Adhyaya 39
Vana ParvaAdhyaya 3984 Verses

Adhyaya 39

Arjuna’s Himalayan Departure and the Commencement of Severe Tapas (Janamejaya’s Inquiry; Sages Approach Śiva)

Upa-parva: Kirātārjunīya / Arjuna’s Tapas for Divine Weapons (Śiva–Indra Anugraha Arc)

The chapter opens with Janamejaya requesting a detailed account of how Arjuna (Pārtha, Dhanaṃjaya), renowned for unwearied action, entered a remote, humanless forest and what he accomplished there, including how Śiva (Sthāṇu/Tryambaka) and Indra (Devarāja/Śakra) were satisfied. Vaiśaṃpāyana agrees to narrate the extraordinary divine encounter sequence and frames Arjuna’s mission as undertaken by Yudhiṣṭhira’s directive. Arjuna departs northward toward Himavat carrying a divine bow and sword for the sake of accomplishing the objective. The narrative describes the forest’s beauty and liminal grandeur—flowers, birds, rivers—contrasting with its human absence, then shifts to Arjuna’s progressive austerities: first subsisting on fruits, then reducing intake by temporal intervals, then consuming fallen leaves, and finally becoming ‘air-fed’ while standing in a severe posture. His ascetic intensity draws cosmic notice (celestial sounds, flower-rain imagery), prompting sages to report to Śiva that Arjuna’s tapas is distressing the worlds. Śiva responds that he understands Arjuna’s inner intention, notes the absence of selfish desire for heaven, sovereignty, or lifespan, and promises to grant what Arjuna seeks; the sages return to their hermitages, setting the stage for the forthcoming encounter and bestowal narrative.

Chapter Arc: तपस्वी महात्माओं के चले जाने के बाद एकांत वन में अर्जुन का तप-तेज और लक्ष्य—दिव्यास्त्र-प्राप्ति—एक नई परीक्षा को आमंत्रित करता है; तभी एक अद्भुत किरात-वेषधारी पुरुष का आगमन होता है। → किरात (वास्तव में भगवान शंकर) और अर्जुन के बीच शिकार/अधिकार और वीर-गौरव का टकराव बढ़ता है। दोनों अपने-अपने धनुष उठाते हैं, विषधर-समान बाण सजाते हैं, और गांडीव की टंकार से वन-गिरि गूँज उठते हैं। अर्जुन उस तेजस्वी पुरुष से प्रश्न करता है—‘तुम कौन हो, इस शून्य वन में स्त्रियों से घिरे क्यों विचरते हो?’—और संवाद धीरे-धीरे द्वंद्व में बदल जाता है। → अर्जुन और किरात का घोर युद्ध—तेज, वीर्य और कौशल की चरम सीमा—ऐसा कि स्वयं शंकर कहते हैं: ‘आज तुम्हारा तेज और पराक्रम मेरे समान सिद्ध हुआ।’ यह क्षण अर्जुन के तप की सिद्धि और अहं की परीक्षा—दोनों का शिखर है। → अर्जुन को बोध होता है कि यह साधारण किरात नहीं; वह महादेव हैं। वह साहसवश हुए अपराध के लिए क्षमा माँगता है, शरणागति करता है और स्तुति करता है। प्रसन्न भगवान हर अर्जुन को आलिंगन देकर सांत्वना देते हैं—यह स्वीकारोक्ति कि अर्जुन योग्य है और उसका तप फलित हुआ। → महादेव की प्रसन्नता के बाद अर्जुन के लिए दिव्यास्त्र-प्राप्ति का द्वार खुलता है—अब कौन-सा वर/अस्त्र मिलेगा और आगे देव-लोक की यात्रा कैसे घटेगी?

Shlokas

Verse 1

अपना स२ (0 अवज असल एकोनचत्वारिशोड ध्याय: भगवान्‌ शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान्‌ शंकरकी स्तुति वैशम्पायन उवाच गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु । पिनाकपाणिभर्भगवान्‌ सर्वपापहरो हर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान्‌ शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्धासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान्‌ और विशाल था

Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Setelah semua pertapa agung itu pergi, Hara, Sang Bhagavān, pemusnah segala dosa, pemegang busur Pināka, (bermaksud menguji Arjuna) menampakkan diri dengan menyamar sebagai seorang Kirāta. Cahaya ilahinya menyala bagaikan pohon emas, dan tubuhnya tampak luas serta cemerlang, laksana Gunung Meru yang kedua.

Verse 2

कैरातं वेषमास्थाय काठ्चनद्रुमसंनिभम्‌ । विभ्राजमानो विपुलो गिरिमेंरुरिवापर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान्‌ शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्धासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान्‌ और विशाल था

Dengan mengenakan samaran Kirāta, bagaikan pohon emas, ia bersinar oleh kemilau ilahi—luas dan agung, laksana Gunung Meru yang kedua.

Verse 3

श्रीमद्‌ धनुरुपादाय शरांश्चवाशीविषोपमान्‌ । निष्पपात महावेगो दहनो देहवानिव,वे एक शोभायमान धनुष और सर्पोके समान विषाक्त बाण लेकर बड़े वेगसे चले। मानो साक्षात्‌ अग्निदेव ही देह धारण करके निकले हों

Ia mengangkat busur yang gemilang dan anak panah yang berbisa laksana ular mematikan; lalu melompat maju dengan kecepatan dahsyat—seperti Dewa Api sendiri yang menjelma berwujud dan menerjang.

Verse 4

देव्या सहोमया श्रीमान्‌ समानव्रतवेषया । नानावेषधरै्ष्टेर्भूतिरनुगतस्तदा,उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान्‌ शिव सहसों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था

Bersamanya hadir pula Dewi Umā, yang laku tapa dan busananya serupa dengan miliknya. Rombongan bhūta yang mengenakan beragam penyamaran pun mengikuti dengan gembira. Demikianlah Śiva yang mulia—tersembunyi dalam rupa Kirāta—tampak amat elok, dikelilingi banyak perempuan; dan wahai keturunan Bharata, wilayah itu menjadi sangat indah oleh gerak seluruh iring-iringan tersebut.

Verse 5

किरातवेषसंच्छन्न: स्त्रीभिश्वापि सहस्रश: । अशोभत तदा राजन्‌ स देशोडतीव भारत,उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान्‌ शिव सहसों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, saat itu Śaṅkara yang mulia, tersembunyi dalam samaran seorang Kirāta, tampak bersinar—dikelilingi ribuan perempuan. Dan wahai keturunan Bharata, seluruh wilayah itu menjadi amat indah oleh gerak dan kehadiran rombongan besar tersebut.”

Verse 6

क्षणेन तद्‌ वनं सर्व नि:शब्दम भवत्‌ तदा । नाद: प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत्‌,एक ही क्षणमें वह सारा वन शब्दरहित हो गया। झरनों और पक्षियोंतककी आवाज बंद हो गयी

Waiśampāyana berkata: Dalam sekejap, seluruh hutan itu menjadi sunyi senyap. Gemericik mata air berhenti, dan kicau burung pun terdiam.

