Adhyaya 230
Vana ParvaAdhyaya 23061 Verses

Adhyaya 230

चित्रसेनगन्धर्वैः कौरवसंनिपातः (Citrasena and the Kaurava engagement)

Upa-parva: Gandharva–Kaurava Saṃgharṣa (Citrasena episode)

Vaiśaṃpāyana reports that the Kaurava party collectively approaches Duryodhana and then moves against a Gandharva-restrained situation in the forest. The Dhārtarāṣṭra forces disregard verbal checks and press inward with martial display. When speech fails to halt them, the Gandharva cohort informs King Citrasena, who condemns the Kauravas’ impropriety and authorizes armed action. Gandharvas advance rapidly; most Kaurava troops break formation and flee in visible disorder, while Karṇa (Vaikartana/Rādheya) alone initially refuses to turn away, checking the Gandharva host with intense arrow volleys and inflicting heavy losses. Duryodhana, Śakuni, Duḥśāsana, Vikarṇa, and other Dhṛtarāṣṭra sons re-engage with Karṇa at the front, producing a tumultuous clash. Citrasena escalates by deploying māyā (illusion/strategic deception), causing confusion; Kaurava fighters become isolated and overwhelmed in groups. Under pressure, many retreat toward the area where Yudhiṣṭhira is located. Karṇa continues to resist “like a mountain,” but Gandharvas concentrate on disabling his chariot—cutting yoke, dropping banner, and striking horses and charioteer—forcing Karṇa to dismount, take up sword and shield, and withdraw by mounting Vikarṇa’s chariot to effect escape.

Chapter Arc: वनपर्व के प्रवाह में कथा अचानक दिव्य लोकों की ओर मुड़ती है—इन्द्र के सम्मुख तेजस्वी, लोहिताम्बरधारी, तीक्ष्णदंष्ट्र, सर्वलक्षणसम्पन्न कुमार प्रकट होता है; त्रैलोक्य को प्रिय यह कौन है, और किस हेतु से उसका आविर्भाव हुआ? → स्कन्द अपने उद्गम और प्रयोजन का उद्घोष करता है—दानव-विनाश और देवकार्य-सिद्धि के लिए उसका प्राकट्य हुआ। रुद्र और अग्नि के रहस्यपूर्ण संयोग से जन्म की कथा, देवताओं की आशा और भय को एक साथ जगाती है: क्या यह कुमार देवसेनाओं को एक सूत्र में बाँध पाएगा, और क्या देवगण उसके तेज को धारण कर पाएँगे? → इन्द्र स्कन्द का देवसेनापति-पद पर अभिषेक करता है; लक्ष्मी-तुल्य श्री स्वयं उस युवा शूर पर आसीन होती है, और देवसेना के साथ उसका विधिवत पाणिग्रहण होता है—देव-शक्ति का केन्द्र एक नाम में स्थिर हो जाता है: महासेन स्कन्द। → अभिषिक्त महासेन देवगणों और समस्त भूतगणों से घिरकर देवसेनाओं को सान्त्वना देता है, उन्हें आश्वस्त करता है, और देव-व्यवस्था में अनुशासन व विजय-विश्वास स्थापित करता है; देवकार्य के लिए नेतृत्व अब अनिश्चित नहीं रहता। → अभिषेक के पश्चात् इन्द्र को उस कुमारी देवसेना का स्मरण होता है जिसे स्कन्द ने मुक्त किया था—यह स्मृति संकेत देती है कि देव-युद्ध का अगला चरण अब महासेन के नेतृत्व में शीघ्र ही घटित होगा।

Shlokas

Verse 1

#::3:.8 #::3...7 (0) हि २ 7 एकोनत्रिशर्दाधिकद्धिशततमो< ध्याय: स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह मार्कण्डेय उवाच उपविष्टं तु तं स्कन्दं हिरण्यकवचस्त्रजम्‌ । हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्‌! स्कन्द सोनेका कवच, सोनेकी माला और सोनेकी कलँगीसे सुशोभित मुकुट धारण किये (सुन्दर आसनपर) बैठे थे। उनके नेत्रोंसे सुवर्णकी- सी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीरसे महान्‌ तेज:पुंज प्रकट हो रहा था

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, Skanda duduk di singgasana, berhias baju zirah emas dan kalung emas. Ia mengenakan mahkota dengan jambul keemasan; matanya berkilau laksana emas, dan dari dirinya memancar cahaya yang amat dahsyat.”

