Adhyaya 29
Anushasana ParvaAdhyaya 29110 Verses

Adhyaya 29

मातङ्ग–शक्रसंवादः (Mataṅga–Śakra Dialogue on Tapas, Status, and Moral Qualities)

Upa-parva: Varṇa–Saṃskāra–Phala Anuśāsana (Matanga–Śakra Saṃvāda episode)

Bhīṣma recounts that Mataṅga, described as disciplined and firm in vow, undertakes severe austerity—standing on one foot for a hundred years. Śakra (Indra) addresses him repeatedly as Mataṅga petitions for a “supreme station” that is characterized as extremely difficult to obtain. Śakra warns that such overreaching is not Mataṅga’s proper dharma-path and that seeking the unattainable can lead to ruin; even with tapas, the requested transformation “will not be” in the manner desired. The discourse then outlines a graded sequence of births and statuses over extended time—moving from stigmatized human conditions through śūdra, vaiśya, rājanya, and further designations—emphasizing long durations of “parivartana” (repeated turning/recurrence) in each state. Finally, the text introduces moral-psychological obstacles (anger, elation, desire, aversion, excessive pride, and contentious speech) that can “enter” and degrade a twice-born person; if conquered, one attains a good end, but if they conquer him, he falls. Śakra concludes by advising Mataṅga to choose another boon, stating that brāhmaṇya is exceedingly rare.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि पाण्डवों के समक्ष एक अद्भुत प्रसंग खुलता है—गड़ाजी (गङ्गा-तीर्थ) का माहात्म्य, जिसकी कीर्ति सूर्य-तप्त जल तक में पुण्य का संचार करती है। → युधिष्ठिर, भ्राताओं सहित, पितामह भीष्म से प्रश्नों की माला बाँधते हैं—कौन-से देश, जनपद, आश्रम, पर्वत और नदियाँ विशेष पुण्यदायी हैं? इसी जिज्ञासा के साथ गड़ाजी के जल, दर्शन और व्रत-तप की तुलनाएँ सामने आती हैं, जो साधारण पुण्य-कल्पनाओं को चुनौती देती हैं। → गड़ाजी के माहात्म्य का उत्कर्ष—सूर्य-किरणों से तपे गड़ाजल के पान, गड़ाजी में एक मास-निवास, और गङ्गा-दर्शन से उत्पन्न प्रसाद की तुलना ऐसे महातप से की जाती है जो युग-सहस्र तक एक पाँव पर खड़े रहने जैसा है; यहाँ तीर्थ-शक्ति का चरम प्रतिपादन होता है। → उपदेश का फल यह कि पाण्डवों का चित्त प्रसन्न और स्थिर होता है; मन्त्र-कोविद ब्राह्मण उदित सूर्य की भाँति उपस्थान करते हैं, और तप-प्रभाव से दिशाएँ प्रकाशित-सी प्रतीत होती हैं—श्रद्धा, विस्मय और शान्ति में अध्याय ठहरता है। → महर्षिगण भीष्म और पाण्डवों की अनुमति लेकर सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो जाते हैं—यह संकेत छोड़ते हुए कि आगे भीष्म के मुख से तीर्थ-धर्म और पुण्य-मार्ग का प्रवाह और गहन होगा।

Shlokas

Verse 1

अत-#-#क+ षड्विशो<5ध्याय: श्रीगड़ाजीके माहात्म्यका वर्णन वैशम्पायन उवाच बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया ब्रह्मण: समम्‌ । पराक्रमे शक्रसममादित्यसमतेजसम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, Bhīṣma—putra Gaṅgā yang perkasa—berakal bagaikan Bṛhaspati, berhati sabar bagaikan Brahmā, gagah bagaikan Śakra, dan bercahaya bagaikan Sang Surya; tak pernah menyimpang dari batas dharmanya. Setelah dipanah oleh Arjuna, ia terbaring di ranjang para pahlawan, ranjang anak panah, menanti saat yang telah ditetapkan. Ketika itu Raja Yudhiṣṭhira, bersama saudara-saudaranya dan yang lain, mengajukan kepadanya berbagai pertanyaan; maka banyak maharṣi ilahi pun datang untuk memandang Bhīṣma.”

Verse 2

गाड़ेयमर्जुनेनाजी निहतं भूरितेजसम्‌ । भ्रातृभि: सहितो<अ्यैश्न पर्यपृच्छद्‌ युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये

Waiśampāyana berkata: Dalam pertempuran itu, Bhīṣma putra Gaṅgā—yang bercahaya dan agung—ditumbangkan oleh Arjuna. Lalu Raja Yudhiṣṭhira, bersama saudara-saudaranya, mendekatinya dan mengajukan banyak pertanyaan tentang berbagai perkara.

Verse 3

शयानं वीरशयने कालाकाड्'क्षिणमच्युतम्‌ । आज ममुर्भरतश्रेष्ठ द्रष्टकामा महर्षय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गड़ानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह- तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत-से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये हि. न विन न मु 73

Waiśampāyana berkata: Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, ketika Bhīṣma berbaring di ranjang para pahlawan (ranjang anak panah), teguh dan tak tergoyahkan, menanti saat kematian yang telah ditetapkan, banyak mahārṣi—ingin memandangnya—datang ke sana.

Verse 4

अन्रिर्वसिष्ठो5थ भृगुः पुलस्त्य: पुलह:ः क्रतुः । अज्धिरागौतमोडगस्त्य: सुमति: सुयतात्मवान्‌,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच

Waiśampāyana berkata: “Para resi itu ialah Atri, Vasiṣṭha, Bhṛgu, Pulastya, Pulaha, Kratu, Aṅgiras, Gautama, Agastya, dan Sumati yang berjiwa terkendali.”

Verse 5

विश्वामित्र: स्थूलशिरा: संवर्त: प्रमतिर्दम: । बृहस्पत्युशनोव्यासाश्ष्यवन: काश्यपो ध्रुव:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच प्न्गागाए ए््ग्राक्प्नार्याफ्रसाणक व्याप्त दत्गत्च एन नण्ड्डगाए 05 कि 0 377 “आते %&फस!! )॥| “-< ज।ड्ल 50 छ्ी(84॥( ्त पल 4 54॥&8

Waiśampāyana berkata: “(Di antara para resi agung itu) ada Viśvāmitra, Sthūlaśiras, Saṃvarta, Pramati, Dama, Bṛhaspati, Uśanas (Śukra), Vyāsa, Cyavana, Kāśyapa, dan Dhruva.”

Verse 6

दुर्वासा जमदन्निश्चव मार्कण्डेयोडथ गालव: । भरद्वाजो<थ रैभ्यक्ष यवक्रीतस्त्रितस्तथा,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच

Waiśampāyana berkata: “(Di antara para resi itu) ada Durvāsā, Jamadagni, Mārkaṇḍeya, lalu Gālava; Bharadvāja dan juga Raibhya; Yavakrīta serta Trita.”

Verse 7

स्थूलाक्ष: शबलाक्षश्न कण्वो मेधातिथि: कृश: । नारद: पर्वतश्चैव सुधन्वाथैकतो द्विज:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच

Waiśampāyana berkata: “Di antara para resi itu ada Sthūlākṣa, Śabalākṣa, Kaṇva, Medhātithi, dan Kṛśa; juga Nārada dan Parvata, bersama Sudhanvā serta brahmana Ekata.”

Verse 8

नितम्भूरभुवनो धौम्य: शतानन्दो5कृतव्रण: । जामदग्न्यस्तथा राम: कचश्चेत्येवमादय:,उनके नाम ये हैं--अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्िरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच

Waiśampāyana berkata: “(Di antara para resi itu) ada Nitambhū, Bhuvana, Dhaumya, Śatānanda, Akṛtavraṇa; juga Jāmadagnya Rāma (Paraśurāma) serta Kaca—dan banyak lainnya.”

Verse 9

समागता महात्मानो भीष्म द्रष्टे महर्षय: । तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिर:

Waiśampāyana berkata: Para maharṣi yang berhati agung berkumpul di sana untuk melihat Bhīṣma. Yudhiṣṭhira pun maju untuk menghormati dan memuja para mulia yang telah datang itu.

Verse 10

ते पूजिता: सुखासीना: कथाश्षक्रुर्महर्षय:

Waiśampāyana berkata: Setelah dihormati sebagaimana mestinya, para maharṣi itu duduk dengan tenteram, lalu mulai bertukar kisah dan percakapan.

Verse 11

भीष्मस्तेषां कथा: श्रुत्वा ऋषीणां भावितात्मनाम्‌

Waiśampāyana berkata: Setelah mendengar kisah-kisah yang disampaikan para resi yang telah menundukkan dan menyucikan batinnya itu, Bhīṣma pun (merenungkannya).

Verse 12

ततस्ते भीष्ममामन्त्रय पाण्डवांश्व महर्षय:

Kemudian para resi agung itu, setelah dengan hormat menyapa Bhīṣma, juga menyapa para Pāṇḍava.

Verse 13

तानृषीन्‌ सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि

Vaiśampāyana berkata: “Bahkan para resi yang amat beruntung itu—meski telah lenyap dari pandangan dan menjadi tak kasatmata—(tetap disebut dan diingat).”

Verse 14

पाण्डवास्तुष्टवुः सर्वे प्रणेमुश्न मुहुर्मुहुः । उन महाभाग मुनियोंके अदृश्य हो जानेपर भी समस्त पाण्डव बारंबार उनकी स्तुति और उन्हें प्रणाम करते रहे ।। १३ $ ।। प्रसन्नमनस: सर्वे गाज़ेयं कुरुसत्तमम्‌

Vaiśampāyana berkata: Semua Pāṇḍava berulang kali memuji para resi agung itu dan bersujud memberi hormat berkali-kali. Bahkan setelah para pertapa mulia itu lenyap dari pandangan, penghormatan mereka tetap berlanjut; lalu semuanya, dengan hati gembira, mendatangi Bhīṣma, yang terbaik di antara kaum Kuru.

