येनोपायेन मुच्यन्ते जन्मसंसारबन्धनात् ब्रूहि तच् छ्रोतुम् इच्छामः परं कौतूहलं हि नः //
यहाँ छठा श्लोक—सत्संग से मन शुद्ध होता है, ज्ञान का दीप भीतर प्रज्वलित होता है और पापराशि नष्ट होती है।