Adhyaya 45
Shalya ParvaAdhyaya 45129 Verses

Adhyaya 45

Kārttikeya-Abhiṣecana: Mātṛgaṇa-Nāma Saṃkīrtana and Skanda’s Commission

Upa-parva: Kārttikeya-Abhiṣecana (Skanda’s Consecration and the Mātṛgaṇa Catalogue)

Vaiśaṃpāyana, speaking to Janamejaya, enumerates the renowned Mātṛs who attend Skanda (Kārttikeya), presenting an extensive onomastic catalogue that signals their multiplicity, liminal habitats, and variable forms. The narrative then describes the formal empowerment of Skanda as divine commander: major deities bestow weapons, insignia, garments, and auspicious objects (including Śakra’s śakti-weapon, Śiva’s formidable host, Viṣṇu’s vaijayantī garland, Umā’s garments, Gaṅgā’s divine kamaṇḍalu, Bṛhaspati’s staff, Varuṇa’s pāśa, Brahmā’s black antelope-skin, and other supports). Skanda’s army is depicted with martial soundscape and standards, and the episode transitions to a strategic engagement in which Skanda deploys the śakti-weapon with overwhelming effect, defeating leading adversaries (including Tāraka) and dispersing hostile forces. The account closes by reaffirming Skanda’s consecration at a tīrtha identified as Aujasa, and notes ritual acts performed there (including offerings and gifts), framing the episode as both mythic history and legitimizing charter for command, protection, and sacred geography.

Chapter Arc: युद्ध-धूलि के बीच कथा अचानक देव-लोक की ओर मुड़ती है—सप्त मातृकाएँ (ब्राह्मी से चामुण्डा तक) प्रकट होती हैं और स्कन्द के अभिषेक का मंगल-आयोजन आरम्भ होता है। → हिमवान् द्वारा मणि-रत्नों से शोभित दिव्य आसन दिया जाता है; देवगण विधि-मन्त्रों सहित अभिषेक-सामग्री लेकर एकत्र होते हैं। इन्द्र, विष्णु, सूर्य-चन्द्र, रुद्र-वासु-आदित्य, अश्विनीकुमार, गरुड, अरुण, वासुकि, औषधि-वृक्ष—समस्त लोक-शक्तियाँ इस एक क्षण में केन्द्रित होकर स्कन्द की सार्वभौम स्वीकृति रचती हैं। → देवताओं की आज्ञा से वायु स्कन्द (कृत्तिकाकुमार) को ‘बल’ और ‘अतिबल’ नामक दो महाबली सेवक प्रदान करता है—यह क्षण स्कन्द की सेनानायक-शक्ति को ठोस रूप देता है और उसके पार्षद-समुदाय का गठन निर्णायक रूप से स्थापित करता है। → देव-आज्ञा पाकर देवलोक, अन्तरिक्ष और भूलोक के वायुतुल्य वेगशाली शूर पार्षद स्कन्द के अनुचर बनते हैं; उनके विविध आयुध, विचित्र आभूषण और नाम-परम्परा का विस्तार स्कन्द-सेना की पूर्णता का बोध कराता है। → स्कन्द के अनुचरों और सैनिक-समूह की सूची आगे और भी फैलती जाती है—अगले अध्याय में यह देव-सेना किस प्रयोजन से स्मरण की जा रही है, यह संकेत अधूरा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। अं ऋाज - ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इन्द्राणी, वाराही तथा चामुण्डा--ये सात मातृकाएँ हैं। पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: स्कन्दका अभिषेक और उनके महापार्षदोंके नाम, रूप आदिका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततो5भिषेकसम्भारान्‌ सर्वान्‌ सम्भृत्य शास्त्रतः । बृहस्पति: समिद्धे5ग्नौ जुहावाग्निं यथाविधि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर बृहस्पतिजीने सम्पूर्ण अभिषेकसाम ग्रीका संग्रह करके शास्त्रीय पद्धतिसे प्रज्वयलित की हुई अग्निमें विधिपूर्वक होम किया

毗湿摩波耶那说:随后,婆罗诃斯波提依照经典的戒律,备齐灌顶所需的一切供具,在熊熊燃起的圣火中,如仪如法地行所规定的供献。此景昭示:即便是神祇或英雄的擢升,也须立基于严整的法度与正当的程序,而非一时冲动——权力唯有通过达摩与正确的祭仪秩序方得正名。

Verse 2

ततो हिमवता दत्ते मणिप्रवरशोभिते । दिव्यरत्नाचिते पुण्ये निषण्णं परमासने

随后,他登上喜马伐特所赐的至上宝座——以殊胜宝石辉映,堆叠天界珠玉,被视为吉祥之座——并安坐于那最高的王座之上。叙事在战云惨烈之中仍强调王者尊严与神圣正当性,暗示权柄当从受灌顶、守秩序的根基上施行,而非仅凭武力。

Verse 3

सर्वमड्रलसम्भारैरविधिमन्त्रपुरस्कृतम्‌ । आभिषेचनिकं द्रव्यं गृहीत्वा देवतागणा:

毗湿摩波耶那说:诸神众携来灌顶所需之物——吉祥供具无不齐备,并以前导正当真言——准备依次第如法行此大礼。此景表明:纵在战争逼迫之际,正当性与道德权威仍须凭正确施行的神圣仪轨来确立。

Verse 4

तत्पश्चात्‌ हिमवान्‌के दिये हुए उत्तम मणियोंसे सुशोभित तथा दिव्य रत्नोंसे जटित पवित्र सिंहासनपर कुमार कार्तिकेय विराजमान हुए। उस समय उनके पास सम्पूर्ण मांगलिक उपकरणोंके साथ विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिषेकद्रव्य लेकर समस्त देवता वहाँ पधारे ।। इन्द्राविष्णू महावीर्यों सूर्याचन्द्रमसौ तथा । धाता चैव विधाता च तथा चैवानिलानलौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