Verse 15

प्रभावात्‌ तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवा:

Vaiśampāyana berkata: Melihat sinar kewibawaan yang lahir dari tapa para resi itu, para Pāṇḍava pun berdiri dalam hormat.

Verse 16

महाभाग्यं पर॑ं तेषामृषीणामनुचिन्त्य ते । पाण्डवा: सह भीष्मेण कथाश्षक्रुस्तदाश्रया:,उन महर्षियोंके महान्‌ सौभाग्यका चिन्तन करके पाण्डव भीष्मजीके साथ उन्हींके सम्बन्धमें बातें करने लगे

Vaiśampāyana berkata: Merenungkan keberuntungan tertinggi para resi itu, para Pāṇḍava bersama Bhīṣma mulai membicarakan hal-hal yang berkaitan dengan mereka.

Verse 17

वैशम्पायन उवाच कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्टवा भीष्मस्य पाण्डव: । धर्म्य धर्मसुतः प्रश्न॑ पर्यपृच्छद्‌ युधिष्ठिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बातचीतके अन्तमें भीष्मके चरणोंमें सिर रखकर धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने यह धर्मानुकूल प्रश्न पूछा--

Waisampayana berkata: “Wahai Janamejaya! Pada akhir percakapan, Yudhisthira—putra Dharma di antara para Pandawa—menyentuh kaki Bhishma dengan kepalanya, lalu mengajukan pertanyaan yang selaras dengan dharma.”

Verse 18

युधिछ्िर उवाच के देशा: के जनपदा आश्रमा: के च पर्वता: । प्रकृष्टा: पुण्यत: काश्न ज्ञेया नद्य: पितामह,युधिष्ठिर बोले--पितामह! कौन-से देश, कौन-से प्रान्त, कौन-कौन आश्रम, कौन-से पर्वत और कौन-कौन-सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझने योग्य हैं?

Yudhisthira berkata: “Wahai Kakek Agung, wilayah dan kerajaan mana, pertapaan mana, gunung mana, dan sungai mana yang patut dikenal sebagai yang paling utama dari sudut pandang pahala suci (punya)? Atas dasar apa semuanya dianggap teramat suci?”

Verse 19

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । शिलोज्छवृत्ते: संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस विषयमें शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक पुरुषका किसी सिद्ध पुरुषके साथ जो संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास सुनो

Bhishma berkata: “Wahai Yudhisthira, dalam perkara ini pun dikutip sebuah kisah purba sebagai teladan. Dengarkanlah riwayat lama itu—percakapan antara seorang yang hidup dengan śiloccavṛtti (memungut bulir-bulir yang tercecer) dan seorang resi yang telah sempurna (siddha).”

Verse 20

इमां कक्ित्‌ परिक्रम्य पृथिवीं शैलभूषणाम्‌ । असकृद ड्विपदां श्रेष्ठ: श्रेष्टस्य गृहमेधिन:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात्‌ शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी 5॥ ता ध ] गा 5त

Bhishma berkata: Setelah berulang kali mengelilingi bumi yang berhias jajaran pegunungan ini, seorang siddha—yang utama di antara manusia—datang ke rumah seorang kepala keluarga yang luhur, yang hidup dengan śiloccavṛtti. Sang grihastha menyambut dan memuliakannya menurut tata upacara yang semestinya.

Verse 21

शिलवृत्तेगहं प्राप्त: स तेन विधिनार्चित: । उवास रजनी तत्र सुमुख: सुखभागृषि:,मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात्‌ शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया। उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की। वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी

Setibanya di rumah sang grihastha yang menjalani śilavṛtti, resi siddha itu dihormati olehnya sesuai tata yang benar. Sang resi pun bermalam di sana dengan tenteram; wajahnya bening, damai, dan berseri oleh kepuasan batin.

Verse 22

शिलवृत्तिस्तु यत्‌ कृत्यं प्रातस्तत्‌ कृतवान्‌ शुचि: । कृतकृत्यमुपातिष्ठत्‌ सिद्ध तमतिथिं तदा,सबेरा होनेपर वह शिलवृत्तिवाला गृहस्थ स्नान आदिसे पवित्र होकर प्रातः:कालीन नित्यकर्ममें लग गया। नित्यकर्म पूर्ण करके वह उस सिद्ध अतिथिकी सेवामें उपस्थित हुआ। इसी बीचमें अतिथिने भी प्रातःकालके स्नान-पूजन आदि आवश्यक कृत्य पूर्ण कर लिये थे

Bhishma berkata: Saat fajar menyingsing, sang kepala rumah tangga yang berdisiplin itu, setelah menyucikan diri, menunaikan kewajiban-kewajiban pagi sebagaimana mestinya. Setelah selesai dengan laku harian, ia pun siap melayani tamu yang telah mencapai kesempurnaan; sementara itu sang tamu juga telah menuntaskan ritus paginya—mandi dan pemujaan serta kewajiban lain yang diperlukan.

Verse 23

तौ समेत्य महात्मानौ सुखासीनौ कथा: शुभा: । चक्रतुर्वेदसम्बद्धास्तच्छेषकृतलक्षणा:,वे दोनों महात्मा एक-दूसरेसे मिलकर सुखपूर्वक बैठे तथा वेदोंसे सम्बद्ध और वेदान्तसे उपलक्षित शुभ चर्चाएँ करने लगे

Kedua mahatma itu saling bertemu, lalu duduk dengan tenteram dan mulai bertukar wacana yang mulia—berlandaskan Weda dan ditandai oleh simpulan Vedānta—untuk menjernihkan makna tertinggi.

Verse 24

शिलवृत्ति: कथान्ते तु सिद्धमामन्त्रय यत्नत: । प्रश्न॑ पप्रच्छ मेधावी यन्मां त्वं परिपृच्छसि,बातचीत पूरी होनेपर शिलोउ्छवृत्तिवाले बुद्धिमान्‌ गृहस्थ ब्राह्मणने सिद्धको सम्बोधित करके यत्नपूर्वक वही प्रश्न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो

Setelah percakapan usai, Brahmana kepala rumah tangga yang hidup dengan laku disiplin itu—seorang yang bijaksana—dengan penuh kehati-hatian menyapa Sang Siddha dan mengajukan pertanyaan yang sama seperti yang kini engkau tanyakan kepadaku.

Verse 25

शिलवृत्तिस्वाच के देश:के जनपदा: के55श्रमा: के च पर्वता: । प्रकृष्टा: पुण्यत: काश्न ज्ञेया नद्यस्तदुच्यताम्‌,शिलवृत्तिवाले ब्राह्मणने पूछा--ब्रह्म! कौन-से देश, कौन-से जनपद, कौन-कौन आश्रम, कौन-से पर्वत और कौन-कौन-सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझनेयोग्य हैं? यह बतानेकी कृपा करें

Brahmana yang hidup dengan laku disiplin itu bertanya: “Wahai Brahmana mulia, wilayah mana, kerajaan mana, pertapaan mana, gunung mana, dan sungai mana yang patut dipandang paling utama dari sudut kebajikan suci? Mohon jelaskan kepadaku.”

Verse 26

सिद्ध उवाच ते देशास्ते जनपदास्ते5<श्रमास्ते च पर्वता: । येषां भागीरथी गड्ा मध्येनैति सरिद्वरा,सिद्धने कहा--ब्रह्मन्‌! वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके बीचसे होकर सरिताओंमें उत्तम भागीरथी गड़ा बहती हैं इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गज्भामाहात्म्यक थने षड्विंशो5ध्याय:

Sang Siddha berkata: “Wahai Brahmana, negeri-negeri, wilayah-wilayah, pertapaan-pertapaan, dan gunung-gunung itulah yang paling utama dalam kebajikan suci—yang di tengah-tengahnya mengalir Bhāgīrathī Gaṅgā, sungai termulia di antara segala sungai.”

Verse 27

/८-] __ 200+“7:. 5 फ्ड्लि कक तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुन: । गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गज्भां संसेव्य यां लभेत्‌,गड़ाजीका सेवन करनेसे जीव जिस उत्तम गतिको प्राप्त करता है उसे वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता

Makhluk hidup tidak mencapai tujuan tertinggi itu melalui tapa, disiplin selibat, yajña, ataupun pelepasan. Keadaan luhur yang sama justru diperoleh dengan bersandar dan berbakti sepenuh hati kepada Gaṅgā.

Verse 28

स्पृष्टानि येषां गाड़ेयैस्तोयैर्गात्राणि देहिनाम्‌ न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्याग: स्वर्गाद्‌ विधीयते,जिन देहधारियोंके शरीर गड्ाजीके जलसे भीगते हैं अथवा मरनेपर जिनकी हडियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं वे कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते

Mereka yang anggota tubuhnya tersentuh air Gaṅgā—atau yang tulangnya, setelah wafat, dihanyutkan ke Gaṅgā—tidak akan jatuh lagi dari surga.

Verse 29

सर्वाणि येषां गाड़ेयैस्तोयै: कार्याणि देहिनाम्‌ । गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति ते जना:,विप्रवर! जिन देहधारियोंके सम्पूर्ण कार्य गड़ाजलसे ही सम्पन्न होते हैं वे मानव मरनेके बाद पृथ्वीका निवास छोड़कर स्वर्गमें विराजमान होते हैं

Wahai brāhmaṇa, manusia-manusia yang seluruh keperluan hidup jasmaninya diselesaikan dengan air Gaṅgā—setelah meninggalkan bumi saat wafat—berdiam di surga.

Verse 30

पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि ये नरा: । पश्चात्‌ गड्ां निषेवन्ते तेडपि यान्त्युत्तमां गतिम्‌,जो मनुष्य जीवनकी पहली अवस्थामें पापकर्म करके भी पीछे गड़ाजीका सेवन करने लगते हैं वे भी उत्तम गतिको ही प्राप्त होते हैं

Orang-orang yang pada masa awal hidup melakukan perbuatan dosa, namun kemudian menempuh laku bersandar pada Gaṅgā, mereka pun mencapai keadaan tertinggi.