Verse 7

स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मण: । मूक नाम दनो: पुत्र ददर्शाद्भुतदर्शनम्‌,अनायास ही महान पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुके निकट आकर भगवान्‌ शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोके समान भयंकर बाण हाथ-में ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा--

Waiśampāyana berkata: Mendekati Pārtha yang tak pernah letih dalam perbuatan, Śaṅkara melihat Mūka, putra Danu, sosok mengerikan yang tampak ganjil dan menakjubkan. Ia mengenakan wujud babi hutan dan diam-diam merancang cara untuk membunuh Arjuna yang bercahaya gagah.

Verse 8

वाराहं रूपमास्थाय तर्कयन्तमिवार्जुनम्‌ । हन्तुं परं दीप्पमानं तमुवाचाथ फाल्गुन:,अनायास ही महान पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुके निकट आकर भगवान्‌ शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोके समान भयंकर बाण हाथ-में ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा--

Waiśampāyana berkata: Dengan mengambil wujud babi hutan, makhluk itu menyala oleh tenaga garang, seakan sedang menimbang cara membunuh Arjuna. Maka Phālguna pun menegurnya dan berbicara langsung menghadapi ancaman itu.

Verse 9

गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्वाशीविषोपमान्‌ | सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादयन्‌,अनायास ही महान पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुके निकट आकर भगवान्‌ शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोके समान भयंकर बाण हाथ-में ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा--

Waiśampāyana berkata: Arjuna mengangkat busur Gāṇḍīva dan menggenggam anak panah yang mengerikan laksana ular berbisa. Ia memasang talinya pada busur unggul itu, lalu dengan dentum bunyi senarnya membuat segenap penjuru bergema.

Verse 10

यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहागतम्‌ । तस्मात्‌ त्वां पूर्वमेवाहं नेताद्य यमसादनम्‌,“अरे! तू यहाँ आये हुए मुझ निरपराधको मारनेकी घातमें लगा है, इसीलिये मैं आज पहले ही तुझे यमलोक भेज दूँगा”

Karena engkau hendak membunuhku—padahal aku tak bersalah dan datang ke sini tanpa permusuhan—maka hari ini juga akan kukirim engkau lebih dahulu ke kediaman Yama.

Verse 11

दृष्टवा तं॑ प्रहरिष्यन्तं फाल्गुनं दृढ्धन्विनम्‌ । किरातरूपी सहसा वारयामास शड्कर:,सुदृढ़ धनुषवाले अर्जुनको प्रहारके लिये उद्यत देख किरातरूपधारी भगवान्‌ शंकरने उन्हें सहसा रोका

Vaiśampāyana berkata: Melihat Phālguna (Arjuna), pemanah berbusur kukuh, siap menghantam, Śaṅkara—yang mengambil rupa seorang Kirāta—seketika menahannya.

Verse 12

मयैष प्रार्थित: पूर्वमिन्द्रकीलसमप्रभ: । अनादृत्य च तद्‌ वाक्यं प्रजहाराथ फाल्गुन:,और कहा--*इन्द्रकील पर्वतके समान कान्तिवाले इस सूअरको पहलेसे ही मैंने अपना लक्ष्य बना रखा है, अतः तुम न मारो।' परंतु अर्जुनने किरातके वचनकी अवहेलना करके उसपर प्रहार कर ही दिया

Arjuna berkata, “Babi hutan yang bercahaya laksana Gunung Indrakīla ini telah sejak awal kujadikan sasaran; maka jangan kau bunuh.” Namun Phālguna mengabaikan ucapan sang Kirāta dan tetap menghantamnya.

Verse 13

किरातश्न सम॑ तस्मिन्नेकलक्ष्ये महाद्युति: । प्रमुमोचाशनिप्रख्यं शरमग्निशिखोपमम्‌,साथ ही महातेजस्वी किरातने भी उसी एकमात्र लक्ष्ययर बिजली और अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाण छोड़ा

Vaiśampāyana berkata: Maka Kirāta yang bercahaya pun, membidik sasaran yang sama, melepaskan anak panah—sekuat halilintar dan seterang puncak nyala api.

Verse 14

तौ मुक्तौ सायकौ ताभ्यां सम॑ तत्र निपेततुः । मूकस्य गात्रे विस्तीर्णे शैलसंहनने तदा,उन दोनोंके छोड़े हुए वे दोनों बाण एक ही साथ मूक दानवके पर्वत-सदृश विशाल शरीरमें लगे

Vaiśampāyana berkata: Kedua anak panah yang dilepaskan oleh mereka berdua jatuh pada saat yang sama, menancap pada tubuh Mūka sang raksasa—lebar, besar, dan sekeras batu karang.

Verse 15

यथाशनेविंनिर्घोषो वज्रस्येव च पर्वते । तथा तयो: संनिपात: शरयोरभवत्‌ तदा,जैसे पर्वतपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपातका भयंकर शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनों बाणोंके आघातका शब्द हुआ

Seperti gemuruh halilintar dan dentuman dahsyat petir yang menggema di atas gunung, demikian pula pada saat itu terdengar suara mengerikan ketika anak panah kedua kesatria itu saling beradu.

Verse 16

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यै: पन्नगैरिव । ममार राक्षसं रूप॑ भूय: कृत्वा विभीषणम्‌,इस प्रकार प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान अनेक बाणोंसे घायल होकर वह दानव फिर अपने भयानक राक्षसरूपको प्रकट करते हुए मर गया

Tertusuk banyak anak panah, bagaikan ular bermulut menyala, sang raksasa—sekali lagi mengambil wujud rākṣasa yang mengerikan—rebah ke tanah dan mati.

Verse 17

स ददर्श ततो जिष्णु: पुरुषं काउचनप्रभम्‌ । किरातवेषसंच्छन्नं सत्रीसहायममित्रहा,इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंक साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा--“आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं?

Lalu Jiṣṇu (Arjuna), pembinasaan musuh, melihat seorang pria bercahaya laksana emas, yang menyamarkan diri dalam busana Kirāta dan datang ditemani para wanita.

Verse 18

तमब्रवीत्‌ प्रीतमना: कौन्तेय: प्रहसन्निव । को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृत:,इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंक साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा--“आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं?

Maka putra Kuntī, dengan hati gembira seakan tersenyum, berkata kepadanya: “Siapakah engkau yang berjalan di hutan sunyi ini, dikelilingi rombongan wanita?”

Verse 19

न त्वमस्मिन्‌ वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ । किमर्थ च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रह:,'सुवर्णके समान दीप्तिमान्‌ पुरुष! क्या आपको इस भयानक वनमें भय नहीं लगता? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्‍यों उसपर बाण मारा?

