Adhyaya 63
Shalya ParvaAdhyaya 63100 Versesयुद्ध समाप्त; पाण्डवों की निर्णायक विजय के बाद युद्धोत्तर शान्ति-स्थापन का चरण

Adhyaya 63

Duryodhana’s Post-Duel Lament and Instructions (भग्नसक्थस्य विलापः)

Upa-parva: Gadāyuddha-anantara Vilāpa (Post–Mace-Duel Lamentation Episode)

Dhṛtarāṣṭra questions Saṃjaya about what Duryodhana said after falling with shattered thighs. Saṃjaya describes the king’s physical condition—dust-covered, controlling his hair, breathing in agitation, striking the ground—then reports Duryodhana’s discourse. Duryodhana laments his reversal despite recalling his former sovereignty, patronage, honors received, and kṣatriya-style achievements, repeatedly framing himself as once “more fortunate” while now brought low. He attributes the outcome to kāla (inevitability) and simultaneously alleges a breach of samaya in the mace duel, characterizing his death as achieved through procedural deviation. He asks that surviving Kaurava allies be informed, specifically naming Aśvatthāman, Kṛtavarman, and Kṛpa, and warns them against trusting opponents portrayed as violators of convention. He anticipates the grief of Dhṛtarāṣṭra and Gāndhārī, the suffering of female kin (including Duḥśalā), and envisions joining fallen comrades. The chapter closes with collective distress and cosmic disturbance motifs, followed by messengers reporting the duel’s circumstances to Droṇa’s son.

Chapter Arc: जनमेजय के प्रश्न से अध्याय खुलता है—जब युद्ध समाप्त हो चुका, दुर्योधन गिर चुका और पृथ्वी पाण्डवों के लिए निष्कण्टक हो गयी, तब भी युधिष्ठिर की चिंता क्यों शान्त नहीं होती और वे श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर क्यों भेजते हैं। → युधिष्ठिर की प्रेरणा से श्रीकृष्ण का उद्देश्य स्पष्ट होता है—धृतराष्ट्र और विशेषतः क्रोधदीप्त, शोककर्शिता गान्धारी को आश्वासन देना, ताकि शाप और प्रतिशोध की अग्नि शेष बचे धर्म को भी भस्म न कर दे। कृष्ण जानते हैं कि यह वही हस्तिनापुर है जहाँ पहले शान्ति-याचना निष्फल हुई थी; अब वे विजय के बाद भी विनय लेकर लौटते हैं। → कृष्ण धृतराष्ट्र से संवाद कर गान्धारी के सम्मुख आते हैं और उनके शोक व क्रोध को शान्त करने हेतु तीक्ष्ण किन्तु करुण वाणी से उन्हें धैर्य, मर्यादा और लोकधर्म की ओर मोड़ते हैं—यह क्षण युद्धोत्तर राजनीति नहीं, युद्धोत्तर आत्मा का निर्णायक संग्राम बन जाता है। → व्यास की उपस्थिति में आश्वासन का कार्य पूर्ण होता है; धृतराष्ट्र-गान्धारी का उग्र वेग शमन की ओर झुकता है। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण दारुक के साथ शीघ्र प्रस्थान कर पाण्डव-शिबिर की ओर लौटते हैं—कृतकृत्य होकर, परन्तु भविष्य की छाया को जानते हुए। → गान्धारी का क्रोध पूरी तरह बुझा नहीं—शान्ति के भीतर भी शाप की सम्भावना शेष है; कृष्ण का लौटना एक अस्थायी विराम है, अन्त नहीं।

Shlokas

Verse 1

त्रेषष्टितमो<् ध्याय: युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुनः पाण्डवोंके पास लौट आना जनमेजय उवाच किमर्थ द्विजशार्दूल धर्मराजो युधिष्ठिर: । गान्धार्या: प्रेषयामास वासुदेव॑ परंतपम्‌,जनमेजयने पूछा-<द्विजश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिरने शत्रुसंतापी भगवान्‌ श्रीकृष्णको गान्धारी देवीके पास किसलिये भेजा?

阇那弥阇耶问道:“噢,二次生者中的猛虎!法王坚战(Yudhiṣṭhira)为何差遣婆苏提婆——焚灼敌人的勇者——前往王后甘陀利(Gāndhārī)那里?”

Verse 2

यदा पूर्व गत: कृष्ण: शमार्थ कौरवान्‌ प्रति । न चतं लब्धवान्‌ कामं॑ ततो युद्धमभूदिदम्‌,जब पूर्वकालमें श्रीकृष्ण संधि करानेके लिये कौरवोंके पास गये थे, उस समय तो उन्हें उनका अभीष्ट मनोरथ प्राप्त ही नहीं हुआ, जिससे यह युद्ध उपस्थित हुआ

阇那弥阇耶说道:“先前克里希纳为求和而赴拘卢诸王处,却未得所愿;因此这场战争才会发生。”

Verse 3

निहतेषु तु योधेषु हते दुर्योधने तदा । पृथिव्यां पाण्डवेयस्य नि:सपत्ने कृते युधि,ब्रह्मन! जब युद्धमें सारे योद्धा मारे गये, दुर्योधनका भी अन्त हो गया, भूमण्डलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके शत्रुओंका सर्वथा अभाव हो गया, कौरवदलके लोग शिविरको सूना करके भाग गये और पाण्डवोंको उत्तम यशकी प्राप्ति हो गयी, तब कौन-सा ऐसा कारण आ गया, जिससे श्रीकृष्ण पुन: हस्तिनापुरमें गये?

阇那弥阇耶说道:“婆罗门啊!当诸战士尽皆被杀,难敌(Duryodhana)亦已陨落;当在那场战争中,大地对般度之子(坚战,Yudhiṣṭhira)已无任何对手——那么,究竟发生了什么缘故,使圣克里希纳又一次前往象城(Hastināpura)?”

Verse 4

विद्रुते शिबिरे शून्ये प्राप्त यशसि चोत्तमे । कि नु तत्‌ कारणं ब्रह्मन्‌ येन कृष्णो गत: पुन:,ब्रह्मन! जब युद्धमें सारे योद्धा मारे गये, दुर्योधनका भी अन्त हो गया, भूमण्डलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके शत्रुओंका सर्वथा अभाव हो गया, कौरवदलके लोग शिविरको सूना करके भाग गये और पाण्डवोंको उत्तम यशकी प्राप्ति हो गयी, तब कौन-सा ऐसा कारण आ गया, जिससे श्रीकृष्ण पुन: हस्तिनापुरमें गये?

阇那弥阇耶说道:“婆罗门啊!当拘卢军营被弃置而空寂;当般度五子获得至高声名;当坚战(Yudhiṣṭhira)的仇敌从大地上被彻底扫除——那么,究竟是什么原因,使克里希纳又一次前往象城(Hastināpura)?”

