Varaha Purana - Adhyaya 99
Varaha PuranaAdhyaya 99100 Shlokas

Adhyaya 99: The Greatness and Rite of the Sesame-Cow (Tiladhenu) Gift

Tiladhenumāhātmya

Ritual-Manual (Dāna and Dīkṣā) with Embedded Ethical-Discourse (Food-giving and Social Welfare)

In dialogue with Pṛthivī, Varāha frames a salvific ritual program that removes major sins and restores prosperity, presenting a structured Vaiṣṇava observance centered on seeing and worshipping Nārāyaṇa in a maṇḍala, especially in Kārttika on Śukla Dvādaśī and at saṅkrānti and eclipses. The chapter outlines guru–śiṣya testing over a year, initiation preliminaries, maṇḍala construction, installation and worship of dikpālas and Vyūha-deities (Vāsudeva, Saṅkarṣaṇa/Bala, Pradyumna, Aniruddha), mantra-homa, and graded ritual bathing with nine kumbhas for specific aims (śānti, pāpanāśa, jñāna, wealth). An exemplum narrates King Śveta’s post-mortem hunger due to neglecting anna-dāna, leading to instruction on crafting and donating a tiladhenu. The pedagogical arc links ritual merit with social ethics—food and resource distribution as sustaining terrestrial order and human well-being on Earth.

Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

tiladhenu-dāna (sesame-cow gift) as expiatory and prosperity ritedīkṣā and guru–śiṣya protocol (parīkṣa, samaya, guru-dakṣiṇā)Kārttika-śukla-dvādaśī Vaiṣṇava observance and darśanamaṇḍala, cakra (ṣoḍaśāra / sarvatobhadra / aṣṭapatra) and dikpāla-pūjānavakumbha-snāna (nine-jar ablution) with goal-specific phalasanna-dāna as superior gift and social-ecological sustenanceitihāsa exemplum: Śveta and Vinītāśva as didactic kingship ethics
Recitation with translationVaraha Purana Adhyaya 99

Shlokas in Adhyaya 99

Verse 1

अथ तिलधेनुमाहात्म्यम् ॥ धरन्युवाच ॥ या सा माया शरीरात्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ गायत्र्यष्टभुजा भूत्वा चैव त्रासुरमयोदधयत्

अब तिलधेनु की बात आती है। धरती ने बताया कि ब्रह्मा की माया उस शरीर से निकली। वो गायत्री बन गई, आठ हाथ थे उसके। उसने असुर त्रासुर से लड़ाई की।

Verse 2

सैव नन्दा भवेद्देवी देवकार्यचिकीर्षया ॥ महिषाख्यासुरवधं कुर्वती ब्रह्मणेरिता

वो माया देवी नंदा बनी। देवताओं का काम करने के लिए। ब्रह्मा ने कहा, तो उसने महिषासुर नाम के असुर को मारा।

Verse 3

वैष्णव्याख्या ततो देव कथमेतद्धि शंस मे ॥ श्रीवराह उवाच ॥ द्वयं जगद्धिता देवी गङ्गा शङ्कर सुप्रिया ॥

देवी ने कहा, भगवान, वैष्णवी की कथा समझाओ। वराह भगवान बोले, दुनिया के लिए दो चीज़ें बहुत ज़रूरी हैं। गंगा और शंकर की प्रिय देवी।

Verse 4

क्वचित्किंचिद्भवेद्दत्तं स्वपदं वेद सर्ववित् ॥ स्वायम्भुवे हतो दैत्यो वैष्णव्या मन्दरे गिरौ ॥

कभी-कभी कुछ मिल भी जाता है, भगवान जानते हैं क्या देना है। स्वयंभुव कल में एक दैत्य मरा गया। वैष्णवी ने उसे मंदर पर्वत पे मारा।

Verse 5

महिषाख्यः परः पश्चात्स वै चैत्रासुरो हतः ॥ नन्दया निहतो विन्ध्ये महाबलपराक्रमः ॥

बाद में महिष नाम का एक और दैत्य मरा गया। चैत्रासुर भी वही था। नंदा ने उसे विंध्य में मारा। वो बहुत ताकतवाला था।

Verse 6

अथवा ज्ञानशक्तिः सा महिषोऽज्ञानमूर्त्तिमान् ॥ अज्ञानं ज्ञानसाध्यं तु भवतीति न संशयः ॥

या फिर ऐसे भी समझो, वो ज्ञान की शक्ति है। महिष मतलब भैंस, वो अंधा विश्वास की शकल है। ज्ञान से ही अंधा विश्वास दूर होता है, इसमें कोई शक नहीं।

Verse 7

मूर्त्तिपक्षे चेतिहासममूर्ते चैवगद्धृदि ॥ ख्याप्यते वेदवाक्यैश्च इह सा वेदवादिभिः ॥

जब शकल की बात हो तो ये कहानी है। जब शकल न हो तो ये दिल में रहता है। वेद पढ़ने वाले लोग वेद की बातों से ये बताते हैं।

Verse 8

इदानीं शृणु मे देवि पञ्चपातकनाशनम् ॥ यजनं देवदेवस्य विष्णोः पुत्रवसुप्रदम् ॥

देवी, अब सुनो। मैं तुम्हे बता रहा हूँ जो चीज़ पाँच बड़े पाप खत्म करती है। यह विष्णु भगवान की पूजा है। यह पूजा करने से बेटे और दौलत दोनों मिलते हैं।

Verse 9

इह जन्मनि दारिद्र्यव्याधिकुष्ठादिपीडितः ॥ अलक्ष्मीवानपुत्रस्तु यो भवेत्पुरुषो भुवि ॥

इस जनम में कोई आदमी गरीबी से परेशान हो सकता है। बीमारी हो, कोई बड़ा रोग हो, पैसे नहीं हो, कोई बेटा न हो। ऐसा इंसान दुनिया में होता है।

Verse 10

नारायणं परं देवं यः पश्यति विधानतः ॥ आचार्यदर्शितं देवि मन्त्रमूर्तिमयोनिजम् ॥

देवी, जो कोई नारायण भगवान को सही तरीके से देख लेता है। गुरु जी बताते हैं कैसे देखना है, मंत्र से, वो जनम से नहीं हुआ है। नारायण सबसे बड़े भगवान हैं।

