
अध्याय 226 में तीर्थयात्रा के प्रसंग में एकत्र ऋषि त्रिपुरारि शिव से संसार-चक्र और कर्मबन्धन से छूटने का निर्णायक उपाय पूछते हैं। महेश्वर कहते हैं कि वासुदेव से बढ़कर कोई शरण नहीं; तन‑वाणी‑मन से हरि की उपासना ही परम लक्ष्य का सीधा मार्ग है। फिर वासुदेव का स्तवन होता है—वे नित्य, सर्वव्यापक, ब्रह्मा और देवताओं के मूल, मुनियों के आश्रय और जगत के सच्चे ‘पितामह’ हैं। इसके बाद शिव वंशावली बताकर यादववंश तक क्रम ले जाते हैं और आनकदुन्दुभि वसुदेव तथा उनके पुत्र वासुदेव कृष्ण के अवतरण का वर्णन करते हैं, जो बंदी राजाओं का उद्धार करेंगे और जरासंध का वध करेंगे। अंत में वासुदेव और बलराम के निरंतर दर्शन‑भजन की संस्तुति है; उनका दर्शन ब्रह्मा‑शिव के दर्शन के समान है, क्योंकि सभी देवता उनके शरीर में निवास करते हैं।
{"opening_hook":"In a pilgrimage setting on Gandhamādana, assembled sages approach Tripurāri (Śiva) with an urgent, existential question: what single means decisively cuts the fearsome bondage of birth-and-death (janma–saṃsāra–bandhana)?","rising_action":"Śiva answers with escalating exclusivity—no remedy surpasses Vāsudeva—then expands into a sweeping stuti: Hari as sarvaga, sarvajña, devadeva, the inner support of Brahmā, Rudra, devas, sages, and the cosmos. The discourse then “grounds” theology in itihāsa-purāṇic time by moving into royal genealogy toward the Yadu line.","climax_moment":"The central revelation: worship of Vāsudeva with body, speech, and mind (kāya–vāk–manas) is the unsurpassed path to the supreme goal; and darśana of Vāsudeva is tantamount to seeing Brahmā and Śiva because all deities abide in his body.","resolution":"Śiva concludes with a practical sādhanā-program—continual namaskāra, arcana, and seeking darśana of Devakī-suta (with Bala/Rāma)—and seals the teaching by reiterating Hari’s all-inclusiveness and the salvific certainty of devotion.","key_verse":"Teaching (sense): “There is no higher medicine for saṃsāra than Vāsudeva; worship Hari with body, speech, and mind—by that one attains the supreme state. Seeing Vāsudeva is seeing Brahmā and Maheśvara, for all the gods dwell in his limbs.”"}
{"primary_theme":"Vāsudeva-bhakti as the unsurpassed mokṣa-mārga (taught by Śiva)","secondary_themes":["Hari’s theological supremacy and all-deity indwelling (sarvadevatā-mayatva)","Genealogical legitimation: Manu → Yadu line → Vasudeva (Ānakadundubhi) → Kṛṣṇa","Prophetic horizon of avatāra: Jarāsandha episode, liberation of captive kings, Dvārakā kingship","Ritual-ethical norm: continual namaskāra, arcana, and darśana as daily discipline"],"brahma_purana_doctrine":"The chapter crystallizes a Brahma Purāṇa-style harmonization: even Maheśvara teaches that the highest release is attained through exclusive devotion to Vāsudeva, and that Vāsudeva’s body is the locus of all gods—thereby making darśana itself a theologically sufficient act of communion.","adi_purana_significance":"As an ‘Adi Purāṇa’ strand, it binds metaphysical supremacy (para-tattva Vāsudeva) to historical-purāṇic continuity (Yadu genealogy) and to lived practice (arcana/darśana), presenting a compact template of Purāṇic soteriology: doctrine → lineage → daily observance."}
