Adhyaya 171
Vana ParvaAdhyaya 17130 Versesप्रारम्भ में दानवों की घेराबंदी; मध्य में अर्जुन का प्रचण्ड प्रत्याक्रमण; अंत में दानव प्रत्यक्ष युद्ध में क्षीण होकर माया-रणनीति की ओर मुड़ते हैं।

Adhyaya 171

इन्द्रप्रशंसा, दिव्योपकरणदानं, गन्धमादनसमागमश्च (Indra’s Commendation, Bestowal of Divine Insignia, and the Gandhamādana Reunion)

Upa-parva: Indraloka-prāpti / Divyāstra-prāpti (Arjuna in Indra’s celestial realm)

Arjuna reports that Indra, observing him as battle-worn yet steadfast, speaks at an opportune time to affirm that divine weapons reside with him and that no human opponent on earth can overpower him. Indra further assesses prominent adversarial figures—Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Karṇa, Śakuni and allied kings—as unable to match even a fraction of Arjuna’s battlefield capacity when he is properly equipped. The chapter records the conferment/confirmation of protective and royal-martial emblems: an impenetrable divine armor (kavaca), a golden garland, the loud conch Devadatta, a divine crown fitted by Indra, and additional celestial garments and ornaments. Arjuna states that he dwelt comfortably in Indra’s sacred residence for five years among Gandharva youths, while remembering the dice-born calamity. Indra then instructs him to depart, noting that his brothers remember him. Arjuna reaches Gandhamādana and meets Yudhiṣṭhira surrounded by his brothers; Yudhiṣṭhira expresses auspicious joy at Arjuna’s success with Indra, Śiva (Sthāṇu) and the guardians of the worlds, and requests to see the divine weapons used against the Nivātakavacas. Arjuna agrees to show them the next morning. Vaiśaṃpāyana closes the unit by noting that Arjuna, having narrated his return, spends the night with his brothers.

Chapter Arc: समुद्र-गर्भ की भयावह गुफाओं में अर्जुन का रथ-मार्ग रोककर निवातकवच दानव गर्जना करते हैं—मानो तिमि-तिमिंगिल की कथा साक्षात् युद्ध-रूप ले चुकी हो। → दानव चारों ओर से रथपन्था आच्छादित कर शर-वर्षा करते हैं; फिर शूल, पट्टिश और भुशुण्डी की घोर वर्षा छूटती है। अर्जुन पर निरन्तर प्रहार होते हैं, पर वह ब्रह्मास्त्र-परिमन्त्रित लघु, तीक्ष्ण बाणों से प्रत्युत्तर देता है; रथ-नेमि का घर्घर, घोड़ों की चरण-ध्वनि और बाणों की चोट से रणभूमि काँप उठती है। → अर्जुन के बाण इन्द्र-वज्र-स्पर्शी बनकर दानवों पर टूटते हैं; शतधा भिन्न देह, क्षीण अस्त्र-बल—फिर भी निवातकवच मायावी युद्ध का आश्रय लेते हैं, और प्रत्यक्ष पराक्रम के बाद छल-छाया का द्वार खुलता है। → दानवों की प्रत्यक्ष सेना भारी क्षति उठाती है; अर्जुन की शर-वर्षा से वे समुद्धिग्न होकर पीछे हटते-से दिखते हैं, पर पराजय स्वीकार नहीं करते—रण का रूप बदलने की तैयारी करते हैं। → क्षीण प्रहरण-ओजस होकर भी निवातकवच ‘माया’ से युद्ध करने लगते हैं—अब अर्जुन को केवल शस्त्र-बल नहीं, विवेक-बल से भी लड़ना होगा।

Shlokas

Verse 1

हि मय - न () असम अप १. एक विशेष प्रकारके मत्स्यका नाम 'तिमि” है, जो उसे निगल जाता है, उस महामत्स्यको 'तिमिंगिल” कहते हैं। २. जो तिमिंगलको भी निगल जाता है, उस महामहामत्स्यका नाम 'तिमितिमिंगिल' है। ३. नीलकण्ठी टीकामें लिखा है कि पृथ्वीमें उतरकर निम्नस्थलमें गये हुए रथके चक्केको दृढ़तापूर्वक पकड़कर ऊँचा किया। सप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध अजुन उवाच ततो निवातकवचा: सर्वे वेगेन भारत । अभ्यद्रवन्‌ मां सहिता: प्रगृहीतायुधा रणे,अर्जुन बोले--भारत! तदनन्तर सारे निवातकवच संगठित हो हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये युद्धभूमिमें वेगपूर्वक मेरे ऊपर टूट पड़े

Arjuna berkata: Lalu, wahai Bhārata, semua Nivātakavaca, dalam satu barisan, menerjangku dengan kecepatan besar di medan laga, senjata mereka tergenggam erat.

