Mahabharata Adhyaya 191
Drona ParvaAdhyaya 19180 Versesपांडव पक्ष का दबाव बढ़ता हुआ; द्रोण पर घेरा कसता है, पर दुर्योधन का प्रतिरोध तीव्र है।

Adhyaya 191

Chapter Arc: धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य के साथ उलझे हुए हैं, पर दुःशासन के तीखे बाण उनके रथ को छेदते हुए आते हैं—और क्रोध की ज्वाला अचानक दिशा बदल देती है। → दुःशासन के प्रहारों से पीड़ित धृष्टद्युम्न प्रतिशोध में दुर्योधन के घोड़ों पर बाण-वर्षा करते हैं; दुःशासन शरजाल से दबकर सामने टिक नहीं पाता। इसी बीच रणभूमि के दूसरे छोर पर सात्यकि और दुर्योधन के बीच क्षत्रिय-धर्म, युद्ध-नीति और क्रोध-लोभ की तीखी वाक्-प्रतिवाक् के साथ शस्त्र-प्रतिशस्त्र का संग्राम उठ खड़ा होता है। → हाथी और सिंह के समान क्रुद्ध होकर मधुवंशी सात्यकि और कुरुवंशी दुर्योधन का घोर द्वंद्व छिड़ता है; दुर्योधन हँसते हुए कान तक धनुष खींचकर तीस तीखे बाणों से सात्यकि को बेधता है, और युद्ध का ताप चरम पर पहुँचता है। → भीमसेन कर्ण के साथ घोर युद्ध में प्रवृत्त होते हैं; उधर पांचालों की तीखी बाण-वर्षा और भीमसेन आदि के घेराव से द्रोणाचार्य पर दबाव बढ़ता है—कौरव पक्ष की रक्षा-रेखा कई मोर्चों पर एक साथ खिंच जाती है। → द्रोण पर बढ़ता घेरा और दुर्योधन–सात्यकि का उग्र द्वंद्व अगले क्षण किस ओर पलटेगा—क्या द्रोण निकलेंगे, या पांडवों का दबाव निर्णायक बनेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं।) ऑपन-आ प्रात बछ। अर: 2 एकोननवर्त्याधेकशततमो< ध्याय: धृष्टद्युम्नका दुःशासनको हराकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण

قال سنجيا: «أيها الملك، وبينما كانت تلك المعركة تتكشف—حاملةً المقتلة في الفيلة والخيل والرجال—اشتَبَكَ دُهشاسَنَةُ مع دِهريشتاديومنَة في قتال.»

Verse 2

स तु रुक्मरथासक्तो दुःशासनशरार्दित: । अमर्षात्‌ तव पुत्रस्य शरैर्वाहानवाकिरत्‌

قال سنجيا: لكنه، وقد اشتدّ عليه الضغط وهو يشتبك مع المحارب ذي العربة الذهبية، وأصيب بسهام دُهشاسَنَة، لم يطق ذلك. فاندفع غضبًا فأمطر خيلَ ابنِك بوابلٍ من النبال—فعلٌ ينقل العنف من الخصم إلى وسيلة الحركة، كاشفًا كيف أنّ السخط في الحرب كثيرًا ما يبتغي الغلبة بشلّ ما يقوم عليه العدوّ بدل مواجهته وجهًا لوجه.

Verse 3

धृष्टद्युम्न पहले द्रोणाचार्यके साथ उलझे हुए थे, दुःशासनके बाणोंसे पीड़ित होकर उन्होंने आपके पुत्रके घोड़ोंपर रोषपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।

قال سنجيا: أيها الملك، في لحظة واحدة لم يعد يُرى مركب دُهشاسانا الحربي—برايته وسائسه—إذ غطّته غمامة كثيفة من السهام أطلقها دْهريشْتاديومنا، ابن بريصَتة، حتى توارى عن الأنظار.

Verse 4

दुःशासनस्तु राजेन्द्र पाउ्चाल्यस्य महात्मन: । नाशकत्‌ प्रमुखे स्थातुं शरजालप्रपीडित:,राजेन्द्र! महामना धृष्टद्युम्नके बाणसमूहोंसे अत्यन्त पीड़ित हो दुःशासन उनके सामने ठहर न सका

قال سنجيا: أيها الملك، إن دُهشاسانا، وقد أُنهك وأُثقل بشبكة السهام الكثيفة التي أمطره بها أمير البانشالا عظيم النفس، لم يستطع أن يثبت أمامه.

Verse 5

स तु दुःशासनं बाणैर्विमुखीकृत्य पार्षत: । किरन्‌ शरसहस्राणि द्रोणमेवाभ्ययाद्‌ रणे

قال سنجيا: وبعد أن ردَّ دُهشاسانا على أعقابه بسهامه، تقدّم دْهريشْتاديومنا ابن بريصَتة مرةً أخرى في ساحة القتال قاصدًا دْرونا نفسه، وهو يمطره بآلاف النبال.

Verse 6

अभ्यपद्यत हार्दिक्य: कृतवर्मा त्वनन्तरम्‌ । सोदर्याणां त्रयश्चनैव त एनं पर्यवारयन्‌ ६ ।। यह देख हृदिकपुत्र कृतवर्मा तथा दुःशासनके तीन भाई बीचमें आ धमके। वे चारों मिलकर धृष्टद्युम्नको रोकने लगे

قال سنجيا: ثم اندفع هارديكيا كريتافَرما، وتبعه على الفور ثلاثة إخوة أشقاء. فاجتمع الأربعة وأطبقوا عليه، يريدون كبح تقدّمه.

Verse 7

त॑ यमौ पृष्ठतो<न्चैतां रक्षन्तौ पुरुषर्षभौ । द्रोणायाभिमुखं यान्तं दीप्यमानमिवानलम्‌

قال سنجيا: ولمّا رأى التوأمان—ناكولا وسَهَديفا، وهما من خيار الرجال—دْهريشْتاديومنا متّقدًا كالنار يتقدّم مواجهةً دْرونا، تبعاه من خلفه يحميانه.