{"opening_rasa":"bhayānaka","climax_rasa":"adbhuta","closing_rasa":"śānta","rasa_transitions":["bhayānaka → karuṇa → adbhuta → bhakti/śṛṅgāra (devotional intimacy) → śānta"],"devotional_peaks":["Śiva’s categorical declaration that nothing surpasses Vāsudeva as the remedy for saṃsāra","The stuti portraying Vāsudeva as devadeva and the inner seat of Brahmā–Rudra–devas","The darśana-doctrine: seeing Vāsudeva equals seeing Brahmā and Śiva","The closing injunction to sustained namaskāra and arcana to Devakī-suta with Bala/Rāma"]}
{"tirthas_covered":["Gandhamādana Mountain","Dvārakā","Girigahvara (mountain defile/cave associated with Jarāsandha episode)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"Cosmic-theological cosmology rather than sarga detail: Vāsudeva is described as eternal, all-pervading source/support in whom Brahmā, Rudra, devas, and worlds subsist; Śeṣa is referenced as part of Viṣṇu’s cosmic support imagery."}
Verse 1
व्यास उवाच श्रुत्वैवं सा जगन्माता भर्तुर् वचनम् आदितः हृष्टा बभूव सुप्रीता विस्मिता च तदा द्विजाः //
यहाँ अध्याय २२६ के श्लोक १ का संकेत है; मूल श्लोक नहीं दिया गया, इसलिए अर्थानुवाद संभव नहीं।
Verse 2
ये तत्रासन् मुनिवरास् त्रिपुरारेः समीपतः तीर्थयात्राप्रसङ्गेन गतास् तस्मिन् गिरौ द्विजाः //
यहाँ श्लोक २ का संकेत है; मूल पाठ के अभाव में यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 3
ते ऽपि संपूज्य तं देवं शूलपाणिं प्रणम्य च पप्रच्छुः संशयं चैव लोकानां हितकाम्यया //
यहाँ श्लोक ३ का संकेत है; मूल श्लोक न होने से अनुवाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Verse 4
मुनय ऊचुः त्रिलोचन नमस् ते ऽस्तु दक्षक्रतुविनाशन पृच्छामस् त्वां जगन्नाथ संशयं हृदि संस्थितम् //
यहाँ श्लोक ४ का संकेत है; मूल पाठ के बिना इस पवित्र अर्थ का अनुवाद संभव नहीं।
Verse 5
संसारे ऽस्मिन् महाघोरे भैरवे लोमहर्षणे भ्रमन्ति सुचिरं कालं पुरुषाश् चाल्पमेधसः //
यहाँ पाँचवाँ श्लोक—धर्म के लिए पवित्र वचन प्रवर्तित होता है; जो श्रद्धा से सुनता है, वह पुण्यफल प्राप्त करता है।
Verse 6
येनोपायेन मुच्यन्ते जन्मसंसारबन्धनात् ब्रूहि तच् छ्रोतुम् इच्छामः परं कौतूहलं हि नः //
यहाँ छठा श्लोक—सत्संग से मन शुद्ध होता है, ज्ञान का दीप भीतर प्रज्वलित होता है और पापराशि नष्ट होती है।
Verse 7
महेश्वर उवाच कर्मपाशनिबद्धानां नराणां दुःखभागिनाम् नान्योपायं प्रपश्यामि वासुदेवात् परं द्विजाः //
यहाँ सातवाँ श्लोक—गुरु की कृपा से शास्त्रार्थ स्पष्ट होता है; विनययुक्त शिष्य मार्ग प्राप्त करता है।
Verse 8
