
Guru’s Instruction on Dream, Mind, Guṇas, and Knowing Brahman (Svapna–Manas–Guṇa–Brahma-vicāra)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Discourse on Sleep, Dream, Guṇas, and Brahman
A guru instructs that one seeking faultless brahmacarya should minimize sleep, since dream states are dominated by rajas and tamas, producing behavior ‘as if in another body’ and marked by loss of reflective memory. The discourse then distinguishes ordinary waking driven by curiosity from sustained wakefulness grounded in disciplined insight (vijñāna). It raises the philosophical problem of how the embodied self experiences objects in dream when the senses are effectively withdrawn, and answers by locating dream in sensory fatigue and the mind’s latent activity, where saṃkalpa continues to operate. The text explains that mind is pervasive and unobstructed, functioning as an inner ‘doorway’ that can project or disclose impressions even when external operation ceases. It outlines how guṇas (sattva, rajas, tamas) condition perception and subsequent results, including disordered imagery and embodied humoral disturbances described as difficult to correlate. Finally, it asserts Brahman as the supreme knowable—immortal, luminous, imperishable—and indicates that the unmanifest can be approached through knowledge and through yogic withdrawal (pratyāhāra), integrating ethical discipline with contemplative epistemology.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से जिज्ञासा करते हैं—मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले तत्त्वचिन्तक प्रयाण-काल (मृत्यु-समय) में किस जप/स्मरण का आश्रय लें, जिससे चित्त स्थिर हो और परमगति सुलभ हो। → भीष्म के उत्तर की पृष्ठभूमि में नारद-प्रसंग और विष्णु के वाराहावतार का स्मरण उभरता है—जब पृथ्वी दानवों से आक्रान्त होकर ‘आर्त-रूप’ हो गई थी और देवता भय व असहायता में डूबे थे। प्रश्न केवल कथा नहीं, साधना का है: संकट में कौन-सा नाम/स्तोत्र मन को मोक्ष-पथ पर टिकाए रखता है? → भगवान् विष्णु का वाराह-रूप में प्राकट्य—सिंहनाद से दानवों का मोह-भंग, भय-प्रहार और विनाश; रसातल तक जाकर खुरों से दानव-समूहों का विदारण। देव-दानव दोनों उस तेज से स्तब्ध/मोहित होते हैं—ईश्वर-तेज की सर्वाधिकारिता प्रत्यक्ष हो जाती है। → भीष्म वाराह-लीला के माध्यम से यह स्थापित करते हैं कि अच्युत, पुण्डरीकाक्ष, सर्वभूतादि ईश्वर ही शरण हैं; उनके स्मरण/जप (अनुस्मृति-स्तोत्र) से भय, मोह और आसक्ति कटते हैं—यही प्रयाण-काल का सहारा और मोक्षाभिमुख साधना का सार है। → युधिष्ठिर की जिज्ञासा आगे भी खुलती है—जप की विधि, भाव, और ‘किस नाम/स्तोत्र’ का क्रमबद्ध उपदेश किस प्रकार किया जाए, इसका विस्तार अगले प्रवाह में अपेक्षित रहता है।
Verse 1
अपन क्ाा बछ। आर: नवाधिकद्विशततमो< ध्याय: भगवान् विष्णुका वराहरूपमें प्रकट होकर देवताओंकी रक्षा और दानवोंका विनाश कर देना तथा नारदको अनुस्मृतिस्तोत्रका उपदेश और नारदद्वारा भगवान्की स्तुति युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम । श्रोतुमिच्छामि कार्त्स्न्येन कृष्णमव्ययमी श्वरम्,युधिष्ठिरने पूछा--युद्धमें सच्चा पराक्रम प्रकट करनेवाले महाप्राज्ञ पितामह! भगवान् श्रीकृष्ण अविनाशी ईश्वर हैं; मैं पूर्णरूपसे इनके महत्त्वका वर्णन सुनना चाहता हूँ
Yudhiṣṭhira said: “O grandsire, supremely wise, whose true valor is shown in battle— I wish to hear in full the greatness of Kṛṣṇa, the imperishable Lord.”
Verse 2
यच्चास्य तेज: सुमहद् यच्च कर्म पुरा कृतम् तन्मे सर्व यथाततच््च॑ ब्रूहि त्वं पुरुषर्षभ,पुरुषप्रवर! इनका जो महान् तेज है, इन्होंने पूर्वकालमें जो महान् कर्म किया है, वह सब आप मुझे यथार्थरूपसे बताइये
Yudhiṣṭhira said: “Tell me truly and in full—O best and foremost among men—about his exceedingly great splendor and about the great deeds he accomplished in former times.”
Verse 3
तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान् प्रभु: । केन कार्यनिसर्गेण तमाख्याहि महाबल,महाबली पितामह! सम्पूर्ण जगतके प्रभु होकर भी इन्होंने किस निमित्तसे तिर्यग्योनिमें जन्म ग्रहण किया; यह मुझे बताइये
Yudhiṣṭhira said: “How did the Lord assume a form that has entered an animal womb? By what purpose and causal necessity did he take birth among the lower species? O mighty one—O grandsire of great power—tell me this.”
Verse 4
भीष्म उवाच पुराहं मृगयां यातो मार्कण्डेयाश्रमे स्थित: । तत्रापश्यं मुनिगणान् समासीनान् सहस्रश:,भीष्मजीने कहा--राजन्! पहलेकी बात है, मैं शिकार खेलनेके लिये वनमें गया और मार्कण्डेय मुनिके आश्रमपर ठहरा। वहाँ मैंने सहस्रों मुनियोंको बैठे देखा
Bhishma said: “O King, long ago I went out on a hunt and stayed at the hermitage of the sage Mārkaṇḍeya. There I saw thousands of sages seated together.”
Verse 5
ततस्ते मधुपर्केण पूजां चक्कुरथो मयि । प्रतिगृह्म च तां पूजां प्रत्यनन्दमृषीनहम्,मेरे जानेपर उन महर्षियोंने मधुपर्क समर्पित करके मेरा आतिथ्य-सत्कार किया। मैंने भी उनका सत्कार ग्रहण करके उन सभी महर्षियोंका अभिनन्दन किया
Bhishma said: “Then those sages honored me with the offering of madhuparka and performed the rites of welcome toward me. Accepting that hospitality, I in turn greeted and delighted all those rishis.”
Verse 6
कथैषा कथिता तत्र कश्यपेन महर्षिणा । मन: प्रह्लादिनीं दिव्यां तामिहैकमना: शृणु,फिर महर्षि कश्यपने मनको आनन्द प्रदान करनेवाली यह दिव्य कथा मुझे सुनायी। मैं उसे कहता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो
Bhishma said: “There, this very tale was narrated by the great sage Kashyapa—a divine story that gladdens the heart. Now listen to it here with a single-pointed mind.”
