द्रष्टव्यस् तेन भगवान् वासुदेवः प्रतापवान् दृष्टे तस्मिन्न् अहं दृष्टो न मे ऽत्रास्ति विचारणा //
यह सैंतालीसवाँ श्लोक-स्थान है; यहाँ मूल पाठ के अभाव में केवल श्लोक-संख्या बताई गई है।