Adhyaya 169
Shanti ParvaAdhyaya 16955 Verses

Adhyaya 169

मृत्यु-काल-प्रबोधनम् (Instruction on Mortality, Time, and Truth) — Mahābhārata, Śānti-parva 169

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Didactic Dialogue on Time, Death, and Truth (Chapter 169 Context)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what constitutes śreyas (the highest good) as time advances in a world tending toward dissolution. Bhīṣma replies by presenting an ancient dialogue between a Veda-studying father and his discerning son, Medhāvī. The son challenges the father’s deferred life-plan—study, household rites, progeny, and eventual forest life—by arguing that the world is ‘struck by death’ and ‘surrounded by aging,’ while days and nights continuously fall away. He warns that death arrives while desires remain unfulfilled and while one is absorbed in tasks, property, and familial maintenance. The discourse urges immediate pursuit of what is truly beneficial, emphasizing that death does not wait for completion of plans. It then identifies ethical and contemplative anchors: ahiṃsā in thought, speech, and body; satya as non-abandonable; equanimity; restraint; abandonment of passion and anger; and an inward search for the self rather than reliance on wealth, relations, or social roles. Bhīṣma closes by stating that the father adopted the son’s counsel and advises Yudhiṣṭhira to live devoted to truth and dharma.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, शोक-शान्ति के बीच, भीष्म से पूछते हैं—“सौम्य स्वभाव वाले मनुष्य कैसे होते हैं, किनके साथ प्रेम करना चाहिए, और कौन वर्तमान व भविष्य—दोनों में क्षमा के योग्य हैं?” → भीष्म मित्रता की कसौटी रखते हैं: जहाँ सुहृद खड़े हों वहाँ धन-सम्बन्धी भी तुच्छ हो जाते हैं; फिर वे विपरीत स्वभावों की सूची खोलते हैं—अल्प अपकार पर भी क्रुद्ध होने वाले, अज्ञान से किए गए अपराध को भी न क्षमने वाले, मित्रों में कार्य-साधक बनकर भीतर से द्वेष रखने वाले, लोभी-कपटी-धर्मत्यागी—ऐसे जन मित्रता को भीतर से खोखला कर देते हैं। → भीष्म ‘सत्सुहृद’ का उज्ज्वल प्रतिमान सामने रखते हैं—कृतज्ञ, लोभवर्जित, मधुर भाषी, सत्यसंध, जितेन्द्रिय, दृढ़बुद्धि; जिनके लिए लोष्ट और काञ्चन समान हैं, जो अभिमान त्यागकर सृष्टि-हित में चलते हैं—यही वह क्षण है जहाँ मित्र-धर्म का सार एक वाक्य-चित्र बनकर उभरता है। → युधिष्ठिर ‘मित्रद्रोही’ और ‘कृतघ्न’ के लक्षण विस्तार से जानना चाहते हैं; भीष्म कृतघ्नोपाख्यान की ओर संकेत करते हुए बताते हैं कि संगति मनुष्य को ढाल देती है—जैसे गौतम डाकुओं के सम्पर्क में रहकर धीरे-धीरे वैसा ही बन गया; अतः मित्रता का चयन और कृतज्ञता का पालन ही आपद्धर्म में भी रक्षा-कवच है। → भीष्म द्वारा संकेतित कृतघ्नोपाख्यान (गौतम-डाकू-संगति) का आगे का निर्णायक प्रसंग—कृतघ्नता का फल और उससे उबरने का उपाय—अभी खुलना शेष रहता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पड़ुजगीताविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६७ ॥/ ऑपन--माजल बछ। अल अष्ट षष्ट्यांधेिकशततमोब<& ध्याय: मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ कुरूणां प्रीतिवर्धन । प्रश्न॑ कज्चित्‌ प्रवक्ष्यामि तन्मे व्याख्यातुमरहसि,युधिष्ठिरने कहा--कौरवकुलकी प्रीति बढ़ानेवाले महाज्ञानी पितामह! मैं कुछ और प्रश्न आपके सामने उपस्थित कर रहा हूँ। मेरे उन प्रश्नोंका विवेचन कीजिये

Yudhishthira said: “O Grandfather, supremely wise one, who increases the harmony and affection of the Kuru line—I shall pose another question. Please be pleased to explain it to me.”

Verse 2

कीदृशा मानवा: सौम्या: कै: प्रीति: परमा भवेत्‌ । आयत्यां च तदात्वे च के क्षमास्तान्‌ वदस्व मे,सौम्य स्वभावके मनुष्य कैसे होते हैं? किनके साथ प्रेम करना उत्तम होता है? वर्तमान और भविष्यमें कौन-से मनुष्य उपकार करनेमें समर्थ होते हैं? उन सबका मुझसे वर्णन कीजिये

“What are gentle and good-natured people like? With whom is it best to place one’s highest affection? And in the present and in the future, what kind of people are capable of doing good and giving help? Tell me of them all.”

