
Chapter Arc: द्रोण-पर्व के रण में एक विचित्र दृश्य उठता है—म्लेच्छ पाषाणयोधी, पर्वत-से शिलाखण्ड उठाकर, रथों और गजों पर वर्षा करने लगते हैं; और कौरव-सेना के बीच यह प्रश्न गूँजता है कि मृत्यु को सामने देखकर भी धृति कैसे टिकेगी। → कौरव योद्धा अपने ही सैन्य-मध्य में पराजय की लज्जा और क्षात्र-प्रतिष्ठा के भय से काँपते हैं—“सात्यकि युद्ध में कैसे व्यतिक्रान्त हो गया?”—और दूसरी ओर सात्यकि, सिंह की भाँति, द्रोण के निकटवर्ती रण में भीषण वेग से म्लेच्छ-पाषाणयोधियों पर टूट पड़ता है। → सात्यकि का उन्मत्त संहार-प्रवाह—रथसेना, गजसेना, अश्वारोही और दस्यु-म्लेच्छ सबका सर्वथा विनाश; गिरिरूप गजराज धराशायी होते हैं, और भूमि हारों-आभूषणों-वस्त्रों से ऐसी ढँक जाती है मानो आकाश तारागणों से भर गया हो। → कौरवों को यह बोध होता है कि वे प्रस्तरयुद्ध में प्रवीण नहीं; भय-निवारण के लिए पुकार उठती है—“अभिद्रवत, मा भैष्ट, सात्यकि तुम्हें न पा सकेगा”—पर रणभूमि पर सात्यकि की विजय-छाया और शव-शिलाखण्डों का ढेर उनकी बात को खोखला कर देता है। → सात्यकि की इस प्रचण्ड गति को रोकने के लिए कौरव-पक्ष किस महाबली को आगे करेगा—और क्या यह वेग द्रोण-व्यूह के भीतर और गहरे प्रवेश का द्वार बनेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ श्लोक मिलाकर कुल ४८३ “लोक हैं।) फल र (0) आज अत+- एकविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: सात्यकिके द्वारा पाषाणयोधी म्लेच्छोंकी सेनाका संहार और दुःशासनका सेनासहित पलायन धृतराष्ट्र रवाच सम्प्रमृद्य महत् सैन्यं यान्तं शैनेयमर्जुनम् । निर्ह्लीका मम ते पुत्रा: किमकुर्वत संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! मेरी विशाल सेनाको रौंदकर जाते हुए सात्यकि और अर्जुनको देखकर मेरे उन निर्लज्ज पुत्रोंने क्या किया?
持国王说道:“三阇耶,当尸尼之子(萨底耶吉)与阿周那推进之时——一路碾压我那浩大军阵——我那些不知羞耻的儿子们当时做了什么?”
Verse 2
कथं वैषां तदा युद्धे धृतिरासीन्मुमूर्षताम् । शैनेयचरितं दृष्टवा यादृशं सव्यसाचिन:,वे सब-के-सब मरना चाहते थे। उस समय युद्धस्थलमें अर्जुनके समान ही सात्यकिका चरित्र देखकर उनकी कैसी धारणा हुई थी?
三阇耶说道:“在那场战斗中,那些已抱必死之心的人,究竟如何生出坚忍与定力?而当他们目睹尸尼之子(萨底耶吉)的行止与武威——与阿周那(善射者)无异——这又在他们心中激起了怎样的信念与心境?”
Verse 3
कि नु वक्ष्यन्ति ते क्षात्र॑ सैन्यमध्ये पराजिता: । कथं नु सात्यकिर्युद्धे व्यतिक्रान्तो महायशा:,वे सेनाके बीचमें परास्त होकर अपने क्षात्रबलका क्या वर्णन करेंगे? समरांगणमें महायशस्वी सात्यकि किस प्रकार सारी सेनाको लाँचकर आगे बढ़ गये?
三阇耶说道:“那些武士在自家军阵之中便遭击败之后,还能如何谈论他们所夸耀的刹帝利之力?而在战场最密处,声名显赫的萨底耶吉又是怎样冲破阵列,横断全军,继续向前推进的?”
