Adhyaya 250
Vana ParvaAdhyaya 25051 Verses

Adhyaya 250

द्रौपदी-शैब्यसंवादः — Draupadī’s Identification and Counsel on Hospitality

Upa-parva: Draupadī–Śaibya-saṃvāda (Hospitality and Identification Episode)

Vaiśaṃpāyana reports Draupadī’s reply after she is questioned by a distinguished Śibi figure. She first marks the impropriety of a direct address to her, stating that no one else is present to speak on her behalf and that she is alone in the forest, committed to her prescribed conduct. She then demonstrates informed recognition of the questioner, identifying him as Suratha’s son known as Koṭikāśya, and proceeds to disclose her own identity as Drupada’s daughter, known as Kṛṣṇā (Draupadī). She states that she has the five Pandavas as husbands and explains their current movements: having settled her at the hermitage, they have separated to the four directions for hunting—Yudhiṣṭhira to the east, Bhīma to the south, Arjuna (Jaya) to the west, and the twin sons of Mādrī to the north. Draupadī anticipates their return and advises that the visitor will be honored and then may depart as desired, emphasizing atithi-dharma. She concludes by entering the leaf-hut, reflecting on the household’s guest-obligations even in exile.

Chapter Arc: गन्धर्वों के हाथों अपमानित होकर छूटे दुर्योधन का हृदय विषाद से भर उठता है; वह कर्ण के सामने अपनी ग्लानि, पराजय और ‘आमरण अनशन’ का निश्चय प्रकट करता है। → दुर्योधन अपने ही अहंकार पर धिक्कार करता है—शत्रुओं की हँसी, पाण्डवों की उपेक्षापूर्ण दृष्टि, और अपने ‘पौरुष’ की निष्फलता उसे भीतर से तोड़ती है। भाई दुःशासन भी बड़े भाई के चरण छूकर विलाप करता है और राज्य-भार सँभालने की बात कहकर रो पड़ता है; संकट यह है कि शोक और अपमान दुर्योधन को आत्म-विनाश की ओर ढकेल रहे हैं। → कर्ण व्यथित होकर आगे आता है और कठोर-उपदेश देता है—‘शोक में डूबे रहने से शोक कभी नहीं मिटता’; वह दुर्योधन को नासमझी छोड़कर धैर्य, नीति और पुरुषार्थ की ओर लौटने को बाध्य करता है, ताकि अपमान का उत्तर आत्म-त्याग नहीं, कर्म-प्रयत्न बने। → कर्ण दुर्योधन के मन को स्थिर करने का प्रयत्न करता है—विषाद को काटकर उसे कर्तव्य, प्रतिष्ठा और भविष्य की योजना की ओर मोड़ता है; भाई-बंधुता और राजधर्म की स्मृति दुर्योधन को अनशन के संकल्प से हटाने की दिशा में ले जाती है। → कर्ण के उपदेश के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—क्या दुर्योधन अपमान की आग को नीति में बदलेगा, या उसी आग से स्वयं को जला डालेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल १६६ “लोक हैं) एकोनपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन हु आमरण अनशनका निश्चय, दुःशासनको राजा आदेश, दुःशासनका दुःख और कर्णका दुर्योधनको समझाना दुर्योधन उवाच चित्रसेनं समागम्य प्रहसन्नर्जुनस्तदा । इदं वचनमक्लीबमब्रवीत्‌ परवीरहा,दुर्योधन बोला--कर्ण! चित्रसेनसे मिलकर उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने हँसते हुए-से यह शूरोचित वचन कहा-- इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनविषयक दी सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २४९ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ “लोक मिलाकर कुल ४१३ “लोक हैं) ८-० (3) #पत अर पज्चाशदधिकद्वधिशततमो< ध्याय: कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय कर्ण उवाच राजन्नाद्यावगच्छामि तवेह लघुसत्त्वताम्‌ । किमत्र चित्र यद्‌ वीर मोक्षित: पाण्डवैरसि

Duryodhana berkata: “Karna, setelah bertemu Citrāsena, Arjuna—pembunuh para pahlawan musuh—pada saat itu mengucapkan kata-kata ini sambil tersenyum, kata-kata yang layak bagi seorang kesatria.”

Verse 2

भ्रातृनहसि मे वीर मोक्तुं गन्धर्वसत्तम । अनर्हधर्षणा हीमे जीवमानेषु पाण्डुषु,“वीर गन्धर्वश्रेष्ठ! तुम्हें मेरे इन भाइयोंको मुक्त कर देना चाहिये। पाण्डवोंके जीते-जी ये इस प्रकार अपमान सहन करनेयोग्य नहीं हैं!