Verse 3

नहि तत्र धनं स्फीतं न च सम्बन्धिबान्धवा: । तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम,मेरी तो यह धारणा है कि जिस स्थानपर सुहृद्‌ खड़े होते हैं वहाँ न तो प्रचुर धन काम दे सकता है और न सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव ही ठहर सकते हैं

“This is my conviction: where true well-wishers take their stand, neither abundant wealth nor even one’s relatives and kinsmen can truly remain or avail.”

Verse 4

दुर्लभो हि सुहृच्छोता दुर्लभश्न हितः सुहृत्‌ । एतद्‌ धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्व व्याख्यातुमरहसि

Yudhishthira said: “Rare indeed is a friend who truly listens, and rare as well is a well-wishing friend who speaks what is beneficial. O best among the upholders of dharma, you are worthy to explain all this to me in full.”

Verse 5

हितकी बात सुननेवाला सुहृद्‌ दुर्लभ है तथा हितकारी सुहृद्‌ भी दुर्लभ ही है। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! इन सब प्रश्नोंका आप विशद विवेचन कीजिये ।। भीष्म उवाच संधेयान्‌ पुरुषान्‌ राजन्नसंधेयांश्व॒ तत्त्वतः । वदतो मे निबोध त्वं निखिलेन युधिषप्ठिर,भीष्मजीने कहा--राजा युधिष्ठिर! किनके साथ संधि (मित्रता) करनी चाहिये और किनके साथ नहीं? यह बात मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता रहा हूँ। तुम सब कुछ ध्यान देकर सुनो

Bhishma said: “O King Yudhishthira, listen attentively as I explain in full, and in accordance with the truth of the matter, which kinds of people are fit to be approached for alliance and reconciliation, and which kinds are not. In matters of friendship and treaty, discernment is itself a form of dharma, for the wrong bond can endanger both righteousness and the realm.”

Verse 6

लुब्ध: क्रूरस्त्यक्तरर्मा निकृति: शठ एव च | क्षुद्र पापसमाचार: सर्वशड्की तथालस:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: “One who is greedy and cruel, who has abandoned dharma, who is deceitful and treacherous; who is petty-minded, habituated to sinful conduct, suspicious of everyone, and lazy—such a person is unfit for alliance. A man who constantly looks for others’ faults is likewise not worthy of making a pact with. Now I shall describe those who are fit for alliance; listen.”

Verse 7

दीर्घसूत्रो5नृजु: क्रुष्टो गुरुदारप्रधर्षक: । व्यसने यः परित्यागी दुरात्मा निरपत्रप:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: “One who is dilatory and procrastinating, crooked and not straightforward, harsh by nature, and who violates the sanctity of the teacher’s wife; who abandons others in times of calamity; who is wicked and shameless—such a person is unfit for alliance.”

Verse 8

सर्वतः पापदर्शी च नास्तिको वेदनिन्दक: । सम्प्रकीर्णेन्द्रियो लोके यः काम॑ निरतश्चरेत्‌,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhīṣma said: “One should never enter into an alliance with a man whose gaze is fixed on sin in every direction—an unbeliever who reviles the Veda—who lets his senses run loose and roams the world driven by desire. Such a person, lacking restraint and reverence, becomes unreliable in friendship and dangerous in agreement; therefore he is unfit for any pact. Likewise, one who is always hunting for others’ faults is not worthy of alliance. Now I shall describe those who are fit for alliance—listen.”

Verse 9

असत्यो लोकविद्धिष्ट: समये चानवस्थित: । पिशुनो5थाकृतप्रज्ञो मत्सरी पापनिश्चय:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: “One should never enter into an alliance with a man who is untruthful, hated by the world, and unreliable in times of need—who is a slanderer, devoid of sound judgment, envious, and fixed in sinful resolve. With such a man, no pact should ever be made; nor with one who is always hunting for others’ faults. Now I shall describe those who are fit for alliance—listen.”

Verse 10

दुःशीलो5थाकृतात्मा च नृशंस: कितवस्तथा । मित्रैरपकृतिर्नित्यमिच्छते<र्थ परस्य य:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhīṣma said: “One who is ill-mannered and undisciplined, cruel and treacherous, a gambler, who constantly harms his friends and is ever eager to seize another’s wealth—such a person should never be entered into alliance with. Likewise, one who habitually searches for others’ faults is unfit for pact-making. Now I shall describe those who are fit for alliance; listen.”

Verse 11

ददतश्न यथाशक्ति यो न तुष्यति मन्दधी: । अधीैर्यमपि यो युद्धक्ते सदा मित्र नरर्षभ,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: O bull among men, one who, even when given to according to one’s capacity, remains dissatisfied—being of dull understanding—and who continually injects impatience and loss of composure into a friendship, is not fit to be bound by alliance. Such a person’s nature is to corrode trust: he is never content with fair help, and he unsettles even well-wishing friends; therefore one should avoid making a pact with him and with those who habitually look for faults in others. Now I shall describe those who are worthy of alliance—listen.