其后,童子迦尔蒂凯耶登上清净宝座;此座由喜马伐特所赐,以上妙宝石辉煌,镶嵌天界珠玉。彼时,诸神悉皆来集,携灌顶之物与一切吉祥器具,依正法次第而行,并诵所规定之真言。大勇的因陀罗与毗湿奴,日与月,达塔与毗达塔,风与火——又有诸鲁陀罗、八伐苏、十二阿底提耶及双阿湿毗尼——环立四周,拱卫光耀的主宰迦尔蒂凯耶。此景将王权置于法度之中:唯有以清净、正当仪轨与宇宙诸力的共同认可而建立者,方为正统,暗示权威必须契合达摩,而非徒恃武力。

Verse 5

पूष्णा भगेनार्यम्णा च अंशेन च विवस्वता । रुद्रश्न सहितो धीमान्‌ मित्रेण वरुणेन च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说:主宰威力无边,周遭有普善、薄伽、阿利耶曼、安沙与毗婆斯瓦特(太阳)环侍,又有智者鲁陀罗与密多罗、伐楼那相随;并且诸鲁陀罗、诸伐苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼亦复围绕。此景彰显:宇宙秩序与神圣权威汇聚于一位统帅之侧,在战事铺陈之中,为其正名并赐以吉祥护佑。

Verse 6

विश्वेदेवैर्मरुद्धिश्न साध्यैश्व पितृभि: सह,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Lord (Kārttikeya) stood surrounded by the Viśvedevas, the Maruts, the Sādhyas, and the Pitṛs; and also by the Rudras, the Vasus, the Ādityas, and the two Aśvins. Thus encircled by the foremost divine hosts, he appeared as the focal point of their reverence and power—an image of rightful authority upheld by the collective order of the gods.

Verse 7

गन्धर्वैरप्सरोभि क्ष्‌ यक्षराक्षसपन्नगै: । देवर्षिभिरसंख्यातैस्तथा ब्रह्मर्षिभिस्तथा,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Lord was surrounded by Gandharvas and Apsarases, by Yakṣas, Rākṣasas, and Nāgas; by countless divine seers and likewise by brahmin seers; and also by the Rudras, the Vasus, the Ādityas, and the two Aśvins. The scene presents a cosmic assembly in which all classes of beings—celestial, semi-divine, and powerful spirits—stand in reverent attendance, affirming the supremacy and auspicious authority of the central deity (here understood in the narrative as Kumāra/Kārttikeya).

Verse 8

वैखानसैर्वालखिल्यैवा्वाहारैर्मरीचिपै: । भगुभिश्नाज़िरोभिश्व यतिभिश्न महात्मभि:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Lord (Kārttikeya), mighty in prowess, stood surrounded by ascetics and divine seers—Vaikhānasas, Vālakhilyas, the Vāhāras, the Marīcipas, the Bhṛgus, the Aṅgirases, and other great-souled yatis. Around him also gathered the Rudras, the Vasus, the Ādityas, and the twin Aśvins—an assembly that signals the moral order of the cosmos aligning itself behind divine leadership and disciplined austerity.

Verse 9

सर्पर्विद्याधरै: पुण्यैयोगसिद्धैस्तथा वृत: । विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्यगण, पितृगण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, नाग, असंख्य देवर्षि, ब्रह्मर्षि, वनवासी मुनि, वालखिल्य, वायु पीकर रहनेवाले ऋषि, सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले मुनि, भूगु और अंगिराके वंशमें उत्पन्न महर्षि, महात्मा यतिगण, सर्प, विद्याधर तथा पुण्यात्मा योगसिद्ध मुनि भी कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए || ६--८ $ ।। पितामह:ः पुलस्त्यश्न पुलह॒श्च महातपा:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

Vaiśampāyana said: Encircled by serpents, Vidyādharas, and holy sages perfected in yoga, Kārtikeya stood surrounded. The Viśvedevas, hosts of Maruts, the Sādhyas, the Pitṛs, Gandharvas and Apsarases, Yakṣas and Rākṣasas, Nāgas, countless divine seers and brahma-seers, forest-dwelling munis, the Vālakhilyas, ascetics who live by drinking the wind, and sages who ‘drink’ the sun’s rays; great ṛṣis born in the lineages of Bhṛgu and Aṅgiras; and noble companies of renunciants—all these, along with serpents and Vidyādharas and other yoga-perfected holy men, gathered and stood around Kārtikeya. Then the Grandsire (Brahmā), Pulastya, the great ascetic Pulaha, and the mighty Lord surrounded by Rudras, Vasus, Ādityas, and the two Aśvins; and also Indra and Viṣṇu, the Sun and the Moon, Dhātā and Vidhātā, Vāyu and Agni, Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra, and Varuṇa—these powerful deities too came together and stood encircling the youthful commander Kārtikeya. The scene presents a cosmic consensus: the gods and seers honor disciplined power when it is aligned with protection of the world and rightful order.

Verse 10

अज्िरा: कश्यपोअत्रिश्न मरीचिर्भुगुरेव च । क्रतुर्हर: प्रचेता श्व मनुर्दक्षस्तथैव च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

Vaiśampāyana said: Aṅgiras, Kaśyapa, Atri, Marīci, Bhṛgu, Kratu, Hara, Pracetas, Manu, and Dakṣa—together with Rudras, Vasus, Ādityas, and the two Aśvins—stood surrounding the mighty lord. Along with them came Indra and Viṣṇu; Sūrya and Candra; Dhātṛ and Vidhātṛ; Vāyu and Agni; Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra, and Varuṇa; the eleven Rudras, eight Vasus, twelve Ādityas, and the twin Aśvinīkumāras. Also arriving were Brahmā and the great seers Pulastya and Pulaha, the embodied Vedas, rivers and oceans, lakes and sacred fords, the earth and the quarters, mountains such as Himavat, Vindhya, and Meru, celestial beings like Airāvata and Uccaiḥśravas, Vāsuki, Aruṇa, Garuḍa, trees with medicinal herbs, and the powers of law and time—Dharma, Kāla, Yama, Mṛtyu, and Yama’s attendants. The passage presents a cosmic assembly: all orders of existence converge to witness and honor the divine commander (Kārttikeya/Skanda), underscoring that righteous power is not merely martial but sanctioned by the total moral and cosmic order.