“Wahai pahlawan, yang terbaik di antara para Gandharva! Lepaskanlah saudara-saudaraku ini. Selagi para Pāṇḍava masih hidup, tidak patut mereka menanggung kehinaan dan perlakuan sewenang-wenang seperti ini.”

Verse 3

एवमुक्तस्तु गन्धर्व: पाण्डवेन महात्मना | उवाच यत्‌ कर्ण वयं मन्त्रयन्तो विनिर्गता:

Setelah demikian disapa oleh Pāṇḍava yang mulia, sang Gandharva menjawab: “Wahai Karna, kami keluar ketika sedang bermusyawarah.”

Verse 4

तस्मिन्नुच्चार्यमाणे तु गन्धर्वेण वचस्तथा

Ketika kata-kata itu demikian diucapkan oleh sang Gandharva—

Verse 5

युधिष्ठिरमथागम्य गन्धर्वा: सह पाण्डवै:

Kemudian para Gandharwa, bersama para Pāṇḍawa, mendatangi Yudhiṣṭhira dan berdiri di hadapannya.

Verse 6

स्त्रीसमक्षमहं दीनो बद्ध: शत्रुवशं गत:

Di hadapan para perempuan, aku menjadi hina; terbelenggu dan jatuh ke dalam kuasa musuh-musuhku.

Verse 7

युधिष्ठटिरस्योपह्त: कि नु दुःखमत: परम्‌ | स्त्रियोंके सामने मैं दीनभावसे बँधकर शत्रुओंके वशमें पड़ गया और उसी दशामें युधिष्ठिरको अर्पित किया गया। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ।। ६३ || ये मे निराकृता नित्यं रिपुर्येषामहं सदा

Apa duka yang lebih besar daripada ini—dipermalukan di hadapan Yudhiṣṭhira? Di depan para perempuan aku diikat dalam kehinaan, jatuh ke dalam kuasa musuh, dan dalam keadaan itulah aku dipersembahkan kepada Yudhiṣṭhira. Kesedihan apa lagi yang melampaui ini?

Verse 8

तैर्मोक्षितो<हं दुर्बृद्धिर्दत्तं तैरैव जीवितम्‌ । जिनका मैंने सदा तिरस्कार किया और जिनका मैं सर्वदा शत्रु बना रहा, उन्हीं लोगोंने मुझ दुर्बुद्धिको शत्रुओंके बन्धनसे छुड़ाया है और उन्होंने ही मुझे जीवनदान दिया है ।। ७३ || प्राप्त: स्यां यद्य॒हं वीर वधधं तस्मिन्‌ महारणे

Aku yang berpikiran sesat ini dibebaskan oleh mereka; bahkan nyawaku pun dianugerahkan oleh mereka saja. Orang-orang yang selalu kucemooh dan yang senantiasa kuanggap musuh—merekalah yang melepaskanku dari belenggu lawan dan memberiku karunia hidup.

Verse 9

भवेद्‌ यश: पृथिव्यां मे ख्यातं गन्धर्वतो वधात्‌

Bila aku membunuh Gandharwa itu, kemasyhuranku akan termasyhur di seluruh bumi.

Verse 10

यत्‌ त्वद्य मे व्यवसितं तच्छूणुध्वं नरर्षभा:

Duryodhana berkata: “Wahai insan-insan utama, dengarkanlah keputusan yang telah kutetapkan hari ini.”

Verse 11

भ्रातरश्वैव मे सर्वे यान्त्वद्य स्वपुरं प्रति

Duryodhana berkata: “Biarlah semua saudaraku hari ini juga kembali menuju kota kita sendiri.”

Verse 12

कर्णप्रभृतयश्वैव सुह्ृदो बान्धवाश्न ये | दुःशासन पुरस्कृत्य प्रयान्त्वद्य पुरं प्रति

Duryodhana berkata: “Biarlah Karna dan yang lainnya—para sahabat setia serta kerabatku—berangkat hari ini menuju kota, dengan Duhshasana di barisan terdepan.”

Verse 13

मेरे सब भाई आज अपनी राजधानीको चले जायाँँ। कर्ण आदि मेरे मित्र तथा बान्धवगण भी दुःशासनको आगे करके आज ही हस्तिनापुरको लौट जायाँ ।। न हाहं सम्प्रयास्यामि पुरं शत्रुनिराकृत: । शत्रुमानापहो भूत्वा सुहददां मानकृत्‌ तथा,शत्रुओंसे अपमानित होकर अब मैं अपने नगरको नहीं जाऊँगा। अबतक मैंने शत्रुओंका मानमर्दन किया है और सुहृदोंको सम्मान दिया है

Duryodhana berkata: “Biarlah semua saudaraku hari ini pergi ke ibu kota. Karna dan yang lain—para sahabat serta kerabatku—hendaklah juga kembali ke Hastinapura hari ini juga, dengan Duhshasana di depan. Namun aku tidak akan pulang ke kota sebagai orang yang dipukul mundur oleh musuh. Aku telah merendahkan keangkuhan lawan dan memuliakan para sahabatku sebagaimana mestinya; kini aku tak sudi kembali dalam kehinaan.”