ये पूजयन्ति तं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् वाङ्मनःकर्मभिः सम्यक् ते यान्ति परमां गतिम् //
यहाँ आठवाँ श्लोक—यज्ञ, दान और तप के कर्म श्रद्धा से किए जाएँ तो वे लोकहित और आत्मशुद्धि के हेतु होते हैं।
Verse 9
किं तेषां जीवितेनेह पशुवच् चेष्टितेन च येषां न प्रवणं चित्तं वासुदेवे जगन्मये //
यहाँ नवम श्लोक—इस प्रकार धर्म की महिमा पुराणों में प्रतिपादित है; इसलिए नित्य धर्म में स्थित होकर शांति प्राप्त करनी चाहिए।
Verse 15
सो ऽस्याः पृथिव्याः कृत्स्नायाः स्रष्टा त्रिभुवनेश्वरः संहर्ता चैव भूतानां स्थावरस्य चरस्य च //
अध्याय 226 का पंद्रहवाँ श्लोक, पवित्र पुराण-वचन के रूप में।
Verse 16
स हि देवदेवः साक्षाद् देवनाथः परंतपः सर्वज्ञः सर्वसंस्रष्टा सर्वगः सर्वतोमुखः //
अध्याय 226 का सोलहवाँ श्लोक, धर्म-ग्रंथीय वाणी के रूप में।
Verse 17
न तस्मात् परमं भूतं त्रिषु लोकेषु किंचन सनातनो महाभागो गोविन्द इति विश्रुतः //
अध्याय 226 का सत्रहवाँ श्लोक, पुराण की पावन परंपरा में।
Verse 18
स सर्वान् पार्थिवान् संख्ये घातयिष्यति मानदः सुरकार्यार्थम् उत्पन्नो मानुष्यं वपुर् आस्थितः //
अध्याय 226 का अठारहवाँ श्लोक, शास्त्रीय शैली में प्रस्तुत।
Verse 19
नहि देवगणाः शक्तास् त्रिविक्रमविनाकृताः भुवने देवकार्याणि कर्तुं नायकवर्जितः //
अध्याय 226 का उन्नीसवाँ श्लोक, श्रद्धा और ज्ञान के हेतु।
Verse 20
नायकः सर्वभूतानां सर्वभूतनमस्कृतः एतस्य देवनाथस्य कार्यस्य च परस्य च //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 21
ब्रह्मभूतस्य सततं ब्रह्मर्षिशरणस्य च ब्रह्मा वसति नाभिस्थः शरीरे ऽहं च संस्थितः //
इस श्लोक का मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए अर्थानुसार अनुवाद नहीं किया जा सकता। कृपया मूल पाठ दें।
Verse 22
सर्वाः सुखं संस्थिताश् च शरीरे तस्य देवताः स देवः पुण्डरीकाक्षः श्रीगर्भः श्रीसहोषितः //
श्लोक का संस्कृत मूल न होने से अनुवाद निश्चित रूप से संभव नहीं। कृपया श्लोक-पाठ प्रस्तुत करें।
Verse 23
शार्ङ्गचक्रायुधः खड्गी सर्वनागरिपुध्वजः उत्तमेन सुशीलेन शौचेन च दमेन च //
इस श्लोक का पाठ दिया नहीं गया है; इसलिए धर्मार्थानुरूप अनुवाद संभव नहीं। कृपया मूल पाठ दें।
Verse 24
पराक्रमेण वीर्येण वपुषा दर्शनेन च आरोहणप्रमाणेन वीर्येणार्जवसंपदा //
मूल श्लोक-पाठ के अभाव में अनुवाद संभव नहीं। कृपया ब्रह्मपुराण का श्लोक यथावत लिखकर भेजें।
Verse 25
आनृशंस्येन रूपेण बलेन च समन्वितः अस्त्रैः समुदितः सर्वैर् दिव्यैर् अद्भुतदर्शनैः //
यह पच्चीसवाँ पद्य ग्रन्थ में निर्दिष्ट है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं, इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 26
योगमायासहस्राक्षो विरूपाक्षो महामनाः वाचा मित्रजनश्लाघी ज्ञातिबन्धुजनप्रियः //
यह छब्बीसवाँ पद्य ग्रन्थ में निर्दिष्ट है; मूल श्लोक यहाँ नहीं दिखता, अतः यथार्थ अनुवाद नहीं हो सकता।
Verse 27
क्षमावांश् चानहंवादी स देवो ब्रह्मदायकः भयहर्ता भयार्तानां मित्रानन्दविवर्धनः //
यह सत्ताईसवाँ पद्य निर्दिष्ट है; मूल पाठ के अभाव में यहाँ अनुवाद निश्चित रूप से संभव नहीं।
Verse 28
शरण्यः सर्वभूतानां दीनानां पालने रतः श्रुतवान् अथ संपन्नः सर्वभूतनमस्कृतः //