Verse 5

न चैतत्‌ कारणं ब्रद्यन्नल्पं विप्रतिभाति मे । यत्रागमदमेयात्मा स्वयमेव जनार्दन:,विप्रवर! मुझे इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं जान पड़ता, जिससे अप्रमेयस्वरूप साक्षात्‌ भगवान्‌ जनार्दनको ही जाना पड़ा

阇那美阇耶说道:“婆罗门啊,在我看来,这绝非微不足道或寻常之因——竟能使本性不可测度的阇那尔达那亲自降临。”

Verse 6

तत्त्वतो वै समाचक्ष्व सर्वमध्वर्युसत्तम । यच्चात्र कारणं ब्रद्मन्‌ कार्यस्यास्य विनिश्चये,यजुर्वेदीय दिद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! इस कार्यका निश्चय करनेमें जो भी कारण हो, वह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये

阇那美阇耶说道:“最上等的祭官啊,请如实无隐地把一切都告诉我。婆罗门啊,也请说明在此事定夺之中,究竟有哪些缘由在起作用。”

Verse 7

वैशम्पायन उवाच त्वद्युक्तोडयमनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव । तत्ते5हं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद्‌ भरतर्षभ

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,你这追问甚为相宜,因为你正向我询问此事。故而我将如法如实、详尽无遗地为你说明,婆罗多族中的雄牛啊。”

Verse 8

वैशम्पायनजीने कहा--भरतकुलभूषण नरेश! तुमने जो प्रश्न किया है, वह सर्वथा उचित है। तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुझे यथार्थरूपसे बताऊँगा ।। हतं दुर्योधन दृष्टवा भीमसेनेन संयुगे । व्युत्क्रम्य समयं राजन धार्तराष्ट्र महाबलम्‌,राजन्‌! भरतवंशी महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र महाबली दुर्योधनको भीमसेनने युद्धमें उसके नियमका उल्लंघन करके मारा है। वह गदायुद्धके द्वारा मारा गया है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके युधिष्ठिरके मनमें बड़ा भारी भय समा गया

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,见到持国之子、力大无比的难敌,被毗摩军在战场上击杀,而且还是违越了先前约定的交战规矩,尤提士提罗心中顿时生起了巨大的恐惧。”

Verse 9

अन्यायेन हतं दृष्टवा गदायुद्धेन भारत । युधिष्ठिरे महाराज महद्‌ भयमथाविशत्‌,राजन्‌! भरतवंशी महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र महाबली दुर्योधनको भीमसेनने युद्धमें उसके नियमका उल्लंघन करके मारा है। वह गदायुद्धके द्वारा मारा गया है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके युधिष्ठिरके मनमें बड़ा भारी भय समा गया

毗湿摩波耶那说道:“婆罗多的后裔啊,见到(难敌)在棍棒之战中以不义之举被杀,尤提士提罗王心中便涌入巨大的恐惧。那因违背既定战斗规矩而蒙垢的胜利,立刻化作一场法(dharma)的危机:尤提士提罗预见到责难、罪业,以及当法在战争中亦被践踏时随之而来的凶险后果。”

Verse 10

चिन्तयानो महाभागां गान्धारी तपसान्विताम्‌ । घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत्‌

他沉思那位具大福德、以苦行为资的甘达丽,心想:凭借如此可怖的苦行之力,她甚至能焚尽三界。

Verse 11

वे घोर तपस्यासे युक्त महाभागा तपस्विनी गान्धारी देवीका चिन्तन करने लगे। उन्होंने सोचा “गान्धारी देवी कुपित होनेपर तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकती हैं' ।। तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धि: समभवत्‌ तदा | गान्धार्या: क्रोधदीप्ताया: पूर्व प्रशमनं भवेत्‌

他思量那位具大福德、以可怖苦行为伴的苦行女神甘达丽,心中念道:“若甘达丽女神震怒,足以焚尽三界,化为灰烬。”正当他如此思索之时,便生出一念:当先设法平息甘达丽那炽燃的怒火。

Verse 12

इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा युधिष्ठिरके हृदयमें उस समय यह विचार हुआ कि पहले क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त कर देना चाहिये ।। सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभिरीदृशम्‌ । मानसेनाग्निना क्ुद्धा भस्मसान्न: करिष्यति,वे हमलोगोंके द्वारा इस तरह पुत्रका वध किया गया सुनकर कुपित हो अपने संकल्पजनित अग्निसे हमें भस्म कर डालेंगी

毗舍波耶那说:当于提施提罗王如此思量之时,心中当下生起一念:应先安抚那因愤怒而燃烧的甘达丽王后。因为她一旦听闻我们竟使她诸子遭此屠戮,必将震怒,以决意在心中燃起烈火,或将我们化为灰烬。

Verse 13

कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी सा सहिष्यति । श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्ययोधिनम्‌,उनका पुत्र सरलतासे युद्ध कर रहा था; परंतु छलसे मारा गया। यह सुनकर गान्धारी देवी इस तीव्र दुःखको कैसे सह सकेंगी?

毗舍波耶那说:“甘达丽如何能承受这般剧痛——当她听闻自己的儿子素以坦直而战、毫无欺诈,却竟被诡计所杀?”

Verse 14

एवं विचिन्त्य बहुधा भयशोकसमन्वित: । वासुदेवमिदं वाक्य धर्मराजो5भ्यभाषत,इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके धर्मराज युधिष्ठिर भय और शोकमें डूब गये और वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे बोले--

他多方思量,心为恐惧与哀伤所压,护持法的于提施提罗王便对婆苏提婆(圣克里希那)说出了这番话。

Verse 15

तव प्रसादाद्‌ गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम्‌ | अप्राप्यं मनसापीदं प्राप्तमस्माभिरच्युत,“गोविन्द! अच्युत! जिसे मनके द्वारा भी प्राप्त करना असम्भव था, वही यह अकण्टक राज्य हमें आपकी कृपासे प्राप्त हो गया

毗舍摩波耶那说道:“凭借你的恩德,哦 Govinda,我们得到了一个无荆棘之国——安稳而无人敢抗。哦 Acyuta,连心念都难以企及之事,如今竟为我们所得。”

Verse 16

प्रत्यक्ष मे महाबाहो संग्रामे लोमहर्षणे । विमर्द: सुमहान्‌ प्राप्तस्त्वया यादवनन्दन,“यादवनन्दन! महाबाहो! इस रोमांचकारी संग्राममें जो महान्‌ विनाश प्राप्त हुआ था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा था

毗舍摩波耶那说道:“哦大臂者,哦雅度族之欢,在这令人毛骨悚然的战场上,那极其惨烈的屠戮与碾压般的混战,你亲眼目睹了。”

Verse 17

त्वया देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम्‌ यथा साहां पुरा दत्त हताश्न विबुधद्विष:,'पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जैसे आपने देवद्रोही दैत्योंक वधके लिये देवताओंकी सहायता की थी, जिससे वे सारे देवशत्रु मारे गये, महाबाहु अच्युत! उसी प्रकार इस युद्धमें आपने हमें सहायता प्रदान की है। वृष्णिनन्दन! आपने सारथिका कार्य करके हमलोगोंको बचा लिया

毗舍摩波耶那说道:“正如往昔在天神与阿修罗之战中,你为诛灭憎恨不死者的诸魔而助天神一臂之力,使一切天敌尽皆被杀;同样地,哦大臂的 Acyuta,在此战中你也赐予我们援助。哦弗利什尼后裔,你承担御者之职,便护全了我们。”

Verse 18

साहां तथा महाबाहो दत्तमस्माकमच्युत । सारथ्येन च वार्ष्णेय भवता हि धृता वयम्‌,'पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जैसे आपने देवद्रोही दैत्योंक वधके लिये देवताओंकी सहायता की थी, जिससे वे सारे देवशत्रु मारे गये, महाबाहु अच्युत! उसी प्रकार इस युद्धमें आपने हमें सहायता प्रदान की है। वृष्णिनन्दन! आपने सारथिका कार्य करके हमलोगोंको बचा लिया

毗舍摩波耶那说道:“同样地,哦大臂的 Acyuta,你被赐与我们。哦 Vārṣṇeya,你以御者之职事奉,确实扶持并护卫了我们。往昔在天神与阿修罗之战中,你助天神诛杀敌对诸天的代底耶,使一切天敌尽皆覆灭;此战亦复如是,你同样赐予我们援助。哦弗利什尼后裔,你承担御者之责,救全了我们。”

Verse 19

यदि न त्वं भवे्नाथ: फाल्गुनस्य महारणे । कथं शक्‍्यो रणे जेतुं भवेदेष बलार्णव:,“यदि आप इस महासमरमें अर्जुनके स्वामी और सहायक न होते तो युद्धमें इस कौरव- सेनारूपी समुद्रपर विजय पाना कैसे सम्भव हो सकता था?

