Mahabharata Adhyaya 131
Adi ParvaAdhyaya 13188 Verses

Adhyaya 131

Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)

Upa-parva: Vāraṇāvata-gamana (Pāṇḍava-pravāsa) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that Duryodhana gradually consolidates key constituencies through material incentives and honorific gestures. Skilled ministers, acting under Dhṛtarāṣṭra’s direction, repeatedly describe Vāraṇāvata as exceptionally delightful and prosperous, emphasizing its festivals, beauty, and abundance. As these reports circulate, a plan forms for the Pāṇḍavas’ travel to Vāraṇāvata. Dhṛtarāṣṭra addresses the Pāṇḍavas, presenting the journey as an opportunity to enjoy the festivities with attendants, distribute gifts to Brahmins and singers, and return happily to Hāstinapura afterward. Yudhiṣṭhira understands Dhṛtarāṣṭra’s intent and acknowledges his own lack of supportive power, yet replies with formal acceptance. He then informs senior figures—Bhīṣma, Vidura, Droṇa, Bāhlika, Somadatta, Kṛpa, and Gāndhārī—stating that they will reside in Vāraṇāvata by the king’s command. The elders respond with auspicious blessings for safe passage and protection from misfortune. After performing customary rites and completing preparations, the Pāṇḍavas depart for Vāraṇāvata, explicitly linked to the pursuit of political security and eventual restoration of status.

Chapter Arc: गौतमगोत्रीय शरद्वान के वंश-प्रसंग से कथा धनुर्वेद और ब्राह्मतेज की पृष्ठभूमि रचती है—और उसी धरातल पर द्रोण–द्रुपद की मित्रता का स्मरण उभरता है। → पंचालराज द्रुपद, द्रोण के प्रेमपूर्ण मित्र-वचनों को सुनकर भी ऐश्वर्य-मद में भर उठता है; क्रोध से भौंहें टेढ़ी, नेत्र रक्त—वह मित्रता की समानता पर प्रश्न उठाता है: ‘जो श्रोत्रिय नहीं, वह श्रोत्रिय का मित्र कैसे? जो राजा नहीं, वह राजा का मित्र कैसे?’ इस अपमान से द्रोण का मन्यु भीतर-भीतर जलने लगता है। → द्रुपद का कटु निषेध—मित्रता को पद-प्रतिष्ठा की कसौटी पर तोलना—द्रोण के भीतर प्रतिशोध का संकल्प पक्का कर देता है; वह समझ लेता है कि अब न्याय/प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना केवल शक्ति-साधना और राजाश्रय से होगी। → द्रोण अपने जीवन को नए लक्ष्य पर मोड़ता है: पुत्र अश्वत्थामा (कृपी से) की प्राप्ति और भविष्य की सिद्धि के लिए वह राजकीय संरक्षण खोजने लगता है; द्रुपद के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर वह उसी ‘प्रिय सखा’ के पास जाने का निश्चय करता है, पर अब भाव मित्रता का नहीं—प्रतिज्ञा का है। → कुमारों से संवाद के बाद द्रोण उन्हें भीष्म के पास भेजने का संकेत देता है—अब प्रश्न यह है कि भीष्म द्रोण को किस रूप में स्वीकार करेंगे: आचार्य, शरणागत, या भविष्य के युद्ध-यंत्र के रूप में?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बक। चॉ-ज:ड: - गौतमगोत्रीय होनेके कारण शरद्वानूको भी गौतम कहा जाता था। - धर्नुर्वेदके चार भेद इस प्रकार हैं--मुक्त

قال فايشَمبايانا: ثم إنَّ درونا، ابنَ بهارادفاجا الشجاع، دنا من الملك دروبادا وخاطب الحاكم قائلاً: «أيها الملك، اعرفني هنا صديقًا لك—لقد جئت لألقاك.»

Verse 2

इत्येवमुक्त: सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वर: । भारद्वाजेन पाज्चालो नामृष्यत वचो<5स्य तत्‌,मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश ट्रपद उनकी इस बातको सह न सके

قال فايشَمبايانا: وهكذا، وقد خوطِب بمودّة الصديق، لم يستطع دروبادا، سيدَ رجال البانشالا، أن يحتمل تلك الكلمات التي نطق بها ابنُ بهارادفاجا (درونا).

Verse 3

सक्रोधामर्षजिद्दय भ्रू: कषघायीकृतलोचन: । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम्‌

غلبه الغضبُ وجرحُ الكبرياء، فانعقدت حاجباه واحمرّت عيناه. وقد سكر بزهو الثروة وسلطان الملك، خاطب درونا بهذه الكلمات.

Verse 4

हुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं॑ सखा ते5हमिति द्विज

قال دروبادا: «أيها البرهمن، إن فهمك غيرُ مهذّب ولا يستقيم مع ما يليق. ولذلك تخاطبني بجرأة قائلًا: “أنا صديقك”، يا ذا الميلادين.»

Verse 5

न हि रज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्‌ । सख्यं भवति मन्दात्मन्‌ श्रिया हीनैर्धनच्युतै:,ओ मूढ़! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती

إنّ الملوك العظام المرفوعي الشأن لا يعقدون، في أيّ وقت، صداقةً مع رجالٍ من طرازك—يا بليدَ الفؤاد—محرومين من النعمة ساقطين من الثراء.

Verse 6

सौह्दान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यत: । सौद्ददं मे त्वया हयासीत्‌ पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्‌

حتى عُرى الصداقة تبلى مع الزمن، كما يشيخ الإنسان شيئًا فشيئًا. أمّا صداقتي التي كانت بيني وبينك قديمًا فكانت، في الحقيقة، موثوقةً بالقوة والقدرة؛ إذ كنا يومئذٍ متكافئين في السلطان، وذلك التكافؤ هو الذي شدّ حبل التحالف.

Verse 7

न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित्‌ । कालो होन॑ विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत

في هذا العالم لا يحمل قلبُ أحدٍ صداقةً لا تشيخ ولا تزول. فالزمن يفرّق بين الصديق وصديقه، والغضب كذلك قد ينتزع الإنسان من رباط الصداقة.

