भवार्थम् एव देवानां बुद्ध्या परमया युतः प्राजापत्ये शुभे मार्गे मानवे धर्मसंस्कृते //
त्रिंशत्तम श्लोक—यह पद्य मूल पाठ में यहाँ उपलब्ध नहीं है; इसलिए इसका यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।