Verse 4
कथं च मम पुत्राणां जीवतां तत्र संजय । शैनेयोडभिययौ युद्धे तन्ममाचक्ष्य संजय,संजय! युद्धस्थलमें मेरे पुत्रोंके जीते-जी शिनिनन्दन सात्यकि किस तरह आगे जा सके? संजय! यह सब मुझे बताओ
三阇耶说道:“当我的儿子们还活在那里的时候,三阇耶啊,尸尼之裔(萨底耶吉)在那场战斗中是如何还能向前推进的?三阇耶啊,把这一切详尽告诉我。”
Verse 5
अत्यद्भुतमिदं तात त्वत्सकाशाच्छूणोम्यहम् । एकस्य बहुभि: सार्ध शत्रुभिस्तैर्महारथै:,तात! यह मैं तुम्हारे मुँहसे अत्यन्त विचित्र बात सुन रहा हूँ कि शत्रुदलके उन बहुसंख्यक महारथियोंके साथ एकमात्र सात्यकिका ऐसा घोर संग्राम हुआ
三阇耶说道:“慈父啊,我从你口中听到一件极其惊异之事:竟有一名战士独自迎战众多敌人——那些伟大的战车勇士,并与之展开惨烈厮杀。”
Verse 6
विपरीतमहं मन्ये मन्दभाग्यं सुतं प्रति । यत्रावध्यन्त समरे सात्वतेन महारथा:,मैं अपने भाग्यहीन पुत्रके लिये सब कुछ विपरीत ही मान रहा हूँ; क्योंकि समरांगणमें अकेले सात्यकिने बहुत-से महारथियोंका वध कर डाला है
三阇耶说道:“为了我那命途不幸的儿子,我只见万事皆与所愿相反;因为在战场上,萨特瓦塔的英雄(萨底耶吉)在交锋中斩杀了许多伟大的战车勇士。”
Verse 7
एकस्य हि न पर्याप्त यत्सैन्यं तस्प संजय । क़ुद्धस्य युयुधानस्य सर्वे तिष्ठन्तु पाण्डवा:,संजय! और सब पाण्डव तो दूर रहें, क्रोधमें भरे हुए अकेले सात्यकिके लिये भी मेरी सारी सेना पर्याप्त नहीं है
三阇耶说道:“三阇耶啊,我所统率的军队,甚至不足以对付那一人——愤怒燃起的优优陀那(萨底耶吉)。让般度五子都退到一旁吧;即便没有他们相助,他一人也足以压过我全军。”
Verse 8
निर्जित्य समरे द्रोणं कृतिनं चित्रयोधिनम् । यथा पशुगणान् सिंहस्तद्वद्धन्ता सुतानू मम,जैसे सिंह पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार सात्यकि विचित्र युद्ध करनेवाले दिद्वान् द्रोणाचार्यको भी युद्धमें परास्त करके मेरे पुत्रोंका वध कर डालेंगे
三阇耶说道:“他在战斗中战胜了德罗那——那位精通兵器的名师、武艺奇绝的战士——随后萨底耶吉将屠戮我的儿子们,正如雄狮扑杀成群的野兽。”
Verse 9
कृतवर्मादिश्ि: शूरैर्यत्तैर्बहुभिराहवे । युयुधानो न शकितो हन्तुं यत् पुरुषर्षभ:,कृतवर्मा आदि बहुत-से शूरवीर समरांगणमें प्रयत्न करते ही रह गये; परंतु पुरुषप्रवर सात्यकि मारे न जा सके
三阇耶说道:尽管以克利多跋摩为首的众多勇士在战场上竭尽全力奋战,他们仍无法杀死优优陀那(萨底耆),那位人中雄牛。
Verse 10
नैतदीदृशकं युद्ध॑ कृतवांस्तत्र फाल्गुन: । यादृशं कृतवान् युद्ध शिनेर्नप्ता महायशा:,शिनिके महायशस्वी पौत्र सात्यकिने वहाँ जैसा युद्ध किया, वैसा तो अर्जुनने भी नहीं किया था
三阇耶说道:在那战场上,法尔古那(阿周那)也未曾打过如此一战。尸尼那位声名赫赫的孙子——大名鼎鼎的萨底耆——所展现的战斗,连阿周那也未能匹敌。
Verse 11
संजय उवाच तव दुर्मन्त्रिते राजन् दुर्योधनकृतेन च । शृणुष्वावहितो भूत्वा यत् ते वक्ष्यामि भारत,संजयने कहा--राजन्! आपकी खोटी सलाह और दुर्योधनकी काली करतूतसे यह सब कुछ हुआ है। भारत! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनिये
三阇耶说道:大王啊,正因你谋虑失当,又因杜尤陀那自身的作为,才有今日之事。婆罗多啊,请专心聆听我将要告诉你的话。
Verse 12
ते पुनः संन्यवर्तन्त कृत्वा संशप्तकान् मिथ: । परां युद्धे मतिं क्रूरां तव पुत्रस्य शासनात्,आपके पुत्रकी आज्ञासे युद्धके लिये अत्यन्त क्रूरतापूर्ण निश्चय करके परस्पर शपथ ले वे सभी पराजित योद्धा पुन: लौट आये
三阇耶说道:随后那些武士又彼此立誓,结为“誓死军”(萨摩誓缚迦),再度回转。奉你儿子之命,他们在战斗中定下残酷的决意,纵然先前已被击退,仍重返战场。
Verse 13
त्रीणि सादिसहस््राणि दुर्योधनपुरोगमा: । शककाम्बोजबाह्लीका यवना: पारदास्तथा,अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभा: पावकं यथा । तीन हजार घुड़सवार और हाथीसवार दुर्योधनको अपना अगुआ बनाकर चले। उनके साथ शक, काम्बोज, बाह्लीक, यवन, पारद, कुलिन्द, तंगण, अम्बष्ठ, पैशाच, बर्बर तथा पर्वतीय योद्धा भी थे। राजेन्द्र! वे सब-के-सब कुपित हो हाथोंमें पत्थर लिये सात्यकिकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे फतिंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं
三阇耶说道:在杜尤陀那率领下,三千武士——连同释迦、甘婆阇、婆诃利迦、夜婆那与波罗陀诸族——猛扑向舍尼耶(萨底耆)。他们怒火冲天,蜂拥而上,宛如飞蛾投向熊熊烈焰。