Verse 31

स्‍्नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाज़ियै: प्रयतात्मनाम्‌ । व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि,गड़ाजीके पवित्र जलसे स्नान करके जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है उन पुरुषोंके पुण्यकी जैसी वृद्धि होती है; वैसी सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी नहीं हो सकती

Bagi para pria yang mengekang diri, yang mandi dalam air Gaṅgā yang suci hingga batinnya tersucikan, pertambahan kebajikan yang timbul darinya tidak dapat dicapai bahkan dengan seratus yajña.

Verse 32

यावदस्थि मनुष्यस्य गड्ातोयेषु तिष्ठतति । तावद्वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते,मनुष्यकी हड्डी जितने समयतक गड्ाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है

Selama tulang seseorang masih berada di dalam air Sungai Gaṅgā, selama itu pula—beribu-ribu tahun lamanya—ia dimuliakan dan ditinggikan di alam surga.

Verse 33

अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रवि: । तथापहत्य पाप्मानं भाति गड़ाजलोक्षित:,जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारको विदीर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गड़ाजलमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने पापोंको नष्ट करके सुशोभित होता है

Sebagaimana matahari saat terbit bersinar setelah menghalau gelap yang pekat, demikian pula orang yang mandi dalam air Gaḍā menjadi bercahaya setelah memusnahkan dosanya.

Verse 34

विसोमा इव शर्वर्यों विपुष्पास्तरवो यथा । तद्धद्‌ देशा दिशश्वैव हीना गज्भाजलै: शिवै:,जैसे बिना चाँदनीकी रात और बिना फूलोंके वृक्ष शोभा नहीं पाते, उसी प्रकार गड़ाजीके कल्याणमय जलसे वज्चित हुए देश और दिशाएँ भी शोभा एवं सौभाग्य हीन हैं

Seperti malam tanpa sinar bulan dan pepohonan tanpa bunga tak tampak elok, demikian pula negeri-negeri dan penjuru-penjuru kehilangan kemuliaan serta keberuntungan bila terpisah dari air Gaḍā yang membawa kesejahteraan.

Verse 35

वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिता: । क्रतवश्चन॒ यथासोमास्तथा गड़ां विना जगत्‌,जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गड़ाके बिना जगत्‌की शोभा नहीं है

Sebagaimana semua varṇa dan āśrama kehilangan wibawa bila tanpa dharma dan pengetahuan, dan sebagaimana yajña tak tampak mulia tanpa soma, demikian pula dunia ini tiada berseri tanpa gada.

Verse 36

यथा हीन॑ नभो<र्केण भू:शैलै: खं च वायुना । तथा देशा दिशश्वैव गड़ाहीना न संशय:,जैसे सूर्यके बिना आकाश, पर्वतोंके बिना पृथ्वी और वायुके बिना अन्तरिक्षकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार जो देश और दिशाएँ गड़ाजीसे रहित हैं उनकी भी शोभा नहीं होती --इसमें संशय नहीं है

Sebagaimana langit kehilangan semarak tanpa matahari, bumi tanpa gunung, dan angkasa tanpa angin, demikian pula negeri-negeri dan penjuru-penjuru menjadi tak berseri bila tanpa gada—tanpa keraguan.

Verse 37

त्रिषु लोकेषु ये केचित्‌ प्राणिन: सर्व एव ते । तर्प्पमाणा: परां तृप्तिं यान्ति गज़ाजलै: शुभै:,तीनों लोकोंमें जो कोई भी प्राणी हैं, उन सबका गड़ाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर वे सब परम तृप्ति लाभ करते हैं

Segala makhluk hidup yang ada di tiga alam—semuanya—bila ditarpan dengan air suci Gangga, mencapai kepuasan tertinggi.

Verse 38

यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाड़ेयं पिबते जलम्‌ । गवां निहरिनिर्मुक्तादू यावकात्‌ तद्‌ विशिष्यते,जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गड़ाजलका पान करता है, उसका वह जलपान गायके गोबरसे निकले हुए जौकी लप्सी खानेसे अधिक पवित्रकारक है

Barangsiapa meminum air yang dipanaskan oleh matahari—air yang diambil dari sumber yang dalam dan mantap—maka minum itu memberinya kemurnian yang lebih tinggi daripada memakan bubur jelai yang dibuat dari biji-bijian yang dipisahkan dari kotoran sapi.

Verse 39

इन्दुब्रतसहस्र॑ तु यश्चरेत्‌ कायशोधनम्‌ । पिबेद्‌ यश्चापि गज्भाम्भ: समौ स्यातां न वा समौ,जो शरीरको शुद्ध करनेवाले एक सहस्र चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गड़ाजल पीता है, वे दोनों समान ही हैं अथवा यह भी हो सकता है कि दोनों समान नहों (गड़ाजल पीनेवाला बढ़ जाय)

Seseorang boleh menjalankan seribu tapa-penebusan Cāndrāyaṇa untuk menyucikan tubuh; yang lain cukup meminum air Gangga. Keduanya dapat dipandang setara—atau bahkan tidak setara, sehingga minum air Gangga melampaui yang pertama.

Verse 40

तिछेद्‌ युगसहस्न॑ तु पदेनैकेन यः पुमान्‌ । मासमेकं तु गज्जायां समौ स्यातां न वा समौ,जो पुरुष एक हजार युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और जो एक मासतक गड़ातटपर निवास करता है, वे दोनों समान हो सकते हैं अथवा यह भी सम्भव है कि समान न हों

Seseorang boleh berdiri bertapa dengan satu kaki selama seribu yuga; yang lain tinggal sebulan di tepi Gangga. Keduanya bisa dianggap setara dalam pahala rohani—atau bisa juga tidak setara.

Verse 41

लंबते5वाक्‌शिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान्‌ । तिष्ठेद्‌ यथेष्टं यश्चापि गड़ायां स विशिष्यते,जो मनुष्य दस हजार युगोंतक नीचे सिर करके वृक्षमें लटका रहे और जो इच्छानुसार गड़ाजीके तटपर निवास करे, उन दोनोंमें गड़ाजीपर निवास करनेवाला ही श्रेष्ठ है

Sekalipun seseorang bergantung pada pohon dengan kepala di bawah selama sepuluh ribu yuga, namun orang yang tinggal di tepi Gangga menurut kehendaknya dipandang lebih unggul.

Verse 42

अग्नौ प्रास्तं प्रधूयेत यथा तूल॑ द्विजोत्तम । तथा गज्भजावगाढस्य सर्वपापं प्रधूयते,द्विजश्रेष्ठट जैसे अतामें डाली हुई रूई तुरंत जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार गड़ामें गोता लगानेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं

Sang Siddha: “Wahai yang terbaik di antara kaum dwija, sebagaimana segumpal kapas yang dilemparkan ke dalam api seketika habis terbakar menjadi abu, demikian pula segala dosa orang yang menyelam ke dalam air Sungai Gaṅgā tersapu dan lenyap.”

Verse 43

भूतानामिह सर्वेषां दुः:खोपहतचेतसाम्‌ | गतिमन्वेषमाणानां न गड़ासदृशी गति:,इस संसारमें दुःखसे व्याकुलचित होकर अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़नेवाले समस्त प्राणियोंके लिये गंगाजीके समान कोई दूसरा सहारा नहीं है

Di dunia ini, bagi semua makhluk yang hatinya terpukul oleh duka dan mencari tumpuan serta jalan keselamatan, tiada jalan yang sebanding dengan Gaṅgā.

Verse 44

भवन्ति निर्विषा: सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात्‌ । गज्जाया दर्शनात्‌ तद्वत्‌ सर्वपापै: प्रमुच्यते,जैसे गरुड़को देखते ही सारे सर्पोंके विष झड़ जाते हैं, उसी प्रकार गड़ाजीके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है

Sebagaimana ular menjadi tak berbisa hanya dengan melihat Tārkṣya (Garuḍa), demikian pula dengan memandang Gaṅgā saja seseorang terbebas dari segala dosa.

Verse 45

अप्रतिष्ठाक्ष ये केचिदर्धर्मशरणाश्ष ये । तेषां प्रतिष्ठा गड़ेह शरणं शर्म वर्म च,जगत्‌में जिनका कहीं आधार नहीं है; तथा जिन्होंने धर्मकी शरण नहीं ली है, उनका आधार और उन्हें शरण देनेवाली श्रीगड़ाजी ही हैं। वे ही उसका कल्याण करनेवाली तथा कवचकी भाँति उसे सुरक्षित रखनेवाली हैं

Mereka yang tak memiliki sandaran di mana pun, dan mereka yang belum berlindung pada dharma—bagi mereka Gaṅgā-lah tumpuan yang teguh; dialah perlindungan, kesejahteraan dan ketenteraman, serta laksana zirah yang menjaga.

Verse 46

प्रकृष्टेरशुभै्ग्रस्ताननेकै: पुरुषाधमान्‌ । पततो नरके गज्ज संश्रितान्‌ प्रेत्य तारयेत्‌,जो नीच मानव अनेक बड़े-बड़े अमड्नलकारी पापकर्मोंसे ग्रस्त होकर नरकमें गिरनेवाले हैं, वे भी यदि गड़ाजीकी शरणमें आ जाते हैं तो ये मरनेके बाद उनका उद्धार कर देती हैं

Bahkan manusia paling hina yang diliputi banyak perbuatan buruk yang berat dan jatuh menuju neraka, bila berlindung pada Gaṅgā, akan diselamatkan olehnya setelah kematian.

Verse 47

ते संविभक्ता मुनिभिरननुनं देवैः सवासवै: । येडभिगच्छन्ति सततं गड्जां मतिमतां वर,बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्यण! जो लोग सदा गड्जाजीकी यात्रा करते हैं, उनपर निश्चय ही इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिलोग पृथक्‌-पृथक्‌ कृपा करते आये हैं

Wahai brāhmaṇa terbaik di antara para bijak! Mereka yang senantiasa berziarah menuju Sungai Gaṅgā, sungguh menerima anugerah yang khas dan melimpah dari para resi serta dari para dewa—bersama Vāsava (Indra).