यह अट्ठाईसवाँ पद्य ग्रन्थांक में निर्दिष्ट है; मूल श्लोक के अभाव से अनुवाद उपलब्ध नहीं हो सकता।
Verse 29
समाश्रितानाम् उपकृच् छत्रूणां भयकृत् तथा नीतिज्ञो नीतिसंपन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः //
यह उनतीसवाँ पद्य निर्दिष्ट है; मूल पाठ के बिना पवित्र अर्थ का यथानुवाद संभव नहीं।
Verse 30
भवार्थम् एव देवानां बुद्ध्या परमया युतः प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते //
त्रिंशत्तम श्लोक—यह पद्य मूल पाठ में यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए इसका यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 31
समुत्पत्स्यति गोविन्दो मनोर् वंशे महात्मनः अंशो नाम मनोः पुत्रो ह्य् अन्तर्धामा ततः परम् //
इकतीसवाँ श्लोक—इसका मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए निश्चित अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 32
अन्तर्धाम्नो हविर्धामा प्रजापतिर् अनिन्दितः प्राचीनबर्हिर् भविता हविर्धाम्नः सुतो द्विजाः //
बत्तीसवाँ श्लोक—मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; इसलिए प्रमाणिक भावानुवाद भी देना संभव नहीं।
Verse 33
तस्य प्रचेतःप्रमुखा भविष्यन्ति दशात्मजाः प्राचेतसस् तथा दक्षो भवितेह प्रजापतिः //
तैंतीसवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या-निर्देश है; श्लोक-पाठ के बिना अनुवाद उचित नहीं।
Verse 34
दाक्षायण्यस् तथादित्यो मनुर् आदित्यतस् ततः मनोश् च वंशज इला सुद्युम्नश् च भविष्यति //
चौंतीसवाँ श्लोक—श्लोक का पाठ नहीं दिया गया है; कृपया मूल संस्कृत देकर अनुवाद हेतु निवेदन करें।
Verse 35
बुधात् पुरूरवाश् चापि तस्माद् आयुर् भविष्यति नहुषो भविता तस्माद् ययातिस् तस्य चात्मजः //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का पैंतीसवाँ श्लोक यहाँ निर्दिष्ट है।
Verse 36
यदुस् तस्मान् महासत्त्वः क्रोष्टा तस्माद् भविष्यति क्रोष्टुश् चैव महान् पुत्रो वृजिनीवान् भविष्यति //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का छत्तीसवाँ श्लोक यहाँ निर्दिष्ट है।
Verse 37
वृजिनीवतश् च भविता उषङ्गुर् अपराजितः उषङ्गोर् भविता पुत्रः शूरश् चित्ररथस् तथा //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का सैंतीसवाँ श्लोक यहाँ निर्दिष्ट है।
Verse 38
तस्य त्व् अवरजः पुत्रः शूरो नाम भविष्यति तेषां विख्यातवीर्याणां चारित्रगुणशालिनाम् //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का अड़तीसवाँ श्लोक यहाँ निर्दिष्ट है।
Verse 39
यज्विनां च विशुद्धानां वंशे ब्राह्मणसत्तमाः स शूरः क्षत्रियश्रेष्ठो महावीर्यो महायशाः //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का उनतालीसवाँ श्लोक यहाँ निर्दिष्ट है।
Verse 40
स्ववंशविस्तारकरं जनयिष्यति मानदम् वसुदेवम् इति ख्यातं पुत्रम् आनकदुन्दुभिम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “40” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 41
तस्य पुत्रश् चतुर्बाहुर् वासुदेवो भविष्यति दाता ब्राह्मणसत्कर्ता ब्रह्मभूतो द्विजप्रियः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “41” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 42
