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Sukta 4.34
Vāmadeva Gautama
Rbhus (Ṛbhu, Vibhvan, Vāja) with Indra as companion power
Trishtubh
This hymn invites the Ṛbhus—Ṛbhu, Vibhvan, and Vāja—to the sacrifice, asking them to arrive with Indra and partake of the soma “honey,” bringing their famed power of craftsmanship and renewal into the rite. It praises their unfailing responsiveness to the call and seeks “ratna-dheya” (the placing of treasure/boons) through their united exhilaration with Indra and allied powers.
Mantra 1
ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छेमं यज्ञं रत्नधेयोप यात । इदा हि वो धिषणा देव्यह्नामधात्पीतिं सं मदा अग्मता वः ॥
ऋभु, विभ्वन, वाज, तीनों भाई आओ। इंद्र के साथ इस यज्ञ में आओ। यहाँ तुम्हारे लिए प्याला रखा है। देवी धिषणा ने तुम्हारे लिए पीने का सामान रेडी किया है। आओ और खुश हो जाओ। यह सब तुम्हारे लिए है।
Mantra 2
विदानासो जन्मनो वाजरत्ना उत ऋतुभिॠभवो मादयध्वम् । सं वो मदा अग्मत सं पुरंधिः सुवीरामस्मे रयिमेरयध्वम् ॥
रभु भाई, तुम अपना जनम और अपनी शुरुआत जानते हो। तुम में ताकत है, खजाना है। खुशी से भरो, सही वक्त का इंतज़ार करो। तुम्हारी खुशी और ताकत एक साथ आए। हमें ऐसा धन दो जो हमें मज़बूत बनाए, जो हमारे घर को चमकाए।
Mantra 3
अयं वो यज्ञ ऋभवोऽकारि यमा मनुष्वत्प्रदिवो दधिध्वे । प्र वोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अग्रियोत वाजाः ॥
यह यज्ञ तुम्हारे लिए बनाया गया है, रभु भाई। तुमने इसे आसमान से लाकर लोगों तक पहुँचाया। हम तुम्हारी तरफ जाके खड़े हैं, तुम्हे अपना मानते हैं। ताकत के सारे शक्तिशाली रूप सामने आ गए हैं।
Mantra 4
अभूदु वो विधते रत्नधेयमिदा नरो दाशुषे मर्त्याय । पिबत वाजा ऋभवो ददे वो महि तृतीयं सवनं मदाय ॥
तुम्हारे लिए एक खजाना तैयार है। जो भगवान को पूजा चढ़ाता है, उस इंसान के लिए यह दान है। रभु भाई, पियो। तुम्हे तीसरा प्याला दिया गया है, जो खुशी और मस्ती लाता है।
Mantra 5
आ वाजा यातोप न ऋभुक्षा महो नरो द्रविणसो गृणानाः । आ वः पीतयोऽभिपित्वे अह्नामिमा अस्तं नवस्व इव ग्मन् ॥
आओ, पास आओ। तुम बड़े हो, धन के मालिक हो। हम तुम्हारी स्तुति करते हैं। आओ और पियो, दिन के वक्त यहीं रहो। जैसे शाम को लोग अपने घर वापस आते हैं, वैसे ही तुम भी हमारे पास आओ।
Mantra 6
आ नपातः शवसो यातनोपेमं यज्ञं नमसा हूयमानाः । सजोषसः सूरयो यस्य च स्थ मध्वः पात रत्नधा इन्द्रवन्तः ॥
ताकत के बेटे, आओ। यह यज्ञ है, नमस्ते करते हुए बुला रहे हैं। चमकने वाले भाई, तुम सब एक साथ हो। यह मीठा रस पियो। तुम खजाने रखने वाले हो, इंद्र की ताकत से बले हो। खुश रहो।
Mantra 7
सजोषा इन्द्र वरुणेन सोमं सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः । अग्रेपाभिॠतुपाभिः सजोषा ग्नास्पत्नीभी रत्नधाभिः सजोषाः ॥
इंद्र, तुम वरुण के साथ मिलकर सोम पियो। गिर्वन के स्वामी, तुम मरुत देवताओं के साथ भी पियो। जो पहले पीते हैं, उनके साथ भी पियो। सही वक्त पे पीने वाले लोगों के साथ भी पियो। देवताओं की पत्नियों के साथ भी पियो। जो खज़ाना देते हैं, उन सबके साथ मिलकर पियो।
Mantra 8
सजोषस आदित्यैर्मादयध्वं सजोषस ऋभवः पर्वतेभिः । सजोषसो दैव्येना सवित्रा सजोषसः सिन्धुभी रत्नधेभिः ॥
आदित्य देवताओं के साथ खुश हो जाओ। र्भु देवता, तुम पर्वत के साथ भी खुश रहो। सविता देव के साथ भी खुश रहो। नदियों के साथ भी खुश रहो। जो नदियाँ खज़ाना ले कर आती हैं, उन सबके साथ एक साथ खुश रहो।
Mantra 9
ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुॠभवो ये अश्वा । ये अंसत्रा य ऋधग्रोदसी ये विभ्वो नरः स्वपत्यानि चक्रुः ॥
जो अश्विनी कुमार बने, जो पितर बने, जो मदद करते हैं, वो सब र्भु देवता हैं। उन्होंने चमक वाली गाय बनाई। उन्होंने ताकत वाले घोड़े बनाए। जो कभी हार नहीं मानते, वही हैं। उन्होंने आसमान और धरती को अलग किया। जो बड़े काम किए, वो विभु देवता हैं। उन्होंने ऐसे काम किए जो सबसे बेस्ट हैं।
Mantra 10
ये गोमन्तं वाजवन्तं सुवीरं रयिं धत्थ वसुमन्तं पुरुक्षुम् । ते अग्रेपा ऋभवो मन्दसाना अस्मे धत्त ये च रातिं गृणन्ति ॥
तुमने जो धन दिया, उसमें चमक है, ताकत है, और बहुत लोग हैं। यह धन बहुत है और बढ़ भी रहा है। र्भु देवता, तुम जो आगे बढ़ रहे हो, खुश हो के रहो। अब यह तोहफा हमारे पास भी रख दो। जो लोग तुम्हारी महिमा गाते हैं, उनको भी दो।
Mantra 11
नापाभूत न वोऽतीतृषामानिःशस्ता ऋभवो यज्ञे अस्मिन् । समिन्द्रेण मदथ सं मरुद्भिः सं राजभी रत्नधेयाय देवाः ॥
तुम कभी फेल नहीं हुए। किसी ने तुम्हे कभी बुरा नहीं कहा। र्भु देवता, इस यज्ञ में तुमने अपना काम पूरा किया। इंद्र के साथ खुश रहो। मरुत देवताओं के साथ भी खुश रहो। राजा लोगों के साथ भी खुश रहो। देवता, हमारे पास खज़ाना लगा दो।
They are three divine artisan-powers—Ṛbhu, Vibhvan, and Vāja—famed for perfect skill, renewal, and making the sacrifice effective. This hymn calls them to come and drink soma with Indra.
Indra represents empowering force and victorious energy. Joined with the Ṛbhus’ perfected skill, the hymn seeks a complete power: strength plus mastery, resulting in ‘treasure’ (boons) for the sacrificer.
Literally it is the ‘placing/setting of treasure.’ In context it means securing blessings—wealth, strength, inspiration, and successful outcomes—firmly established through the properly performed soma rite.
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