Verse 12

अस्थानक्रोधनो<्युक्तो यश्चाकस्माद्‌ विरुध्यते । सुहृदश्चैव कल्याणानाशु त्यजति किल्बिषी,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: One who becomes angry without cause, who is irrational, who suddenly turns hostile for no reason, and who—being sinful—quickly abandons even well-wishing friends who seek his good: with such a person one should not enter into alliance. Bhishma is describing the moral and practical signs of an untrustworthy nature, warning that friendship or treaty with such a person collapses in crisis and becomes a source of harm rather than protection.

Verse 13

अल्पेडप्यपकृते मूढस्तथाज्ञानात्‌ कृतेडपि च । कार्यसेवी च मित्रेषु मित्रद्धेषी नराधिप,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: “O king, one should never enter into an alliance with a person who, even when the harm done is slight, becomes deluded and hostile, and who, even when a fault is committed in ignorance, still bears malice. Such a man serves friends only for his own ends, yet in truth hates them. (Indeed, one should avoid making peace with those of greedy, cruel, deceitful, irreligious, suspicious, lazy, treacherous, slanderous, ungrateful, violent, and faithless character—who abandon companions in danger, revile the Vedas, indulge the senses, break promises, and seek others’ faults.) One who is intent on finding flaws in others is also unfit for alliance. Now I shall describe those who are fit for alliance—listen.”

Verse 14

शन्रुमित्रमुखो यश्व जिद्ठाप्रेक्षी विलोचन: । न विरज्यति कल्याणे यस्त्यजेत्‌ तादृशं॑ नरम्‌,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: One who wears the face of a friend while being an enemy within—whose eyes and tongue are ever watchful for faults—does not truly delight in another’s welfare. Such a man should be abandoned. Indeed, one should never enter into alliance with a person who is greedy, cruel, a renouncer of dharma, deceitful, hypocritical, petty-minded, sinful in conduct, suspicious of all, lazy, procrastinating, crooked, blameworthy, an adulterer with the teacher’s wife, one who deserts in times of crisis, wicked, shameless, of sin-stained vision, an unbeliever, a reviler of the Vedas, one who lets the senses roam at will, a liar, hated by all, unsteady in vows, a slanderer, impure in intellect, envious, of sinful thoughts and vicious nature, uncontrolled in mind, ruthless, crafty, a backbiter of friends, ever coveting others’ wealth, never satisfied even when given according to one’s capacity, dull-witted, one who constantly unsettles a friend’s patience, careless, prone to untimely anger, one who suddenly turns hostile and quickly abandons even beneficent well-wishers, one who harms a friend over even a slight unintended offense, a sinner who keeps friendships only for advantage, a true hater of friends who speaks of friendship while harboring enmity, one who looks with crooked and perverse vision, one who abandons even a steadfast benefactor, a drunkard, hateful, wrathful, merciless, oppressive, a betrayer of friends, intent on harming living beings, ungrateful, and base. One should also not ally with a person who hunts for others’ flaws. Now I shall describe those fit for alliance—listen.

Verse 15

पानपो द्वेषण: क्रोधी निर्घण: परुषस्तथा । परोपतापी मित्रश्चुक्‌ तथा प्राणिवधे रत:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: One should never enter into an alliance with a person who is addicted to drink, driven by hatred, quick to anger, devoid of compassion, harsh in speech, intent on tormenting others, treacherous to friends, and devoted to the killing of living beings. Such a character corrodes trust and turns even well-wishers into victims; therefore, peace or pact with him is unsafe. Likewise, one who constantly searches for others’ faults is also unfit for alliance. Now I shall describe those who are fit to be allied with—listen.

Verse 16

कृतघ्नश्लाधमो लोके न संधेय: कदाचन । छिद्रान्वेषी हसंधेय: संधेयानपि मे शूणु,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन्‍्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्‌में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात्‌ विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो

Bhishma said: “In this world, a man who is ungrateful and of the basest disposition should never be entered into alliance with—at any time. Likewise, one who is always hunting for others’ faults is not fit for alliance. Now listen from me about those who are fit to be allied with.”

Verse 17

कुलीना वाक्यसम्पन्ना ज्ञानविज्ञानकोविदा: । रूपवन्तो गुणोपेतास्तथा5लुब्धा जितश्रमा:,जो कुलीन, बोलनेमें समर्थ, ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, रूपवानू, गुणवान्‌ू, लोभहीन, काम करनेसे कभी न थकनेवाले, अच्छे मित्रोंसे सम्पन्न, कृतज्ञ, सर्वज्ञ, लोभसे दूर रहनेवाले, मधुरस्वभाववाले, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा व्यायामशील, उत्तम कुलकी संतान, अपने कुलका भार वहन करनेमें समर्थ, दोषशून्य तथा लोकमें विख्यात हों--ऐसे मनुष्योंको राजा अपना मित्र बनावे

Bhishma said: A king should choose as friends those men who are of noble lineage and accomplished in speech; who are skilled in knowledge and practical discernment; who are handsome and endowed with virtues; who are free from greed and unwearied in effort. Such companions—upright, capable, and reputable—support the king’s dharma by offering trustworthy counsel, steady service, and moral restraint rather than self-serving gain.