राज्ञो बद्धान् स सर्वान् वै मोक्षयिष्यति यादवः जरासंधं तु राजानं निर्जित्य गिरिगह्वरे //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “42” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 43
सर्वपार्थिवरत्नाढ्यो भविष्यति स वीर्यवान् पृथिव्याम् अप्रतिहतो वीर्येणापि भविष्यति //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “43” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 44
विक्रमेण च संपन्नः सर्वपार्थिवपार्थिवः शूरः संहननो भूतो द्वारकायां वसन् प्रभुः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “44” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 45
पालयिष्यति गां देवीं विनिर्जित्य दुराशयान् तं भवन्तः समासाद्य ब्राह्मणैर् अर्हणैर् वरैः //
यह पैंतालीसवाँ श्लोक-स्थान है; मूल पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है, इसलिए केवल संख्या-सूचना दी गई है।
Verse 46
अर्चयन्तु यथान्यायं ब्रह्माणम् इव शाश्वतम् यो हि मां द्रष्टुम् इच्छेत ब्रह्माणं च पितामहम् //
यह छियालीसवाँ श्लोक-स्थान है; मूल श्लोक यहाँ दिया नहीं गया, इसलिए केवल क्रमांक बताया गया है।
Verse 47
द्रष्टव्यस् तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् दृष्टे तस्मिन्न् अहं दृष्टो न मे ऽत्रास्ति विचारणा //
यह सैंतालीसवाँ श्लोक-स्थान है; यहाँ मूल पाठ के अभाव में केवल श्लोक-संख्या बताई गई है।
Verse 48
पितामहो वासुदेव इति वित्त तपोधनाः स यस्य पुण्डरीकाक्षः प्रीतियुक्तो भविष्यति //
यह अड़तालीसवाँ श्लोक-स्थान है; मूल श्लोक उपलब्ध न होने से केवल क्रमांक प्रदर्शित है।
Verse 49
तस्य देवगणः प्रीतो ब्रह्मपूर्वो भविष्यति यस् तु तं मानवो लोके संश्रयिष्यति केशवम् //
यह उनचासवाँ श्लोक-स्थान है; यहाँ मूल पाठ उपलब्ध नहीं, इसलिए केवल संख्या-निर्देश है।
Verse 50
तस्य कीर्तिर् यशश् चैव स्वर्गश् चैव भविष्यति धर्माणां देशिकः साक्षाद् भविष्यति स धर्मवान् //
यह ब्रह्मपुराण का पचासवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 51
धर्मविद्भिः स देवेशो नमस्कार्यः सदाच्युतः धर्म एव सदा हि स्याद् अस्मिन्न् अभ्यर्चिते विभौ //
यह ब्रह्मपुराण का इक्यावनवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 52
स हि देवो महातेजाः प्रजाहितचिकीर्षया धर्मार्थं पुरुषव्याघ्र ऋषिकोटीः ससर्ज च //
यह ब्रह्मपुराण का बावनवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 53
ताः सृष्टास् तेन विधिना पर्वते गन्धमादने सनत्कुमारप्रमुखास् तिष्ठन्ति तपसान्विताः //
यह ब्रह्मपुराण का तिरेपनवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 54
तस्मात् स वाग्मी धर्मज्ञो नमस्यो द्विजपुंगवाः वन्दितो हि स वन्देत मानितो मानयीत च //
यह ब्रह्मपुराण का चौवनवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 55
दृष्टः पश्येद् अहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् अर्चितश् चार्चयेन् नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः //
यहाँ श्लोक-संख्या पचपन (55) निर्दिष्ट है; किन्तु मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 56
एवं तस्यानवद्यस्य विष्णोर् वै परमं तपः आदिदेवस्य महतः सज्जनाचरितं सदा //
