
Sukta 8.68
Indra
This hymn summons Indra’s chariot to the sacrifice, praising him as the mightiest protector of ṛta (cosmic right) who overcomes all assaults and brings “sumná” (wholeness, well-being). Through yajña and inspired speech, the poet asks Indra to repeat his ancient help—granting vāja (victorious strength, abundance) and faultless protection for his allies. The closing tone stresses the irreproachability of the divine working: no mortal detractor can successfully place blame upon the Indraic company.
Mantra 1
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्र शविष्ठ सत्पते ॥
इंद्र, हम आपका रथ यहाँ ला रहे हैं। यह हमारे काम आए, हमें खुश रखे। आप बहुत ताकतवर हो, सत्य के रास्ते के मालिक हो। आप बुरी हरकतों पर जीतने वाले हो।
Mantra 2
तुविशुष्म तुविक्रतो शचीवो विश्वया मते । आ पप्राथ महित्वना ॥
इंद्र, आप में बहुत जोश है, बहुत इच्छा शक्ति है। आप शचि के मालिक हो, जो शक्ति का काम करती है। आपकी सोच सब जगह है, इसलिए आपका महत्व बढ़ता जा रहा है।
Mantra 3
यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः । हस्ता वज्रं हिरण्ययम् ॥
उसकी ताकत इतनी बड़ी है कि उसकी चमक चारों तरफ फैल जाती है। उसके हाथ में सोना जैसा चमकता वज्र है। यह वज्र जीतने की ताकत रखता है।
Mantra 4
विश्वानरस्य वस्पतिमनानतस्य शवसः । एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥
मैं उस शक्ति के मालिक को बुलाता हूँ जो कभी हार नहीं मानता। वो सब लोगों की मदद करता है और सब रथों को चलाता है। उसकी ताकत सबसे बड़ी है।
Mantra 5
अभिष्टये सदावृधं स्वर्मीळ्हेषु यं नरः । नाना हवन्त ऊतये ॥
लोग अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उसे बुलाते हैं। वो हमेशा बढ़ता रहता है। लोग अलग-अलग तरह से उसे पुकारते हैं ताकि वो उनकी मदद करे।
Mantra 6
परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम् । ईशानं चिद्वसूनाम् ॥
इंद्र सबसे बड़ा है, कोई उसके बराबर नहीं। उसके पास शब्द की ताकत है और वो बहुत शक्तिशाली है। वो सब खजानों का मालिक है।
Mantra 7
तंतमिद्राधसे मह इन्द्रं चोदामि पीतये । यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः ॥
मैं उस बड़े इंद्र को बुलाता हूँ ताकि वो खुश हो जाए। वो लोगों का लीडर है और पुराने ज़माने से लोग उसकी तारीफ करते आए हैं।
Mantra 8
न यस्य ते शवसान सख्यमानंश मर्त्यः । नकिः शवांसि ते नशत् ॥
हे बड़े बलवान, कोई इंसान तेरा दोस्त नहीं बन पाया। कोई तेरे ताकत के लेवल तक नहीं पहुंचा।
Mantra 9
त्वोतासस्त्वा युजाप्सु सूर्ये महद्धनम् । जयेम पृत्सु वज्रिवः ॥
तू हमारे साथ है, तू हमारे साथी है। पानी में, धूप में, हमें बड़ा खज़ाना मिलता है। इंद्र, तू बिजली वाला है, हमें लड़ाई में जीता दे।
Mantra 10
तं त्वा यज्ञेभिरीमहे तं गीर्भिर्गिर्वणस्तम । इन्द्र यथा चिदाविथ वाजेषु पुरुमाय्यम् ॥