Verse 8

सम्प्रहारमकुर्वस्ते सर्वे च सुमहारथा: । अमर्षिता: सत्त्ववन्त: कृत्वा मरणमग्रत:,उस समय अमर्षसे भरे हुए उन सभी धैर्यशाली महारथियोंने मृत्युको सामने रखकर परस्पर युद्ध आरम्भ कर दिया

قال سنجيا: عندئذٍ شرع أولئك الفرسان العظام على العربات جميعًا—وقد امتلأت صدورهم بسخطٍ عارم وثبتت قلوبهم على الشجاعة—في هجومٍ متبادل، واضعين الموت أمامهم ثمنًا لعزمهم.

Verse 9

शुद्धात्मान: शुद्धवृत्ता राजन्‌ स्वर्गपुरस्कृता: । आर्य युद्धमकुर्वन्त परस्परजिगीषव:

قال سنجيا: «أيها الملك، كانت قلوبهم طاهرة وسيرتهم نقيّة لا دنس فيها. وقد جعلوا السماء غايتهم الأولى، فهؤلاء النبلاء—وكلٌّ منهم يتوق إلى الغلبة على الآخر—خاضوا قتالًا يليق بالآريين، محكومًا بالأعراف والمواثيق لا بمجرد القسوة».

Verse 10

शुक्लाभिजनकर्माणो मतिमन्तो जनाधिप । धर्मयुद्धमयुध्यन्त प्रेप्सन्तो गतिमुत्तमाम्‌

قال سنجيا: أيها الملك، كان أولئك المحاربون من سلالة طاهرة وأعمالهم بلا دنس؛ لذلك، وقد أوتوا بصيرةً ورشدًا، اندفعوا إلى «حرب الدharma»—الحرب العادلة—طامحين إلى نيل المقام الأعلى.

Verse 11

न तत्रासीदधर्मिष्ठमशस्तं युद्धमेव च । नात्र कर्णी न नालीको न लिप्तो न च बस्तिक:

قال سنجيا: «لم يكن القتال هناك قتالَ ظلمٍ ولا معركةً يُلام عليها. وفي ذلك اللقاء لم تُستعمل karṇī ولا nālīka، ولا السهام الملطخة بالسم، ولا السلاح المسمّى bastika».

Verse 12

न सूची कपिशो नैव न गवास्थिर्गजास्थिज: । इषुरासीन्न संश्लिष्टो न पूतिन्न च जिह्यग:

قال سنجيا: في تلك المعركة لم تُستعمل سهامٌ ذات رؤوس كالإبر، ولا سهامٌ صُنعت من عظم القرد، ولا مما صيغ من عظم البقر أو عظم الفيل؛ ولم تُستخدم سهامٌ مركّبة موصولة، ولا سهامٌ كريهة الرائحة، ولا سهامٌ معوجّة المسار في طيرانها.

Verse 13

ऋजून्येव विशुद्धानि सर्वे शस्त्राण्यधारयन्‌ । सुयुद्धेन परॉललोकानीप्सन्त: कीर्तिमेव च

قال سنجيا: إنّ أولئك المحاربين جميعًا لم يحملوا إلا أسلحةً مستقيمةً طاهرة، يبتغون—بقتالٍ قويمٍ مُحكم—أن ينالوا عوالم أرفع في الآخرة، وأن يظفروا كذلك بمجدٍ باقٍ.

Verse 14

तदा<5<सीत्‌ तुमुल॑ युद्ध सर्वदोषविवर्जितम्‌ । चतुर्णा तव योधानां तैस्त्रिभि: पाण्डवै: सह,आपके चार योद्धाओंका तीन पाण्डववीरोंके साथ जो घमासान युद्ध चल रहा था, वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित था

قال سنجيا: عندئذٍ اندلع قتالٌ صاخب—خالٍ من كل شائبةٍ من شَوائب الجَوْر—بين أربعةٍ من محاربيك وأولئك الأبطال الثلاثة من آل باندافا، وقد التحَموا التحامًا قريبًا.

Verse 15

धृष्टद्युम्नस्तु तान्‌ दृष्टवा तव राजन्‌ रथर्षभान्‌ | यमाभ्यां वारितान्‌ वीरान्‌ शीघ्रास्त्रो द्रोणमभ्ययात्‌

قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى دْهْرِشْتَديومْنَ أولئك الأبطال—كالثيران بين فرسان المركبات—وقد كفّهم التوأمان (ناكولا وسهاديفا)، وهو سريعٌ في إطلاق الأسلحة، اندفع مباشرةً نحو درونا.

Verse 16

निवारितास्तु ते वीरास्तयो: पुरुषसिंहयो: । समसज्जन्त चत्वारो वाता: पर्वतयोरिव,वहाँ रोके गये वे चारों वीर उन दोनों पुरुषसिंह पाण्डवोंके साथ इस प्रकार भिड़ गये मानो चौआई हवा दो पर्वतोंसे टकरा रही हो

قال سنجيا: ومع أنهم كُفّوا، فإن أولئك الأبطال الأربعة دَنَوا والتحموا مع الرجلين، أسدين بين الرجال. وكان اصطدامهم بالباندافا كأربع رياحٍ عاتيةٍ تضرب جبلين.

Verse 17

द्वाभ्यां द्वाभ्यां यमौ सार्थ रथाभ्यां रथपुड़्वौ । समासक्तौ ततो द्रोणं धृष्टद्युम्नो 5 भ्यवर्तत

قال سنجيا: إن التوأمين ناكولا وسهاديفا—وهما من أبرع فرسان المركبات—اشتَبَكا مع مقاتلي الكورافا اثنين اثنين، في قتال المركبات. وفي الأثناء اندفع دْهْرِشْتَديومْنَ إلى الأمام حتى صار وجهًا لوجه مع دروناآتشاريّا.