Verse 2

आच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथा: । आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षरवाकिरन्‌,उन महारथी दानवोंने मेरे रथका मार्ग रोककर भीषण गर्जना करते हुए मुझे सब ओरसे घेर लिया और मुझपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। फिर कुछ अन्य महापराक्रमी दानव शूल और पट्टिश आदि हाथोंमें लिये मेरे सामने आये और मुझपर शूल तथा भुशुण्डियोंका प्रहार करने लगे

Arjuna berkata: Para kesatria kereta yang perkasa itu menutup jalan keretaku; sambil mengaum mengerikan, mereka mengepungku dari segala arah dan menumpahkanku dengan hujan anak panah yang menderu.

Verse 3

ततो<परे महावीर्या: शूलपट्टिशपाणय: । शूलानि च भुशुण्डीश्व मुमुचुर्दानवा मयि,उन महारथी दानवोंने मेरे रथका मार्ग रोककर भीषण गर्जना करते हुए मुझे सब ओरसे घेर लिया और मुझपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। फिर कुछ अन्य महापराक्रमी दानव शूल और पट्टिश आदि हाथोंमें लिये मेरे सामने आये और मुझपर शूल तथा भुशुण्डियोंका प्रहार करने लगे

Lalu datang pula para raksasa lain yang sangat perkasa, menggenggam tombak dan kapak-perang; mereka melemparkan tombak serta peluru berat (bhuśuṇḍī) ke arahku.

Verse 4

तच्छूलवर्ष सुमहद्‌ गदाशक्तिसमाकुलम्‌ | अनिशं सृज्यमानं तैरपतन्मद्रथोपरि,दानवोंद्वारा की गयी वह शूलोंकी बड़ी भारी वर्षा निरन्तर मेरे रथपर होने लगी। उसके साथ ही गदा और शक्तियोंका भी प्रहार हो रहा था। कुछ दूसरे निवातकवच हाथोंमें तीखे अस्त्र-शस्त्र लिये उस युद्धके मैदानमें मेरी और दौड़े। वे प्रहार करनेमें कुशल थे। उनकी आकृति बड़ी भयंकर थी और देखनेमें वे कालरूप जान पड़ते थे

Hujan trisula yang dahsyat—bercampur hantaman gada dan lembing—dilemparkan tanpa henti oleh mereka, dan semuanya terus jatuh menimpa keretaku.

Verse 5

अन्ये मामभ्यधावन्त निवातकवचा युधि । शितशस्त्रायुधा रौद्रा: कालरूपा: प्रहारिण:,दानवोंद्वारा की गयी वह शूलोंकी बड़ी भारी वर्षा निरन्तर मेरे रथपर होने लगी। उसके साथ ही गदा और शक्तियोंका भी प्रहार हो रहा था। कुछ दूसरे निवातकवच हाथोंमें तीखे अस्त्र-शस्त्र लिये उस युद्धके मैदानमें मेरी और दौड़े। वे प्रहार करनेमें कुशल थे। उनकी आकृति बड़ी भयंकर थी और देखनेमें वे कालरूप जान पड़ते थे

Dalam pertempuran itu, para Nivātakavaca lainnya pun menerjang ke arahku, menggenggam senjata yang tajam; garang dan tak kenal gentar, mahir menghantam, tampak mengerikan laksana wujud Maut.

Verse 6

तानहं विविधैर्बाणैवेंगवद्धिरजिदह्ागै: । गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिम्मथे,तब मैंने उनमेंसे एक-एकको युद्धमें गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सीधे जानेवाले विविध प्रकारके दस-दस वेगवान्‌ वाणोंद्वारा बींध डाला

Maka di tengah pertempuran, kutembus mereka satu per satu dengan sepuluh anak panah yang cepat, beraneka ragam, melesat lurus, dilepaskan dari Gāṇḍīva.

