Ayodhya KandaPrakarana 1720 Verses

Prakarana 17

यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परीक्षा’ का है। राजधर्म, पुत्रधर्म, मातृभाव, और लोकलज्जा—इन सबके बीच राम-आज्ञा (ईश-आज्ञा) को सर्वोच्च मानने की साधना यहाँ घटित होती है। अयोध्या का वैभव-त्याग भीतर के ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन बनता है; भरत का विलाप और फिर धीरज—वैराग्य-युक्त प्रेम (विवेक सहित करुणा) की सीढ़ी है।

এই অংশে করুণ-রস প্রধান, কিন্তু তা কেবল শোক নয়—ধর্মবোধে সংযত করুণা। ভরতের ‘তাত-তাত’ আহ্বান পুত্রহৃদয়ের অসহায়তা দেখায়; কৈকেয়ীর ‘মরমু পাঁছি জনু মাহুর দেই’ বাক্য মনস্তাত্ত্বিক নিষ্ঠুরতাকে তীক্ষ্ণ রূপকে বাঁধে। এরপর কৌশল্যার মাতৃত্ব করুণাকে শান্তিতে রূপান্তরিত করে—‘ধীরজ ধরহু’ উপদেশ করুণ-রসকে শান্ত-রসের দিকে ফেরায়। এখানে তুলসীদাস ‘লীলা’ (রামের বনগমন)কে ‘সাধনা’ (আজ্ঞাপালন, বৈরাগ্য, লোকধর্ম)তে পরিণত করেন। ভরতের প্রতিজ্ঞাময় ভাষা (পাতক-গণনা) আত্মশুদ্ধির কষ্টিপাথর: তিনি নিজের মনকে প্রকাশ্যে ধর্ম-প্রতিজ্ঞায় বেঁধে দেন। ফলে অযোধ্যা কাণ্ডের এই খণ্ড সোপান-ক্রমে ‘বিরহ থেকে বিবেক’ এবং ‘শোক থেকে শরণাগতি’-র সিঁড়ি হয়ে ওঠে।

Spoken translationRamcharitmanas Ayodhya Kanda, Prakarana 17

Verses

চৌপাই 160.1-4

तात बात मैं सकल सँवारी।भै मंथरा सहाय बिचारी।।

कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ।भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा।जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।

तात तात हा तात पुकारी।परे भूमितल ब्याकुल भारी।।

चलत न देखन पायउँ तोही।तात न रामहि सौंपेहु मोही।।

बहुरि धीर धरि उठे सँभारी।कहु पितु मरन हेतु महतारी।।

सुनि सुत बचन कहति कैकेई।मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।

आदिहु तें सब आपनि करनी।कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।

tāta bāta maiṁ sakala sãvārī |bhai maṁtharā sahāya bicārī ||

kachuka kāja bidhi bīca bigāreu |bhūpati surapati pura pagu dhāreu ||

sunata bharatu bhae bibasa biṣādā |janu sahameu kari kehari nādā ||

tāta tāta hā tāta pukārī |pare bhūmitala byākula bhārī ||

calata na dekhana pāyaũ tohī |tāta na rāmahi sauṁpehu mohī ||

bahuri dhīra dhari uṭhe sãbhārī |kahu pitu marana hetu mahatārī ||

suni suta bacana kahati kaikeī |maramu pā̃chi janu māhura deī ||

ādihu teṁ saba āpani karanī |kuṭila kaṭhora mudita mana baranī ||

"বৎস, আমি সব ব্যবস্থা করেছিলাম, আর হতভাগ্য মন্থরা হয়েছিল আমার সহায়িকা। কিন্তু বিধাতা মাঝপথে কাজ নষ্ট করে দিলেন: রাজা দেবরাজ ইন্দ্রের নগরীতে পদ স্থাপন করেছেন।" এই কথা শুনে ভরত শোকে প্রায় বিহ্বল হয়ে পড়লেন, যেন সিংহের গর্জনে ভীত এক হাতি। "পিতা, পিতা, হায় পিতা!" বলে চিৎকার করে তিনি অতিশয় ব্যাকুল হয়ে ভূমিতলে পড়ে গেলেন। "আপনি যাওয়ার সময় আমি আপনাকে দেখতে পাইনি, পিতা, আর আপনি আমাকে রামের কাছে সঁপে দেননি।" তারপর ধৈর্য ধরে নিজেকে সামলে তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন, "মাতা, পিতার মৃত্যুর কারণ বলুন।" পুত্রের কথা শুনে কৈকেয়ী উত্তর দিলেন, যেন কেউ ঘায়ে আঙুল দিয়ে বিষ ঢালছেন। ধূর্ত ও নিষ্ঠুর মনে আনন্দিত হয়ে তিনি আদিকাল থেকে নিজের সমস্ত কৃতকর্ম বর্ণনা করলেন।

