഥം അവിടെ താമസിച്ചിരുന്നതായിരുന്നു. അവൻ ദുരിതത്തിലായവനെന്നു തോന്നി; മുടി നരച്ചിരുന്നു, ശരീരം അത്യന്തം ക്ഷീണിച്ചിരുന്നു.
Verse 21
उन महात्मा ब्राह्मगको देखकर वे सभी कुमार उनके पास गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये। उनका उत्साह भंग हो गया था। कोई काम करनेकी इच्छा नहीं होती थी। मनमें भारी निराशा भर गयी थी
ആ മഹാത്മ ബ്രാഹ്മണനെ കണ്ടപ്പോൾ ആ കുമാരന്മാർ എല്ലാവരും അദ്ദേഹത്തിന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു അദ്ദേഹത്തെ ചുറ്റിനിന്നു. അവരുടെ ഉത്സാഹം തകർന്നിരുന്നു; ഒന്നും ചെയ്യാനുള്ള ആഗ്രഹം ശേഷിച്ചില്ല. മനസ്സിൽ ഭാരമേറിയ നിരാശ നിറഞ്ഞു.
Verse 22
अथ द्रोण: कुमारांस्तान् दृष्टवा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान्,तदनन्तर पराक्रमी द्रोण यह देखकर कि इन कुमारोंका अभीष्ट कार्य पूर्ण नहीं हुआ है “-ये उसी प्रयोजनसे मेरे पास आये हैं, उस समय मन्द मुसकराहटके साथ बड़े कौशलसे बोले--
അനന്തരം വീര്യവാനായ ദ്രോണൻ ആ കുമാരന്മാരുടെ അഭിലഷിതകാര്യങ്ങൾ പൂർത്തിയായിട്ടില്ലെന്ന് കണ്ടു—അവർ അതേ ആവശ്യാർത്ഥം തന്റെ അടുക്കൽ വന്നിരിക്കുന്നുവെന്ന് മനസ്സിലാക്കി—മന്ദഹാസത്തോടെ കൗശലപൂർവ്വം ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു—
Verse 23
अहो वो धिग् बल क्षात्रं धिगेतां व: कृतास्त्राताम् । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत,“अहो! तुमलोगोंके क्षत्रिययलको धिक्कार है और तुमलोगोंकी इस अस्त्र-विद्या- विषयक निपुणताको भी धिक्कार है; क्योंकि तुमलोग भरतवंशमें जन्म लेकर भी कुएँमें गिरी हुई गुल्लीको नहीं निकाल पाते
“അഹോ! നിങ്ങളുടെ ക്ഷാത്രബലത്തിന് ധിക്കാരം; നിങ്ങളുടെ അസ്ത്രവിദ്യാനിപുണതയ്ക്കും ധിക്കാരം; കാരണം ഭരതവംശത്തിൽ ജനിച്ചിട്ടും കിണറ്റിൽ വീണ ഒരു ചെറു ഗുള്ളി പോലും നിങ്ങൾക്ക് എടുത്തെടുക്കാൻ കഴിയുന്നില്ല.”
Verse 24
वीटां च मुद्रिकां चैव हाहमेतदपि द्वयम् । उद्धरेयमिषीकाभिशर्भोजन मे प्रदीयताम्,“देखो, मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस आअँगूठी दोनोंको सींकोंसे निकाल सकता हूँ। तुमलोग मेरी जीविकाकी व्यवस्था करो”
“നോക്കൂ! നിങ്ങളുടെ ഗുള്ളിയും എന്റെ ഈ മോതിരവും—ഇരണ്ടും ഞാൻ വെറും നേർത്ത കാട്ടുകൊമ്പുകൾ (ഇഷീകകൾ) കൊണ്ടു തന്നെ പുറത്തെടുക്കാം. എന്റെ ഉപജീവനത്തിനുള്ള ക്രമം നിങ്ങൾ ചെയ്യുക.”
Verse 25
एवमुक््त्वा कुमारांस्तान् द्रोण: स्वाडुलिवेष्टनम् । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदम:,उन कुमारोंसे यों कहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणने उस निर्जल कुएँमें अपनी अँगूठी डाल दी
അങ്ങനെ ആ കുമാരന്മാരോട് പറഞ്ഞിട്ട്, ശത്രുദമനായ ദ്രോണൻ ആ ജലമില്ലാത്ത കിണറ്റിൽ തന്റെ മോതിരം എറിഞ്ഞു.
Verse 26
युधिछिर उवाच कृपस्यानुमते ब्रह्मन् भिक्षामाप्तुहि शाश्वतीम्
യുധിഷ്ഠിരൻ പറഞ്ഞു—“ഹേ ബ്രാഹ്മണാ! കൃപയുടെ അനുവാദത്തോടെ ഞാൻ ഇവിടെ ഭിക്ഷ ലഭിക്കുവാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു; അത് ശാശ്വതമായ ഉപജീവനമാർഗമാകട്ടെ.”
Verse 27
द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता,द्रोण बोले--ये मुदट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है
ദ്രോണൻ പറഞ്ഞു—“ഇത് ഇഷീകകളുടെ ഒരു മുഷ്ടിയാണ്; ഞാൻ ഇതിനെ അസ്ത്ര-മന്ത്രംകൊണ്ട് അഭിമന്ത്രിതമാക്കിയിരിക്കുന്നു.”
Verse 28
अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते । भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया,तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूँगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींकको बींधूँगा
ദ്രോണൻ പറഞ്ഞു—“ഇതിന്റെയീ വീര്യം നോക്കുവിൻ; മറ്റൊരുവനിലും ഇല്ലാത്തത്. ഒരു ഇഷീകകൊണ്ട് ഞാൻ ലക്ഷ്യം ഭേദിക്കും; പിന്നെ മറ്റൊരു ഇഷീകകൊണ്ട് ആ ആദ്യ ഇഷീകയെയും ഭേദിക്കും.”