“Wahai yang bercahaya laksana emas, tidakkah engkau takut di hutan yang mengerikan ini? Dan mengapa engkau memanah babi hutan itu, padahal ia telah menjadi buruanku?”

Verse 20

मयाभिपन्नः पूर्व हि राक्षमो5यमिहागत: । कामात्‌ परिभवाद्‌ वापि न मे जीवन्‌ विमोक्ष्यसे,“यह राक्षस पहले यहीं मेरे पास आया था और मैंने इसे काबूमें कर लिया था। आपने किसी कामनासे इस शूकरको मारा हो या मेरा तिरस्कार करनेके लिये। किसी दशामें भी मैं आपको जीवित नहीं छोडूँगा

Vaiśampāyana berkata: “Rākṣasa ini telah datang ke sini lebih dahulu, dan aku sudah menaklukkannya. Entah engkau membunuh babi hutan ini karena nafsu keinginan atau untuk menghina diriku, bagaimanapun juga aku tidak akan membiarkanmu pergi hidup-hidup.”

Verse 21

न होष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि । तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात्‌ पर्वताश्रयम्‌,“यह मृगयाका धर्म नहीं है, जो आज आपने मेरे साथ किया है। आप पर्वतके निवासी हैं तो भी उस अपराधके कारण मैं आपको जीवनसे वंचित कर दूँगा”

“Ini bukanlah dharma perburuan—perbuatan yang kau tunjukkan kepadaku hari ini. Karena pelanggaran itu, meski engkau bernaung di pegunungan, akan kucabut juga nyawamu.”

Verse 22

इत्युक्त: पाण्डवेयेन किरात: प्रहसन्निव । उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम्‌,पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर किरात-वेषधारी भगवान्‌ शंकर जोर-जोरसे हँस पड़े और सव्यसाची पाण्डवसे मधुर वाणीमें बोले--

Vaiśampāyana berkata: Setelah putra Pāṇḍu berkata demikian, sang Kirāta—seakan tertawa kecil—berbicara kepada Arjuna sang Pāṇḍava, yang termasyhur sebagai Savyasācin, dengan tutur kata yang lembut dan terpilih.

Verse 23

न मत्कृते त्वया वीर भी: कार्या वनमन्तिकात्‌ । इयं भूमि: सदास्माकमुचिता वसतां वने,“वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो। हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है

“Wahai pahlawan, jangan takut karena engkau telah mendekati hutan demi kami. Kami adalah penghuni rimba; bagi kami, bergerak di tanah ini selalu pantas dan wajar.”

Verse 24

त्वया तु दुष्कर: कस्मादिह वास: प्ररोचित: । वयं तु बहुसत्त्वेडस्मिन्‌ निवसामस्तपोधन,'किंतु तुमने यहाँका दुष्कर निवास कैसे पसंद किया? तपोधन! हम तो अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें सदा ही रहते हैं

“Namun mengapa engkau memilih tinggal di sini, di tempat yang begitu sukar ini? Wahai yang kaya tapa, kami justru senantiasa hidup di hutan ini yang dipenuhi beraneka makhluk.”

Verse 25

भवांस्तु कृष्णवर्त्माभ: सुकुमार: सुखोचित: । कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति,“तुम्हारे अंगोंकी प्रभा प्रजजलित अग्निके समान जान पड़ती है। तुम सुकुमार हो और सुख भोगनेके योग्य प्रतीत होते हो। इस निर्जन प्रदेशमें किसलिये अकेले विचर रहे हो?”

Waiśampāyana berkata: “Cahayamu tampak menyala laksana api yang berkobar; engkau halus dan seakan layak bagi kenyamanan serta kemewahan. Bagaimana engkau akan mengembara seorang diri di wilayah yang sunyi ini—dan apa sebabnya engkau berkeliaran di sini sendirian?”

Verse 26

अजुन उवाच गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचां श्वाग्निसंनिभान्‌ । निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकि:,अर्जुनने कहा--मैं गाण्डीव धनुष और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका आश्रय लेकर इस महान्‌ वनमें द्वितीय कार्तिकेयकी भाँति (निर्भय) निवास करता हूँ

Arjuna berkata: “Dengan bersandar pada busur Gāṇḍīva dan mengandalkan anak panah yang menyala laksana api, aku tinggal di rimba besar ini—tak gentar dan dahsyat, seakan api itu sendiri menjelma kedua kalinya.”

Verse 27

एष चापि मया जसन्तुर्मगरूपं समाश्रित: । राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागत:,यह प्राणी हिंसक पशुका रूप धारण करके मुझे ही मारनेके लिये यहाँ आया था, अतः इस भयंकर राक्षसको मैंने मार गिराया है

Arjuna berkata: “Rākṣasa yang mengerikan ini, bernama Jasantu, telah mengambil wujud buaya dan datang ke sini untuk membunuhku. Maka aku menjatuhkan dan membinasakan makhluk yang keji itu.”

Verse 28

किरयात उवाच मयैष धन्वनिर्मुक्तैस्ताडित: पूर्वमेव हि । बाणैरभिहत: शेते नीतश्न॒ यमसादनम्‌,किरातरूपधारी शिव बोले--मैंने अपने धनुषद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे पहले ही इसे घायल कर दिया था। मेरे ही बाणोंकी चोट खाकर यह सदाके लिये सो रहा है और यमलोकमें पहुँच गया

Sang Kirāta berkata: “Sesungguhnya aku telah lebih dahulu melukainya dengan anak panah yang kulepaskan dari busurku. Terhantam oleh panahku, kini ia terbaring tak bergerak—telah dibawa ke kediaman Yama.”

Verse 29

ममैष लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रह: । ममैव च प्रहारेण जीविताद्‌ व्यपरोपित:,मैंने ही पहले इसे अपने बाणोंका निशाना बनाया, अतः तुमसे पहले इसपर मेरा अधिकार स्थापित हो चुका था। मेरे ही तीव्र प्रहारसे इस दानवको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा है

Ia berkata lagi: “Dialah yang mula-mula kutandai sebagai sasaran; maka hak terdahulu atasnya adalah milikku. Dan oleh pukulanku sendirilah makhluk ganas itu tercerabut dari nyawa.”

Verse 30

दोषान्‌ स्वान्‌ नार्हसे<न्यस्मै वक्तुं स्‍्वबलदर्पित: । अवलिप्तो$सि मन्दात्मन्‌ न मे जीवन विमोक्ष्यसे,मन्दबुद्धे! तुम अपने बलके घमंडमें आकर अपने दोष दूसरेपर नहीं मढ़ सकते। तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व है; अत: अब तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकते

Mabuk oleh congkak atas kekuatanmu, engkau tak berhak menimpakan kesalahanmu sendiri kepada orang lain. Wahai jiwa yang hina dan angkuh, karena itu, wahai dungu, engkau takkan lolos dariku hidup-hidup.