Verse 14

स सुहृच्छोकदो जात: शत्रूणां हर्षवर्धन: । वारणाह्नयमासाद्य कि वक्ष्यामि जनाधिपम्‌,परंतु आज मैं अपने सुहृदोंके लिये शोकदायक और शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाला हो गया। हस्तिनापुर जाकर मैं राजासे क्या कहूँगा?

“Hari ini aku menjadi sumber duka bagi para sahabatku dan penambah sukacita bagi musuh-musuhku. Bila aku tiba di Hastinapura, apa yang dapat kukatakan kepada sang raja?”

Verse 15

भीष्मद्रोणौ कृपद्रौणी विदुर: संजयस्तथा । बाह्लीकः सौमदत्तिश्न ये चान्ये वृद्धसम्मता:,भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विदुर, संजय, बाह्नलीक, भूरिश्रवा तथा अन्य जो वृद्ध पुरुषोंके लिये आदरणीय महानुभाव हैं वे, तथा ब्राह्मण, प्रमुख वैश्यगण और उदासीन वृत्तिवाले लोग मुझसे क्या कहेंगे और मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?

Duryodhana berkata: “Bhishma dan Drona, Kripa dan putra Drona (Ashvatthama), juga Vidura dan Sanjaya; Bahlika dan putra Somadatta (Bhūrishravas), serta para sesepuh lain yang dihormati—apa yang akan dikatakan para mulia itu kepadaku? Dan apa jawaban yang dapat kuberikan kepada mereka—bersama para Brahmana, para Vaishya terkemuka, dan mereka yang memilih bersikap netral?”

Verse 16

ब्राह्मणा: श्रेणिमुख्याश्व तथोदासीनवृत्तय: । किं मां वक्ष्यन्ति कि चापि प्रतिवक्ष्यामि तानहम्‌,भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विदुर, संजय, बाह्नलीक, भूरिश्रवा तथा अन्य जो वृद्ध पुरुषोंके लिये आदरणीय महानुभाव हैं वे, तथा ब्राह्मण, प्रमुख वैश्यगण और उदासीन वृत्तिवाले लोग मुझसे क्या कहेंगे और मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?

Duryodhana berkata: “Apa yang akan dikatakan para Brahmana, para pemuka serikat-serikat, dan mereka yang hidup dengan sikap lepas serta netral kepadaku? Dan apa yang akan kujawab kepada mereka? Dan para sesepuh yang dimuliakan—Bhishma, Drona, Kripa, Ashvatthama, Vidura, Sanjaya, Bahlika, Bhūrishravas, serta para tokoh lain yang patut dihormati—apa pula yang akan mereka katakan kepadaku?”

Verse 17

रिपूर्णां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि । आत्मदोषात्‌ परिशभ्रष्ट: कथं वक्ष्यामि तानहम्‌,मैं पराक्रम करके शत्रुओंके मस्तक तथा छातीपर खड़ा हो गया था; परंतु अब अपने ही दोषसे नीचे गिर गया। ऐसी दशामें उन आदरणीय पुरुषोंसे मैं किस प्रकार वार्तालाप करूँगा?

Aku pernah berdiri dengan gagah, menginjak kepala dan dada musuh; namun kini, karena kesalahanku sendiri, aku terjatuh dari kedudukan itu. Dalam keadaan demikian, bagaimana mungkin aku berbicara kepada para lelaki yang patut dimuliakan itu?

Verse 18

दुर्विनीता: श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च । तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाहं मदगर्वित:,उद्ण्ड मनुष्य लक्ष्मी, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी दीर्घकालतक कल्याणमय पदपर प्रतिष्ठित नहीं रह पाते हैं। जैसे मैं मद और अहंकारमें चूर होकर अपनी प्रतिष्ठा खो बैठा हूँ

Wahai yang mulia, mereka yang tak terdidik dan tak terkendali—meski memperoleh Sri (kemakmuran), pengetahuan, dan kekuasaan—tak akan lama bertahan pada kedudukan yang membawa kebaikan; sebagaimana aku, mabuk oleh kesombongan, telah kehilangan kehormatanku sendiri.