Verse 7

ते कृता विमुखा: सर्वे मत्प्रयुक्त: शिलाशितै: । ततो मातलिना तूर्ण हयास्ते सम्प्रचोदिता:,मेरे छोड़े हुए बाण पत्थरपर तेज किये हुए थे। उनकी मार खाकर सभी दानव युद्धभूमिसे भाग चले। तब मातलि उस रथके घोड़ोंको तुरंत ही तीव्र वेगसे हाँका

Dihantam anak panah yang kulepaskan—diasah di atas batu—mereka semua berpaling dan lari dari medan laga. Lalu Mātali segera memacu kuda-kuda kereta itu dengan kecepatan tinggi.

Verse 8

मार्गान्‌ बहुविधांस्तत्र विचेरुर्वातरंहस: । सुसंयता मातलिना प्रामथ्नन्त दिते: सुतान्‌,सारथिसे प्रेरित होकर वे अश्व नाना प्रकारकी चालें दिखाते हुए वायुके समान वेगसे चलने लगे। मातलिने उन्हें अच्छी तरह काबूमें कर रखा था। उन सबने वहाँ दितिके पुत्रोंको रौंद डाला

Didorong oleh kusirnya, kuda-kuda itu memperagakan berbagai macam langkah dan melaju secepat angin. Mātali mengekang mereka dengan kendali yang sempurna. Maka di sana mereka menginjak-injak putra-putra Diti hingga binasa.

Verse 9

शतं शतास्ते हरयस्तस्मिन्‌ युक्ता महारथे । शान्ता मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव,अर्जुनके उस विशाल रथमें दस हजार घोड़े जुते हुए थे, तो भी मातलिने उन्हें इस प्रकार वशमें कर रखा था कि वे अल्पसंख्यक अश्वोंकी भाँति शान्तभावसे विचरते थे

Pada kereta perang agung itu, ratus demi ratus kuda berwarna keemasan telah dipasangkan; namun, karena kendali dan tuntunan Mātali, mereka bergerak tenang—seolah hanya beberapa ekor saja.

Verse 10

तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च । मम बाणनिपातैश्न हतास्ते शतशो5सुरा:,उन घोड़ोंके पैरोंकी मार पड़नेसे, रथके पहियेकी घर्घराहट होनेसे तथा मेरे बाणोंकी चोट खानेसे सैकड़ों दैत्य मर गये

Oleh injakan kuku mereka, oleh gemuruh roda kereta, dan oleh hantaman anak panahku—ratusan asura pun tewas.

Verse 11

गतासवस्तथैवान्ये प्रगृहीतशरासना: । हतसारथयस्तत्र व्यकृष्यन्त तुरंगमै:,इसी प्रकार वहाँ दूसरे बहुत-से असुर हाथमें धनुष-बाण लिये प्राणरहित हो गये थे और उनके सारथि भी मारे गये थे, उस दशामें सारथिशून्य घोड़े उनके निर्जीव शरीरको खींचे लिये जाते थे

Demikian pula, banyak asura lain tergeletak tak bernyawa, masih menggenggam busur dan anak panah. Kusir-kusir mereka telah terbunuh; maka kuda-kuda tanpa kusir menyeret tubuh mereka yang kaku.

Verse 12

ते दिशो विदिश: सर्वे प्रतिरुध्य प्रहारिण: । अभ्यघ्नन्‌ विविधै: शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मन:,तब वे समस्त दानव सारी दिशाओं और विदिशाओंको रोककर भाँति-भाँतिके अस्त्र- शास्त्रोंद्वारा मुझपर घातक प्रहार करने लगे। इससे मेरे मनमें बड़ी व्यथा हुई

Lalu para dānawa itu menutup semua arah dan penjuru antara, kemudian menghantamku dengan berbagai senjata yang mematikan. Melihat gempuran itu, hatiku diliputi duka yang dalam.

Verse 13

ततोऊ<हं मातलेवीर्यमपश्यं परमाद्भुतम्‌ । अश्वांस्तथा वेगवतो यदयत्नादधारयत्‌,उस समय मैंने मातलिकी अत्यन्त अद्भुत शक्ति देखी। उन्होंने वैसे वेगशाली अश्वोंको बिना किसी प्रयासके ही काबूमें कर लिया

Saat itu aku menyaksikan keperkasaan Mātali yang sungguh menakjubkan: tanpa tampak bersusah payah, ia menahan dan mengendalikan kuda-kuda yang begitu cepat dan liar itu.