Verse 18

दृष्टवा द्रोणाय पाज्चाल्यं व्रजन्तं युद्धदुर्मदम्‌ । यमाभ्यां तांश्व संसक्तांस्तदन्तरमुपाद्रवत्‌

قال سنجيا: لما رأى محارب البانچالا يندفع نحو درونا، مخمورًا بجنون المعركة، ولاحظ أولئك المقاتلين وقد اشتبكوا اشتباكًا لصيقًا بين «اليَمَين» التوأمين، أسرع فاقتحم تلك الفُرجة. ويُبرز المشهد كيف تُغتنم الثغرات التكتيكية في لمح البصر، حتى تحت وطأة العبء الأخلاقي للحرب، فيما يُساق المحاربون بالغضب وكبرياء الفروسية.

Verse 19

त॑ सात्यकि: शीघ्रतरं पुनरेवाभ्यवर्तत

قال سنجيا: إن ساتياكي استدار سريعًا مرة أخرى، وعاد فوقف من جديد قبالة دوريودhana. فلما رآه يعود بتلك السرعة، تقارب الاثنان—وهما كالأُسْد بين الرجال في البأس—حتى تلاقيا. دوريودhana من سلالة الكورو، وساتياكي من سلالة المادهافا، إذ التقيا عن قرب، اقتتلا بلا خوف، بل وبابتسامة؛ صورةُ محاربين يرون الخطر في لهيب المعركة امتحانًا للفروسية لا سببًا للتردد.

Verse 20

तौ परस्परमासाद्य समीपे कुरुमाधवौ । हसमानीौ नृशार्दूलावभीतौ समसज्जताम्‌

قال سنجيا: لما تلاقى الكورو والمادهافا—دوريودhana وساتياكي—وجهًا لوجه على مقربة، وهما أسدان بين الرجال، بلا خوف وبابتسامة، اشتبكا في القتال. ويؤكد المشهد شريعة المحارب: أن يلقى الندَّ نِدَّه مواجهةً، مُظهرًا الشجاعة والعزم، حتى في ظلمة العبء الأخلاقي لحربٍ يقتل فيها القريبُ قريبه.

Verse 21

बाल्यवृत्तानि सर्वाणि प्रीयमाणौ विचिन्त्य तौ । अन्योनयं प्रेक्षमाणी च स्मयमानौ पुन: पुन:,बचपनकी सारी बातें याद करके वे दोनों वीर एक-दूसरेकी ओर देखते हुए बारंबार प्रसन्नतापूर्वक मुसकरा उठते थे

قال سنجيا: إذ استعادا بسرورٍ جميعَ وقائع الطفولة، ظلّ البطلان ينظر أحدهما إلى الآخر، ويبتسمان مرارًا بفرح—كأن المودّة القديمة والذكرى المشتركة ارتفعت لحظةً، رغم قسوة الحرب.

Verse 22

अथ दुर्योधनो राजा सात्यकि समभाषत | प्रियं सखायं सतत गर्हयन्‌ वृत्तमात्मन:,तदनन्तर राजा दुर्योधनने अपने बर्तावकी निरन्तर निन्दा करते हुए वहाँ अपने प्रिय सखा सात्यकिसे इस प्रकार कहा--

ثم خاطب الملك دوريودhana ساتياكي. وبينما كان يوبّخ سلوكه هو على الدوام، قال لصديقه الحبيب على هذا النحو—كاشفًا لحظةَ لومٍ للذات وسط ضغوط الحرب والملك.

Verse 23

धिक्‌ क्रोधं धिक्‌ सखे लोभं घिड्मोहं धिगमर्षितम्‌ । धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलमौरसम्‌

قال سنجيا: «تبًّا للغضب يا صديقي؛ تبًّا للطمع؛ تبًّا للوهم؛ تبًّا لتلك السَّخَطة التي لا تعرف الاحتمال. تبًّا لناموس المحارب، وتبًّا كذلك للقوة الفطرية الموروثة.»

Verse 24

यत्र मामभिसंधत्से त्वां चाहं शिनिपुड्भव । त्वं हि प्राणै: प्रियतरो ममाहं च सदा तव

قال سنجيا: «يا سليلَ شِيني، لِمَ تُصوِّب نحوي، ولِمَ أُصوِّب نحوك؟ لقد ساقَنا الغضبُ والطمعُ وما شابههما، فحوّلنا سهامَنا بعضَنا إلى بعض. ومع ذلك كنتَ أحبَّ إليَّ من نفسي، وكنتُ أنا أيضًا موضعَ مودّتك على الدوام.»

Verse 25

स्मरामि तानि सर्वाणि बाल्यवृत्तानि यानि नौ । तानि सर्वाणि जीर्णानि साम्प्रतं नो रणाजिरे

قال سنجيا: «أذكرُ كلَّ ما كان بيننا من شؤون الطفولة—كلَّ عادةٍ وفعلٍ تبادلناه. ولكن الآن، في ساحة القتال هذه، قد بَلِيَتْ تلك المجاملات والروابط القديمة.»

Verse 26

किमन्यत्क्रोधलोभाशभ्यां युद्धमेवाद्य सात्वत । त॑ तथावादिन तत्र सात्यकि: प्रत्यभाषत

قال سنجيا: «وماذا عسى أن يكون غير القتال اليوم—وقد ساقَنا الغضبُ والطمع—يا سَاتْوَتَا؟» فهناك، أجاب ساتْيَكِي من تكلّم بهذا القول.

Verse 27

नेयं सभा राजपुत्र नाचार्यस्य निवेशनम्‌

قال سنجيا: «يا ابنَ الملك، ليست هذه قاعةَ مجلسٍ ملوكي، ولا هي دارَ المعلّم. إنما هي موضعُ حربٍ وخطر؛ فلا تَحسَبْها محكمةَ مشورةٍ ولا حِمىً للعلم.»