Verse 11

कार्तिके मासि शुक्लायां द्वादश्यां तु विशेषतः ॥ सर्वासु वा यजेद्देवं द्वादशीषु विधानतः ॥

कार्तिक महीने में, जब चाँद बढ़ रहा हो, बारहवीं तारीख को खास है। उस दिन भगवान की पूजा करनी चाहिए। या फिर साल भर जब भी बारहवीं तारीख आए, तब भी पूजा करो।

Verse 12

ब्राह्मणक्षत्रियविशां भक्तानां तु परीक्षनम् ॥ संवत्सरं गुरुः कुर्याज्जातिशौचक्रियादिभिः ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य - इन तीन में से जो भक्त हो, उनको एक साल तक गुरु जी चेक करते हैं। उनका कैसा परिवार है, कैसे रहते हैं, साफ-सुथरा हैं या नहीं, यह सब देखते हैं।

Verse 13

संक्रान्त्यां वा महाभागं चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥ यः पश्यति हरिं देवि पूजितं गुरुणा शुभे ॥

देवी, संक्रांति के दिन या सूरज-चाँद ग्रहण के टाइम जो कोई हरि को देखता है। गुरु उसकी पूजा कर चुका होता है। उसे खास फल मिलता है।

Verse 14

तस्य सद्यो भवेत् तुष्टिः पापध्वंसश्च जायते ॥ सामान्यदेवतानां च भवतीति न संशयः ॥

उसको तुरंत सैटिस्फैक्शन मिलता है और उसके सारे पाप खत्म हो जाते हैं। सारे छोटे-मोटे देवी-देवता भी उसे आशीर्वाद देते हैं। इसमें कोई डाउट नहीं।

Verse 15

उपासन्नं ततो ज्ञात्वा हृदयेनावधारयेत् ॥ तेऽपि भक्तिमतो ज्ञात्वा त्वात्मानं परमेश्वरम् ॥

जब समझ आए कि भगवान का कार्य चल रहा है, तो उसे दिल में बसा के रखना। वो भी तुम्हारी भक्ति देख कर समझ जाते हैं कि तुम भगवान के हो।

Verse 16

संवत्सरं गुरोर्भक्तिं कुर्युर् विष्णोरिवाचलाम् ॥ संवत्सरे ततः पूर्णे गुरुं चैव प्रसादयेत् ॥

एक साल तक गुरु से वही प्यार रखो जो विष्णु से रखते हो। जब साल पूरा हो जाए, तब गुरु को खुश करो और उनका आशीर्वाद लो।

Verse 17

भगवंस्त्वत्प्रसादेन संसारार्णवतारणम् ॥ इच्छामस्त्वैहिकीं लक्ष्मीं विशेषेण तपोधन ॥

भगवान, आप कृपा करके हमको इस जनम-मरण के चक्कर से निकाल दो। हम दुनिया की लक्ष्मी भी चाहते हैं, लेकिन मुक्ति ज़्यादा चाहिए।

Verse 18

एवमभ्यर्च्य मेधावी गुरुं विष्णुमिवाग्रतः ॥ अभ्यर्चितस्तैः सोऽप्याशु दशम्यां कार्त्तिकस्य तु ॥

स्मार्ट बंदा गुरु की पूजा करता है, जैसे विष्णु सामने खड़े हो। गुरु भी खुश हो जाता है जब उसकी पूजा होती है। यह सब कार्तिक महीने की दसवीं तारीख में जल्दी होता है।

Verse 19

स्वप्नान्दृष्ट्वा गुरोरग्रे श्रावयेत विचक्षणः ॥ ततः शुभाशुभे तत्र लक्षयेत्परमो गुरुः ॥

जब सपने आएँ तो सीधा गुरु के पास जाओ और बताओ। गुरु फिर देखेगा कि सपना अच्छा है या बुरा। वो समझा देगा कि इसका मतलब क्या है।

Verse 20

एकादश्यामुपोष्यैवं स्नात्वा देवालयं व्रजेत् ॥ गुरुश्च मण्डलं भूमौ कल्पितायां तु वर्त्तयेत् ॥

एकादशी का व्रत रख के नहा लो। फिर मंदिर चलो। गुरु ज़मीन पर मंडल बनाता है, सब तैयार कर के।

Verse 21

लक्षणैर्विविधैर्भूमिं लक्षयित्वा विधानतः ॥ षोडशारं लिखेच्चक्रं सर्वतोभद्रमेव च ॥

ज़मीन को सही तरह मार्क करो। उसके ऊपर चक्र बनाओ, सोलह स्पोक्स वाला। एक और डिज़ाइन भी बनाओ जो शुभ माना जाता है।

Verse 22

अथवा अष्टपत्रं च लिखित्वा दर्शयेद्बुधः ॥ नेत्रबन्धं तु कुर्वीत सितवस्त्रेण यत्नतः ॥

या फिर आठ पेटल्स वाला डिज़ाइन बनाओ। उसे दिखाओ सबको। फिर आँखों पर सफेद कपड़ा बाँध लो, ध्यान से।

Verse 23

वर्णानुक्रमतः शिष्यान्पुष्पहस्तान्प्रवेशयेत्॥ नवनाभं यदा कुर्यान्मण्डलं वर्णकैर्बुधः॥

शिष्यों को वर्णों के ऑर्डर में अंदर बुलाओ, हाथों में फूल रखा हो। ज्ञानी व्यक्ति रंग से नौ कमरों वाला मंडल बनाता है।

Verse 24

तदानिं पूर्वतो देवमिन्द्रपूर्वं तु पूजयेत्॥ लोकपालैः समं पूज्य अग्निं सम्पूजयेत्छुभे॥

फिर पूरब तरफ देवता की पूजा करो, पहले इंद्र की। दुनिया के रक्षक देवताओं के साथ पूजा करो। फिर अग्नि की भी पूजा करो।

Verse 25

स्वदिक्षु तद्वद्याम्यायां नैर्ऋत्यां निरृतिं न्यसेत्॥ वरुणं वारुणायां च वायुम् वायव्यतो न्यसेत्॥