Verse 14
कुलिन्दास्तड्भणाम्बष्ठा: पैशाचाश्न सबर्बरा: । पर्वतीयाश्न राजेन्द्र क़ुद्धा: पाषाणपाणय:,अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभा: पावकं यथा । तीन हजार घुड़सवार और हाथीसवार दुर्योधनको अपना अगुआ बनाकर चले। उनके साथ शक, काम्बोज, बाह्लीक, यवन, पारद, कुलिन्द, तंगण, अम्बष्ठ, पैशाच, बर्बर तथा पर्वतीय योद्धा भी थे। राजेन्द्र! वे सब-के-सब कुपित हो हाथोंमें पत्थर लिये सात्यकिकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे फतिंगे जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं
三阇耶说道:“大王啊,库林达、唐伽那、安跋湿陀、毗舍遮、蛮族以及山地诸部——怒火中烧,手执石块——一齐扑向沙伊内耶(萨底耆),恰如飞蛾投向熊熊烈焰。”
Verse 15
।। युक्ताश्न पर्वतीयानां रथा: पाषाणयोधिनाम्
三阇耶说道:“那些以石为兵的山地战士,其战车皆以山中所育的骏马驾挽。”
Verse 16
ततो रथसहस्रेण महारथशतेन च,अभ्यद्रवन्त शैनेयमसंख्येयाश्ष पत्तय: । तत्पश्चात् एक हजार रथी, सौ महारथी, एक हजार हाथी और दो हजार घुड़सवारोंके साथ बहुत-से महारथी और असंख्य पैदल सैनिक सात्यकिपर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए टूट पड़े
随后,他们以一千乘战车与一百名大车战士为前锋,又有无数步兵随行,径直冲向沙伊内耶(萨底耆)。继而又以一千名车战士、一百名大车战士、一千头战象、两千骑兵,并有众多大车战士与无量步卒,万箭齐发,如雨倾泻,蜂拥压向萨底耆。
Verse 17
द्विरदानां सहस्नरेण द्विसाहसैश्व॒ वाजिभि: । शरवर्षाणि मुज्चन्तो विविधानि महारथा:
三阇耶说道:“他们以一千头战象、两千匹战马为势,诸大车战士仍不断放出各式箭雨。”
Verse 18
तांश्व संचोदयन् सर्वान् घ्नतैनमिति भारत
三阇耶说道:“他催逼众人,高喊:‘杀了他!’——噢,婆罗多——以此煽动诸军行那决绝一击。”
Verse 19
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयचरितं महत्
三阇耶说道:“在那里,我们目睹了奇异之事——Śaineya 的伟大功业与英勇行止。”
Verse 20
अवधीच्च रथानीकं द्विरदानां च तद् बलम्
三阇耶说道:他斩溃战车之阵,又摧折那支象军之力——在战斗正酣之际,更进一步击碎敌军严整的战力。
Verse 21
तत्र चक्रैविमथितैर्भग्नैश्न परमायुधै:
三阇耶说道:在那里,战场被战车之轮翻搅撕裂;连最精良的兵器也碎裂散落——这正是战争无情之力的图景:对武备的骄矜,在毁灭的洪势前尽皆崩塌。
Verse 22
अक्षैश्व बहुधा भग्नैरीषादण्डकबन्धुरै: । कुण्जरैर्मथितैश्वापि ध्वजैश्व विनिपातितैः
三阇耶说道:“战场上遍地狼藉——战车车轴多处折断,轭与辕杆尽皆碎裂;战象被碾压撕裂;旗帜与旌幢也被掀翻坠地。于是,骄矜与权势的标记,在战争不息的暴烈之中尽成残骸。”
Verse 23
वर्मभिश्व तथानीकैव्यवरकीर्णा वसुंधरा । वहाँ चूर-चूर हुए चक्कों, टूटे हुए उत्तमोत्तम आयुधों, टूक-टूक हुए धुरों, खण्डित हुए ईषादण्डों और बन्धुरों, मथे गये हाथियों, तोड़कर गिराये हुए ध्वजों, छिन्न-भिन्न कवचों और विनष्ट हुए सैनिकोंकी लाशोंसे वहाँकी पृथ्वी पट गयी थी || २१-२२ ह ।। स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैरनुकर्षैश्व मारिष
三阇耶说道:那里的大地遍布甲胄,阵列亦四散零落。那片土地仿佛被战争的残骸铺成地毯——车轮碎成片片,最精良的兵器折断,轭具崩裂,辕杆与连接件尽皆粉碎;战象在冲撞中被碾压撕裂;旗幡被扯落抛弃;胸甲破碎成缕;阵亡士卒的尸身覆满其上。这是一幅冷峻的图景,显出战争的道德代价:勇力与骄矜同归于败坏,而当达摩以兵刃相争时,战场本身便成为毁灭的见证。
Verse 24
गिरिरूपधराश्चापि पतिता: कुज्जरोत्तमा:
三阇耶说道:“即便是最上等的巨象,形如山岳,也都倒下了。”
Verse 25
सुप्रतीककुले जाता महापद्मकुले तथा,नरेश्वर! सुप्रतीक, महापद्मय, ऐरावत तथा अन्य [पुण्डरीक, पुष्पदन््त और सार्वभौम-- (इन) दिग्गजोंके] कुलोंमें उत्पन्न हुए बहुतेरे दंतार हाथी भी वहाँ धरतीपर लोट रहे थे
三阇耶说道:“大王啊,许多具长牙的上等王象——出自苏普拉提迦与摩诃钵摩诸族,又出自爱罗伐多之族,并出自其他著名的‘世界象’诸族,如本荼利迦、普湿波檀多与萨尔瓦婆乌摩——都在那里,在大地上翻滚。”
Verse 26
ऐरावतकुले चैव तथान्येषु कुलेषु च । जाता दन्तिवरा राजन् शेरते बहवो हता:,नरेश्वर! सुप्रतीक, महापद्मय, ऐरावत तथा अन्य [पुण्डरीक, पुष्पदन््त और सार्वभौम-- (इन) दिग्गजोंके] कुलोंमें उत्पन्न हुए बहुतेरे दंतार हाथी भी वहाँ धरतीपर लोट रहे थे
三阇耶说道:“大王啊,许多上等长牙象——出自爱罗伐多一族以及其他名门——被杀而卧,散落在大地之上。”
Verse 27