Verse 2

लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्टं मनोरमम्‌ । सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम्‌,उन्होंने लाल रंगके वस्त्रसे अपने अंगोंको आच्छादित कर रखा था। उनके दाँत बड़े तीखे थे और उनकी आकृति मनको लुभा लेनेवाली थी। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा तीनों लोकोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे

Ia berselimut busana merah tua; taringnya tajam namun rupanya memikat. Ia memiliki segala tanda keberuntungan dan amat dicintai oleh ketiga dunia.

Verse 3

ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम्‌ | अभजत्‌ पद्मरूपा श्री: स्वयमेव शरीरिणी,तदनन्तर वर देनेमें समर्थ, शौर्यसम्पन्न, युवा अवस्थासे सुशोभित तथा सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत कुमार कार्तिकेयका कमलके समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभाने स्वयं ही सेवन किया

Kemudian Śrī—kemakmuran yang berwujud, laksana teratai—dengan sendirinya berpihak kepada sang pemuda pahlawan itu, sang pemberi anugerah, yang berhias anting yang berkilau halus.

Verse 4

श्रिया जुष्ट: पृथुयशा: स कुमारवरस्तदा । निषण्णो दृश्यते भूतै: पौर्णमास्यां यथा शशी,मूर्तिमती शोभासे सेवित हो वहाँ बैठे हुए महा-यशस्वी सुन्दरकुमारको उस समय सब प्राणी पूर्णमासीके चन्द्रमाकी भाँति देखते थे

Sang pangeran utama itu, dianugerahi kemakmuran dan termasyhur luas, pada saat itu tampak duduk di sana oleh semua makhluk—bersinar laksana bulan purnama pada malam purnama.

Verse 5

अपूजयन्‌ महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम्‌ | इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षय:,महामना ब्राह्मणोंने महाबली स्कन्दकी पूजा की और सब महर्षियोंने वहाँ आकर उनका इस प्रकार स्तवन किया

Kemudian para Brahmana yang berhati luhur memuliakan dia yang mahaperkasa itu; dan para resi agung yang hadir di sana pun menyapa Skanda dengan kata-kata pujian demikian.

Verse 6

ऋषय ऊचु: हिरण्यगर्भ भद्रें ते लोकानां शड्करो भव । त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृता:,ऋषि बोले--हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम समस्त जगतके लिये कल्याणकारी बनो। तुम्हारे पैदा हुए अभी छ: रातें ही बीती होंगी। इतनेमें ही तुमने समस्त लोकोंको अपने वशमें कर लिया है

Para resi berkata: “Wahai Hiraṇyagarbha, semoga kesejahteraan menyertaimu. Jadilah pembawa kebaikan bagi semua dunia. Baru enam malam berlalu sejak kelahiranmu, namun dalam waktu sesingkat itu engkau telah menundukkan seluruh dunia ke dalam kuasamu.”

Verse 7

अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम । तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकर:,सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है। अत: आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो

“Wahai yang terbaik di antara para dewa, engkaulah yang telah menganugerahkan kembali rasa tanpa takut kepada dunia-dunia ini. Karena itu, mulai hari ini jadilah Indra—jadilah penyingkir ketakutan bagi tiga dunia.”

Verse 8

स्कन्द उवाच किमिन्द्र: सर्वलोकानां करोतीह तपोधना: । कथं देवगणांश्वैव पाति नित्य सुरेश्वर:,स्कन्द बोले--तपोधनो! इन्द्र इस पदपर रहकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये क्‍या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओंकी किस प्रकार रक्षा करते हैं?

Skanda berkata: “Wahai para pertapa yang kaya tapa, apakah yang dikerjakan Indra, ketika memegang jabatan ini, bagi semua dunia? Dan bagaimana Sang Penguasa para dewa senantiasa melindungi rombongan para dewa?”

Verse 9

ऋषय ऊचु: इन्द्रो दधाति भूतानां बल॑ तेज: प्रजा: सुखम्‌ । तुष्ट: प्रयच्छति तथा सर्वान्‌ कामान्‌ सुरेश्वर:,ऋषि बोले--देवराज इन्द्र संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण प्राणियोंको बल, तेज, संतान और सुखकी प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं

Para resi berkata: “Bila Indra, raja para dewa, berkenan, ia menganugerahkan kepada semua makhluk kekuatan, daya-gagah, keturunan, dan kebahagiaan; demikian pula ia mengabulkan pemenuhan segala hasrat.”