Verse 19

अहो नाह॑मिदं कर्म कष्टं दुश्चरितं कृतम्‌ । स्वयं दुर्बुद्धिना मोहाद्‌ येन प्राप्तोडस्मि संशयम्‌,अहो! यह कुकर्म मेरे योग्य नहीं था। मुझ दुर्बुद्धिने स्वयं ही मोहवश दु:खदायक दुष्कर्म कर डाला; जिससे (गन्धर्वोका बंदी हो जानेके कारण) मेरा जीवन संदिग्ध हो गया

Ah, perbuatan yang keras dan tercela ini bukanlah pantas bagiku. Aku sendiri, karena kebodohan dan tertipu oleh delusi, telah melakukan kejahatan yang menyakitkan ini—hingga kini nyawaku pun berada dalam keraguan dan bahaya.

Verse 20

तस्मात्‌ प्रायमुपासिष्ये न हि शक्ष्यामि जीवितुम्‌ | चेतयानो हि को जीवेत्‌ कृच्छाच्छत्रुभिरुद्धृत:,इसलिये मैं (अवश्य) आमरण उपवास करूँगा। अब जीवित नहीं रह सकूँगा। जिसका शत्रुओंने संकटसे उद्धार किया हो, ऐसा कौन विचारशील पुरुष जीवित रहना चाहेगा?

Karena itu aku akan menjalani prāya—puasa sampai mati; aku tak sanggup lagi hidup. Sebab lelaki yang sadar diri, siapa yang mau tetap hidup setelah diselamatkan dari kesusahan oleh musuh-musuhnya?

Verse 21

शत्रुओंने मेरी हँसी उड़ायी है। मुझे अपने पौरुषका अभिमान था; किंतु यहाँ मैं कोई पुरुषार्थ न दिखा सका। पराक्रमी पाण्डवोंने अवहेलनापूर्ण दृष्टिसे मुझे देखा है। (ऐसी दशामें मुझे इस जीवनसे विरक्ति हो गयी है)

Musuh-musuh telah menertawakanku. Aku dulu membanggakan keperkasaan, namun di sini aku tak mampu menunjukkan usaha dan keberanian apa pun. Para Pāṇḍava yang gagah memandangku dengan hina; maka timbullah kejijikan terhadap hidup ini sendiri.

Verse 22

वैशम्पायन उवाच एवं चिन्तापरिगतो दुःशासनमथाब्रवीत्‌ | दुःशासन निबोधेदं वचनं मम भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार चिन्तामग्न हुए दुर्योधनने दुःशासनसे कहा--'भरतनन्दन दुःशासन! मेरी यह बात सुनो--

Vaiśampāyana berkata: Demikian, diliputi kecemasan, Duryodhana lalu berkata kepada Duḥśāsana, “Duḥśāsana, wahai keturunan Bharata, dengarkanlah perkataanku ini.”

Verse 23

प्रतीच्छ त्वं मया दत्तमभिषेकं नूपो भव । प्रशाधि पृथिवीं स्फीतां कर्णममौबलपालिताम्‌,“मैं तुम्हारा राज्याभिषेक करता हूँ। तुम मेरे दिये हुए इस राज्यको ग्रहण करो और राजा बनो। कर्ण और शकुनिकी सहायतासे सुरक्षित एवं धन-धान्यसे समृद्ध इस पृथ्वीका शासन करो

Terimalah penobatan kerajaan yang kuberikan; jadilah raja. Perintahlah bumi yang makmur ini—terlindungi oleh kekuatan Karṇa dan Śakuni.

Verse 24

भ्रातृन्‌ पालय विस्रब्ध॑ मरुतो वृत्रहा यथा । बान्धवाश्लोपजीवन्तु देवा इव शतक़ुतुम्‌,जैसे इन्द्र मरुद्णोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने अन्य भाइयोंका विश्वासपूर्वक पालन करना। जैसे देवता इन्द्रके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे बान्धवजन भी तुम्हारा आश्रय लेकर जीविका चलावें

Lindungilah saudara-saudaramu dengan keyakinan yang teguh, sebagaimana Vṛtrahā (Indra) melindungi para Marut. Dan biarlah kaum kerabatmu hidup bersandar padamu, sebagaimana para dewa hidup ditopang oleh Śatakratu (Indra).

Verse 25

ब्राह्मणेषु सदा वृत्तिं कुर्वीथाश्वाप्रमादत: । बन्धूनां सुहृदां चैव भवेथास्त्वं गति: सदा,'प्रमाद छोड़कर सदा ब्राह्मणोंकी जीविकाकी व्यवस्था एवं रक्षा करना। बन्धुओं तथा सुहृदोंको सदैव सहारा देते रहना

Tanpa kelengahan, senantiasa pastikan penghidupan dan perlindungan para Brāhmaṇa. Dan bagi sanak-kerabat serta para sahabat baikmu, jadilah selalu tempat berlindung dan penopang.