Verse 18

सम्समित्राश्न कृतज्ञाश्च सर्वज्ञा लोभवर्जिता: । माधुर्यगुणसम्पन्ना: सत्यसंधा जितेन्द्रिया:,जो कुलीन, बोलनेमें समर्थ, ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, रूपवानू, गुणवान्‌ू, लोभहीन, काम करनेसे कभी न थकनेवाले, अच्छे मित्रोंसे सम्पन्न, कृतज्ञ, सर्वज्ञ, लोभसे दूर रहनेवाले, मधुरस्वभाववाले, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा व्यायामशील, उत्तम कुलकी संतान, अपने कुलका भार वहन करनेमें समर्थ, दोषशून्य तथा लोकमें विख्यात हों--ऐसे मनुष्योंको राजा अपना मित्र बनावे

Bhīṣma said: A king should choose as friends those men who are well-endowed with good companions, grateful, and broadly knowledgeable; who are free from greed; who possess sweetness of disposition and refined virtues; who are steadfast in truth and firm in their vows; and who have conquered their senses. Such people—of good conduct and reputation—become reliable supports for righteous kingship and the stability of the realm.

Verse 19

व्यायामशीला सततं कुलपुत्रा: कुलोद्वहा: । दोषै: प्रमुक्ता: प्रथितास्ते ग्राह्मा: पार्थिवैर्नरा:,जो कुलीन, बोलनेमें समर्थ, ज्ञान-विज्ञानमें कुशल, रूपवानू, गुणवान्‌ू, लोभहीन, काम करनेसे कभी न थकनेवाले, अच्छे मित्रोंसे सम्पन्न, कृतज्ञ, सर्वज्ञ, लोभसे दूर रहनेवाले, मधुरस्वभाववाले, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा व्यायामशील, उत्तम कुलकी संतान, अपने कुलका भार वहन करनेमें समर्थ, दोषशून्य तथा लोकमें विख्यात हों--ऐसे मनुष्योंको राजा अपना मित्र बनावे

Bhishma said: “Kings should take into close association those men who are ever devoted to disciplined exertion, born of good families and capable of upholding their lineage; who are free from faults and renowned among people. Such men—steadfast, competent, and publicly respected—are fit to be accepted as allies and friends in the work of righteous governance.”

Verse 20

यथाशक्ति समाचारा: सम्प्रतुष्यन्ति हि प्रभो । नास्थाने क्रोधवन्तश्न न चाकस्माद्‌ विरागिण: । विरक्ताश्न न दुष्यन्ति मनसाप्यर्थकोविदा:

Bhishma said: “O lord, people become content when conduct is practiced according to one’s capacity. The wise are not wrathful without cause, nor do they become suddenly indifferent. Those who are detached and discerning in matters do not fall into fault—even in their minds.”

Verse 21

आत्मानं पीडयित्वापि सुहृत्कार्यपरायणा: । विरज्यन्ति न मित्रेभ्यो वासो रक्तमिवाविकम्‌

Bhīṣma said: Even when they must afflict themselves, those devoted to accomplishing a friend’s welfare do not turn away from their friends—just as a woollen cloth does not lose the dye that has soaked into it.

Verse 22

क्रोधाच्च लोभमोहाभ्यां नानर्थे युवतीषु च । न दर्शयन्ति सुहृदो विश्वस्ता धर्मवत्सला:

Bhishma said: Trusted friends who are devoted to dharma do not expose one to harm—whether it arises from anger, from greed and delusion, or from entanglement with young women.

Verse 23

लोष्टकाज्चनतुल्यार्था: सुहृत्सु दृढबुद्धय: । ये चरन्त्यभिमानानि सृष्टार्थमनुषज्धिण:

Bhīṣma said: Those steadfast in understanding, who regard a clod of earth and gold as of equal worth, remain firm and well-disposed among friends. They move through life without clinging to self-importance, living in accordance with the purpose for which beings are set in the world—free from possessiveness and pride.

Verse 24

संगृह्नन्तः परिजन स्वाम्यर्थपरमा: सदा । ईदृशै: पुरुषश्रेष्ठैर्य: संधि कुरुते नृप:

Bhīṣma said: Those who keep their dependants and followers united are always devoted above all to their lord’s interest. A king who makes an alliance with such excellent men secures a compact grounded in loyalty and steadfast support.