Verse 10

दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति । अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदन:,वे दुष्टोंका संहार करते और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंको जीवन दान देते हैं। बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले इन्द्र सभी प्राणियोंको आवश्यक कार्योंमें लगनेका आदेश देते हैं

Ia membinasakan orang-orang durjana dan menganugerahkan kehidupan kepada para saleh yang teguh dalam laku tapa dan brata. Indra, penumpas asura bernama Bala, memerintah semua makhluk agar menunaikan tugas-tugas yang semestinya.

Verse 11

असूर्ये च भवेत्‌ सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमा: । भवत्यन्निश्च वायुश्न पृथिव्यापश्च॒ कारणै:,सूर्यके अभावमें वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमाके न रहनेपर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं। आवश्यकता पड़नेपर वे ही अग्नि, वायु, पृथिवी और जलका स्वरूप धारण कर लेते हैं

Di tempat tiada matahari, ia sendiri menjadi matahari; dan di tempat tiada bulan, ia sendiri menjadi bulan, menunaikan fungsinya. Bila diperlukan, ia pun mengambil wujud api, angin, bumi, dan air, menjadi sebab yang menggerakkan semuanya.

Verse 12

एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम्‌ । त्वंच वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व न:,यह सब इन्द्रका कार्य है। इन्द्रमें अपरिमित बल होता है। वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान्‌ हो। अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ

Inilah tugas yang patut dilakukan oleh Indra, sebab Indra memiliki kekuatan yang amat besar. Namun engkau pun, wahai pahlawan, adalah yang terunggul dalam kekuatan; maka jadilah Indra bagi kami—pemimpin dan pelindung kami.

Verse 13

शक्र उवाच भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां न: सुखावह: । अभिषिच्यस्व चैवाद्य प्राप्तरूपो$सि सत्तम,इन्द्रने कहा--महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ। सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो। अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो

Śakra (Indra) berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, jadilah Indra dan bawalah kebahagiaan bagi kami semua. Wahai yang terbaik di antara orang baik, engkau sepenuhnya layak atas kedudukan ini; maka terimalah penobatanmu pada jabatan ini hari ini juga.”

Verse 14

स्कन्द उवाच शधि त्वमेव त्रैलोेक्यमव्यग्रो विजये रत: । अहं ते किड्कर: शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम्‌,स्कन्द बोले--इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये। मैं तो आपका सेवक हूँ। मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है

Skanda berkata: “Wahai Śakra, engkaulah yang harus memerintah tiga dunia dengan pikiran tak terganggu, tekun pada karya kemenangan. Aku hanyalah pelayanmu; aku tidak menginginkan kedaulatan Indra.”

Verse 15

श॒क्र उवाच हलक: वीर त्वं देवानामरीन्‌ जहि । अवज्ञस्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिता:,इन्द्रने कहा--वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओंका संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे। यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे

Śakra (Indra) berkata: “Wahai Halaka, pahlawan—engkaulah yang harus membinasakan musuh-musuh para dewa. Orang-orang, tercengang oleh kegagahanmu, akan meremehkanku.”

Verse 16

इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम्‌ । आवयोश्व मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिता:,इन्द्रने कहा--वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओंका संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे। यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे

Śakra berkata: “Wahai pahlawan, meski aku tetap bertakhta sebagai Indra, aku tampak kalah dan kehilangan daya. Dan bila timbul perpecahan di antara kita berdua, orang-orang—tanpa lengah—akan berusaha menyalakan perselisihan.”

Verse 17

भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेष्यति । द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा,तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय । प्रभो! यदि तुम फ़ूट जाओगे तो जगतके प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे। महाबलवान्‌ वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे। अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो

Śakra berkata: “Wahai Yang Mahakuat, bila engkau terpecah, dunia akan jatuh ke dalam dua kubu. Dan ketika alam-alam pasti terbagi—berpihak kepadamu dan kepadaku—pertikaian di antara kita dapat bermula. Karena itu, engkaulah yang harus menjadi Indra; jangan menimbang-nimbang lagi.”