Verse 29
वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्व कृतमज्जसा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—“അതിനുശേഷം ദ്രോണൻ പറഞ്ഞതുപോലെ അതെല്ലാം അനായാസം നടന്നു.”
Verse 30
तददवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचना: । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचो<ब्रुवन्,यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले
ആ അത്ഭുതകർമ്മം കണ്ടപ്പോൾ കുമാരന്മാരുടെ കണ്ണുകൾ വിസ്മയത്തോടെ വിരിഞ്ഞു. ഇത് അത്യന്തം അത്ഭുതകരമെന്ന് കരുതി, വിസ്മയാവേശത്തോടെ അവർ സംസാരിക്കാൻ തുടങ്ങി.
Verse 31
कुमारा ऊचु. मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारोंने कहा--ब्रह्मर्ष! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० १ कल वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय भरनुद्रोणो महायशा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
കുമാരന്മാർ പറഞ്ഞു—“ഹേ ബ്രഹ്മർഷേ, ഈ മുദ്രികയും വേഗത്തിൽ എടുത്തുകൊടുക്കുക.”
Verse 32
शरेण विद्ृध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभु: । सशरं समुपादाय कूपादड्जुलिवेष्टनम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ പരാക്രമശാലിയും പ്രശസ്തനുമായ ദ്രോണൻ ധനുസ്സും അമ്പും എടുത്ത്, അമ്പുകൊണ്ട് ആ മുദ്രികയെ കുത്തിവെച്ച് കിണറ്റിൽ നിന്ന് മുകളിലേക്ക് വലിച്ചെടുത്തു. അമ്പോടുകൂടി മുദ്രിക പുറത്തെടുത്ത് വിസ്മയിച്ച കുമാരന്മാരുടെ കൈകളിൽ വെച്ചു; എന്നാൽ അദ്ദേഹം സ്വയം ലേശമാത്രവും വിസ്മയിച്ചില്ല.
Verse 33
ददौ तत: कुमाराणां विस्मितानामविस्मित: । मुद्रिकामुद्धूतां दृष्टवा तमाहुस्ते कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँसे बाणसहित अँगूठी निकालकर उन आश्वर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—കുമാരന്മാർ വിസ്മയിച്ചുനിന്നപ്പോൾ, ദ്രോണൻ സ്വയം അവിസ്മിതനായി അത് അവർക്കു നൽകി. കിണറ്റിൽ നിന്ന് എടുത്ത ആ മുദ്രിക കണ്ടിട്ട് കുമാരന്മാർ അദ്ദേഹത്തോട് വീണ്ടും പറഞ്ഞു.
Verse 34
कुमारा ऊचु: अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते । को5सि कस्यासि जानीमो वयं कि करवामहे,कुमार बोले--ब्रह्मन! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं--यह हम जानना हैं। बताइये, हमलोग आपकी कया सेवा करें?
കുമാരന്മാർ പറഞ്ഞു—“ഹേ ബ്രഹ്മണാ, ഞങ്ങൾ നിങ്ങളെ അഭിവാദ്യം ചെയ്യുന്നു. ഇത്തരമൊരു ആയുധകൗശലം മറ്റാരിലും ഇല്ല. നിങ്ങൾ ആരാണ്? ആരുടെ പുത്രൻ? ഞങ്ങൾ അറിയാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു. പറയുക—ഞങ്ങൾ നിങ്ങളെന്ത് സേവ ചെയ്യണം?”
Verse 35
द्रोण उदाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्व माम्
ദ്രോണം പറഞ്ഞു—“ഭീഷ്മനോടും എന്നെ വിവരിക്കുവിൻ—എന്റെ രൂപത്താലും ഗുണങ്ങളാലും.”
Verse 36
वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचु: कुमारका:,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“തഥാസ്തു” എന്നു പറഞ്ഞ് ആ കുമാരന്മാർ ഭീഷ്മന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു, ആ ബ്രാഹ്മണന്റെ സത്യവചനങ്ങളും അവൻ പ്രകടിപ്പിച്ച അത്ഭുതപരാക്രമവും ഭീഷ്മനോട് അറിയിച്ചു. അവരുടെ വാക്കുകൾ കേട്ട് ഭീഷ്മൻ—ആ ബ്രാഹ്മണൻ ആചാര്യ ദ്രോണം തന്നെയെന്ന് തിരിച്ചറിഞ്ഞു.
Verse 37
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् | भीष्म: श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत,वैशम्पायनजी कहते हैं--“बहुत अच्छा” कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्यणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं
ആ ബ്രാഹ്മണന്റെ വചനങ്ങൾ സത്യമായിരുന്നു; അവന്റെ പ്രവൃത്തിയും അതുപോലെ അത്യസാധാരണമായിരുന്നു. കുമാരന്മാരുടെ വൃത്താന്തം കേട്ട് ഭീഷ്മൻ അവനെ ദ്രോണമെന്നു തിരിച്ചറിഞ്ഞു.
Verse 38
युक्तरूप: स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च | अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया
“ഇവൻ തന്നെയാണ് കുമാരന്മാർക്കു യോജ്യനായ ഗുരു” എന്നു ചിന്തിച്ച് ഭീഷ്മൻ സ്വയം അവനെ കൊണ്ടുവന്ന് യഥോചിതമായി സത്കരിച്ചു.
Verse 39
परिपप्रच्छ निपुणं भीष्म: शस्त्रभृतां वर: | हेतुमागमने तच्च द्रोण: सर्व न्यवेदयत्,फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया
ശസ്ത്രധാരികളിൽ ശ്രേഷ്ഠനായ ഭീഷ്മൻ നിപുണമായി ദ്രോണനോട് അവന്റെ വരവിന്റെ കാരണം ചോദിച്ചു; അപ്പോൾ ദ്രോണം ആ മുഴുവൻ കാരണവും അറിയിച്ചു.
