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Sukta 9.110
Pavam01na Soma hymn tradition (RV 9.110; specific r63i not supplied here)
Soma Pavam01na
Not determinable from provided excerpt alone (requires metrical scan; likely Tri636dubh/Jagat2b family common in Book 9)
This Pavamāna Soma hymn praises Soma as he “flows” through the filter, pressing forward to win abundance, fame, and heroic strength for the sacrificer. Soma is invoked as a conquering power who encircles and breaks obstacles (vṛtra), carries the worshipper beyond haters and debts, and drives away hostile forces and inner enemies. The hymn’s purpose is both ritual—empowering the Soma pressing and offering—and protective, asking for victory, purification, and fearless vigor.
Mantra 1
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः । द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे ॥
सोम, चारों तरफ फैलो और आगे बढ़ो। जीत के लिए, पूरा पावर लगा दो। रास्ते में जो रुकावटें हैं, उनको पार करो। दुश्मन लोग पीछे रह जाते हैं। तुम उनसे आगे निकल जाते हो, सारे बोझ उतार के।
Mantra 2
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये । वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे ॥
जब सोम को दबा के निकालते हैं, तब हम उसके पीछे चले जाते हैं। वो नशा इतना गहरा होता है कि जीत पक्की हो जाती है। सोम आगे बढ़ता है, ताकत ले के चलता है।
Mantra 3
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः । गोजीरया रंहमाणः पुरंध्या ॥
सोम ने सूरज को निकाला है। उसने दूध जैसा अमृत बनाया है, जो सबको खिलाता है। वो तेज़ी से आता है, गायों के साथ। साथ में वो पूरा काम भी ला देता है।
Mantra 4
अजीजनो अमृत मर्त्येष्वाँ ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः । सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत् ॥
सोम ने इंसानों में अमृत पैदा किया है। मरने वाले लोगों में भी वो ज़िंदा रहने की बात डाल दी। यह धरम का काम है, जो सही है और सुंदर है। सोम हमेशा बहता रहता है, ताकत की तरफ बढ़ता है, उसे पकड़ने के लिए।
Mantra 5
अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम् । शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः ॥
तुम्हारी सुनने की ताकत बार-बार आगे बढ़ती है। जैसे कोई चश्मा है जो कभी खत्म नहीं होता, लोग उससे पानी पिएँ। तुम तीर से नहीं चलते, तुम अपने हाथों में लिए जाते हो जो तुम्हारी किरणें ले कर चलते हैं।
Mantra 6
आदीं के चित्पश्यमानास आप्यं वसुरुचो दिव्या अभ्यनूषत । वारं न देवः सविता व्यूर्णुते ॥
फिर कुछ लोग अंदर की दौलत देख के उसकी तारीफ करने लगे। वो लोग जो असली खजाना समझते थे, वो भी उसके साथ हो गए। जैसे सविता पर्दा हटा देता है, वैसे ही भगवान ने छुपी हुई रोशनी को साफ कर दिया।
Mantra 7
त्वे सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः । स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय ॥
सोम, तुम्हारे लिए पहले लोग यज्ञ की बिछौना बिछा के अपना ध्यान लगाया। उन्होंने बड़ी बरकत और सुनने की ताकत के लिए तुम्हे याद किया। अब तुम भी हमें वीरता दिखाने के लिए आगे बढ़ाओ।
Mantra 8
दिवः पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत । इन्द्रमभि जायमानं समस्वरन् ॥
आसमान से वो पुराना अमृत निकाला गया जिसकी हमेशा बात होती थी। आसमान की गहराई से उस्से दूध जैसे निकाला। जब इंद्र पैदा हो रहा है, तब सारी ताकतें एक साथ आवाज़ उठा के उसका स्वागत करती हैं।
Mantra 9
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना । यूथे न निष्ठा वृषभो वि तिष्ठसे ॥
पवमान, जब तुम दोनों दुनिया और सारी चीज़ें अपनी बड़ाई से घेर लेते हो, तब तुम ऐसे खड़े हो जैसे कोई बैल झुंड के आगे होता है। तुम अपनी जगह पक्के खड़े हो, तुम्हारी ताकत साफ दिख रही है।
Mantra 10
सोमः पुनानो अव्यये वारे शिशुर्न क्रीळन्पवमानो अक्षाः । सहस्रधारः शतवाज इन्दुः ॥
सोम अपने आप को साफ कर रहा है, जैसे कोई फ़िल्टर से गुज़र रहा हो। वो बिल्कुल बच्चे की तरह खेलता हुआ बह रहा है। उसकी हज़ारों धारें बन गई हैं। वो कितनी ताकत ले के आ रहा है, सौ गुना पावर के साथ।
Mantra 11
एष पुनानो मधुमाँ ऋतावेन्द्रायेन्दुः पवते स्वादुरूर्मिः । वाजसनिर्वरिवोविद्वयोधाः ॥
यह सोम अपने आप को साफ करके इंद्र के लिए बह रहा है। वो शहद जैसा मीठा है और सही रास्ता जानता है। उसकी लहर मीठी है। वो पावर जीत रहा है, जगह बना रहा है, और ज़िन्दगी की ताकत को सम्भाल रहा है।
Mantra 12
स पवस्व सहमानः पृतन्यून्त्सेधन्रक्षांस्यप दुर्गहाणि । स्वायुधः सासह्वान्त्सोम शत्रून् ॥
आगे बह सोम, जो तुम्हारा सामना कर रहे हैं उन्हे हरा दे। गलत लोगों को और मुश्किल रास्ता रोकने वालों को भगा दे। अपनी ताकत से, दुश्मनों को सोम, तुम पार कर दो।
It praises Soma as he is purified (pavamāna) through the filter and asks him to bring strength, abundance, and victory while removing obstacles and hostility.
In Vedic language, obstacles include both outer opposition (rivals, harm) and inner hindrances (fear, weakness, confusion). Soma is asked to overcome both.
It is suited to Soma pressing and filtration: it is recited while Soma flows through the pavitra (filter) and is prepared for offering, strengthening the rite’s protective and invigorating power.
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