Verse 18

विग्रह: सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल । तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्ध॑ विजेष्यसि

Wahai yang mahaperkasa, bila pertikaian timbul karena perpecahan di antara makhluk-makhluk, maka di medan laga itu, wahai anakku, engkau akan menaklukkanku sesuai kadar keyakinan dan tekadmu.

Verse 19

स्कन्द उवाच त्वमेव राजा भद्र ते त्रैलोक्यस्थ ममैव च

Skanda berkata: “Engkaulah raja; semoga berkah menyertaimu—bagi Yang bersemayam di tiga dunia, dan bagiku juga.”

Verse 20

इन्द्र उवाच अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल,अभिषिच्यस्व देवानां सैनापत्ये महाबल । इन्द्रने कहा--महाबलवान्‌ स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो--महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो

Indra berkata: “Wahai yang perkasa, sesuai dengan sabdamu aku akan tetap tegak pada jabatan Indra. Maka, wahai pahlawan agung, terimalah penobatanmu sebagai panglima bala tentara para dewa.”

Verse 21

यदि सत्यमिदं वाक्‍यं निश्चयाद्‌ भाषितं त्वया । यदि वा शासन स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृूणु

Indra berkata: “Jika ucapanmu ini benar, diucapkan dengan keteguhan tekad, atau jika engkau, wahai Skanda, sungguh hendak melaksanakan perintahku, maka dengarkanlah aku.”

Verse 22

स्कन्द उवाच दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये

Skanda berkata: “Demi membinasakan para Dānava, dan demi menuntaskan maksud para dewa.”

Verse 23

मार्कण्डेय उवाच सो5भिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणै: सह

Mārkaṇḍeya berkata: “Maka ia pun ditahbiskan dengan semestinya oleh Maghavat (Indra), disaksikan oleh segenap golongan para dewa.”

Verse 24

अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभि: | तत्र तत्‌ काउ्चनं छत्र प्रियमाणं व्यरोचत

Di sana ia bersinar dengan kemegahan yang luar biasa, dihormati oleh para maharṣi. Di tempat itu pula, sebuah payung emas—dianugerahkan dengan kasih dan penghargaan sebagai tanda kemuliaan—berkilau terang di atasnya.

Verse 25

यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम्‌ | मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओंसहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया। उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्धासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो || २३-२४ $ ।। विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी,नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात्‌ त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान्‌ शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कनन्‍्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira! Seperti lingkar cahaya api yang menyala sempurna memancar oleh kodratnya sendiri, demikian pula kemuliaan Skanda—setelah penobatannya sebagai panglima bala para dewa—tampak di sana dengan terang yang tak terbantahkan.”

Verse 26

आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना । आगम्य मनुजव्याप्र सह देव्या परंतप,नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात्‌ त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान्‌ शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कनन्‍्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai yang terbaik di antara manusia, Yudhiṣṭhira, penakluk musuh! Tuhan Śiva yang termasyhur, sang pemusnah Tripura, datang ke sana bersama Dewi Pārvatī. Lalu mereka mengalungkan pada leher Skanda sebuah karangan bunga emas yang bercahaya, karya Viśvakarmā.”

Verse 27

अर्चयामास सुप्रीतो भगवान्‌ गोवृषध्वज: । रुद्रमग्निं द्विजा:ः प्राहू रुद्रसूनुस्ततस्तु सः,भगवान्‌ वृषध्वज (शिव)-ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्दका समादर किया। ब्राह्मणलोग अग्निको रुद्रका स्वरूप बताते हैं, इसलिये स्कन्द भगवान्‌ रुद्रके ही पुत्र हैं

Dengan sangat berkenan, Sang Bhagavān yang berpanji lembu (Śiva) menghormati Skanda dengan pemujaan penuh takzim. Para brāhmaṇa menyatakan Agni sebagai wujud Rudra; karena itu Skanda sungguh putra Rudra.

Verse 28

रुद्रेण शुक्रमुत्सृष्टं तच्छवेत: पर्वतो5भवत्‌ | पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभि: कृतं नगे,रुद्रने जिस वीर्यका त्याग किया था, वही श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। फिर कृत्तिकाओंने अग्निके वीर्यको श्वेत पर्वतपर पहुँचाया था

Benih yang dilepaskan oleh Rudra berubah menjadi Gunung Putih. Di Gunung Putih itu, para Kṛttikā menempatkan sari daya generatif Pāvaka (Agni).