Verse 8

मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत्‌ सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्‌

فلا تتعلّق بصداقةٍ قد هرِمت وبَلِيَت. اطرح من قلبك قولَك: «نحن صديقان». يا خيرَ البراهمة، إنّ الصداقة التي كانت بيني وبينك قديمًا كانت موثوقةً بالمصلحة—نشأت لأجل اللعب معًا، والدراسة معًا، وما شابه ذلك من المنافع.

Verse 9

न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्‌ विदुष: सखा । न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते

قال هوبادا: «لا يكون الفقيرُ حقًّا صاحبًا للغنيّ، ولا يكون الجاهلُ صاحبًا للعالِم، ولا يكون الجبانُ صاحبًا للبطل. فبأيّ اعتمادٍ يُعوَّل على صداقةٍ لم تكن إلا في الماضي؟»

Verse 10

ययोरेव सम॑ वित्तं ययोरेव सम॑ श्रुतम्‌ । तयोरविवाह: सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयो:

قال هوبادا: «إنما ينشأ الزواج والصداقة على وجههما الصحيح بين من تساوت ثروتهم وتساوت معارفهم. أمّا بين المترف والمعدم—بين المزدهر والمحروم—فإن الصداقة الحقّة لا تدوم.»

Verse 11

नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते

قال هوبادا: «من ليس śrotriya لا يكون صديقًا لِـśrotriya؛ ومن ليس محاربَ عربةٍ لا يكون رفيقًا لمحاربٍ ماهرٍ في العربة؛ وكذلك من ليس ملكًا لا يكون حقًّا صديقًا لملك. فلماذا تُلحّ على استحضار صداقةٍ قديمة؟»

Verse 12

वैशग्पायन उवाच द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान्‌ | मुहूर्त चिन्तयित्वा तु मन्युनाभिपरिष्लुत:

قال فايشَمبايانا: لما خاطبه الملك دروبادا بهذا القول، استولى الغضب على درونا، ابن بهاردفاجا الشجاع. وبعد أن تفكّر هنيهة، وقد فاض قلبه بالحنق، عقد في باطنه عزمًا على الاقتصاص من سيد بانشالا، ثم انطلق نحو هاستينابورا، عاصمة الكاورافا.

Verse 13

स विनिश्ित्य मनसा पाज्चालं प्रति बुद्धिमान्‌ जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम्‌

قال فايشَمبايانا: يا جاناميجايا، لما قال الملك دروبادا ذلك، اشتعل درونا القوي غضبًا، ومكث برهة غارقًا في تفكير عميق. ومع أنه حكيم، فقد عزم في سريرته على نهجٍ يقتصّ به من سيد بانشالا، ثم مضى إلى ناغاساهفيا—هاستينابورا، حاضرةَ أعاظم الكورو.

Verse 14

स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने । भारद्वाजो5वसत्‌ तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तम:,हस्तिनापुरमें पहुँचकर द्विजश्रेष्ठ द्रोण गौतमगोत्रीय कृपाचार्यके घरमें गुप्तरूपसे निवास करने लगे

قال فايشَمبايانا: لما بلغ درونا، ابن بهاردفاجا، ناغابورا (هاستينابورا)، وهو خيرُ «ذوي الميلادين»، أقام هناك في دارِ سليلِ غوتاما (كريپا)، متخفيًا مستترًا.

Verse 15

ततो<स्य तनुज: पार्थान्‌ कृपस्यानन्तरं प्रभु: । अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जना:

ثم إن ابنه—أشْوَتْثَامَا القوي—بعد كِرِبا، شرع بنفسه يعلّم أبناء بارتها علم الأسلحة؛ غير أنّ الناس لم يعرفوا حقيقته ومن يكون على وجه اليقين.

Verse 16

एवं स तत्र गूढात्मा कंचित्‌ कालमुवास ह । कुमारास्त्वथ निष्क्रम्प समेता गजसाह्दयात्‌

وهكذا، وقد أخفى ما في نفسه، أقام هناك زمنًا. ثم خرج الأمراء معًا من جَجَساهْفَيَا (هستينابورا)، واجتمعوا في سرورٍ عظيم للّعب. وفي أثناء لعبهم وقع حادثٌ سرعان ما سيكشف ما كان مستورًا ويحرّك عواقب تمسّ الفتيان من أبناء الملوك.

Verse 17

क्रीडन्तो वीटया तत्र वीरा: पर्यचरन्‌ मुदा । पपात कूपे सा वीटा तेषां वै क्रीडतां तदा

هناك كان الفتيان الأبطال يمرحون في سرور، يلعبون بـ«فيطا» (عصًا/هراوة للّعب). وبينما هم منغمسون في لعبهم سقطت تلك الفيطة في بئر.

Verse 18

ततस्ते यत्नमातिष्ठन्‌ वीटामुद्धर्तुमादृता: । नच ते प्रत्यपद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये

عندئذٍ أخذوا يجتهدون بجدٍّ وحماسة لاستخراج الفيطة، غير أنّهم لم يهتدوا إلى وسيلةٍ ناجعة ينالون بها تلك الفيطة.

Verse 19

ततोडन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनतानना: । तस्या योगमविन्दन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन्‌

ثم أخذوا ينظر بعضهم إلى بعض ووجوههم مطرقة خجلًا. ولما لم يجدوا وسيلةً لإنجاز ذلك الأمر، استبدّ بهم القلق واضطربت نفوسهم اضطرابًا شديدًا.

Verse 20

ते5पश्यन्‌ ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम्‌ । कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम्‌

ثم لمحوا، غير بعيدٍ عنهم، براهمنًا داكنَ البشرة جالسًا هناك—كان قد أتمّ لتوّه شعيرة الأَغْنِيهوترا (agnihotra) وبقي لغايةٍ ما. بدا كأنه واقعٌ في ضيق: قد شاب شعره، وكان جسده بالغَ الهزال. ويُبرز هذا المشهد، في صمتٍ، الثقلَ الأخلاقي للقاء مُقيمِ شعيرةٍ يتألّم، داعيًا إلى استجابةٍ تُصاغ بالدارما والرحمة.