Verse 25

तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव । प्रभो! जो अपनी शक्तिके अनुसार कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करते और संतुष्ट रहते हैं, जिन्हें बेमौके क्रोध नहीं आता, जो अकस्मात्‌ स्नेहका त्याग नहीं करते, जो उदासीन हो जानेपर भी मनसे कभी बुराई नहीं चाहते, अर्थके तत्त्वको समझते हैं और अपनेको कष्टमें डालकर भी हितैषी पुरुषोंका कार्य सिद्ध करते हैं। जैसे रैगा हुआ ऊनी कपड़ा अपने रंग नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जो मित्रकी ओरसे विरक्त नहीं होते हैं, जो क्रोधवश मित्रका अनर्थ करनेमें प्रवृत्त नहीं होते हैं तथा लोभ और मोहके वशीभूत हो मित्रकी युवतियोंपर अपनी आसक्ति नहीं दिखाते, जो मित्रके विश्वासपात्र और धर्मके प्रति अनुरक्त हैं, जिनकी दृष्टिमें मिट्टीका ढेला और सोना दोनों एक-से हैं, जो सदा सुहृदोंके प्रति सुस्थिर बुद्धि रखनेवाले हैं, सबके लिये प्रमाणभूत शास्त्रोंके अनुसार चलते हैं और प्रारब्धवश प्राप्त हुए धनमें ही संतुष्ट रहते हैं, जो कुट॒म्बका संग्रह रखते हुए सदा अपने सुहृद्‌ एवं स्वामीके कार्य-साधनमें तत्पर रहते हैं--ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ जो राजा संधि (मेल) करता है, उसका राज्य उसी तरह बढ़ता है, जैसे चन्द्रमाकी चाँदनी || २०-२४ $ ।। शास्त्रनित्या जितक्रोधा बलवन्तो रणे सदा

Bhishma said: The kingdom of that king expands and spreads out—like the moonlight of the lord of the planets (the Moon). In ethical context, the verse praises a ruler who forms alliance with truly excellent men: when a king joins himself to steadfast, disciplined, trustworthy, dharma-aligned companions, his sovereignty naturally grows, just as moonlight steadily fills the night sky.

Verse 26

ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ,निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न। वे मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं। ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये। यह सबका निश्चय है

Bhishma said: “O blameless king, among all the men I have described as tainted with faults, the lowest is the ungrateful. Such a person may even go so far as to kill his friends. Therefore, those vile men of corrupt conduct should be abandoned from a distance. This is the settled conviction of all.”

Verse 27

तेषामप्यधमा राजन्‌ कृतघ्ना मित्रघातका: । त्यक्तव्यास्तु दुराचारा: सर्वेषामिति निश्चय:,निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न। वे मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं। ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये। यह सबका निश्चय है

Bhishma said: “O King, even among those blameworthy people, the lowest are the ungrateful—those who can go so far as to slay their own friends. Such wicked, ill-conducted men should be abandoned from afar; this is the settled conviction of all.”

Verse 28

युधिछिर उवाच विस्तरेणाथ सम्बन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । मित्रद्रोही कृतघ्नश्न यः प्रोक्तस्तद्‌ वदस्व मे,युधिष्ठिरने कहा--पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका यथार्थ इतिहास क्‍या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे बताइये

Yudhishthira said: “Grandfather, I wish to hear in full detail, in accordance with the truth, about the one you have called a betrayer of friends and an ungrateful man. Tell me of him, I pray.”

Verse 29

भीष्म उवाच हन्त ते वर्तयिष्येडहमितिहासं पुरातनम्‌ । उदीच्यां दिशि यद्‌ वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप,भीष्मजीने कहा--नरेश्वर! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें एक पुराना इतिहास बता रहा हूँ। यह घटना उत्तरदिशामें म्लेच्छोंके देशमें घटित हुई थी

Bhishma said: “Come, I shall recount to you an ancient traditionary tale. O lord of men, it concerns an event that occurred in the northern quarter, among the Mlecchas.”

Verse 30

ब्राह्मणो मध्यदेशीय: कश्रिद्‌ वै ब्रह्मवर्जित: । ग्रामं वृद्धियुतं वीक्ष्य प्राविशद्‌ भैक्ष्यकांक्षया,मध्यदेशका एक ब्राह्मण, जिसने वेद बिलकुल नहीं पढ़ा था, कोई सम्पन्न गाँव देखकर उसमें भीख माँगनेके लिये गया

Bhishma said: “A certain Brahmin from the Madhyadesha, though devoid of Vedic learning, saw a prosperous village and entered it with the intention of seeking alms.”

Verse 31

तत्र दस्युर्धनयुत: सर्ववर्णविशेषवित्‌ । ब्रह्मण्य: सत्यसंधश्न दाने च निरतो5भवत्‌,उस गाँवमें एक धनी डाकू रहता था, जो समस्त वर्णोकी विशेषताका जानकार था। उसके ह्ृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति थी। वह सत्यप्रतिज्ञ और दानी था

There lived a wealthy dāsyu, a bandit who understood the distinctive duties and traits of all the varṇas. Yet he was devoted to the Brahmins, steadfast in truth, faithful to his vows, and ever engaged in giving.