Verse 28

दुर्योधन उवाच क्व सा क्रीडा गतास्माकं बाल्ये वै शिनिपुड़व

قال دُريودَهَنَة: «أين ذهبت تلك المرَحُ الذي كان لنا—ألعابُ الطفولة التي تقاسمناها، يا ثورَ آلِ شِيني؟»

Verse 29

कि नु नो विद्यते कृत्यं धनेन धनलिप्सया

قال دُريودَهَنَة: «أيُّ واجبٍ لنا بقي غير مُنجَز، ونحن مدفوعون بالمال وبالطمع في المال؟»

Verse 30

संजय उवाच त॑ तथावादिन तत्र राजानं माधवो<ब्रवीत्‌

قال سَنجايا: ثم خاطب مَادهافا ذلك الملكَ الذي كان يتكلم على هذا النحو. وأعلن أن هذا هو السُّنَنُ العتيق لطبقة الكشاتريا: ففي ساحة الحرب، إذا اقتضى الواجب، يقاتلون حتى الشيوخ الموقَّرين والمعلّمين. ثم حثّ الملك على أن يعمل بلا إبطاء—فإن كان حقًّا يريد إرضاءه فليضرب في الحال ولا يتردد.

Verse 31

एवंवृत्तं सदा क्षात्रं युध्यन्तीह गुरूनपि । यदि ते<हं प्रियो राजन्‌ जहि मां मा चिरं कृथा:

قال سَنجايا: «يا أيها الملك، هكذا كان على الدوام سُننُ المحارب: هنا يُقاتَل حتى الشيوخُ والمعلّمون. فإن كنتُ عزيزًا عليك، أيها الملك، فاضربني قتيلاً في الحال—ولا تُمهِل.»

Verse 32

त्वत्कृते सुकृताल्लॉँकान्‌ गच्छेयं भरतर्षभ । या ते शक्तिर्बलं यच्च तत्‌ क्षिप्रं मयि दर्शय

«يا ثورَ آلِ بهاراتا، بفضل ما اكتسبتُه من ثوابٍ بخدمتي لك، لعلّي أبلغ العوالم التي تُنال بالأعمال الصالحة. وأيًّا تكن قوتك وبأسك، فأظهرهما لي عاجلاً، في الحال.»

Verse 33

इत्येवं व्यक्तमा भाष्य प्रतिभाष्य च सात्यकि:

قال سنجيا: وبعد أن تكلّم على هذا النحو بوضوح، وردَّ بدوره ردًّا مسؤولًا، مضى ساتياكي يواصل الحديث في الأمر.

Verse 34

तमायान्तं महाबाहें प्रत्यगृह्नलात्‌ तवात्मज:

قال سنجيا: «يا عظيمَ الساعدَين! لما أقبل متقدّمًا تلقّاه ابنُك—لاقى تقدّمه وواجهه وجهًا لوجه.»

Verse 35

ततः प्रववृते युद्ध कुरुमाधवर्सिहयो:

ثم اندلعت المعركة بين الكورو وبطلِ ماذافا، الشبيهِ بالثور في بأسه.

Verse 36

ततः पूर्णायतोत्सूष्टे: सात्वतं युद्धदुर्मदम्‌

قال سنجيا: ثم إنّه من تلك الرمية التي شُدَّت قوسُها إلى أقصاها وأُطلقت بعنف، اندفع بطلُ الساتڤاتا—كأنما سكرَ بحرارة القتال—يمضي قُدمًا في سَورة الحرب.

Verse 37

त॑ सात्यकि: प्रत्यविध्यत्‌ तथैवावाकिरच्छरै:

قال سنجيا: فضربه ساتياكي ردًّا عليه، وعلى النحو نفسه أمطره بالسهام.

Verse 38

पज्चाशता पुनश्चाजौ त्रिंशता दशभिश्न ह | इसी प्रकार सात्यकिने भी युद्धस्थलमें पहले पचास, फिर तीस और फिर दस बाणोंद्वारा दुर्योधनको बींध डाला और उसे भी अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।।

قال سانجيا: في تلك المعركة طعنه مرةً أخرى—أولًا بخمسين سهمًا، ثم بثلاثين، ثم بعشرة. وكان ساتياكي يضحك في خضم القتال، فأمطر ابنك بوابلٍ كثيف من النبال حتى غطّاه بالسهام.

Verse 39

ततो<स्य सशरं चापं क्षुरप्रेण द्विधाच्छिनत्‌

قال سانجيا: ثم شطر قوسه—وهو ما يزال موصولًا بالسهام—إلى قطعتين بسهمٍ حادّ كالموسى. فبادر ساتياكي إلى تناول قوسٍ آخر شديد المتانة، وبحركاتٍ خاطفة أخذ يمطر ابنك بوابلٍ من السهام دون انقطاع.

Verse 40

सोअन्यत्‌ कार्मुकमादाय लघुहस्तस्ततो दृढम्‌ । सात्यकिरव्यसृजच्चापि शरश्रेणीं सुतस्य ते

قال سانجيا: عندئذٍ تناول ساتياكي، السريع اليد، قوسًا آخر شديدًا، وأطلق بسرعةٍ سيلًا متتابعًا من السهام على ابنك.

Verse 41

तामापतन्तीं सहसा शरश्रेणीं जिघांसया । चिच्छेद बहुधा राजा तत उच्चुक्रुशुर्जना:,वधके लिये अपने ऊपर सहसा आती हुई उन बाण पंक्तियोंके राजा दुर्योधनने अनेक टुकड़े कर डाले; इससे सब लोग हर्षध्वनि करने लगे

قال سانجيا: وبنية القتل اندفعت نحوه فجأةً سيلٌ من السهام. فقطّع الملك دوريوذانا ذلك السيل المقبل إلى قطعٍ كثيرة؛ فهتف المحاربون والحاضرون بصيحات الإعجاب العالية.