Verse 40
द्रोण उदाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत । अन्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदजिघृक्षया,द्रोणाचार्यने कहा--अपनी प्रतिज्ञासे कभी च्युत न होनेवाले भीष्मजी! पहलेकी बात है, मैं अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा तथा धरनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये महर्षि अग्निवेशके समीप गया था
ദ്രോണൻ പറഞ്ഞു—അച്യുതപ്രതിജ്ഞനായ ഭീഷ്മാ! പൂർവ്വകാലത്ത് ഞാൻ ധനുർവേദജ്ഞാനവും അസ്ത്രശസ്ത്രവിദ്യയും നേടുവാൻ മഹർഷി അഗ്നിവേശന്റെ സന്നിധിയിലേക്കു പോയിരുന്നു।
Verse 41
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा: । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:,वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोतक रहा। गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया
അവിടെ ഞാൻ വിനീതഹൃദയനായ ബ്രഹ്മചാരിയായി, ജട ധരിച്ച്, അനേകം വർഷങ്ങൾ പാർത്തു. ഗുരുശുശ്രൂഷയിൽ നിരന്തരം രതനായി, ദീർഘകാലം അവരുടെ ആശ്രമത്തിൽ വസിച്ചു।
Verse 42
पाज्चालो राजपुत्रश्न यज्ञसेनो महाबल: । इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत् तस्मिन्नेव गुरौ प्रभु:,उन दिनों पंचालराजकुमार महाबली यज्ञसेन ट्रुपद भी, जो बड़े शक्तिशाली थे, धनुर्वेदकी शिक्षा पानेके लिये उन्हीं गुरुदेव अग्निवेशके समीप रहते थे
അന്നാളുകളിൽ പാഞ്ചാലരാജകുമാരനായ മഹാബലവാൻ യജ്ഞസേനൻ (ദ്രുപദൻ)യും അസ്ത്രവിദ്യയും ധനുർവേദവും പഠിക്കുവാൻ അതേ ഗുരുവിന്റെ അടുക്കൽ തന്നെ പാർത്തിരുന്നു।
Verse 43
स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्न मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो,वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल- जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा
അവിടെ അവൻ എന്റെ സഖാവായിരുന്നു—എനിക്ക് ഉപകാരിയും പ്രിയനും. പ്രഭോ! അവനോടൊപ്പം അടുത്ത ബന്ധത്തോടെ ചേർന്ന് ഞാൻ ദീർഘകാലം ആ ആശ്രമത്തിൽ പാർത്തു।
Verse 44
बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकर:,बचपनसे ही हम दोनोंका अध्ययन साथ-साथ चलता था। द्रुपद वहाँ मेरे घनिष्ठ मित्र थे। वे सदा मुझसे प्रिय वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे
ഹേ കൗരവശ്രേഷ്ഠാ! ബാല്യകാലം മുതൽ തന്നെ ഞങ്ങളുടെ പഠനം ഒരുമിച്ചായിരുന്നു. അവിടെ ദ്രുപദൻ എപ്പോഴും എന്റെ അടുത്ത സഖാവ്—സ്നേഹത്തോടെ മധുരവചനങ്ങൾ പറഞ്ഞു, എനിക്ക് പ്രിയമായ കാര്യങ്ങൾ ചെയ്തു കൊണ്ടിരുന്നു।
Verse 45
अब्रवीदिति मां भीष्म वचन प्रीतिवर्धनम् अहं प्रियतमः पुत्र: पितुद्रोण महात्मन:,भीष्मजी! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली यह बात बोले--'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिताका अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“ഹേ ഭീഷ്മാ! അവൻ ഒരിക്കൽ എന്റെ ആനന്ദം വർധിപ്പിക്കുന്ന വാക്കുകൾ പറഞ്ഞു—‘ദ്രോണാ! ഞാൻ എന്റെ മഹാത്മാവായ പിതാവിന്റെ ഏറ്റവും പ്രിയപ്പെട്ട പുത്രനാണ്.’”
Verse 46
अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाड्चालो यदा तदा । त्वद्धोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“താതാ! പാഞ്ചാലരാജാവ് എപ്പോഴെങ്കിലും എന്നെ രാജ്യത്തിൽ അഭിഷേകം ചെയ്യുമ്പോൾ, അപ്പോൾ എന്റെ രാജ്യം നിന്റെ ഭോഗത്തിനായിരിക്കും. സഖേ! സത്യത്തെ സാക്ഷിയാക്കി ഞാൻ ശപഥം ചെയ്യുന്നു—എന്റെ ഭോഗങ്ങളും വൈഭവവും സുഖങ്ങളും എല്ലാം നിന്റെ അധീനത്തിലായിരിക്കും.”
Verse 47
मम भोगाश्च वित्त च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक््त्वाथ वबच्राज कृतास्त्र: पूजितो मया,“तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ--मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“എന്റെ ഭോഗങ്ങളും എന്റെ ധനവും എന്റെ സുഖങ്ങളും—എല്ലാം നിന്റെ അധീനത്തിലാണ്.” ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞ്, ആ രാജകുമാരൻ അസ്ത്രവിദ്യയിൽ പൂർണ്ണനിപുണനായി, എന്റെ കൈകളാൽ ആദരിക്കപ്പെട്ടു, തന്റെ ദേശത്തേക്ക് മടങ്ങി.