Verse 11

ऋतवश्न ग्रहाश्षैव ज्योतींषि च विशाम्पते । मूर्तिमत्यश्न सरितो वेदाश्वैव सनातना:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,众民之主!诸季节与诸行星,以及天界诸光曜;具形之诸河与永恒而有生机的吠陀——这一切都前来会集。大能的主斯甘陀(迦尔蒂凯耶)立于其中,四面为鲁陀罗、婆苏、阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕。此段描绘一场宇宙性的集会:时间、自然、神圣启示乃至诸神本身皆来礼敬并侍从这位天军统帅,昭示正义之力并非仅是武力,而是由宇宙秩序(ṛta/达摩)与吠陀圣权所支撑。”

Verse 12

समुद्राश्च हृदाश्नैव तीर्थानि विविधानि च । पृथिवी द्यौर्दिशश्वैव पादपाश्च॒ जनाधिप,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,人中之主!诸海与诸湖,种种圣渡(tīrtha),大地与苍穹,诸方与林木——无不在场。那位大能之主亦立于其间,为鲁陀罗、婆苏、阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕。”

Verse 13

अदितिर्देवमाता च ह्वी: श्री: स्वाहा सरस्वती । उमा शची सिनीवाली तथा चानुमति: कुहूः,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说道:那位大能之主——为鲁陀罗、婆苏、阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕——其周围又有诸神母与女神同立:天神之母阿底提,赫利(谦抑/羞怯),室利(光辉与吉祥),娑婆诃(祭祀呼声),萨拉斯瓦蒂(智慧与言语),乌玛,舍契,西尼瓦利,阿努摩蒂与库呼。此景呈现一场宇宙集会:维系祭祀、秩序与繁荣的诸种神力齐来致敬,昭示真正的主权与胜利并非仅凭强力,而在于与达摩及神圣秩序相契。

Verse 14

राका च धिषणा चैव पत्न्यश्चान्या दिवौकसाम्‌ | हिमवांश्वैव विन्ध्यश्न मेरुश्नानेकशुड्रवान्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说道:罗迦与底沙那,以及诸天许多其他配偶,也都来到那里;喜马梵、温陀耶山脉,以及多峰辉饰的须弥山亦然。于是,神圣的存在与宇宙的实体——诸神、其神力,乃至群山——一同庄严会集,昭示世界的秩序本身也在此重大时刻汇聚。

Verse 15

ऐरावत: सानुचर: कला: काष्ठास्तथैव च । मासार्धमासा ऋतवस्तथा रात्रयहनी नूप,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,大王!爱罗婆多携其随从来到那里;而时间的神圣度量——迦罗与迦湿吒——以及诸月、半月、诸季节、昼与夜,也一并到来。于是连时间的秩序与宇宙的调节都被描写为前来侍立,强调此事具有普遍而维系世界的意义,并非仅关乎个人或一隅之地。”

Verse 16

उच्चै:श्रवा हयश्रेष्ठो नागराजश्न वासुकि: । अरुणो गरुडश्जैव वृक्षाश्नौषधिभि: सह,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说:彼处群集者,有马中最胜的乌柴赫施罗婆(Uccaiḥśravā),有龙王婆苏吉(Vāsuki),有阿鲁那(Aruṇa),有迦楼罗(Garuḍa),并有诸树与一切药草同来。那位威力无边的主宰——为诸鲁陀罗(Rudras)、诸婆苏(Vasus)、诸阿底提耶(Ādityas)与双阿湿毗尼(Aśvins)所环绕——又被这些神圣威权层层围拢。此景如同宇宙大会:自天神至自然之灵,万类齐赴以致敬侍从至上统帅,昭示合乎达摩的正当权柄与神意,能使整个世界归于同一秩序。

Verse 17

धर्मश्न भगवान्‌ देव: समाजम्मुर्हि सड़ता: । कालो यमश्न मृत्युश्न॒ यमस्यानुचराश्न ये,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान्‌ सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, झ्ुलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ही, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्‌, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अअश्रोंमें श्रेष्ठ उच्चै:श्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान्‌ धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर--ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे

毗湿摩波耶那说:彼处,尊严的法神达摩(Dharma)亦入会。迦罗(Kāla,时间)、阎摩(Yama)、摩利底优(Mṛtyu,死亡)以及阎摩的随从也都到来。主宰仍为诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕——这表明将要展开的一切,正被维系秩序、报应与死亡必然性的宇宙权能所见证并认可。

Verse 18

बहुलत्वाच्च नोक्ता ये विविधा देवतागणा: । ते कुमाराभिषेकार्थ समाजग्मुस्ततस्तत:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए संख्यामें अधिक होनेके कारण जिनके नाम यहाँ नहीं बताये गये हैं, वे सभी नाना प्रकारके देवता कुमार कार्तिकेयका अभिषेक करनेके लिये इधर-उधरसे वहाँ आ पहुँचे थे

毗湿摩波耶那说:由于数量繁多,此处不尽列举诸天神众之名。然而他们全都从四方汇集,为鸠摩罗(迦尔蒂凯耶,Kārttikeya)举行灌顶加冕(abhiṣeka)。主宰立于诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼的环绕之中,天界群神以恭敬而有序的队列聚集,来尊奉并安立他。