Verse 42

सात्यकिं च त्रिसप्तत्या पीडयामास वेगित: । स्वर्णपुड्खै: शिलाधौतैराकर्णापूर्णनि:सृतै:

قال سانجيا: ثم اندفع بقوةٍ سريعة يضغط على ساتياكي ضغطًا شديدًا، فأطلق ثلاثًا وسبعين سهمًا—مذهّبة الريش، مصقولة كأنها مُجلّاة بالحجر، ومنطلقة من قوسٍ مُدَّ حتى الأذن.

Verse 43

फिर शिलापर साफ किये हुए सुनहरी पाँखवाले तिहत्तर बाणोंसे, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे, दुर्योधनने वेगपूर्वक सात्यकिको पीड़ित कर दिया ।।

قال سنجيا: ثم إنّ دوريوذانا، وقد شدّ قوسه حتى الأذن، أطلق ثلاثًا وسبعين سهمًا ذات أجنحة من ذهب، مصقولة السُّوق كالحجر؛ فبذلك الرشق الخاطف ضيّق على ساتياكي في ساحة القتال. غير أنّ دوريوذانا لما كان يهيّئ سهمًا آخر ويمسك قوسه على أهبة الإطلاق، بادر ساتياكي فقطع سريعًا—بسهامه—السهمَ الذي كان يُركَّب والقوسَ الذي يحمله، ثم أردف ذلك بأن طعن دوريوذانا بسهام كثيرة فأصابه بجراح.

Verse 44

स गाढविद्धो व्यथित: प्रत्यपायाद्‌ रथान्तरे | दुर्योधनो महाराज दाशाहशरपीडित:,महाराज! उस समय दुर्योधन सात्यकिके बाणोंसे गहरी चोट खाकर पीड़ित एवं व्यथित हो उठा और रथके भीतर चला गया

قال سنجيا: وقد أُصيب دوريوذانا إصابةً غائرة واضطرب من شدة الألم، مُعذَّبًا بسهام ساتياكي، فتراجع وانكفأ إلى داخل عربته الحربية.

Verse 45

समाश्चस्य तु पुत्रस्ते सात्यकिं पुनरभ्ययात्‌ । विसृजन्निषुजालानि युयुधानरथं प्रति,फिर धीरे-धीरे कुछ आराम मिलनेपर आपका पुत्र पुनः सात्यकिपर चढ़ आया और उनके रथपर बाणोंके जाल बिछाने लगा

قال سنجيا: فلما استعاد أنفاسه ورباطة جأشه، عاد ابنك فاندفع نحو ساتياكي من جديد، مُرسِلًا سُحُبًا من السهام كالشِّباك صوب عربة يويودانا.

Verse 46

तथैव सात्यकिर्बाणान्‌ दुर्योधनरथं प्रति । सततं विसृजन्‌ राजंस्तत्‌ संकुलमवर्तत

قال سنجيا: وكذلك، أيها الملك، أخذ ساتياكي يطلق بلا انقطاع وابلًا متصلًا من السهام نحو عربة دوريوذانا. وبذلك التبادل الذي لا ينفصم تحوّل القتال هناك إلى ملحمةٍ متشابكةٍ مكتظّة، قتالٍ قريبٍ شديد الوطأة.

Verse 47

तत्रेषुभि: क्षिप्पमाणै: पतद्धिश्व॒ शरीरिषु । अग्नेरिव महाकक्षे शब्द: समभवन्महान्‌

قال سنجيا: هناك، حين كانت السهام المقذوفة سريعًا تقع على أجساد ذوي الأرواح، ارتفع دويٌّ عظيم، كقعقعة لهيبٍ متأجّج يشتعل في كومة هائلة من القصب وال bamboo اليابس.

Verse 48

तयो: शरसहसैश्न संछन्न॑ं वसुधातलम्‌ | अगम्यरूपं च शरैराकाशं समपद्यत,उन दोनोंके हजारों बाणोंसे पृथ्वी ढक गयी और आकाशगमें भी बाणोंके कारण (पक्षियोंतकका) चलना-फिरना बंद हो गया

قال سنجيا: بآلاف السهام التي أطلقها ذانك الاثنان غُطِّي وجهُ الأرض كلَّه، وأضحى الفضاءُ كذلك مكتظًّا بالنبال حتى صار غيرَ قابلٍ للاجتياز—فلم تعد الطيورُ نفسها تستطيع الحركة فيه.

Verse 49

तत्राप्यधिकमालक्ष्य माधवं रथसत्तमम्‌ | क्षिप्रमभ्यपतत्‌ कर्ण: परीप्संस्तनयं तव

قال سنجيا: حتى هناك، إذ تبيّن كارنا بوضوح ماذافا—أعظمَ فرسان العربة—اندفع مسرعًا إلى الأمام، قاصدًا أن يبلغ ابنك ويصرعه.

Verse 50

उस युद्धमें महारथी सात्यकिको प्रबल होते देख कर्ण आपके पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही बीचमें कूद पड़ा ।।

في تلك المعركة، لما رأى كارنا المَهارَثي ساتياكي يشتدّ بأسُه، قفز سريعًا إلى الوسط حمايةً لابنك. غير أن بهيماسينا شديدَ القوة لم يحتمل ذلك الفعل؛ فانقضّ على كارنا على الفور وهو يطلق وابلًا من سهامٍ كثيرة.

Verse 51

तस्य कर्ण: शितान्‌ बाणान्‌ प्रतिहत्य हसन्निव । धनु: शरांश्व चिच्छेद सूतं चाभ्यहनच्छरै:

قال سنجيا: إن كارنا، كأنه يضحك، صدَّ سهام خصمه الحادّة وأبطلها. ثم قطع القوسَ والسهام، وبوابلٍ من النبال أردى السائقَ أيضًا.

Verse 52

भीमसेनस्तु संक्रुद्धो गदामादाय पाण्डव: । ध्वजं धनुश्न सूतं च सम्ममर्दाहवे रिपो:

قال سنجيا: إن بهيماسينا، الباندفي، وقد استبدّ به الغضب، تناول هراوته، وفي خضمّ المعركة سحق رايةَ العدو وقوسَه وسائقَه أيضًا.