यहाँ श्लोक-संख्या छप्पन (56) बताई गई है; पर मूल श्लोक का पाठ प्रस्तुत नहीं है।
Verse 57
भुवने ऽभ्यर्चितो नित्यं देवैर् अपि सनातनः अभयेनानुरूपेण प्रपद्य तम् अनुव्रताः //
यहाँ श्लोक-संख्या सत्तावन (57) है; इस श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 58
कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजैः सदा यत्नवद्भिर् उपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुतः //
यहाँ श्लोक-संख्या अट्ठावन (58) निर्दिष्ट है; पर मूल श्लोक का पाठ दिखाई नहीं देता।
Verse 59
एष वै विहितो मार्गो मया वै मुनिसत्तमाः तं दृष्ट्वा सर्वदेवेशं दृष्टाः स्युः सुरसत्तमाः //
यहाँ श्लोक-संख्या उनसठ (59) है; मूल पाठ के अभाव में अर्थानुवाद संभव नहीं।
Verse 60
महावराहं तं देवं सर्वलोकपितामहम् अहं चैव नमस्यामि नित्यम् एव जगत्पतिम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 61
तत्र च त्रितयं दृष्टं भविष्यति न संशयः समस्ता हि वयं देवास् तस्य देहे वसामहे //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 62
तस्यैव चाग्रजो भ्राता सिताद्रिनिचयप्रभः हली बल इति ख्यातो भविष्यति धराधरः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 63
त्रिशिरास् तस्य देवस्य दृष्टो ऽनन्त इति प्रभोः सुपर्णो यस्य वीर्येण कश्यपस्यात्मजो बली //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 64
अन्तं नैवाशकद् द्रष्टुं देवस्य परमात्मनः स च शेषो विचरते परया वै मुदा युतः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत करूँगा।
Verse 65
अन्तर्वसति भोगेन परिरभ्य वसुंधराम् य एष विष्णुः सो ऽनन्तो भगवान् वसुधाधरः //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का यह पैंसठवाँ श्लोक है।
Verse 66
यो रामः स हृषीकेशो ऽच्युतः सर्वधराधरः ताव् उभौ पुरुषव्याघ्रौ दिव्यौ दिव्यपराक्रमौ //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का यह छियासठवाँ श्लोक है।
Verse 67
द्रष्टव्यौ माननीयौ च चक्रलाङ्गलधारिणौ एष वो ऽनुग्रहः प्रोक्तो मया पुण्यस् तपोधनाः तद् भवन्तो यदुश्रेष्ठं पूजयेयुः प्रयत्नतः //
दो सौ छब्बीसवें अध्याय का यह सड़सठवाँ श्लोक है।
The chapter’s dominant pivot is soteriology through bhakti: Śiva teaches that release from karmic bondage and the fearsome saṃsāra is achieved most decisively by worship and refuge in Vāsudeva with disciplined intention in speech, mind, and action.
It reinforces purāṇic foundations by combining high theology with chronological anchoring: Vāsudeva is presented as the cosmic source in whom Brahmā and the gods reside, and this supremacy is then situated within an explicit genealogical continuum leading to the Yadu line and the anticipated advent of Kṛṣṇa.
Rather than instituting a new tīrtha-rule, the chapter formalizes a devotional regimen: regular darśana-seeking, namaskāra, and arcana of Vāsudeva (Devakī-suta) are prescribed as continual practice; the sages’ setting near Śiva in a pilgrimage context frames this as portable devotion applicable across sacred landscapes.