Verse 29

पूज्यमान तु रुद्रेण दृष्टवा सर्वे दिवौकस: । रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवर्ता वरम्‌,भगवान्‌ रुद्रके द्वारा गुणवानोंमें श्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयका सम्मान होता देख सब देवता कहने लगे, ये रुद्रके ही पुत्र हैं

Melihat Guha dihormati oleh Rudra, semua dewa penghuni surga berseru, “Guha ini—yang paling utama di antara para berbudi—sungguh putra Rudra.”

Verse 30

अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्लिं जातो हायं शिशु: । तत्र जातस्तत:ः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततो5भवत्‌,'रुद्रने अग्निमें प्रवेश करके इस शिशुको जन्म दिया है। रुद्रस्वरूप अग्निसे उत्पन्न होनेके कारण स्कन्द रुद्रके ही पुत्र कहलाये”

Dengan daya Rudra, memasuki Agni, anak ini lahir. Karena terlahir dari api yang berhakikat Rudra, ia kemudian dikenal sebagai Skanda dan dipandang sebagai putra Rudra sendiri.

Verse 31

रुद्रस्य वहल्लेः स्वाहाया: षण्णां स्त्रीणां च भारत | जात: स्कनन्‍्द: सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततो5भवत्‌,भारत! सुरश्रेष्ठ स्कन्दका जन्म रुद्रस्वरूप अग्निसे, स्वाहासे तथा छः स्त्रियोंसे हुआ था। इसलिये वे भगवान्‌ रुद्रके पुत्र हुए

Wahai Bhārata, Skanda—yang utama di antara para dewa—lahir dari Rudra, dari Vahni (Agni), dari Svāhā, dan dari enam perempuan; karena itu ia dipandang sebagai putra Dewa Rudra.

Verse 32

अरजे वाससी रक्ते वसान: पावकात्मज: । भाति दीप्तवपु: श्रीमान्‌ रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान्‌,अग्निनन्दन स्कन्द लाल रंगके दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये कान्तिमान्‌ एवं तेजस्वी शरीरसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो दो लाल बादलोंके साथ भगवान्‌ अंशुमाली (सूर्य) सुशोभित हो रहे हों

Skanda, putra Api, mengenakan dua kain merah yang bersih tanpa noda; dengan tubuhnya yang bercahaya dan penuh kemuliaan, ia tampak laksana matahari (Aṃśumān) berhias dua awan merah.

Verse 33

कुक्कुटश्नाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृत: । रथे समुच्छितो भाति कालाग्निरिव लोहितः,अग्निदेवने स्कन्दके लिये कुक्कुटके चिह्लसे अलंकृत ऊँचा ध्वज प्रदान किया था, जो रथपर अपनी अरुण प्रभासे प्रलयाग्निके समान उद्धासित होता था

Agni, yang dikenal sebagai Kukkūṭaśnā, menganugerahkan kepadanya panji berhias lambang ayam jantan. Terangkat tinggi di atas kereta, panji merah itu menyala laksana api pralaya.

Verse 34

या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शान्तिर्बलं तथा । अग्रतस्तस्य सा शक्तिदेवानां जयवर्धिनी,सम्पूर्ण भूतोंमें जो चेष्टा, प्रभा, शान्ति और बल है, वही कुमार कार्तिकेयके सम्मुख शक्तिरूपमें उपस्थित है। वह देवताओंकी विजयश्रीको बढ़ानेवाली है

Dorongan bertindak yang ada pada semua makhluk—beserta cahaya, ketenangan, dan kekuatannya—kini berdiri di hadapannya sebagai Śakti yang menjelma. Dialah daya yang menambah kejayaan kemenangan para dewa.

Verse 35

विवेश कवचं चास्य शरीरे सहजं तथा । युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवीति तत्‌ सदा,तथा उन स्कन्ददेवके शरीरमें सहज (स्वाभाविक) कवचका प्रवेश हो गया, जो सदा उनके युद्ध करते समय प्रकट होता था

Lalu ke dalam tubuhnya masuklah baju zirah yang alami, bawaan sejak lahir. Setiap kali sang dewa terjun bertempur, zirah itu selalu menampakkan diri dengan sendirinya.