দোহা 160

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।⁠160।।

bharatahi bisareu pitu marana sunata rāma bana gaunu |hetu apanapau jāni jiyã thakita rahe dhari maunu ||⁠160||

ভরত পিতার মৃত্যু ভুলে গেলেন রামের বনগমন শুনে। নিজেই এর কারণ জেনে হৃদয়ে স্তব্ধ হয়ে মৌন রইলেন।

চৌপাই 161.1-4

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति।मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

तात राउ नहिं सोचे जोगू।बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।

जीवत सकल जनम फल पाए।अंत अमरपति सदन सिधाए।।

अस अनुमानि सोच परिहरहू।सहित समाज राज पुर करहू।।

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू।पाकें छत जनु लाग अँगारू।।

धीरज धरि भरि लेहिं उसासा।पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।

जौं पै कुरुचि रही अति तोही।जनमत काहे न मारे मोही।।

पेड़ काटि तैं पालउ सींचा।मीन जिअन निति बारि उलीचा।।

bikala biloki sutahi samujhāvati |manahũ jare para lonu lagāvati ||

tāta rāu nahiṁ soce jogū |biṛhai sukṛta jasu kīnheu bhogū ||

jīvata sakala janama phala pāe |aṁta amarapati sadana sidhāe ||

asa anumāni soca pariharahū |sahita samāja rāja pura karahū ||

suni suṭhi sahameu rājakumārū |pākeṁ chata janu lāga ãgārū ||

dhīraja dhari bhari lehiṁ usāsā |pāpani sabahi bhā̃ti kula nāsā ||

jauṁ pai kuruci rahī ati tohī |janamata kāhe na māre mohī ||

peṛa kāṭi taiṁ pālau sīṁcā |mīna jiana niti bāri ulīcā ||

বিহ্বল পুত্রকে দেখে তাঁকে সান্ত্বনা দিতে লাগলেন, অথচ মনে হল যেন দগ্ধ স্থানে লবণ ঘষছেন। "তাত, রাজার জন্য শোক করা উচিত নয়। তিনি মহান পুণ্য ও যশ অর্জন করেছিলেন এবং তাহার ফল ভোগ করেছিলেন।" "জীবিতাবস্থায় তিনি জন্মের সমস্ত ফল লাভ করেছিলেন, এবং অন্তে তিনি অমরপতির ধামে গমন করিয়াছেন।" "এইরূপ বিবেচনা করিয়া শোক ত্যাগ করো, এবং সমস্ত প্রজা সহ রাজ্য ও নগর শাসন করো।" এই কথা শুনিয়া রাজকুমার মহাভয়ে সংকুচিত হলেন, যেন পুঁথিতে অঙ্গার পড়িয়াছে। ধৈর্য ধরিয়া গভীর নিঃশ্বাস গ্রহণ করিলেন: "পাপিষ্ঠা, তুই সর্বপ্রকারে কুল নাশ করিয়াছিস।" "যদি তোর মনে এত দুষ্টতা ছিল, তবে আমার জন্মের সময়েই কেন আমাকে হত্যা করলি না?" "তুই বৃক্ষ কেটে তাহার ডাল সেচিস, আর জল শুকাইয়া মাছকে বাঁচাইতে চেষ্টা করিস।"

দোহা 161

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।⁠161।।

haṁsabaṁsu dasarathu janaku rāma lakhana se bhāi |jananī tū̃ jananī bhaī bidhi sana kachu na basāi ||⁠161||

আমার বংশ সূর্যবংশ, দশরথ আমার পিতা, রাম ও লক্ষ্মণ আমার ভাই। তুমি আমার জননী, তুমি এমন জননী হয়েছ, বিধির বিরুদ্ধে কিছু করা যায় না।