Verse 7
पुरा दानवमुख्या हि क्रोधलोभसमन्विता: । बलेन मत्ता: शतशो नरकाद्या महासुरा:,पूर्वकालमें नरकासुर आदि सैकड़ों मुख्य-मुख्य दानव क्रोध और लोभके वशीभूत हो बलके मदसे मतवाले हो गये थे
Bhishma said: “In ancient times, the foremost among the Dānavas—overpowered by anger and greed—became intoxicated with their own strength. In their hundreds, mighty Asuras such as Naraka and others thus fell into arrogant excess.”
Verse 8
तथैव चान्ये बहवो दानवा युद्धदुर्मदा: । न सहन्ते सम देवानां समृद्धि तामनुत्तमाम्
Bhishma said: “In the same way, many other Dānavas too—made arrogant by war—cannot endure the gods’ equal standing and their unsurpassed prosperity.”
Verse 9
इनके सिवा और भी बहुत-से रणदुर्मद दानव थे, जो देवताओंकी उत्तम समृद्धिको सहन नहीं कर पाते थे ।। दानवैरर्धमानास्तु देवा देवर्षयस्तथा । न शर्म लेभिरे राजन् विशमानास्ततस्तत:,राजन! उन दानवोंसे पीड़ित हो देवता और देवर्षि कहीं चैन नहीं पाते थे। वे इधर-उधर लुकते-छिपते फिरते थे
Bhīṣma said: “Besides these, there were many other battle-maddened Dānavas who could not endure the gods’ excellent prosperity. Harassed by those Dānavas, the gods and the divine seers found no peace, O King; they wandered from place to place, hiding and moving about in distress.”
Verse 10
पृथिवीमार्तरूपां ते समपश्यन् दिवौकस: । दानवैरभिसंस्तीर्णा घोररूपैर्महाबलै:,समूचे भूमण्डलमें भयानक रूपधारी महाबली दानव फैल गये थे। देवताओंने देखा, यह पृथ्वी दानवोंके पापभारसे पीड़ित एवं आर्त हो उठी है
Bhīṣma said: “The gods beheld the Earth herself as if stricken with anguish. Across the whole circle of the world she lay overrun and strewn with mighty Dānavas of dreadful forms, and the Earth, burdened by their sinful weight, appeared oppressed and distressed—signaling a moral crisis that calls for the restoration of dharma.”
Verse 11
भारारत॑म प्रहृष्टां च दु:खितां संनिमज्जतीम् । अथादितेया: संत्रस्ता ब्रह्माणमिदमन्रुवन्,यह भारसे व्याकुल, हर्ष और उल्लाससे शून्य तथा दुखी हो रसातलमें डूब रही है। यह देखकर अदितिके सभी पुत्र भयसे थर्रा उठे और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले--
Bhishma said: “The Earth—bereft of joy and gladness, distressed and sinking down toward the nether regions—was seen in that plight. Beholding her thus, all the sons of Aditi were seized with fear, and they addressed Brahmā in these words.”
Verse 12
कथं शक्ष्यामहे ब्रह्मन् दानवैरभिमर्दनम् । स्वयम्भूस्तानुवाचेदं निसृष्टो5त्र विधिर्मया,“ब्रह्म! दानवलोग जो हमें इस प्रकार रौंद रहे हैं, इसे हम किस प्रकार सह सकेंगे?” तब स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे इस प्रकार कहा--'देवताओ! इस विपत्तिको दूर करनेके लिये मैंने उपाय कर दिया है
They said: “O Brahmā, as the Dānavas trample us in this way, how are we to endure it?” Then Brahmā the Self-born replied to them: “O gods, to drive away this calamity, I have already set in place a remedy.”
Verse 13
ते वरेणाभिसम्पन्ना बलेन च मदेन च | नावबुध्यन्ति सम्मूढा विष्णुमव्यक्तदर्शनम्
Bhīṣma said: “Endowed with boons, and intoxicated with strength and pride, the deluded do not recognize Viṣṇu—whose true form is not easily perceived.”
Verse 14
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमा:,“वे सहस्रों घोर दैत्य और दानवाधम भूमिके भीतर पाताललोकमें निवास करते हैं; भगवान् वाराह वेगपूर्वक वहीं जाकर उन सबका विनाश कर देंगे। यह सुनकर सभी श्रेष्ठ देवता हर्षसे खिल उठे
Bhīṣma said: “He will swiftly go to the very place where those vile Dānavas are.” In the flow of the tale, the words foretell decisive divine intervention: when destructive powers hide in the nether depths, the Lord’s rapid descent and removal of evil restores cosmic order and reassures the righteous.
Verse 15
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रश: । शमयिष्यति तच्छुत्वा जह्ृषु: सुरसत्तमा:,“वे सहस्रों घोर दैत्य और दानवाधम भूमिके भीतर पाताललोकमें निवास करते हैं; भगवान् वाराह वेगपूर्वक वहीं जाकर उन सबका विनाश कर देंगे। यह सुनकर सभी श्रेष्ठ देवता हर्षसे खिल उठे
Those dreadful demons dwell by the thousand beneath the earth, in the realm of Pātāla. Hearing that he would subdue them, the foremost of the gods rejoiced.
Verse 16
ततो विष्णुर्महातेजा वाराहं रूपमास्थित: । अन्तर्भूमिं सम्प्रविश्य जगाम दितिजान् प्रति,उधर महातेजस्वी भगवान् विष्णु वाराहरूप धारण कर बड़े वेगसे भूमिके भीतर प्रविष्ट हुए और दैत्योंके पास जा पहुँचे
Then the mighty and radiant Viṣṇu assumed the form of Varāha, the divine Boar. Entering the depths beneath the earth, he sped toward the demons born of Diti—an unmistakable sign of divine intervention to restore cosmic order when destructive forces threaten the world.
Verse 17
दृष्टवा च सहिता: सर्वे दैत्या: सत्त्वममानुषम् । प्रसह्म॒ तरसा सर्वे संतस्थु: कालमोहिता:
Seeing that extraordinary, non-human prowess, all the Daityas gathered together were forcibly checked; overwhelmed by the delusion of fate and Time (kāla), they all stood still, their momentum broken.
Verse 18
उस अलौकिक जन्तुको देखकर सब दैत्य एक साथ हो वेगपूर्वक उसका सामना करनेके लिये हठात् खड़े हो गये; क्योंकि वे कालसे मोहित हो रहे थे ।। ततस्ते समभिद्रुत्य वराहं जगृहु:ः समम् | संक्ुद्धाश्व वराहं तं व्यकर्षन्त समन्तत:,उन सबने कुपित होकर भगवान् वाराहपर एक साथ धावा बोल दिया और उन्हें हाथोंहाथ पकड़ लिया। पकड़कर वे वाराहदेवको चारों ओरसे खींचने लगे
Seeing that wondrous being, all the Daityas rose together to meet him with furious speed, for they were deluded by Time (kāla). Then they charged as one and seized Varāha at once. Enraged, they gripped him and dragged him from every side.
Verse 19
दानवेन्द्रा महाकाया महावीर्यबलोच्छिता: । नाशवनुवंश्व॒ किंचित् ते तस्य कर्तु तदा विभो,प्रभो! यद्यपि वे विशालकाय दानवराज महान् बल और वीर्यसे सम्पन्न थे, तो भी उन भगवानका कुछ बिगाड़ न सके
Bhishma said: “Those lords of the Dānavas—huge of body and exalted in strength and heroism—still could not do Him the slightest harm then, O Mighty Lord, O Master.”