Verse 19

जगहुस्ते तदा राजन्‌ सर्व एव दिवौकस: । आभिषेचनिकं भाण्डं मड़लानि च सर्वश:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए राजन्‌! उस समय उन सभी देवताओंने अभिषेकके पात्र और सब प्रकारके मांगलिक द्रव्य हाथोंमें ले रखे थे

毗湿摩波耶那说:大王啊,当时天界诸神齐声欢呼称颂。他们手持灌顶之器与种种吉祥之物。主宰为诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕,威严屹立于众神围拢之中——此乃神圣秩序之象:正当权柄由公开而庄严的仪式所确认,而非仅凭武力夺取。

Verse 20

दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशै: काउचनैर्न॑प । सरस्वतीभि: पुण्याभिर्दिव्यतोयाभिरेव तु,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर-भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे

毗湿摩波耶那说:大王啊,诸神以备具天界供仪的金瓶,盛满清净的天水;七位圣洁的萨拉斯瓦蒂河神(Sarasvatīs)便以此行灌顶之礼。鸠摩罗迦尔蒂凯耶(Kumāra Kārttikeya)——威猛无俦、令阿修罗胆寒者——被膏灌而立为统帅。主宰仍为诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕;此景昭示正当授权之范:权力非以夺取而得,乃由清净、秩序与诸神共同认可,通过神圣仪式托付于其身。

Verse 21

अभ्यषिज्चन्‌ कुमार वै सम्प्रहृषषशट दिवौकस: । सेनापतिं महात्मानमसुराणां भयंकरम्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर-भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे

毗湿摩波耶那说:诸天欢欣鼓舞,为神圣的少年神——鸠摩罗·迦尔蒂凯耶——举行灌顶大礼,立这位大心之主为天军统帅,使其成为阿修罗的恐惧。鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼环侍左右;当诸天以圣水为其涂灌时,他以光辉威仪屹立,受命在对抗魔类势力的宇宙征战中统领诸军。

Verse 22

पुरा यथा महाराज वरुण वै जलेश्वरम्‌ । तथाभ्यषिज्चद्‌ भगवान्‌ सर्वलोकपितामह:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说:“大王啊,正如往昔水之主伐楼那受灌顶一般,蒙福的万界祖父(梵天)亦如此行灌顶礼;其时鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼环侍在侧。”

Verse 23

तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो बलिनो वातरंहस:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说:梵天喜悦于他,便赐予那位强大而迅疾如风者以恩赐。主神立于其间,鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼环绕四周——诸般神力汇聚一堂,以共同的神圣认可来印证其灌顶,并宣示其威力之正当与合法。

Verse 24

कामवीर्यधरान्‌ सिद्धान्‌ महापारिषदान्‌ प्रभु: । नन्दिसेनं लोहिताक्षं घण्टाकर्ण च सम्मतम्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说:主神(斯坎达/迦尔蒂凯耶)立于其间,周围有具坚毅勇武的成就者(悉地)与天廷的大侍从;难提塞那、洛希塔克沙与受敬的伽ṇṭā迦耳那环列护卫。又有鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼随侍左右。此景昭示正当权威之义:真正的统御不在孤身之力,而在于受持戒律、契合达摩的诸能量与宇宙秩序之列队所扶持。

Verse 25

चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम्‌ । उस समय भगवान्‌ ब्रह्माने संतुष्ट होकर कार्तिकेयको वायुके समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान्‌ और सिद्ध चार महान्‌ अनुचर प्रदान किये, जिनमें पहला नन्दिसेन, दूसरा लोहिताक्ष, तीसरा परम प्रिय घंटाकर्ण और उनका चौथा अनुचर कुमुदमालीके नामसे विख्यात था ।। तत्र स्थाणुर्महातेजा महापारिषदं प्रभु:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान्‌ शंकरने स्कन्दको एक महान्‌ असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था

毗湿摩波耶那说:“他的第四位随从,是著名的俱牟陀摩林。”在此一段中,诸天因欢喜与护持而赐予迦尔蒂凯耶强有力的同伴,强调神圣之力并非仅是个人勇力,更是宇宙诸力有序的扶助与忠诚的侍奉。叙事由此界定权力的正当性:唯有为护持世界、约束毁灭性众生而授予的力量,才称得上合法与合乎达摩。

Verse 26

मायाशतथधरं काम॑ कामवीर्य बलान्वितम्‌ | ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान्‌ शंकरने स्कन्दको एक महान्‌ असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था

毗湿摩波耶那说:大王啊,湿婆赐予斯甘陀一位强大的存在——能持有数百种幻力,其力与勇可随意召发,并足以摧灭诸天之敌。此景彰显史诗的道德逻辑:当宇宙秩序受威胁时,神力被托付给配得上的统帅,不为私利,而为护持达摩、约束毁灭之势。

Verse 27

स हि देवासुरे युद्धे दैत्यानां भीमकर्मणाम्‌ । जघान दोर्भ्या संक्रुद्धः प्रयुतानि चतुर्दश,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए उसने देवासुरसंग्राममें अत्यन्त कुपित होकर भयानक कर्म करनेवाले चौदह प्रयुत- दैत्योंका केवल अपनी दोनों भुजाओंसे वध कर डाला था

毗湿摩波耶那说:在诸天与阿修罗的战争中,那强者盛怒之下,仅凭双臂便诛杀了十四“普罗由多”的代底耶——皆是行事可怖的战士。此颂凸显一种为守护宇宙秩序而施展的压倒性英勇:当毁灭之力威胁诸天所维系的平衡时,正义之力便迅疾、果断,且与危机相称。

Verse 28

तथा देवा ददुस्तस्मै सेनां नैऋतसंकुलाम्‌ । देवशत्रुक्षयकरीमजय्यां विष्णुरूपिणीम्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए इसी प्रकार देवताओंने उन्हें देव-शत्रुओंका विनाश करनेवाली, अजेय एवं विष्णुरूपिणी सेना प्रदान की, जो नैरऋतोंसे भरी हुई थी