Verse 53

रथचक्रं च कर्णस्य बभञठ्ज स महाबल: । भग्नचक्रे रथेडतिष्ठदकम्प: शैलराडिव,इतना ही नहीं, महाबली भीमने कर्णके रथका एक पहिया भी तोड़ डाला तो भी कर्ण टूटे पहियेवाले उस रथपर गिरिराजके समान अविचलभावसे खड़ा रहा

قال سانجيا: إنَّ بهيما شديدَ البأس حطَّم إحدى عجلات مركبة كارنا. ومع ذلك، حتى وقد انكسرت العجلة، ظلَّ كارنا ثابتًا على مركبته—لا يتزعزع، كملكِ الجبال.

Verse 54

एकचक्रं रथं तस्य तमूहुः सुचिरं हया: । एकचक्रमिवार्कस्य रथं सप्त हया यथा,कर्णके घोड़े उसके एक पहियेवाले रथको बहुत देरतक ढोते रहे, मानो सूर्यके सात अश्व उनके एक चक्रवाले रथको खींच रहे हैं

قال سانجيا: كانت مركبته وقد بقيت بعجلة واحدة تُحمَل زمنًا طويلًا بخيولها—كعربة الشمس ذات العجلة الواحدة التي تجرّها سبعة جياد.

Verse 55

अमृष्यमाण: कर्णस्तु भीमसेनमयुध्यत । विविधैरिषुजालैश्न नानाशस्त्रैश्व संयुगे

قال سانجيا: لم يطق كارنا احتمال بأس بهيماسينا وتحدّيه، فاشتبك معه في القتال. وفي لُجّة المعركة قاتل بشِباكٍ من السهام المتنوّعة وبشتى أصناف السلاح، دافعًا القتال على أرض الحرب بلا هوادة.

Verse 56

भीमसेनस्तु संक़्रुद्ध: सूतपुत्रमयोधयत्‌ । तस्मिंस्तथा वर्तमाने क्रुद्धो धर्मसुतो5ब्रवीत्‌

قال سانجيا: إنَّ بهيماسينا، وقد اشتعل غضبًا، قاتل ابن السُّوتا (كارنا). وبينما كانت تلك المواجهة العنيفة دائرة، تكلّم دارماسوتا (يودهيشثيرا)، وقد اعتراه الغضب هو أيضًا.

Verse 57

ये नः प्राणा: शिरो ये च ये नो योधा महारथा:

قال سانجيا: «أولئك الذين هم أنفاسُ حياتنا، وكأنهم رأسُنا—أولئك الأبطالُ المتقدّمون، عِظامُ فرسانِ المركبات—قد اشتبكوا في القتال مع أبناء دريتاراشترا. فلماذا تقفون هنا كرجالٍ حمقى لا وعي لهم؟»

Verse 58

त एते धार्तराष्ट्रेषु विषक्ता: पुरुषर्षभा: । कि तिष्ठत यथा मूढा: सर्वे विगतचेतस:

قال سنجيا: «أولئك الأبطال، ثيرانُ الرجال—هم حياتُنا وتاجُنا—قد اشتبكوا في القتال مع أبناء دِهْرِتَرَاشْتْرَ. فلماذا تقفون هنا كالمضلَّلين، وقد سُلِب كلُّ واحدٍ منكم عزيمتَه؟»

Verse 59

तत्र गच्छत यज्रैते युध्यन्ते मामका रथा: । क्षात्रधर्म पुरस्कृत्य सर्व एव गतज्वरा:,“वहाँ जाओ, जहाँ ये मेरे सब रथी क्षत्रियधर्मको सामने रखकर निश्चिन्तभावसे युद्ध कर रहे हैं

قال سنجيا: «اذهبوا إلى هناك—حيث يقاتل فرسانُ مركباتي. وقد جعلوا شريعةَ الكشاتريا في المقدّمة، فطرحوا القلق جانبًا وانخرطوا جميعًا في القتال.»

Verse 60

जयन्तो वध्यमानाक्ष गतिमिष्टां गमिष्यथ । जित्वा वा बहुभिर्यज्ञैर्यजध्वं भूरिदक्षिणै:

قال سنجيا: «يا جَيَنْتَ، يا فَدْيَمَانَاكْشَ، ستبلغون الغايةَ المنشودة. أو إن ظفرتم، فأقيموا قرابينَ كثيرةً غزيرةَ العطايا.»

Verse 61

हता वा देवसाद्‌ भूत्वा लोकानू प्राप्स्थथ पुष्कलान्‌ । “तुमलोग विजयी होओ अथवा मारे जाओ

قال سنجيا: «سواءٌ ظفرتم أم قُتِلتم، ففي الحالين تنالون أسمى المصير. فإن غلبتم فاعبدوا الربَّ، يَجْنْيَا-بُرُوشَا (Yajña-Puruṣa)، بقرابينَ كثيرةٍ وافرةِ الدَّكْشِنَا؛ وإن سقطتم صرتم كالأرباب وبلغتم عوالمَ كثيرةَ البرّ.» وهكذا، إذ حثّهم ملكُهم، تهيّأ أولئك الأبطالُ من عظماء فرسان المركبات للقتال.

Verse 62

क्षात्रधर्म पुरस्कृत्य त्वरिता द्रोणमभ्ययु: । राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार प्रेरित हो उन वीर महारथियोंने युद्धके लिये उद्यत होकर क्षत्रियधर्मको सामने रखते हुए बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ।।

وهكذا، إذ حثّهم الملك، جعل أولئك الأبطالُ من عظماء فرسان المركبات شريعةَ الكشاتريا في المقدّمة، وأسرعوا يندفعون لمهاجمة دروناآتشاريّا طلبًا للقتال.