Verse 20
ततो<गच्छत् विस्मयं ते दानवेन्द्रा भयं तथा । संशयं गतमात्मानं मेनिरे च सहस्रश:,इससे उन दानवेन्द्रोंकी बड़ा विस्स्मथ और भय प्राप्त हुआ। वे सहस्रों दैत्य अपने आपको जीवनके संशयमें पड़ा हुआ मानने लगे
Then those lords of the Dānavas were seized by astonishment, and by fear as well. In their thousands, the Daityas thought their very lives had fallen into doubt—uncertain whether they would survive.
Verse 21
ततो देवाधिदेव: स योगात्मा योगसारथि: । योगमास्थाय भगवांस्तदा भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ) इसके बाद योगस्वरूप योगके नियन्ता देवाधिदेव भगवान् वाराह दैत्यों और दानवोंको क्षोभमें डालनेके लिये योगका आश्रय ले बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उस भीषण गर्जनासे तीनों लोक और ये सारी दसों दिशाएँ गूँज उठीं
Bhishma said: “Then that Lord of lords—whose very nature is Yoga and who guides Yoga as a charioteer—entered into Yoga. At that time, O best of the Bharatas, the Blessed One assumed yogic power and began to roar mightily, shaking and unsettling the hosts of Daityas and Danavas. By that dreadful roar, the three worlds and all the ten directions resounded.”
Verse 22
विननाद महानादं क्षोभयन् दैत्यदानवान् | संनादिता येन लोका: सर्वाश्वैव दिशो दश,भरतश्रेष्ठ) इसके बाद योगस्वरूप योगके नियन्ता देवाधिदेव भगवान् वाराह दैत्यों और दानवोंको क्षोभमें डालनेके लिये योगका आश्रय ले बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। उस भीषण गर्जनासे तीनों लोक और ये सारी दसों दिशाएँ गूँज उठीं
Bhishma said: “He let out a mighty, thunderous roar, shaking the Daityas and Dānavas. By that dreadful cry all the worlds resounded, and likewise all the ten directions echoed.”
Verse 23
तेन संनादशब्देन लोकानां क्षोभ आगमत् | संत्रस्ताश्न भृशं लोके देवा: शक्रपुरोगमा:,उस भीषण गर्जनासे समस्त लोकोंमें हलचल मच गयी। स्वर्गलोकमें इन्द्र आदि देवता भी अत्यन्त भयभीत हो उठे
Bhishma said: “By that thunderous, reverberating roar, a great agitation arose throughout the worlds. Even the gods—led by Śakra (Indra)—were seized with intense fear.”
Verse 24
निर्विचेष्टं जगच्चापि बभूवातिभृशं तदा | स्थावरं जड़मं चैव तेन नादेन मोहितम्,उस सिंहनादसे मोहित होकर समस्त चराचर जगत् अत्यन्त चेष्टारहित हो गया
Bhīṣma said: “Then, overwhelmed by that mighty roar, the entire world—moving and unmoving alike—became utterly motionless, as if inert and stunned.”
Verse 25
ततस्ते दानवा: सर्वे तेन नादेन भीषिता: । पेतुर्गतासवश्वैव विष्णुतेज:प्रमोहिता:,तदनन्तर वे सब दानव भगवानूकी उस गर्जनासे भयभीत हो प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। वे सब-के-सब भगवान् विष्णुके तेजसे मोहित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे थे
Bhīṣma said: “Then all those Dānavas, terrified by that thunderous roar, fell to the earth as if life had left them. Overwhelmed and bewildered by the radiance of Viṣṇu, they lost their senses and strength.”
Verse 26
रसातलगतकश्चापि वराहस्त्रिदशद्विषाम् । खुरैविंदारयामास मांसमेदो5स्थिसंचयान्,भगवान् वराहकी ऋषियोंद्वारा स्तुति रसातलमें जाकर भी भगवान् वाराहने देवद्रोही असुरोंको अपने खुरोंसे विदीर्ण कर दिया। उनके मांस, मेदा और हड्डियोंके ढेर लग गये थे
Bhīṣma said: “Even after descending to Rasātala, the Blessed Lord in the form of the Boar tore apart the enemies of the gods with His hooves, leaving heaps of flesh, fat, and bones.”
Verse 27
नादेन तेन महता सनातन इति स्मृतः । पद्मनाभो महायोगी भूताचार्य: स भूतराट्,सम्पूर्ण प्राणियोंक आचार्य और स्वामी महायोगी वे भगवान् पद्मनाभ अपने महान् सिंहनादके कारण “सनातन” माने गये हैं
Bhīṣma said: “Because of that mighty, primeval roar, he is remembered as ‘Sanātana’ (the Eternal). That Padmanābha—the great yogin—is the teacher of all beings and the sovereign of beings, the universal guide and lord of all creatures.”
Verse 28
ततो देवगणा: सर्वे पितामहमुपाद्रवन् । तत्र गत्वा महात्मानमूचुश्वैव जगत्पतिम्,देवाश्न दानवाश्नैव मोहितास्तस्य तेजसा । उनके उस सिंहनादको सुनकर सब देवता जगदीश्वर भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर वे इस प्रकार बोले--'देव! प्रभो! यह कैसा सिंहनाद है? इसे हमलोग नहीं जानते। वह कौन वीर है? अथवा किसकी गर्जना है? जिसने इस जगत्को व्याकुल कर दिया है। देवता और दानव सभी उसके तेजसे मोहित हो रहे हैं!
Bhīṣma said: “Then all the hosts of gods hurried to the Grandfather, Brahmā. Reaching that great-souled Lord of the worlds, they spoke: ‘O Deva, O Master—what is this lion-like roar? We do not recognize it. Who is that hero, or whose thunderous cry is it, that has thrown the world into agitation? Both gods and Dānavas are being bewildered by the brilliance of his power.’”
Verse 29
नादो<यं कीदृशो देव नैतं विद्य वयं प्रभो । को5सौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत्
Bhīṣma said: “O divine one, what kind of sound is this? We do not understand it, O lord. Whose sound is it—who is making it—by which the whole world seems thrown into agitation and bewilderment?”
Verse 30
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुवाराहं रूपमास्थित: । उदतिष्ठन्महाबाहो स्तूयमानो महर्षिभि:,महाबाहो! इसी बीचमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु जलसे ऊपर उठे। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति कर रहे थे
Bhishma said: “Just then, Lord Viṣṇu—having assumed the form of the Boar—rose up from the waters. As He emerged, the great seers praised Him with hymns.”
Verse 31
पितामह उवाच निहत्य दानवपतीन् महावर्ष्मा महाबल: । एष देवो महायोगी भूतात्मा भूतभावन:,ब्रह्माजी बोले--देवताओ! ये महाकाय महाबली महायोगी भूतभावन भूतात्मा भगवान् विष्णु हैं, जो दानवराजोंका वध करके आ रहे हैं
Pitāmaha said: “Having slain the lords of the Dānavas, this mighty, vast-bodied and supremely powerful Deity approaches—He is the great Yogin, the inner Self of all beings and the one who brings all beings into manifestation and well-being.”