Verse 14

ततोऊहं लघुभिभ्रित्रैरस्त्रैस्तानसुरान्‌ रणे | चिच्छेद सायुधान्‌ राजन्‌ शतशो5थ सहस्रश:,राजन! तब मैंने उस रणभूमिने अस्त्र-शस्त्रधारी सैकड़ों तथा सहस्रों असुरोंको विचित्र एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा मार गिराया। शत्रुदमन नरेश! इस प्रकार पूर्ण प्रयत्नपूर्वक युद्धमें विचरते हुए मेरे ऊपर इन्द्रसाराथि वीरवर मातलि बड़े प्रसन्न हुए

Wahai raja, kemudian di medan laga aku menebas para Asura bersenjata itu—ratusan bahkan ribuan—dengan senjata-senjata yang menakjubkan dan melesat cepat.

Verse 15

एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन्‌ । प्रीतिमानभवद्‌ वीरो मातलि: शक्रसारथि:,राजन! तब मैंने उस रणभूमिने अस्त्र-शस्त्रधारी सैकड़ों तथा सहस्रों असुरोंको विचित्र एवं शीघ्रगामी बाणोंद्वारा मार गिराया। शत्रुदमन नरेश! इस प्रकार पूर्ण प्रयत्नपूर्वक युद्धमें विचरते हुए मेरे ऊपर इन्द्रसाराथि वीरवर मातलि बड़े प्रसन्न हुए

Wahai raja penakluk musuh, ketika aku bergerak di medan perang dengan segenap upaya untuk membinasakan para lawan, Mātali sang pahlawan—kusir Indra—menjadi sangat berkenan kepadaku.

Verse 16

बध्यमानास्ततस्तैस्तु हयैस्तेन रथेन च । अगमन्‌ प्रक्षयं केचिन्न्यवर्तन्त तथा परे,मेरे उन घोड़ों तथा उस दिव्य रथसे कुचल जानेके कारण भी कितने ही दानव मारे गये और बहुत-से युद्ध छोड़कर भाग गये

Terinjak dan dihantam oleh kuda-kuda itu serta kereta perang itu, banyak Dānava menemui kebinasaan; sementara yang lain patah semangat, berbalik, dan lari dari pertempuran.

Verse 17

स्पर्थमाना इवास्माभिनिवातकवचा रणे | शरवर्ष: शरार्त मां महद्धि: प्रत्यवारयन्‌,निवातकवचोंने संग्राममें हमलोगोंसे होड़-सी लगा रखी थी। मैं बाणोंके आघातसे पीड़ित था, तो भी उन्होंने बड़ी भारी बाणवर्षा करके मेरी प्रगतिको रोकने-की चेष्टा की। तब मैंने अद्भुत और शीघ्रगामी बाणोंको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया और उनके द्वारा शीघ्र ही सैकड़ों तथा हजारों दानवोंका संहार करने लगा

Dalam pertempuran, para Nivātakavaca seakan menantang kami sebagai pesaing. Meski aku tersiksa oleh hantaman anak panah mereka, para kesatria perkasa itu berusaha menahan lajuku dengan hujan panah yang lebat. Maka kulepaskan panah-panah menakjubkan yang melesat cepat, dimantrai dengan Brahmāstra; dan dengan itu segera mulai kubinasakan ratusan dan ribuan para raksasa.

Verse 18

ततोऊहं लघुभिभ्षिन्रैब्रह्यास्त्रपरिमन्त्रितै: । व्यधमं सायकैराशु शशशो5थ सहस्रश:,निवातकवचोंने संग्राममें हमलोगोंसे होड़-सी लगा रखी थी। मैं बाणोंके आघातसे पीड़ित था, तो भी उन्होंने बड़ी भारी बाणवर्षा करके मेरी प्रगतिको रोकने-की चेष्टा की। तब मैंने अद्भुत और शीघ्रगामी बाणोंको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके चलाया और उनके द्वारा शीघ्र ही सैकड़ों तथा हजारों दानवोंका संहार करने लगा

Lalu aku, dengan anak-anak panah cepat yang disucikan oleh mantra Brahmāstra, segera menumbangkan mereka—ratusan dan ribuan jumlahnya. Di desakan pertempuran, ketika para Nivātakavaca berusaha menahan lajuku dengan hujan senjata yang rapat, aku menjawab bukan dengan amarah semata, melainkan dengan daya senjata suci yang lebih tinggi dan terdisiplin; dengan penguasaan atas astra ilahi serta tekad yang teguh, aku membalikkan arus pertempuran.