毗舍摩波耶那说道:“若你在那场大战中不作法尔古那(阿周那)的主宰与护持者,又怎可能在战场上战胜这‘力量之海’——俱卢军阵——呢?”

Verse 20

गदाप्रहारा विपुला: परिघैश्वापि ताडनम्‌ | शक्तिभिभिंन्दिपालैश्लव तोमरै: सपरश्वथै:,'श्रीकृष्णण आपने हमलोगोंके लिये गदाओंके बहुत-से आघात सहे, परिघोंकी मार खायी; शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर और फरसोंकी चोटें सहन कीं तथा बहुत-सी कठोर बातें सुनीं। आपके ऊपर रणभूमिमें ऐसे-ऐसे शस्त्रोंके प्रहार हुए, जिनका स्पर्श वज्रके तुल्य था

毗舍波耶那说:“为了我们,你忍受了无数沉重的钉锤(伽陀)击打,也被铁棒(parigha)所击。你承受了长枪śakti、bhindipāla、tomara以及战斧的冲击;又忍受了许多尖刻的话语。在战场上,落在你身上的兵刃之击,其触及如金刚雷霆(vajra)一般。”

Verse 21

अस्मत्कृते त्वया कृष्ण वाच: सुपरुषा: श्रुता: । शस्त्राणां च निपाता वै वज्रस्पर्शोपमा रणे,'श्रीकृष्णण आपने हमलोगोंके लिये गदाओंके बहुत-से आघात सहे, परिघोंकी मार खायी; शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर और फरसोंकी चोटें सहन कीं तथा बहुत-सी कठोर बातें सुनीं। आपके ऊपर रणभूमिमें ऐसे-ऐसे शस्त्रोंके प्रहार हुए, जिनका स्पर्श वज्रके तुल्य था

毗舍波耶那说:“为了我们,噢奎师那,你忍受了许多刺痛人心的 harsh 言辞;在战场上,你也承受了兵刃的击打——其触及如金刚雷霆(vajra)一般。你就这样为护持己方之道义,甘受言语与肉身两重苦楚。”

Verse 22

ते च ते सफला जाता हते दुर्योधने5च्युत । तत्‌ सर्व न यथा नश्येत्‌ पुनः कृष्ण तथा कुरु

“阿周陀啊,你的一切作为确已结果;如今杜罗约陀那既被诛灭。故而,奎师那啊,当行其事,使这一切不再复失。”

Verse 23

“अच्युत! दुर्योधनके मारे जानेपर वे सारे आघात सफल हो गये। श्रीकृष्ण! अब ऐसा कीजिये, जिससे वह सारा किया-कराया कार्य फिर नष्ट न हो जाय ।। संदेहदोलां प्राप्तं नश्लेत: कृष्ण जये सति । गान्धार्या हि महाबाहो क्रोधं बुद्धयसझ्व माधव,श्रीकृष्ण! आज विजय हो जानेपर भी हमारा मन संदेहके झूलापर झूल रहा है। महाबाहु माधव! आप गान्धारी देवीके क्रोधपर तो ध्यान दीजिये

毗舍波耶那说:“阿周陀啊,杜罗约陀那既已被杀,那一切打击与辛劳便都结了果。噢圣奎师那,当设法使已成之功不再毁于一旦。纵然胜利在手,我们的心仍在疑惧的摆锤上摇荡。噢大臂的摩陀婆啊,当留意王后甘陀利的怒火。”

Verse 24

सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता । पुत्रपौत्रवध श्रुत्वा ध्रुवं न: सम्प्रधक्ष्यति,“महाभागा गान्धारी प्रतिदिन उग्र तपस्यासे अपने शरीरको दुर्बल करती जा रही हैं। वे पुत्रों और पौत्रोंका वध हुआ सुनकर निश्चय ही हमें जला डालेंगी

毗舍波耶那说:“那位高贵的妇人(甘陀利)日复一日为严酷苦行所消瘦;一旦听闻其子与孙被屠戮,她必定对我们怒焰腾起。”

Verse 25

तस्या: प्रसादनं वीर प्राप्तकालं मतं मम । कश्च तां कोधताम्राक्षीं पुत्रव्यसनकर्शिताम्‌

毗舍波耶那说道:“勇士啊,依我之见,此刻正是去求她息怒、赢得她欢心的时机。因为又有谁能安抚那位女子——双目因愤怒而赤红,被丧子之祸折磨得憔悴不堪?”

Verse 26

तत्र मे गमन॑ प्राप्त रोचते तव माधव

“到那里去吧,摩陀婆啊,我此刻前往,正合时宜,也与汝之意图相契。”

Verse 27

गान्धार्या: क्रोधदीप्ताया: प्रशमार्थमरिंदम । “शत्रुओंका दमन करनेवाले माधव! इस समय क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका वहाँ जाना ही मुझे उचित जान पड़ता है ।। त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाप्यय:,“महाबाहो! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और संहारक हैं। आप ही सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। आप युक्ति और कारणोंसे संयुक्त समयोचित वचनोंद्वारा गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर देंगे

毗舍波耶那说道:“灭敌者啊!为使因愤怒而炽燃的甘陀梨王后得以平息,我以为你此刻前往那里最为合宜。摩陀婆、驯伏仇敌者啊!你确是诸世界的造作者与毁灭者——是一切众生之所从生、亦所归灭。大臂者啊,你是万有兴起之基,也是万有归入之地。以合乎时宜之言,贯通正理与因由,你必能迅速安抚甘陀梨王后。”

Verse 28

हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यै: कालसमीरितै: । क्षिप्रमेव महाबाहो गान्धारीं शमयिष्यसि,“महाबाहो! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और संहारक हैं। आप ही सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। आप युक्ति और कारणोंसे संयुक्त समयोचित वचनोंद्वारा गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर देंगे

毗舍波耶那说道:“大臂者啊,以贯通因由与正理之言,且在适当之时说出,你必能迅速抚慰甘陀梨。”

Verse 29

पितामहश्न भगवान्‌ कृष्णस्तत्र भविष्यति | सर्वथा ते महाबाहो गान्धार्या: क्रोधनाशनम्‌

毗舍波耶那说道:“在那里,受人敬仰的主克里希那也将同在,并与那位祖父(毗湿摩)一同。大臂者啊,无论如何,他都将使甘陀梨的怒火得以平息。”

Verse 30

धर्मराजस्य वचन श्र॒ुत्वा यदुकुलोद्वह:

毗舍波耶那说道:听闻法王(坚战,Yudhiṣṭhira)之言后,夜度族中最杰出的后裔随即作答——这昭示着一个转折:在战争与职责的重压之下,仍有人愿意领受以正法为本的劝诫。

Verse 31

केशवस्य वच: श्र॒ुत्वा त्वमाणो5थ दारुक:

毗舍波耶那说道:听闻凯沙瓦(Keśava,克里希那)之言后,达鲁迦立刻疾行——以严整而急切的行动奉行命令,正如一位恪尽职责的御者在战事重压下所当为。

Verse 32

त॑ रथं यादवश्रेष्ठ;: समारुहु परंतप:

毗舍波耶那说道:于是,夜陀婆中最卓越者登上那辆战车,而那位“焚敌者”也整备欲进——在战争的道义重压之下,这是一幅决然行动的图景:职责凭借严整的备战而推进,而非踌躇不前。

Verse 33

तत:ः प्रायान्महाराज माधवो भगवान्‌ रथी

于是,大王啊,摩陀婆(Mādhava)——受人敬奉的主宰、亦是驾车高手——启程出发,在战争与职责的重压之下,以有的放矢的决意推动事势向前。

Verse 34

प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादयन्‌,नगरमें प्रविष्ट होकर वीर श्रीकृष्ण अपने रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। धृतराष्ट्रको उनके आगमनकी सूचना दी गयी और वे अपने उत्तम रथसे उतरकर मनमें दीनता न लाते हुए धृतराष्ट्रके महलमें गये

毗舍波耶那说道:进入城中,英勇的奎师那以战车深沉的轰鸣使四方回响。人们将他到来的消息禀告给持国;而奎师那从他那上等战车上下来,心中不容丝毫沮丧,径入持国的宫殿——即便在战争的废墟之间,仍守其尊严与旨意。

Verse 35

विदितो धृतराष्ट्रस्य सो5वतीर्य रथोत्तमात्‌ अभ्यगच्छददीनात्मा धृतराष्ट्रनिवेशनम्‌,नगरमें प्रविष्ट होकर वीर श्रीकृष्ण अपने रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। धृतराष्ट्रको उनके आगमनकी सूचना दी गयी और वे अपने उत्तम रथसे उतरकर मनमें दीनता न लाते हुए धृतराष्ट्रके महलमें गये

当持国王(Dhṛtarāṣṭra)得知他已到来时,圣克里希那(Śrī Kṛṣṇa)便从那卓绝的战车上下来,心志不陷于沮丧,径往持国王的王宫而去。入城之际,英勇的克里希那以战车深沉的轰鸣震响四方——此番到来,即使在战争废墟之中,也昭示着决断与道义的坚定。

Verse 36

पूर्व चाभिगतं तत्र सो5पश्यदृषिसत्तमम्‌ | पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्नापि जनार्दन:

毗舍波耶那说:在那里,他看见了那位至上的仙圣——先前他曾与之相会。于是阇那尔达那(克里希那)依正法之礼,俯身按抚其足,以示恭敬,奉以应有的尊崇。

Verse 37

ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षज:

随后,雅度族中最卓越者——阿陀克沙阇(Adhokṣaja,克里希那),那超越诸根感知之主——走近持国王(Dhṛtarāṣṭra),为战后劝诫与道义清算铺陈开端。

Verse 38

पाणिमालम्ब्य राजेन्द्र सुस्वरं प्रसरोद ह । राजेन्द्र! तदनन्तर यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रका हाथ अपने हाथमें लेकर उन्मुक्त स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे ।। स मुहूर्तादिवोत्सृज्य बाष्पं शोकसमुद्धवम्‌,उन्होंने दो घड़ीतक शोकके आँसू बहाकर शुद्ध जलसे नेत्र धोये और विधिपूर्वक आचमन किया। तत्पश्चात्‌ शत्रुदमन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रसे प्रस्तुत वचन कहा--“भारत! आप वृद्ध पुरुष हैं; अतः कालके द्वारा जो कुछ भी संघटित हुआ और हो रहा है, वह कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है। प्रभो! आपको सब कुछ अच्छी तरह विदित है

毗舍波耶那说:克里希那握住国王的手,放声恸哭,悲声不自禁。过了一会儿,他任由哀恸之泪流尽,便以净水洗目,又依仪轨行阿遮摩那(ācamana)之礼。随后,这位降伏仇敌者克里希那对持国王说道:“噢,婆罗多啊,你已年迈;因此,时间所造成的、以及仍在造成的一切,没有一样是你所不知的。大王,你对此都了然于心。”

Verse 39

प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे ह्ाचम्पय च यथाविधि । उवाच प्रस्तुतं वाक्‍्यं धृतराष्ट्रमरिंदम:,उन्होंने दो घड़ीतक शोकके आँसू बहाकर शुद्ध जलसे नेत्र धोये और विधिपूर्वक आचमन किया। तत्पश्चात्‌ शत्रुदमन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रसे प्रस्तुत वचन कहा--“भारत! आप वृद्ध पुरुष हैं; अतः कालके द्वारा जो कुछ भी संघटित हुआ और हो रहा है, वह कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है। प्रभो! आपको सब कुछ अच्छी तरह विदित है

他以水洗目,又依规定啜水行阿遮摩那(ācamana)之后,那位降伏仇敌者便以切合当下的话语对持国王说道。他提醒这位年迈的国王:时间所造成并仍在造成的一切,没有一样是他所不知的,因为他对此洞然明白。

Verse 40

न ते>स्त्यविदितं किंचिद्‌ वृद्धस्य तव भारत । कालस्य च यथावृत्तं तत्‌ ते सुविदितं प्रभो,उन्होंने दो घड़ीतक शोकके आँसू बहाकर शुद्ध जलसे नेत्र धोये और विधिपूर्वक आचमन किया। तत्पश्चात्‌ शत्रुदमन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रसे प्रस्तुत वचन कहा--“भारत! आप वृद्ध पुरुष हैं; अतः कालके द्वारा जो कुछ भी संघटित हुआ और हो रहा है, वह कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है। प्रभो! आपको सब कुछ अच्छी तरह विदित है

毗舍波耶那说道:“噢,婆罗多啊,你已年迈;于你并无未知之事。凡随时轮之轨而展开的一切,你都了然于心,主上。”

Verse 41

यतितं पाण्डवै: सर्वैस्तव चित्तानुरोधिभि: । कथं कुलक्षयो न स्यात्तथा क्षत्रस्थ भारत,“भारत! समस्त पाण्डव सदासे ही आपकी इच्छाके अनुसार बर्ताव करनेवाले हैं। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया कि किसी तरह हमारे कुलका तथा क्षत्रियसमूहका विनाश न हो

毗舍波耶那说道:“噢,婆罗多啊,诸般度瓦——一向顺从你心意行事——曾竭力奋斗,欲使宗族不至灭绝,刹帝利之序不至倾覆。”

Verse 42

भ्रातृभि: समयं कृत्वा क्षान्तवान्‌ धर्मवत्सल: । द्यूतच्छलजितै: शुद्धैर्वनवासो हुपागतः,“धर्मवत्सल युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ नियत समयकी प्रतीक्षा करते हुए सारा कष्ट चुपचाप सहन किया था। पाण्डव शुद्धभावसे आपके पास आये थे तो भी उन्हें कपट॒पूर्वक जूएमें हराकर वनवास दिया गया