Verse 32

तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत । प्रतिश्रयं च वासार्थ भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम्‌,ब्राह्मणने उसीके घर जाकर भिक्षाके लिये याचना की। दस्युने ब्राह्मणको रहनेके लिये एक घर देकर वर्षभर निर्वाह करनेके योग्य अन्नकी भिक्षाका प्रबन्ध कर दिया, उपयुक्त नया वस्त्र दिया और उसकी सेवामें एक युवती दासी भी दे दी, जो उस समय पतिसे रहित थी

When his provisions were exhausted, he went to beg for alms. He asked as well for a shelter to live in, and for alms sufficient to maintain him for an entire year.

Verse 33

प्रादात्‌ तस्मै स विप्राय वस्त्र च सदृशं॑ नवम्‌ । नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रां विरहितां तथा,ब्राह्मणने उसीके घर जाकर भिक्षाके लिये याचना की। दस्युने ब्राह्मणको रहनेके लिये एक घर देकर वर्षभर निर्वाह करनेके योग्य अन्नकी भिक्षाका प्रबन्ध कर दिया, उपयुक्त नया वस्त्र दिया और उसकी सेवामें एक युवती दासी भी दे दी, जो उस समय पतिसे रहित थी

He gave that brahmin a suitable new garment, and also provided a woman of mature age who at that time was without a husband.

Verse 34

एतत्‌ सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्यो: सर्व द्विजस्तथा । तस्मिन्‌ गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतम:,राजन! दस्युसे ये सारी वस्तुएँ पाकर ब्राह्मण मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ; और उस सुन्दर गृहमें दासीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा

O King, having obtained all those things from the dāsyu, the brahmin became inwardly delighted. And in that excellent house, Gautama lived in enjoyment together with her.

Verse 35

कुट॒म्बार्थ च दास्याश्व साहाय्यं चाप्पयथाकरोत्‌ । तत्रावसत्‌ स वर्षीश्ष समृद्धे शबरालये,वह दासीके कुटुम्बके लिये कुछ सहायता भी करने लगा। ब्राह्मणने भीलके उस समृद्धिशाली भवनमें अनेक वर्षोतक निवास किया

And for the sake of that household he also began to render assistance as needed—helping with the servant and the horse. There he lived for many years, in the prosperous dwelling of the Śabara, the forest-dweller.

Verse 36

बाणवेधे परं यत्नमकरोच्चैव गौतम: । चक्राड्रानू स च नित्यं वै सर्वतो वनगोचरान्‌,उसका नाम गौतम था। उसने बाण चलाकर लक्ष्य बेधनेका वहाँ बड़े यत्नके साथ अभ्यास किया। राजन! गौतम भी दस्युओंकी तरह प्रतिदिन जंगलमें सब ओर घूम-फिरकर हंसोंका शिकार करने लगा। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था। उसमें दया नहीं थी। वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था

Bhīṣma said: “Gautama exerted himself intensely in the practice of archery, striving for excellence in striking the mark. Then, roaming daily through the forest in every direction like a marauder, he took to hunting—becoming skilled in violence, devoid of compassion, and ever intent on taking the lives of creatures.”

Verse 37

जघान गौतमो राजन्‌ यथा दस्युगणास्तथा । हिंसापटर्घणाहीन: सदा प्राणिवधे रत:,उसका नाम गौतम था। उसने बाण चलाकर लक्ष्य बेधनेका वहाँ बड़े यत्नके साथ अभ्यास किया। राजन! गौतम भी दस्युओंकी तरह प्रतिदिन जंगलमें सब ओर घूम-फिरकर हंसोंका शिकार करने लगा। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था। उसमें दया नहीं थी। वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था

Bhīṣma said: “O King, Gautama killed living beings just as bands of robbers do. Devoid of any restraint against violence, he was ever intent on the slaughter of creatures.”

Verse 38

गौतम: संनिकर्षेण दस्युभि: समतामियात्‌ | तथा तु वसतस्तस्य दस्युग्रामे सुखं तदा

Bhīṣma said: “By close association with the bandits, Gautama came to resemble them. And while he lived among them in the robbers’ village, he even experienced comfort there for a time.”

Verse 39

तत: कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागत:,तदनन्तर एक दिन कोई दूसरा ब्राह्मण उस गाँवमें आया जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था। वह स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी, नियमके अनुकूल भोजन करनेवाला, ब्राह्मणभक्त तथा वेदोंका पारज्गत विद्वान्‌ था

Bhishma said: Then, at one time, another brahmin arrived in that region. Wearing matted locks, bark garments, and a deerskin, he was devoted to Vedic study, pure and disciplined, humble in conduct, and one who ate only in accordance with prescribed restraints. He was devoted to brahmins and a learned scholar who had mastered the Vedas.