हम तुझे यज्ञ से बुलाते हैं, गाना से बुलाते हैं। इंद्र, तू हमारी सुनता है। जैसे पहले मदद की, अब भी मदद कर। तू बहुत ताकत वाला है।
Mantra 11
यस्य ते स्वादु सख्यं स्वाद्वी प्रणीतिरद्रिवः । यज्ञो वितन्तसाय्यः ॥
जिसका लिए तेरी दोस्ती मीठी है, तेरा साथ अच्छा लगता है, उसका यज्ञ जीत की तरफ जाता है। तू पत्थर वाला है।
Mantra 12
उरु णस्तन्वे तन उरु क्षयाय नस्कृधि । उरु णो यन्धि जीवसे ॥
हमें जगह दे, हम आराम से रहें। हमें घर दे, हम खुश रहें। हमें रास्ता दे, हम जीते रहें।
Mantra 13
उरुं नृभ्य उरुं गव उरुं रथाय पन्थाम् । देववीतिं मनामहे ॥
हम माँगते हैं एक चौड़ा रास्ता। आदमी के अंदर की ताकत के लिए, रोशनी के लिए, और आगे बढ़ने के लिए। यह रास्ता भगवान की तरफ ले जाता है। हम उसी तरफ जाना चाहते हैं।
Mantra 14
उप मा षड्द्वाद्वा नरः सोमस्य हर्ष्या । तिष्ठन्ति स्वादुरातयः ॥
मेरे पास आओ। बारह ताकतें खड़ी हैं जो खुशी में डूबीं हैं। यह ताकतें मीठा आनंद देती हैं जो अंदर से पोषण करती है। वो मज़बूत खड़ी हैं।
Mantra 15
ऋज्राविन्द्रोत आ ददे हरी ऋक्षस्य सूनवि । आश्वमेधस्य रोहिता ॥
इंद्र ने दो घोड़े दिए हैं। यह सोना जैसा चमक रहे हैं। रिक्ष के बेटे को दिए, और अश्वमेध यज्ञ के लिए। यह ताकतें आगे ले जाती हैं।
Mantra 16
सुरथाँ आतिथिग्वे स्वभीशूँरार्क्षे । आश्वमेधे सुपेशसः ॥
इंद्र ने अच्छी गाड़ी दी और सही कंट्रोल में ताकतें। अतिथिग्व को मिली यह चीज़। रिक्ष के बेटा, अश्वमेध के लिए यह सुंदर ताकतें हैं। यह यज्ञ को पूरा करती हैं।
Mantra 17
षळश्वाँ आतिथिग्व इन्द्रोते वधूमतः । सचा पूतक्रतौ सनम् ॥
इंद्र ने छे घोड़े दिए अतिथिग्व को। जो दुल्हन की ताकत से भरा है, उसको मिली यह दान। तुम साथ हो, तुम्हारा इरादा साफ है। यह कमाई ज़िन्दगी भर चले।
Mantra 18
ऐषु चेतद्वृषण्वत्यन्तॠज्रेष्वरुषी । स्वभीशुः कशावती ॥
अपनी सोच को जगाओ इन चीज़ों में। जो ताकत है, वो बैल जैसी मज़बूत है। यह अग्नि के रंग जैसी चमक है। सही कंट्रोल में है, जैसे कोई चाबुक से चलाता हो। यह ताकत को सही जगह ले जाता है।
Mantra 19
न युष्मे वाजबन्धवो निनित्सुश्चन मर्त्यः । अवद्यमधि दीधरत् ॥
कोई भी इंसान तुम पर कोई दोष नहीं लगा सकता। तुम लोग जो ताकत के साथ हो, तुम पर कोई बुरा नहीं बोल सकता। तुम्हारा काम इतना साफ है कि कोई उसमे कोई गड़बड़ नहीं दिखा सकता।
The hymn asks Indra to come swiftly to the sacrifice, protect the worshippers, and grant wholeness (sumná) and victorious strength (vāja).
It says Indra is sought through both yajña (sacrificial offering) and gīr/gir (inspired hymns and chants), emphasizing the power of ritual plus praise.
It reassures the community that hostile criticism cannot establish a real “fault” over the divine working—Indra’s protection and the righteous order (ṛta) stand firm.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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