毗舍波耶那说道:“他与诸弟立下约定,守候既定之期;那爱护达摩的(坚战,Yudhiṣṭhira)以忍耐承受艰难。然而这些心地纯净之人,却被赌局诡计所欺而败,于是被判流放林野。”

Verse 43

अज्ञातवासचर्या च नानावेषसमावृतै: । अन्ये च बहव: क्लेशात्‌ त्वशक्तैरिव सर्वदा,उन्होंने नाना प्रकारके वेशोंमें अपनेको छिपाकर अज्ञातवासका कष्ट भोगा। इसके सिवा और भी बहुत-से क्लेश उन्हें असमर्थ पुरुषोंके समान सदा सहन करने पड़े हैं

毗舍波耶那说道:“他们以种种伪装掩其真形,忍受了隐姓埋名之苦。除此之外,他们还被迫承受许多别样的磨难——长久不息,仿佛无权无势之人——为守其所择之道,唯有忍受痛楚。”

Verse 44

मया च स्वयमागम्य युद्धकाल उपस्थिते । सर्वलोकस्य सांनिध्ये ग्रामांस्त्वं पडच याचित:,“जब युद्धका अवसर उपस्थित हुआ, उस समय मैंने स्वयं आकर शान्ति स्थापित करनेके लिये सब लोगोंके सामने आपसे केवल पाँच गाँव माँगे थे

毗舍波耶那说道:“当战事之期已至,我亲自来到众人面前,为求息兵定和,只向你索取区区五村。”

Verse 45

त्वया कालोपसूष्टेन लोभतो नापवर्जिता: । तवापराधान्नूपते सर्व क्षत्रं क्षयं गतम्‌,'परंतु कालसे प्रेरित हो आपने लोभवश वे पाँच गाँव भी नहीं दिये। नरेश्वर! आपके अपराधसे समस्त क्षत्रियोंका विनाश हो गया

毗湿摩波耶那说道:你被“时”(迦罗)本身所驱使,又为贪欲所摇动,连那(五个村庄)也不肯让出。噢,国王,正因你的过失,整个刹帝利武士阶层被推向了毁灭。

Verse 46

भीष्मेण सोमदत्तेन बाह्लीकेन कृपेण च | द्रोणेन च सपुत्रेण विदुरेण च धीमता

毗湿摩波耶那说道:连同毗湿摩、苏摩达多、婆诃利迦、克利波、与其子同在的德罗那,以及睿智的毗度罗——这些卓然的长老被追忆为劝诫与统御之传承。

Verse 47

याचितस्त्वं शमं नित्यं न च तत्‌ कृतवानसि । 'भीष्म, सोमदत्त, बाह्नीक, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और बुद्धिमान्‌ विदुरजीने भी सदा आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपने वह कार्य नहीं किया || ४६६ || कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुहान्ति भारत,'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्‍या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है

毗湿摩波耶那说道:“人们屡屡劝你求和,你却不肯。噢,婆罗多啊,当心识被‘时’之力击中而蒙蔽,众人便陷入迷妄。正因此,先前在备战之初,你的判断也曾迷乱——这除了是‘时’的运作,还能称作什么?终究,唯有命定成为最后的归依。”

Verse 48

यथा मूढो भवान्‌ पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते । किमन्यत्‌ कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम्‌,'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्‍या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है

毗湿摩波耶那说道:“正如你先前在此事上曾迷乱而被煽动——在备战之时——同样,凡心识被‘时’之力所染者,皆坠入迷惘。这除了是‘时’的运作,还能是什么?的确,唯有命定才是最后的归依。”

Verse 49

मा च दोषान्‌ महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय । अल्पो>प्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम्‌

毗湿摩波耶那说道:“噢,大智者,不要把过错归于般度五子。在那些高魂的般度五子身上,连丝毫的逾越也没有。”

Verse 50

एतत्‌ सर्व तु विज्ञाय ह्वात्मदोषकृतं फलम्‌

洞悉这一切之后,他明白这结局确是自作之过的果报——由个人的罪行所招致,并非仅仅出于命运而已。

Verse 51

असूयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान्‌ कर्तुमहति । 'यह सब अपने ही अपराधोंका फल है, ऐसा जानकर आपको पाण्डवोंके प्रति दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।। ५० ई ।। कुलं वंशश्व पिण्डाश्व यच्च पुत्रकृतं फलम्‌

毗舍波耶那说道:“你不应对般度之子心怀嫉妒,亦不当苛求其过。既知此诸事皆是自作恶业之果,便不该以责罪之目光投向般度五子。”

Verse 52

त्वं चैव कुरुशार्टूल गान्धारी च यशस्विनी

毗舍波耶那说道:“你亦如此,噫,俱卢族中的猛虎;还有那声名显赫的甘陀丽亦然……”

Verse 53

मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान्‌ प्रति किल्बिषम्‌ । “कुरुप्रवर! पुरुषसिंह! आप और यशस्वी गान्धारी-देवी कभी पाण्डवोंकी बुराई करनेकी बात न सोचें ।। एतत्‌ सर्वमनुध्याय आत्मनश्न व्यतिक्रमम्‌

毗舍波耶那说道:“莫悲恸,噫,人中之虎;也莫对般度五子起一念加害之心。思量一切已然发生之事——并省察自身之失——当收敛责怨,转而以清醒之心自我反观。”

Verse 54

जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि

毗舍波耶那说道:“噫,臂力无双者,你早已知晓法王对你所怀的敬重与信任。”

Verse 55

एतच्च कदन कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम्‌

既已对那些曾加害于己的仇敌施行此等毁灭之举,毗舍波耶那便继续叙述,以一种语气将其置于战争残酷逻辑中的报复之行:此举出于怨仇与创痛,而非出于慈悲。

Verse 56

त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम्‌

毗舍波耶那曰:“汝亦然,噫,人中之虎;并且那位声名显赫的甘陀梨亦然。”

Verse 57

हिया च परया5<विष्टो भवन्तं नाधिगच्छति

而他为强烈的羞怯与惭愧所压倒,竟不敢近前。此句揭示:道德的自持与自我羞惭,足以使人踟蹰不前,即便在严峻关头本当开口或有所作为。

Verse 58

एवमुक्‍्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तम:,उवाच परम॑ वाक्‍्यं गान्धारीं शोककर्शिताम्‌ | महाराज! यदश्रेष्ट श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शोकसे दुर्बल हुई गान्धारी देवीसे यह उत्तम वचन बोले--

毗舍波耶那曰:“言毕,噫,大王,夜度族中至上者室利·奎师那先对持国王(Dhṛtarāṣṭra)开口,继而又向为哀恸所摧的甘陀梨,宣说一段至为沉重而切当之言。”

Verse 59

।। सौबलेयि निबोध त्वं यत्‌ त्वां वक्ष्यामि तच्छुणु

毗舍波耶那曰:“噫,苏婆罗之子,当明了之——且细听我将告汝之言。”

Verse 60

त्वत्समा नास्ति लोके5स्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे । “सुबलनन्दिनि! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो और समझो। शुभे! इस संसारमें तुम्हारी-जैसी तपोबल-सम्पन्न स्त्री दूसरी कोई नहीं है ।। ५९ ई |। जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम संनिधौ,“रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना

毗舍摩波耶那说道:“吉祥的夫人,尊贵的女子啊,今日此世间无人能与你比肩。王后啊,你必定记得:在王廷大会上,就在我面前,你曾说出立足于法(dharma)与现实利益之言——为两方福祉而发——然而你的儿子们却不肯采纳。”

Verse 61

धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयो: पक्षयोर्हितम्‌ । उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयै: कृतम्‌,“रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना

“吉祥的夫人啊,你曾说出兼具法(dharma)与利的言辞,为两方之利而发;但你的儿子们并未照做。”

Verse 62

दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वच: । शृणु मूढ वचो महां यतो धर्मस्ततो जय:,“तुमने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दुर्योधनको सम्बोधित करके उससे बड़ी रुखाईके साथ कहा था--'ओ मूढ! मेरी बात सुन ले, जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत होती है”

“你曾以严厉之言对渴求胜利的难敌(Duryodhana)说道:‘听着,愚昧之人!听我这沉重的劝诫:法(dharma)所在之处,胜利亦在其处。’”

Verse 63

तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्य नृपात्मजे । एवं विदित्वा कल्याणि मा सम शोके मन: कृथा:,“कल्याणमयी राजकुमारी! तुम्हारी वही बात आज सत्य हुई है, ऐसा समझकर तुम मनमें शोक न करो इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि धृतराष्ट्रगान्धारीसमा श्वासने त्रिषष्टितमो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें धृतराड्र और गान्धारीका श्रीकृष्णको आश्वासन देनाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

“吉祥的公主啊,你当日所言之果,如今已然应验。既知如此,吉祥的夫人,莫让心神沉入哀恸。”

Verse 64

पाण्डवानां विनाशाय मा ते बुद्धि: कदाचन । शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम्‌

毗舍摩波耶那说道:“愿你之心志永不指向毁灭般度族(Pāṇḍava)。福德深厚的夫人啊,你有力量撼动并左右整个大地——一切动者与一切静者皆在其中。”

Verse 65

वासुदेववच: श्रुत्वा गान्धारी वाक्यमत्रवीत्‌,सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन । भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गान्धारीने कहा--“महाबाहु केशव! तुम जैसा कहते हो, वह बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मनमें बड़ी व्यथाएँ थीं और उन व्यथाओंकी आगसे दग्ध होनेके कारण मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी (अतः मैं पाण्डवोंके अनिष्टकी बात सोचने लगी थी); परंतु जनार्दन! इस समय तुम्हारी बात सुनकर मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी है--क्रोधका आवेश उतर गया है

毗湿摩波耶那说:听了婆苏提婆的话,甘陀利答道:“阇那尔达那啊,听闻你的劝诫,我的心已安定。大臂的计舍婆啊,你所言全然正确。先前我被剧烈的悲痛所折磨;那悲苦之火灼烧着我,使我的理智动摇,以致我竟起了加害般度五子的念头。如今听你一言,我的心智复归稳固——怒潮已然平息。”

Verse 66

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि केशव । आधिकभिर्दहमानाया मति: संचलिता मम

“确是如此,大臂者,正如你所言,计舍婆啊。我的心念被过度的悲痛与重压灼烧,因而动摇,陷入纷乱。”

Verse 67

राज्स्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव

毗湿摩波耶那说:“计舍婆啊,请看那位国王——双目失明,年迈衰老,又丧尽诸子。”

Verse 68

एतावदुक्त्वा वचन मुखं प्रच्छाद्य वाससा

说到这里,他便以衣襟掩面。

Verse 69

तत एनां महाबाहु: केशव: शोककर्शिताम्‌

于是,大臂的计舍婆开口对她说道——她已被忧伤折磨得憔悴消瘦。

Verse 70

समाश्चास्य च गान्धारीं धृतराष्ट्र च माधव:

毗舍摩波耶那说道:摩陀婆(奎师那)也走近,向甘陀梨与持国致辞,在战后与他们交谈——此举将王者的哀恸与责任置于达摩与克制的要求之中。

Verse 71

ततस्त्वरित उत्थाय पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च,राजेन्द्र! तदनन्तर वे सहसा उठकर खड़े हो गये और व्यासजीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके कुरुवंशी धृतराष्ट्रसे बोले--“कुरुश्रेष्ठी अब मैं आपसे जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। अब आप अपने मनको शोकमग्न न कीजिये। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके मनमें पापपूर्ण संकल्प उदित हुआ है। इसीलिये मैं सहसा उठ गया हूँ। उसने रातको सोते समय पाण्डवोंके वधका विचार किया है”

于是他急忙起身,以头顶礼于(那位可敬长者的)足下,行了叩拜之礼。继而对国王说道:“大王中之最者,我今请辞而去。愿你莫使心神沉入哀恸。德罗那之子阿湿婆他摩心中生起了罪恶的决意;因此我才立刻起身。夜深人睡之时,他已起意要杀戮般度五子。”

Verse 72

द्वैपायनस्य राजेन्द्र ततः कौरवमब्रवीत्‌ । आपूृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मन: कृथा:,राजेन्द्र! तदनन्तर वे सहसा उठकर खड़े हो गये और व्यासजीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके कुरुवंशी धृतराष्ट्रसे बोले--“कुरुश्रेष्ठी अब मैं आपसे जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। अब आप अपने मनको शोकमग्न न कीजिये। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके मनमें पापपूर्ण संकल्प उदित हुआ है। इसीलिये मैं सहसा उठ गया हूँ। उसने रातको सोते समय पाण्डवोंके वधका विचार किया है”

毗舍摩波耶那说道:于是,大王啊,(三阇耶)在向岛生(毗耶娑)顶礼之后,对俱卢长者持国说道:“俱卢中之最者,我今告辞;愿你莫使心神沉入哀恸。”他骤然离去的道义急迫在于:德罗那之子阿湿婆他摩已生罪恶之念——他意欲在夜里趁般度五子熟睡时将其杀害。

Verse 73

द्रौणे: पापो5स्त्यभिप्रायस्तेनास्मि सहसोत्थित: । पाण्डवानां वधे रात्रौ बुद्धिस्तेन प्रदर्शिता,राजेन्द्र! तदनन्तर वे सहसा उठकर खड़े हो गये और व्यासजीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके कुरुवंशी धृतराष्ट्रसे बोले--“कुरुश्रेष्ठी अब मैं आपसे जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। अब आप अपने मनको शोकमग्न न कीजिये। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके मनमें पापपूर्ण संकल्प उदित हुआ है। इसीलिये मैं सहसा उठ गया हूँ। उसने रातको सोते समय पाण्डवोंके वधका विचार किया है”

毗舍摩波耶那说道:“德罗那之子心中生起了罪恶的意图;因此我才立刻起身。大王中之最者,他在夜里已将决意系于屠戮般度五子。”

Verse 74

एतच्छुत्वा तु वचन गान्धार्या सहितो<ब्रवीत्‌ । धृतराष्ट्रो महाबाहुः केशवं केशिसूदनम्‌,यह सुनकर गान्धारीसहित महाबाहु धृतराष्ट्रने केशिहन्ता केशवसे कहा--“महाबाहु जनार्दन! आप शीघ्र जाइये और पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये। मैं पुनः शीघ्र ही आपसे मिलूँगा'