Verse 63

आसंस्तु पाण्डुपुत्राणां त्रयो जिह्मा महारथा:

قال سنجيا: كان في أبناء باندو ثلاثةٌ من عظماء فرسان المركبات ذوي طبعٍ مراوغٍ ومسلكٍ ملتفّ. وهؤلاء الثلاثة—ناكولا وسهاديفا وبهيمسينا—نادَوا أرجونا: «يا أرجونا، أسرِع—أسرِع حالًا—واطرد هؤلاء الكوروڤا بعيدًا عن دروناآچاريا!»

Verse 64

यमौ च भीमसेनश्ष प्राक्रोशंस्ते धनंजयम्‌ । अभिद्रवार्जुन क्षिप्रं कुरून्‌ द्रोणादपानुद

قال سنجيا: نادى ناكولا وسهاديفا، ومعهما بهيمسينا، بصوتٍ عالٍ دهننجايا (أرجونا): «اندفع يا أرجونا—سريعًا! وادفع هؤلاء الكوروڤا بعيدًا عن درونا!»

Verse 65

तत एनं हनिष्यन्ति पठ्चाला हतरक्षिणम्‌ | कौरवेयांस्तत: पार्थ: सहसा समुपाद्रवत्‌,“जब इनके रक्षक मारे जायँगे, तभी पांचाल वीर इन्हें मार सकेंगे।! तब अर्जुनने सहसा कौरवयोद्धाओंपर आक्रमण किया

قال سنجيا: «إنما إذا قُتل حُماتُه أمكن لمحاربي البانچالا أن يقتلوه». فعندئذٍ اندفع بارثا (أرجونا) بعزمٍ خاطف، وهجم سريعًا على مقاتلي الكورو.

Verse 66

पज्चालानेव तु द्रोणो धृष्टद्युम्नपुरोगमान्‌ । ममर्दुस्तरसा वीरा: पठचमे5हनि भारत

قال سنجيا: غير أن درونا اندفع على البانچالا، يتقدّمهم دِهْرِشْتَدْيُومْنَ. يا بهاراتا، في اليوم الخامس من القتال كان الأبطال، مدفوعين بزخمٍ عاصف، يسحق بعضُهم بعضًا ويدوس بعضُهم بعضًا في ازدحام المعركة.

Verse 186

दुर्योधनो महाराज किर|ञष्छोणित भोजनान्‌ । महाराज! रणदुर्मद धृष्टद्युम्नको द्रोणाचार्यकी ओर जाते और अपने दलके उन चारों वीरोंको नकुल-सहदेवके साथ युद्ध करते देख राजा दुर्योधन रक्त पीनेवाले बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनके बीचमें आ धमका

قال سنجيا: أيها الملك العظيم، لما رأى الملك دُريودھانا دِهْرِشْتَدْيُومْنَ، وقد استبدّ به جنونُ المعركة، يتقدّم نحو درونا، ورأى أولئك الأربعة من أبطال جانبه يقاتلون ناكولا وسهاديفا، اندفع إلى وسطهم، يمطرهم بسيلٍ من السهام كأنها تشرب الدم.

Verse 189

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे एकोननवत्यधिकशततमो<ध्याय:

وهكذا، في «المهابهاراتا» الشريفة، ضمن «بارفا درونا»—وخاصة في قسم «مقتل درونا»—تنتهي هنا الفصل الحادي والتسعون بعد المئة، واصفًا القتال المتشابك المضطرب. وهذه الخاتمة تُشير إلى انتقالٍ في السرد، وتُذكِّر السامع بأن نظام الحرب الأخلاقي قد اشتدّ عليه الضغط ومال إلى الفوضى، إذ يتصاعد الصراع حول سقوط درونا.

Verse 263

प्रहसन्‌ विशिखांस्तीक्ष्णानुद्यम्य परमास्त्रवित्‌ । 'सात्वत वीर! आजका यह युद्ध ही क्रोध और लोभके सिवा दूसरा क्या है?” उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता सात्यकिने हँसते हुए तीखे बाणोंको ऊपर उठाकर वहाँ पूर्वोक्त बातें करनेवाले दुर्योधनको इस प्रकार उत्तर दिया--

قال سنجيا: مبتسمًا، رفع العارفُ بالأسلحة العُليا سهامَه الحادّة. وردًّا على دوريوذانا—الذي كان قد قال تلك الكلمات آنفًا—رفع ساتياكي، العارفَ بأجود المقاذيف، نِصالَه القاطعة وأجابه على هذا النحو، متحدّيًا زعمه بأن قتال اليوم ليس إلا غضبًا وطمعًا.

Verse 276

यत्र क्रीडितमस्माभिस्तदा राजन्‌ समागतै: । “राजकुमार! कौरवनरेश! न तो यह सभा है और न आचार्यका घर ही है जहाँ एकत्र होकर हम सब लोग खेला करते थे”

قال سنجيا: «يا ملك، ليست هذه تلك القاعة، ولا بيت المعلّم، حيث كنّا نحن الأمراء نجتمع ونلهو في صحبةٍ مطمئنّة. إن المشهد أمامنا من نظامٍ آخر—نظامٍ غُيِّبت فيه روابط الصبا والقرابة تحت وطأة مطالب القتال والواجب القاسية.»

Verse 283

क्व च युद्धमिदं भूय: “कालो हि दुरतिक्रम:” । दुर्योधन बोला--शिनिप्रवर! हमारा बचपनका वह खेल कहाँ चला गया और फिर यह युद्ध कहाँसे आ धमका? हाय! कालका उल्लंघन करना अत्यन्त ही कठिन है

قال دوريوذانا: «أين مضى لعبُ طفولتنا، ومن أين أقبلت هذه الحرب لتداهمنا من جديد؟ آهٍ—إن كالا (الزمن) لعسيرٌ جدًّا أن يُتجاوز.» وفي خضمّ الخراب أدرك مأساة قتل ذوي القربى أخلاقيًّا، وقوة كالا التي لا تُقاوَم، إذ تسوق الأحداث إلى ما وراء قدرة الإنسان على التحكم.