Verse 19

तत:ः सम्पीड्यनास्ते क्रोधाविष्टा महारथा: । अपीडयन्‌ मां सहिता: शरशूलासिवृष्टिभि:,तदनन्तर मेरे बाणोंसे पीड़ित होकर वे महारथी दैत्य क्रोधसे आग-बबूला हो उठे और एक साथ संगठित हो खड्ग, शूल तथा बाणोंकी वर्षद्वारा मुझे घायल करने लगे

Kemudian, terluka dan terdesak oleh anak panahku, para kesatria kereta perang itu—dikuasai amarah—bangkit mengamuk dan, dengan bergerak serempak, mulai menimpaku dengan hujan panah, tombak, dan pedang. Bagian ini menegaskan bahwa amarah, ketika menguasai yang perkasa, mendorong mereka meninggalkan pertarungan yang terukur menuju serbuan balasan secara kolektif.

Verse 20

ततो5हमस्त्रमातिष्ठं परमं तिग्मतैजसम्‌ | दयितं देवराजस्य माधवं नाम भारत,भारत! यह देख मैंने देवराज इन्द्रके परम प्रिय माधव नामक प्रचण्ड तेजस्वी अस्त्रका आश्रय लिया

Wahai Bhārata, melihat itu aku berlindung pada senjata tertinggi yang menyala dengan kilau setajam mata pedang—bernama Mādhava—yang paling dikasihi Indra, raja para dewa. Pada saat itu aku tidak bersandar pada tenaga diri semata, melainkan memanggil daya ilahi dengan niat yang terdisiplin.

Verse 21

ततः खड्गांस्त्रिशूलांश्व॒ तोमरांश्व सहस्रश: । अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिदम्‌,तब उस अस्त्रके प्रभावसे मैंने दैत्योंके चलाये हुए सहस्रों खड़्ग, त्रिशूल और तोमरोंके सौ-सौ टुकड़े कर डाले

Lalu, dengan daya senjataku, aku menghancurkan menjadi ratusan serpihan ribuan pedang, trisula, dan lembing yang dilemparkan kepadaku. Di tengah pertempuran, ini menunjukkan penguasaan yang terjaga—bukan amarah membabi buta, melainkan keterampilan terkendali yang meniadakan bahaya dan melindungi tujuan.

Verse 22

छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वश: । प्रत्यविध्यमहं रोषाद्‌ दशभिर्दशभि: शरै:,तत्पश्चात्‌ दानवोंके समस्त अस्त्र-शस्त्रोंका उच्छेद करके मैंने रोषवश उन सबको भी दस-दस बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया

Setelah terlebih dahulu mematahkan semua senjata mereka, kemudian dalam amarah aku pun menghujam mereka dari segala sisi—melukai masing-masing dengan sepuluh anak panah—dan dengan demikian kubayar serangan mereka.

Verse 23

गाण्डीवाद्धि तदा संख्ये यथा भ्रमरपद्धक्तय: । निष्पतन्ति महाबाणास्तन्मातलिरपूजयत्‌,उस समय मेरे गाण्डीव धनुषसे बड़े-बड़े बाण उस युद्ध-भूमिमें इस प्रकार छूटते थे, मानो वृक्षसे झुंड-के-झुंड भौंरे उड़ रहे हों। मातलिने मेरे इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा की

Arjuna berkata: “Saat itu di medan laga, dari busur Gāṇḍīva-ku anak-anak panah raksasa melesat tanpa henti—laksana kawanan lebah yang menyeruak keluar dari sebuah pohon. Menyaksikan kepahlawanan itu, Mātali memuji dan memuliakan tindakanku.”

Verse 24

तेषामपि तु बाणास्ते तन्मातलिरपूजयत्‌ । अवाकिरन्‌ मां बलवत्‌ तानहं व्यधमं शरै:,तदनन्तर उन दानवोंके भी बाण मेरे ऊपर जोर-जोरसे गिरने लगे। मातलिने उनकी उस बाण-वर्षाकी भी सराहना की। फिर मैंने अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सब बाणोंको छिन्न- भिन्न कर डाला

Arjuna berkata: “Bahkan anak panah mereka pun mulai menghujaniku dengan dahsyat. Mātali memuji hujan senjata itu; namun dengan anak panahku sendiri, kutebas dan kuceraiberaikan seluruh panah musuh.”