听到这番话,持国王——那位臂力雄伟的君主——与甘陀梨一道,对凯沙瓦、诛灭凯辛者说道:他催促奎师那立刻启程,护卫般度五子,并表示不久将再与他相见。

Verse 75

शीघ्रं गच्छ महाबाहो पाण्डवान्‌ परिपालय । भूयस्त्वया समेष्यामि क्षिप्रमेव जनार्दन,यह सुनकर गान्धारीसहित महाबाहु धृतराष्ट्रने केशिहन्ता केशवसे कहा--“महाबाहु जनार्दन! आप शीघ्र जाइये और पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये। मैं पुनः शीघ्र ही आपसे मिलूँगा'

毗湿摩波耶那说道:“速去吧,臂力无双者,护佑般度五子。我也将很快再与你相会,阇那尔达那。”

Verse 76

प्रायात्‌ ततस्तु त्वरितो दारुकण सहाच्युत: । वासुदेवे गते राजन धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्‌

随后,达鲁迦急速启程,阿周陀(奎师那)随行。大王啊,婆苏提婆离去之后,他便去见人中之主——持国王。

Verse 77

वासुदेवो5पि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह

毗湿摩波耶那说道:即便是秉持正法的婆苏提婆,在完成了当行之事后,也离去了。

Verse 78

आगम्य शिबिरं रात्रौ सो5भ्यगच्छत पाण्डवान्‌ । तच्च तेभ्य: समाख्याय सहितस्तै: समाहित:,शिबिरमें आकर रातमें वे पाण्डवोंसे मिले और उनसे सारा समाचार कहकर उन्हींके साथ सावधान होकर रहे

夜里抵达营地后,他前去拜见般度五子。将事情始末尽数禀告之后,他便与他们同住其间,心神沉着而戒备不懈。

Verse 253

वीक्षितुं पुरुष: शक्तस्त्वामृते पुरुषोत्तम । “वीर! अब उन्हें प्रसन्न करनेका कार्य ही मुझे समयोचित जान पड़ता है। पुरुषोत्तम! आपके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो पुत्रोंके शोकसे दुर्बल हो क्रोधसे लाल आँखें करके बैठी हुई गान्धारी देवीकी ओर आँख उठाकर देख सके

除你之外,噢至上之人(Puruṣottama),无人能抬眼望向她。“勇士啊!如今我以为,当务之急是设法安抚并取悦他们。至上之人啊!除你之外,还有哪个男子敢抬眼去看那位甘陀梨女神——因丧子之痛而衰弱,怒火灼心、双目赤红地端坐在那里?”

Verse 296

कर्तव्यं सात्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितार्थिना । “हमारे पितामह श्रीकृष्णद्वैपायन भगवान्‌ व्यास भी वहीं होंगे। महाबाहो! सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरछुष। आप पाण्डवोंके हितैषी हैं। आपको सब प्रकारसे गान्धारी देवीके क्रोधको शान्त कर देना चाहिये'

毗湿摩波耶那说道:“噢,萨特瓦塔族中最卓越者,你既以般度五子之福祉为念,便当行当行之事。我们的祖父、圣者黑天·岛生毗耶娑也将在那里。噢,臂力无双者,萨特瓦塔一脉之魁首,人中至上者——既然你是般度五子的善愿者,就应竭尽一切方法,平息甘陀利夫人的怒火。”

Verse 303

आमन्त्र्य दारुक॑ प्राह रथ: सज्जो विधीयताम्‌ । धर्मराजकी यह बात सुनकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने दारुकको बुलाकर कहा--'रथ तैयार करो”

毗湿摩波耶那说道:他召来达鲁迦,说道:“备好战车。”听闻达摩罗阇的决意,圣克里希那——夜度族的荣饰——便唤达鲁迦,命其整备车乘。

Verse 313

न्यवेदयद्‌ रथं सज्जं केशवाय महात्मने । केशवका यह आदेश सुनकर दारुकने बड़ी उतावलीके साथ रथको सुसज्जित किया और उन महात्माको इसकी सूचना दी

毗湿摩波耶那说道:达鲁迦听从凯沙瓦之命,立刻将战车整备周全,随后禀告那位大心的凯沙瓦:车已备妥。

Verse 326

जगाम हास्तिनपुरं त्वरित: केशवो विभु: । शत्रुओंको संताप देनेवाले यादवश्रेष्ठ भगवान्‌ श्रीकृष्ण तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरकी ओर चल दिये

毗湿摩波耶那说道:威能无比的凯沙瓦——圣克里希那,夜度族之最,令敌人受苦者——立刻登上战车,疾驰启程,前往哈斯提那补罗。

Verse 333

नागसाह्दयमासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान्‌ । महाराज! पराक्रमी भगवान्‌ माधव उस रथपर बैठकर हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया

毗湿摩波耶那说道:抵达那伽萨哈达耶之后,这位勇武者便入其境。大王啊,英勇的摩陀婆端坐于那辆战车之上,已至哈斯提那补罗;到达城中,遂入城门而进。

Verse 496

धर्मतो न्‍्यायतश्चवैव स्नेहतश्न॒ परंतप । महाप्राज्ञ! आप पाण्डवोंपर दोषारोपण न कीजियेगा। परंतप! धर्म, न्याय और स्नेहकी दृष्टिसे महात्मा पाण्डवोंका इसमें थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है

毗舍波耶那说道:“噬敌如焰者啊,无论依达摩而断,依公正而断,或依情义之系而断,都不要将罪责加于般度五子。大智之人啊,从正法、平允与忠爱之眼观之,高贵的般度五子在此事上毫无过失,连一丝一毫也没有。”

Verse 516

गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम्‌ अब तो आपका कुल और वंश पाण्डवोंसे ही चलनेवाला है। नाथ! आपको और गान्धारी देवीको पिण्डा-पानी तथा पुत्रसे प्राप्त होनेवाला सारा फल पाण्डवोंसे ही मिलनेवाला है। उन्हींपर यह सब कुछ अवलम्बित है

毗舍波耶那说道:“主上啊,你的立足之地如今已系于般度五子。自今日起,你的家族与血脉唯有借他们方能延续。大王啊,你与甘陀利王后将得的一切功德——由祭奠所献的饭团与净水(品陀与水),以及因有子嗣而来的福报——今后都只能从般度五子处获得。诚然,这一切皆依他们而立。”

Verse 533

शिवेन पाण्डवान्‌ पाहि नमस्ते भरतर्षभ । “भरतश्रेष्ठ) इन सब बातों तथा अपने अपराधोंका चिन्तन करके आप पाण्डवोंके प्रति कल्याण-भावना रखते हुए उनकी रक्षा करें। आपको नमस्कार है

毗舍波耶那说道:“婆罗多族之雄牛啊,愿你以吉祥与仁善护佑般度五子。既已思量此诸事,并省察自身之过,当转心向其福祉,守护他们。谨向你致敬。”

Verse 543

भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्वापि स्वभावत: । “महाबाहो! भरतवंशके सिंह! आप जानते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें आपके प्रति कितनी भक्ति और कितना स्वाभाविक स्नेह है

毗舍波耶那说道:“婆罗多族之虎啊,情爱与敬信亦可出于天性。大臂之勇者、婆罗多族之狮啊,你深知法王由提施提罗对你怀有何等虔敬,何等自然而然、由衷流露的爱戴。”