वनायुजानू् पर्वतीयान् काम्बोजान् बाह्विकानपि | तथा हयवरान् राजन् निजघ्ने तत्र सात्यकि:,राजन! वहाँ सात्यकिने वनायु, काम्बोज (काबुल) और बाह्लीक देशोंमें उत्पन्न हुए श्रेष्ठ अश्वों तथा पहाड़ी घोड़ोंको भी मार गिराया
三阇耶说道:“大王啊,就在那里,萨底耶迦击倒了连最上等的战马——瓦那由族所产之马、山地良驹,以及来自剑波阇与婆诃利迦诸地的名马。”
Verse 28
नानादेशसमुत्थांश्व नानाजातींश्व दन्तिन: । निजघ्ने तत्र शैनेय: शतशो5थ सहस्रश:,शिनिके उस वीर पौत्रने अनेक देशोंमें उत्पन्न हुए विभिन्न जातिके सैकड़ों और हजारों हाथियोंका भी संहार कर डाला
三阇耶说道:“在那里,尸尼之勇孙——舍因耶(萨底耶迦)——击倒了成百上千的象群:来自诸国,品种各异。”
Verse 29
तेषु प्रकाल्यमानेषु दस्यून् दुःशासनोडब्रवीत् । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं कि सृतेन व:,वे हाथी जब कालके गालमें जा रहे थे, उस समय दुःशासनने लूट-पाट करनेवाले म्लेच्छोंसे इस प्रकार कहा--“धर्मको न जाननेवाले योद्धाओ! इस तरह भाग जानेसे तुम्हें क्या मिलेगा? लौटो और युद्ध करो”
当那些大象被驱赶着奔向死亡的巨口之时,杜赫沙萨那对那些掠夺的匪徒喝道:“你们这些不知达摩之辈——如此逃窜能得什么?回转身来作战!这般奔逃对你们有何用处?”
Verse 30
तांश्वातिभग्नान् सम्प्रेक्ष्य पुत्रो द:ःशासनस्तव । पाषाणयोधिन: शूरान् पर्वतीयानचोदयत्,इतनेपर भी उन्हें चोर-जोरसे भागते देख आपके पुत्र दुःशासनने पत्थरोंद्वारा युद्ध करनेवाले शूरवीर पर्वतीयोंको आज्ञा दी--
三阇耶说道:见那些战士彻底溃散、乱作一团而奔逃,你的儿子杜赫沙萨那便催动山地战士——以投石作战的勇士——命他们加紧进攻,向前压迫。
Verse 31
अभश्मयुद्धेषु कुशला नैतज्जानाति सात्यकि: । अश्मयुद्धमजानन्तं घ्नतैनं युद्धकार्मुकम्,“वीरो! तुमलोग प्रस्तरोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल हो। सात्यकिको इस कलाका ज्ञान नहीं है। प्रस्तरयुद्धको न जानते हुए भी युद्धकी इच्छा रखनेवाले इस शत्रुकोी तुमलोग मार डालो
“勇士们!你们精于投石之战;萨提亚基不识此技。把这敌人——那执弓而好战者——杀了;他虽不懂石战,却仍妄求交锋!”
Verse 32
तथैव कुरव: सर्वे नाश्मयुद्धविशारदा: । अभिद्रवत मा भैष्ट न व: प्राप्स्पति सात्यकि:,“इसी प्रकार समस्त कौरव भी प्रस्तरयुद्धमें प्रवीण नहीं हैं। अतः तुम डरो मत। आक्रमण करो। सात्यकि तुम्हें नहीं पा सकता”
三阇耶说道:“同样,库鲁众也并不精于投石之战。因此不必畏惧——冲上去!萨提亚基决不能触及你们。”
Verse 33
ते पर्वतीया राजान: सर्वे पाषाणयोधिन: । अभ्यद्रवन्त शैनेयं राजानमिव मन्त्रिण:,जैसे मन्त्री राजाके पास जाते हैं, उसी प्रकार वे पाषाणयोधी समस्त पर्वतीय नरेश सात्यकिकी ओर दौड़े
三阇耶说道:那些山地诸王,皆为投石之士,齐齐奔向舍因耶(萨提亚基),如群臣趋赴其王一般,在战阵拥挤之中同心合势,逼近于他。
Verse 34
ततो गजशिर:प्रख्यैरुपलै: शैलवासिन: । उद्यतैर्युयुधानस्य पुरतस्तस्थुराहवे,वे पर्वतनिवासी योद्धा हाथीके मस्तकके समान बड़े-बड़े प्रस्तर हाथमें लेकर समरांगणमें युयुधानके सामने युद्धके लिये तैयार होकर खड़े हो गये
三阇耶说道:随后,那些居于山岭的战士高举形如象首的巨石,在战场上径直立于尤尤陀那之前,整装待战。
Verse 35
क्षेपणीयैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिण: । चोदितास्तव पुत्रेण सर्वतो रुरुधुर्दिश:,आपके पुत्र दुःशासनसे प्रेरित होकर सात्यकिके वधकी इच्छा रखनेवाले अन्य बहुतेरे सैनिकोंने भी क्षेपणीयास्त्र उठाकर सब ओरसे सात्यकिकी सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध कर लिया
又有许多士卒渴求诛杀萨特瓦塔(萨提亚奇),举起投掷之器;在你之子杜沙萨那的驱使下,他们从四面八方封堵了萨提亚奇的去路。
Verse 36
तेषामापततामेव शिलायुद्ध॑ं चिकीर्षताम् । सात्यकि: प्रतिसंधाय निशितान् प्राहिणोच्छरान्,प्रस्तरयुद्धकी इच्छा रखनेवाले उन योद्धाओंके आक्रमण करते ही सात्यकिने तेज किये हुए बाणोंका संधान करके उन्हें उनपर चलाया
当他们扑来,意欲以石相斗之时,萨提亚奇凝神瞄准,向他们射出锐利之箭。
Verse 37
तामश्मवृष्टिं तुमुलां पर्वतीय: समीरिताम् । चिच्छेदोरगसंकाशै्नासचै: शिनिपुड्रव:,पर्वतीय सैनिकोंद्वारा की हुई उस भयंकर पाषाणवर्षाको शिनिप्रवर सात्यकिने अपने सर्पतुल्य नाराचोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया
那由山地战士掷来的可怖石雨轰然如雷;尸尼族的英雄萨提亚奇以蛇般的那罗遮箭将其斩碎成片。