Verse 21

उन महात्मा ब्राह्मगको देखकर वे सभी कुमार उनके पास गये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये। उनका उत्साह भंग हो गया था। कोई काम करनेकी इच्छा नहीं होती थी। मनमें भारी निराशा भर गयी थी

فلما رأوا ذلك البراهمن عظيمَ النفس، تقدّم جميعُ الأمراء الفتيان إليه ووقفوا يحيطون به. كانت عزيمتهم قد انكسرت؛ ولم يبقَ فيهم ميلٌ إلى الفعل. وامتلأت قلوبهم بيأسٍ ثقيل—مُظهِرًا كيف تنهار الإرادة الباطنة حين تضيع الثقة والغاية، وكيف تغدو هداية الحكماء لازمةً في مثل تلك اللحظة.

Verse 22

अथ द्रोण: कुमारांस्तान्‌ दृष्टवा कृत्यवतस्तदा । प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान्‌

ثم إنّ درونا، وهو ذو بأسٍ وشجاعة، لما رأى أولئك الفتيان علم أنّ مقصدهم لم يُقضَ بعد. فابتسم ابتسامةً خفيفة، وخاطبهم بمهارةٍ ولطفٍ في القول.

Verse 23

अहो वो धिग्‌ बल क्षात्रं धिगेतां व: कृतास्त्राताम्‌ । भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत

قال فايشَمبايانا: «العارُ على قوّتكم الكشترية—والعارُ حتى على براعتكم المزعومة في السلاح! فمع أنّكم مولودون في سلالة بهارتا، لا تقدرون حتى على إخراج كرةٍ صغيرة سقطت في بئر.»

Verse 24

वीटां च मुद्रिकां चैव हाहमेतदपि द्वयम्‌ । उद्धरेयमिषीकाभिशर्भोजन मे प्रदीयताम्‌,“देखो, मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस आअँगूठी दोनोंको सींकोंसे निकाल सकता हूँ। तुमलोग मेरी जीविकाकी व्यवस्था करो”

قال فايشَمبايانا: «انظروا! أستطيع أن أُخرج هذين كليهما—كرتكم الصغيرة للّعب وخاتمي هذا—باستخدام عيدانٍ رفيعة من القصب. فدبّروا لي القوت.» وفي السياق، لا يُظهر المتكلم مهارته للزهو، بل لطلب معيشةٍ مشروعة، مُشيرًا إلى أنّ القدرة ينبغي أن تُقابَل بإعالةٍ بحق، وأنّ المرء قد يطلب القوت بوسائل صادقة لا بخداعٍ ولا بأذى.

Verse 25

एवमुक्‍्त्वा कुमारांस्तान्‌ द्रोण: स्वाडुलिवेष्टनम्‌ । कूपे निरुदके तस्मिन्नपातयदरिंदम:,उन कुमारोंसे यों कहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणने उस निर्जल कुएँमें अपनी अँगूठी डाल दी

وبعد أن قال ذلك لأولئك الأمراء الفتيان، ألقى درونا—قاهر الأعداء—خاتمه الذي في إصبعه في ذلك البئر الخالي من الماء.

Verse 26

युधिछिर उवाच कृपस्यानुमते ब्रह्मन्‌ भिक्षामाप्तुहि शाश्वतीम्‌

قال يودهيشتيرا: «أيها البراهمن، وبموافقة كريبا، أودّ أن أنال الصدقة هنا لتكون لي رزقًا دائمًا».

Verse 27

द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता,द्रोण बोले--ये मुदट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है

قال درونا: «هذه قبضةٌ من سيقان القصب قد كرّستُها بتعويذة السلاح. ليست عشبًا عاديًا، بل أداةٌ مشحونةٌ بقوةٍ قتالية—لتُظهر بأس المعرفة المنضبطة، وثِقَل المسؤولية الملازمة لاستعمال الأسترا».

Verse 28

अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते । भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया

قال درونا: «انظروا إلى بأس هذه—مما لا يوجد في غيرها. بقصبةٍ واحدة سأثقب الهدف؛ ثم بقصبةٍ أخرى سأثقب تلك القصبة الأولى ذاتها».

Verse 29

वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत्‌ सर्व कृतमज्जसा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया

قال فايشامبايانا: ثم إن كلَّ ما قاله درونا قد أُنجز على النحو الذي ذكره، بيسرٍ ومن غير إبطاء.

Verse 30

तददवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचना: । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचो<ब्रुवन्‌,यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले

قال فَيْشَمْبَايَنَة: لما رأى الأمراءُ الفتيانُ تلك الفعلةَ العجيبةَ اتّسعت عيونُهم دهشةً. وإذ حكموا بأنها آيةٌ في العجب، شرعوا يتكلمون—وقد حرّكهم الإعجاب بما شهدوه لتوِّهم.

Verse 31

कुमारा ऊचु. मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारोंने कहा--ब्रह्मर्ष! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।।

قال الغلمان: «يا أيها البراهمارِشي (brahmarṣi)، أسرِعْ فأخرج هذه الخاتمَ أيضًا.» قال فَيْشَمْبَايَنَة: عندئذٍ أخذ دْرُوṇَةُ ذو الصيت الرفيع قوسَه وسهمَه، فثقب الخاتمَ بالسهم ورفعه إلى أعلى. وهكذا استخرج الخاتمَ من البئر مع السهم، ووضعه في أيدي الأمراء المندهشين؛ أمّا هو فلم يُبدِ أدنى دهشة. ولمّا رأى الغلمانُ الخاتمَ قد أُخرج من البئر، خاطبوا دْرُوṇَةَ مرةً أخرى.

Verse 32

शरेण विद्‌ृध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत्‌ प्रभु: । सशरं समुपादाय कूपादड्जुलिवेष्टनम्‌

قال فَيْشَمْبَايَنَة: ثم إن دْرُوṇَةَ القويَّ المشهور أخذ القوسَ والسهمَ، فثقب بذلك السهمِ الخاتمَ وجرَّه إلى أعلى من البئر. وهكذا رفع الخاتمَ مع السهم من جوف البئر.