हर दिशा में अपने हिस्से से देवता बिठाओ। दक्षिण में और दक्षिण-पश्चिम में निरृति को रखो। पश्चिम में वरुण, उत्तर-पश्चिम में वायु को बिठाओ।

Verse 26

धनदं चोत्तरे न्यस्य रुद्रमीशानगोचरे। पूज्यैवं तु विधानॆन दिक्षेत्रेषु व्यवस्थिताम्॥

उत्तर में धनद को रखो, और उत्तर-पूरब में रुद्र को। इस तरह पूजा करके, हर दिशा के देवताओं को उसकी जगह पे स्थापित करो।

Verse 27

पद्ममध्ये तथा विष्णुमर्च्चयेत्परमेश्वरम्॥ पूर्वपत्रे बलं पूज्य प्रद्युम्नं दक्षिणे तथा॥

फिर कमल के बीच में विष्णु की पूजा करो, वो सबसे बड़े भगवान हैं। पूरब वाले पत्ते पे बालाजी की पूजा करो, और दक्षिण वाले पत्ते पे प्रद्युम्न की।

Verse 28

ऐशान्यां विन्यसेच्छङ्खमाग्नेय्यां चक्रमेव तु॥ याम्यायां तु गदां पूज्य वायव्यां पद्ममेव च॥

पूजा के टाइम शंख को नॉर्थईस्ट साइड में रखना। चक्र को साउथईस्ट साइड में प्लेस करना। गदा को साउथ साइड में पूजा के लिए रखो। और पद्म, यानी कमल, को नॉर्थवेस्ट साइड में रखना।

Verse 29

ऐशान्यां मुसलं पूज्य दक्षिणे गरुडं न्यसेत्॥ वामतो विन्यसेल्लक्ष्मीं देवदेवस्य बुद्धिमान्॥

नॉर्थईस्ट साइड में मुसल को पूजा के लिए रखो। साउथ साइड में गरुड़ को प्लेस करना। दाएं तरफ से लक्ष्मी को रखना। यह सब भगवान के लिए है, समझदार इंसान ऐसे ही करता है।

Verse 30

वैष्णवं कलशं चैव नवमं तत्र कल्पयेत्॥ स्नापयेन्मुक्तिकामं तु वैष्णवेन घटेन ह॥

वहाँ एक वैष्णव कलश भी रेडी करना। यह नाइंथ आइटम है। जो मुक्ति चाहता है, उसको उस वैष्णव घड़े से स्नान करवाना है।

Verse 31

धनुश्चैव तु खड्गं तु देवस्य पुरतो न्यसेत्। श्रीवत्सं कौस्तुभं चैव नवमं तत्र कल्पयेत्॥

धनुष और तलवार को भगवान के सामने रखना। श्रीवत्स और कौस्तुभ को भी वहाँ अरेंज करना। यह भी नाइंथ आइटम की तरह सेटअप करना है।

Verse 32

एवं पूज्य यथान्यायं देवदेवं जनार्द्दनम्॥ दलॆषु दिक्षु विन्यस्य अष्टौ कुम्भान्विधानतः॥

इस तरह से जनार्दन भगवान की सही रूल के साथ पूजा करना। फिर पेटल्स और डायरेक्शन्स में सब आइटम्स प्लेस करना। उसके बाद आठ कुंभ, यानी मटके, विधान के हिसाब से लगाना है।

Verse 33

श्रीकामं स्नापयेत् तद्वद् ऐन्द्रेण तु घटेन ह ॥ प्राज्यप्रतापकामं च आग्नेयेन तु स्नापयेत् ॥

जो आदमी समृद्धि चाहता है, उसको इंद्र के घरे से नहाया जाता है। जो शक्ति और तेज़ चमक चाहता है, उसको अग्नि के घरे से नहाया जाता है।

Verse 34

मृत्युञ्जयविधानाय याम्येन स्नपनं तथा ॥ दुष्टप्रध्वंसनायालं नैऋतेन विधीयते ॥

मृत्यु पर जीतने के लिए यम के घरे से नहाया जाता है। बुरे लोगों को खत्म करने के लिए निर्ऋति के घरे का प्रयोग होता है।

Verse 35

शान्तये वारुणेनाशु पापनाशाय वायवे ॥ द्रव्यसम्पत्तिकामस्य कौबेरेण विधीयते ॥

शांति के लिए वरुण के घरे से जल्दी नहाया जाता है। पाप मिटाने के लिए वायु के घरे से नहाते हैं। पैसा और दौलत के लिए कुबेर के घरे का विधान है।

Verse 36

रौद्रेण ज्ञानहेतोश्च लोकपालपदाप्तये ॥ एकैकेन नरः स्नातः सर्वपापविवर्जितः ॥

ज्ञान के लिए रुद्र के घरे से नहाया जाता है। इससे आदमी दुनिया के रक्षक बन सकता है। एक एक घरे से नहाने से आदमी के सारे पाप खत्म हो जाते हैं।

Verse 37

जायते विष्णुसदृशः सद्यो राजाथवा भवेत् ॥ अथवा दिक्षु सर्वासु यथासंख्येन लोकपान् ॥ पूजयीता स्वशास्त्रोक्तविधानेन विधानवित् ॥

आदमी विष्णु जैसा बन जाता है या फिर राजा बन जाता है। चारों दिशा में लोकपालों की पूजा करनी चाहिए। अपने ग्रंथ में जो लिखा है वही विधान फॉलो करना है।

Verse 38

एवं सम्पूज्य देवान्श्च लोकपालान् प्रसन्नधीः ॥ पश्चात्प्रदक्षिणान् शिष्यान् बद्धनेत्रान् प्रवेशयेत् ॥ आग्नेयी वारुणी दग्धा वायुना विधिना ततः ॥

पहले भगवान और दुनिया के रक्षकों की पूरा सम्मान के साथ पूजा करो। मन शांत रख के। फिर शिष्यों को आँखें बंद करके अंदर ले जाओ, जब वो मंदिर के चारों तरफ चल के आए हों। उसके बाद अग्नि और वरुण के हिसाब से साफ करना होता है, वायु के थ्रू सही तरीके से।