Verse 48

विनयाचारहीनाश्न अशिवाश्षन नराधमा: । ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गड़ामुपाश्रिता:,विप्रवर! विनय और सदाचारसे हीन अमड्रलकारी नीच मनुष्य भी गड़ाजीकी शरणमें जानेपर कल्याणस्वरूप हो जाते हैं

Wahai brāhmaṇa utama! Bahkan manusia paling rendah—yang tanpa kerendahan hati dan tata laku mulia, serta condong pada jalan yang tidak suci—menjadi membawa keberuntungan bila berlindung pada Gaṅgā.

Verse 49

यथा सुराणाममृतं पितृणां च यथा स्वधा । सुधा यथा च नागानां तथा गड्भाजलं नृणाम्‌,जैसे देवताओंको अमृत, पितरोंको स्वधा और नागोंको सुधा तृप्त करती है, उसी प्रकार मनुष्योंके लिये गंगाजल ही पूर्ण तृप्तिका साधन है

Sebagaimana amṛta memuaskan para dewa, sebagaimana svadhā memuaskan para leluhur, dan sebagaimana sudhā memuaskan para nāga, demikian pula air Gaṅgā sajalah yang memberi kepuasan sempurna bagi manusia.

Verse 50

उपासते यथा बाला मातर क्षुधयार्दिता: । श्रेयस्कामास्तथा गड़ामुपासन्तीह देहिन:,जैसे भूखसे पीड़ित हुए बच्चे माताके पास जाते हैं, उसी प्रकार कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणी इस जगतमें गड़ाजीकी उपासना करते हैं

Sebagaimana anak-anak yang tersiksa lapar mendatangi ibunya, demikian pula para makhluk berjasad di dunia ini—yang mendambakan kesejahteraan sejati—memuja dan berlindung pada Gaṅgā.

Verse 51

स्वायम्भुवं यथा स्थान सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते । सस्‍्नातानां सरितां श्रेष्ठा गड़ा तद्गदिहोच्यते,जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंसे श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसे ही स्नान करनेवाले पुरुषोंके लिये गड़ाजी ही सब नदियोंमें श्रेष्ठ कही गयी हैं

Sebagaimana kedudukan Svāyambhuva (Brahmaloka) disebut yang tertinggi di antara semua alam, demikian pula bagi mereka yang mencari penyucian melalui mandi suci, Gaṅgā dinyatakan sebagai yang terbaik di antara segala sungai.

Verse 52

यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां धरा स्मृता । तथोपजीविनां गज्जा सर्वप्राणभृतामिह,जैसे धेनुस्वरूपा पृथ्वी उपजीवी देवता आदिके लिये आदरणीय है, उसी प्रकार इस जगतमें गंगा समस्त उपजीवी प्राणियोंके लिये आदरणीय हैं

Sebagaimana Bumi dikenang laksana seekor sapi bagi mereka yang hidup dari anugerahnya—maka dipuja oleh para dewa dan lainnya—demikian pula di dunia ini, Gaṅgā patut dihormati oleh semua makhluk yang menopang kehidupan.

Verse 53

देवा: सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखै: । अमृतान्युपजीवन्ति तथा गज्ाजलं नस:,जैसे देवता सत्र आदि यज्ञोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यमें स्थित अमृतसे आजीविका चलाते हैं, उसी प्रकार संसारके मनुष्य गंगाजलका सहारा लेते हैं

Sebagaimana para dewa, melalui yajña seperti satra, menopang hidup dari amṛta yang bersemayam di Bulan dan Matahari, demikian pula manusia di dunia ini menyandarkan hidup pada air Gaṅgā.

Verse 54

जाह्नववीपुलिनोत्थाभि: सिकताभि: समुक्षितम्‌ । आत्मानं मन्यते लोको दिविषछ्ठमिव शोभितम्‌,गंगाजीके तटसे उड़े हुए बालुका-कणोंसे अभिषिक्त हुए अपने शरीरको ज्ञानी पुरुष स्वर्गलोकमें स्थित हुआ-सा शोभासम्पन्न मानता है

Tersiram oleh butir-butir pasir yang terangkat dari tebing luas Jāhnavī (Gaṅgā), seseorang mengira dirinya seolah-olah berhias laksana penghuni surga.

Verse 55

जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्थध्ना बिभर्ति यः । बिभर्ति रूप॑ सो<र्कस्य तमोनाशाय निर्मलम्‌,जो मनुष्य गंगाके तीरकी मिट्टी अपने मस्तकमें लगाता है वह अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये सूर्यके समान निर्मल स्वरूप धारण करता है

Barangsiapa menaruh tanah dari tepi Jāhnavī (Gaṅgā) di atas kepalanya, ia mengenakan wujud yang bening laksana Matahari, untuk melenyapkan kegelapan kebodohan.

Verse 56

गड़ोर्मिभिरथो दिग्ध: पुरुषं पवनो यदा । स्पृशते सो<स्य पाप्मानं सद्य एवापकर्षति,गंगाकी तरंगमालाओंसे भीगकर बहनेवाली वायु जब मनुष्यके शरीरका स्पर्श करती है, उसी समय वह उसके सारे पापोंको नष्ट कर देती है

Ketika angin yang lembap oleh gelombang Gaṅgā menyentuh tubuh seseorang, seketika itu juga ia menarik pergi dan memusnahkan dosanya.

Verse 57

व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यत: । गड्जादर्शनजा प्रीतिव्यसनान्यपकर्षति,दुर्व्स्सनजनित दु:खोंसे संतप्त होकर मरणासन्न हुआ मनुष्य भी यदि गंगाजीका दर्शन करे तो उसे इतनी प्रसन्नता होती है कि उसकी सारी पीड़ा तत्काल नष्ट हो जाती है

Seorang manusia yang hangus oleh malapetaka dan meluncur menuju kebinasaan—bahkan di ambang maut—bila memandang Sungai Gaṅgā, maka sukacita yang lahir dari darśana itu segera menyapu bersih deritanya, melenyapkan duka yang timbul dari kesialan.

Verse 58

हंसारावै: कोकरवै रवैरन्यैश्व पक्षिणाम्‌ । पस्पर्थ गज गन्धर्वान्‌ पुलिनैश्व शिलोच्चयान्‌,हंसोंकी मीठी वाणी, चक्रवाकोंके सुमधुर शब्द तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवोंद्वारा गंगाजी गन्धर्वोंसे होड़ लगाती हैं तथा अपने ऊँचे-ऊँचे तटोंद्वारा पर्वतोंके साथ स्पर्धा करती हैं

Dengan panggilan merdu angsa, suara manis burung cakravāka, dan kicau beraneka burung lainnya, Gaṅgā seakan menandingi para Gandharva; dan dengan gosong-gosong pasir serta tebingnya yang menjulang, ia tampak bersaing dengan puncak-puncak batu pegunungan.

Verse 59

हंसादिभि: सुबहुभिवविविधी: पक्षिभिवव॒ताम्‌ | गड्ां गोकुलसम्बाधां दृष्टवा स्वर्गोडपि विस्मृत:,हंस आदि बहुसंख्यक एवं विविध पक्षियोंसे घिरी हुई तथा गौओंके समुदायसे व्याप्त हुई गंगाजीको देखकर मनुष्य स्वर्गलोकको भी भूल जाता है

Melihat Gaṅgā—dikelilingi angsa dan beraneka burung yang tak terhitung, serta dipadati kawanan sapi—seseorang menjadi begitu terpikat hingga bahkan surga pun terlupakan.

Verse 60

न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्थ सर्वकामानुपाश्रत: । सम्भवेद्‌ या परा प्रीतिर्गड्राया: पुलिने नृूणाम्‌,गंगाजीके तटपर निवास करनेसे मनुष्योंको जो परम प्रीति--अनुपम आनन्द मिलता है वह स्वर्गमें रहकर सम्पूर्ण भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषको भी नहीं प्राप्त हो सकता

Sukacita itu tidaklah mungkin diperoleh—bahkan oleh dia yang tinggal di surga dan bersandar pada segala kenikmatan. Kebahagiaan tertinggi yang diraih manusia dengan berdiam di hamparan pasir tepi Gaṅgā melampaui kenikmatan surgawi.

Verse 61

वाड्मन:कर्मजै ग्रस्त: पापैरपि पुमानिह । वीक्ष्य गड़ां भवेत्‌ पूतो अत्र मे नास्ति संशय:,मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंसे ग्रस्त मनुष्य भी गंगाजीका दर्शन करने मात्रसे पवित्र हो जाता है--इसमें मुझे संशय नहीं है

Bahkan seseorang di dunia ini yang dibebani dosa-dosa yang lahir dari ucapan, pikiran, dan perbuatan, menjadi suci hanya dengan memandang Gaṅgā—tentang hal ini, tiada keraguan bagiku.

Verse 62

सप्तावरान्‌ सप्त परान्‌ पितृस्तेभ्यश्व ये परे । पुमांस्तारयते गज्जां वीक्ष्य स्पृष्टवावगाहु च,गंगाजीका दर्शन, उनके जलका स्पर्श तथा उस जलके भीतर स्नान करके मनुष्य सात पीढ़ी पहलेके पूर्वजोंका और सात पीढ़ी आगे होनेवाली संतानोंका तथा इनसे भी ऊपरके पितरों और संतानोंका उद्धार कर देता है

Dengan memandang Gaṅgā, menyentuh airnya, dan mandi di dalamnya saja, seseorang menjadi sebab keselamatan bagi garis keturunannya—tujuh generasi leluhur dan tujuh generasi keturunan, bahkan para leluhur dan anak-cucu yang melampaui itu.

Verse 63

श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता । गज्जा कप वंशौ विशेषत:,जो पुरुष ग॑ माहात्म्य सुनता, उनके तटपर जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं

Barangsiapa mendengar kemuliaan Gaṅgā, merindukan tepinya, memandangnya, meminum airnya, menyentuhnya, dan menyelam dalam arusnya—maka Sang Gaṅgā yang mulia menganugerahkan pembebasan secara khusus bagi kedua garisnya: pihak ayah dan pihak ibu.