Verse 36

शक्तिर्धर्मो बल॑ तेज: कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः । ब्रह्माण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम्‌,राजन! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन--ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे

Wahai raja! Daya, dharma, kekuatan, kemilau, keelokan bercahaya, kebenaran, keluhuran; bakti kepada para Brahmana, kejernihan budi yang tak tergoyahkan, serta perlindungan bagi para bhakta—semua kebajikan ini lahir bersamaan dengan Skanda.

Verse 37

निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम्‌ | स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप,राजन! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन--ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे

Wahai penguasa manusia! Menebas dan membinasakan musuh, serta melindungi seluruh dunia—semuanya pun lahir bersama Skanda.

Verse 38

एवं देवगणै: सर्वे: सो5भिषिक्त: स्वलंकृत: । बभौ प्रतीत: सुमना: परिपूर्णेन्दुमण्डल:,इस प्रकार समस्त देवताओंद्वारा सेनापतिके पदपर अभिषिक्त होकर विविध आभूषणोंसे विभूषित, विशुद्ध एवं प्रसन्न हृदयवाले स्कन्द पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हुए

Demikianlah, setelah ditahbiskan oleh seluruh golongan dewa ke jabatan panglima bala surgawi dan dihiasi perhiasan mulia, Skanda—suci dan berhati gembira—bersinar laksana cakram bulan purnama.

Verse 39

इष्टे: स्वाध्यायघोषैश्व देवतूर्यवरैरपि । देवगन्धर्वगीतैश्नल सर्वैरप्सरसां गणै:,उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ये तथा और भी बहुत-से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे

Saat itu, dari segala penjuru bangkit bunyi yang paling merdu—gaung lantang pembacaan Weda dan kidung-kidung suci yang membawa pertanda baik. Alat musik surgawi yang terbaik pun dimainkan; para dewa dan Gandharwa bernyanyi; dan seluruh rombongan Apsara menari. Banyak makhluk ilahi lainnya, juga kelompok-kelompok Piśāca, berhias aneka perhiasan, berseri oleh sukacita dan kepuasan, berdiri mengelilingi Skanda untuk memuliakannya dengan kehadiran mereka.

Verse 40

एतैश्वान्यैश्व बहुभिस्तुषशट्एष्टै: स्वलंकृतैः । सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा,उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ये तथा और भी बहुत-से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे

Demikian pula, oleh banyak rombongan lainnya—berhias dengan perhiasan masing-masing dan bersorak karena puas—ia dikepung rapat oleh kelompok-kelompok Piśāca dan juga oleh kelompok-kelompok para dewa. Pada saat itu juga, dari segala arah bergema lantunan Weda yang amat menyenangkan didengar; alat musik ilahi terbaik dimainkan; para dewa dan Gandharwa bernyanyi; dan semua Apsara menari—membentuk lingkaran sukacita dan hormat di sekeliling Skanda.

Verse 42

अथैनमभ्ययु: सर्वा देवसेना: सहस्रशः

Lalu semua bala tentara surgawi, beribu-ribu jumlahnya, bergerak maju menyerbu ke arahnya.

Verse 43

अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणा: सर्वतो दिश: । तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं--'आप ही हमारे पति हैं” ।। ४२ ई ।। ता: समासाद्य भगवान्‌ सर्वभूतगणैर्वृत:

Dari segala penjuru mereka berseru, “Engkaulah suami kami.” Setelah mendekatinya, Sang Bhagavān berdiri dikelilingi oleh rombongan segala makhluk.

Verse 44

शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दे सेनापतिं तदा

Kemudian Śatakratu (Indra) menahbiskan Skanda dan mengangkatnya sebagai panglima bala tentara para dewa.

Verse 45

अयं तस्या: पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम्‌

Mārkaṇḍeya berkata: “Sungguh, lelaki inilah yang ditetapkan oleh Brahmā sendiri sebagai suaminya.”

Verse 46

विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां हालंकृताम्‌ । उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये ।। स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम,फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा--'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो। “इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah merenung, ia membawa Devasenā yang berhias perhiasan. Lalu Indra, pembunuh Bala, berkata kepada Skanda: “Wahai yang terbaik di antara para dewa, bahkan sebelum kelahiranmu Brahmā telah menetapkan gadis ini sebagai istrimu. Maka terimalah tangannya menurut tata upacara suci, dengan mantra-mantra Weda di depan.”