Verse 26

ज्ञातीश्वाप्पनुपश्येथा विष्णुरदेवगणान्‌ यथा । गुरव: पालनीयास्ते गच्छ पालय मेदिनीम्‌

Pandanglah sanak-kerabatmu sebagaimana Viṣṇu memandang para dewa—dengan sikap melindungi dan tanpa permusuhan. Para guru dan para sesepuh patut engkau jaga. Pergilah, perintahilah bumi.

Verse 27

नन्दयन्‌ सुहृदः सर्वान्‌ शात्रवां क्षावभर्त्सयन्‌ । कण्ठे चैनं परिष्वज्य गम्यतामित्युवाच ह

Sambil menggembirakan semua sahabat baik dan menegur para musuh, ia memeluknya pada leher dan berkata, “Sekarang berangkatlah.”

Verse 28

'जैसे भगवान्‌ विष्णु देवताओंपर कृपादृष्टि रखते हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने कुटुम्बीजनोंकी देखभाल करते रहना और गुरुजनोंका सदैव पालन करना। अच्छा, अब जाओ और समस्त सुहृदोंका आनन्द बढ़ाते तथा शत्रुओंकी भर्त्सना करते हुए अपनी अधिकृत भूमिकी रक्षा करो।” ऐसा कहकर दुर्योधनने दुःशासनको गलेसे लगा लिया और गद्गद कण्ठसे कहा--“जाओ' ।। तस्य तद्‌ू वचन श्रुत्वा दीनो दुःशासनो<ब्रवीत्‌ । अश्रुकण्ठ: सुदुःखार्त: प्राउजलि: प्रणिपत्य च,दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुःशासनका गला भर आया। वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने बड़े भाईके चरणोंमें गिर पड़ा और गदगद वाणीमें व्यथित चित्तसे इस प्रकार बोला--'भैया! आप प्रसन्न हों?” ऐसा कहकर वह धरतीपर लोट गया और दु:खसे कातर हो दुर्योधनके दोनों चरणोंमें अपने नेत्रोंका अश्रुजल चढ़ाता हुआ नरश्रेष्ठ द:शासन यों बोला--“नहीं, ऐसा नहीं होगा

Mendengar kata-kata itu, Duḥśāsana menjadi lemah dan murung. Tenggorokannya tersedak oleh air mata; dilanda duka yang amat, ia bersedekap tangan, bersujud hormat, lalu berkata.

Verse 29

सगद्गदमिदं वाक्‍्यं भ्रातरं ज्येष्ठमात्मन: । प्रसीदेत्यपतद्‌ भूमौ दूयमानेन चेतसा,दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुःशासनका गला भर आया। वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने बड़े भाईके चरणोंमें गिर पड़ा और गदगद वाणीमें व्यथित चित्तसे इस प्रकार बोला--'भैया! आप प्रसन्न हों?” ऐसा कहकर वह धरतीपर लोट गया और दु:खसे कातर हो दुर्योधनके दोनों चरणोंमें अपने नेत्रोंका अश्रुजल चढ़ाता हुआ नरश्रेष्ठ द:शासन यों बोला--“नहीं, ऐसा नहीं होगा

Dengan suara tersendat, ia berkata kepada kakak sulungnya, “Berkenanlah.” Lalu, dengan hati yang terbakar oleh duka, ia jatuh tersungkur ke tanah.

Verse 30

दुःखित: पादयोस्तस्य नेत्रजं जलमुत्सूजन्‌ । उक्तवांश्व॒ नरव्याप्रो नैतदेवं भविष्यति,दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुःशासनका गला भर आया। वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने बड़े भाईके चरणोंमें गिर पड़ा और गदगद वाणीमें व्यथित चित्तसे इस प्रकार बोला--'भैया! आप प्रसन्न हों?” ऐसा कहकर वह धरतीपर लोट गया और दु:खसे कातर हो दुर्योधनके दोनों चरणोंमें अपने नेत्रोंका अश्रुजल चढ़ाता हुआ नरश्रेष्ठ द:शासन यों बोला--“नहीं, ऐसा नहीं होगा

Vaiśampāyana berkata: Diliputi duka, ia tersungkur di kaki kakaknya, membiarkan air mata mengalir dari matanya. Lalu sang harimau di antara manusia itu, dengan suara tersendat oleh pilu, berkata: “Tidak—ini tidak akan terjadi demikian.”