Verse 39

सौमेनाप्यायिता पश्चाच्छ्रावयेत्समयान्बुधः ॥ अनिन्द्यान्ब्राह्मणान्वेदान्विष्णुं ब्रह्माणमेव च ॥

जब सोम से सब ठहर जाए, तब पंडित जी समय के नियम सुनाएं। यह नियम उन ब्राह्मणों के बारे में हैं जो कोई बुरा काम नहीं करते। वेदों के बारे में, विष्णु और ब्रह्मा के बारे में भी बताना है।

Verse 40

रुद्रमादित्यमग्निं च लोकपालग्रहांस्ततः ॥ गुरूंश्च वैष्णवांश्चापि पुरुषः पूर्वदीक्षितः ॥

उसके बाद रुद्र, सूर्य और अग्नि का सम्मान करो। फिर दुनिया के रक्षक और ग्रहों का भी। गुरु और विष्णु के भक्तों का भी। यह सब वो करेगा जिसका पहले से ही दिया हुआ हो।

Verse 41

एवं तु समयं ख्याप्य पश्चाद्धोमं तु कारयेत् ॥ ॐ नमो भगवते सर्वरूपिणे हुं फट् स्वाहा ॥

नियम बता देने के बाद होम करना है। अग्नि में सामग्री डालना। मंत्र यह है, ओम, नमो भगवते सर्वरूपिने, हुम फट स्वाहा। यह बोल के होम करो।

Verse 42

षोडशाक्षरमन्त्रेण होमयेज्ज्वलिताग्नये ॥ गर्भाधानादिकाश्चैव क्रियाः समवघारयेत् ॥

सोला अक्षर वाले मंत्र से जलते हुए अग्नि में सामग्री डालनी है। और गर्भाधान जैसे रिचुअल्स को भी समझ के करना है, सब सही से।

Verse 43

त्रिभिराहुतिभिश्चापि देवदेवस्य सन्निधौ ॥ होमान्ते दीक्षितः पश्चाद्दद्याच्च गुरुदक्षिणाम्

भगवान के सामने तीन बार आहुति देना है। जब होम खत्म हो, तब गुरु को दक्षिणा देना है। यह वो शख्स करता है जिसको दीक्षा मिली है।

Verse 44

हस्त्यश्वकटाकादीनि हेमग्रामादिकं नृपः ॥ दद्याच्च गुरवे प्राज्ञो मध्यमे मध्यमं तथा

राजा समझदार होना चाहिए। वो गुरु को हाथी, घोड़े, गाड़ी और सोना देता है। अगर उसके पास कम पैसा हो, तो इतना ही देना चाहिए जितना उसकी हालत में हो।

Verse 45

एवं कृते तु यत्पुण्यं माहात्म्यं जायते धरे ॥ तत्र शक्यं तु गदितुमपि वर्षशतैरपि

जब आप यह सब करोगे, बहुत पुण्य मिलेगा। इतना बड़ा फल मिलेगा कि सौ साल में भी पूरा बताना मुश्किल है।

Verse 46

जप्ताः स्युः पुष्करे तीर्थे प्रयागे सिन्धुसङ्गमे ॥ देवागारे कुरुक्षेत्रे वाराणस्यां विशेषतः

यह पाठ पुष्कर में करना चाहिए। प्रयाग में भी, सिंधु नदी के संगम पे भी। मंदिर में, कुरुक्षेत्र में, और काशी में खास करके।

Verse 47

ग्रहणे विषुवे चैव यत्फलं जपतां भवेत् ॥ तत्फलं द्विगुणं तस्य दीक्षितो यः शृणोति च

ग्रहण के वक्त जो फल मिलता है, या जब सूरज सीधा हो, उतना ही फल दुगुना मिलता है। लेकिन वही शख्स जो दीक्षा लिया है और सुनता भी है, उसको दुगुना मिलता है।

Verse 48

देवा अपि तपः कृत्वा ध्यायंति च वदंति च ॥ कदा नो भारते वर्षे जन्म स्याद्भूतधारिणि

देव लोग भी तपस करते हैं। वो ध्यान लगाते हैं और बोलते हैं। कहते हैं, कब हम भारत में जन्मे। भारत वो जगह है जहाँ भगवान भी जन्मना चाहते हैं।

Verse 49

दीक्षिताश्च भविष्यामो वराहं शृणुमः कथम् ॥ वराहं षोडशात्मानं त्यक्त्वा देहं कदा वयम्

वो कहते हैं, हम भी दीक्षा लेंगे। हम वराह को कैसे सुनेंगे। यह देह छोड़ के कब हम वराह को पाएंगे। वराह जो सोलह रूप वाले हैं, उनको कब मिलेंगे।

Verse 50

यास्यामः परमं स्थानं यद्गत्वा न पुनर्भवेत् ॥ एवं जल्पन्ति विबुधा मनसा चिन्तयन्ति च

हम उस सबसे बड़े स्थान पर जाएंगे। वहाँ जाने के बाद वापस नहीं आना पड़ता। देव लोग ऐसे ही बात करते हैं। अपने मन में भी यही सोचते रहते हैं।

Verse 51

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ॥ वसिष्ठस्य च संवादं श्वेतस्य च महात्मनः

इसके बारे में एक पुरानी कहानी है। वसिष्ठ और श्वेत की बात-चीत थी। श्वेत बड़ा बड़ा आदमी था। यह दोनों का संवाद सुनो।

Verse 52

स्वर्गवासे स्थितो ह्यासिच्छ्वेतो राजा महायशाः ॥ आसीदिलावृते वर्षे श्वेतो राजा बृहत्तपाः

श्वेत नाम का राजा था, बड़ा मशहूर था। वो स्वर्ग में रहता था। इलावृत वर्ष में भी श्वेत राजा था। उसने बड़ी तपस की थी।

Verse 53

स महीṃ सकलां देवी सपल्लववनद्रुमाम् ॥ दातुमिच्छन्स चोवाच वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥

वो पूरी ज़मीन देना चाहते थे, देवी। जिसमें पेड़-पौधे, जंगल, सब कुछ था। उन्होंने वशिष्ठ से बात की, जो बहुत बड़े तपस्वी थे।