毗湿摩波耶那说:同样,诸天又赐给他一支挤满奈利利陀的军队——一支不可战胜的天军,具毗湿奴之形与力,注定要歼灭诸天之敌。此段将神战置于“受认可的行动”之框架:武力的授予并非为私利,而是为恢复宇宙秩序,清除威胁天众正当安定者。

Verse 29

जयशब्दं तथा चक्रुर्देवा: सर्वे सवासवा: । गन्धर्वा यक्षरक्षांसि मुनय: पितरस्तथा,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说:于是诸天与因陀罗一同高呼胜利。乾闼婆、夜叉、罗刹、仙人以及祖灵亦同欢庆。那大能之主为诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双阿湿毗尼所环绕而立——此乃宇宙秩序之象:正当的权威由共同的敬仰所确认,而非仅凭武力。

Verse 30

उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, मुनियों तथा पितरोंने जय-जयकार किया ।। ततः प्रादादनुचरी यम: कालोपमावुभौ | उन्माथश्च प्रमाथश्न महावीर्यों महाद्युती,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए तत्पश्चात्‌ यमराजने उन्हें दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे उन्‍्माथ और प्रमाथ। वे दोनों कालके समान महापराक्रमी और महातेजस्वी थे

当时,诸天与因陀罗,以及乾闼婆、夜叉、罗刹、仙人和祖灵,都齐声高呼“胜利!胜利!”。随后,阎摩赐给他两位侍从——乌恩摩他与普罗摩他——二者皆如“时”本身般可怖,具大勇与炽盛光辉。此景强调:宇宙权威认可并装备那位受命的统帅;力量不仅是个人武艺,更是由更高秩序所敕定的责任,以纪律之奉事来护持达摩。

Verse 31

सुभ्राजो भास्वरश्वैव यौ तौ सूर्यानुयायिनौ । तौ सूर्य: कार्तिकेयाय ददौ प्रीत: प्रतापवान्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए सुभ्राज और भास्वर--जो सूर्यके अनुचर थे, उन्हें प्रतापी सूर्यने प्रसन्न होकर कार्तिकेयकी सेवामें दे दिया

毗湿摩波耶那说道:“苏婆罗阇与婆娑伐罗——那两位光辉灿然、随侍太阳神的侍从——被威德赫赫的苏利耶因欢喜而慷慨赐予迦尔蒂凯耶,令其侍奉左右。于是那位大能的主宰(迦尔蒂凯耶)在诸神环拱之中屹立:鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼围绕其侧——此景昭示天界的认可与严整的臣属;连天上的威权也被编列成序,归于一位当得其位的统帅麾下。”

Verse 32

कैलासशू्‌ज्गसंकाशोौ श्वेतमाल्यानुलेपनौ । सोमो>प्यनुचरीौ प्रादान्मर्णिं सुमणिमेव च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说道:“他光耀如同凯拉萨雪山之巅,身佩白色花鬘,涂抹白色香膏;又蒙苏摩(月神)加以尊崇,献上侍从并奉上一颗灿然宝珠。那位大能的主宰就这样屹立于众神环侍之中——鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼围绕其侧。此段强调:神力之所以被承认,不在孤身称雄,而在恭敬的奉献与有序的侍从之礼,呈现出宇宙的等级与群神同敬的景象。”

Verse 33

चन्द्रमाने भी कैलास-शिखरके समान श्वेतवर्णवाले तथा श्वेत माला और श्वेत चन्दन धारण करनेवाले दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे मणि और सुमणि ।। ज्वालाजिह्ठं तथा ज्योतिरात्मजाय हुताशन: । ददावनुचरौ शूरौ परसैन्यप्रमाथिनौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए अग्निदेवने भी अपने पुत्र स्कन्दको ज्वालाजिह्न तथा ज्योति नामक दो शूर सेवक प्रदान किये, जो शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले थे

毗湿摩波耶那说道:“苏摩(月神)也赐给他两位侍从:肤色皎白,佩白花鬘,涂白檀香,光耀如凯拉萨山巅,名为摩尼与苏摩尼。同样,火神阿耆尼(护塔沙那)也赐给其子两位勇猛侍从:阇婆罗舌与焦提,皆为能摧碎敌军的猛将。那光荣的主宰斯坎陀周围,鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼等大神恭敬环立,昭示其权柄得天界认可,亦预示其征战之天命。”

Verse 34

परिघं च वर्ट चैव भीम॑ च सुमहाबलम्‌ । दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसम्मतौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗湿摩波耶那说道:“在那位大能的主宰周围,亦有可畏之力侍立:波利伽与婆尔多,巨力的毗摩,以及达诃提与达诃那——二者皆凶烈而以勇武著称;又有鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼环绕。此景凸显神界的同心:诸般宇宙之力以秩序聚集、列队侍从,昭示真正的威力并非徒然暴烈,而是与更高旨意相契的纪律之强。”

Verse 35

अंशो5प्यनुचरान्‌ पञ्च ददौ स्कन्दाय धीमते । अंशने भी बुद्धिमान्‌ स्कन्दको पाँच अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम इस प्रकार हैं-- परिघ, वट, महाबली भीम तथा दहति और दहन। इनमेंसे दहति और दहन बड़े प्रचण्ड तथा बल-पराक्रमकी दृष्टिसे सम्मानित थे ।। उत्क्रोशं पजचकं चैव वज्रदण्डधरावुभौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रने अग्निकुमार स्कन्दको उत्क्रोश और पंचक नामक दो अनुचर प्रदान किये। वे दोनों क्रमश: वज्ञ और दण्ड धारण करनेवाले थे। उन दोनोंने समरांगणमें इन्द्रके बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला था