Verse 556

दहाते स दिवा रात्रौ न च शर्माधिगच्छति । “अपने अपराधी शत्रुओंका ही यह संहार करके वे दिन-रात शोककी आगमें जलते हैं, कभी चैन नहीं पाते हैं

毗舍波耶那说道:他昼夜灼烧,终不得安宁——那些亲手促成自己有罪之敌覆灭的人,反被哀恸之火吞噬,无法抵达心境的平静。

Verse 563

स शोचन्‌ नरशार्दूल: शान्तिं नैवाधिगच्छति । 'पुरुषसिंह! आप और यशस्विनी गान्धारी देवीके लिये निरन्तर शोक करते हुए नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको शान्ति नहीं मिल रही है

毗湿摩波耶那说:纵然悲恸,那位人中之虎仍不能得安宁。人中至善的由提施提罗心神不定——不断哀悼狮子般的持国与声名显赫的甘陀利夫人——显明即便正直之心,也会在慈悲与战后亲族之痛的重压下动摇。

Verse 573

पुत्रशोकाभिसंतप्त॑ बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम्‌ । “आप पुत्रशोकसे सर्वथा संतप्त हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हैं। ऐसी दशामें वे अत्यन्त लज्जित होनेके कारण आपके सामने नहीं आ रहे हैं!

毗湿摩波耶那说:“你被丧子之痛彻底灼烧;你的心智与诸根为悲伤所扰而紊乱。在这般境地,他们因羞惭压倒,便不敢到你面前来。”

Verse 643

चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो बलात्‌ | 'पाण्डवोंके विनाशका विचार तुम्हारे मनमें कभी नहीं आना चाहिये। महाभागे! तुम अपनी तपस्याके बलसे क्रोधभरी दृष्टिद्वारा चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखती हो”

毗湿摩波耶那说:“你以怒火炽燃之目,凭苦行之力,足以焚尽万有,使之成灰。因此,福德深厚的夫人啊,毁灭般度族的念头切不可在你心中生起。凭你修苦行的威力,你那含怒的一瞥,能将大地连同一切动与不动的众生尽化为灰烬。”

Verse 666

सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन । भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गान्धारीने कहा--“महाबाहु केशव! तुम जैसा कहते हो, वह बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मनमें बड़ी व्यथाएँ थीं और उन व्यथाओंकी आगसे दग्ध होनेके कारण मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी (अतः मैं पाण्डवोंके अनिष्टकी बात सोचने लगी थी); परंतु जनार्दन! इस समय तुम्हारी बात सुनकर मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी है--क्रोधका आवेश उतर गया है

听了你的话,阎那罗陀那,我已复归镇定。大臂的计舍婆啊,你所言全然正确。直到如今,诸多悲苦折磨我心;被那痛楚之火灼烧,我的判断曾经动摇——于是竟起了加害般度族的念头。但此刻,阎那罗陀那,听你一言,我的心智已稳,怒潮亦已退去。

Verse 673

त्वं गति: सहितैवीरिे: पाण्डवैदविपदां वर | “मनुष्योंमें श्रेष्ठ केशव! ये राजा अन्धे और बूढ़े हैं तथा इनके सभी पुत्र मारे गये हैं। अब समस्त वीर पाण्डवोंके साथ तुम्हीं इनके आश्रयदाता हो”

毗湿摩波耶那说:“计舍婆啊,人中至上者!你是这些国王的归依与最后的凭藉——并与英勇的般度族同在。这些君王既盲且老,他们的诸子皆已战死。如今,众般度勇士都在你身旁,唯有你当成为他们的护持者与赐庇护之人。”

Verse 686

पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह | इतनी बात कहकर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवी अपने मुखको आँचलसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं

因丧子之痛而心如火灼的甘达丽悲恸欲绝,放声痛哭。话音方落,她以衣襟掩面,泣不成声,哀号不止。

Verse 693

हेतुकारणसंयुक्तर्वाक्यैराश्वासयत्‌ प्रभु: । तब महाबाहु भगवान्‌ केशवने शोकसे दुर्बल हुई गान्धारीको कितने ही कारण बताकर युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आश्वासन दिया--धीरज बँधाया

毗湿摩耶那说道:于是臂力无双的主克沙瓦见甘达丽因悲痛而衰弱,便以合乎理法之言加以慰藉,陈说诸多因缘与缘由,用正当而真实的论辩使其心神安定。

Verse 706

द्रौणिसंकल्पितं भावमवबुद्धयत केशव: । गान्धारी और धुृतराष्ट्रको सान्त्वना दे माधव श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके मनमें जो भीषण संकल्प हुआ था, उसका स्मरण किया

毗湿摩耶那说道:克沙瓦(圣克里希纳)洞察到德罗纳之子阿湿婆他摩心中已成的阴惨决意。觉察此念对法(dharma)之危,摩陀婆在安慰甘达丽与持国之后,仍将阿湿婆他摩那可怖的谋划铭记于心,预料其对法与战后幸存者的后果。

Verse 763

आश्वासयदमेयात्मा व्यासो लोकनमस्कृत: । तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण दारुकके साथ वहाँसे शीघ्र चल दिये। राजन! श्रीकृष्णके चले जानेपर अप्रमेयस्वरूप विश्ववन्दित भगवान्‌ व्यासने राजा धूृतराष्ट्रको सान्त्वना दी

毗湿摩耶那说道:为世人所敬礼、心量不可测的圣者毗耶娑安慰了国王。其后,世尊圣克里希纳与达鲁迦同行,迅速离开此地。待克里希纳离去后,那位为天下所景仰、形相不可量度的毗耶娑又抚慰持国王。

Verse 773

शिबिरं हास्तिनपुराद्‌ दिदृक्षु: पाण्डवान्‌ नृप । नरेश्वर! इधर धर्मात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो हस्तिनापुरसे पाण्डवोंको देखनेके लिये शिबिरमें लौट आये

毗湿摩耶那说道:大王啊,欲见般度五子,具正法之心的瓦苏提婆之子圣克里希纳,在哈斯蒂那补罗办毕当办之事后,复返军营与他们相会。

Verse 3636

अभ्यवादयदव्यग्रो गान्धारीं चापि केशव: । वहाँ उन्होंने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको पहलेसे ही उपस्थित देखा। व्यास तथा राजा धूृतराष्ट्र दोनोंके चरण दबाकर जनार्दन श्रीकृष्णने बिना किसी व्यग्रताके गान्धारी देवीको प्रणाम किया

毗湿摩波耶那说:凯沙瓦(奎师那)神色安定,毫不慌乱,恭敬地向甘陀利王后致礼。其时,他见最上仙人毗耶娑早已在座。随后,阇那尔达那——圣奎师那——以按抚双足之礼敬奉毗耶娑与国王持国(德里达罗湿陀罗),又不露丝毫急躁,向甘陀利女王俯首顶礼。

Frequently Asked Questions

The dilemma centers on whether a decisive victory remains ethically defensible when achieved by deviating from agreed rules of engagement (samaya) in a regulated duel, and how such deviation should be judged against wartime necessity and prior conduct.

The chapter juxtaposes personal agency with kāla: it presents inevitability as a force no one surpasses, while showing how human actors still seek moral accounting through claims of procedural legitimacy, reputation, and remembered duty.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the narrative framing—Saṃjaya’s report functions as ethical documentation, preserving competing evaluations of conduct and the instructive consequences of grief, pride, and contested legitimacy.