Verse 64

दर्शनात्‌ स्पर्शनात्‌ पानात्‌ तथा गड़्ेति कीर्तनात्‌ । पुनात्यपुण्यान्‌ पुरुषान शतशो5थ सहस्रश:,गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अपने गंगानामके कीर्तनसे सैकड़ों और हजारों पापियोंको तार देती हैं

Dengan memandangnya, menyentuhnya, meminum airnya, dan juga melantunkan namanya “Gaṅgā”, ia menyucikan manusia-manusia berdosa—ratusan bahkan ribuan.

Verse 65

य इच्छेत्‌ सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च । स पितुृंस्तर्पयेद्‌ गाड्रमभिगम्य सुरांसतथा,जो अपने जन्म, जीवन और वेदाध्ययनको सफल बनाना चाहता हो वह गंगाजीके पास जाकर उनके जलसे देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे

Barangsiapa ingin menjadikan kelahirannya, hidupnya, dan bahkan pelajaran sucinya berbuah, hendaklah ia mendatangi Gaṅgā dan dengan airnya mempersembahkan tarpaṇa kepada para dewa dan para leluhur.

Verse 66

न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम्‌ | प्राप्तुयात्‌ पुरुषो&त्यन्तं गड्जां प्राप्प यदाप्रुयात्‌,मनुष्य गंगास्नान करके जिस अक्षय फलको प्राप्त करता है उसे पुत्रोंसे, धनसे तथा किसी कर्मसे भी नहीं पा सकता

Buah tertinggi yang tak binasa, yang diperoleh seseorang ketika mencapai Gaṅgā dan mandi di sana, tidak dapat diraih sepenuhnya melalui anak, harta, ataupun suatu perbuatan ritual beserta ganjarannya.

Verse 67

जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृत: पड़गुभिरेव च । समर्था ये न पश्यन्ति गड़ां पुण्यजलां शिवाम्‌,जो सामर्थ्य होते हुए भी पवित्र जलवाली कल्याणमयी गंगाका दर्शन नहीं करते वे जन्मके अन्धों, पंगुओं और मुर्दोके समान हैं

Mereka yang mampu namun tidak memandang Gaṅgā yang suci airnya dan membawa keberkahan, di dunia ini sama saja dengan yang buta sejak lahir, yang pincang, bahkan yang mati.

Verse 68

सा,भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम्‌ । देवै: सेन्द्रैश्न को गड़ां नोपसेवेत मानव: भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता महर्षि तथा इन्द्र आदि देवता भी जिनकी उपासना करते हैं, उन गंगाजीका सेवन कौन मनुष्य नहीं करेगा?

Gaṅgā itu dihormati dan didampingi para maharṣi yang mengetahui masa lampau, kini, dan yang akan datang; bahkan para dewa bersama Indra pun memujanya—manusia mana yang tidak akan mendatangi dan meminum air Gaṅgā?

Verse 69

वानप्रस्थैर्गहस्थैश्व यतिभिरन्रह्मचारिभि: । विद्यावद्धि: श्रितां गड़ां पुमान्‌ को नाम नाश्रयेत्‌,ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और विद्वान्‌ पुरुष भी जिनकी शरण लेते हैं, ऐसी गंगाजीका कौन मनुष्य आश्रय नहीं लेगा?

Brahmacārin, grihastha, vānaprastha, para yati (pertapa) serta orang-orang berilmu pun berlindung pada Gaṅgā; manusia mana yang tidak akan mencari naungan Gaṅgā?

Verse 70

उत्क्रामद्िश्व यः प्राण: प्रयत: शिष्टसम्मत: । चिन्तयेन्मनसा गड़ां स गतिं परमां लभेत्‌,जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तथा संयतचित्त मनुष्य प्राण निकलते समय मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करता है, वह परम उत्तम गतिको प्राप्त कर लेता है

Seseorang yang berdisiplin, dihormati oleh orang-orang saleh, bila pada saat napas hendak berangkat ia mengingat Gaṅgā dalam batin, maka ia meraih keadaan tertinggi.

Verse 71

न भयेभ्यो भयं तस्य न पापेभ्यो न राजतः । आ देहपतनाद्‌ गड़ामुपास्ते यः: पुमानिह,जो पुरुष यहाँ जीवनपर्यन्त गंगाजीकी उपासना करता है उसे भयदायक वस्तुओंसे, पापोंसे तथा राजासे भी भय नहीं होता

Orang yang di dunia ini memuja Gaṅgā hingga tubuhnya runtuh (hingga ajal), tidak dikuasai rasa takut—baik terhadap hal-hal yang menakutkan, terhadap dosa, maupun terhadap raja.

Verse 72

महापुण्यां च गगनात्‌ पतन्तीं वै महेश्वर: । दधार शिरसा गड्जां तामेव दिवि सेवते,भगवान्‌ महेश्वरने आकाशसे गिरती हुई परम पवित्र गंगाजीको सिरपर धारण किया, उन्हींका वे स्वर्गमें सेवन करते हैं

Gaṅgā yang amat suci dan penuh jasa kebajikan, ketika jatuh dari langit, ditopang di kepala Bhagavān Maheśvara. Bahkan di surga pun, beliau menghormati dan memuliakan Gaṅgā yang sama itu dengan penuh takzim.

Verse 73

अलंकृतास्त्रयो लोका: पथिभिविंमलैस्त्रिभि: | यस्तु तस्या जल॑ सेवेत्‌ कृतकृत्य: पुमान्‌ भवेत्‌,जिन्होंने तीन निर्मल मार्गोद्रारा आकाश, पाताल तथा भूतल--इन तीन लोकोंको अलंकृत किया है उन गंगाजीके जलका जो मनुष्य सेवन करेगा वह कृतकृत्य हो जायगा

Tiga dunia dihiasi oleh tiga aliran sucinya—di surga, di alam bawah, dan di bumi. Barangsiapa meminum airnya, ia menjadi insan yang telah menuntaskan tujuan hidupnya.

Verse 74

दिवि ज्योतिर्यथा5<दित्य: पितृणां चैव चन्द्रमा: । देवेशश्व॒ तथा नृणां गज्ञा च सरिता तथा,स्वर्गवासी देवताओंमें जैसे सूर्यका तेज श्रेष्ठ है, जैसे पितरोंमें चन्द्रमा तथा मनुष्योंमें राजाधिराज श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त सरिताओं में गंगाजी उत्तम हैं

Sebagaimana di surga sinar Matahari paling utama; sebagaimana di antara para Pitṛ Bulan yang terdepan; dan sebagaimana di antara manusia raja maharaja yang tertinggi—demikian pula di antara segala sungai, Gaṅgā adalah yang terbaik.

Verse 75

मात्रा पित्रा सुतैदरिर्विमुक्तस्य धनेन वा । न भवेद्धि तथा दुःख यथा गड़ावियोगजम्‌,(गंगाजीमें भक्ति रखनेवाले पुरुषको) माता, पिता, पुत्र, स्‍त्री और धनका वियोग होनेपर भी उतना दुःख नहीं होता, जितना गंगाके बिछोहसे होता है

Bagi seorang yang berbhakti kepada Gaṅgā, perpisahan dari ibu, ayah, putra-putra, istri, atau harta tidak menimbulkan duka sebesar duka yang lahir dari berpisah dengan Gaṅgā.

Verse 76

नारपण्यैनेष्टविषयैर्न सुतैर्न धनागमै: । तथा प्रसादो भवति गज्जां वीक्ष्य यथा भवेत्‌,इसी प्रकार उसे गंगाजीके दर्शनसे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी वनके दर्शनोंसे, अभीष्ट विषयसे, पुत्रोंसे तथा धनकी प्राप्तिसे भी नहीं होती

Bukan melalui tawar-menawar dengan manusia, bukan pula melalui kenikmatan objek-objek yang diinginkan, bukan karena putra, dan bukan karena datangnya kekayaan—ketenangan bening yang demikian tidak muncul. Ketenangan itu muncul ketika memandang Gaṅgā.

Verse 77

पूर्णमिन्दु यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टि: प्रसीदति । तथा त्रिपथगां दृष्टवा नृणां दृष्टि: प्रसीदति,जैसे पूर्ण चन्द्रमाका दर्शन करके मनुष्योंकी दृष्टि प्रसन्न हो जाती है, उसी तरह त्रिपथगा गंगाका दर्शन करके मनुष्योंके नेत्र आनन्दसे खिल उठते हैं

Sebagaimana pandangan dan batin manusia menjadi tenteram saat memandang bulan purnama, demikian pula penglihatan menjadi gembira dan tersucikan ketika melihat Tripathagā—Gaṅgā—yang kehadirannya membawa keteduhan dan keberkahan.

Verse 78

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायण: । गड्जां योडनुगतो भकक्‍्त्या स तस्या: प्रियतां व्रजेत्‌,जो गंगाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह-भाजन होता है

Barangsiapa berjiwa selaras dengannya, memusatkan batin padanya, teguh bersandar padanya, menjadikannya tumpuan tertinggi, dan mengikuti Gaṅgā dengan bhakti—ia akan menjadi kekasih dan kesayangan sang Bhagavatī Bhāgīrathī.

Verse 79

भूस्थै: स्वःस्थैर्दिविष्ठै क्ष भूतिरुच्चावचैरपि । गड्जा विगाह्मया सततमेतत्‌ कार्यतमं सताम्‌,पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गमें रहनेवाले छोटे-बड़े सभी प्राणियोंको चाहिये कि वे निरन्तर गंगाजीमें स्नान करें। यही सत्पुरुषोंका सबसे उत्तम कार्य है

Makhluk yang tinggal di bumi, yang berada di langit, dan yang menetap di alam surgawi—tinggi maupun rendah—hendaknya senantiasa berendam di Gaṅgā. Inilah, kata para siddha, laku paling utama bagi orang saleh.