毗湿摩波耶那说道:“阿姆沙也赐给睿智的斯坎陀五位侍从。在此一段中,诸神为斯坎陀增益随从之众,以承担镇伏敌对势力之业——这是一幅‘受托之权’的图景:威力被委任以护持宇宙秩序,强力被编制于正当的统御之下,而非为私欲所用。”

Verse 36

ददावनलपुत्राय वासव: परवीरहा । तौ हि शत्रून्‌ महेन्द्रस्य जघ्नतु: समरे बहूनू,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रने अग्निकुमार स्कन्दको उत्क्रोश और पंचक नामक दो अनुचर प्रदान किये। वे दोनों क्रमश: वज्ञ और दण्ड धारण करनेवाले थे। उन दोनोंने समरांगणमें इन्द्रके बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला था

毗湿摩波耶那说:因陀罗——诛灭敌方勇士者——赐予火神阿耆尼之子、斯坎陀两名侍从:乌特克罗沙与般遮迦。主神立于战阵之前,周遭环列诸天的雄师——鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众,以及双生阿湿毗尼——威势赫然。那两名侍从手执金刚杵与杖,於战场上击杀了因陀罗的许多仇敌。

Verse 37

चक्र विक्रमकं चैव संक्रमं च महाबलम्‌ | स्कन्दाय त्रीननुचरान्‌ ददौ विष्णुर्महायशा:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए महायशस्वी भगवान्‌ विष्णुने स्कन्दको चक्र, विक्रम और महाबली संक्रम--ये तीन अनुचर दिये

毗湿摩波耶那说:声名显赫的毗湿奴赐予斯坎陀三种随侍之力——恰克罗、毗克罗摩迦,以及大力的僧迦罗摩。叙事之中,诸天以敬仰之心环立在这位年轻的战神周围;毗湿奴的赐与昭示一条正道:神力当被整饬、分任,并用于护持宇宙秩序,而非满足个人傲慢。

Verse 38

वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ । स्कन्दाय ददतु: प्रीतावश्चिनौ भिषजां वरौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण चिकित्सकचूड़ामणि अश्विनीकुमारोंने प्रसन्न होकर स्कन्दको वर्धन और नन्दन नामक दो सेवक दिये

毗湿摩波耶那说:双生阿湿毗尼——医中之最,通达诸学——心生欢喜,赐予斯坎陀两名侍从,名为伐尔陀那与难陀那。此段昭示:神圣的技艺与学识若与善意相合,便归于服务;医神之赐并非单纯奖赏,而是以能干的辅佐来增益天军统帅之威力。

Verse 39

कुन्दं च कुसुमं चैव कुमुदं च महायशा: । डम्बराडम्बरौ चैव ददौ धाता महात्मने,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए महायशस्वी धाताने महात्मा स्कन्दको कुन्द, कुसुम, कुमुद, डम्बर और आडम्बर--ये पाँच सेवक प्रदान किये

毗湿摩波耶那说:声名显赫的达塔赐予大心的斯坎陀五名侍从——军荼、拘苏摩、拘牟陀、檀婆罗与阿檀婆罗。此景彰显诸天对功德的认可:他们敬奉斯坎陀,不止以赞词,更以侍奉与扶持,宣示正当的统御因纪律严整的随从与有序的分任而愈加坚固。

Verse 40

चक्रानुचक्रौ बलिनौ मेघचक्रौ बलोत्कटौ । ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए प्रजापति त्वष्टाने बलवान, बलोन्मत्त, महामायावी और मेघचक्रधारी चक्र और अनुचक्र नामक दो अनुचर स्कन्दकी सेवामें उपस्थित किये

毗湿摩波耶那说:生主特瓦什特利为斯坎陀任命两名侍从,名为恰克罗与阿努恰克罗——二者皆雄健强悍,力势凶猛,具大幻力,并持如云之轮盘。于更宏阔的场景中,鲁陀罗与诸鲁陀罗、婆苏、阿底提耶及双生阿湿毗尼环聚在威严的童子迦尔蒂迦耶周围,昭示其神圣权柄,并确立那维系宇宙与战阵统御的、有序的侍奉等级。

Verse 41

सुव्रतं सत्यसंधं च ददौ मित्रो महात्मने । कुमाराय महात्मानौ तपोविद्याधरी प्रभु:,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗耶娑波耶那说:那位威能无比、具足苦行之力与神圣智识的主宰,赐予大心的俱摩罗(迦尔蒂凯耶)一位同伴——密多罗——其誓戒清净,守真不移。随后,那光辉的主宰立于众神环侍之中:鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众以及双阿湿毗尼。诸天神力围绕拱卫,仿佛昭示:真实与严持誓戒,乃统御与神圣权威最相称的庄严。

Verse 42

सुव्रतं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗耶娑波耶那说:那位主宰——誓戒清净,大心宏远,勤行吉祥之业——立于鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼的环绕之中。于叙事框架里,诸神之力聚集拱卫这位统军之神(俱摩罗/迦尔蒂凯耶),象征共同的认可与护持:正义之威并非凭蛮力,而是由严持誓戒(vrata)与善行(śubha-karman)所支撑。

Verse 43

पाणीतकं कालिकं च महामायाविनायुभौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗耶娑波耶那说:那位威猛的主宰——偕同两位善使大幻术者,般尼多迦与迦利迦——立于鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼的环绕之中。此一场景里,诸神恭敬侍立于天军统帅周围,昭示其至上权威,并表明战争进程背后有宇宙秩序的认可与护持。

Verse 44

बल॑ चातिबलं चैव महावक्त्रौ महाबलौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗耶娑波耶那说:那位主宰——强而又强,面容广大,神力雄浑——立于鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼的环绕之中。于是,光耀的诸神之众聚集在俱摩罗·迦尔蒂凯耶周围,礼敬其威力与位阶;在这战火摧残的世间,仿佛要宣告:神圣秩序与护佑仍然站在正当的统御与有纪律的勇武之后。