Verse 31

स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव । घटस्व परया शक्‍्त्या मुज्च त्वमपि सायकान्‌,धैर्यपूर्वक सामने खड़े रहो, मैं वज़के समान भयानक बाण छोड़ूँगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतनेका प्रयास करो। मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो

Berdirilah teguh; aku akan melepaskan anak panah laksana halilintar. Kerahkan segenap kekuatanmu untuk menaklukkanku; engkau pun, lepaskanlah panahmu kepadaku.

Verse 32

तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा । रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभि:,किरातकी वह बात सुनकर उस समय अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बाणोंसे उसपर प्रहार आरम्भ किया

Mendengar kata-kata Kirāta itu, Arjuna seketika menyala oleh amarah. Ia menghimpun murka dalam dada dan mulai menghantam sang pemburu dengan rentetan anak panah.

Verse 33

ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान्‌ | भूयो भूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह

Lalu, dengan hati bersukacita, ia menerima anak-anak panah itu. Berulang-ulang ia berkata, “Lagi, lagi,” dan ia pun terus berkata, “Pelan-pelan, pelan-pelan.”

Verse 34

प्रहरस्व शरानेतान्‌ नाराचान्‌ मर्मभेदिन: । तब किरातने प्रसन्नचित्तसे अर्जुनके छोड़े हुए सभी बाणोंको पकड़ लिया और कहा --“ओ मूर्ख! और बाण मार और बाण मार, इन मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार कर' || ३३ $ || इत्युक्तो बाणवर्ष स मुमोच सहसार्जुन:,उसके ऐसा कहनेपर अर्जुनने सहसा बाणोंकी झड़ी लगा दी

Kata Kirāta, “Hantamkanlah panah-panah ini—nārāca yang menembus titik-titik vital.” Mendengar tantangan itu, Arjuna seketika melepaskan hujan anak panah.

Verse 35

ततस्तौ तत्र संरब्धौ राजमानौ मुहुर्मुहुः । शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम्‌,तदनन्तर वे दोनों क्रोधमें भरकर बारंबार सर्पाकार बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल करने लगे। उस समय उन दोनोंकी बड़ी शोभा होने लगी

Maka di medan itu keduanya, tersulut amarah, berulang-ulang saling melukai dengan anak panah yang menyerupai ular berbisa. Pemandangan itu memancarkan kilau kelam: murka dan keperkasaan bertaut, luka dibalas luka.

Verse 36

ततोडअर्जुन: शरवर्ष किराते समवासृजत्‌ | तत्‌ प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शड्कर:,तत्पश्चात्‌ अर्जुनने किरातपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की; परंतु भगवान्‌ शंकरने प्रसन्नचित्तसे उन सब बाणोंको ग्रहण कर लिया

Lalu Arjuna menumpahkan hujan anak panah yang rapat ke arah Kirāta; namun Śaṅkara, dengan hati tenang dan berkenan, menerima semuanya.

Verse 37

मुहूर्त शरवर्ष तत्‌ प्रतिगृह्ा पिनाकधृक्‌ । अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचल:,पिनाकथधारी शिव दो ही घड़ीमें सारी बाण-वर्षाको अपनेमें लीन करके पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे। उनके शरीरपर तनिक भी चोट या क्षति नहीं पहुँची थी

Pemegang Pināka itu, dalam sekejap, menyerap seluruh hujan panah tersebut. Dengan tubuh sama sekali tak terluka, ia berdiri tak tergoyahkan, laksana gunung.

Verse 38

स दृष्टवा बाणवर्ष तु मोघीभूतं धनंजय: । परम विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत्‌,अपनी की हुई सारी बाण-वर्षा व्यर्थ हुई देख धनंजयको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे किरातको साधुवाद देने लगे और बोले--

Melihat hujan panahnya menjadi sia-sia, Dhanañjaya diliputi keheranan yang mendalam. Ia memuji Kirāta, berulang-ulang berseru, “Sādhu! Sādhu!”

Verse 39

अहो<यं सुकुमाराज़ो हिमवच्छिखराश्रय: । गाण्डीवमुक्तान्‌ नाराचान प्रतिगृह्नात्यविह्लल:,“अहो! हिमालयके शिखरपर निवास करनेवाले इस किरातके अंग तो बड़े सुकुमार हैं, तो भी यह गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंको ग्रहण कर लेता है और तनिक भी व्याकुल नहीं होता इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशो5ध्याय: ।। ३९ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपव्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महादेवजीकी स्वुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

“Ah! Kirāta yang bernaung di puncak-puncak Himālaya ini tampak bertubuh lembut; namun ia menangkap anak panah tajam yang dilepaskan dari Gāṇḍīva tanpa sedikit pun gentar.”

Verse 40

को<यं देवो भवेत्‌ साक्षाद्‌ रुद्रो यक्ष: सुरोडसुर: । विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागम:,“यह कौन है? साक्षात्‌ भगवान्‌ रुद्रदेव, यक्ष, देवता अथवा असुर तो नहीं है। इस श्रेष्ठ पर्वतपर देवताओंका आना-जाना होता रहता है

Siapakah dia? Mungkinkah ia Rudra sendiri—atau seorang Yakṣa, dewa, bahkan Asura? Sebab di gunung terbaik ini memang kerap terjadi pertemuan dan lalu-lalang para dewa Tiga Puluh Tiga.

Verse 41

न हि मद्बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रश: । शक्तो<न्य: सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम्‌,“मैंने सहस्नों बार जिन बाण-समूहोंकी वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान्‌ शंकरके सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता

Dari hujan anak panah yang kulepaskan berulang-ulang hingga ribuan kali, tak seorang pun sanggup menahan daya hantamnya—kecuali Dewa yang memanggul Pināka, Śiva.

Verse 42

देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थित: । अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैनयामि यमसादनम्‌,“यदि यह रुद्रदेवसे भिन्न व्यक्ति है तो यह देवता हो या यक्ष--मैं इसे तीखे बाणोंसे मारकर अभी यमलोक भेजता हूँ

Jika ia bukan Rudra—entah dewa atau yakṣa—akan kupanahkan ia dengan anak panah tajam dan seketika kukirim ke kediaman Yama.

Verse 43

ततो हृष्टमना जिष्णु्नाराचान्‌ मर्मभेदिन: । व्यसृजच्छतथा राजन्‌ मयूखानिव भास्कर:,राजन! यह सोचकर प्रसन्नचित्त अर्जुनने सहस्रों किरणोंको फैलानेवाले भगवान्‌ भास्करकी भाँति सैकड़ों मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार किया

Lalu Arjuna, Jishnu yang hatinya meluap oleh kegembiraan dan tekad, melepaskan ratusan anak panah nārāca yang menembus titik-titik vital—wahai Raja—bagaikan Sang Surya menghamparkan sinarnya.

