Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् । अन्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्,उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अन्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वानकी पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया
Vaiśampāyana uvāca: nātikeśīṃ mahāprajñām upayeme mahāvratām | agnihotre ca satre ca dame ca satataṃ ratām ||
വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—“ഞാൻ നാതികേശി, മഹാപ്രജ്ഞ, മഹാവ്രതപരായണയായ (കൃപി)യെ വിവാഹം ചെയ്തു; അവൾ അഗ്നിഹോത്രം, സത്രകർമ്മങ്ങൾ, ദമാനുഷ്ഠാനം എന്നിവയിൽ എപ്പോഴും നിരതയായിരുന്നു.”
वैशम्पायन उवाच