Verse 40

जटाचीराजिनधर: स्वाध्यायपरम: शुचि: । विनीतो नियताहारो ब्रह्माण्यो वेदपारग:,तदनन्तर एक दिन कोई दूसरा ब्राह्मण उस गाँवमें आया जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था। वह स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी, नियमके अनुकूल भोजन करनेवाला, ब्राह्मणभक्त तथा वेदोंका पारज्गत विद्वान्‌ था

Bhishma said: “He wore matted locks, bark-garments, and a deer-skin. Devoted above all to sacred study, pure in conduct, humble, and restrained in his food, he was reverent toward Brahmins and had mastered the Vedas.”

Verse 41

स ब्रह्मचारी तद्देश्य: सखा तस्यैव सुप्रिय: । त॑ दस्युग्राममगमद्‌ यत्रासौ गौतमो5वसत्‌,वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण गौतमके ही गाँवका निवासी तथा उसका परमप्रिय मित्र था और घूमता हुआ डाकुओंके उसी गाँवमें जा पहुँचा था, जहाँ गौतम निवास करता था

Bhīṣma said: “That brahmacārin was a native of the same region and the dearest friend of Gautama. While wandering, he came to the very village of the bandits where Gautama was residing.”

Verse 42

सतु विप्रगृहान्वेषी शूद्रान्नपरिवर्जक: । ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत्‌ सर्वतोदिशम्‌,वह शूद्रका अन्न नहीं खाता था; इसलिये दस्युओंसे भरे हुए उस गाँवमें ब्राह्मणके घरकी तलाश करता हुआ सब ओर घूमने लगा

But he, refusing to partake of food obtained from Śūdras, went about in every direction through a village crowded with bandits, searching for the house of a Brāhmaṇa.

Verse 43

ततः स गौतमगहं प्रविवेश द्विजोत्तम: । गौतमश्नापि सम्प्राप्तस्तावन्योन्येन संगतौ,घूमता-घामता वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतमके घरपर गया, इतनेहीमें गौतम भी शिकारसे लौटकर वहाँ आ पहुँचा। उन दोनोंकी एक-दूसरेसे भेंट हुई

Then that eminent Brahmin entered Gautama’s house. At that very time Gautama too arrived there, having returned from the hunt, and the two encountered one another face to face.

Verse 44

चक्राड्रभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम्‌ । रुधिरेणावसिक्ताड़ुं गृहद्वारमुपागतम्‌,ब्राह्मणने देखा, गौतमके कंधेपर मारे गये हंसकी लाश है, हाथमें धनुष और बाण है, सारा शरीर रक्तसे सींच उठा है, घरके दरवाजेपर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षसके समान जान पड़ता है; और ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुका है। उसे इस अवस्थामें घरपर आया देख ब्राह्मणने पहचान लिया। पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले --

Bhīṣma said: “He came to the very door of the house—his shoulder burdened as though with a wheel and a mountain, bow in hand and weapons grasped, his limbs drenched in blood. In that condition he looked like a man-eating rākṣasa, and as one who had fallen away from the status and conduct of a brāhmaṇa. Seeing him arrive at the house in such a state, the brāhmaṇa recognized him; and, recognizing him, they were overcome with shame and addressed him thus.”

Verse 45

त॑ दृष्टवा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षयागतम्‌ | अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत्‌,ब्राह्मणने देखा, गौतमके कंधेपर मारे गये हंसकी लाश है, हाथमें धनुष और बाण है, सारा शरीर रक्तसे सींच उठा है, घरके दरवाजेपर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षसके समान जान पड़ता है; और ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुका है। उसे इस अवस्थामें घरपर आया देख ब्राह्मणने पहचान लिया। पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले --

Bhīṣma said: Seeing him—looking like a man-eater, ruined and brought to utter decline—the brāhmaṇa recognized him. Ashamed, he then addressed him with these words.

Verse 46

किमिदं कुरुषे मोहाद्‌ विप्रस्त्वं हि कुलोद्वह: । मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गत: कथम्‌,“अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेशका विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था। यहाँ डाकू कैसे बन गया?

Bhishma said: “What is this you are doing out of delusion? You are a brahmin, indeed an ornament of your lineage—well known in the Madhyadeśa. How, then, have you fallen into the condition of a bandit?”

Verse 47

पूर्वान्‌ समर द्विज ज्ञातीन्‌ प्रख्यातान्‌ वेदपारगान्‌ । तेषां वंशेडभिजातस्त्वमीदृश: कुलपांसन:,“ब्रह्म! अपने पूर्वजोंको तो याद कर। उनकी कितनी ख्याति थी। वे कैसे वेदोंके पारड्गत विद्वान थे और तू उन्हींके वंशमें पैदा होकर ऐसा कुलकलड्क निकला

Bhīṣma said: “O brāhmaṇa, remember your forefathers—your renowned kinsmen who had mastered the Vedas. Born in their lineage, you have turned out like this: a disgrace that soils the honor of the family.”