চৌপাই 162.1-4

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ।खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ।।

बर मागत मन भइ नहिं पीरा।गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।

भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही।मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।

बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

सरल सुसील धरम रत राऊ।सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।

अस को जीव जंतु जग माहीं।जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।

भे अति अहित रामु तेउ तोही।को तू अहसि सत्य कहु मोही।।

जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई।आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।

jaba taiṁ kumati kumata jiyã ṭhayaū |khaṁḍa khaṁḍa hoi hṛdau na gayaū ||

bara māgata mana bhai nahiṁ pīrā |gari na jīha muhã pareu na kīrā ||

bhūpã pratīta tori kimi kīnhī |marana kāla bidhi mati hari līnhī ||

bidhihũ na nāri hṛdaya gati jānī |sakala kapaṭa agha avaguna khānī ||

sarala susīla dharama rata rāū |so kimi jānai tīya subhāū ||

asa ko jīva jaṁtu jaga māhīṁ |jehi raghunātha prānapriya nāhīṁ ||

bhe ati ahita rāmu teu tohī |ko tū ahasi satya kahu mohī ||

jo hasi so hasi muhã masi lāī |ā̃khi oṭa uṭhi baiṭhahiṁ jāī ||

যখন তুমি তোমার মনে এই দুষ্ট পরামর্শ স্থির করলে, তখন কেন তোমার হৃদয় খণ্ড খণ্ড হয়ে গেল না? বর চাইতে গিয়ে তোমার মনে কোনো পীড়া হলো না, জিহ্বা পুড়ে গেল না, আর মুখে কৃমি পড়ল না। রাজা তোমাকে কীভাবে বিশ্বাস করলেন? মৃত্যুকাল উপস্থিত হয়েছিল, ঈশ্বর তাঁর বুদ্ধি হরণ করেছিলেন। ব্রহ্মাও নারীর হৃদয়ের গতি জানেন না, যা সকল ছল, পাপ ও দোষের খনি। রাজা ছিলেন সরল, শীলবান ও ধর্মে রত; তিনি নারীর স্বভাব কীভাবে জানবেন? জগতে এমন কোনো প্রাণী আছে কি, যার কাছে রঘুনাথ প্রাণের চেয়ে প্রিয় নন? রামও তোমার অতি অহিত হয়েছেন। তুমি কে? আমাকে সত্য বলো। যা হও তা হও, কিন্তু তুমি মুখে কালি মেখেছ। উঠে আমার চোখের আড়ালে গিয়ে বসো।

দোহা 162

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।⁠162।।

rāma birodhī hṛdaya teṁ pragaṭa kīnha bidhi mohi |mo samāna ko pātakī bādi kahaũ kachu tohi ||⁠162||

রাম-বিরোধী হৃদয় থেকে বিধি আমাকে প্রকট করেছেন। আমার মতো পাতকী আর কে আছে? বৃথাই তোমাকে কিছু বলছি।

চৌপাই 163.1-4

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई।जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

तेहि अवसर कुबरी तहँ आई।बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई।बरत अनल घृत आहुति पाई।।

हुमगि लात तकि कूबर मारा।परि मुह भर महि करत पुकारा।।

कूबर टूटेउ फूट कपारू।दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।

आह दइअ मैं काह नसावा।करत नीक फलु अनइस पावा।।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी।लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।

भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई।कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।