Verse 33

ददौ तत: कुमाराणां विस्मितानामविस्मित: । मुद्रिकामुद्धूतां दृष्टवा तमाहुस्ते कुमारका:

قال فَيْشَمْبَايَنَة: ثم إنه—والأمراءُ ما زالوا مبهوتين—بقي غيرَ مدهوش، فناولهم الخاتم. فلما رأى أولئك الفتيانُ الخاتمَ وقد رُفع من البئر، خاطبوه.

Verse 34

कुमारा ऊचु: अभिवादयामहे ब्रह्मन्‌ नैतदन्येषु विद्यते । को5सि कस्यासि जानीमो वयं कि करवामहे

قال الفتيان: «أيها البراهمن الجليل، ننحني لك إجلالًا. إن مثل هذه البراعة في السلاح لا توجد عند غيرك. من أنت، وابنُ مَن أنت؟ نودّ أن نعلم. فقل لنا—أيَّ خدمةٍ نستطيع أن نؤديها لك؟»

Verse 35

द्रोण उदाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्व माम्‌

قال درونا: «صِفوني لِبهِيشما أيضًا—في هيئتي الظاهرة وفي خصالي وصفاتي.»

Verse 36

वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचु: कुमारका:

قال فايشَمبايانا: لما أجابوا «ليكن كذلك»، مضى الفتيان إلى بهيشما وأخبروه بكلمات البرهمن الصادقة وبالبأس العجيب الذي أبداه. فلما سمع بهيشما خبرهم أدرك أن ذلك البرهمن ليس إلا الآتشاريّا درونا.

Verse 37

ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम्‌ | भीष्म: श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत

قال فايشَمبايانا: كانت كلمات البرهمن صادقة، وكان فعله على تلك الشاكلة نفسها من العجب. فلما سمع بهيشما تقرير الأمراء الفتيان عرف ذلك الرجل أنه درونا.

Verse 38

युक्तरूप: स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च | अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्‌

وتفكّر بهيشما قائلاً: «إنه حقًّا المعلم الأليق»، ثم مضى بنفسه فأحضره وأكرمه بما يليق. وهناك سأل بهيشما—وهو أرفع حملة السلاح—درونا بحكمة عن سبب قدومه، فبيّن درونا الأمر كلَّه كما هو.

Verse 39

परिपप्रच्छ निपुणं भीष्म: शस्त्रभृतां वर: | हेतुमागमने तच्च द्रोण: सर्व न्यवेदयत्‌

قال فايشَمبايانا: إن بهيشما، وهو أسبق حملة السلاح، سأل درونا بذكاء نافذ عن علة قدومه. فصرّح درونا له بكل السبب تصريحًا تامًّا.

Verse 40

द्रोण उदाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत । अन्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदजिघृक्षया

قال درونا: «يا بهيشما، يا من لا تحيد عن نذرك! لقد مضيتُ في سالف الأيام إلى حضرة الحكيم العظيم أغنِفيشا، ألتمس أن أتلقى تعليماً في علم الرمي بالقوس ومعرفة دهنورفيدا».

Verse 41

ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुला: समा: । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रत:

قال فايشَمبايانا: عشتُ هناك براهماتشارين منضبطاً، متواضع النفس، ذا خُصلٍ معقودة، وأقمتُ سنين كثيرة. وقد كرّستُ نفسي لخدمة أستاذي، فلبثتُ زمناً طويلاً في أشرمه، ملازماً الحضور والطاعة.

Verse 42

पाज्चालो राजपुत्रश्न यज्ञसेनो महाबल: । इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत्‌ तस्मिन्नेव गुरौ प्रभु:

قال فايشَمبايانا: وفي تلك الأيام كان أمير بانشالا يَجْنَسِينا (دروبادا)، وهو ذو بأسٍ عظيم وسلطان، يقيم أيضاً عند ذلك المعلّم نفسه، يلتمس تعلّم الرمي بالقوس وعلم الأسلحة.

Verse 43

स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्न मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन्‌ सुचिरं प्रभो,वे उस गुरुकुलमें मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल- जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा

قال فايشَمبايانا: «هناك كان رفيقي وصديقي—نافعاً لي وعزيزاً كذلك. يا مولاي، وقد لازمتُه وصحبته، أقمتُ زمناً طويلاً في ذلك الأشرم.»

Verse 44

बाल्यात्‌ प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकर:

منذ الطفولة، يا سليل الكورو، كان درسُنا يمضي معاً جنباً إلى جنب. وهناك كان دروبادا صديقي الحميم على الدوام—يخاطبني بكلامٍ محبّب، ويصنع ما يسرّني.

Verse 45

अब्रवीदिति मां भीष्म वचन प्रीतिवर्धनम्‌ अहं प्रियतमः पुत्र: पितुद्रोण महात्मन:,भीष्मजी! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली यह बात बोले--'द्रोण! मैं अपने महात्मा पिताका अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ

قال فايشَمبايانا: «يا بهيشما، لقد قال لي مرةً كلامًا زاد سروري: ‘يا درونا، إنني أحبُّ أبناء أبي العظيم إلى قلبه.’»

Verse 46

अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाड्चालो यदा तदा । त्वद्धोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे

قال فايشَمبايانا: «متى ما أقام ملك بانشالا لي طقس التتويج (الأبهيشيكا) على العرش، فحينئذٍ تكون مملكتي لتمتّعك، أيها المكرَّم. يا صديقي، أقسم لك بالحقّ نفسه: إن لذّاتي وبهائي وسعادتي جميعًا ستكون تحت أمرك.» ثم بعد أن قال ذلك، عاد إلى بلاده، وهو بارع في علم السلاح وقد نال مني التكريم.

Verse 47

मम भोगाश्च वित्त च त्वदधीनं सुखानि च । एवमुक्‍्त्वाथ वबच्राज कृतास्त्र: पूजितो मया

قال فايشَمبايانا: «إن متاعي وثروتي، وراحتي أيضًا، كلها تحت سلطانك.» ثم بعد أن قال ذلك، كان الأمير قد اكتمل تدريبه على استعمال السلاح، فكرّمته، ثم عاد إلى بلاده.