Verse 48

अवबुध्यात्मना55त्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम्‌ । अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज,“अब भी तो अपने-आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे”

Bhīṣma said: “Awaken to your true self through inner understanding. Remember the virtues befitting a twice-born—steadfast goodness, noble conduct, sacred learning, self-restraint, and compassion—and, keeping these in mind, abandon this dwelling.”

Verse 49

स एवमुक्त: सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा । प्रत्युवाच ततो राजन्‌ विनिश्चित्य तदार्तवत्‌,राजन! अपने उस हितैषी सुहृदके इस प्रकार कहनेपर गौतम मन-ही-मन कुछ निश्चय करके आर्त-सा होकर बोला--

Thus addressed there by that well-wishing friend, he then replied, O King—having inwardly come to a firm decision, yet speaking as one distressed.

Verse 50

निर्धनो5स्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम्‌ । वित्तार्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम,द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेदको भी नहीं जानता; अतः द्विजप्रवर! मुझे धन कमानेके लिये इधर आया हुआ समझें

He said: “O best of twice-born brāhmaṇas, I am poor, and I am not even a knower of the Vedas. Know me to have come here for the sake of earning wealth, O foremost among the twice-born.”

Verse 51

त्वद्दर्शनात्‌ तु विप्रेन्द्र कृतार्थो 5स्म्यद्य वै द्विज । आवां हि सह यास्याव: श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम्‌,“विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। ब्रह्म! अब रातभर यहीं रहिये, कल खबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे”

Bhīṣma said: “O best of Brāhmaṇas, by seeing you today I feel my purpose fulfilled. O twice-born one, stay here for this night; tomorrow at daybreak we shall go together.”

Verse 52

स तत्र न्यवसद्‌ विप्रो घृणी किज्चिदसंस्पृशन्‌ | क्षुधितश्छन्द्यमानो5पि भोजनं नाभ्यनन्दत,वह ब्राह्मण दयालु था। गौतमके अनुरोधसे उसके यहाँ ठहर गया, किंतु वहाँकी किसी भी वस्तुको हाथसे छूआ भी नहीं। यद्यपि वह भूखा था और भोजन करनेके लिये गौतमद्वारा उससे बड़ी अनुनय-विनय की गई तो भी किसी तरह वहाँका अन्न ग्रहण करना उसने स्वीकार नहीं किया

Bhishma said: The compassionate brahmin stayed there, yet he did not touch anything at that place. Though he was hungry and was repeatedly urged to eat, he still did not consent to accept the food there—signaling a deliberate ethical restraint rather than mere lack of appetite.

Verse 168

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने अष्टषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघध्नका उपाख्यानविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Śānti Parva—specifically in the section on dharma in times of distress (Āpaddharma Parva)—the chapter known as the “Episode of the Ungrateful” concludes here as the 168th chapter. The narrative frame signals closure and emphasizes the ethical warning against ingratitude, especially when moral choices are tested under hardship.

Verse 253

जन्मशीलगुणोपेता: संधेया: पुरुषोत्तमा: | जो प्रतिदिन शास्त्रोंका स्वाध्याय करते हैं, क्रोधको काबूमें रखते हैं और युद्धमें सदा प्रबल रहते हैं। जिनका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है, जो शीलवान्‌ और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनानेके योग्य होते हैं

Those born in a noble line, endowed with good conduct and excellent virtues, are the superior men fit to be made friends. They who daily pursue the study of the śāstras, keep anger under control, and are ever strong in battle—only such eminent persons are worthy of friendship.

Verse 386

अगमन्‌ बहवो मासा निधघ्नत: पक्षिणो बहून्‌ डाकुओंके सम्पर्कमें रहनेसे गौतम भी उनके ही समान पूरा डाकू बन गया। डाकुओंके गाँवमें सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन बहुत-से पक्षियोंका शिकार करते हुए उसके कई महीने बीत गये

Bhishma said: Many months passed as he kept killing numerous birds. By living in the company of bandits, even Gautama became entirely like them—a complete robber. Residing comfortably in the bandits’ village and hunting many birds day after day, he let several months slip by. The episode underscores how sustained association shapes character and conduct, and how ease and habit can normalize violence and adharma.

Frequently Asked Questions

Whether one should defer the ‘highest good’ to a later life-stage (after social and ritual goals) when death is uncertain and time is continuously diminishing.

Do what is truly beneficial immediately: cultivate truthfulness, non-injury, restraint, and detachment, because mortality interrupts incomplete projects and unfulfilled desires.

Yes: Bhīṣma reports that the father adopted the son’s counsel and directly enjoins Yudhiṣṭhira to follow the same orientation—be steadfast in satya and dharma—thereby converting exemplar narrative into practical royal guidance.