suni satrughuna mātu kuṭilāī |jarahiṁ gāta risa kachu na basāī ||

tehi avasara kubarī tahã āī |basana bibhūṣana bibidha banāī ||

lakhi risa bhareu lakhana laghu bhāī |barata anala ghṛta āhuti pāī ||

humagi lāta taki kūbara mārā |pari muha bhara mahi karata pukārā ||

kūbara ṭūṭeu phūṭa kapārū |dalita dasana mukha rudhira pracārū ||

āha daia maiṁ kāha nasāvā |karata nīka phalu anaisa pāvā ||

suni ripuhana lakhi nakha sikha khoṭī |lage ghasīṭana dhari dhari jhoṁṭī ||

bharata dayānidhi dīnhi chaṛāī |kausalyā pahiṁ ge dou bhāī ||

শত্রুঘ্ন তাঁর মাতার কুটিলতা শুনে সমস্ত শরীরে দগ্ধ হলেন, এবং রোষে নিজেকে কিছুতেই সংযত রাখতে পারলেন না। সেই মুহূর্তে কুবরী সেখানে এল, বিবিধ বসন ও অলংকারে সজ্জিত হয়ে। তাকে দেখে লক্ষ্মণের অনুজ ভ্রাতা রোষে ভরে উঠলেন, যেমন ঘৃতাহুতি পেয়ে অগ্নি প্রজ্বলিত হয়। লাফ দিয়ে এগিয়ে গিয়ে তিনি সুনিশিত লাথি মারলেন তার কুঁজোতে; সে মুখ থুবড়ে মাটিতে পড়ে চিৎকার করতে লাগল। কুবরীর কুঁজো ভেঙে গেল, মাথা ফেটে গেল, দাঁত ভেঙে গেল, এবং মুখ থেকে রক্ত ঝরতে লাগল। "হায় ঈশ্বর! আমি কী অনিষ্ট করেছি? আমি ভালো কাজ করেছি, আর এই হল আমার ফল, এক অমঙ্গল ফল।" এই কথা শুনে শত্রুঘ্ন তাকে দেখলেন, নখ থেকে শিরোভাগ পর্যন্ত কুটিলা, এবং বারবার চুল ধরে টেনে হেঁচড়তে লাগলেন। ভরত, দয়ার ভাণ্ডার, তাকে ছাড়িয়ে দিলেন, এবং তারপর দুই ভাই কৌশল্যার কাছে গেলেন।

দোহা 163

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।⁠163।।

malina basana bibarana bikala kṛsa sarīra dukha bhāra |kanaka kalapa bara beli bana mānahũ hanī tusāra ||⁠163||

মলিন বসনে, বিবর্ণ ও বিকল, কৃশ শরীর দুঃখের ভারে ভারাক্রান্ত, যেন বনের স্বর্ণ কল্পবৃক্ষের শ্রেষ্ঠ লতা তুষারাঘাতে ক্ষতিগ্রস্ত।

চৌপাই 164.1-4

भरतहि देखि मातु उठि धाई।मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

देखत भरतु बिकल भए भारी।परे चरन तन दसा बिसारी।।

मातु तात कहँ देहि देखाई।कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।

कैकइ कत जनमी जग माझा।जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही।अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।

को तिभुवन मोहि सरिस अभागी।गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू।मैं केवल सब अनरथ हेतु।।

धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी।दुसह दाह दुख दूषन भागी।।

bharatahi dekhi mātu uṭhi dhāī |muruchita avani parī jhaĩ āī ||

dekhata bharatu bikala bhae bhārī |pare carana tana dasā bisārī ||

mātu tāta kahã dehi dekhāī |kahã siya rāmu lakhanu dou bhāī ||

kaikai kata janamī jaga mājhā |jauṁ janami ta bhai kāhe na bā̃jhā ||

kula kalaṁku jehiṁ janameu mohī |apajasa bhājana priyajana drohī ||

ko tibhuvana mohi sarisa abhāgī |gati asi tori mātu jehi lāgī ||

pitu surapura bana raghubara ketū |maiṁ kevala saba anaratha hetu ||

dhiga mohi bhayaũ benu bana āgī |dusaha dāha dukha dūṣana bhāgī ||

ভরতকে দেখে মাতা উঠে দৌড়ালেন, কিন্তু মূর্ছিত হয়ে ভূমিতে পড়ে গেলেন। দেখে ভরত অত্যন্ত ব্যাকুল হলেন, নিজ দেহের অবস্থা ভুলে তাঁর চরণে পড়ে গেলেন। "মাতা, আমাকে পিতাকে দেখান। সীতা কোথায়, রাম ও লক্ষ্মণ এই দুই ভ্রাতা কোথায়? কৈকেয়ী জগতে কেন জন্মালেন? আর যদি জন্মালেন, তবে কেন বন্ধ্যা হলেন না? যিনি আমাকে জন্ম দিলেন তিনি কুলের কলঙ্ক, অপযশের পাত্র, প্রিয়জনের বিশ্বাসঘাতক। ত্রিভুবনে আমার মতো অভাগা কে আছে, যার কারণে মাতা আপনার এই দশা হল? পিতা স্বর্গলোকে গেছেন, রঘুবর বনে গেছেন, আমি একাই সব অনর্থের কারণ। ধিক আমাকে! আমি বাঁশবনের আগুনের মতো হয়েছি, অসহ্য দাহ, দুঃখ ও নিন্দার অংশীদার।