Verse 48
तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सो<हं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद् यशस्विनीम्,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“അവൻ പറഞ്ഞ ആ വാക്കുകൾ ഞാൻ എപ്പോഴും മനസ്സിൽ ധരിച്ചു. പിന്നെ പിതൃകളുടെ നിയോഗത്താലും പുത്രപ്രാപ്തിയുടെ ആഗ്രഹത്താലും ഞാൻ ശരദ്വതന്റെ പുത്രിയായ യശസ്വിനി കൃപിയെ വിവാഹം ചെയ്തു—അവൾ നാതികേശി, മഹാപ്രജ്ഞ, മഹാവ്രതപരായണ; അഗ്നിഹോത്രം, സത്രകർമ്മങ്ങൾ, ശമ-ദമാനുഷ്ഠാനങ്ങൾ എന്നിവയിൽ എപ്പോഴും എന്നോടൊപ്പം നിരതയായിരുന്നു.”
Verse 49
नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् । अन्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“ഞാൻ നാതികേശി, മഹാപ്രജ്ഞ, മഹാവ്രതപരായണയായ (കൃപി)യെ വിവാഹം ചെയ്തു; അവൾ അഗ്നിഹോത്രം, സത്രകർമ്മങ്ങൾ, ദമാനുഷ്ഠാനം എന്നിവയിൽ എപ്പോഴും നിരതയായിരുന്നു.”
Verse 50
अलभद् गौतमी पुत्रमश्चत्थामानमौरसम् । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम्,उस गौतमी कृपीने मुझसे मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामाको प्राप्त किया, जो सूर्यके समान तेजस्वी तथा भयंकर पराक्रम एवं पुरुषार्थ करनेवाला है
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഗൗതമീ (കൃപീ) എനിക്കാൽ തന്റെ ഔരസപുത്രനായ അശ്വത്ഥാമനെ പ്രാപിച്ചു; അവൻ സൂര്യസമമായ തേജസ്സും ഭയങ്കര പരാക്രമകൃത്യങ്ങളും ഉള്ളവനായിരുന്നു.
Verse 51
पुत्रेण तेन प्रीतो5हं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्टवा धनिनस्तत्र पुत्रकान् अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद् दिश:,उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी। एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे। उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल-स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा। इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया--मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ആ പുത്രനാൽ എനിക്ക് ഉണ്ടായ സന്തോഷം, എന്റെ പിതാവായ ഭരദ്വാജന് എനിക്കാൽ ഒരിക്കൽ ഉണ്ടായ സന്തോഷത്തോടു തുല്യം. എന്നാൽ ഒരു ദിവസം അവിടെ ധനികരുടെ പുത്രന്മാർ ഗോക്ഷീരം കുടിക്കുന്നതു കണ്ടപ്പോൾ, എന്റെ ചെറുപ്രായക്കാരനായ അശ്വത്ഥാമാ പാൽ വേണമെന്ന് കരഞ്ഞു. ആ കാഴ്ചയിൽ എന്റെ മനസ്സ് വിങ്ങി; കണ്ണിനു മുന്നിൽ ഇരുട്ട് വീണതുപോലെ, ദിക്കുകളെ പോലും തിരിച്ചറിയാൻ സംശയം തോന്നി.
Verse 52
न सनातको<5वसीदेत वर्तमान: स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं॑ देशं बहुशो भ्रमन्,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—‘സ്വകർമങ്ങളിൽ ഏർപ്പെട്ടിരിക്കുന്ന സ്നാതകനെയൊരിക്കലും ദുഃഖത്തിലാക്കരുത്’ എന്ന് മനസ്സിൽ ചിന്തിച്ച് ഞാൻ ആ ദേശത്ത് പലവട്ടം അലഞ്ഞു; ധർമ്മാനുസൃതവും വിശുദ്ധവുമായ ദാനം അനേകം പശുക്കളുള്ളവനിൽ നിന്നുമാത്രം സ്വീകരിക്കണമെന്നാഗ്രഹിച്ച്—അल्पഗോധനമുള്ള ബ്രാഹ്മണനോട് പശു ചോദിച്ചാൽ അവൻ അഗ്നിഹോത്രാദി കർമങ്ങളിൽ പാലില്ലായ്മകൊണ്ട് കഷ്ടപ്പെടാതിരിക്കേണ്ടതിന്ന്.
Verse 53
विशुद्धमिच्छन् गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छ॑ पयस्विनीम्,मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഹേ ഗാഡേയ! ധർമ്മോപേതമായ വിശുദ്ധ പ്രതിഗ്രഹം ആഗ്രഹിച്ച് ഞാൻ ആ ദേശം അറ്റം മുതൽ അറ്റം വരെ ചുറ്റി നടന്നു; എങ്കിലും പാലുതരുന്ന ഒരു പശുവിനെയും കണ്ടെത്തിയില്ല.
Verse 54
अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारका: । पीत्वा पिष्टरसं बाल: क्षीरं॑ पीत॑ मयापि च,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ കുട്ടികൾ അവനെ മാവുകലർന്ന വെള്ളം കാണിച്ച് വശീകരിച്ചു. ആ ബാലൻ ആ മാവ്-ജലം കുടിച്ച് ആനന്ദത്തിൽ തുളുമ്പി, നൃത്തം ചെയ്തുകൊണ്ട്—“ഞാനും പാൽ കുടിച്ചു” എന്നു പറഞ്ഞു.
Verse 55
ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद् विमोहित: । त॑ दृष्टवा नृत्यमानं तु बालै: परिवृतं सुतम्,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—ഹേ കൗരവകുലശ്രേഷ്ഠാ! ബാല്യഭ്രമത്തിൽ മയങ്ങിയ അവൻ ആനന്ദത്തോടെ എഴുന്നേറ്റ് നൃത്തം ചെയ്തു. ബാലന്മാർ ചുറ്റിനിന്ന് നൃത്തം ചെയ്യുന്ന ആ പുത്രനെ പരിഹാസവിഷയമാക്കിയതു കണ്ടപ്പോൾ എന്റെ ഹൃദയം ഗാഢമായ വ്യഥയിൽ മുങ്ങി.