Verse 47

अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा । तस्मात्‌ त्वमस्या विधिवत पार्णिं मन्त्रपुरस्कृतम्‌,फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा--'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो। “इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया

Mārkaṇḍeya berkata: “Bahkan sebelum engkau lahir, Brahmā Yang Maha Ada telah menetapkan gadis ini sebagai istrimu. Karena itu, terimalah tangannya menurut tata cara yang benar, dengan mantra-mantra Weda sebagai pengiring utama.”

Verse 48

गृहाण दक्षिणं देव्या: पाणिना पद्मवर्चसा । एवमुक्त: स जग्राह तस्या: पार्णिं यथाविधि,फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा--'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो। “इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया

Mārkaṇḍeya berkata: “Genggamlah tangan kanan sang dewi dengan tanganmu yang bercahaya laksana teratai.” Setelah demikian diperintahkan, Skanda pun menerima tangannya sesuai tata upacara.

Verse 49

(५॥॥ बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च । एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जना:,उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंका जप और होम किया। इस प्रकार सब लोग यह जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेयकी पटरानी है

Mārkaṇḍeya berkata: Bṛhaspati, sang ahli mantra, melantunkan mantra-mantra suci dan mempersembahkan oblation ke dalam api. Maka orang-orang pun mengetahui bahwa Devasenā adalah permaisuri utama Skanda (Kārttikeya) yang telah ditahbiskan.

Verse 50

षष्ठी यां ब्राह्मणा: प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम्‌ । सिनीवालीं कुहूं चैव सदवृत्तिमपराजिताम्‌

Markandeya berkata: “Tithi keenam—yang oleh para brahmana disebut sebagai Lakṣmī sendiri, yakni ‘Harapan’ yang menganugerahkan kebahagiaan—juga dinamai Sinīvālī dan Kuhū; lagi pula dipuji sebagai ‘Perilaku Luhur’ serta ‘Tak Terkalahkan.’”

Verse 51

उसीको ब्राह्मणलोग पष्ठछी, लक्ष्मी, आशा, सुखप्रदा, सिनीवाली, कुहू, सदवृत्ति तथा अपराजिता कहते हैं ।। यदा स्कन्द: पतिर्लब्ध: शाश्वतो देवसेनया । तदा तमाश्रयल्लक्ष्मी: स्वयं देवी शरीरिणी,जब देवसेनाने स्कन्दको अपने सनातन पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया, तब (शोभास्वरूपा) लक्ष्मीदेवीने स्वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया

Markandeya berkata: “Ketika Devasenā memperoleh Skanda sebagai suami abadinya, saat itu pula Lakṣmī—sang dewi yang berwujud—sendiri bernaung padanya.” Dalam bingkai kisah, hal ini menegaskan bahwa keberuntungan dan kemilau ilahi dengan sendirinya menetap di tempat persatuan yang sah, keteguhan, dan tatanan yang ditetapkan.

Verse 52

श्रीजुष्ट: पठचमीं स्कन्दस्तस्माच्छीपज्चमी स्मृता । षष्ठ्यां कृतार्थो5भूद्‌ यस्मात्‌ तस्मात्‌ षष्ठी महातिथि:,पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात्‌ शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपड्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षप्ठी महातिथि मानी गयी

Pada tithi kelima, Skanda dinaungi oleh Śrī—yakni kemuliaan dan keindahan; karena itu tithi itu dikenang sebagai Śrīpañcamī. Dan pada tithi keenam ia mencapai keberhasilan yang sempurna; maka tithi keenam dipandang sebagai mahātithi, “hari agung.”

Verse 183

तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय । प्रभो! यदि तुम फ़ूट जाओगे तो जगतके प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे। महाबलवान्‌ वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे। अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो

Śakra (Indra) berkata: “Karena itu, engkaulah yang harus menjadi Indra—jangan menimbang-nimbang lagi. Wahai Tuan, bila engkau terpecah, makhluk-makhluk dunia akan terbelah menjadi dua pihak. Wahai pahlawan perkasa, ketika seluruh alam pasti terbagi menjadi dua kubu dan manusia menumbuhkan rasa perbedaan serta permusuhan, perang dapat meletus di antara kita. Anakku, dalam perang itu—demikian keyakinanku—engkaulah yang akan menang. Maka, jadilah Indra. Jangan memikirkan hal lain dalam perkara ini.”