Verse 45

प्रददौ कार्तिकेयाय वायुर्भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! वायु देवताने कृत्तिकाकुमारको महान्‌ बलशाली एवं विशाल मुखवाले बल और अतिबल नामक दो सेवक प्रदान किये || ४४ $ ।। यम॑ चातियमं चैव तिमिवक्‍क्त्रौ महाबलौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलरामती र्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने स्कन्दाभिषेके पठ्चचत्वारिंशो5ध्याय:

毗耶娑波耶那说:噢,婆罗多族中最卓越者!风神伐由赐予迦尔蒂凯耶两位强大的侍从——阎摩与阿底阎摩——二者皆力大无比,面貌狰狞,宛如鲸面。随后,光荣的主宰(斯甘陀)立于鲁陀罗众、婆苏众、阿底提耶众与双阿湿毗尼的环绕之中。此段强调:神威并非仅是个人勇力,而是经由宇宙秩序所认可的权能;诸神共同确认斯甘陀的权柄,并认可他以有纪律的力量护持达摩的能力。

Verse 46

सुवर्चसं महात्मानं तथैवाप्यतिवर्चसम्‌,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Lord—radiant and great-souled, indeed surpassingly resplendent—stood surrounded by the Rudras, the Vasus, the Ādityas, and the two Aśvins. In this scene, the epic underscores how true sovereignty is marked not merely by force but by divine sanction and ordered harmony: the powers that govern the cosmos gather around the one whose splendor and authority are recognized by all.

Verse 47

काजउ्चनं च महात्मानं मेघमभालिनमेव च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The mighty Lord—radiant like gold and like a cloud—stood surrounded by the hosts of gods: the Rudras, Vasus, Ādityas, and the two Aśvins. Indra of great prowess, Viṣṇu, the Sun and the Moon, Dhātṛ and Vidhātṛ, Vāyu and Agni, Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra, and Varuṇa—together with the wise Rudra and the eleven Rudras, the eight Vasus, the twelve Ādityas, and both Aśvinīkumāras—all these powerful deities stood encircling Kumāra Kārttikeya. The scene underscores a moral order in which divine powers align around a rightful commander, suggesting that legitimate leadership and cosmic duty (dharma) draw collective support.

Verse 48

स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Lord, surrounded by the Rudras, the Vasus, the Ādityas, and the two Aśvins, bestowed both firmness and unshakable stability—like Mount Meru itself. In that divine assembly, mighty deities such as Indra and Viṣṇu, Sūrya and Candra, Dhātā and Vidhātā, Vāyu and Agni, Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra, and Varuṇa, together with the wise Rudra—along with the eleven Rudras, eight Vasus, twelve Ādityas, and the twin Aśvinīkumāras—stood encircling the radiant Kumāra Kārttikeya.

Verse 49

उच्छूड़ूं चातिशुड्ं च महापाषाणयोधिनौ,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The mighty Lord—Kumāra Kārtikeya—stood surrounded by the great stone-weapon warriors Ucchūḍū and Atiśūḍū, and by the hosts of the Rudras, Vasus, Ādityas, and the two Aśvins. Around him gathered the great powers: Indra and Viṣṇu; the Sun and the Moon; Dhātṛ and Vidhātṛ; Vāyu and Agni; Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra, and Varuṇa—together with Rudradeva, the eleven Rudras, the eight Vasus, the twelve Ādityas, and the twin Aśvin-kumāras. All, radiant with might, encircled Kārtikeya and stood in attendance.

Verse 50

प्रददावग्निपुत्राय विन्ध्य: पारिषदावुभौ । विन्ध्य पर्वतने भी अग्निकुमारको दो पार्षद प्रदान किये, जिनके नाम थे उच्छृंग और अतिशंग। वे दोनों ही बड़े-बड़े पत्थरोंकी चट्टानोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल थे ।। संग्रह विग्रहं चैव समुद्रोडपि गदाधरी,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

Vaiśampāyana said: The Vindhya mountain presented to the son of Agni two attendants—Ucchṛṅga and Atiśṛṅga—both expert in fighting with massive slabs of stone. Around the mighty lord Kārttikeya stood gathered the great powers: Indra and Viṣṇu, the Sun and the Moon, Dhātā and Vidhātā, Vāyu and Agni, Pūṣan, Bhaga, Aryaman, Aṃśa, Vivasvān, Mitra and Varuṇa; and also Rudra with the eleven Rudras, the eight Vasus, the twelve Ādityas, and the two Aśvin twins. The scene underscores a moral order in which even the highest gods assemble in disciplined support of a chosen commander, affirming hierarchy, duty, and collective responsibility in the face of conflict.

Verse 51

उन्मादं शड्कुकर्ण च पुष्पदन्तं तथैव च,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗耶娑之弟子毗舍摩波耶那说道:威力无边的主神(迦尔蒂凯耶)立于其间,周遭环侍者有乌摩达、商拘迦耳那与普湿波檀多;又有诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶,以及双生阿湿毗尼天神同来围绕。此景并非将战神描绘为孤身英雄,而是显出他为宇宙秩序所扶持:诸大神与其眷属齐集其侧,昭示共同的认可、克制而有纪律的威势,并使武力与神圣治理相契合。

Verse 52

जयं महाजयं चैव नागौ ज्वलनसूनवे,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗舍摩波耶那说道:在主神——火神阿耆尼之子(迦尔蒂凯耶)——周围,龙族首领阇耶与摩诃阇耶侍立;而诸鲁陀罗、诸婆苏、诸阿底提耶与双生阿湿毗尼亦环绕其侧。此景表明战神并非孤立之力,而是由宇宙有序之诸力所扶持,暗示真正的威能须由神圣秩序加以正名并加以节制,而非任由暴力恣行。