Verse 56
हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मे5भवत् । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति,मैं लौटकर आया तो देखता हूँ कि छोटे-छोटे बालक आटेके पानीसे अभश्वत्थामाको ललचा रहे हैं और वह अज्ञानमोहित बालक उस आटेके जलको ही पीकर मारे हर्षके फ़ूला नहीं समाता तथा यह कहता हुआ उठकर नाच रहा है कि "मैंने दूध पी लिया'। कुरुनन्दन! बालकोंसे घिरे हुए अपने पुत्रको इस प्रकार नाचते और उसकी हँसी उड़ायी जाती देख मेरे मनमें बड़ा क्षोभ हुआ। उस समय कुछ लोग इस प्रकार कह रहे थे, 'इस धनहीन द्रोणको धिक््कार है, जो धनका उपार्जन नहीं करता
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ എനിക്ക് ഭീകരമായ വ്യഥ വന്നു; കാരണം എന്റെ പുത്രൻ പരിഹാസവിഷയമായതു ഞാൻ കണ്ടു. അവിടെ ചിലർ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു—‘ധനമില്ലാത്ത ദ്രോണനോട് ധിക്കാരം! ധനം സമ്പാദിക്കാത്തവൻ!’
Verse 57
पिष्टोदक॑ सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यति सम मुदाविष्ट: क्षीरं पीत॑ मयाप्युत
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—‘ആരുടെയോ പുത്രൻ “പിഷ്ടോദകസുതൻ” എന്നപോലെ; ദാഹത്തിൽ പാൽ കുടിച്ചതായി കരുതി ആനന്ദോന്മത്തനായി നൃത്തം ചെയ്ത്—“ഞാനും പാൽ കുടിച്ചു!” എന്നു പറയുന്നു.’
Verse 58
इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत् । आत्मानं चात्मना गर्हन् मनसेदं व्यचिन्तयम्
വൈശംപായനൻ പറഞ്ഞു—അവർ തമ്മിൽ പറഞ്ഞ ആ വാക്കുകൾ കേട്ടപ്പോൾ എന്റെ ബുദ്ധി കുലുങ്ങി. മനസ്സിനുള്ളിൽ തന്നെ എന്നെ ഞാൻ ശാസിച്ച് ഞാൻ ഇങ്ങനെ ചിന്തിച്ചു.
Verse 59
अपि चाह ं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया
ഞാനും ഒരിക്കൽ ബ്രാഹ്മണന്മാർ ഉപേക്ഷിക്കുകയും നിന്ദിക്കുകയും ചെയ്ത നിലയിൽ ജീവിച്ചിട്ടുണ്ട്; എങ്കിലും ധനലോഭം കൊണ്ടു മറ്റൊരാളെ ആശ്രയിച്ചുള്ള സേവനം എന്ന അത്യന്തം പാപമായ ദാസ്യം ഞാൻ ചെയ്യുകയില്ല.
Verse 60
“जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि “मैंने भी दूध पी लिया।” इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा--“मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता” || ५७ “7५९ || इति मत्वा प्रियं पुत्र भीष्मादाय ततो हाहम् । पूर्वस्नेहानुरागित्वात्ू सदार: सौमकि गत:,भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा ट्रुपदके यहाँ गया
ഇങ്ങനെ നിശ്ചയിച്ച് ഞാൻ പ്രിയപുത്രൻ ഭീഷ്മനെ കൂട്ടിക്കൊണ്ട്, മുൻസ്നേഹവും അനുരാഗവും കൊണ്ടു, ഭാര്യയോടുകൂടി സൗമകദേശത്തേക്ക് (ദ്രുപദന്റെ രാജ്യത്തിലേക്ക്) പോയി. ദാരിദ്ര്യനിന്ദ സഹിച്ച് ഉപവാസം ചെയ്യാം; പക്ഷേ ധനലോഭത്താൽ മറ്റുള്ളവർക്കു ദാസ്യസേവ—അത് മഹാപാപം—ഞാൻ ഒരിക്കലും ചെയ്യുകയില്ല.
Verse 61
अभिफषिक्तं तु श्र॒ुत्वैव कृतार्थो5स्मीति चिन्तयन् । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम्,मैंने सुन रखा था कि ट्रुपदका राज्याभिषेक हो चुका है, अतः मैं मन-ही-मन अपनेको कृतार्थ मानने लगा और बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए अपने प्रिय सखाके समीप गया
അവൻ രാജാഭിഷിക്തനായെന്നു കേട്ട ഉടൻ തന്നെ ഞാൻ മനസ്സിൽ—“ഞാൻ കൃതാർത്ഥനായി” എന്നു വിചാരിച്ചു. പിന്നെ അത്യന്തം സന്തോഷത്തോടെ രാജാസനത്തിൽ ഇരുന്ന എന്റെ പ്രിയ സഖാവിന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു.
Verse 62
संस्मरन् संगमं चैव वचन चैव तस्य तत् | ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला
അപ്പോൾ നമ്മുടെ മുൻസംഗമവും അന്ന് അവൻ പറഞ്ഞ വചനങ്ങളും എനിക്ക് വീണ്ടും വീണ്ടും ഓർമ്മയായി. പിന്നെ ഞാൻ എന്റെ മുൻസഖാവായ ദ്രുപദന്റെ അടുക്കൽ എത്തി.
Verse 63
अब्रुवं पुरुषव्यात्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगत:,उस समय मुझे द्रुपदकी मैत्री और उनकी कही हुई पूर्वोक्त बातोंका बारंबार स्मरण हो आता था। तदनन्तर अपने पहलेके सखा द्रुपदके पास पहुँचकर मैंने कहा--“नरश्रेष्ठ! मुझ अपने मित्रको पहचानो तो सही।' प्रभो! मैं ट्रपदके पास पहुँचनेपर उनसे मित्रकी ही भाँति मिला
ഞാൻ പറഞ്ഞു—“പുരുഷവ്യാഘ്രാ, എന്നെ നിന്റെ സഖാവെന്നു തിരിച്ചറിയുക.” പിന്നെ ദ്രുപദന്റെ സന്നിധിയിൽ ഞാൻ സഖാവിനെപ്പോലെ തന്നെ സമീപിച്ചു കൂടിക്കാഴ്ച നടത്തി.