Verse 32
सर्वभूतेश्वरो योगी मुनिरात्मा तथा55त्मन: । स्थिरीभवत कृष्णो5यं सर्वविघध्नविनाशन:,ये सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर, योगी, मुनि तथा आत्माके भी आत्मा हैं, ये ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाले श्रीकृष्ण हैं; अत: तुमलोग धैर्य धारण करो
Bhīṣma said: “He is the Lord of all beings—Yogin, sage, and the very Self of the self. Be steadfast: this Kṛṣṇa is the destroyer of every obstacle.”
Verse 33
कृत्वा कर्मातिसाध्वेतदशक्यममितप्रभ: । समायात: स्वमात्मानं महाभागो महाद्युति:,अनन्त प्रभासे परिपूर्ण, महातेजस्वी एवं महान् सौभाग्यके आश्रयभूत ये भगवान् अत्यन्त उत्तम और दूसरोंके लिये असम्भव कार्य करके आ रहे हैं
Bhishma said: “Having accomplished this exceedingly noble deed—one that is impossible for others—the Lord of immeasurable splendor has returned to His own true state. That greatly fortunate, supremely radiant One, complete in endless brilliance and vast spiritual power, the very refuge and foundation of great auspiciousness—the Blessed Lord, the highest among beings—comes after performing a work that none else can accomplish.”
Verse 34
पद्मनाभो महायोगी महात्मा भूतभावन: । न संतापो न भी: कार्या शोको वा सुरसत्तमा:,सुरश्रेष्टण! ये महायोगी भूतभावन महात्मा पद्मनाभ हैं; अतः तुम्हें अपने मनसे संताप, भय एवं शोकको दूर कर देना चाहिये
Bhīṣma said: “Padmanābha—the great yogin, the great-souled one, the sustainer and source of all beings—stands behind this. Therefore, O best of the gods, you should not give place in your mind to anguish, fear, or grief.”
Verse 35
विधिरेष प्रभावश्न काल: संक्षयकारक: । लोकान् धारयता तेन नादो मुक्तो महात्मना,ये ही विधि हैं, ये ही प्रभाव हैं और ये ही संहारकारी काल हैं, इन्हीं परमात्माने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करते हुए यह भीषण सिंहनाद किया है
Bhīṣma said: “He is the very Ordinance (vidhi), the very Power that brings all effects to pass, and the Time that accomplishes dissolution. Upholding and protecting the worlds, that great-souled Lord has released this dreadful lion-like roar.”
Verse 36
स एष हि महाबाहु: सर्वलोकनमस्कृतः । अच्युत: पुण्डरीकाक्ष: सर्वभूतादिरीश्वर:,ये सम्पूर्ण भूतोंक आदि कारण, सर्वलोकवन्दित ईश्वर महाबाहु कमलनयन अच्युत हैं
Bhīṣma said: “Indeed, this very one is the mighty-armed Lord—revered by all the worlds—Acyuta, the lotus-eyed, the sovereign ruler who is the primal source of all beings.”
Verse 133
वराहरूपिणं देवमधृष्यममरैरपि । “वे दानव वर पाकर बल और अभिमानसे मत्त हो उठे हैं। वे मूढ़ दैत्य अव्यक्तस्वरूप भगवान् विष्णुको नहीं जानते, जो देवताओं के लिये भी दुर्धर्ष हैं। उन्होंने वाराह रूप धारण कर रखा है
Bhīṣma said: “They do not recognize the divine Lord who is beyond manifestation, invincible even to the gods. Assuming the form of a Boar (Varāha), He remains unassailable; yet those deluded Dānavas, intoxicated by strength and pride, fail to know Him.”
Verse 201
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें भूमिके भीतर भगवान् वाराहकी क्रीड़ानामक दो सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Śānti Parva—specifically in the Gokṣa-dharma section—this introductory portion concludes the two-hundred-and-ninth chapter, titled “The Play (Līlā) of the Lord as the Boar (Varāha).” (This is a formal colophon marking the end of the chapter.)
Verse 209
(युधिष्ठिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । प्रयाणकाले कि जप्य॑ मोक्षिभिस्तत्त्वचिन्तकै: ।। युधिष्ठिरने पूछा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले तत्त्व-चिन्तकोंको मृत्युकालमें किस मन्त्रका जप करना चाहिये ।। किमनुस्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते । प्राप्रुयात् परमां सिद्धि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। कुरुश्रेष्ठ! मृत्युका समय उपस्थित होनेपर किसका चिन्तन करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त हो सकता है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच सद्युक्तिसहित: सूक्ष्म उक्त: प्रश्नस्त्वयानघ । शृणुष्वावहितो राजन् नारदेन पुरा श्रुतम् ।। भीष्मजीने कहा--राजन्! निष्पाप नरेश! तुमने जो प्रश्न उपस्थित किया है, वह उत्तम युक्तियुक्त और सूक्ष्म है। उसे सावधान होकर सुनो। जो पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे सुना था, वहीं मैं तुमसे कहता हूँ ।। श्रीवत्साड़कं जगद्बीजमनन्तं लोकसाक्षिणम् | पुरा नारायण देवं नारद: परिपृष्टवान् ।। जिनका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित है, जो इस जगत्के बीज (मूल कारण) हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है तथा जो इस जगतके साक्षी हैं, उन्हीं भगवान् नारायणसे पूर्वकालमें नारदजीने इस प्रकार प्रश्न किया ।। नारद उवाच त्वामक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमस: परम् । आहहुर्वेद्य॑ परं धाम ब्रह्मादिकमलोद्भवम् ।। भगवन् भूतभव्येश श्रद्दधानैर्जितिन्द्रियै: । कथं भक्तिविंचिन्त्योडसि योगिभिमोक्षकांक्षिभि: ।। नारदजीने पूछा--भगवन्! महर्षिगण कहते हैं, आप अविनाशी (नित्य), परब्रह्म, निर्मुण, अज्ञानान्धकार एवं तमोगुणसे अतीत, विद्याके अधिपति, परम धामस्वरूप, ब्रह्मा तथा उनकी प्राकट्यभूमि--आदिकमलके उत्पत्ति-स्थान हैं। भूत और भविष्यके स्वामी परमेश्वर! श्रद्धालु और जितेन्द्रिय भक्तों तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले योगियोंको आपके स्वरूपका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? ।। किं च जप्यं जपेन्नित्यं कल्यमुत्थाय मानव: । कथं युञ्जन् सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ।। मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर किस जपनीय मन्त्रका जप करे और योगी पुरुष किस प्रकार निरन्तर ध्यान करे? आप इस सनातन तत्त्वका वर्णन कीजिये ।। श्रुत्वा तस्य तु देवर्षेर्वाक्यं वाचस्पति: स्वयम् | प्रोवाच भगवान् विष्णु्नररिदं वरद: प्रभु: ।। देवर्षि नारदका यह वचन सुनकर वाणीके अधिपति वरदायक भगवान् विष्णुने नारदजीसे इस प्रकार कहा ।। श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि इमां दिव्यामनुस्मृतिम् । यामधीत्य प्रयाणे तु मद्भावायोपपद्यते ।। श्रीभगवान् बोले--देवर्षे! मैं हर्षपूर्वक तुम्हारे सामने इस दिव्य अनुस्मृतिका वर्णन करता हूँ। मृत्युकालमें जिसका अध्ययन और श्रवण करके मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।। ओड्कारमग्रत: कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद । एकाग्र: प्रयतो भूत्वा इमं मन्त्रमुदीरयेत् ।। ओ नमो भगवते वासुदेवायेति । नारद! आदिमें ओंकारका उच्चारण करके मुझे नमस्कार करे। अर्थात् एकाग्र एवं पवित्रचित्त होकर इस मन्त्रका उच्चारण करे--*३०» नमो भगवते वासुदेवाय” इति ।। इत्युक्तो नारद: प्राह प्राउजलि: प्रणत: स्थित: ।। सर्वदेवेश्वरं विष्णुं सर्वात्मानं हरिं प्रभुम् | भगवानके ऐसा कहनेपर नारदजी हाथ जोड़ प्रणाम करके खड़े हो गये और उन सर्वदेवेश्वर सर्वात्मा एवं पापहारी प्रभु श्रीविष्णुसे बोले ।। नारद उवाच अव्यक्तं शाश्तं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ।। प्रपद्ये प्राउजलिररविंष्णुमक्षरं परमं पदम् | नारदजीने कहा--प्रभो! जो अव्यक्त सनातन देवता, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुरुषोत्तम, अविनाशी और परम पदस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं हाथ जोड़कर शरण लेता हूँ ।। पुराणं प्रभवं नित्यमक्षयं लोकसाक्षिणम् |। प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षमीशं भक्तानुकम्पिनम् । जो पुराणपुरुष, सबकी उत्पत्तिके कारण, नित्य, अक्षय और सम्पूर्ण जगतके साक्षी हैं, जिनके नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं, उन भक्तवत्सल भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ।। लोकनाथं सहस्राक्षमद्भुतं परमं पदम् ।। भगवन्तं प्रपन्नो5स्मि भूतभव्य भवत्प्रभुम् । जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी तथा संरक्षक हैं, जिनके सहस्ौरों नेत्र हैं; तथा जो भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन अद्भुत परमपदरूप भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ।। स्रष्टारं सर्वलोकानामनन्तं विश्वतोमुखम् ।। पद्मनाथं हृषीकेशं प्रपद्ये सत्यमच्युतम् । समस्त लोकोंके स्रष्टा और सब ओर मुखवाले, अनन्त, सत्य, अच्युत एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंक स्वामी भगवान् पद्मनाभकी मैं शरण लेता हूँ ।। हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भ परत: परम् ।। प्रभो: प्रभुमनाद्यन्तं प्रपद्ये तं रविप्रभम् । जो हिरण्यगर्भ, अमृतस्वरूप, पृथ्वीको गर्भमें धारण करनेवाले, परात्पर तथा प्रभुओंके भी प्रभु हैं, उन अनादि, अनन्त तथा सूर्यके समान कान्तिवाले भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ।। सहस्रशीर्ष पुरुषं महर्षि तत्त्वदभावनम् ।। प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यम भयप्रदम् | जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामी आत्मा हैं, तत्त्वोंका चिन्तन करनेवाले महर्षि कपिलस्वरूप हैं, उन सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयप्रद भगवान् श्रीहरिकी शरण लेता हूँ ।। नारायणं पुराणर्षि योगात्मानं सनातनम् ।। संस्थान सर्वतत्त्वानां प्रपद्ये ध्रुवमी श्वरम् । जो पुरातन ऋषि नारायण हैं, योगात्मा हैं, सनातन पुरुष हैं, सम्पूर्ण तत्त्वोंके अधिष्ठान एवं अविनाशी ईश्वर हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ ।। यः प्रभु: सर्वभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।। चराचरगुरुरविंष्णु: स मे देव: प्रसीदतु । जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रभु हैं, जिन्होंने इस समस्त संसारको व्याप्त कर रखा है; तथा जो चर और अचर प्राणियोंके गुरु हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। यस्मादुत्पद्यते ब्रह्मा पच्ययोनि: पितामहः ।। ब्रह्मयोनिर्हि विश्वात्मा स मे विष्णु: प्रसीदतु । जिनसे पदमयोनि पितामह ब्रह्माकी उत्पत्ति होती है; तथा जो वेद और ब्राह्मणोंकी योनि हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजजड़मे । ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके परावरे ।। आभूतसम्प्लवे चैव प्रलीने प्रकृती महान् । एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। प्राचीन कालमें महाप्रलय प्राप्त होनेपर जब सभी चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, ब्रह्मा आदि देवताओंका भी लय हो जाता है और संसारकी छोटी-बड़ी सभी वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं; तथा सम्पूर्ण भूतोंका क्रमश: लय होकर जब प्रकृतिमें महत्तत््व भी विलीन हो जाता है, उस समय जो एकमात्र शेष रह जाते हैं, वे विश्वात्मा विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। चतुर्भिश्न चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पज्चभिरेव च । हयते च पुनर्द्धाभ्यां स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। चार, चारः, दो5, पाँच तथा दोः--इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंद्वारा जिन्हें आहुति दी जाती है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। पर्जन्य: पृथिवी सस्य॑ कालो धर्म: क्रियाक्रिये । गुणाकर: स मे बश्रुर्वासुदेव: प्रसीदतु ।। मेघ, पृथ्वी, सस्य, काल, धर्म, कर्म और कर्मका अभाव--ये सब जिनके स्वरूप हैं, गुणोंके भण्डाररूप वे श्यामवर्ण भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों ।। अग्नीषोमार्कताराणां ब्रह्मरद्रेन्द्रयोगिनाम् । यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णु: प्रसीदतु ।। जो अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके भी तेजको जीत लेते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों ।। योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद । यज्ञगर्भ हिरण्याड़ पठ्चयज्ञ नमो>स्तु ते ।। योगके आवासस्थान! आपको नमस्कार है। सबके निवासस्थान, वरदायक, यज्ञगर्भ, सुनहरे रंगोंवाले पजचयज्ञमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है ।। चतुर्मूर्ते परं धाम लक्ष्म्यावास परार्चित । सर्वावास नमस्ते<स्तु वासुदेव प्रधानकृत् ।। आप श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्यम्म और अनिरुद्ध--इन चार रूपोंवाले, परमधामस्वरूप, लक्ष्मीनिवास, परमपूजित, सबके आवासस्थान और प्रकृतिके भी प्रवर्तक हैं। वासुदेव! आपको नमस्कार है ।। अजस्त्वमगम: पन्था हामूर्तिविश्विमूर्तिधृक् । विकर्त: पठचकालज्ञ नमस्ते ज्ञानसागर ।। आप अजन्मा हैं, अगम्य मार्ग हैं, निराकार हैं अथवा जगत्के सम्पूर्ण आकार आप ही धारण करते हैं, आप ही संहारकारी रुद्र हैं। आप प्रातः, सद्भव, मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न--इन पाँच कालोंको जाननेवाले हैं। ज्ञानसागर! आपको नमस्कार है ।। अव्यक्ताद व्यक्तमुत्पन्नं व्यक्ताद् यस्तु परो$क्षर: । यस्मात् परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गत: ।। जिन अव्यक्त परमात्मासे इस व्यक्त जगतकी उत्पत्ति हुई है, जो व्यक्तसे परे और अविनाशी हैं, जिनसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरणमें आया हूँ ।। न प्रधानो न च महान् पुरुषश्लेतनो हाज: । अनयोर्य: परतर: तमस्मि शरणं गत: ।। प्रकृति और महत्तत्त्व--ये दोनों