Verse 48

तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सो<हं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद्‌ यशस्विनीम्‌

قال فايشَمبايانا: «كنتُ أحفظ تلك الكلمات في قلبي على الدوام. ثم، امتثالًا لإيعاز الآباء الأسلاف (Pitṛs)، وبنزوعٍ إلى نيل ابنٍ، تزوّجتُ كِرْبي (Kṛpī) ذات الذكر الرفيع، ابنة شارَدْفَت (Śaradvat).»

Verse 49

नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम्‌ । अन्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्‌

قال فايشَمبايانا: «وبعد حينٍ، وبإلحاحٍ من الآباء الأسلاف (Pitṛs) ورغبةً في نيل ابنٍ، تزوّجتُ كِرْبي (Kṛpī) ابنة شارَدْفَت (Śaradvat): لم يكن شعرها طويلًا، لكنها كانت بالغة الذكاء، ثابتةً على النذور العظام، مواظبةً على شعائر الأَغْنِيهوترا (Agnihotra)، وعلى مجالس القربان (satra)، وعلى رياضات الشَّمَ-دَمَ (śama-dama)؛ أي تهذيب النفس وكبح الحواس.»

Verse 50

अलभद्‌ गौतमी पुत्रमश्चत्थामानमौरसम्‌ । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम्‌

قال فايشَمبايانا: إن غوتَمي (كِرْبي) قد نالت ابنها الشرعي من صلبها، أشفَتّاما—ذا الأفعال الموسومة ببأسٍ مُرهب، وذا الإشراق المساوي لإشراق الشمس. وتُبرز هذه الآية اكتمال النَّسَب على وجهٍ ميمون، وما تُنذر به هذه الولادة من قوةٍ حربيةٍ هائلة ضمن شواغل عالم الكورو الأخلاقية والسلالية.

Verse 51

पुत्रेण तेन प्रीतो5हं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्टवा धनिनस्तत्र पुत्रकान्‌ अश्वत्थामारुदद्‌ बालस्तन्मे संदेहयद्‌ दिश:

قال فايشَمبايانا: «بذلك الابن سُرِرتُ—كما سُرَّ أبي بهارادفاجا بي من قبل. غير أنّه في يومٍ ما، لمّا رأيتُ أبناءَ الأغنياء هناك يشربون لبنَ البقر، أخذ طفلي أشفَتّاما—في عجز الطفولة—يبكي ويتلهّف إلى اللبن. عند ذلك غمرني الاضطراب؛ كأنّ ظلمةً هبطت أمام عينيّ، حتى كدتُ لا أميّز الجهات.»

Verse 52

न सनातको<5वसीदेत वर्तमान: स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं॑ देशं बहुशो भ्रमन्‌

قال فايشَمبايانا: «لا ينبغي أن يُوقَع السّناتَكا (snātaka)، المنشغل بفرائضه وطقوسه المقرّرة، في ضيقٍ وعنت.» وإذ فكّرتُ في ذلك في نفسي، طُفتُ بتلك الناحية مرارًا، راغبًا في قبول عطيةٍ طاهرةٍ موافقةٍ للدَّرما، لا آخذها إلا ممن يملك بقرًا كثيرًا—لئلا إن سألتُ براهمنًا قليلَ الماشية بقرةً، عانى من فقدان اللبن وهو يقيم الأَغْنِيهوترا (agnihotra) وسائر واجباته.

Verse 53

विशुद्धमिच्छन्‌ गाड़ेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम्‌ अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छ॑ पयस्विनीम्‌

قال فايشَمبايانا: «إذ كنتُ أبتغي عطيةً طاهرة، يا غادِيَة، وقبولًا مشروعًا موافقًا للدَّرما، طُفتُ بالبلاد من أقصاها إلى أقصاها، فلم أجد بقرةً تُدرّ لبنًا. فقد حدّثتُ نفسي: إن سألتُ براهمنًا قليلَ البقر بقرةً، لربّما عانى—وهو سَناتَكا منشغل بالأَغْنِيهوترا وسائر الطقوس—من فقدان اللبن. لذلك رغبتُ في أخذ صدقةٍ غير مُدنَّسة، منسجمةٍ مع الدَّرما، من صاحب البقر الكثير وحده؛ فهُمتُ في تلك الديار مرارًا، ومع انتقالي من إقليمٍ إلى إقليم، لم أظفر ببقرةٍ تُدرّ اللبن.»

Verse 54

अथ पिष्टोदकेनैनं लोभयन्ति कुमारका: । पीत्वा पिष्टरसं बाल: क्षीरं॑ पीत॑ मयापि च

قال فايشَمبايانا: ثم إنّ الصبيان أغروه بماءٍ ممزوجٍ بالدقيق. فشرب الطفل ذلك الماء الدقيقي، فانتفخ فرحًا، وأخذ يرقص وهو يعلن: «لقد شربتُ اللبن أنا أيضًا!» وتكشف هذه الصورة كيف تُعرِّي الفاقةُ براءةَ الصغير للسخرية، وكيف يُشوّه الحرمانُ فهمَ الطفل للكرامة والكفاية—فيُثير في قلب الوالد الذي يشهد ذلك لوعةً عميقة.

Verse 55

ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद्‌ विमोहित: । त॑ दृष्टवा नृत्यमानं तु बालै: परिवृतं सुतम्‌

قال فايشَمبايانا: «يا سليل الكورو، لقد أضلَّه سُكرُ الطفولة، فوثبَ وقام يرقص فرحًا. ولمّا رأيتُ ذلك الابن محاطًا بالصبيان يرقص—وقد جعلوه موضعَ فرجةٍ وسخرية—امتلأ قلبي بغمٍّ عميق.»

Verse 56

हास्यतामुपसम्प्राप्तं कश्मलं तत्र मे5भवत्‌ । द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति

قال فايشَمبايانا: «ثم نزل بي كربٌ أليم، إذ رأيتُ ابني موضعَ هزءٍ وسخرية. وكان بعضُ الناس هناك يقولون: ‘العارُ على درونا، ذلك الفقير المعدم—ذاك الذي لا ينال مالًا!’»

