समाश्रितानाम् उपकृच् छत्रूणां भयकृत् तथा नीतिज्ञो नीतिसंपन्नो ब्रह्मवादी जितेन्द्रियः //
यह उनतीसवाँ पद्य निर्दिष्ट है; मूल पाठ के बिना पवित्र अर्थ का यथानुवाद संभव नहीं।