भुवने ऽभ्यर्चितो नित्यं देवैर् अपि सनातनः अभयेनानुरूपेण प्रपद्य तम् अनुव्रताः //
यहाँ श्लोक-संख्या सत्तावन (57) है; इस श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है।