Verse 31

विदीर्येत्‌ सकला भूमिद्यौश्वापि शकलीभवेत्‌ | रविरात्मप्रभां जह्मात्‌ सोम: शीतांशुतां त्यजेत्‌,“चाहे सारी पृथ्वी फट जाय, आकाशके टुकड़े-टुकड़े हो जाय, सूर्य अपनी प्रभा और चन्द्रमा अपनी शीतलता त्याग दें, वायु अपनी तीव्र गति छोड़ दें, हिमालय अपना स्थान छोड़कर इधर-उधर घूमने लगे, समुद्रका जल सूख जाय तथा अग्नि अपनी उष्णता त्याग दे; परंतु मैं आपके बिना इस पृथ्वीका शासन नहीं करूँगा। राजन्‌! अब आप प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये।” इस अन्तिम वाक्यको दुःशासनने बार-बार दुहराया और इस प्रकार कहा --

“Sekalipun seluruh bumi terbelah dan langit hancur berkeping-keping; sekalipun matahari meninggalkan cahayanya dan bulan melepaskan sinar sejuknya—tetap saja, wahai Raja, tanpa engkau aku tidak akan memerintah bumi ini. ‘Berkenanlah—berkenanlah!’ Kalimat terakhir itu diulanginya berkali-kali.”

Verse 32

वायु: शैघ्रयमथो जह्माद्धिमवांश्व॒ परिव्रजेत्‌ । शुष्येत्‌ तोयं समुद्रेषु वह्लिरप्युष्णतां त्यजेत्‌,“चाहे सारी पृथ्वी फट जाय, आकाशके टुकड़े-टुकड़े हो जाय, सूर्य अपनी प्रभा और चन्द्रमा अपनी शीतलता त्याग दें, वायु अपनी तीव्र गति छोड़ दें, हिमालय अपना स्थान छोड़कर इधर-उधर घूमने लगे, समुद्रका जल सूख जाय तथा अग्नि अपनी उष्णता त्याग दे; परंतु मैं आपके बिना इस पृथ्वीका शासन नहीं करूँगा। राजन्‌! अब आप प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये।” इस अन्तिम वाक्यको दुःशासनने बार-बार दुहराया और इस प्रकार कहा --

“Sekalipun angin meninggalkan kelincahannya, sekalipun Himālaya berpindah dari tempatnya dan mengembara; sekalipun air lautan mengering dan api pun melepaskan panasnya—tetap saja, wahai Raja, tanpa engkau aku tidak akan memerintah bumi ini.” Dan ia mengulang-ulang, “Berkenanlah—berkenanlah.”

Verse 33

द्रष्टार: सम सुखाद्धीनान्‌ सदारान्‌ पाण्डवानिति । कर्ण! महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके ऐसा कहनेपर गन्धर्वने वह बात कह दी, जिसके लिये सलाह करके हमलोग घरसे चले थे। उसने बताया कि “ये कौरव सुखसे वज्चित हुए पाण्डवों तथा द्रौपदीकी दुर्दशा देखनेके लिये आये हैं”,न चाहं त्वदृते राजन्‌ प्रशासेयं वसुन्धराम्‌ । पुन: पुन: प्रसीदेति वाक्‍्यं चेदमुवाच ह “चाहे सारी पृथ्वी फट जाय, आकाशके टुकड़े-टुकड़े हो जाय, सूर्य अपनी प्रभा और चन्द्रमा अपनी शीतलता त्याग दें, वायु अपनी तीव्र गति छोड़ दें, हिमालय अपना स्थान छोड़कर इधर-उधर घूमने लगे, समुद्रका जल सूख जाय तथा अग्नि अपनी उष्णता त्याग दे; परंतु मैं आपके बिना इस पृथ्वीका शासन नहीं करूँगा। राजन्‌! अब आप प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये।” इस अन्तिम वाक्यको दुःशासनने बार-बार दुहराया और इस प्रकार कहा --

Duryodhana berkata: “Karna, Gandharva itu telah mengucapkan tepat hal yang karenanya, setelah bermusyawarah, kami berangkat dari rumah: ‘Para Kaurava ini datang untuk memandang para Pandava—yang kehilangan kebahagiaan—bersama istri mereka.’ Dan ia juga berkata: ‘Wahai Raja, tanpa engkau aku tidak akan memerintah bumi ini; berkenanlah—berkenanlah.’ Demikianlah seruan itu diulanginya berkali-kali.”

Verse 34

त्वमेव न: कुले राजा भविष्यसि शतं समा: । एवमुक्‍त्वा स राजान सुस्वरं प्ररुरोद ह

“Engkaulah satu-satunya raja dalam wangsa kami selama seratus tahun.” Setelah berkata demikian, ia menangis keras di hadapan sang raja, suaranya terdengar jelas.

Verse 35

तथा तौ दुःखितौ दृष्टवा दःशासनसुयोधनौ

Melihat kedua orang itu diliputi duka, Duhśāsana dan Suyodhana pun bereaksi demikian.

Verse 36

विषीदथ: कि कौरव्यौ बालिश्यात्‌ प्राकृताविव

Wahai dua pangeran Kaurava, mengapa kalian tenggelam dalam keputusasaan—seperti orang kebanyakan yang kasar—hanya karena kebodohan kanak-kanak?