Verse 44

तान्‌ प्रसन्नेन मनसा भगवॉल्लोकभावन: । शूलपाणि: प्रत्यगृह्नाच्छिलावर्षमिवाचल:,परंतु त्रिशूलधारी भूतभावन भगवान्‌ भवने हर्षभरे हृदयसे उन सब नाराचोंको उसी प्रकार आत्मसात्‌ कर लिया, जैसे पर्वत पत्थरोंकी वर्षाको

Namun dengan hati yang tenang dan berkenan, Sang Bhagavan—pemelihara dunia—Śūlapāṇi menerima dan menyerap semuanya tanpa terusik, laksana gunung menahan hujan batu.

Verse 45

क्षणेन क्षीणबाणो<थ संवृत्त: फाल्गुनस्तदा | भीश्वैनमाविशत्‌ तीव्रा तं दृष्टवा शरसंक्षयम्‌,उस समय एक ही क्षणमें अर्जुनके सारे बाण समाप्त हो चले। उन बाणोंका इस प्रकार विनाश देखकर उनके मनमें बड़ा भय समा गया

Dalam sekejap, Phālguna (Arjuna) mendapati persediaan anak panahnya telah habis. Melihat susutnya senjata itu secara mendadak, rasa takut yang tajam menyergap batinnya.

Verse 46

चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम्‌ । पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्थ खाण्डवे,विजयी अर्जुनने उस समय भगवान्‌ अग्निदेवका चिन्तन किया, जिन्होंने खाण्डववनमें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें दो अक्षय तूणीर प्रदान किये थे

Saat itu Jiṣṇu (Arjuna) mengenang Sang Hutaśana, Dewa Api yang dahulu menampakkan diri di hutan Khāṇḍava dan menganugerahinya dua tabung panah yang tak pernah habis.

Verse 47

कि नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणा: क्षयं गता: । अयं च पुरुष: को5पि बाणान्‌ ग्रसति सर्वश:,वे मन-ही-मन सोचने लगे, “मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा। यह कोई अदभुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि (नोक)-से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ”

Ia berpikir dalam hati, “Apa lagi yang dapat kulepaskan dari busurku, bila anak panahku telah habis? Dan orang ini—siapa pun dia—seakan menelan habis semua panahku.”

Verse 48

हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुज्जरम्‌ । नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदन प्रति,वे मन-ही-मन सोचने लगे, “मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा। यह कोई अदभुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि (नोक)-से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ”

“Akan kubunuh dia dengan ujung busurku—laksana gajah yang terluka oleh mata tombak—dan akan kukirim ia ke kediaman Yama, sang pemegang gada.”

Verse 49

प्रगृह्या थ धनुष्कोट्या ज्यापाशेनावकृष्य च | मुष्टिभिश्चापि हतवान्‌ वज्रकल्पैर्महाद्युति:,ऐसा विचारकर महातेजस्वी अर्जुनने किरातको अपने धनुषकी कोटिसे पकड़कर उसकी प्रत्यंचामें उसके शरीरको फँसाकर खींचा और वज्रके समान दुः:सह मुष्टिप्रहारसे पीड़ित करना प्रारम्भ किया

Dengan tekad itu, sang pahlawan bercahaya menggenggamnya pada ujung busur, menariknya mendekat dengan tali busur laksana jerat, lalu menghantamnya dengan kepalan sekeras wajra.

Verse 50

सम्प्रयुद्धों धनुष्कोट्या कौन्तेय: परवीरहा । तदप्यस्य धर्नुर्दिव्यं जग्राह गिरिगोचर:,शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनने जब धनुषकी कोटिसे प्रहार किया, तब उस पर्वतीय किरातने अर्जुनके उस दिव्य धनुषको भी अपनेमें लीन कर लिया

Dalam pertarungan jarak dekat, Arjuna putra Kuntī—pembunuh para jawara musuh—menghantam dengan ujung busurnya. Namun Kirāta, sang pengembara gunung, merenggut bahkan busur ilahi Arjuna, seakan-akan menyerapnya ke dalam genggamannya sendiri.

Verse 51

ततोड्डर्जुनो ग्रस्तधनु: खड्गपाणिरतिष्ठत । युद्धस्यान्तम भी प्सन्‌ वै वेगेनाभिजगाम तम्‌,तदनन्तर धनुषके ग्रस्त हो जानेपर अर्जुन हाथमें तलवार लेकर खड़े हो गये और युद्धका अन्त कर देनेकी इच्छासे वेगपूर्वक उसपर आक्रमण किया

Kemudian, ketika busurnya telah direnggut, Arjuna berdiri teguh dengan pedang di tangan. Berhasrat mengakhiri pertempuran, ia menerjangnya dengan kecepatan dahsyat.

Verse 52

तस्य मूर्थ्नि शितं खड्गमसक्तं पर्वतेष्वपि | मुमोच भुजवीर्येण विक्रम्प कुरुनन्दन:,उनकी वह तलवार पर्वतोंपर भी कुण्ठित नहीं होती थी। कुरुनन्दन अर्जुनने अपने भुजाओंकी पूरी शक्ति लगाकर किरातके मस्तकपर उस तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे वार किया

Pedangnya begitu tajam hingga tak tumpul sekalipun menghantam gunung. Pangeran Kuru, Arjuna, menghimpun segenap tenaga lengannya, menerjang maju, dan menebaskan pedang bermata tajam itu ke kepala Kirāta.

Verse 53

तस्य मूर्धानमासाद्य पफालासिवरो हि सः । ततो वृक्ष: शिलाभिश्न योधयामास फाल्गुन:,परंतु उसके मस्तकसे टकराते ही वह उत्तम तलवार टूक-टूक हो गयी। तब अर्जुनने वृक्षों और शिलाओंसे युद्ध करना आरम्भ किया

Namun begitu menghantam kepalanya, pedang unggul itu pecah berkeping-keping. Maka Phālguna (Arjuna) pun melanjutkan pertempuran dengan melemparkan pohon-pohon dan batu-batu besar.

Verse 54

तदा वृक्षान्‌ महाकाय: प्रत्यगृह्नादथो शिला: । किरातरूपी भगवांस्तत: पार्थो महाबल:,तब विशालकाय किरातरूपी भगवान्‌ शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज़तुल्य मुक्‍्कोंसे दुर्धर्ष किरात-सदृश रूपवाले भगवान्‌ शिवपर प्रहार करने लगे। उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था

Saat itu, sosok raksasa itu merenggut pohon-pohon dan bahkan batu-batu. Sang Bhagavān, Śaṅkara, yang menyamar sebagai Kirāta, menangkis semuanya; melihatnya, Pārtha (Arjuna) yang perkasa, diliputi amarah, mulai menghantam Dewa Śiva dalam wujud Kirāta yang dahsyat itu dengan tinju-tinju berat laksana wajra. Pada saat itu, dari wajah Arjuna seakan mengepul asap karena bara amarahnya.