Verse 54

भगवन् दातुमिच्छामि ब्राह्मणेभ्यो वसुन्धराम् ॥ देह्यनुज्ञां स चोवाच वसिष्ठो राजसत्तमम् ॥

उन्होंने कहा, भगवान, मैं यह ज़मीन ब्राह्मणों को देना चाहता हूँ। आप हाँ कर दो। वशिष्ठ ने राजा से ऐसा कहा।

Verse 55

सर्वेषामेव दानानामन्नदानं विशिष्यते ॥ अन्नाद्भवन्ति भूतानि अन्नेनैव च वर्धते ॥

सब दान में सबसे बड़ा दान खाने का है। खाने से ही सब पैदा होते हैं। खाने से ही सब बढ़ते हैं।

Verse 56

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन अन्नदानं ददस्व भोः ॥ वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा स राजा न तथाकरॊत् ॥

इसलिए पूरी मेहनत से खाने का दान करो। लेकिन राजा ने वशिष्ठ की बात सुनी और ऐसा नहीं किया।

Verse 57

रत्नवस्त्रमलङ्कारान् श्रीमन्ति नगराणि च ॥ यत्किञ्चित्कोषजातं स द्विजानाहूय तद्ददौ ॥

उसने ब्राह्मणों को बुलाया। उन्हें रत्न, कपड़े, गहने दिए। शहरी भी दिए, जो ख़ज़ाने में कुछ भी था वो सब दे दिया।

Verse 58

प्रदत्तं ब्राह्मणस्याथ कुञ्जरानजिनानि च ॥ स कदाचिन्नृपः पृथ्वीं जित्वा परमधर्मवित् ॥

उसने ब्राह्मण को हाथी भी दिए और जानवर की खाल भी दी। एक बार उस राजा ने पूरी दुनिया जीत ली। वो बड़ा धरम जानता था।

Verse 59

पुरोहितमुवाचेदं वसिष्ठं जपतां वरम् ॥ भगवन्नश्वमेधानां सहस्रं कर्तुमुत्सहे ॥

राजा ने अपने पुरोहित वसिष्ठ से बात की। वसिष्ठ बड़े जाप करने वाले थे। राजा बोला, भगवान, मैं एक हज़ार अश्वमेध यज्ञ कर सकता हूँ।

Verse 60

सुवर्णरौप्यताम्राणि यागं कृत्वा द्विजातिषु ॥ दत्तानि तेन राज्ञा वै नान्नं दत्तं तथा जलम् ॥

राजा ने यज्ञ किया और ब्राह्मण लोगों को सोना, चाँदी और तांबा दिया। लेकिन उसने खाना नहीं दिया और पानी भी नहीं दिया।

Verse 61

वस्तु स्वल्पमिति ज्ञात्वा प्रभुः सोऽन्नं तु नाददत् ॥ एवं विभवयुक्तस्य तस्य राज्ञो महात्मनः ॥

उसको लगता था कि चीज़ छोटी है, इसलिए उसने खाना नहीं दिया। राजा के पास सब कुछ था, वो बड़ा आदमी था।

Verse 62

कालधर्मवशाद्देवि मृत्युḥ समभवत्तदा ॥ परलोके वर्तमानः स च राजा महामनाः ॥

देवी, वक़्त के हिसाब से उसकी मौत आ गई। वो राजा दूसरी दुनिया में चला गया। उसका दिल बड़ा था।

Verse 63

क्षुधया पीडितो ह्यासीत् तृषया च विशेषतः ॥ अनिनायाप्सरोभागं गत्वा श्वेताख्यपर्वतम्

उसे भूख और प्यास बहुत सताती थी। वो श्वेत पर्वत गया। वहाँ उसने अप्सरों का हिस्सा ले लिया।

Verse 64

पुनर्विमानमारुह्य दिवमाचक्रमे नृपः ॥ अथ कालेन महता स राजा संशितव्रतः

राजा ने फिर से उड़ने वाली रथ पे सवार होके आसमान की तरफ चल दिया। बहुत लंबे समय तक वो रहा वहाँ। उसने अपना व्रत पूरा रखा था।

Verse 65

तान्यस्थीनि लिहन्दृष्टो वसिष्ठेन महात्मना ॥ उक्तश्च तेन किंच त्वं स्वास्थि भुङ्क्षे नराधिप

वशिष्ठ ने उसे देखा कि वो हड्डियाँ चाट रहा है। उन्होंने पूछा, राजा, तुम अपनी हड्डियाँ क्यों खा रहे हो?

Verse 66

एवमुक्तस्तदा राजा वसिष्ठेन महात्मना ॥ उवाच वचनं चेदं श्वेतो राजा मुनिं तदा

वशिष्ठ की बात सुनकर राजा ने मुनि से कहा। राजा श्वेत ने उनको जवाब दिया।

Verse 67

भगन् क्षुधितश्चास्मि अन्नपानं पुरा मया ॥ न दत्तं मुनिशार्दूल तेन मां बाधते क्षुधा

मुनि, मुझे भूख लगती है। मैंने पहले खाना पानी नहीं दिया था। इसलिए अब मुझे भूख सताती है।

Verse 68

किं ते करोमि राजेन्द्र क्षुधितस्य विशेषतः ॥ अदत्तं नोपतिष्ठेत कस्यचित्किंचिदुत्तमम्

मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ, राजा? आप भूखे हैं, इसलिए और भी दिक्कत है। जो चीज़ बड़ी अच्छी है, वो अगर दी नहीं गई तो किसी को नहीं मिलती।

Verse 69

रत्नहेमप्रदानेन भोगवान् जायते नरः ॥ अन्नपानप्रदानेन सर्वकामैस्तु तर्पितः

जो लोग हीरा-मोती और सोने का दान करते हैं, वो सुख भोगते हैं। लेकिन जो खाना-पानी देते हैं, उनको सब चीज़ें मिल जाती हैं जो वो चाहते हैं।

Verse 70

तन्न दत्तं त्वया राजन् स्तोकं मत्वा नराधिप ॥ श्वेत उवाच ॥ अदत्तस्य च सम्प्राप्तिस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः

आपने वो दान नहीं किया, राजा। आपने सोचा कि वो छोटी बात है। श्वेत ने पूछा, बताइए, जिसने दान नहीं किया उसका क्या होता है?