Verse 57

पिष्टोदक॑ सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया । नृत्यति सम मुदाविष्ट: क्षीरं पीत॑ मयाप्युत

قال فايشَمبايانا: «مَن كان ابنُه كأنما هو “مولودٌ من ماءٍ ممزوجٍ بالدقيق”—فإذا شرب اللبن عند عطشه—انفجر رقصًا وقد غمرته البهجة. وكذلك أنا أيضًا: لقد “شربتُ اللبن” (لبنَ تلك اللذة) أنا كذلك.»

Verse 58

इति सम्भाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत्‌ । आत्मानं चात्मना गर्हन्‌ मनसेदं व्यचिन्तयम्‌

قال فايشَمبايانا: «فلما سمعتُ تلك الكلمات التي كانوا يتناجون بها اضطربَ عقلي. وأخذتُ ألوم نفسي في باطني، وأتأمل هذا—ممزقًا بين ما سمعتُه وما ينبغي عليّ أن أفعل.»

Verse 59

अपि चाह ं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे । परोपसेवां पापिष्ठां न च कुर्या धनेप्सया

وأنا أيضًا قد عشتُ من قبلُ منبوذًا مُدانًا بين البراهمة. ومن أجل طلب المال، لن أرتكب أشنعَ الآثام: أن أخدم غيري خدمةً مُهينةً في ذلٍّ وتبعية.

Verse 60

“जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि “मैंने भी दूध पी लिया।” इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा--“मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा

ولمّا استقرّ عزمي على ذلك، أخذتُ معي ابني الحبيب بهيشما (Bhīṣma)؛ ثم بدافع المودّة والعلائق القديمة مضيتُ—ومعي زوجتي—إلى ساوماكا (Saumaka، أي الديار/الملك المرتبط بدروبادا Drupada). ويصوّر هذا المقطع أزمةً أخلاقية: فالفقر يجلب ازدراء الناس، غير أنّ المتكلّم يأبى أن يطلب المال بخدمةٍ ذليلة قائمة على التبعية، إذ يعدّها عملاً آثماً؛ ولذلك عاد إلى رابطةٍ قديمة يلتمس منها العون.

Verse 61

अभिफषिक्तं तु श्र॒ुत्वैव कृतार्थो5स्मीति चिन्तयन्‌ । प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम्‌

قال فايشَمبايَنا (Vaiśampāyana): لمّا سمعتُ أنّه قد تُوِّج حقًّا (ومُسِح ملكًا)، حدّثتُ نفسي: «لقد تمّت غايتي.» ثم دنوتُ مسرورًا من صديقي الحبيب، وهو جالس في مقامه الملكي على العرش.

Verse 62

संस्मरन्‌ संगमं चैव वचन चैव तस्य तत्‌ | ततो द्रुपदमागम्य सखिपूर्वमहं प्रभो

وكنتُ أستعيد مرارًا لقاءنا القديم وكلماته التي قالها يومئذ. ثم قصدتُ دروبادا (Drupada)، صديقي السابق؛ فلمّا بلغتُه قلتُ: «يا خير الرجال، اعرفني—فأنا صديقك.» وهكذا، إذ حضرتُ لدى دروبادا، دنوتُ منه دنوَّ الصديق، ألتمس تجديد العهد القديم، وأستند إلى الحقّ الأخلاقي الذي تُنشئه الصداقة.

Verse 63

अब्रुवं पुरुषव्यात्र सखायं विद्धि मामिति । उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि संगत:

قال فايشَمبايَنا: «قلتُ: يا نمرَ الرجال، اعرفني صديقًا لك. ثم لمّا حضرتُ بين يدي دروبادا دنوتُ منه ولقيتُه لقاءَ الصديق.» وتُبرز هذه الآية توتّرًا أخلاقيًا بين صداقةٍ محفوظة في الذاكرة وواقعِ المنزلة وتبدّل الأحوال.

Verse 64

स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत्‌ | अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मनू नातिसमञज्जसा

غير أنّه ابتسم ابتسامةَ ازدراء، وخاطبني كأنّي رجلٌ لا قدر له، وقال: «يا برهمن، إنّ فهمك مشوَّه الصياغة؛ بل ليس فيه اتساقٌ ولا لياقة.» وتكشف هذه العبارة عن الاحتقار، وعن الخلل الأخلاقي في السخرية من المرء بإسقاط تمييزه بدل محاورة كلامه باحترام.

Verse 65

यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा ते5हमिति द्विज । संगतानीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यत:

يا أيها البراهمنُ، لِمَ تجرؤ أن تقول لي بوقاحة: «أيها الملك، أنا صديقك»؟ إن الروابط التي تُعقَد هنا تَبلى بمرور الزمان؛ فكلما شاخ الإنسان على مقتضى الوقت، وهنَتْ صداقته شيئًا فشيئًا.

Verse 66

सौद्दं मे त्वया हयासीत्‌ पूर्व सामर्थ्यबन्धनम्‌ । नाक्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा

قال فايشَمبايَنا: «كان الرباط بيني وبينك فيما مضى صداقةً تقوم على تساوي المقدرة—إذ كانت قوتنا يومئذٍ متقاربة. أما الآن فليس الأمر كذلك. من لم يكن śrotriya لا يكون رفيقًا حقًّا لـ śrotriya، ومن لم يكن فارسَ عربةٍ لا يكون صديقًا لمحاربٍ عظيمٍ من محاربي العربة».

Verse 67

साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यात्रोपपद्यते | न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित्‌

قال فايشَمبايَنا: «إن الصداقة لا تقوم حقًّا إلا على المساواة؛ فإذا وُجد التفاوت لم تستقم لها جذور. وفي هذا العالم لا تُوجد صداقةٌ لأحدٍ لا تشيخ ولا تبلى».

Verse 68

कालो वैनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत । मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सत्यं भवत्वपाकृधि

قال فايشَمبايَنا: «إن الزمان نفسه يُرخِي هذا الرباط، والغضب أيضًا قد يختطفه. فلا تتعلّق إذن، ولا تضع ثقتك، بصداقةٍ قد أخذت تَبلى. اطرح من قلبك فكرة: “كنا نحن الاثنين صديقين”؛ ليكن ذلك هو الحق، ثم أزِحْه عنك».