Verse 37

यदा च शोचत: शोको व्यसनं नापकर्षति

Dan ketika, meski seseorang berduka, duka itu tidak mampu menyingkirkan malapetaka yang menimpanya,

Verse 38

सामर्थ्य कि तत: शोके शोचमानौ प्रपश्यथ: । धृतिं गृह्लीत मा शत्रून्‌ शोचन्तौ नन्दयिष्यथ:

Maka apa guna kemampuan apa pun bila kalian tenggelam dalam duka dan hanya memandang sambil meratap? Peganglah keteguhan hati; jangan, dengan berduka, membuat musuh bersukacita.

Verse 39

जब शोक करनेवालेका शोक उसपर आये हुए संकटको टाल नहीं सकता है, तब उसमें क्या सामर्थ्य है? यह तुम दोनों भाई शोक करके प्रत्यक्ष देख रहे हो। अत: धैर्य धारण करो। शोक करके तो शत्रुओंका हर्ष ही बढ़ाओगे ।। कर्तव्यं हि कृतं राजन्‌ पाण्डवैस्तव मोक्षणम्‌ । नित्यमेव प्रियं कार्य राज्ञो विषयवासिभि:,“राजन! पाण्डवोंने गन्धर्वोके हाथसे तुम्हें छुड़कर अपने कर्तव्यका ही पालन किया है। राजाके राज्यमें रहनेवालोंको सदा ही उसका प्रिय करना चाहिये

Bila duka, pada orang yang berduka, tidak mampu menolak bencana yang telah menimpanya, maka kuasa apakah yang dimilikinya? Kalian berdua bersaudara melihatnya dengan nyata, bahkan ketika kalian meratap. Karena itu, teguhkanlah hati; dengan berduka kalian hanya menambah sukacita musuh. Wahai raja, para Pāṇḍava telah melakukan apa yang wajib—membebaskan engkau dari tangan para Gandharva. Mereka yang tinggal dalam wilayah seorang raja hendaknya senantiasa bertindak dengan cara yang menyenangkan dan menguatkan sang penguasa.

Verse 40

पाल्यमानास्त्वया ते हि निवसन्ति गतज्वरा: । ना्हस्येवंगते मन्युं कर्तु प्राकृतवद्‌ यथा,“तुमसे सुरक्षित होकर वे यहाँ निश्चिन्ततापूर्वक निवास कर रहे हैं। ऐसी दशामें तुम्हें निम्न कोटिके मनुष्योंकी तरह दीनतापूर्ण खेद नहीं करना चाहिये

Waiśampāyana berkata: “Di bawah perlindungan dan pemeliharaanmu, mereka tinggal di sini tanpa demam kegelisahan. Dalam keadaan demikian, engkau tidak patut larut dalam amarah atau iba pada diri sendiri seperti orang kebanyakan.”

Verse 41

विषण्णास्तव सोदर्यस्त्वियि प्रायं समास्थिते । (तदलं दुःखितानेतान्‌ कर्तु सर्वान्‌ नराधिप ।।) उत्तिष्ठ ब्रज भद्रं ते समाश्वासय सोदरान्‌,“राजन! तुम आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठे हो और इधर तुम्हारे सगे भाई शोक एवं विषादमें डूबे हुए हैं। बस, इन सबको दुःखी करनेसे कोई लाभ नहीं है। तुम्हारा भला हो। उठो, चलो और अपने भाइयोंको आश्वासन दो”

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja, karena engkau berketetapan menjalani puasa sampai mati, saudara-saudaramu tenggelam dalam duka dan putus asa. Cukuplah—tiada guna membuat mereka semua menderita, wahai penguasa manusia. Semoga baik bagimu. Bangkitlah, pergilah, dan teguhkan hati saudara-saudaramu.”

Verse 46

भूमेर्विवरमन्वैच्छ प्रवेष्टं व्रीडयान्वित: । जिस समय गन्धर्व उपर्युक्त बात कह रहा था, उस समय मैं (अत्यन्त) लज्जित हो गया। मेरी इच्छा हुई कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ

Duryodhana berkata: “Dilanda malu, aku mendambakan bumi terbelah, agar aku dapat masuk ke dalamnya dan lenyap.”

Verse 56

अस्महुर्मन्त्रितं तस्मै बद्धांश्वास्मान्‌ न्यवेदयन्‌ | तत्पश्चात्‌ गन्धर्वोने पाण्डवोंके साथ युधिष्ठिरके पास आकर हमलोगोंकी दुर्मन्त्रणा उन्हें बतायी और हमें उनके सुपुर्द कर दिया। उस समय हम सब लोग बँधे हुए थे

Duryodhana berkata: “Kami telah menyampaikan siasat kami kepadanya; lalu kami pun berada dalam ikatan. Setelah itu sang Gandharwa datang kepada Yudhiṣṭhira bersama para Pāṇḍawa, membuka rencana jahat kami, dan menyerahkan kami ke dalam tahanan mereka. Saat itu kami semua terbelenggu.”