দোহা 164

मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।⁠164।।

mātu bharata ke bacana mṛdu suni suni uṭhī sãbhāri |lie uṭhāi lagāi ura locana mocati bāri ||⁠164||

ভরতের কোমল কথা বারবার শুনে মা সামলে নিয়ে উঠে দাঁড়ালেন। তাঁকে তুলে নিয়ে বুকে জড়িয়ে ধরলেন, চোখে জল ঝরিয়ে দিলেন।

চৌপাই 165.1-4

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए।अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई।सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।

देखि सुभाउ कहत सबु कोई।राम मातु अस काहे न होई।।

माताँ भरतु गोद बैठारे।आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू।कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।

जनि मानहु हियँ हानि गलानी।काल करम गति अघटित जानि।।

काहुहि दोसु देहु जनि ताता।भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।

जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा।अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।

sarala subhāya māyã hiyã lāe |ati hita manahũ rāma phiri āe ||

bheṁṭeu bahuri lakhana laghu bhāī |soku sanehu na hṛdayã samāī ||

dekhi subhāu kahata sabu koī |rāma mātu asa kāhe na hoī ||

mātā̃ bharatu goda baiṭhāre |ā̃su pauṁchi mṛdu bacana ucāre ||

ajahũ baccha bali dhīraja dharahū |kusamau samujhi soka pariharahū ||

jani mānahu hiyã hāni galānī |kāla karama gati aghaṭita jāni ||

kāhuhi dosu dehu jani tātā |bhā mohi saba bidhi bāma bidhātā ||

jo etehũ dukha mohi jiāvā |ajahũ ko jānai kā tehi bhāvā ||

সরল স্বভাবে মাতা তাঁকে হৃদয়ে ধারণ করলেন, মনে হল যেন রাম নিজেই ফিরে এসেছেন। তারপর তিনি লক্ষণের ছোট ভাইকেও আলিঙ্গন করলেন, হৃদয়ে শোক আর স্নেহ ধরে রাখা গেল না। তাঁর স্বভাব দেখে সকলেই বললেন, রামের মাতা, এমন না হবেন তো কেন? মাতা ভরতকে কোলে বসালেন, অশ্রু মুছিয়ে কোমল বচন উচ্চারণ করলেন। এখনও বৎস, স্থিরচিত্ত হও, অমঙ্গল সময় বুঝে শোক ত্যাগ করো। হৃদয়ে হানি আর লজ্জা মেনো না, কাল আর কর্মের গতি অনিবার্য জেনে। কাহাকেও দোষ দিও না তাতা, বিধাতা আমার প্রতি সব বিধাতেই প্রতিকূল হয়েছেন। যিনি এত দুঃখেও আমাকে বাঁচিয়ে রেখেছেন, এখনও কে জানে তাঁর কী অভিপ্রায়।

দোহা 165

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर।।⁠165।।

pitu āyasa bhūṣana basana tāta taje raghubīra |bisamau haraṣu na hṛdayã kachu pahire balakala cīra ||⁠165||

পিতার আজ্ঞায় ভূষণ ও বস্ত্র পরিত্যাগ করেছিলেন রঘুবীর, হে পিতা। হৃদয়ে বিষাদ বা হর্ষ কিছুই না রেখে তিনি বলকল চীর ধারণ করেছিলেন।

চৌপাই 166.1-4

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू।सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी।रहइ न राम चरन अनुरागी।।

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा।रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।

तब रघुपति सबही सिरु नाई।चले संग सिय अरु लघु भाई।।

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए।गइउँ न संग न प्रान पठाए।।

यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें।तउ न तजा तनु जीव अभागें।।