Verse 71

एवमुक्तस्ततो राज्ञा वसिष्ठो मुनिपुङ्गवः ॥ उवाच च मुनिर्भूयः श्वेतं वाक्यं महानृपम्

राजा ने बात कही, तो वशिष्ठ ने वापस जवाब दिया। वो बड़े रिशि थे। उन्होंने श्वेत राजा को फिर से समझाया।

Verse 72

शिरसा भक्तियुक्तेन याचितोऽसि महामुने ॥ वसिष्ठ उवाच ॥ अस्त्येकं कारणं येन जायते तन्न संशयः

आपने झुक के मुझसे पूछा है, बड़े रिशि। वशिष्ठ बोले, हाँ, एक वजह है इसकी। इसमें कोई शक नहीं।

Verse 73

स सर्वमेधमारॆभे स्वयं क्रतुवरं नृपः ॥ यजतानेन विप्रेभ्यो दत्ता गावो द्विपा वसु ॥

राजा ने खुद एक बड़ा यज्ञ शुरू किया। यज्ञ करते वक्त उन्होंने ब्राह्मण को गाय, हाथी और पैसा दिया।

Verse 74

नान्नं तेन तदा दत्तं स्वल्पं मत्वा यथा त्वया ॥ ततः कालेन महता मृतोऽसौ जाह्नवीजले ॥

लेकिन उस वक्त उन्होंने खाना नहीं दिया। उन्होंने सोचा यह छोटी बात है, जैसे तुमने सोचा था। बहुत टाइम बाद वो गंगा के पानी में मर गया।

Verse 75

कृत्वा पुण्यं विनीताś्वः सार्वभौमो नृपोत्तमः ॥ स्वर्गं च गतवान्सोऽपि यथा राजन् भवान् प्रभो ॥

वो राजा ने अच्छे काम किए। वो बड़ा राजा था, सब पर राज करता था। फिर वो स्वर्ग गया, जैसे तुम भी जाओगे राजा।

Verse 76

असावपि क्षुधाविष्ट एवमेव गतो नृपः ॥ मर्त्यलोके नदीतीरे गङ्गायां नीलपवर्तम् ॥

वो राजा भी भूख से परेशान था। फिर वापस इस दुनिया में आया। गंगा के किनारे, नीलपवर्त नाम की जगह पे।

Verse 77

विमानेनार्कवर्णेन भास्वता देववन्नृपः ॥ ददर्श च तदा राजा क्षुधितः स्वं कलेवरम् ॥

एक चमकदार विमान आया, सूरज जैसा रंग था। राजा भगवान जैसा दिखता था। भूखा होके भी अपना शरीर देख रहा था।

Verse 78

पुरोहितं ददर्शाथ होतारं जाह्नवीतटे ॥ तद्दृष्ट्वाऽसावपि नृपः पप्रच्छ मुनिसत्तमम् ॥

राजा ने जाह्नवी नदी के किनारे अपने पंडित को देखा। उसको देख के राजा ने उस रिशि से सवाल किया।

Verse 79

क्षुधायाः कारणं किं मे स होता तमुवाच ह ॥ तिलधेनुं भवान्राजञ् जलधेनुं च सत्तम ॥

राजा ने पूछा, मैं भूखा क्यों हूँ? पंडित ने कहा, राजा, तिल की गाय और पानी की गाय दो।

Verse 80

घृतधेनुं च धेनुं च रसधेनुं च पार्थिव ॥ देहि शीघ्रं येन भवान्क्षुधया वर्ज्जितो भवेत् ॥

घी की गाय भी दो, एक साधारण गाय भी दो, और रस की गाय भी दो। जल्दी दो, ताकि तुम भूख से आज़ाद हो जाओ।

Verse 81

तपते यावदादित्यस्तपते वापि चन्द्रमाः ॥ एवमुक्तस्ततो राजा तं पुनः पृष्टवानिदम् ॥

जब तक सूरज चमकता है और चाँद चमकता है, तब तक यह काम रहेगा। यह सुन के राजा ने दोबारा पूछा।

Verse 82

होतोवाच ॥ विधानं तिलधेनोश्च त्वं शृणुष्व नराधिप ॥ चतुर्भिः कुडवैश्चैव प्रस्थ एकः प्रकीर्तितः ॥

पंडित ने कहा, राजा, सुन्नो तिल की गाय कैसे बनाते हैं। चार कुडव मिल के एक प्रस्थ होता है।

Verse 83

पुच्छे प्रकल्पनीया सा घण्टाभरणाभूषिता ॥ ईदृशीं कल्पयित्वा तु स्वर्णशृङ्गीं तु कारयेत् ॥

पूँछ में घंटे और गहने लगाओ। ऐसे ही बना के, उसके सींग सोना के बनाओ।

Verse 84

कांस्यदोहां रौप्यखुरां पूर्वधेनुविधानतः ॥ कृत्वा तां ब्राह्मणायाशु दद्याच्चैव नराधिप ॥

गाय का दूभना कैसे है उसके हिसाब से बनाओ। दूभने वाला बर्तन कांसी का होना चाहिए और खुर चांदी के। फिर उसे जल्दी से किसी ब्राह्मण को दे दो, राजा।

Verse 85

सा तु षोडशभिः कार्या चतुर्भिर् वत्सको भवेत् ॥ नासा गन्धमयी तस्या जिह्वा गुडमयी शुभा ॥

गाय को सोलह हिस्सों में बनाओ। बच्चा चार हिस्सों में बनेगा। नाक सुगंध वाली चीज़ से बनाओ। जीभ गुड़ की बनाओ, यह अच्छा है।

Verse 86

सर्वौषधिसमायुक्तां मन्त्रपूतां तु दापयेत् ॥ अन्नं मे जायतामन्यत् पानं सर्वरसास्तथा ॥

सभी जड़ी-बूटी उसमें डाल के मंत्र पढ़ो। फिर दो। बोलना, मुझे खाना मिले और पानी भी जिसमें सारे स्वाद हों।