Verse 69

आसीत्‌ सख्य॑ द्विजश्रेष्ठ त्वया मे5र्थनिबन्धनम्‌ । न हानाढ्य: सखाढ्यस्य नाविद्वान्‌ विदुष: सखा

قال فايشَمبايَنا: «يا أفضلَ ذوي الميلادين، إن الصداقة التي كانت بيني وبينك قديمًا كانت مربوطةً بالمصلحة. فالفقير لا يكون حقًّا صديقًا للغني، ولا الجاهل صديقًا للعالِم».

Verse 70

न शूरस्य सखा क्लीब: सखिपूर्व किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरै: क्वचित्‌

قال فايشَمبايانا: «إن الجبان لا يكون حقًّا صديقًا للبطل—فأيُّ قيمةٍ إذن في التعلّق بصداقةٍ قديمة؟ إن الملوك العظام، إذا ما ارتفعوا إلى السلطان، لا يعقدون في موضعٍ من المواضع صحبةً مع رجالٍ من هذا الصنف، يا أفضلَ البراهمة. إن الرابطة التي تذكرها لم تكن إلا معاشرةً سابقةً قامت على المنفعة؛ فلا يُعوَّل عليها اليوم بوصفها حقًّا أخلاقيًّا. لا بدّ أن تتكافأ الأهلية الاجتماعية والخلقية: فمن لا علم له لا يصحب العالِم، ومن ليس بمحاربِ عربةٍ لا يكون صديقًا لمحاربِ عربة، ومن ليس بملكٍ لا يكون صديقًا لملك. فلماذا تذكّرني بصداقةٍ باليةٍ ممزّقة؟»

Verse 71

सख्यं भवति मन्दात्मन्‌ श्रियाहीनैर्धनच्युतै: । नाश्रोत्रिय: श्रोत्रियस्थ नारथी रथिन: सखा

قال فايشَمبايانا: «يا بليدَ الفؤاد، إن الصداقة لا تثبت حقًّا مع من حُرموا اليسر وسقطوا من الغنى. من ليس śrotriya لا يكون صاحب śrotriya، ومن ليس بمحاربِ عربةٍ لا يكون صديقًا لمحاربِ عربة. يا أفضلَ ذوي الولادتين، لا تُلحّ عليّ بذكريات صداقةٍ قديمةٍ بالية؛ فمثل هذه الروابط لا تدوم مع تفاوت المنزلة.»

Verse 72

नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्‌

قال فايشَمبايانا: «حتى للملك، ما قيمةُ صداقةٍ قديمةٍ مع حاكمٍ أرضيٍّ محض؟ لا أعلم أني عقدتُ معك اتفاقًا من أجل مُلكٍ، يا أفضلَ ذوي الولادتين. لا تتكئ على صداقةٍ بالية: فالفقير لا يكون حقًّا صديقًا للغني، والأحمق لا يكون صديقًا للعالِم، والجبان لا يكون صديقًا للبطل. فكيف للملوك العظام أن تكون لهم صداقةٌ صادقةٌ مع رجلٍ مثلك، بلا بهاءٍ ولا عُدّة؟ من ليس śrotriya لا يكون صديقًا لـ śrotriya؛ ومن ليس rathin لا يكون صديقًا لـ rathin؛ ومن ليس ملكًا لا يكون صديقًا لملك. فلماذا تذكّرني بصداقةٍ هرِمت وتمزّقت؟ لا أذكر أني قطعتُ لك وعدًا بشأن مملكتي.»

Verse 73

एकरात्र तु ते ब्रह्मन्‌ काम॑ दास्यामि भोजनम्‌ | एवमुक्तस्त्वहं तेन सदार: प्रस्थितस्तदा

قال فايشَمبايانا: «يا براهمن، إن شئتَ أطعمتُك طعامَ ليلةٍ واحدة.» فلما قال لي الملك دروبادا ذلك، انطلقتُ من هناك مع زوجتي وابني، قابلاً ضيافته على وفق ما بين المضيف والضيف من واجباتٍ متبادلة.

Verse 74

तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव । द्रुपदेनैवमुक्तो5हं मनन्‍्युनाभिपरिप्लुत:

وقد قطعتُ ذلك النذر—النذر الذي أعزم على إنفاذه عن قريب—فإذا بي الآن غارقٌ في سخطٍ متّقد، لأن دروبادا خاطبني بكلماتٍ من ازدراء. لسعةُ الإهانة تُقلق نفسي، وعزمي الموثوق بالقَسَم يشتدّ صلابةً، مطالبًا بجزاءٍ يوازي ما كان.

Verse 75

अभ्यागच्छ॑ कुरून्‌ भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितै: । ततो<हं भवतः काम॑ संवर्धयितुमागत:

«تعالَ إلى آلِ كورو، يا بِهِيشْما، مصحوبًا بتلاميذَ جديرين يطلبون التعلّم ومتحلّين بالخصال الحميدة. لذلك جئتُ لأُتمَّ وأزيدَ تحقيق رغبتك (مقصدك).»

Verse 76

हूँ वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा

قال فَيْشَمْبايَنَة: لما قال بهارَدْفاجا (دْرونا) ذلك، أجابه بِهِيشْما، مواصِلًا الحوار الذي كان يرسم المسار الأخلاقي والاستراتيجي لبيت كورو.

Verse 77

भीष्म उवाच अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय । भुड्क्ष्य भोगान्‌ भृशं प्रीत: पूज्यमान: कुरुक्षये

قال بِهِيشْما: «أيها البراهمن الفاضل، انزع وتر قوسك وضع القوس جانبًا. أقم هنا وعلِّم على الوجه القويم علمَ السلاح واستعمالَ المقذوفات الرفيعة. مكرَّمًا في بيت كورو، ستنعم—بغِبطة عظيمة—بما تشتهي من اللذّات.»