मोहि न लाज निज नेहु निहारी।राम सरिस सुत मैं महतारी।।

जिऐ मरै भल भूपति जाना।मोर हृदय सत कुलिस समाना।।

mukha prasanna mana raṁga na roṣū |saba kara saba bidhi kari paritoṣū ||

cale bipina suni siya sãga lāgī |rahai na rāma carana anurāgī ||

sunatahiṁ lakhanu cale uṭhi sāthā |rahahiṁ na jatana kie raghunāthā ||

taba raghupati sabahī siru nāī |cale saṁga siya aru laghu bhāī ||

rāmu lakhanu siya banahi sidhāe |gaiũ na saṁga na prāna paṭhāe ||

yahu sabu bhā inha ā̃khinha āgeṁ |tau na tajā tanu jīva abhāgeṁ ||

mohi na lāja nija nehu nihārī |rāma sarisa suta maiṁ mahatārī ||

jiai marai bhala bhūpati jānā |mora hṛdaya sata kulisa samānā ||

তাঁর মুখ ছিল প্রসন্ন, মনে রাগ বা আবেগের কোনো চিহ্ন ছিল না; তিনি সব উপায়ে সবাইকে সন্তুষ্ট করলেন। সীতা শুনলেন যে তিনি বনে যাচ্ছেন, তখন তাঁর সঙ্গে চলতে লাগলেন; রামের চরণে অনুরক্ত হয়ে তিনি পিছিয়ে থাকতে পারলেন না। লক্ষ্মণ শোনামাত্রই উঠে দাঁড়িয়ে সঙ্গে চললেন; রঘুনাথ যতই চেষ্টা করলেন, তিনি থাকতে রাজি হলেন না। তখন রঘুপতি সবাইকে মাথা নত করে প্রণাম করে সীতা ও ছোট ভাইয়ের সঙ্গে বেরিয়ে পড়লেন। রাম, লক্ষ্মণ ও সীতা বনের দিকে রওনা হলেন। আমি তাঁদের সঙ্গে গেলাম না, প্রাণপণও পাঠালাম না। এই সবই আমার এই চোখের সামনে ঘটল, তবু আমার দুর্ভাগা জীবন দেহ ছেড়ে গেল না। নিজের স্নেহ দেখেও আমার লজ্জা হয় না, যিনি রামের মতো পুত্রের জননী। রাজা ভালো করেই জানতেন কীভাবে বাঁচতে হয় আর কীভাবে মরতে হয়; আমার হৃদয় শত বজ্রের মতো কঠিন।

দোহা 166

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।⁠166।।

kausalyā ke bacana suni bharata sahita ranivāsa |byākula bilapata rājagṛha mānahũ soka nevāsu ||⁠166||

কৌসল্যার কথা শুনে ভরত সহ অন্তঃপুরের নারীরা ব্যাকুল হয়ে কাঁদতে লাগলেন, এবং রাজভবন যেন শোকের বাসস্থান হয়ে দাঁড়াল।

চৌপাই 167.1-4

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई।कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

भाँति अनेक भरतु समुझाए।कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं।कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।

छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।बोले भरत जोरि जुग पानी।।

जे अघ मातु पिता सुत मारें।गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।