Verse 55

मुष्टिभि्वज्ञसंकाशैर्धूममुत्पादयन्‌ मुखे । प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि,तब विशालकाय किरातरूपी भगवान्‌ शंकरने उन वृक्षों और शिलाओंको भी ग्रहण कर लिया। यह देखकर महाबली कुन्तीकुमार अपने वज़तुल्य मुक्‍्कोंसे दुर्धर्ष किरात-सदृश रूपवाले भगवान्‌ शिवपर प्रहार करने लगे। उस समय क्रोधके आवेशसे अर्जुनके मुखसे धूम प्रकट हो रहा था

Dengan kepalan tangan laksana wajra, dan asap mengepul dari mulutnya karena panas amarah, Arjuna putra Kuntī menghantam Sang Dewa yang tak tertaklukkan, yang mengambil rupa Kirāta. Melihat bahkan pohon dan batu pun direngkuh dan dibuat sia-sia, sang pahlawan perkasa itu makin mendesak serangan; saat itu, karena luapan murka, asap tampak keluar dari mulutnya.

Verse 56

ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भुशदारुणै: । किरातरूपी भगवानर्दयामास फाल्गुनम्‌,तदनन्तर किरातरूपी भगवान्‌ शिव भी अत्यन्त दारुण और इन्द्रके वज़के समान दुःसह मुक्कोंसे मारकर अर्जुनको पीड़ा देने लगे

Kemudian Sang Bhagavān Śiva dalam rupa Kirāta mulai menghantam Phālguna (Arjuna) dengan kepalan yang amat kejam dan tak tertahankan, sekeras wajra Indra, hingga menimbulkan rasa sakit.

Verse 57

ततश्नट्चटाशब्द: सुघोर: समपद्यत । पाण्डवस्य च मुष्टीनां किरातस्य च युध्यत:,फिर तो घमासान युद्धमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा किरातरूपी शिवके मुक्कोंका एक-दूसरेके शरीरपर प्रहार होनेसे बड़ा भयंकर “चट-चट” शब्द होने लगा

Lalu, ketika sang Pāṇḍava (Arjuna) dan Kirāta (Śiva dalam rupa pemburu) bertarung jarak dekat, dari benturan kepalan mereka yang menghantam tubuh satu sama lain timbullah bunyi “chat-chat” yang mengerikan.

Verse 58

सुमुहूर्त तु तद्‌ युद्धमभभवल्लोमहर्षणम्‌ | भुजप्रहारसंयुक्तं वृत्रवासवयोरिव,वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनोंका वह रोमांचकारी बाहुयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा

Untuk sejenak, pertempuran itu menjadi mendebarkan dan membuat bulu kuduk berdiri—pukulan lengan berbalas lengan—laksana pertarungan Vṛtra melawan Vāsava (Indra).

Verse 59

जघानाथ ततो जिष्णु: किरातमुरसा बली । पाण्डवं च विचेष्ट॑ तं किरातो5प्यहनद्‌ बली,तत्पश्चात्‌ बलवान्‌ वीर अर्जुनने अपनी छातीसे किरातको बड़े जोरसे मारा, तब महाबली किरातने भी विपरीत चेष्टा करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुन॒पर आघात किया

Kemudian Jiṣṇu (Arjuna) yang perkasa menghantam Kirāta dengan dadanya sekuat-kuatnya. Dan Kirāta yang mahakuat pun membalas, memukul sang Pāṇḍava yang sedang bergerak mencari celah dan melakukan serangan balik.

Verse 60

तयोर्भुजविनिष्पेषात्‌ संघर्षणोरसोस्तथा । समजायत गात्रेषु पावको5ड्रारधूमवान्‌,उन दोनोंकी भुजाओंके टकराने और वक्षःस्थलोंके संघर्षसे उनके अंगोंमें धूम और चिनगारियोंके साथ आग प्रकट हो जाती थी

Dari hantaman keras lengan mereka dan gesekan dahsyat dada mereka, pada tubuh keduanya seakan menyala api—disertai asap dan bara merah—demikian hebat daya pertempuran itu.

Verse 61

तत एनं महादेव: पीड्य गात्रै: सुपीडितम्‌ । तेजसा व्यक्रमद्‌ रोषाच्चेतस्तस्य विमोहयन्‌,तदनन्तर! महादेवजीने अपने अंगोंसे दबाकर अर्जुनको अच्छी तरह पीड़ा दी और उनके चित्तको मूर्च्छित-सा करते हुए उन्होंने तेज तथा रोषसे उनके ऊपर अपना पराक्रम प्रकट किया

Kemudian Mahādeva menekannya dengan anggota tubuh-Nya, menghimpitnya dengan sangat keras. Dengan kilau daya dan amarah yang menyala, Sang Dewa Agung menampakkan keperkasaan-Nya, hingga batin Arjuna seakan terbenam dalam pingsan.

Verse 62

ततो<5भिपीडितैगरत्रि: पिण्डीकृत इवाबभौ । फाल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत,भारत! तदनन्तर देवाधिदेव महादेवजीके अंगोंसे अवरुद्ध हो अर्जुन अपने पीड़ित अवयवोंके साथ मिट्टीके लोंदे-से दिखायी देने लगे

Wahai Bhārata, ketika anggota tubuhnya terhimpit dan terkungkung oleh Dewa para dewa, Mahādeva, Phālguna (Arjuna) tampak seolah dipadatkan menjadi segumpal tanah—demikian tertahan seluruh raganya.

Verse 63

निरुच्छवासो5 भवच्चैव संनिरुद्धों महात्मना । पपात भूम्यां निश्चेष्टो गतसत्त्व इवाभवत्‌,महात्मा भगवान्‌ शंकरके द्वारा भलीभाँति नियन्त्रित हो जानेके कारण अर्जुनकी श्वासक्रिया बंद हो गयी। वे निष्प्राणकी भाँति चेष्टाहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े

Karena sepenuhnya ditahan oleh Yang Mahātmā, ia pun kehilangan napas. Ia jatuh ke tanah tanpa gerak, tampak seakan daya hidupnya telah sirna.

Verse 64

स मुहूर्त तथा भूत्वा सचेता: पुनरुत्थितः । रुधिरेणाप्लुताड़स्तु पाण्डवो भृशदु:खित:,दो घड़ीतक उसी अवस्थामें पड़े रहनेके पश्चात्‌ जब अर्जुनको चेत हुआ, तब वे उठकर खड़े हो गये। उस समय उनका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो रहा था और वे बहुत दुःखी हो गये थे

Setelah beberapa saat tergeletak demikian, Arjuna sadar kembali dan bangkit berdiri. Seluruh tubuhnya berlumur darah, dan sang Pāṇḍava diliputi duka yang amat dalam.