Verse 293

यत्र युध्यामहे सर्वे धनलो भात्‌ समागता: । हमें धनसे या धन पानेकी इच्छासे क्‍या प्रयोजन है? जो हम सब लोग यहाँ धनके लोभसे एकत्र होकर जूझ रहे हैं

قال دوريوذانا: «ها نحن جميعًا نخوض القتال هنا، وقد اجتمعنا بدافع الطمع في المال.» وفي سياقها تكشف هذه العبارة تآكل الأخلاق في هذا الصراع: إذ تُصوَّر الحرب لا بوصفها واجبًا حقًّا، بل صراعًا تحرّكه الشهوة إلى المكاسب، بما يلمّح إلى التشكيك في مشروعية هذا الدافع أخلاقيًّا.

Verse 326

नेच्छामि तदहं द्रष्टं मित्राणां व्यसनं महत्‌ । “भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे ऐसा करनेपर मैं पुण्यवानोंके लोकोंमें जाऊँगा। तुममें जितनी शक्ति और बल है

قال سنجيا: «لا أريد أن أشهد تلك الكارثة العظمى وهي تحلّ بأصدقائي. فليكن المآل على نحوٍ لا أضطر معه أن أقف متفرّجًا على من أحبّ وهم يُقذفون إلى الهلاك».

Verse 336

अभ्ययात्‌ तूर्णमव्यग्रो दयां नाकुरुतात्मनि । इस प्रकार स्पष्ट बोलकर दुर्योधनकी बातका उत्तर दे सात्यकि निःशंक होकर तुरंत आगे बढ़े, उन्होंने अपने ऊपर दया नहीं दिखायी

قال سنجيا: إن ساتيَكي، غير مضطرب ولا متردد، تقدّم في الحال. وبعد أن أجاب بوضوح على كلام دوريوذَن، لم يُبدِ شفقةً على نفسه—بل آثر الفعل الحازم على الاسترسال في الخوف أو اللين، وسط مقتضيات القتال القائم على الدارما.

Verse 343

शरैश्वावाकिरद्‌ राजन्‌ शैनेयं तनयस्तव । राजन्‌! सामने आते हुए उन महाबाहु सात्यकिको आपके पुत्रने रोका और उन्हें बाणोंसे ढक दिया

قال سنجيا: أيها الملك، إن ابنك أوقف شَيْنَيَة وهو يتقدّم إلى المقدّمة، وأمطره بالسهام حتى غطّى سَاتْيَكي عظيمَ الساعدين بوابلٍ كثيف.

Verse 356

अन्योनयं क्रुद्धयोर्घोरं यथा द्विरद्सिंहयो: । तदनन्तर हाथी और सिंहके समान क्रोधमें भरे हुए उन कुरुवंशी और मधुवंशी सिंहोंमें परस्पर घोर युद्ध होने लगा

قال سنجيا: ثم، كفيلٍ هائجٍ وأسدٍ ضارٍ اشتبكا في قتال، شرع أولئك الأبطال الغاضبون من سلالة الكورو ومن سلالة مَدهو (اليادَفَة) في معركةٍ مروّعةٍ بعضهم مع بعض.

Verse 363

दुर्योधन: प्रत्यविध्यत्‌ कुपितो दशभि: शरै: । तत्पश्चात्‌ कुपित हुए दुर्योधनने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये दस बाणोंद्वारा रणदुर्मद सात्यकिको घायल कर दिया

قال سنجيا: وغضبَ دوريوذَنُ فردَّ الضربة، فطعن خصمه بعشر سهام. وفي زحمة القتال العنيف تجلّت ثورته في رميٍ منضبط بالقوس، فأصاب ساتيَكي—المستغرق في نشوة الحرب—ودفع الصراع إلى الأمام بروح الانتقام لا بروح الكفّ.

Verse 386

आकर्णपूर्णनिशितैर्विव्याध त्रिंशता शरै: । राजन! तब हँसते हुए आपके पुत्रने धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए तीस तीखे बाणोंद्वारा रणभूमिमें सात्यकिको क्षत-विक्षत कर डाला

قال سانجيا: أيها الملك، عندئذٍ ابتسم ابنك، فمدَّ قوسه حتى الأذن وأطلق ثلاثين سهماً حادّاً كالموسى. وبتلك السهام مزّق ساتياكي في ساحة القتال، فأثخنه جراحاً وتركه ممزقاً.

Verse 563

पज्चालानां नरव्याप्रान्‌ मत्स्यांश्व पुरुषर्षभान्‌ । इससे भीमसेन अत्यन्त कुपित हो उठे और सुतपुत्र कर्णके साथ घोर युद्ध करने लगे। इस प्रकार जब वह युद्ध चल रहा था

قال سانجيا: خاطب يودهيشتيرا أبطال البانشالا—أسوداً بين الرجال—ومحاربي الماتسيا—ثيراناً بين الرجال. وبينما كانت المعركة تستعر، اندفع بهيماسينا وقد استبدّ به الغضب فاشتدّ نزالُه مع كارنا؛ وفي تلك اللحظة نفسها تكلّم يودهيشتيرا، ابن الدارما، وهو ممتلئ سخطاً، إلى أولئك الأبطال الشجعان من البانشالا والماتسيا.

Verse 626

भीमसेनपुरोगाश्चाप्पेकत: पर्यवारयन्‌ । एक ओरसे पांचाल वीर तीखे बाणोंसे द्रोणाचार्यको मारने लगे और दूसरी ओरसे भीमसेन आदि वीरोंने उन्हें घेर रखा था

قال سانجيا: وبهيماسينا في المقدّمة، تقدّم المحاربون من جهةٍ فأحاطوا بدروṇa وحاصروه. ومن جهةٍ أخرى كان أبطال البانشالا يطلقون سهاماً حادّة يضغطون بها لقتل دروناتشاريا. وهكذا، في لهيب المعركة، كان دروṇa مُهاجَماً ومُحاصَراً في آنٍ واحد.

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