दृष्टः पश्येद् अहरहः संश्रितः प्रतिसंश्रयेत् अर्चितश् चार्चयेन् नित्यं स देवो द्विजसत्तमाः //
यहाँ श्लोक-संख्या पचपन (55) निर्दिष्ट है; किन्तु मूल संस्कृत-पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है।