Verse 38
तैरश्मचूर्णै्दीप्यद्धि: खद्योतानामिव व्रजै: । प्राय: सैन्यान्यहन्यन्त हाहाभूतानि मारिष,माननीय नरेश! जुगनुओंकी जमातोंके समान उद्धासित होनेवाले उन प्रस्तरचूर्णोंसे प्रायः सारी सेनाएँ आहत हो हाहाकार करने लगीं
尊贵的王啊!那些燃亮的碎石如萤群飞舞般倾泻而下,几乎全军皆被击伤,哀号之声四起:“哀哉!哀哉!”
Verse 39
ततः पड्चशतं शूरा: समुद्यतमहाशिला: । निकृत्तबाहवो राजन निपेतुर्धरणीतले,राजन! तदनन्तर बड़े-बड़े प्रस्तरखण्ड उठाये हुए पाँच सौ शूरवीर अपनी भुजाओंके कट जानेसे धरतीपर गिर पड़े
三阇耶说道:“于是,王啊,五百名勇士——高举巨石——因双臂被斩断而坠倒在地。”
Verse 40
पुनर्दशशताश्चान्ये शतसाहस्रिणस्तथा । सोपलैर्बाहुिभिश्क्िन्नै: पेतुरप्राप्पय सात्यकिम्,फिर एक हजार दूसरे योद्धा तथा एक लाख अन्य सैनिक सात्यकितक पहुँचने भी नहीं पाये थे कि अपने हाथमें लिये शिलाखण्डोंसे कटी हुई बाहुओंके साथ ही धराशायी हो गये
三阇耶说道:“又有别的队伍——有的千人,有的竟至十万人——尚未及近萨底耶吉,便已倒地;臂被斩断,手中仍紧攥着石块。”
Verse 41
(सात्वतस्य च भल््लेन निष्पिष्टैस्तैस्तथाद्रिभि: । न्यपतन् निहता म्लेच्छास्तत्र तत्र गतासव: ।। ते हन्यमाना: समरे सात्वतेन महात्मना | अभश्मवृष्टिं महाघोरां पातयन्ति सम सात्वते ।।) सात्यकिके भल्लसे चूर-चूर हुए शिलाखण्डोंद्वारा मारे गये म्लेच्छ प्राणशून्य होकर जहाँ-तहाँ पड़े थे। महामना सात्यकिद्वारा समरभूमिमें मारे जाते हुए वे म्लेच्छ सैनिक उनपर बड़ी भयंकर पत्थरोंकी वर्षा करते थे। पाषाणयोधिन: शूरान् यतमानानवस्थितान् । न्यवधीद् बहुसाहस्रांस्तदद्भुतमिवाभवत्,वे पाषाणोंद्वारा युद्ध करनेवाले शूरवीर विजयके लिये यत्नशील होकर रणक्षेत्रमें डटे हुए थे। उनकी संख्या अनेक सहस्र थी; परंतु सात्यकिने उन सबका संहार कर डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई
三阇耶说道:“那些弥勒叉战士被萨特瓦塔的利箭射中,又被箭矢击碎的巨石所压碎,尽皆毙命,尸身横陈,散落各处。然当那大心的萨特瓦塔(萨底耶吉)在战场上斩杀他们之时,他们仍向他倾泻可怖的石雨,宛如岩石的暴云倾注。那些以石为兵的勇士——坚守阵地、力求胜利,数以千计——尽被萨底耶吉尽数诛灭;几乎令人以为是奇迹。”
Verse 42
ततः पुनर्व्यात्तमुखास्ते5श्मवृष्टी: समनन््ततः । अयोहस्ता: शूलहस्ता दरदास्तड्रणा: खसा:,तदनन्तर पुनः हाथमें लोहेके गोले और त्रिशूल लिये मुँह फैलाये हुए दरद, तंगण, खस, लम्पाक और कुलिन्ददेशीय म्लेच्छोंने सात्यकिपर चारों ओरसे पत्थर बरसाने आरम्भ किये; परंतु प्रतीकार करनेमें निपुण सात्यकिने अपने नाराचोंद्वारा उन सबको छिज्न-भिन्न कर दिया
三阇耶说道:“随后,那些凶悍的战士又一次张口怒吼,从四面八方掷下石雨。手执铁棍、举起三叉戟的达罗陀、唐伽那与迦娑诸部,合围逼近萨底耶吉。然而萨底耶吉善于应对,以锐箭将他们击碎斩倒。”
Verse 43
लम्पाकाश्न कुलिन्दाश्न चिक्षिपुस्तांश्न सात्यकि: । नाराचै: प्रतिचिच्छेद प्रतिपत्तिविशारद:,तदनन्तर पुनः हाथमें लोहेके गोले और त्रिशूल लिये मुँह फैलाये हुए दरद, तंगण, खस, लम्पाक और कुलिन्ददेशीय म्लेच्छोंने सात्यकिपर चारों ओरसे पत्थर बरसाने आरम्भ किये; परंतु प्रतीकार करनेमें निपुण सात्यकिने अपने नाराचोंद्वारा उन सबको छिज्न-भिन्न कर दिया
三阇耶说道:“兰帕迦与拘邻陀掷出他们的投射物;但萨底耶吉——精于迅捷应对——以那罗迦箭将之截断,并将他们斩落。”
Verse 44
अद्रीणां भिद्यमानानामन्तरिक्षे शितै: शरै: । शब्देन प्राद्रवन् संख्ये रथाश्वगजपत्तय:,आकाशकमें तीखे बाणोंद्वारा टूटने-फ़ूटनेवाले प्रस्तर-खण्डोंके शब्दसे भयभीत हो रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिक युद्धस्थलमें इधर-उधर भागने लगे
Sañjaya said: As sharp arrows split the rocky masses in mid-air, the crashing sound of those shattering stones spread terror; and on the battlefield charioteers, horsemen, elephant-corps, and foot-soldiers broke ranks and ran in all directions. The verse underscores how war’s violence and noise can dissolve discipline and courage, driving even trained forces into panic.
