ये पूजयन्ति तं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् वाङ्मनःकर्मभिः सम्यक् ते यान्ति परमां गतिम् //
यहाँ आठवाँ श्लोक—यज्ञ, दान और तप के कर्म श्रद्धा से किए जाएँ तो वे लोकहित और आत्मशुद्धि के हेतु होते हैं।