जे अघ तिय बालक बध कीन्हें।मीत महीपति माहुर दीन्हें।।

जे पातक उपपातक अहहीं।करम बचन मन भव कबि कहहीं।।

ते पातक मोहि होहुँ बिधाता।जौं यहु होइ मोर मत माता।।

bilapahiṁ bikala bharata dou bhāī |kausalyā̃ lie hṛdayã lagāī ||

bhā̃ti aneka bharatu samujhāe |kahi bibekamaya bacana sunāe ||

bharatahũ mātu sakala samujhāīṁ |kahi purāna śruti kathā suhāīṁ ||

chala bihīna suci sarala subānī |bole bharata jori juga pānī ||

je agha mātu pitā suta māreṁ |gāi goṭha mahisura pura jāreṁ ||

je agha tiya bālaka badha kīnheṁ |mīta mahīpati māhura dīnheṁ ||

je pātaka upapātaka ahahīṁ |karama bacana mana bhava kabi kahahīṁ ||

te pātaka mohi hohũ bidhātā |jauṁ yahu hoi mora mata mātā ||

দুই ভ্রাতা ভরত ও শত্রুঘ্ন বিলাপ করিয়া ব্যাকুল হইলেন, কৌসল্যা তাঁহাদিগকে হৃদয়ে লইয়া আলিঙ্গন করিলেন। তিনি ভরতকে অনেক প্রকারে সমুঝাইয়া বুঝাইলেন, বিবেকময় বচন কহিয়া শুনাইলেন। সকল মাতৃগণও ভরতকে সান্ত্বনা দিলেন, পুরাণ ও শ্রুতির সুন্দর কথা কহিয়া শুনাইলেন। ছলবিহীন, পবিত্র ও সরল সুবচন ভরত দুই হাত জোড় করিয়া কহিলেন। যে অঘ মাতা, পিতা বা পুত্রকে বধ করিতে, গো-সহ গোষ্ঠ বা ব্রাহ্মণপুর দাহিতে উৎপন্ন হয়, যে অঘ স্ত্রী বা বালককে বধ করিতে, অথবা মিত্র বা রাজাকে বিষ দিতে হয়, যে সকল পাতক ও উপপাতক আছে, যাহা কবি কর্ম, বাক্য ও মন হইতে উৎপন্ন বলেন, সে সকল পাতক আমার হউক, হে বিধাতা, যদি এ আমার মত হয়, হে মাতা।

দোহা 167

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।⁠167।।

je parihari hari hara carana bhajahiṁ bhūtagana ghora |tehi kai gati mohi deu bidhi jauṁ jananī mata mora ||⁠167||

যারা হরি ও হরের চরণ পরিত্যাগ করে ভয়ঙ্কর ভূতগণের পূজা করে, মাতা, যদি এই আমার পরামর্শ হয়ে থাকে, তবে ব্রহ্মা যেন আমাকে তাদেরই গতি দেন।

চৌপাই 168.1-4

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं।पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी।बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।

लोभी लंपट लोलुपचारा।जे ताकहिं परधनु परदारा।।

पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा।जौं जननी यहु संमत मोरा।।

जे नहिं साधुसंग अनुरागे।परमारथ पथ बिमुख अभागे।।

जे न भजहिं हरि नरतनु पाई।जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं।बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।

तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ।जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।

becahiṁ bedu dharamu duhi lehīṁ |pisuna parāya pāpa kahi dehīṁ ||

kapaṭī kuṭila kalahapriya krodhī |beda bidūṣaka bisva birodhī ||

lobhī laṁpaṭa lolupacārā |je tākahiṁ paradhanu paradārā ||

pāvauṁ maiṁ tinha ke gati ghorā |jauṁ jananī yahu saṁmata morā ||

je nahiṁ sādhusaṁga anurāge |paramāratha patha bimukha abhāge ||

je na bhajahiṁ hari naratanu pāī |jinhahi na hari hara sujasu sohāī ||

taji śrutipaṁthu bāma patha calahīṁ |baṁcaka biraci beṣa jagu chalahīṁ ||

tinha kai gati mohi saṁkara deū |jananī jauṁ yahu jānauṁ bheū ||

যারা বেদ বিক্রি করে, ধর্ম দোহন করে লাভ লয়, এবং যারা পরনিন্দা করে অন্যের দোষ ও পাপ প্রচার করে। ধূর্ত, কুটিল, কলহপ্রিয়, ক্রোধী, বেদের নিন্দক, সমগ্র বিশ্বের শত্রু। লোভী, কামাতুর, লম্পট আচরণে অভ্যস্ত, যারা অন্যের ধন ও অন্যের স্ত্রীর প্রতি লোলুপ দৃষ্টি ফেলে। আমি তাদের ভয়ংকর গতি লাভ করি, মাতা, যদি এই ষড়যন্ত্রে আমার সম্মতি থাকে। যাদের সাধুসঙ্গে কোনো অনুরাগ নেই, যারা পরমার্থের পথ থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়, দুর্ভাগ্যবান। যারা মনুষ্য দেহ পেয়েও হরিকে ভজন করে না, যাদের কাছে হরি ও হরের সুযশ মনোরম ঠেকে না। যারা শ্রুতির পথ ত্যাগ করে বাম পথে চলে, এবং প্রতারকের ছদ্মবেশে জগতকে প্রতারিত করে। শঙ্কর আমাকে তাদের গতি দিন, মাতা, যদি আমি এই ষড়যন্ত্রের রহস্য জানতাম।