Verse 64
स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत् | अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञज्जसा,परंतु द्रपदने मुझे नीच मनुष्यके समान समझकर उपहास करते हुए इस प्रकार कहा --ब्राह्मण! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त असंगत एवं अशुद्ध है
എന്നാൽ അവൻ എന്നെ നിസ്സാരനെന്നപോലെ കണ്ട് പരിഹാസഹാസത്തോടെ പറഞ്ഞു—“ബ്രാഹ്മണാ, നിന്റെ പ്രജ്ഞ വികൃതമാണ്; അത് ഒട്ടും യുക്തിയുക്തവും സംഗതവുമല്ല.”
Verse 65
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा ते5हमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यत:,“तभी तो तुम मुझसे यह कहनेकी धृष्टता कर रहे हो कि “राजन! मैं तुम्हारा सखा हूँ!” समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है
ഹേ ദ്വിജാ! നീ ധൃഷ്ടതയോടെ എന്നോട്—“രാജാവേ, ഞാൻ നിന്റെ സഖാവാണ്” എന്ന് പറയുന്നതും അതുകൊണ്ടുതന്നെ. ഈ ലോകത്ത് സംഗതിയും സൗഹൃദവും കാലക്രമത്തിൽ ജീർണ്ണിക്കുന്നു; മനുഷ്യൻ വയസ്സാകുന്തോറും അവന്റെ മൈത്രിയും ക്ഷയിച്ചുപോകുന്നു।
Verse 66
सौद्दं मे त्वया हयासीत् पूर्व सामर्थ्यबन्धनम् । नाक्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,“पहले तुम्हारे साथ मेरी जो मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी--उस समय हम दोनोंकी शक्ति समान थी (किंतु अब वैसी बात नहीं है)। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता)-का, जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता
മുമ്പ് നിനക്കൊപ്പം എനിക്കുണ്ടായിരുന്ന സൗഹൃദം സാമർത്ഥ്യത്തിന്റെ ബന്ധത്തിലായിരുന്നു—അന്ന് നമ്മുടെ ശക്തി തുല്യമായിരുന്നു; എന്നാൽ ഇപ്പോൾ അങ്ങനെ അല്ല. ശ്രോത്രിയനല്ലാത്തവൻ ശ്രോത്രിയന്റെ സഖാവാകില്ല; രഥിയല്ലാത്തവൻ രഥിനന്റെ മിത്രമാകില്ല।
Verse 67
साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यात्रोपपद्यते | न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित्,सब बातोंमें समानता होनेसे ही मित्रता होती है। विषमता होनेपर मैत्रीका होना असम्भव है। फिर लोकमें कभी किसीकी मैत्री अजर-अमर नहीं होती
സഖ്യം സമത്വത്തിൽ നിന്നാണ് ഉദിക്കുന്നത്; അസമത്വം ഉള്ളിടത്ത് അത് നിലനിൽക്കുകയില്ല. ഈ ലോകത്ത് ആരുടെയുമുള്ള മൈത്രി ഒരിക്കലും അജരാമരമെന്നു കാണപ്പെടുന്നില്ല।
Verse 68
कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि,“समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीकी उपासना (भरोसा) न करो। हम दोनों एक- दूसरेके मित्र थे, इस भावको हृदयसे निकाल दो”
കാലം ഈ ബന്ധത്തെ അഴിച്ചുവിടുന്നു; ക്രോധവും അതിനെ കവർന്നുകൊണ്ടുപോകുന്നു. അതിനാൽ ജീർണ്ണിച്ചുപോകുന്ന മൈത്രിയെ ആശ്രയിക്കരുത്—അതിൽ വിശ്വാസം വെക്കരുത്. “നാം രണ്ടുപേരും സുഹൃത്തുക്കളായിരുന്നു” എന്ന ഭാവം ഹൃദയത്തിൽ നിന്ന് നീക്കുക; അതുതന്നെ സത്യമാകട്ടെ—അത് അകറ്റിവെക്കുക।
Verse 69
आसीत् सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम् । न हानाढ्य: सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुष: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
ഹേ ദ്വിജശ്രേഷ്ഠാ! നിനക്കൊപ്പം എനിക്കുണ്ടായിരുന്ന സഖ്യം അർത്ഥം—സ്വാർത്ഥം—എന്ന ബന്ധനത്തിലായിരുന്നു. സത്യം ഇതാണ്: ദരിദ്രൻ ധനവാന്റെ സഖാവാകില്ല; അവിദ്വാൻ വിദ്വാന്റെ മിത്രമാകില്ല।
Verse 70
न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു— ഭീരുവിന് വീരന്റെ യഥാർത്ഥ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല; അപ്പോൾ പഴയ സൗഹൃദം ചൂണ്ടിക്കാട്ടുന്നതിൽ എന്ത് മൂല്യം? ഹേ ദ്വിജശ്രേഷ്ഠാ, അധികാരത്തിൽ ഉയർന്ന മഹാരാജാക്കന്മാർ ഇത്തരക്കാരുമായി എവിടെയും കൂട്ടുകൂടാറില്ല. നീ ഓർമ്മിപ്പിക്കുന്ന ബന്ധം മുൻപ് സൗകര്യത്തിനായി ഉണ്ടായ പഴയ സഹവാസം മാത്രമാണ്; ഇന്നത് ധാർമ്മിക അവകാശമായി ആശ്രയിക്കാനാവില്ല. ശ്രോത്രിയനല്ലാത്തവൻ ശ്രോത്രിയന്റെ, രഥിയല്ലാത്തവൻ രഥിയുടെ, രാജാവല്ലാത്തവൻ രാജാവിന്റെ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല. അതിനാൽ ജീർണ്ണമായ സൗഹൃദം എനിക്ക് എന്തിന് ഓർമ്മിപ്പിക്കുന്നു?