Verse 45
अश्मचूर्णरवाकीर्णा मनुष्यगजवाजिन: । नाशवनुवन्नवस्थातु भ्रमरैरिव दंशिता:,पत्थरके चूर्णोंसे व्याप्त हुए मनुष्य, हाथी और घोड़े वहाँ ठहर न सके, मानो उन्हें भ्रमरोंने डस लिया हो
Sañjaya said: The ground was strewn and filled with the roar of stone-dust; men, elephants, and horses could not hold their positions there, as if they had been stung by swarming bees. The image underscores the battlefield’s intolerable violence—so overwhelming that even the strongest beings lose steadiness and order amid the chaos.
Verse 46
हतशिष्टा: सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिका: । (विभिन्नशिरसो राजन दन्तैश्छिन्नेश्व॒ दन्तिन: । निर्धूतैश्व॒ करैनागा व्यड्राश्न शतश: कृता: ।। हत्वा पञ्चशतान् योधांस्तत्क्षणेनैव मारिष । व्यचरत् पृतनामध्ये शैनेय: कृतहस्तवत् ।।) कुण्जरा वर्जयामासुर्युयुधानरथं तदा,जो मरनेसे बचे थे, वे हाथी भी खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनके कुम्भस्थल विदीर्ण हो गये थे। राजन! बहुत-से हाथियोंके सिर क्षत-विक्षत हो गये थे। उनके दाँत टूट गये थे, शुण्डदण्ड खण्डित हो गये थे तथा सैकड़ों गजराजोंके सात्यकिने अंग-भंग कर दिये थे। माननीय नरेश! सात्यकि सिद्धहस्त पुरुषकी भाँति क्षणभरमें पाँच सौ योद्धाओंका संहार करके सेनाके मध्यभागमें विचरने लगे। उस समय घायल हुए हाथी युयुधानके रथको छोड़कर भाग गये
Verse 47
(अश्मनां भिद्यमानानां सायकै: श्रूयते ध्वनि: । घद्मपत्रेषु धाराणां पतन्तीनामिव ध्वनि: ।।) बाणोंसे चूर-चूर होनेवाले पत्थरोंकी ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ती थी, मानो कमलदलोंपर गिरती हुई जलधाराओंका शब्द कानोंमें पड़ रहा हो । ततः शब्द: समभवत् तव सैन्यस्य मारिष । माधवेनार्यमानस्य सागरस्येव पर्वणि,आर्य! जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्रका गर्जन बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार सात्यकिके द्वारा पीड़ित हुई आपकी सेनाका महान् कोलाहल प्रकट हो रहा था
Sanjaya said: “The sound was heard of stones being shattered by arrows—like the soft, continuous murmur of streams falling upon lotus-leaves. Then, O revered one, a great roar arose from your army, tormented by Madhava’s warrior (Sātyaki), like the ocean swelling in thunder on the day of the full moon.”
Verse 48
तं शब्द तुमुलं श्र॒ुत्वा द्रोणो यन्तारमब्रवीत् । एष सूत रणे क्रुद्ध: सात्वतानां महारथ:,उस भयंकर शब्दको सुनकर द्रोणाचार्यने अपने सारथिसे कहा--'सूत! यह सात्वतकुलका महारथी वीर सात्यकि रफक्षेत्रमें क्ुद्ध होकर कौरव-सेनाको बारंबार विदीर्ण करता हुआ कालके समान विचर रहा है। सारथे! जहाँ यह भयानक शब्द हो रहा है, वहीं मेरे रथको ले चलो
Sañjaya said: Hearing that tumultuous roar, Droṇa addressed his charioteer: “O charioteer, this great chariot-warrior of the Sātvatas, enraged in battle, is moving about like Death itself, repeatedly rending the Kaurava host. Drive my chariot to the very place from which that dreadful sound is rising.”