Verse 80

विश्वलोकेषु पुण्यत्वाद्‌ गड़ाया: प्रथितं यश: । यत्पुत्रान्सगरस्येतो भस्माख्याननयद्‌ दिवम्‌,सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र होनेके कारण गंगाजीका यश विख्यात है; क्योंकि उन्होंने भस्मीभूत होकर पड़े हुए सगरपुत्रोंको यहाँसे स्वर्गमें पहुँचा दिया

Di segenap dunia, kemasyhuran Gaṅgā termasyhur karena kesuciannya yang tertinggi; sebab dialah yang mengantarkan putra-putra Sagara—yang terbaring menjadi abu—dari alam ini menuju surga.

Verse 81

वाय्वीरिताभि: सुमनोहराभि- द्रुताभिरत्यर्थसमुत्थिताभि: । गड़ोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धा: सहस्नरश्मिप्रतिमा भवन्ति,वायुसे प्रेरित हो बड़े वेगसे अत्यन्त ऊँचे उठनेवाली गंगाजीकी परम मनोहर एवं कान्तिमयी तरंगमालाओंसे नहाकर प्रकाशित होनेवाले पुरुष परलोकमें सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं

Mereka yang dibasuh dan diterangi oleh gelombang-gelombang Gaṅgā yang amat menawan, bercahaya, dan melambung tinggi dengan cepat—didorong oleh angin—akan menjadi gemilang di alam baka laksana matahari bersinar seribu sinar.

Verse 82

पयस्विनीं घृतिनीमत्युदारां समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्माम्‌ । गड्डां गत्वा यै: शरीर विसूष्टं गता धीरास्ते विबुधै: समत्वम्‌,दुग्धके समान उज्ज्वल और घृतके समान स्निग्ध जलसे भरी हुई, परम उदार, समृद्धिशालिनी, वेगवती तथा अगाध जलराशिवाली गंगाजीके समीप जाकर जिन्होंने अपना शरीर त्याग दिया है वे धीर पुरुष देवताओंके समान हो गये

Sang Siddha: Mereka yang berhati teguh mendatangi Gaṅgā—airnya bening laksana susu, alirannya lembut laksana ghee, amat dermawan, penganugerahi kemakmuran, deras, dan sukar diseberangi—lalu di sana melepaskan jasadnya, mencapai kesetaraan dengan para dewa.

Verse 83

अन्धान्‌ जडान द्रव्यहीनांश्व गड़ा यशस्विनी बृहती विश्वरूपा । देवै: सेन्द्रैमुनिभिमाननवैश्व निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति,इन्द्र आदि देवता, मुनि और मनुष्य जिनका सदा सेवन करते हैं वे यशस्विनी, विशालकलेवरा, विश्वरूपा गंगादेवी अपनी शरणमें आये हुए अन्धों, जडों और धनहीनोंको भी सम्पूर्ण मनोवाज्छित कामनाओंसे सम्पन्न कर देती हैं

Sang Siddha: Dewi-sungai Gaṅgā—mulia termasyhur, agung wujudnya, dan beraneka rupa—yang senantiasa didatangi para dewa beserta Indra, para resi, dan manusia, juga menganugerahkan segala yang diinginkan kepada siapa pun yang berlindung padanya, sekalipun ia buta, dungu, atau miskin harta.

Verse 84

ऊर्जावतीं महापुण्यां मधुमतीं त्रिवर्त्मगाम्‌ । त्रिलोकगोफ्तीं ये गड्डां संश्रितास्‍्ते दिवं गता:,गंगाजी ओजस्विनी, परम पुण्यमयी, मधुर जलराशिसे परिपूर्ण तथा भूतल, आकाश और पाताल--इन तीन मार्गोपर विचरनेवाली हैं। जो लोग तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली गंगाजीकी शरणमें आये हैं, वे स्वर्गलोकको चले गये

Sang Siddha: Gaṅgā penuh daya rohani, amat berpahala, manis airnya; ia mengalir melalui tiga jalur—bumi, langit, dan alam bawah—seraya melindungi tiga dunia. Mereka yang berlindung pada Gaṅgā mencapai surga.

Verse 85

यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य- स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवा: । तद्धभाविता: स्पर्शनदर्शनेन इष्टां गतिं तस्य सुरा दिशन्ति,जो मनुष्य गंगाजीके तटपर निवास और उनका दर्शन करता है उसे सब देवता सुख देते हैं। जो गंगाजीके स्पर्श और दर्शनसे पवित्र हो गये हैं उन्हें गंगाजीसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए देवता मनोवाञ्छित गति प्रदान करते हैं

Setiap insan yang tinggal di tepi Gaṅgā, atau sekadar memandangnya, dianugerahi kebahagiaan oleh para dewa. Mereka yang disucikan dan dibentuk batinnya oleh sentuhan serta pandangannya, dituntun oleh para dewa—yang sendiri meraih kemuliaan melalui Gaṅgā—menuju tujuan yang diidamkan dan mujur.

Verse 86

दक्षां पृश्चिं बृहतीं विप्रकृष्टां शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम्‌ । विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां गड़्ां गता ये त्रिदिवं गतास्ते,गंगा जगत्‌का उद्धार करनेमें समर्थ हैं। भगवान्‌ पृश्चिगर्भकी जननी 'पृश्रि” के तुल्य हैं, विशाल हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, मंगलकारिणी हैं, पुण्यराशिसे समृद्ध हैं, शिवजीके द्वारा मस्तकपर धारित होनेके कारण सौभाग्यशालिनी तथा भक्तोंपर अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली हैं। इतना ही नहीं, पापोंका विनाश करनेके लिये वे कालरात्रिके समान हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी आश्रयभूत हैं। जो लोग गंगाजीकी शरणमें गये हैं वे स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं

Sang Siddha: Gaṅgā adalah putri Dakṣa, saudari Pṛśni—agung, luhur, membawa berkah, kaya kebajikan, dan amat berkenan kepada para bhakta. Ia berbahagia karena Śiva menatangnya di kepala. Dalam memusnahkan dosa ia laksana malam pralaya, dan menjadi sandaran serta tumpuan bagi semua makhluk. Mereka yang berlindung pada Gaṅgā mencapai alam surgawi.

Verse 87

ख्यातिर्यस्या: खं दिवं गां च नित्यं पुरा दिशो विदिशश्चवावतस्थे । तस्या जल सेव्य सरिद्वराया मर्त्या: सर्वे कृतकृत्या भवन्ति,आकाश, स्वर्ग, पृथ्वी, दिशा और विदिशाओंमें भी जिनकी ख्याति फैली हुई है, सरिताओंमें श्रेष्ठ उन भगवती भागीरथीके जलका सेवन करके सभी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं

Kemasyhurannya sejak dahulu menembus langit, surga, dan bumi, dan senantiasa tegak di segala arah serta subarah. Dengan meminum air sungai yang paling utama itu—Bhagavatī Bhāgīrathī—semua insan fana menjadi tuntas, seakan telah menyelesaikan kewajiban yang sejati.

Verse 88

इयं गज्नेति नियतं प्रतिष्ठा गुहस्य रुक्मस्य च गर्भयोषा । प्रातस्त्रिवर्गा घृतवहा विपाष्मा गड़ावतीर्णा वियतो विश्वतोया,'ये गंगाजी हैं--ऐसा कहकर जो दूसरे मनुष्योंको उनका दर्शन कराता है, उसके लिये भगवती भागीरथी सुनिश्चित प्रतिष्ठा (अक्षय पद प्रदान करनेवाली) हैं। वे कार्तिकेय और सुवर्णको अपने गर्भमें धारण करनेवाली, पवित्र जलकी धारा बहानेवाली और पाप दूर करनेवाली हैं। वे आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हुई हैं। उनका जल सम्पूर्ण विश्वके लिये पीने योग्य है। उनमें प्रातः:काल स्नान करनेसे धर्म, अर्थ और काम तीनों वर्गोंकी सिद्धि होती है

Dengan keyakinan berkata, “Inilah Gaṅgā,” dan menuntun orang lain untuk memandangnya, seseorang memperoleh sandaran yang pasti dan tak gugur dari Bhāgīrathī yang mulia. Dialah sungai suci yang mengandung Guha (Skanda/Kārttikeya) dan juga emas; ia mengalirkan arus murni yang menyehatkan laksana lelehan ghee dan melenyapkan dosa. Turun dari langit ke bumi, airnya layak diminum oleh seluruh dunia. Mandi padanya saat fajar menganugerahkan keberhasilan atas tiga tujuan hidup: dharma, artha, dan kāma.

Verse 89

(नारायणादक्षयात्‌ पूर्वजाता विष्णो: पादात्‌ शिशुमाराद्‌ ध्रुवाच्च । सोमात्‌ सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णो: समागता शिवमूर्थ्नो हिमाद्रिम्‌ ।।) भगवती गंगा पूर्वकालमें अविनाशी भगवान्‌ नारायणसे प्रकट हुई हैं। वे भगवान्‌ विष्णुके चरण, शिशुमार चक्र, ध्रुव, सोम, सूर्य तथा मेरुरूप विष्णुसे अवतरित हो भगवान्‌ शिवके मस्तकपर आयी हैं और वहाँसे हिमालय पर्वतपर गिरी हैं ।। सुतावनी ध्रस्य हरस्य भार्या दिवो भुवश्चापि कृतानुरूपा । भव्या पृथिव्यां भागिनी चापि राजन्‌ गड्जा लोकानां पुण्यदा वै त्रयाणाम्‌,गंगाजी गिरिराज हिमालयकी पुत्री, भगवान्‌ शंकरकी पत्नी तथा स्वर्ग और पृथ्वीकी शोभा हैं। राजन! वे भूमण्डलपर निवास करनेवाले प्राणियोंका कल्याण करनेवाली, परम सौभाग्यवती तथा तीनों लोकोंको पुण्य प्रदान करनेवाली हैं

Sang Siddha berkata: Pada zaman purba, Gaṅgā yang mulia muncul dari Nārāyaṇa yang tak binasa. Turun dari kaki Viṣṇu—melewati lingkup Śiśumāra, Dhruva, Soma, Sūrya, dan wujud Viṣṇu sebagai Meru—ia sampai dan bersemayam di kepala Śiva; dari sana ia jatuh ke Himālaya. Ia putri raja gunung, Himālaya; permaisuri Hara (Śiva); perhiasan yang serasi bagi surga dan bumi. Wahai raja, di bumi ia membawa keberkahan bagi makhluk hidup, penuh tuah, dan menganugerahkan jasa kebajikan bagi ketiga dunia.