Verse 65

शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम्‌ | मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद्‌ भवम्‌,तब वे शरणागतवत्सल पिनाकधारी भगवान्‌ शिवकी शरणमें गये और मिट्टीकी वेदी बनाकर उसीपर पार्थिव शिवकी स्थापना करके पुष्पमालाके द्वारा उनका पूजन किया

Mencari perlindungan pada Sang Pelindung sejati, ia mendatangi Bhagawan Pinākin (Śiva). Dengan membuat altar sederhana dari tanah, ia memuja Bhava dengan seuntai karangan bunga.

Verse 66

तच्च माल्यं तदा पार्थ: किरातशिरसि स्थितम्‌ | अपश्यत्‌ पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गत:,कुन्तीकुमारने जो माला पार्थिव शिवपर चढ़ायी थी, वह उन्हें किरातके मस्तकपर पड़ी दिखायी दी। यह देखकर पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन हर्षसे उललसित हो अपने आपेमें आ गये

Saat itu Pārtha melihat karangan bunga yang dahulu dipersembahkannya kepada Śiva kini terletak di kepala Kirāta. Melihatnya, Arjuna—yang terbaik di antara para Pāṇḍava—dipenuhi sukacita dan kembali tenang, memahami isyarat ilahi di balik samaran sang pemburu.

Verse 67

पपात पादयोस्तस्य ततः प्रीतो5भवद्‌ भव: । उवाच चैनं वचसा मेघगम्भीरगीर्हर: । जातविस्मयमालोक्य तप:ःक्षीणाड्रसंहतिम्‌,और किरातरूपी भगवान्‌ शंकरके चरणोंमें गिर पड़े। उस समय तपस्याके कारण उनके समस्त अवयव क्षीण हो रहे थे और वे महान्‌ आश्चर्यमें पड़ गये थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर सर्वपापहारी भगवान्‌ भव उनपर बहुत प्रसन्न हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले

Ia pun tersungkur di kaki-Nya; maka Bhava (Śiva) menjadi berkenan. Hara, yang suaranya dalam laksana gemuruh awan, berbicara kepadanya—setelah melihatnya tertegun oleh keajaiban, dengan tubuh yang menyusut dan lemah karena tapa.

Verse 68

भव उवाच भो भो: फाल्गुन तुष्टोडस्मि कर्मणाप्रतिमेन ते । शौर्येणानेन धृत्या च क्षत्रियो नास्ति ते सम:,भगवान्‌ शिवने कहा--फाल्गुन! मैं तुम्हारे इस अनुपम पराक्रम, शौर्य और धैर्यसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे समान दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं है

Bhava bersabda: “Wahai Phālguna, Aku sangat berkenan atas perbuatanmu yang tiada banding. Dengan keberanian dan keteguhan seperti ini, tiada kṣatriya yang setara denganmu.”

Verse 69

सम॑ तेजश्न वीर्य च ममाद्य तव चानघ । प्रीतस्तेडहं महाबाहो पश्य मां भरतर्षभ,अनघ! तुम्हारा तेज और पराक्रम आज मेरे समान सिद्ध हुआ है। महाबाहु भरतश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरी ओर देखो

Bhava bersabda: “Wahai yang tak bercela, hari ini cahaya kemuliaan dan daya kepahlawananmu telah menjadi setara dengan-Ku. Wahai berlengan perkasa, banteng di antara para Bharata, Aku sangat berkenan kepadamu—pandanglah Aku.”

Verse 70

ददामि ते विशालाक्ष चक्षु: पूर्वऋषिर्भवान्‌ । विजेष्यसि रणे शत्रूनपि सर्वान्‌ दिवौकस:,विशाललोचन! मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। तुम पहलेके “नर” नामक ऋषि हो। तुम युद्धमें अपने शत्रुओंपर, वे चाहे सम्पूर्ण देवता ही क्यों न हों, विजय पाओगे

Bhava berkata: “Wahai yang bermata lebar, kepadamu kuanugerahkan penglihatan ilahi. Engkau sesungguhnya resi purba yang dikenal sebagai Nara. Dalam pertempuran engkau akan menaklukkan musuh-musuhmu—meski mereka seluruhnya para penghuni surga.”

Verse 71

प्रीत्या च ते5हं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम्‌ । त्वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात्‌,मैं तुम्हारे प्रेमवश तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र दूँगा, जिसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। तुम क्षणभरमें मेरे उस अस्त्रको धारण करनेमें समर्थ हो जाओगे

Karena kasih kepadamu, akan kuberikan senjata yang tak dapat dibendung itu. Sebab engkau mampu—bahkan sekejap saja—menanggung dan menggunakannya, senjata milikku itu.

Verse 72

वैशम्पायन उवाच ततो देव महादेवं गिरिशं शूलपाणिनम्‌ | ददर्श फाल्गुनस्तत्र सह देव्या महाद्युतिम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनने शूलपाणि महातेजस्वी महादेवजीका देवी पार्वती-सहित दर्शन किया

Vaiśampāyana berkata: Kemudian Phālguna (Arjuna) melihat di sana Mahādeva, Tuhan gunung-gunung, pemegang trisula, bercahaya agung, bersama Sang Dewi (Pārvatī).

Verse 73

स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य च । प्रसादयामास हरं पार्थ: परपुरंजय:,शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमारने उनके आगे पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और सिरसे प्रणाम करके शिवजीको प्रसन्न किया

Lalu Pārtha, penakluk benteng-benteng musuh, berlutut menyentuh bumi dan bersujud menundukkan kepala, memohon perkenan Hara (Śiva).

Verse 74

अजुन उवाच कपर्दिन्‌ सर्वदेवेश भगनेत्रनिपातन । देवदेव महादेव नीलग्रीव जटाधर,अर्जुन बोले--जटाजूटधारी सर्वदेवेश्वर देवदेव महादेव! आप भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले हैं। आपकी ग्रीवामें नील चिह्न शोभा पा रहा है। आप अपने मस्तकपर सुन्दर जटा धारण करते हैं

Arjuna berkata: “Wahai Kāpardin, Penguasa segala dewa, engkau yang menjatuhkan mata Bhaga! Wahai Dewa para dewa, Mahādeva—berleher biru, pemangku rambut gimbal—”

Verse 75

कारणानां च परम॑ जाने त्वां त्रयम्बकं विभुम्‌ | देवानां च गतिं देव त्वत्प्रसूतमिदं जगत्‌,प्रभो! मैं आपको समस्त कारणोंमें सर्वश्रेष्ठ कारण मानता हूँ। आप नत्रिनेत्रधारी तथा सर्वव्यापी हैं। सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं। देव! यह सम्पूर्ण जगत्‌ आपसे ही उत्पन्न हुआ है

Wahai Prabhu! Aku mengetahui Engkau sebagai sebab tertinggi di antara segala sebab. Engkau bermata tiga dan Mahahadir di segala penjuru; Engkaulah tumpuan dan tujuan para dewa. Wahai Dewa, seluruh jagat ini lahir dari-Mu.