Verse 49
दारयन् बहुधा सैन्यं रणे चरति कालवत् | यत्रैष शब्दस्तुमुलस्तत्र सूत रथं नय,उस भयंकर शब्दको सुनकर द्रोणाचार्यने अपने सारथिसे कहा--'सूत! यह सात्वतकुलका महारथी वीर सात्यकि रफक्षेत्रमें क्ुद्ध होकर कौरव-सेनाको बारंबार विदीर्ण करता हुआ कालके समान विचर रहा है। सारथे! जहाँ यह भयानक शब्द हो रहा है, वहीं मेरे रथको ले चलो
三阇耶说道:“他一次又一次撕裂军阵,在战场上游走,宛如死神本身。车夫啊,把战车驶向那喧天怒吼升起之处。”
Verse 50
पाषाणयोधिभिननू्नं युयुधान: समागत: । तथा हि रथिन: सर्वे ह्वियन्ते विद्रुतैर्हयै:,“निश्चय ही युयुधान पाषाणयोधी योद्धाओंसे भिड़ गया है, तभी तो ये भागे हुए घोड़े सम्पूर्ण रथियोंको रणभूमिसे बाहर लिये जा रहे हैं
三阇耶说道:“想必是尤尤陀那已与那些以石为器的战士近身交锋;因此惊惶狂奔的战马正把所有驾车的武士拖离战场。”
Verse 51
विशस्त्रकवचा रुग्णास्तत्र तत्र पतन्ति च । न शवनुवन्ति यन्तार: संयन्तुं तुमुले हयान्,“ये रथी शस्त्र और कवचसे हीन होकर शस्त्रोंके आघातसे रुग्ण हो यत्र-तत्र गिर रहे हैं। इस भयंकर युद्धमें सारथि अपने घोड़ोंको काबूमें नहीं रख पाते हैं!
三阇耶说道:“他们被夺去兵刃与甲胄,又为刀兵所伤,战士们在此处彼处纷纷倒下。在那喧乱的鏖战中,连御者也无法勒住战马。”
Verse 52
इत्येतद् वचन श्रुत्वा भारद्वाजस्य सारथि: । प्रत्युवाच ततो द्रोणं सर्वशस्त्रभूतां वरम्
三阇耶说道:“听罢此言,婆罗堕婆阇之子(德罗那)的御者便答复德罗那——诸持兵者之最。”
Verse 53
सैन्यं द्रवति चायुष्मन् कौरवेयं समन्तत: । पश्य योधान् रणे भग्नान् धावतो वै ततस्तत:
三阇耶说道:“长寿者啊,俱卢军阵四面崩散,奔流而逃。看哪——战中溃败的武士正向各处奔窜。”
Verse 54
द्रोणाचार्यका यह वचन सुनकर सारथिने सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणसे इस प्रकार कहा--'आयुष्मन्! कौरव-सेना चारों ओर भाग रही है। देखिये, रणक्षेत्रमें वे सब योद्धा व्यूह-भंग करके इधर-उधर दौड़ रहे हैं ।। इमे च संहता: शूरा: पञ्चाला: पाण्डवै: सह । त्वामेव हि जिघांसन्त आद्रवन्ति समन््तत:,'ये पाण्डवोंसहित पांचाल वीर संगठित हो आपको मार डालनेकी इच्छासे सब ओरसे आपपर ही आक्रमण कर रहे हैं
三阇耶说道:听到此言,御者便对德罗那——诸持兵者中最为卓绝者——说道:“尊师啊,俱卢军正从四面溃逃。请看:战场之上,阵形已破,众武士奔走散乱,东奔西窜。与此同时,盘遮罗诸勇士与般度诸子合为一体,从四方齐进,心志惟一——欲取汝命。”
Verse 55
अत्र कार्य समाधत्स्व प्राप्तकालमरिंदम । स्थाने वा गमने वापि दूरं यातश्न सात्यकि:,'शत्रुदमन! इस समय जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसपर ध्यान दीजिये; यहीं ठहरना है या अन्यत्र जाना है। सात्यकि तो बहुत दूर चले गये”
三阇耶说道:“灭敌者啊,此刻当专注于时势所迫之事。决断吧:是固守此地,还是移往他处——因为娑底耶迦已去得很远了。”
Verse 56
तथैवं वदतस्तस्य भारद्वाजस्य सारथे: । प्रत्यदृश्यत शैनेयो निध्नन् बहुविधान् रथात्,द्रोणाचार्यका सारथि जब इस प्रकार कह रहा था, उसी समय शिनिनन्दन सात्यकि बहुतेरे रथियोंका संहार करते दिखायी दिये
三阇耶说道:正当婆罗堕阇之子(德罗那)的御者如此言说之时,尸尼之后裔——舍尼耶·娑底耶迦——已映入眼帘,正斩落众多乘车战士。
Verse 57
ते वध्यमाना: समरे युयुधानेन तावका: । युयुधानरथं त्यक्त्वा द्रोणानीकाय दुद्गरुवु:,समरांगणमें युयुधानकी मार खाते हुए आपके सैनिक उनके रथको छोड़कर द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर भाग गये
三阇耶说道:在战阵之中被优优陀那击杀压迫,你的士卒弃下优优陀那之战车,奔向德罗那的军阵。
Verse 58
यैस्तु दुःशासन: सार्ध रथै: पूर्व न्यवर्तत । ते भीतास्त्वभ्यधावन्त सर्वे द्रोणरथं प्रति,पहले दुःशासन जिन रथियोंके साथ लौटा था, वे सब-के-सब भयभीत होकर द्रोणाचार्यके रथकी ओर भाग गये
