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Sukta 3.36
Viśvāmitra Gāthina (continuing Maṇḍala 3 sequence)
Indra (contextually; hymn continues Indra-Soma motif)
Triṣṭubh
This hymn invokes Indra as the ever-strengthened hero who grows with each Soma pressing and becomes “well-heard-of” through his great deeds. It links Indra’s widening power to Soma’s filling force, using the rivers’ rush to the ocean as a cosmic image of irresistible momentum. The sukta culminates in a direct battle-prayer: may the bountiful Indra hear, strike down obstacles (vṛtrāṇi), and win treasures for the worshippers.
Mantra 1
इमामू षु प्रभृतिं सातये धाः शश्वच्छश्वदूतिभिर्यादमानः । सुतेसुते वावृधे वर्धनेभिर्यः कर्मभिर्महद्भिः सुश्रुतो भूत् ॥
यह भेंट रख दो जीत के लिए। वो बार-बार मदद करता है। हर बार जब सोम मिलता है, उसकी ताकत बढ़ती है। उसने बड़े काम किए हैं इसलिए सब उसका नाम जानते हैं।
Mantra 2
इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना ऋभुर्येभिर्वृषपर्वा विहायाः । प्रयम्यमानान्प्रति षू गृभायेन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्णः ॥
इन्द्र के लिए सोम की धारें आसमान से आ रही हैं। रिशि लोगों ने इसे भेजा है। अब इसे पकड़ लो। इन्द्र, तुम बड़े बलवान हो, इस सोम को पियो।
Mantra 3
पिबा वर्धस्व तव घा सुतास इन्द्र सोमासः प्रथमा उतेमे । यथापिबः पूर्व्याँ इन्द्र सोमाँ एवा पाहि पन्यो अद्या नवीयान् ॥
पियो और बड़े हो जाओ। इन्द्र, यह सोम तुम्हारे लिए पहला तोहफा है। जैसे पहले पिया था, वैसे ही अब भी पियो। यह हर बार नया मिलता है।
Mantra 4
महाँ अमत्रो वृजने विरप्श्युग्रं शवः पत्यते धृष्ण्वोजः । नाह विव्याच पृथिवी चनैनं यत्सोमासो हर्यश्वममन्दन् ॥
वो बहुत बड़ा है, कोई उसको नाप नहीं सकता। वो जगह पर काम करते हुए फैलता जाता है। उसकी ताकत बहुत तेज़ है, कोई उसके आगे नहीं टिकता। धरती भी उसको पूरा नहीं पकड़ सकती। जब सोम रस उसको खुश करता है, वो और भी शक्तिशाली हो जाता है।
Mantra 5
महाँ उग्रो वावृधे वीर्याय समाचक्रे वृषभः काव्येन । इन्द्रो भगो वाजदा अस्य गावः प्र जायन्ते दक्षिणा अस्य पूर्वीः ॥
वो बड़ा और भयानक है, उसकी शक्ति दिन के साथ बढ़ती है। रिशियों की ग्यान से वो सब तैयार कर देता है। इंद्र भगवान बन के सबको देता है, उसकी किरणें निकलती हैं और पुरानी दान की परंपरा चलती है।
Mantra 6
प्र यत्सिन्धवः प्रसवं यथायन्नापः समुद्रं रथ्येव जग्मुः । अतश्चिदिन्द्रः सदसो वरीयान्यदीं सोमः पृणति दुग्धो अंशुः ॥
जब नदियाँ बहने लगती हैं, जैसे पानी समुंदर की तरफ जाता है। तब इंद्र सबसे बड़ा हो जाता है। सोम रस उसको भर देता है और उसकी ताकत बढ़ जाती है।
Mantra 7
समुद्रेण सिन्धवो यादमाना इन्द्राय सोमं सुषुतं भरन्तः । अंशुं दुहन्ति हस्तिनो भरित्रैर्मध्वः पुनन्ति धारया पवित्रैः ॥
नदियाँ समुंदर के साथ चलती हैं और इंद्र के लिए सोम रस ले कर आती हैं। हाथों से उस रस को निकालते हैं और छन्नों से साफ करते हैं। यह मीठा रस इंद्र को पसंद आता है।
Mantra 8
ह्रदा इव कुक्षयः सोमधानाः समी विव्याच सवना पुरूणि । अन्ना यदिन्द्रः प्रथमा व्याश वृत्रं जघन्वाँ अवृणीत सोमम् ॥
जैसे तालाब फैलते हैं, वैसे सोम रखने की जगह भी फैलती है। कई जगह सोम रस निकाला जाता है। इंद्र ने पहले खाना खोला, जब उसने वृत्र को मारा। फिर उसने सोम रस अपने लिए चुन लिया।
Mantra 9
आ तू भर माकिरेतत्परि ष्ठाद्विद्मा हि त्वा वसुपतिं वसूनाम् । इन्द्र यत्ते माहिनं दत्रमस्त्यस्मभ्यं तद्धर्यश्व प्र यन्धि ॥
इन्द्र, यह चीज़ हमारे पास ले आ। कोई भी बीच में नहीं आना चाहिए। हम जानते हैं कि तू ही धन का मालिक है। इन्द्र, जो भी बड़ा तोहफा तेरे पास है, वो हमको दे दे। तू पीले घोड़ों वाला है, उसी शक्ति से हमें भी कुछ दे।
Mantra 10
अस्मे प्र यन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र रायो विश्ववारस्य भूरेः । अस्मे शतं शरदो जीवसे धा अस्मे वीराञ्छश्वत इन्द्र शिप्रिन् ॥
इन्द्र, तू दाता है, हमें धन दे। जो भी अच्छा लगता है, सब कुछ दे। तू सोम पीने वाला है, इसलिए तेरे पास सब है। हमें सौ साल तक जीने की उम्र दे। हमें ऐसे वीर बेटे दे जो हमेशा रहें।
Mantra 11
शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ । शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम् ॥
हम अपने भले के लिए इन्द्र को पुकारते हैं। यह लड़ाई में जो सबसे बड़ा मर्द है, उसे बुलाते हैं। जो धन जीत के लाता है, उसे बुलाते हैं। इन्द्र, तू सुन रहा है, तू हमारे लिए लड़ता है। तू दुश्मनों को मारता है और धन जीतता है।
It praises Indra as the heroic power that grows stronger at every Soma pressing and is asked to grant victory, protection, and wealth by destroying obstacles.
The rivers-to-ocean image shows irresistible movement and expansion, illustrating how Indra’s power becomes vast when Soma fills and strengthens him.
Traditionally it fits Soma-offering rites and Indra-invocations; in a simpler devotional setting it can be recited as a prayer for courage, removal of hindrances, and success in difficult efforts.
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