Verse 71
सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतै: । नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു— ഹേ മന്ദബുദ്ധിയേ, ശ്രിയില്ലാത്തവരും ധനച്യുതരുമായവരോടുള്ള സത്യസൗഹൃദം നിലനിൽക്കുകയില്ല. ഹേ ദ്വിജശ്രേഷ്ഠാ, ശ്രോത്രിയനല്ലാത്തവൻ ശ്രോത്രിയന്റെ, രഥിയല്ലാത്തവൻ രഥിയുടെ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല. അതിനാൽ അസമാന നിലയിൽ ജീർണ്ണമായ പഴയ സൗഹൃദത്തെ വീണ്ടും ആശ്രയിക്കരുത്—അത്തരം സഖ്യം സ്ഥിരമാകുകയില്ല.
Verse 72
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു— രാജാവിനും ഒരു സാധാരണ പാർത്ഥിവനോടുള്ള പഴയ സൗഹൃദത്തിന് എന്ത് മൂല്യം? ഹേ ദ്വിജശ്രേഷ്ഠാ, രാജ്യാർത്ഥമായി നിനക്കൊപ്പം ഞാൻ ഏതെങ്കിലും ഉടമ്പടി ചെയ്തതായി എനിക്ക് അറിവില്ല. ദരിദ്രൻ ധനവാന്റെ, മൂഢൻ പണ്ഡിതന്റെ, ഭീരു വീരന്റെ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല. അങ്ങനെ ഇരിക്കെ, നിനക്കുപോലെ ശ്രിയില്ലാത്തതും ധനമില്ലാത്തതുമായവരോട് മഹാരാജാക്കന്മാർ എങ്ങനെ യഥാർത്ഥ സൗഹൃദം പുലർത്തും? ശ്രോത്രിയനല്ലാത്തവൻ ശ്രോത്രിയന്റെ, രഥിയല്ലാത്തവൻ രഥിയുടെ, രാജാവല്ലാത്തവൻ രാജാവിന്റെ സുഹൃത്ത് ആകാൻ കഴിയില്ല. പിന്നെ ഈ ജീർണ്ണ സൗഹൃദം എനിക്ക് എന്തിന് ഓർമ്മിപ്പിക്കുന്നു? എന്റെ രാജ്യത്തെക്കുറിച്ച് നിനക്കു ഞാൻ ഏതെങ്കിലും പ്രതിജ്ഞ ചെയ്തതായി എനിക്ക് ഒന്നും ഓർമ്മയില്ല.
Verse 73
एकरात्र तु ते ब्रह्मन् काम॑ दास्यामि भोजनम् | एवमुक्तस्त्वहं तेन सदार: प्रस्थितस्तदा,“ब्रह्मन! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता ' राजा ट्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു— “ഹേ ബ്രാഹ്മണാ, നിനക്കിഷ്ടമെങ്കിൽ ഒരു രാത്രിക്കുള്ള ഭക്ഷണം ഞാൻ നിനക്കു നൽകാം.” രാജാവ് ദ്രുപദൻ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ, അതിഥിധർമ്മം മാനിച്ച് ആ আতിഥ്യം സ്വീകരിച്ച്, ഞാൻ ഭാര്യയും പുത്രനും കൂടെ അവിടെ നിന്ന് പുറപ്പെട്ടു.
Verse 74
तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तो5हं मनन््युनाभिपरिप्लुत:,चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा। ट्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ
പുറപ്പെടുന്ന വേളയിൽ ഞാൻ ഒരു പ്രതിജ്ഞ ചെയ്തു—അത് ഞാൻ ഉടൻ തന്നെ നിറവേറ്റും. ദ്രുപദൻ എന്നോടു പറഞ്ഞ അവഹേളനവചനങ്ങൾ കാരണം ഞാൻ ക്രോധത്തിൽ മുങ്ങിയിരിക്കുന്നു; അപമാനത്തിന്റെ കുത്ത് എന്നെ വ്യാകുലപ്പെടുത്തുന്നു, പ്രതികാരം നേടാനുള്ള എന്റെ നിശ്ചയം കൂടുതൽ കഠിനമായി ഉറച്ചു.
Verse 75
अभ्यागच्छ॑ कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितै: । ततो<हं भवतः काम॑ संवर्धयितुमागत:
ഹേ ഭീഷ്മാ! ഗുണസമ്പന്നരും വിദ്യാർത്ഥികളുമായ ശിഷ്യന്മാരോടുകൂടെ കുരുക്കളുടെ അടുക്കൽ വരിക. അതിനാൽ നിന്റെ അഭിലാഷം നിറവേറ്റി കൂടുതൽ വർധിപ്പിക്കാനാണ് ഞാൻ വന്നത്.
Verse 76
हूँ वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഭാരദ്വാജൻ (ദ്രോണൻ) ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ, ഭീഷ്മൻ അവനെ മറുപടിയായി അഭിസംബോധന ചെയ്തു.
Verse 77
भीष्म उवाच अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुड्क्ष्य भोगान् भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये,भीष्मजी बोले--विप्रवर! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धरनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये
ഭീഷ്മൻ പറഞ്ഞു—ഹേ വിപ്രവരാ! ധനുസ്സിന്റെ ഞാണു അഴിച്ച് അതിനെ വേറെയാക്കി വെക്കുക. ഇവിടെ തന്നെ പാർത്ത് രാജകുമാരന്മാർക്ക് ധനുർവേദവും ഉത്തമ അസ്ത്രശസ്ത്രപ്രയോഗവും യഥാവിധി ഉപദേശിക്കൂ. കുരുഗൃഹത്തിൽ സദാ പൂജിതനായി, പരമ സന്തോഷത്തോടെ നിനക്കിഷ്ടമായ ഭോഗങ്ങൾ അനുഭവിക്കൂ.