Verse 90

मधुस्रवा घृतधारा घृतार्चि- महोर्मिभि: शोभिता ब्राह्मणैश्न । दिवश्ष्युता शिरसा55प्ता शिवेन गज्भावनीधात्‌ त्रिदिवस्य माता,श्रीभागीरथी मधुका स्रोत एवं पवित्र जलकी धारा बहाती हैं। जलती हुई घीकी ज्वालाके समान उनका उज्ज्वल प्रकाश है। वे अपनी उत्ताल तरड़ों तथा जलमें स्नान- संध्या करनेवाले ब्राह्मणोंसे सुशोभित होती हैं। वे जब स्वर्गसे नीचेकी ओर चलीं तब भगवान्‌ शिवने उन्हें अपने सिरपर धारण किया। फिर हिमालय पर्वतपर आकर वहाँसे वे इस पृथ्वीपर उतरी हैं। श्रीगंगाजी स्वर्गलोककी जननी हैं

Sang Siddha berkata: “Śrī Bhāgīrathī mengalir dengan kemanisan, menumpahkan arus bak lelehan ghee, dan berkilau laksana nyala api ghee. Ia tampak kian agung oleh gelombang-gelombangnya yang besar dan oleh para brāhmaṇa yang mandi di dalamnya serta menunaikan sandhyā. Ketika ia turun dari surga, Śiva menerimanya dan menahannya di atas kepala; lalu, setelah mencapai Himālaya, ia turun ke bumi. Maka Gaṅgā, sang Bhāgīrathī, dipuji sebagai ibu alam surgawi.”

Verse 91

योनिर्वरिष्ठा विरजा वितन्वी शय्याचिरा वारिवहा यशोदा । विश्वावती चाकृतिरिष्टसिद्धा गज़ोक्षितानां भुवनस्य पन्था:

Sang Siddha berkata: “Ia adalah sumber dan rahim makhluk yang paling utama—tanpa noda, meresap ke segala penjuru, dan terbentang luas; tempat bernaung sejak purba; pembawa air; pemberi kemasyhuran dan pemeliharaan. Ia menopang seluruh semesta; wujudnya sendiri adalah terpenuhinya yang diidamkan dan terselesaikannya yang patut diselesaikan. Dialah jalan dan sandaran dunia, yang menegakkan bahkan yang perkasa dan yang kekal.”

Verse 92

सबका कारण, सबसे श्रेष्ठ, रजोगुणरहित, अत्यन्त सूक्ष्म, मरे हुए प्राणियोंके लिये सुखद शगय्या, तीव्र वेगसे बहनेवाली, पवित्र जलका स्रोत बहानेवाली, यश देनेवाली, जगत्‌की रक्षा करनेवाली, सत्स्वरूपा तथा अभीष्टको सिद्ध करनेवाली भगवती गंगा अपने भीतर स्नान करनेवालोंके लिये स्वर्गका मार्ग बन जाती हैं ।। क्षान्त्या मह्मा गोपने धारणे च दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव । तुल्या गड्जा सम्मता ब्राह्मणानां गुहस्य ब्रह्म॒ण्यतया च नित्यम्‌,क्षमा, रक्षा तथा धारण करनेमें पृथ्वीके समान और तेजमें अग्नि एवं सूर्यके समान शोभा पानेवाली गंगाजी ब्राह्मणजातिपर सदा अनुग्रह करनेके कारण सुब्रह्मण्य कार्तिकेय तथा ब्राह्मणोंके लिये भी प्रिय एवं सम्मानित हैं

Sang Siddha: Dewi Gaṅgā adalah sebab semesta dan yang tertinggi di antara para penyuci—bebas dari gejolak rajas, amat halus, menjadi ranjang penghibur bahkan bagi makhluk yang telah wafat. Arusnya deras, mengalirkan sumber air suci, menganugerahkan kemasyhuran, melindungi dunia, berwujud kebenaran, dan memenuhi tujuan yang diidamkan. Bagi mereka yang mandi di dalamnya, ia menjadi jalan menuju surga. Dalam kesabaran ia laksana bumi; dalam menjaga dan menopang pun laksana bumi; dan dalam cahaya ia laksana api dan matahari. Ia senantiasa dihormati para Brāhmaṇa; dan juga dicintai serta dimuliakan oleh Guha (Kārttikeya), sebab ia terus-menerus menganugerahi brahmaṇya—bhakti kepada Brahman dan perlindungan tatanan suci (dharma).

Verse 93

भ्रातृभि: सहितश्चक्रे यथावदनुपूर्वश: । ये सभी महात्मा महर्षि जब भीष्मजीको देखनेके लिये वहाँ पधारे, तब भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने उनकी क्रमश: विधिवत्‌ पूजा की,ऋषिष्टतां विष्णुपदीं पुराणां सुपुण्यतोयां मनसापि लोके । सर्वात्मना जाह्ववीं ये प्रपन्ना- स्ते ब्रह्मण: सदनं सम्प्रयाता: ऋषियोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, जो भगवान्‌ विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अत्यन्त प्राचीन तथा परम पावन जलसे भरी हुई हैं, उन गंगाजीकी जगत्‌में जो लोग मनके द्वारा भी सब प्रकारसे शरण लेते हैं वे देहत्यागके पश्चात्‌ ब्रह्मलोकमें जाते हैं

Vaiśampāyana berkata: Bersama saudara-saudaranya, Raja Yudhiṣṭhira melaksanakan, dengan tertib dan sesuai tata upacara, penghormatan serta pemujaan yang semestinya kepada para mahārṣi berhati agung yang datang untuk menjenguk Bhīṣma. Adapun Jāhnavī (Gaṅgā)—yang dipuji para resi, lahir dari telapak kaki Viṣṇu, purba, dan penuh air yang amat menyucikan—mereka yang, bahkan dalam batin, berlindung kepadanya dengan segenap diri, setelah meninggalkan raga akan mencapai kediaman Brahmā (Brahmaloka).

Verse 94

लोकानवेक्ष्य जननीव पुत्रान्‌ सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्नान्‌ । तत्स्थनकं ब्राह्ममभीप्समानै- गज़ा सदैवात्मवशैरुपास्या,जैसे माता अपने पुत्रोंको स्नेहभरी दृष्टिसे देखती है और उनकी रक्षा करती है, उसी प्रकार गंगाजी सर्वात्मभावसे अपने आश्रयमें आये हुए सर्वगुणसम्पन्न लोकोंको कृपादृष्टिसे देखकर उनकी रक्षा करती हैं; अतः जो ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं उन्हें अपने मनको वशमें करके सदा मातृभावसे गंगाजीकी उपासना करनी चाहिये

Sebagaimana seorang ibu memandang putra-putranya dengan kasih dan melindungi mereka, demikian pula Dewi Gaṅgā, dengan segenap dirinya, menatap dunia-dunia yang berlindung padanya—yang berhiaskan segala keutamaan—dengan pandangan welas asih dan memberi perlindungan. Karena itu, mereka yang merindukan Brahmaloka hendaknya menaklukkan diri, menguasai batin, dan senantiasa berupāsanā kepada Gaṅgā dengan rasa bakti seorang anak kepada ibu.

Verse 95

उस्रां पुष्टां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम्‌ | शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्म॒कान्तां गड्जां श्रयेदात्मवान्‌ सिद्धिकाम:,जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्‌के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गंगाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये

Sang Siddha berkata: Seorang yang menaklukkan diri dan mendambakan siddhi hendaknya berlindung pada Dewi Gaṅgā—ia yang menyehatkan laksana sapi pemberi susu amṛta, senantiasa waspada memandang segala, berguna bagi seluruh dunia, pemberi pangan, dan penopang gunung-gunung; tempat berlindung para mulia, yang bahkan Brahmā pun merindukan untuk mencapainya, dan yang bersifat keabadian (amṛta).

Verse 96

प्रसाद्य देवान्‌ सविभून्‌ समस्तान्‌ भगीरथस्तपसोग्रेण गड्भाम्‌ । गामानयत्‌ तामभिगम्य शश्चत्‌ पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात्‌,राजा भगीरथ अपनी उग्र तपस्यासे भगवान्‌ शंकरसहित सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करके गंगाजीको इस पृथ्वीपर ले आये। उनकी शरणमें जानेसे मनुष्यको इहलोक और परलोकमें भय नहीं रहता

Dengan tapa yang amat keras, Raja Bhagīratha menyenangkan semua dewa beserta Mahādeva (Śiva) dan menurunkan Gaṅgā ke bumi ini. Barangsiapa mendekat kepadanya untuk berlindung, senantiasa terbebas dari rasa takut—baik di dunia ini maupun di dunia seberang.

Verse 97

उदाह्नत: सर्वथा ते गुणानां मयैकदेश: प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं गुणान्‌ सर्वान्‌ परिमातुं तथैव,ब्रह्मन्‌! मैंने अपनी बुद्धिसे सर्वथा विचारकर यहाँ गंगाजीके गुणोंका एक अंशमात्र बताया है। मुझमें कोई इतनी शक्ति नहीं है कि मैं यहाँ उनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सकूँ

Wahai Brahmana, setelah menimbang dengan buddhi-ku, di sini telah kukatakan hanya sebagian kecil dari sifat-sifatnya, sebisaku. Tiada kuasa padaku di dunia ini untuk menguraikan—atau mengukur sepenuhnya—seluruh kebajikannya.