Verse 78

कुरूणामस्ति यद्‌ वित्तं राज्यं चेद॑ सराष्ट्रकम्‌ । त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव,कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं

قال بِهِيشْما: «مهما يكن ما يملكه آل كورو من ثروة، ومهما يكن ما يحوزونه من مملكةٍ مع أقاليمها وولاياتها—فأنت فوق ذلك كلّه الملكُ الأعلى. وجميعُ الكورو تحت سلطانك.»

Verse 79

यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन्‌ कृतं तदिति चिन्त्यताम्‌ । दिष्ट्या प्राप्तोडसि विप्रर्षे महान्‌ मेडनुग्रह: कृत:

وأما ما طلبته، أيها البراهمن، فليُعَدَّ كأنه قد أُنجِز. وبحُسن الطالع، أيها الرِّشي العظيم، لقد قدمتَ إلينا؛ وإن قدومك لنعمةٌ كبرى علينا. وبمجيئك إلى هنا منحتني إحسانًا عظيمًا.

Verse 129

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र- विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا تنتهي الفصل التاسع والعشرون بعد المئة من قسم «سَمْبهافا» ضمن «آدي بارفا» من الملحمة المقدّسة «المهابهاراتا»، وفيه ذُكر كيف نال درونا (Droṇa) من باراشوراما (Paraśurāma) علم الأسلحة الإلهية. ويؤكد خاتمةُ الفصل الثقلَ الأخلاقي لتعلّم فنون القتال: فالقوة الخارقة تُنقَل عبر رابطة المعلّم والتلميذ، واقتناؤها يحمّل صاحبها مسؤولية ستطبع صراعات الأيام الآتية.

Verse 130

इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्य-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا، في «شري المهابهاراتا»، ضمن «آدي بارفا» وعلى وجه الخصوص «سَمْبهافا بارفا»، يختتم الفصل الثلاثون بعد المئة، الذي يصف لقاء بهيشما (Bhīṣma) ودرونا (Droṇa). ويُثبت الكولوفون تمام هذه الوحدة السردية، ويضع الحادثة في سياق الرواية الكبرى عن البدايات وتكوّن عالم الكورو (Kuru)، الذي سيؤول لاحقًا إلى صراع وامتحان أخلاقي.

Verse 231

ते तं दृष्टवा महात्मानमुपगम्य कुमारका: । भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मुणं पर्यवारयन्‌

فلما رأى الغلمانُ ذلك العظيمَ النفس تقدّموا إليه؛ وقد انكسر حماسهم وبطلت مبادرتهم، فأحاطوا بالبراهمن وقوفًا قريبًا في حلقة، يلتمسون الحماية والهداية في شدّتهم.

Verse 253

ततोअब्रवीत्‌ तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने द्रोणसे कहा

ثم في تلك اللحظة خاطب يودهيشثيرا (Yudhiṣṭhira)، ابن كونتي (Kuntī)، درونا (Droṇa). ويُبرز السردُ اقترابًا رسميًا مفعمًا بالتوقير من معلّم جليل، ممهدًا للنبرة الأخلاقية لما سيأتي من طلبٍ أو تساؤلٍ أو تعليم.

Verse 263

एवमुक्त: प्रत्युवाच प्रहस्य भरतानिदम्‌ | युधिष्ठिर बोले--ब्रह्मन! आप कृपाचार्यकी अनुमति ले सदा यहीं रहकर भिक्षा प्राप्त करें। उनके यों कहनेपर द्रोणने हँसकर उन भरतवंशी राजकुमारोंसे कहा

فلما قال يودهيشثيرا (Yudhiṣṭhira) ذلك، أجاب درونا (Droṇa) مبتسمًا لأولئك الأمراء من سلالة بهاراتا (Bharata). فقد كان يودهيشثيرا قد حثّ البراهمن باحترام أن يستأذن كريبا (Kṛpa) وأن يقيم هناك دائمًا، متعيشًا على الصدقات. وعند قوله هذا ضحك درونا ثم خاطب أمراء بهاراتا—في مشهدٍ يبرز حرصهم على مراعاة الأصول وحسن الضيافة لمعلّمٍ براهمني، بينما تومئ إجابته المبتسمة إلى قصدٍ أعمق وإلى انفتاح باب تعليمهم فنون السلاح.

Verse 283

तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरीको तीसरीसे बींधते हुए अनेक सींकोंका संयोग होनेपर मुझे गुल्ली मिल जायगी

قال درونا: «إذا ضممتُ هذه إلى تلك على وجهٍ صحيح وبترتيبٍ محكم، فإن الكُرَيّة (vīṭā) ستقع في قبضتي».

Verse 753

इदं नागपुर रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । भीष्मजी! मैं गुणवान्‌ शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये

«هذه ناغَپُرَة (هستينابورا) بهيّةٌ؛ فقل لي: ماذا أصنع لك؟ أيها الجليل بهيشما! إنّي أبتغي تحقيق مرادي على أيدي تلاميذ ذوي فضيلة، ولأتمّم رغبتك جئتُ من بلاد پنچالا إلى داخل مملكة الكورو، إلى هذه المدينة الحسناء هستينابورا. فقل: أيُّ عملٍ تحبّ أن أقوم به لك؟»

Verse 3436

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोण: प्रत्युवाच कुमारकान्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा

قال فايشَمبايانا: فلمّا خوطِب درونا على ذلك النحو، أجاب الأمراء الفتيان.

Verse 3536

स एव सुमहातेजा: साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले--तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं

«إنّ ذلك الرجل بعينه، ذو البهاء العظيم، سيُعرَف الآن.» وقال درونا: «اذهبوا جميعًا إلى بهيشما وعرّفوه بي بوصف هيئتي وخصالي؛ ففي هذا الوقت لا يستطيع أن يتعرّف عليّ إلا بهيشما الجليل ذو السطوة.»

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira faces the tension between obedience to the reigning authority and prudent self-protection; he recognizes strategic risk but chooses formal compliance due to limited institutional support.

The chapter illustrates dharma in governance as situational: ethical action may require restraint and procedural correctness even when motives around a directive appear ambiguous or politically charged.

No explicit phalaśruti is stated here; the passage functions as narrative causality, emphasizing how ritual propriety, public messaging, and courtly consent can advance consequential political outcomes.

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