Verse 78
कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेद॑ सराष्ट्रकम् । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव,कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं
കുരുക്കൾക്കുള്ള ധനവും, രാജ്യവും രാഷ്ട്ര-പ്രദേശങ്ങളോടുകൂടിയ ഐശ്വര്യവും—അതെല്ലാം നിനക്കേ പരമാധിപത്യം; എല്ലാ കുരുക്കളും നിന്റെ അധീനത്തിലാണ്.
Verse 79
यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् । दिष्ट्या प्राप्तोडसि विप्रर्षे महान् मेडनुग्रह: कृत:,ब्रह्म! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्ष] आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है
ഹേ ബ്രഹ്മൻ! നീ അപേക്ഷിച്ചതെല്ലാം നടന്നു കഴിഞ്ഞതായി കരുതുക. ഹേ വിപ്രർഷേ! നിന്റെ വരവ് ഞങ്ങൾക്ക് മഹാസൗഭാഗ്യം; ഇവിടെ വന്ന് നീ എനിക്കു മഹത്തായ അനുഗ്രഹം ചെയ്തിരിക്കുന്നു.
Verse 129
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र- विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ഇങ്ങനെ പവിത്രമായ ശ്രീമഹാഭാരതത്തിലെ ആദിപർവാന്തർഗതമായ സംഭവപർവത്തിൽ പരശുരാമനിൽ നിന്ന് ദ്രോണൻ ദിവ്യായുധവിദ്യ കൈവരിച്ചതു വിവരിക്കുന്ന നൂറ്റി ഇരുപത്തൊമ്പതാം അധ്യായം സമാപ്തമായി.
Verse 130
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्य-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ഇതി ശ്രീമഹാഭാരതത്തിലെ ആദിപർവാന്തർഗതമായ സംഭവപർവത്തിൽ ഭീഷ്മ-ദ്രോണ സമാഗമം വിവരിക്കുന്ന നൂറ്റി മുപ്പതാം അധ്യായം സമാപ്തമായി.
Verse 231
ते तं दृष्टवा महात्मानमुपगम्य कुमारका: । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मुणं पर्यवारयन्
ആ മഹാത്മാവിനെ കണ്ടപ്പോൾ ആ ബാലകർ അവന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു; അവരുടെ ഉത്സാഹവും ശ്രമവും തകർന്നിരുന്നു; ദുരിതത്തിൽ ആശ്രയം തേടി അവർ ആ ബ്രാഹ്മണനെ ചുറ്റി വലയമായി അടുത്ത് നിന്നു.
Verse 253
ततोअब्रवीत् तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने द्रोणसे कहा
അപ്പോൾ ആ സമയത്ത് കുന്തീപുത്രനായ യുധിഷ്ഠിരൻ ദ്രോണനോടു പറഞ്ഞു.
Verse 263
एवमुक्त: प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम् | युधिष्ठिर बोले--ब्रह्मन! आप कृपाचार्यकी अनुमति ले सदा यहीं रहकर भिक्षा प्राप्त करें। उनके यों कहनेपर द्रोणने हँसकर उन भरतवंशी राजकुमारोंसे कहा
യുധിഷ്ഠിരൻ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞപ്പോൾ ദ്രോണൻ പുഞ്ചിരിയോടെ ആ ഭരതവംശീയ രാജകുമാരന്മാരോട് മറുപടി പറഞ്ഞു.
Verse 283
तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरीको तीसरीसे बींधते हुए अनेक सींकोंका संयोग होनेपर मुझे गुल्ली मिल जायगी
ദ്രോണൻ പറഞ്ഞു—ശരിയായ രീതിയിൽ ഒന്നിനെ മറ്റൊന്നുമായി ചേർത്താൽ ആ ‘വീടാ’ (ഗുള്ളി) എന്റെ കൈവശമാകും.
Verse 753
इदं नागपुर रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान् शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?
ഇത് മനോഹരമായ നാഗപുരം (ഹസ്തിനാപുരം) ആകുന്നു; പറയുക, ഞാൻ നിങ്ങള്ക്കായി ഏത് കാര്യം ചെയ്യണം?
Verse 3436
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोण: प्रत्युवाच कुमारकान् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ജനമേജയാ! ഇങ്ങനെ അഭിസംബോധന ചെയ്യപ്പെട്ടപ്പോൾ ദ്രോണൻ ആ കുമാരന്മാർക്ക് മറുപടി പറഞ്ഞു.
Verse 3536
स एव सुमहातेजा: साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले--तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं
ദ്രോണൻ പറഞ്ഞു—നിങ്ങൾ എല്ലാവരും ഭീഷ്മന്റെ അടുക്കൽ ചെന്നു എന്റെ രൂപവും ഗുണങ്ങളും പരിചയപ്പെടുത്തുക; ഈ സമയത്ത് ആ മഹാതേജസ്വിയായ ഭീഷ്മൻ മാത്രമേ എന്നെ തിരിച്ചറിയുകയുള്ളൂ.
Yudhiṣṭhira faces the tension between obedience to the reigning authority and prudent self-protection; he recognizes strategic risk but chooses formal compliance due to limited institutional support.
The chapter illustrates dharma in governance as situational: ethical action may require restraint and procedural correctness even when motives around a directive appear ambiguous or politically charged.
No explicit phalaśruti is stated here; the passage functions as narrative causality, emphasizing how ritual propriety, public messaging, and courtly consent can advance consequential political outcomes.