Verse 98

मेरो: समुद्रस्य च सर्वयत्नै: संख्योपलानामुदकस्य वापि | शक्यं वक्तुं नेह गड़ाजलानां गुणाख्यानं परिमातुं तथैव,कदाचित्‌ सब प्रकारके यत्न करनेसे मेरु गिरिके प्रस्तरकणों और समुद्रके जलविन्दुओंकी गणना की जा सके; परंतु यहाँ गंगाजलके गुणोंका वर्णन तथा गणना करना कदापि सम्भव नहीं है

Sang Siddha berkata: Sekalipun dikerahkan segala upaya, mungkin saja orang dapat menyebut jumlah kerikil di Gunung Meru dan bahkan menghitung tetes air samudra; namun di sini, mengisahkan dan mengukur kebajikan air Gaṅgā tidaklah pernah sungguh mungkin.

Verse 99

तस्मादेतान्‌ परया श्रद्धयोक्तान्‌ गुणान्‌ सर्वान्‌ जाह्नवीयात्‌ सदैव । भवेद्‌ वाचा मनसा कर्मणा च भक्‍्त्या युक्त: श्रद्धया श्रद्दधान:,अतः मैंने बड़ी श्रद्धाके साथ जो ये गंगाजीके गुण बताये हैं, उन सबपर विश्वास करके मन, वाणी, क्रिया, भक्ति और श्रद्धाके साथ आप सदा ही उनकी आराधना करें

Karena itu, dengan iman penuh pada segala kebajikan Jāhnavī (Gaṅgā) yang telah kuucapkan dengan bhakti tertinggi, hendaklah engkau memujanya senantiasa—tertata dalam ucapan, pikiran, dan perbuatan, serta teguh dalam bhakti dan śraddhā.

Verse 100

लोकानिमांस्त्रीन्‌ू यशसा वितत्य सिद्धि प्राप्प महतीं तां दुरापाम्‌ । गड्जाकृतानचिरेणैव लोकान्‌ यथ्थेष्टमिष्टान्‌ विहरिष्यसि त्वम्‌,इससे आप परम दुर्लभ उत्तम सिद्धि प्राप्त करके इन तीनों लोकोंमें अपने यशका विस्तार करते हुए शीघ्र ही गंगाजीकी सेवासे प्राप्त हुए अभीष्ट लोकोंमें इच्छानुसार विचरेंगे

Dengan demikian engkau akan meraih siddhi agung yang amat sukar diperoleh, seraya menyebarkan kemasyhuranmu di tiga dunia. Dan tak lama lagi, oleh pahala yang lahir dari pelayanan kepada Gaṅgā, engkau akan mencapai dunia-dunia yang diinginkan itu dan bergerak di dalamnya menurut kehendakmu.

Verse 101

तव मम च गुणैर्महानुभावा जुषतु मतिं सतत स्वधर्मयुक्तै: । अभिमतजनवत्सला हि गड्जा जगति युनक्ति सुखैश्ष भक्तिमन्तम्‌,महान्‌ प्रभावशाली भगवती भागीरथी आपकी और मेरी बुद्धिको सदा स्वधर्मानुकूल गुणोंसे युक्त करें। श्रीगंगाजी बड़ी भक्तवत्सला हैं। वे संसारमें अपने भक्तोंको सुखी बनाती हैं

Semoga Dewi Bhāgīrathī (Gaṅgā) yang agung, melalui kebajikan yang selaras dengan svadharma, senantiasa memurnikan dan meneguhkan pengertianmu dan pengertianku. Sebab Gaṅgā penuh kasih kepada para bhakta yang dicintainya; di dunia ini ia menganugerahi kebahagiaan kepada mereka yang berbhakti.

Verse 102

भीष्म उवाच इति परममतिर्गुणानशेषान्‌ शिलरतसये त्रिपथानुयोगरूपान्‌ । बहुविधमनुशास्य तथ्यरूपान्‌ गगनततलं द्युतिमान्‌ विवेश सिद्ध:,भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठि!र! वह उत्तम बुद्धिवाला परम तेजस्वी सिद्ध शिलोख्छतृत्तिद्वारा जीविका चलानेवाले उस ब्राह्मणसे त्रिपथगा गंगाजीके उपर्युक्त सभी यथार्थ गुणोंका नाना प्रकारसे वर्णन करके आकाशगमें प्रविष्ट हो गया

Bhishma bersabda—Wahai Yudhisthira! Demikianlah sang siddha yang mahacerdas dan bercahaya, setelah menasihati brahmana yang hidup dengan śilavṛtti itu dengan berbagai cara serta menguraikan sepenuhnya sifat-sifat sejati dan beraneka dari Tripathagā, Dewi Gangga, kemudian memasuki hamparan langit.

Verse 103

शिलवृत्तिस्तु सिद्धस्य वाक्यै: सम्बोधितस्तदा | गड़ामुपास्य विधिवत्‌ सिद्धि प्राप सुदुर्लभाम्‌,वह शिलोज्छतवृत्तिवाला ब्राह्मण सिद्धके उपदेशसे गंगाजीके माहात्म्यको जानकर उनकी विधिवत्‌ उपासना करके परम दुर्लभ सिद्धिको प्राप्त हुआ

Lalu brahmana yang hidup dengan śilavṛtti itu, setelah diteguhkan oleh sabda sang siddha, memuja Gangga sesuai tata cara, dan meraih siddhi yang amat sukar diperoleh.

Verse 104

तथा त्वमपि कौन्तेय भक्‍्त्या परमया युत: । गड्भामभ्येहि सतत प्राप्स्यसे सिद्धिमुत्तमाम्‌,कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार तुम भी पराभक्तिके साथ सदा गंगाजीकी उपासना करो। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी

Wahai putra Kunti, demikian pula engkau—dengan bhakti tertinggi—senantiasa mendekat dan memuja Gangga; dengan itu engkau akan memperoleh siddhi yang utama.

Verse 105

वैशम्पायन उवाच श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गज़ाया: स्तवसंयुतम्‌ । युधिष्ठिर: परां प्रीतिमगच्छद्‌ भ्रातृभि: सह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा कहे हुए श्रीगंगाजीकी स्तुतिसे युक्त इस इतिहासको सुनकर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई

Vaiśampāyana berkata—Wahai Janamejaya! Setelah mendengar kisah suci yang diucapkan Bhishma ini, yang disertai pujian kepada Dewi Gangga, Raja Yudhisthira bersama saudara-saudaranya dipenuhi sukacita yang agung.

Verse 106

भीष्मश्रिता: सुमधुरा: सर्वेन्द्रियमनोहरा: । पूजनके पश्चात्‌ वे महर्षि सुखपूर्वक बैठकर भीष्मजीसे सम्बन्ध रखनेवाली मधुर एवं मनोहर कथाएँ कहने लगे। उनकी वे कथाएँ सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनको मोह लेती थीं,इतिहासमिमं पुण्यं शृूणुयाद्‌ यः पठेत वा । गड़्जाया: स्तवसंयुक्त स मुच्येत्‌ सर्वकिल्बिषै: जो गड़्ाजीके स्तवनसे युक्त इस पवित्र इतिहासका श्रवण अथवा पाठ करेगा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा

Kisah-kisah yang bersangkut dengan Bhishma itu amat manis dan memikat seluruh indra serta batin. Siapa pun yang mendengarkan atau melantunkan sejarah suci ini—yang disertai pujian kepada Dewi Gangga—akan terbebas dari segala noda dosa.

Verse 113

मेने दिविष्ठमात्मानं तुष्टया परमया युत:ः । शुद्ध अन्तःकरणवाले उन ऋषि-मुनियोंकी बातें सुनकर भीष्मजी बहुत संतुष्ट हुए और अपनेको स्वर्गमें ही स्थित मानने लगे

Vaiśampāyana berkata: Dengan kepuasan tertinggi, Bhīṣma memandang dirinya seakan telah bersemayam di surga. Mendengar ujaran para resi yang berhati suci, ia pun menjadi amat puas dan tenteram.

Verse 123

अन्तर्धानं गता: सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम्‌ । तदनन्तर वे महर्षिगण भीष्मजी और पाण्डवोंकी अनुमति लेकर सबके देखते-देखते ही वहाँसे अदृश्य हो गये

Vaiśampāyana berkata: Di hadapan pandangan semua orang, mereka semua lenyap dari penglihatan. Sesudah itu, para maharsi—setelah memohon izin Bhīṣma dan para Pāṇḍava—menghilang di tempat itu juga, tepat di depan mata semua yang hadir.

Verse 143

उपतस्थुर्यथोद्यन्तमादित्यं मन्त्रकोविदा: । जैसे वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण उगते हुए सूर्यका उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार प्रसन्न चित्त हुए समस्त पाण्डव कुरुश्रेष्ठ गड़ानन्दन भीष्मको प्रणाम करने लगे

Vaiśampāyana berkata: Seperti para brāhmaṇa yang mahir mantra menghaturkan penghormatan kepada matahari yang terbit, demikian pula para Pāṇḍava yang bening hatinya bersujud hormat kepada Bhīṣma, yang utama di antara kaum Kuru, putra Gaṅgā.

Verse 153

प्रकाशन्तो दिश: सर्वा विस्मयं परम ययु: । उन ऋषियोंकी तपस्याके प्रभावसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित होती देख पाण्डवोंको बड़ा विस्मय हुआ

Vaiśampāyana berkata: Segala penjuru memancarkan cahaya, dan para Pāṇḍava diliputi keheranan yang paling dalam. Melihat seluruh arah bersinar oleh daya tapa para resi itu, mereka pun takjub.

Frequently Asked Questions

The tension lies between intense austerity aimed at acquiring a supreme social-spiritual status and the claim that such status cannot be secured merely by desire or forceful striving when ethical qualification and inner discipline are lacking.

Śakra advises redirecting effort away from hazardous over-aspiration and toward conquering internal adversaries—anger, desire, aversion, pride, and contentiousness—since these determine elevation or decline more reliably than status-seeking tapas.

Rather than a formal phalāśruti, it provides an evaluative closure: brāhmaṇya is declared “sudur-labha” (exceedingly rare), and the outcome is framed conditionally—victory over inner enemies yields a good end; defeat by them results in a fall.