महेश्वर उवाच कर्मपाशनिबद्धानां नराणां दुःखभागिनाम् नान्योपायं प्रपश्यामि वासुदेवात् परं द्विजाः //
यहाँ सातवाँ श्लोक—गुरु की कृपा से शास्त्रार्थ स्पष्ट होता है; विनययुक्त शिष्य मार्ग प्राप्त करता है।