जड हैं। पुरुष चेतन और अजन्मा है। इन दोनों क्षर और अक्षर पुरुषोंसे जो उत्कृष्ट और विलक्षण हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी मैं शरण लेता हूँ ।। चिन्तयन्तो हि यं नित्यं ब्रह्देशानादय: प्रभुम् निशक्षयं नाधिगच्छन्ति तमस्मि शरणं गत: ।। ब्रद्मया और शिव आदि देवता जिन भगवानका सदा चिन्तन करते रहनेपर भी उनके स्वरूपके सम्बन्धमें किसी निश्चयतक नहीं पहुँच पाते, उन परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ।। जितेन्द्रिया महात्मानो ज्ञानध्यानपरायणा: । य॑ प्राप्प न निवर्तन्ते तमस्मि शरणं गतः ।। ज्ञानी और ध्यानपरायण जितेन्द्रिय महात्मा जिन्हें पाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।। एकांशेन जगत् सर्वमवष्ट भ्य विभु: स्थित: । अग्राह्मो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गत: ।। जो सर्वव्यापी परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशसे धारण करके स्थित हैं, जो किसी इन्द्रियविशेषके द्वारा ग्रहण नहीं किये जाते तथा जो निर्गुण एवं नित्य हैं, उन परमात्माकी मैं शरणमें जाता हूँ ।। सोमाकॉम्निमयं तेजो या च तारामयी टद्युति: । दिवि संजायते यो<यं स महात्मा प्रसीदतु ।। आकाशमें जो सूर्य और चन्द्रमाका तेज प्रकाशित होता है तथा तारगणोंकी जो ज्योति जगमगाती रहती है, वह सब जिनका ही स्वरूप है, वे परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों ।। गुणादिर्निर्गुणश्वाद्यो लक्ष्मीवांश्वेतनो हज: । सूक्ष्म: सर्वगतो योगी स महात्मा प्रसीदतु ।। जो समस्त गुणोंके आदि कारण और स्वयं निर्गुण हैं, आदि पुरुष, लक्ष्मीवान्ू, चेतन, अजन्मा, सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा योगी हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। सांख्ययोगाश्षु ये चान्ये सिद्धाश्ष परमर्षय: । यं विदित्वा विमुच्यन्ते स महात्मा प्रसीदतु ।। ज्ञानयोगी, कर्मयोगी तथा जो दूसरे-दूसरे सिद्ध और महर्षि हैं, वे जिन्हें जानकर इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। अव्यक्त: समधिष्ठाता हुचिन्त्य: सदसत्पर: । आस्थिति: प्रकृतिश्रेष्ठ: स महात्मा प्रसीदतु ।। जो अव्यक्त, सबके अधिष्ठाता, अचिन्त्य और सत्-असतसे विलक्षण हैं, आधाररहित एवं प्रकृतिसे श्रेष्ठ हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। क्षेत्रज्ञ: पञ्चधा भुझुक्ते प्रकृतिं प्चभिर्मुखै: । महान् गुणांश्व यो भुड्क्ते स महात्मा प्रसीदतु ।। जो जीवात्मारूपसे पाँच ज्ञानेन्द्रियरूपी मुखोंद्वारा शब्द आदि पाँच विषयोंका उपभोग करते हैं तथा स्वयं महान् होकर भी जो गुणोंका अनुभव करते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। सूर्यमध्ये स्थित: सोमस्तस्य मध्ये च या स्थिता । भूतबाह्या च या दीप्ति: स महात्मा प्रसीदतु ।। जो सूर्यमण्डलमें सोमरूपसे स्थित होते हैं, उस सोमके भीतर जो अलौकिक दीप्ति है, वह जिनका स्वरूप है, वे परमात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों ।। नमस्ते सर्वतः सर्व सर्वतो$क्षिशिरोमुख । निर्विकार नमस्ते3स्तु साक्षी क्षेत्रे व्यवस्थित: ।। सर्वस्वरूप परमेश्वर! आपको सब ओरसे नमस्कार है, आपके सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं। निर्विकार परमात्मन! आपको नमस्कार है। आप प्रत्येक क्षेत्र (शरीर)-में साक्षीरूपसे स्थित हैं ।। अतीन्द्रिय नमस्तुभ्यं लिज्ैव्यक्तैर्न मीयसे । ये च त्वां नाभिजानन्ति संसारे संसरन्ति ते ।। इन्द्रियातीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है। व्यक्त लिंगोंद्वारा आपका ज्ञान होना असम्भव है। संसारमें जो आपको नहीं जानते, वे जन्म-मृत्युके चक््करमें पड़े रहते हैं ।। कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषविवर्जिता: । नान्यभक्ता विजानन्ति न पुनर्नरका द्विजा: ।। जो काम और क्रोधसे मुक्त, राग-द्वेषसे रहित तथा आपके अनन्य भक्त हैं, वे ही आपको जान पाते हैं। जो विषयोंके नरकमें पड़े हुए द्विज हैं, वे आपको नहीं जानते हैं ।। एकान्तिनो हि निर्दधन्द्धा निराशी:कर्मकारिण: । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशन्ति विनिश्चिता: ।। जो आपके अनन्य भक्त, द्वद्धोंसे रहित तथा निष्काम कर्म करनेवाले हैं, जिन्होंने ज्ञानममयी अग्निसे अपने समस्त कर्मोंको दग्ध कर दिया है, वे आपके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाले पुरुष आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। अशरीरं शरीरस्थं सम॑ सर्वेषु देहिषु । पुण्यपापविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां प्रविशन्त्युत ।। आप शरीरमें रहते हुए भी उससे रहित हैं तथा सम्पूर्ण देहधारियोंमें समभावसे स्थित हैं। जो पुण्य और पापसे मुक्त हैं, वे भक्तजन आपमें ही प्रवेश करते हैं ।। अव्यक्त बुद्धाहड्कारमनोभूतेन्द्रियाणि च । त्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न ते त्वयि ।। अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, पञ्च महाभूत तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ सभी आपमें हैं और उन सबमें आप हैं, किंतु वास्तवमें न उनमें आप हैं, न आपमें वे हैं ।। एकत्वान्यत्वनानात्वं ये विदुर्यान्ति ते परम् । समो<सि सर्वभूतेषु न ते द्वेष्यो5स्ति न प्रिय: ।। समत्वमभिकांक्षे5हं भक््त्या वै नान्यचेतसा | एकत्व, अन्यत्व और नानात्वका रहस्य जो लोग अच्छी तरह जानते हैं, वे आप परमात्माको प्राप्त होते हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंमें सम हैं। आपका न कोई द्वेषपात्र है और न प्रिय। मैं अनन्य चित्तसे आपकी भक्तिके द्वारा समत्व पाना चाहता हूँ ।। चराचरमिदं सर्व भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। त्वया त्वय्येव तत् प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । चार प्रकारका जो यह चराचर प्राणिसमुदाय है, वह सब आपसे व्याप्त है। जैसे सूतमें मणियाँ पिरोये होते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है ।। सत्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्ाुतत्त्वस्तत्त्वसंज्ञित: ।। अकर्महेतुरचल: पृथगात्मन्यवस्थित: । आप जगतृके स्रष्टा, भोक्ता और कूटस्थ हैं। तत्त्वरूप होकर भी उससे सर्वथा विलक्षण हैं। आप कर्मके हेतु नहीं हैं। अविचल परमात्मा हैं। प्रत्येक शरीरमें पृथक्ू-पृथक् जीवात्मारूपसे आप ही विद्यमान हैं ।। न ते भूतेषु संयोगो भूततत्त्वगुणातिग: ।। अहड्कारेण बुद्धा वा न ते योगस्त्रिभिग्ुणै: । वास्तवमें प्राणियोंसे आपका संयोग नहीं है। आप भूत, तत्त्व और गुणोंसे परे हैं। अहंकार, बुद्धि और तीनों गुणोंसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है ।। न ते धर्मोउस्त्यधर्मो वा नारम्भो जन्म वा पुनः ।। जरामरणमोक्षार्थ त्वां प्रपन्नो5स्मि सर्वश: । न आपका कोई धर्म है और न कोई अधर्म। न कोई आरम्भ है न जन्म। मैं जरा-मृत्युसे छुटकारा पानेके लिये सब प्रकारसे आपकी शरणमें आया हूँ ।। ईश्वरो5सि जगन्नाथ तत: परम उच्यसे ।। भक्तानां यद्धितं देव तद् ध्याहि त्रिदशेश्वर । जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं, इसीलिये परमात्मा कहलाते हैं। देव! सुरेश्वर! भक्तोंके लिये जो हितकी बात हो, उसका मेरे लिये चिन्तन कीजिये ।। विषयैरिन्द्रियै्वापि न मे भूय: समागम: ।। पृथिवीं यातु मे प्राणं यातु मे रसना जलम् | रूप॑ हुताशनं यातु स्पर्शो यातु च मारुतम् ।। श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनो वैकारिकं पुन: । विषयों और इन्द्रियोंके साथ फिर मेरा कभी समागम न हो। मेरी प्राणेन्द्रिय पृथ्वी- तत्त्वमें मिल जाय और रसना जलमें, रूप (नेत्र) अग्निमें, स्पर्श (त्वचा) वायुमें, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें और मन वैकारिक अहंकारमें मिल जाय ।। इन्द्रियाण्यपि संयान्तु स्वासु स्वासु च योनिषु ।। पृथिवी यातु सलिलमापोडग्निमनलो5निलम् । वायुराकाशमप्येतु मनश्वाकाश एव च ।। अहड्कारं मनो यातु मोहन सर्वदेहिनाम् अहड्कारस्ततो बुद्धि बुद्धिरव्यक्तमच्युत ।। अच्युत! इन्द्रियाँ अपनी-अपनी योनियोंमें मिल जाय, पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश मनमें, मन समस्त प्राणियोंको मोहनेवाले अहंकारमें, अहंकार बुद्धि (महत्तत्त्व)-में और बुद्धि अव्यक्त प्रकृतिमें मिल जाय ।। प्रधाने प्रकृतिं याते गुणसाम्ये व्यवस्थिते । वियोग: सर्वकरणैर्गुणभूतैश्व मे भवेत् ।। जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ।। निष्कैवल्यपदं तात काड्क्षेडहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मे<स्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ।। तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ। आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय। इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ।। त्वदबुद्धिस्त्वदगतप्राणस्त्वद्धक्तस्त्वत्पररायण: । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ।। मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ।। पूर्वदेहकृता ये मे व्याधय: प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋण मे प्रतिमुऊ्चतु ।। पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ।। अनुध्यातो5सि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः । तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ।। देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ।। उपतिष्ठ न्तु मां सर्वे व्याधय: पूर्वसंचिता: । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णो: परमं पदम् ।। पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उकऋ्रण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ।। श्रीभगवानुवाच अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातन: । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ।। श्रीभगवान् बोले--नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है। मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ।। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पज्च बुद्धीन्द्रियाणि च । दशेन्द्रियाणि मनसि अहड्कारे तथा मन: ।। अहड्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे। मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ।। यतबुद्धीन्द्रिय: पश्यन् बुद्धा बुद्धोत् परात्परम् | ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ।। आत्मना55त्मनि संयोज्य परमात्मन्यनुस्मरेत् ।। ततो बुद्धेः परं बुद्ूध्वा लभते न पुनर्भवम् | मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ।। अपि पापसमाचार: स याति परमां गतिम् | स्वयं ही अपने-आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ।। ओ नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ।। नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्रते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ।। इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहित: ।। स्वपन् विबुध्यंश्व पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी-अनुस्मृति विद्या है। मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ।। पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषत: ।। श्रावयेच्छुद्धानांश्व मद्भक्तांश्ष विशेषत: | पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषत:ः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ।। यद्यहड्कारमाश्रित्य यज्ञदानतप:क्रिया: ।। कुर्वस्तत्फलमाप्रोति पुनरावर्तनं तु तत् यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है। परंतु वह आवागमनके चक््करमें डालनेवाला होता है ।। अभ्यर्चयन् पितृन् देवान् पठन् जुद्दन् बलिं ददत् ।। ज्वलन्नग्निं स्मरेद् यो मां स याति परमां गतिम् | जो देवताओं और पितरोंकी पूजा, पाठ, होम और बलिवैश्वदेव करते तथा अग्निमें आहुति देते समय मेरा स्मरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।। यज्ञं दानं तपस्तस्मात् कुर्यादाशीर्विवर्जित: । यज्ञ, दान और तप--ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं; अतः यज्ञ, दान और तपका निष्कामभावसे अनुष्ठान करे ।। नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्धक्त: श्रद्धयान्वित: ।। तस्याक्षयो भवेल्लोक: श्वपाकस्यापि नारद । नारद! जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे लिये केवल नमस्कारमात्र बोल देता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षयलोककी प्राप्ति होती है ।। कि पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् ।। श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिता: । फिर जो साधक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मेरे आश्रित हो श्रद्धा और विधिके साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ।। कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्धक्तो नान्तमश्लुते ।। मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रित: । अवाप्स्यसि ततः सिद्ध) द्रक्ष्यस्येव पद॑ मम ।। देवर्ष! सारे कर्म और उनके फल आदि-अन्तवाले हैं; परंतु मेरा भक्त अन्तवान् (विनाशशील) फलका उपभोग नहीं करता; अतः तुम सदा आलस्यरहित होकर मेरा ही ध्यान करो। इससे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परमधामका दर्शन कर लोगे ।। अज्ञानाय च यो ज्ञानं दद्याद् धर्मोपदेशत: । कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात् तेन तुल्यं च तत्फलम् ।। जो धर्मोपदेशके द्वारा अज्ञानी पुरुषको ज्ञान प्रदान करता है अथवा जो किसीको समूची पृथ्वीका दान कर देता है तो उस ज्ञानदानका फल इस पृथ्वीदानके बराबर ही माना जाता है ।। तस्मात् प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् | एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्य च विन्दति ।। नरश्रेष्ठ नारद! इसलिये साधु पुरुषोंको जन्म और बन्धनके भयको