三阇耶说道:先前与杜沙娑那一同退却的那些乘车武士,如今尽为恐惧所攫,齐齐奔向德罗那阿阇梨之战车。
Verse 120
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका शत्रुसेनामें प्रवेश और दुर्योधनका पलायनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
桑阇耶说道:至此,《圣摩诃婆罗多》之《德罗那篇》中“诛杀阇耶陀罗”一段的第一百二十章告终,所叙为萨底耶吉闯入敌军阵中,以及都利约陀那的遁逃。章末点明战争的道德重压:一方以勇武与决意奋然推进,另一方却为恐惧与权宜退却所驱使;由此可见,非正法(adharma)与动摇的统御,如何在危局之际侵蚀人心之胆气。
Verse 121
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिकप्रवेशे एकविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
如是,在《圣摩诃婆罗多》之《德罗那篇》中——尤在“诛杀阇耶陀罗”一段——以萨底耶吉入阵为题的第一百二十一章至此告终。作为卷末题记,它标示战事叙述的转折:一段行动单元既已收束,而随后的事件将携带复仇、职责(dharma)与战争代价日益加重的道德重量,步步逼近。
Verse 153
शूरा: पञ्चशता राजन् शैनेयं समुपाद्रवन् | राजन! पत्थरोंद्वारा युद्ध करनेवाले पर्वतीयोंके पाँच सौ शूरवीर रथी युद्धके लिये सुसज्जित हो सात्यकिपर चढ़ आये
桑阇耶说道:大王啊,五百名勇士一齐奔突而来,直扑沙伊内耶(萨底耶吉)。他们乃山地战士,惯以掷石为战,披坚执锐,蜂拥而上,要与他交锋。
Verse 173
अभ्यद्रवन्त शैनेयमसंख्येयाश्ष पत्तय: । तत्पश्चात् एक हजार रथी, सौ महारथी, एक हजार हाथी और दो हजार घुड़सवारोंके साथ बहुत-से महारथी और असंख्य पैदल सैनिक सात्यकिपर नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए टूट पड़े
桑阇耶说道:无数步卒奔袭沙伊内耶(萨底耶吉)。继而又有一千乘战车、一百名大车战士(摩诃罗提)、一千头战象与两千骑兵;并有许多强悍勇士与不可胜数的步兵,从四面八方涌向萨底耶吉,万箭齐发,如雨倾泻。此景显出战争无情的势头:一位秉持正法的盟友,独受压倒性兵力的考验;勇气并非在顺遂中衡量,而在群暴如潮之际仍能坚守不移。
Verse 186
दुःशासनो महाराज सात्यकिं पर्यवारयत् । भरतवंशी महाराज! “इस सात्यकिको मार डालो”, इस प्रकार उन समस्त सैनिकोंको प्रेरित करते हुए दुःशासनने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया
桑阇耶说道:大王啊,杜沙娑那从四面围困萨底耶吉,并以呼号煽动众军:“杀了这个萨底耶吉!”他一面驱使诸兵,一面令其合围,将他团团困住。此景显出这位俱卢王子在战火炽烈之际鼓动群体暴行;在战争的混乱中,谋略的压迫与道德的克制同受考验。
Verse 193
यदेको बहुभि: सार्धमसम्भ्रान्तमयुध्यत । वहाँ हमने सात्यकिका अत्यन्त अद्भुत चरित्र देखा कि वे बिना किसी घबराहटके अकेले ही बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे
三阇耶说道:在那里,我们目睹了萨底耶奇最令人惊叹的壮举——心神安定,毫不动摇,他竟独自一人迎战众多武士。此景彰显战乱喧嚣之中内心的坚稳:勇气不在于怒火,而在于沉着与决断,在压倒性的劣势前仍不退缩。
Verse 206
सादिनश्वैव तान् सर्वान् दस्यूनपि च सर्वशः । उन्होंने रथसेना और गजसेनाका तथा उन समस्त घुड़सवारों एवं लुटेरे म्लेच्छोंका भी सब प्रकारसे संहार कर डाला
三阇耶说道:他将他们尽数歼灭——连同骑兵、战车军与象军——并以种种手段,连那些如盗匪般的弥勒叉掠夺者也一并扫除。此偈凸显战场暴力的全面性:不惟正规军,连趁乱劫掠的群盗也被卷入同一股毁灭的洪流。
Verse 236
संछन्ना वसुधा तत्र द्यौगग्रहैरिव भारत । माननीय भरतनरेश! योद्धाओंके हारों, आभूषणों, वस्त्रों और अनुकर्षोंसे आच्छादित हुई वहाँकी भूमि तारोंसे व्याप्त हुए आकाशके समान जान पड़ती थी
三阇耶说道:噢婆罗多,噢可敬的婆罗多王!那里的大地被完全覆盖——散落着战士们的花鬘、饰物、衣袍与鞍具缰饰——使得战场宛如繁星布满的天空。此喻揭示战争如何将人间华饰化作遍地残屑,冷峻地提醒人们:暴力有其道德代价,世间荣华亦脆弱易碎。
Verse 2436
अजगज्जनस्य कुले जाता वामनस्य च भारत । भारत! अंजन और वामन नामक दिग्गजके कुलमें उत्पन्न हुए पर्वताकार श्रेष्ठ गजराज भी वहाँ धराशायी हो गये थे
三阇耶说道:噢婆罗多!就连最上等的象王——大如山岳——出自威名远播的巨象阿阇那与婆摩那之族者,也在那处被击倒于地。此景表明:在战争的狂怒中,血统与蛮力都不能庇护,即便最伟大者亦难逃毁灭。