Verse 83

श्रेयस्तद्‌ भविता महां नैवंभूतस्य जीवितम्‌ । वीर! यदि मैं उस महायुद्धमें मारा गया होता तो यह मेरे लिये कल्याणकारी होता; परंतु इस दशामें जीवित रहना कदापि अच्छा नहीं है

Duryodhana berkata: “Wahai pahlawan, bagi diriku dalam keadaan seperti ini, maut lebih baik daripada hidup. Seandainya aku gugur dalam perang besar itu, itulah yang sungguh membawa keberuntungan bagiku; tetapi tetap hidup dalam keadaan ini tak pernah baik.”

Verse 93

प्राप्ताश्न पुण्यलोका: स्युर्महेन्द्रसदने5क्षया: । गन्धर्वके हाथसे मारे जानेपर इस भूमण्डलमें मेरा यश विख्यात हो जाता और इन्द्रलोकमें मुझे अक्षय पुण्यधाम प्राप्त होते

Duryodhana merenung: “Seandainya aku gugur oleh tangan para Gandharwa, kemasyhuranku akan termasyhur di seluruh bumi, dan di istana Mahendra aku akan memperoleh kediaman pahala yang tak binasa.”

Verse 103

इह प्रायमुपासिष्ये यूयं व्रजत वै गृहान्‌ । नरश्रेष्ठ वीरो! अब मैंने जो निश्चय किया है, उसे सुनो। मैं यहाँ आमरण अनशन करूँगा। तुम सब लोग घर लौट जाओ

Duryodhana berkata: “Aku akan menjalani prāyopaveśa di sini—puasa sampai mati. Kalian semua pulanglah ke rumah.”

Verse 231

शत्रुभिश्वावहसितो मानी पौरुषवर्जित: । पाण्डवैरविक्रमाब्यैश्व सावमानमवेक्षित:

Duryodhana berkata: “Dicemooh musuh-musuhku, aku tetap berpegang pada kesombongan meski kehilangan keperkasaan sejati; dan oleh para Pāṇḍava—yang kuanggap berani seadanya—aku dipandang dengan hina.”

Verse 249

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे एकोनपजञ्चाशदधिकद्वधिशततमो< ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—bagian Ghoṣa-yātrā—berakhirlah bab ke-249 tentang prāyopaveśa (puasa sampai mati) Duryodhana.

Verse 346

पादौ संस्पृश्य मानाहँं भ्रातुर्ज्येछ्ठस्य भारत । 'भैया! आप ही हमारे कुलमें सौ वर्षोतक राजा बने रहेंगे।। जनमेजय! ऐसा कहकर दुःशासन अपने बड़े भाईके माननीय चरणोंको पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata, setelah menyentuh kaki kakaknya yang sulung, ia berkata: ‘Kakanda, engkaulah yang akan menjadi raja dalam wangsa kita selama seratus tahun.’” Wahai Janamejaya, setelah berkata demikian, Duḥśāsana memeluk kaki kakaknya yang dimuliakan dan menangis tersedu-sedu.

Verse 353

अधिगम्य व्यथाविष्ट: कर्णस्तौ प्रत्यभाषत । दुःशासन और दुर्योधनको इस प्रकार दुःखी होते देख कर्णके मनमें बड़ी व्यथा हुई। उसने निकट जाकर उन दोनोंसे कहा--

Melihat Duḥśāsana dan Duryodhana tenggelam dalam duka, hati Karṇa diliputi pedih. Ia mendekati keduanya lalu menegur mereka—

Verse 366

न शोक: शोचमानस्य विनिवर्तेत कर्हिचित्‌ | “कुरुकुलके श्रेष्ठ वीरो! तुम दोनों गँवारोंकी तरह नासमझीके कारण इतना विषाद क्‍यों कर रहे हो? शोकमें डूबे रहनेसे किसी मनुष्यका शोक कभी निवृत्त नहीं होता

Duka tidak akan sirna bagi orang yang terus meratap; tenggelam dalam ratap tak pernah menghapus duka.

Frequently Asked Questions

The chapter frames a propriety dilemma: how a lone royal woman in exile should respond to questioning by an unfamiliar noble—balancing safety, decorum, truthful identification, and the obligations of hospitality.

Dharma is situationally enacted through controlled speech and disciplined hospitality: even under scarcity and vulnerability, ethical order is maintained by proper address, truthful self-location, and honoring guests.

No explicit phalaśruti appears in this unit; the meta-significance is implicit—this episode models dharmic communication and atithi-dharma as practical virtues sustaining social legitimacy during exile.