Verse 87

सर्वं सम्पादयास्माकं तिलधेनो द्विजार्पिता ॥ गृह्णामि देवि त्वां भक्त्या कुटुम्बार्थं विशेषतः ॥

तिल की गाय, ब्राह्मण को दे के बोलो। सब कुछ हमारे लिए पूरा करो। देवी, मैं तुम्हे भाव से लेता हूँ। घर परिवार के लिए खास कर के।

Verse 88

भजस्व कामान्मां देवि तिलधेनो नमोऽस्तु ते ॥ एवंविधां ततो दद्यात्तिलधेनुं नृपोत्तम ॥

देवी तिलधेनु से दुआ माँगो कि वो तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करे। उस तिल की गाय को नमस्ते करो। राजा, ऐसे ही एक तिल की गाय दान करनी चाहिए।

Verse 89

कृष्णाजिनं धेनुवासो नन्दितां कल्पितां शुभाम् ॥ सूत्रेण सूत्रितां कृत्वा सर्वरत्नसमन्विताम् ॥

काले हिरन की खाल को गाय पर डाल के उसे शुभ बनाओ। उसे धागे से बाँधो और सारे रतन उसमें सजाओ।

Verse 90

सर्वकामसमावाप्तिं कुरुते नात्र संशयः ॥ यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या कुर्यात्कारयतेऽपि वा ॥

यह दान सारी इच्छाएँ पूरी करता है, इसमें कोई शक नहीं। जो भी यह बात भाव के साथ सुनो, या खुद करो या किसी से करवाओ, वो फायदा उठाता है।

Verse 91

तस्य सद्यो भवेल्लक्ष्मीरायुर् वित्तं सुतः सुखम् ॥ दृष्ट्वा तु मण्डलगतं देवं देव्याः समन्वितम् ॥

उसके घर में तुरंत लक्ष्मी आती है। उसकी उमर लंबी होती है, पैसा आता है, बेटा पैदा होता है, सुख मिलता है। जब वो मंडल में भगवान और देवी को देखता है, और पुण्य मिलता है।

Verse 92

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं च गच्छति ॥ गोमये मण्डले कृत्वा गोचर्म्म तदनन्तरम् ॥

उसके सारे पाप खत्म हो जाते हैं और वो विष्णु के धाम जाता है। गोबर से मंडल बनाओ, फिर उसके बाद गाय की खाल बिछाओ।

Verse 93

क्षीरवृक्षसमुद्भूतं दन्तकाष्ठं समन्त्रकम् ॥ भक्षयित्वा स्वपे्युर्हि देवदेवस्य सन्निधौ

एक दूध वाले पेड़ से दातुन तोड़ लो। उसके ऊपर मंत्र पढ़ के दातुन चबाओ। फिर भगवान के सामने सो जाओ।

Verse 94

अनिरुद्धं तथा पूज्य पश्चिमे चोत्तरे तथा ॥ पूजयेद्वासुदेवं तु सर्वपातकशान्तिदम्

पूजा में पीछले तरफ अनिरुद्ध की पूजा करो। ऊपर तरफ भी उनकी पूजा करो। फिर वासुदेव की पूजा करो। यह सब पाप मिटा देता है।

Verse 95

भवेदव्याहतं ज्ञानं श्रीमान्विप्रो विचक्षणः ॥ किं पुनर्नवभिः स्नातो नरः पातकवर्जितः

ज्ञान साफ मिलता है। ब्राह्मण पैसेवाला और समझदार होता है। अगर कोई इंसान नव स्नान कर के नहा ले, तो उसके पाप भी खत्म हो जाते हैं।

Verse 96

दीक्षितात्मा पुनर्भूत्वा वराहं शृणुयाद्यदि ॥ तेन वेदपुराणानि सर्वे मन्त्राः ससंग्रहाः

अगर तुम दीक्षा ले के वराह पुराण सुनो। तो तुम्हे वेद और पुराण सब मिल जायेंगे। सारे मंत्र भी मिल जायेंगे।

Verse 97

अन्नं देहि सदा राजन् सर्वकालसुखावहम् ॥ अन्नेन चैव दत्तेन किं न दत्तं महीतले

राजा, हमेशा खाना देना। यह हर वक्त सुख देता है। जब खाना दे दिया, तो दुनिया में क्या नहीं मिल गया?

Verse 98

तत्र प्राग्जन्ममूर्त्तिश्च पुरा दग्धा महात्मनः ॥ तत्रास्थीनि स सङ्गृह्य लिहन्नास्ते स पार्थिवः

वहाँ उस बड़े आदमी का पुराना जनम का शरीर बहुत पहले जल चुका था। राजा ने वहाँ उसकी हड्डियाँ उठा ली और उन्हें चट्टा रहा।

Verse 99

तच्छृणुष्व नरव्याघ्र कथ्यमानं मयाऽनघ ॥ आसीद्राजा पुराकल्पे विनीताश्वातिविश्रुतः

सुन, मैं तुम्हे एक कहानी बताता हूँ। बहुत पहले एक राजा था, उसका नाम विनीताश्व था। वो बहुत मशहूर था।

Verse 100

विनीताश्व उवाच ॥ कथं सा दीयते ब्रह्मंस्तिलधेनुर्जिगीषुभिः ॥ भुङ्क्ते स्वर्गं च विप्रेन्द्र तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः

विनीताश्व ने पूछा: ब्राह्मण, तिलधेनु कैसे दी जाती है? जो लोग जीतना चाहते हैं वो कैसे दें? यह देने से स्वर्ग कैसे मिलता है? मैं जानना चाहता हूँ, बताइए।

Inside Adhyaya 99

How it unfolds

  1. Where it opens

    Varāha, in dialogue with Pṛthivī, introduces a salvific Vaiṣṇava ritual program meant to remove grave sins, restore prosperity, and stabilize earthly order, emphasizing Nārāyaṇa-darśana and worship through a properly constructed maṇḍala, especially on auspicious calendrical nodes (Kārttika, Dvādaśī, saṅkrānti, eclipses).