দোহা 168

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।⁠168।।

mātu bharata ke bacana suni sā̃ce sarala subhāyã |kahati rāma priya tāta tumha sadā bacana mana kāyã ||⁠168||

মাতা ভরতের সত্য ও সরল স্বভাবের কথা শুনে বললেন, "বৎস, তুমি সদা রামের প্রিয়, বাক্যে, মনে ও কায়ে।"

চৌপাই 169.1-4

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे।तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी।होइ बारिचर बारि बिरागी।।

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू।तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।

मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं।सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए।थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।।

करत बिलाप बहुत यहि भाँती।बैठेहिं बीति गइ सब राती।।

बामदेउ बसिष्ठ तब आए।सचिव महाजन सकल बोलाए।।

मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे।कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

rāma prānahu teṁ prāna tumhāre |tumha raghupatihi prānahu teṁ pyāre ||

bidhu biṣa cavai sravai himu āgī |hoi bāricara bāri birāgī ||

bhaẽ gyānu baru miṭai na mohū |tumha rāmahi pratikūla na hohū ||

mata tumhāra yahu jo jaga kahahīṁ |so sapanehũ sukha sugati na lahahīṁ ||

asa kahi mātu bharatu hiyã lāe |thana paya sravahiṁ nayana jala chāe ||

karata bilāpa bahuta yahi bhā̃tī |baiṭhehiṁ bīti gai saba rātī ||

bāmadeu basiṣṭha taba āe |saciva mahājana sakala bolāe ||

muni bahu bhā̃ti bharata upadese |kahi paramāratha bacana sudese ||

রাম তোমার প্রাণের চেয়েও প্রাণাধিক প্রিয়, আর তুমি রঘুপতি রামের প্রাণের চেয়েও প্রাণাধিক প্রিয়। চন্দ্র বিষ বর্ষণ করুক, হিম অগ্নি বর্ষণ করুক, জলচর জলের প্রতি বিরাগী হয়ে যাক। জ্ঞান উদয় হলেও মোহ দূর নাও হতে পারে, কিন্তু তুমি রামের প্রতিকূল কখনো হতে পারো না। জগতে যারা বলে যে এই তোমার মত ছিল, তারা স্বপনেও সুখ বা কল্যাণ লাভ করবে না। এই বলে মাতা ভরতকে বক্ষে টেনে নিলেন, তাঁর স্তন থেকে দুগ্ধ ঝরতে লাগল আর চোখে জল ভরে গেল। এইভাবে বহুল বিলাপ করতে করতে বসে বসে সারা রাত কেটে গেল। তখন বামদেব ও বশিষ্ঠ এলেন, সকল মন্ত্রী ও প্রধান নাগরিকদের ডেকে পাঠালেন। মুনি ভরতকে বহু প্রকারে উপদেশ দিলেন, পরমার্থ সম্বন্ধে উত্তম বচন বললেন।

দোহা 169

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।⁠169।।

tāta hṛdayã dhīraju dharahu karahu jo avasara āju |uṭhe bharata gura bacana suni karana kaheu sabu sāju ||⁠169||

"বৎস, হৃদয়ে ধৈর্য ধরো, আজ যা উচিত তা করো।" গুরুর বচন শুনে ভরত উঠে দাঁড়ালেন এবং সমস্ত প্রস্তুতি করতে আদেশ দিলেন।

Frequently Asked Questions

परंपरा में भरत-चरित के पाठ से ‘राम-प्रेम में निष्कपटता’, माता-पिता के प्रति धर्मबुद्धि, और संकट में धैर्य-लाभ माना गया है; विशेषतः ‘राम-प्रतिकूलता’ का त्याग और शरणागति-भाव दृढ़ होता है।

सामान्य मानस-परंपरा में शोक-निवारण/धैर्य हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण समपुट रूप में जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ का आवर्तन भी किया जाता है।

Ask anything about Prakarana 17 of the Ramcharitmanas

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Awadhi recitation where available, and more.

Download on the App StoreGet it on Google Play

Continue reading in the Vedapath app

Open in App
Download on the App StoreGet it on Google Play