Verse 76

अजेयस्त्वं त्रिभिलोंकै: सदेवासुरमानुषै: । शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे,देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक भी आपको पराजित नहीं कर सकते। आप ही विष्णुरूप शिव तथा शिवस्वरूप विष्णु हैं, आपको नमस्कार है

Engkau tak terkalahkan—bahkan tiga dunia beserta para dewa, asura, dan manusia tak mampu menundukkan-Mu. Salam hormat kepada-Mu, Śiva dalam wujud Viṣṇu dan Viṣṇu dalam wujud Śiva.

Verse 77

दक्षयज्ञविनाशाय हरिरुद्राय वै नमः । ललाटाक्षाय शर्वाय मीढुषे शूलपाणये,दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले हरिहररूप आप भगवान्‌को नमस्कार है। आपके ललाटमें तृतीय नेत्र शोभा पाता है। आप जगत्‌का संहारक होनेके कारण शर्व कहलाते हैं। भक्तोंकी अभीष्ट कामनाओंकी वर्षा करनेके कारण आपका नाम मीढ्वान्‌ (वर्षणशील) है। अपने हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है

Salam hormat kepada Hari-Rudra, penghancur yajña Dakṣa. Sembah sujud kepada Dia yang bermata ketiga di dahi; kepada Śarva, peluluh dunia; kepada Mīḍhuṣa, yang menurunkan anugerah sesuai dambaan para bhakta; dan kepada Sang Pemegang Triśūla.

Verse 78

पिनाकगोपष्जरे सूर्याय मंगल्याय च वेधसे । प्रसादये त्वां भगवन्‌ सर्वभूतमहेश्वर,पिनाकरक्षक, सूर्यस्वरूप, मंगलकारक और सृष्टिकर्ता आप परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन! सर्वभूत-महेश्वर! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ

Salam hormat kepada-Mu, penjaga Pināka; yang bercahaya laksana Surya; yang membawa kemuliaan; dan Sang Penata semesta. Wahai Bhagavan, Mahēśvara bagi segala makhluk, aku memohon berkenanlah Engkau.

Verse 79

गणेशं जगत: शम्भुं लोककारणकारणम्‌ | प्रधानपुरुषातीतं परं सूक्ष्मतरं हरम्‌,आप भूतगणोंके स्वामी, सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण करनेवाले तथा जगत्‌के कारणके भी कारण हैं। प्रकृति और पुरुष दोनोंसे परे अत्यन्त सूक्ष्मस्वरूप तथा भक्तोंके पापोंको हरनेवाले हैं

Aku bersujud kepada Śambhu, Penguasa para gaṇa, penopang kesejahteraan jagat—sebab bahkan bagi sebab-sebab dunia. Melampaui Pradhāna (Prakṛti) dan Puruṣa, Ia Mahatinggi, lebih halus dari yang terhalus, dan penghapus dosa para bhakta.

Verse 80

व्यतिक्रमं मे भगवन्‌ क्षन्तुमहसि शंकर । भगवन्‌ दर्शनाकाडुक्षी प्राप्तोडस्मीम॑ं महागिरिम्‌,कल्याणकारी भगवन्‌! मेरा अपराध क्षमा कीजिये। भगवन्‌! मैं आपहीके दर्शनकी इच्छा लेकर इस महान्‌ पर्वतपर आया हूँ

Arjuna berkata: “Wahai Bhagawan Śaṅkara, ampunilah pelanggaranku. Wahai Tuhan, karena rindu akan darśana ilahimu, aku datang ke gunung agung ini.”

Verse 81

दयितं तव देवेश तापसालयमुत्तमम्‌ | प्रसादये त्वां भगवन्‌ सर्वलोकनमस्कृतम्‌,देवेश्वरर यह शैल-शिखर तपस्वियोंका उत्तम आश्रय तथा आपका प्रिय निवासस्थान है। प्रभो! सम्पूर्ण जगत्‌ आपके चरणोंमें वन्दना करता है। मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हों

Wahai Dewa-īśvara, puncak gunung ini adalah pertapaan terbaik bagi para tapa dan juga kediaman yang engkau kasihi. Bhagawan, seluruh dunia bersujud pada kakimu; aku memohon—berkenanlah kepadaku.

Verse 82

न मे स्थादपराधो5यं महादेवातिसाहसात्‌ | कृतो मयायमज्ञानाद विमर्दो यस्त्वया सह | शरणं प्रतिपन्नाय तत्‌ क्षमस्वाद्य शंकर

Janganlah ini menjadi pelanggaran dariku—keberanian nekat terhadap Mahādeva. Karena ketidaktahuan aku terlibat benturan dengan-Mu. Kini aku datang berlindung; ampunilah hari ini, wahai Śaṅkara.

Verse 83

महादेव! अत्यन्त साहसवश मैंने जो आपके साथ यह युद्ध किया है, इसमें मेरा अपराध नहीं है। यह अनजानमें मुझसे बन गया है। शंकर! मैं अब आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी उस धृष्टताको क्षमा करें ।। वैशम्पायन उवाच तमुवाच महातेजा: प्रहस्य वृषभध्वज: । प्रगृह्म रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम्‌,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! तब महातेजस्वी भगवान्‌ वृषभध्वजने अर्जुनका सुन्दर हाथ पकड़कर उनसे हँसते हुए कहा--“मैंने तुम्हारा अपराध पहलेसे ही क्षमा कर दिया”

Vaiśampāyana berkata: Lalu Tuhan yang bercahaya perkasa—Śiva, berpanji lembu—tersenyum; ia menggenggam lengan Arjuna yang elok dan berkata kepada Phālguna, “Aku telah memaafkanmu.”

Verse 84

परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान्‌ हर: । पुन: पार्थ सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वज:,फिर उन्हें दोनों भुजाओंसे खींचकर हृदयसे लगाया और प्रसन्नचित्त हो वृषके चिह्नसे अंकितध्वजा धारण करनेवाले भगवान्‌ रुद्रने पुनः कुन्तीकुमारको सान्त्वना देते हुए कहा

Dengan hati yang berkenan, Bhagawan Hara merangkulnya dengan kedua lengan; lalu Sang Berpanji Lembu kembali berbicara kepada Pārtha dengan kata-kata penghiburan.

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly balances the pursuit of extraordinary martial capability with the requirement of ethical legitimacy: power is sought for a defined duty-bound objective, yet must be acquired through restraint and divine sanction rather than personal ambition.

The text presents disciplined perseverance and diminishing attachment as prerequisites for higher capability: resolve is demonstrated through graduated self-limitation, indicating that inner governance precedes effective outer action.

No explicit phalaśruti formula appears here; instead, the chapter provides meta-validation through Śiva’s statement that he knows Arjuna’s intention and will grant the desired end, functioning as narrative authorization for the spiritual efficacy of the tapas.