  2. Central event

    A structured manual unfolds: year-long guru–śiṣya testing and initiation preliminaries; maṇḍala/cakra construction (sarvatobhadra/aṣṭapatra/ṣoḍaśāra patterns); installation and worship of dikpālas and the Vaiṣṇava Vyūhas (Vāsudeva, Saṅkarṣaṇa/Bala, Pradyumna, Aniruddha); mantra-homa; and navakumbha-snāna with differentiated aims (śānti, pāpanāśa, jñāna, wealth).

  3. Climax resolution

    An embedded exemplum provides the ethical ‘proof’: King Śveta suffers post-mortem hunger because he neglected anna-dāna; Vasiṣṭha instructs the corrective rite—crafting and donating a tiladhenu—thereby resolving the king’s condition and demonstrating that ritual efficacy is inseparable from sustaining-life charity (food/water distribution).

  4. Closing phalashruti

    A phala framework is implied rather than a single closing verse: proper Dvādaśī/Kārttika observance, maṇḍala-worship, homa, navakumbha bathing, and tiladhenu/anna-dāna yield pāpa-kṣaya, śānti, prosperity, knowledge, and post-mortem well-being; neglect of food-giving yields enduring deprivation.

Geographical context

Puṣkara-tīrtha; Prayāga; Sindhu-saṅgama; Devāgāra; Kurukṣetra; Vārāṇasī; Vindhya; Mandara-giri; Gaṅgā (Jāhnavī) and its riverbank setting; Nīlapa-parvata (as read in the manuscript); Śvetākhyaparvata; Bhārata-varṣa; Ilāvṛta-varṣa.

Tirtha focus

  • Primary TirthaPuṣkara-tīrtha (with a wider tīrtha-network invoked)
  • Associated RegionBhārata-varṣa (pan-Indic tīrtha geography; North-Central focus via Prayāga–Vārāṇasī–Kurukṣetra axis)
  • Pilgrimage MeritDarśana and worship of Nārāyaṇa at tīrthas—especially on Kārttika-śukla-dvādaśī, saṅkrānti, and grahaṇa—amplify expiation and prosperity; the tīrtha-list functions as a sacral map where correct giving (anna-dāna/tiladhenu) sustains both pilgrim and world-order.

Ritual instructions

  • Primary RitualTiladhenu-dāna integrated with a Kārttika-śukla-dvādaśī Vaiṣṇava maṇḍala-pūjā, homa, and navakumbha-snāna under guru-guidance.
  • BenefitExpiation of major sins, pacification (śānti), restoration of prosperity and social stability, acquisition of knowledge (jñāna), and protection from post-mortem deprivation; the rite is framed as both soteriological and socio-ecological (sustaining life through food-giving).

The narrative frame

  • VarāhaPṛthivī · Didactic, ritual-prescriptive, and ethically corrective—linking technical observance to social duty and cosmic/terrestrial order.

The emotional journey

  • Dominant RasaŚānta (with strong Dharmic gravity and compassionate correction)
  • Emotional ProgressionAssurance of salvation through orderly worship → disciplined seriousness of initiation and maṇḍala-rites → moral shock and pity in Śveta’s hunger → relief and resolve through tiladhenu/anna-dāna as restorative justice → settled confidence in dharma that sustains Earth.

Planning a pilgrimage

  • Visit FeasibilityHigh for major sites (Puṣkara, Prayagraj, Varanasi, Kurukshetra, Ganga ghats); moderate/uncertain for manuscript-specific mountains (Nīlapa-parvata, Śvetākhyaparvata) which may be difficult to identify with a single modern location.
  • Best SeasonKārttika (Oct–Nov) for the chapter’s flagship observance; also around saṅkrānti dates; avoid peak summer heat for North Indian circuits.
  • Modern Location NamePuṣkara (Ajmer district, Rajasthan); Prayagraj (Uttar Pradesh); Varanasi (Uttar Pradesh); Kurukshetra (Haryana); Gaṅgā ghats (multiple cities).
  • Related FestivalKārttika observances (Vaiṣṇava Dvādaśī; Kārttika-snān/Deepotsava traditions regionally); eclipse-day dāna customs; saṅkrānti charity days (e.g., Makara Saṅkrānti in many regions).

Frequently Asked Questions

The chapter’s central ethical claim is that anna-dāna (the giving of food) is foundational to social welfare and the maintenance of life on Earth: beings arise and thrive through food, so withholding basic sustenance creates harm that persists beyond death. This ethic is reinforced through an itihāsa in which royal generosity focused on valuables and sacrifices is portrayed as incomplete when food and water are neglected. The ritual instructions are thus framed as not only expiatory technique but also as a discipline aligning prosperity with responsible distribution of essential resources.

The text highlights Kārttika-māsa, especially Śukla Dvādaśī, as a prime occasion for worship and darśana of Nārāyaṇa according to procedure. It also mentions performing or attending the rite on saṅkrānti (solar ingress) and during candrasūrya-grahaṇa (lunar and solar eclipses), and more generally on Dvādaśī days. A specific sequencing includes fasting on Ekādaśī, bathing, and entering the temple/ritual space for maṇḍala worship, followed by homa and concluding gifts.

Through the Pṛthivī–Varāha instructional frame, the chapter treats terrestrial well-being as dependent on orderly human conduct: correct ritualized offerings, regulated initiation ethics, and especially the circulation of food and resources. By elevating anna-dāna as the most vital gift—because it enables the flourishing of living beings—the narrative implicitly links human economic choices to Earth’s stability (Pṛthivī as the sustaining ground for life). The maṇḍala and dikpāla arrangements further symbolize spatial order and stewardship across directions and regions.

The chapter references Vasiṣṭha as the authoritative sage interlocutor within the embedded exemplum, and presents two royal figures—King Śveta and the earlier King Vinītāśva—as didactic models for evaluating kingship, charity, and ritual priorities. It also invokes standard cosmological-administrative figures such as the dikpālas (Indra, Agni, Yama, Nirṛti, Varuṇa, Vāyu, Kubera/Dhanada, Rudra/Īśāna) and Vaiṣṇava Vyūha deities (Vāsudeva, Saṅkarṣaṇa/Bala, Pradyumna, Aniruddha) as part of the ritual hierarchy.

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