Verse 25

वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचा: पुन: । शरवर्षर्महद्धिर्मा समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌,इस प्रकार मार खाते और मरते रहनेपर भी निवातकवचोंने पुनः भारी बाण-वर्षकि द्वारा मुझे सब ओरसे घेर लिया

Arjuna berkata: “Walau mereka terus terpukul dan berguguran, para Nivātakavaca itu kembali mengepungku dari segala arah, menutup jalan dengan hujan panah yang dahsyat.”

Verse 26

शरवेगान्निहत्याहमस्त्रैरस्त्रविघातिभि: । ज्वलडद्धि: परमै: शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रश:,तब मैंने अस्त्र-विनाशक अस्त्रोंद्वारा उनकी बाणवर्षाके वेगको शान्त करके अत्यन्त शीघ्रगामी एवं प्रज्वलित बाणोंद्वारा सहस्रों दैत्योंकोी घायल कर दिया

Arjuna berkata: “Aku menahan terjangan badai panah mereka dengan senjata yang menetralkan senjata; lalu dengan anak panah yang amat cepat dan menyala, kutumbangkan mereka—beribu-ribu jumlahnya.”

Verse 27

तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति सम शोणितम्‌ | प्रावषीवाभिवृष्टानि शुज्भाण्यथ धराभूताम्‌,उनके कटे हुए अंग उसी प्रकार रक्तकी धारा बहाते थे, जैसे वर्षा-ऋतुमें वृष्टिके जलसे भीगे हुए पर्वतोंके शिखर (गेरू आदि धातुओंसे मिश्रित) जलकी धारा बहाते हैं

Arjuna berkata: “Anggota tubuh mereka yang terpenggal memancarkan aliran darah; bagaikan puncak-puncak gunung yang tersiram hujan musim penghujan, menurunkan riam-riam air yang kemerahan—tercampur mineral merah—mengalir deras ke bumi.”

Verse 28

इन्द्राशनिसमस्पर्शवेंगवद्धिरजिद्ागै: । मद्बाणैर्वध्यमानास्ते समुद्धिग्ना: सम दानवा:,मेरे बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज़के समान था। वे बड़े वेगसे छूटते और सीधे जाकर शत्रुको अपना निशाना बनाते थे। उनकी चोट खाकर वे समस्त दानव भयसे व्याकुल हो उठे

Arjuna berkata: “Sentuhan anak panahku laksana wajra—halilintar Indra. Dilepaskan dengan kecepatan dahsyat dan tak pernah meleset dari jalurnya, ia menghantam musuh tepat sasaran. Tertikam oleh panah-panahku, semua Dānava itu pun terguncang oleh ketakutan.”

Verse 29

शतधा भिन्नदेहास्ते क्षीणप्रहरणौजस: । ततो निवातकवचा मामयुध्यन्त मायया,उन दैत्योंके शरीरके सौ-सौ टुकड़े हो गये थे। उनके अस्त्र-शस्त्र कट गये और उत्साह नष्ट हो गया था। ऐसी अवस्थामें निवातकवचोंने मेरे साथ माया-युद्ध आरम्भ कर दिया

Arjuna berkata: “Tubuh mereka remuk menjadi seratus serpihan; senjata dan daya serbu mereka telah habis, dan semangat mereka runtuh. Maka para Nivātakavaca, tak mampu menang lewat pertempuran terbuka, mulai melawanku dengan māyā—tipu daya dan siasat ilusi.”

Verse 170

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि सप्तत्यधिकशततमो<ध्याय: ।। २७० |। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-170 dari bagian “Pertempuran Nivātakavaca” dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata.

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly balances confidence and humility: Arjuna receives extraordinary affirmation and insignia, yet the narrative frames these as responsibilities to be integrated into collective aims, not as grounds for unilateral action or reckless display.

Capability is ethically meaningful when aligned with legitimate purpose and disciplined timing: divine endowments and praise are presented as instruments for dharma-oriented restoration, mediated through counsel, fraternity, and measured conduct.

A formal phalaśruti is not stated here; instead, the meta-function is conveyed through narrative closure by Vaiśaṃpāyana, emphasizing orderly transmission (reporting, verification, and next-day demonstration) as the appropriate framework for integrating extraordinary knowledge and power.