Verse 193

करोमि किं च ते शक्र शासन तद्‌ ब्रवीहि मे । स्कन्द बोले--देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ---? यह मुझे बतानेकी कृपा करें

Skanda berkata: “Wahai Śakra (Indra), katakan kepadaku perintahmu—apa yang harus kulakukan? Semoga engkau tetap teguh bertakhta sebagai raja para dewa; semoga kesejahteraan menyertaimu. Engkaulah penguasa tiga dunia—dan juga tuanku. Maka, perintah yang manakah harus kutaat?”

Verse 213

अभिषिच्यस्व देवानां सैनापत्ये महाबल । इन्द्रने कहा--महाबलवान्‌ स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो--महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो

Indra berkata: “Wahai yang mahaperkasa, terimalah penahbisan sebagai panglima bala tentara para dewa. Jika engkau sungguh hendak menaati titahku, jika tekadmu teguh dan benar, dengarkan keputusanku: sebagaimana engkau anjurkan, aku akan tetap tegak pada kedudukan Indra; dan engkau hendaklah menerima penahbisan sebagai senapati para dewa. Dengan demikian kewibawaan terjaga tanpa persaingan, dan dharma ditempatkan pada tangan yang paling kuat dan paling layak demi kesejahteraan bersama.”

Verse 226

गोब्राह्मणहितार्थाय सैनापत्येडभिषिज्च माम्‌ | स्कन्द बोले--देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये

Skanda berkata: “Wahai Raja para dewa, demi kebinasaan para danawa, demi keberhasilan tugas para dewa, dan demi kesejahteraan sapi serta para Brahmana, tahbiskanlah aku pada jabatan panglima tertinggi.”

Verse 228

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रयंगनें कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—di bagian Ringkasan Mārkaṇḍeya—dalam kisah Āṅgirasa, berakhirlah bab ke-228 yang membahas tema kelahiran seorang putra.

Verse 229

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्धिरसे स्कन्दोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva—di bagian Ringkasan Mārkaṇḍeya—berakhir bab ke-229 dalam kisah Skanda pada episode Āṅgirasa.

Verse 413

विनिहत्य तम: सूर्य यथेहाभ्युदितं तथा । उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों

Mārkaṇḍeya berkata: “Sebagaimana matahari terbit di sini setelah memusnahkan kegelapan, demikian pula saat itu Kumāra Kārttikeya—putra kesayangan Agni—tampak dalam kemuliaan. Dikelilingi para dewa dan ditahbiskan oleh mereka pada jabatan panglima, ia bersinar sambil menampilkan aneka permainan ilahi. Para dewa memandang Mahāsena yang baru diurapi itu seakan-akan Sang Surya sendiri telah terbit setelah menyingkirkan malam.”

Verse 433

अर्चितस्तु स्तुतश्वैव सान्त्वयामास ता अपि | समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान्‌ स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए

Setelah dipuja dan dipuji sebagaimana mestinya, Dewa Skanda pun menenteramkan bala tentara para dewa itu. Dikelilingi oleh himpunan makhluk yang tak terbilang, ia menyambut pasukan para dewa mendekat, meneguhkan hati mereka, dan pada gilirannya menerima penghormatan serta sanjungan dari mereka.

Verse 443

सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात्‌ उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था

Setelah Indra menobatkan Skanda sebagai panglima bala tentara para dewa, ia teringat akan gadis Devasenā—yang dahulu telah ia selamatkan dan bebaskan dari tangan Keśī.

Verse 4131

क्रीडन्‌ भाति तदा देवैरभिषिक्तश्चन पावकि: । अभिषिक्त महासेनमपश्यन्त दिवौकस:

Saat para dewa melaksanakan penahbisan, putra Pāvaki (putra Agni) tampak bersinar, bahkan ketika ia bermain dalam kemilau cemerlang. Namun Dewa Api sendiri tidak terlihat; para penghuni surga menyaksikan Mahāsena-lah yang telah diurapi.

Frequently Asked Questions

The chapter contrasts coercive assertion of will against norms of restraint: the Kauravas ignore verbal prohibition, prompting a response framed as enforcement of propriety and boundary order.

Prideful escalation can dissolve cohesion and expose leaders to rapid reversal; disciplined restraint and legitimate authority are portrayed as stabilizing, while confusion (māyā) amplifies tactical vulnerability.

No explicit phalaśruti appears in this passage; its function is primarily narrative-ethical, illustrating consequences of conduct and the strategic costs of disregarding counsel and boundaries.