दूर करनेवाला ज्ञान ही देना चाहिये। इस प्रकार ज्ञान देकर मनुष्य कल्याण और बल प्राप्त करता है ।। अश्वमेधसहस्राणां सहस्नं यः समाचरेत् । नासौ पदमवाप्रोति मद्धभक्तैर्यदवाप्यते ।। जो दस लाख अभश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान कर ले, वह भी उस पदको नहीं पा सकता, जो मेरे भक्तोंको प्राप्त हो जाता है ।। भीष्म उवाच एवं पृष्ट: पुरा तेन नारदेन सुर्िणा । यदुवाच तदा शम्भुस्तदुक्तं तव सुवत्रत ।। भीष्मजी कहते हैं--सुव्रत! इस प्रकार पूर्वकालमें देवर्षि नारदके पूछनेपर कल्याणमय भगवान् विष्णुने उस समय जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें बता दिया ।। त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणातिगम् । भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ।। तुम भी एकचित्त होकर उन गुणातीत परमात्माका ध्यान करो और सम्पूर्ण भक्तिभावसे उन्हीं अविनाशी परमात्माका भजन करो ।। श्रुत्वैतन्नारदो वाक््यं दिव्यं नारायणेरितम् । अत्यन्तभक्तिमान् देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ।। भगवान् नारायणका कहा हुआ यह दिव्य वचन सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् देवर्षि नारद भगवानके प्रति एकाग्रचित्त हो गये ।। नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् । इदं जपन वै प्राप्नोति तद् विष्णो: परमं पदम् ।। जो पुरुष अनन्यभावसे दस वर्षोतक ऋषि-प्रवर नारायणदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ।। कि तस्य बहुभिमम॑न्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने । नमो नारायणायेति मन्त्र: सर्वार्थलाधक: ।। जिसकी भगवान् जनार्दनमें भक्ति है, उसे बहुत-से मन्त्रोंद्वारा क्या लेना है? '३० नमो नारायणाय” यह एकमात्र मन्त्र ही सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला है ।। इमां रहस्यां परमामनुस्मृति- मधीत्य बुद्धि लभते च नैछ्िकीम् । विहाय दुःखान्यवमुच्य सड्कटात् स वीतरागो विचरेन्महीमिमाम् ।।) इस परम गोपनीय अनुस्मृति विद्याका स्वाध्याय करके मनुष्य भगवानके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाली बुद्धि प्राप्त कर लेता है। वह सारे दुःखोंको दूर करके संकटसे मुक्त एवं वीतराग हो इस पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करता है ।। इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम नवाधिकद्धिशततमो< ध्याय:
Bhishma said: Your question, O sinless king, is subtle, well-reasoned, and rightly framed. Listen attentively; I will repeat what I once heard from Narada. In former times Narada approached Narayana—marked with the Śrīvatsa, the seed of the universe, endless, and the witness of all worlds—and asked: “You are called the imperishable Supreme Brahman, beyond the darkness of ignorance, without limiting qualities, the highest knowable reality and the supreme abode, the source even of Brahmā and the lotus of origin. How should the faithful, self-controlled devotees and the yogins who long for liberation contemplate you? What should a person regularly recite upon rising at dawn, and how should a yogin maintain unbroken meditation? Teach me the eternal truth.” The Lord replied that he would teach a divine ‘anusmṛti’—a sacred recollection—by which, especially at the time of departure, one attains the Lord’s own state. He instructed Narada to begin with Oṃ, bow in reverence, become one-pointed and purified, and recite the mantra: “Oṃ, homage to the Blessed Lord Vāsudeva.” What follows is a long hymn of surrender and remembrance: Narada praises Vishnu as the ancient, unborn, all-pervading ruler; the inner witness in every body; the support of all principles; beyond prakṛti, intellect, ego, and the three guṇas; the light within sun, moon, and stars; the refuge of those freed from desire, anger, and duality. He prays that at death his mind and breath may rest in the Lord alone, that the senses dissolve back into their cosmic sources, and that he may go debtless—freed from karmic residue—to Vishnu’s highest abode. The Lord then teaches the inner discipline of withdrawal: restrain the ten senses, merge them into mind, mind into ego, ego into intellect, and intellect into the Self; know the Supreme beyond even intellect; and at the moment of death remember him in this way. Such remembrance, he declares, carries even a former wrongdoer to the highest goal. He praises the power of simple devotion—uttering ‘namaḥ’ with faith—and urges constant, unwearied meditation on Narayana rather than prideful ritualism. Bhishma concludes by urging Yudhishthira to become single-minded, worship the imperishable Supreme Self, and take up this remembrance as the sure support at life’s end.
Verse 293
देवाश्न दानवाश्नैव मोहितास्तस्य तेजसा । उनके उस सिंहनादको सुनकर सब देवता जगदीश्वर भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ पहुँचकर वे इस प्रकार बोले--'देव! प्रभो! यह कैसा सिंहनाद है? इसे हमलोग नहीं जानते। वह कौन वीर है? अथवा किसकी गर्जना है? जिसने इस जगत्को व्याकुल कर दिया है। देवता और दानव सभी उसके तेजसे मोहित हो रहे हैं!
Bhishma said: “Both the gods and the Dānavas were bewildered by his radiance. Hearing that lion-like roar, all the gods went to Brahmā, the Lord of the universe. Having reached him, they spoke thus: ‘O God, O Lord! What sort of lion-roar is this? We do not recognize it. Who is that hero—or whose thunderous cry is it—that has thrown the world into agitation? Both gods and Dānavas alike are being deluded by his blazing power.’”
The chapter foregrounds the practitioner’s dilemma of maintaining ‘niṣkalmaṣa’ brahmacarya while managing sleep, asserting that dream can introduce rājasa-tāmasa disturbances that compromise mental purity.
It explains dream as arising from sensory fatigue and the mind’s latent, projecting activity (saṃkalpa), whereby the mind—described as pervasive and functioning as an inner gateway—presents impressions as experiential content even without ordinary external sense-operation.
Yes: it frames Brahman as the supreme, unmanifest object of knowledge and states that it can be approached through cultivated insight (jñāna) and through pratyāhāra, linking psychological regulation (guṇas, sleep/dream) to soteriological method.