Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
“जिसका बेटा दूधकी लालसासे आटा मिला हुआ जल पीकर आनन्दमग्न हो यह कहता हुआ नाच रहा है कि “मैंने भी दूध पी लिया।” इस प्रकारकी बातें करनेवाले लोगोंकी आवाज मेरे कानोंमें पड़ी तो मेरी बुद्धि स्थिर न रह सकी। मैं स्वयं ही अपने-आपकी निन्दा करता हुआ मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगा--“मुझे दरिद्र जानकर पहलेसे ही ब्राह्मणोंने मेरा साथ छोड़ दिया। मैं धनाभावके कारण निन्दित होकर उपवास भले ही कर लूँगा, परंतु धनके लोभसे दूसरोंकी सेवा, जो अत्यन्त पापपूर्ण कर्म है, कदापि नहीं कर सकता” || ५७ “7५९ || इति मत्वा प्रियं पुत्र भीष्मादाय ततो हाहम् । पूर्वस्नेहानुरागित्वात्ू सदार: सौमकि गत:,भीष्मजी! ऐसा निश्चय करके मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नीको साथ लेकर पहलेके स्नेह और अनुरागके कारण राजा ट्रुपदके यहाँ गया
iti matvā priyaṃ putraṃ bhīṣmam ādāya tato hāham | pūrva-snehānurāgitvāt sa-dāraḥ saumakiṃ gataḥ ||
ولمّا استقرّ عزمي على ذلك، أخذتُ معي ابني الحبيب بهيشما (Bhīṣma)؛ ثم بدافع المودّة والعلائق القديمة مضيتُ—ومعي زوجتي—إلى ساوماكا (Saumaka، أي الديار/الملك المرتبط بدروبادا Drupada). ويصوّر هذا المقطع أزمةً أخلاقية: فالفقر يجلب ازدراء الناس، غير أنّ المتكلّم يأبى أن يطلب المال بخدمةٍ ذليلة قائمة على التبعية، إذ يعدّها عملاً آثماً؛ ولذلك عاد إلى رابطةٍ قديمة يلتمس منها العون.
वैशम्पायन उवाच