Verse 53

प्रददौ पुरुषव्यात्र वासुकि: पन्नगेश्वर: । पुरुषसिंह! नागराज वासुकिने अग्निकुमारको पार्षदरूपसे जय और महाजय नामक दो नाग भेंट किये ।। एवं साध्याश्ष्‌ रुद्राश्न वसव: पितरस्तथा,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्‌ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान्‌ रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए

毗舍摩波耶那说道:噫,人中之虎!蛇族之王婆苏吉献上两位名为阇耶与摩诃阇耶的龙族,作为侍从之形、供役之臣。继而,诸萨陀耶、诸鲁陀罗、诸婆苏与诸祖灵(Pitṛ)亦同来——并与诸阿底提耶及双生阿湿毗尼一道——环立于那位威猛的主神周围。大勇的因陀罗、毗湿奴、日与月、达塔与毗达塔、风神伐由与火神阿耆尼、普尚、婆伽、阿利耶曼、安沙、毗婆斯梵、密多罗与伐楼那——这一切威权之神,皆围绕童子迦尔蒂凯耶而立,侍奉在侧。此景昭示一种道德秩序:即便至高之力亦承认正当的统御,并向那位为护持诸世界而受命者致敬效劳。

Verse 54

सागरा: सरितश्चैव गिरयश्न महाबला: । ददुः सेनागणाध्यक्षान्‌ शूलपट्टिशधारिण:

毗舍摩波耶那说道:甚至大海、江河与雄伟群山,仿佛也献出军旅统领——执矛持重兵之士——宛如自然之力本身正为将临的冲突输送战士。此景更添战争的道德沉重:当争斗膨胀至如此规模,似乎整个世界都被卷入,供给暴力的器具与执行者。

Verse 55

दिव्यप्रहरणोपेतान्‌ नानावेषविभूषितान्‌ । इस प्रकार साध्य, रुद्र, वसु, पितृगण, समुद्र, सरिताओं और महाबली पर्वतोंने उन्हें विभिन्न सेनापति अर्पित किये, जो शूल, पट्टिश और नाना प्रकारके दिव्य आयुध धारण किये हुए थे। वे सब-के-सब भाँति-भाँतिकी वेश-भूषासे विभूषित थे | ५३-५४ $ ।। शृणु नामानि चाप्येषां ये3न्ये स्कन्दस्य सैनिका:

毗舍摩波耶那说道:“他们具足天界兵器,衣饰多样,珠璎纷陈。如今且听,那些在斯坎陀(Skanda)麾下效命的其余战士之名。”

Verse 56

शड्कुकर्णो निकुम्भश्न पद्म: कुमुद एव च

毗舍波耶那说道:“(其中有)沙德库迦耳那、尼俱婆、莲华(Padma),以及拘牟陀(Kumuda)。”

Verse 57

अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ । प्राणश्रवा: कपिस्कन्ध: काज्चनाक्षो जलन्धम:

毗舍波耶那说道:“(其中有)十二臂的阿难多(Ananta);又有克里希那(Kṛṣṇa)与优波克里希那(Upakṛṣṇa);普罗那室罗婆(Prāṇaśravā);迦毗斯建陀(Kapiskandha);金眼者(Kāñcanākṣa);以及阇兰陀摩(Jalandhama)。”

Verse 58

अक्ष: संतर्जनो राजन्‌ कुनदीकस्तमो<न्तकृत्‌ । एकाक्षो द्वादशाक्षश्न तथैवैकजट: प्रभु:

毗舍波耶那说道:“大王啊,有阿克沙(Akṣa),凶猛的威吓者;有库那迪迦(Kunadīka),灭暗之人;又有安多克利特(Antakṛt),带来死亡者。亦有独眼者(Ekākṣa)、十二眼者(Dvādaśākṣa),以及同样强大的独髻者(Ekajaṭa,‘一绺结发’)。”

Verse 59

सहख्बाहुर्विकटो व्याप्राक्ष: क्षितिकम्पन: । पुण्यनामा सुनामा च सुचक्र: प्रियदर्शन:

毗舍波耶那说道:“有名为萨哈克沙婆呼(Sahakṣabāhu)、毗迦塔(Vikaṭa)、毗耶阿普罗阿克沙(Vyāprākṣa)与震地者(Kṣitikampana)的战士;又有善名者(Puṇyanāmā)与美名者(Sunāmā);并且还有善轮者(Sucakra)与悦目者(Priyadarśana)。”

Verse 60

परिश्रुत: कोकनद: प्रियमाल्यानुलेपन: । अजोदरो गजशिरा: स्कन्धाक्ष: शतलोचन:

毗舍波耶那说道:“他声名远播;光辉如绽放的拘迦那陀莲;喜爱珍贵花鬘与芬芳涂香。其腹坚实紧致;其首如象首;其肩与目皆具威力;又被称为‘百眼者’——那非凡而令人敬畏的目光,足以震慑众人。”

Verse 61

ज्वालाजिह्ठवः करालाक्ष: शितिकेशो जटी हरि: । परिश्रुत: कोकनद: कृष्णकेशो जटाधर:

毗舍波耶那说道:“他以许多可怖而夺目的称号闻名——‘火舌者’、‘怖目者’、‘白发者’、‘结发者’、‘黄褐如狮者’、‘声名远播者’、‘如莲者’、‘黑发者’,以及‘持结发者’。”

Verse 62

चर्तुर्वष्टोडष्टजिह्नश्व मेघनाद: पृथुश्रवा: | विद्युताक्षो धनुर्वकत्रो जाठरो मारुताशन:

毗舍波耶那说道:(有些战士)名为“云吼”梅伽那陀、普利图施罗婆、闪目者毗地由多阿叉、弓面者达努尔瓦克特罗、阇吒罗,以及“噬风之火”摩鲁塔沙那——其名本身便令人想到雷霆、闪电与吞噬之焰。

Verse 63

उदाराक्षो रथाक्षश्न वज्ञनाभो वसुप्रभ: । समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च

毗舍波耶那说道:“大王啊,(有些战士)名为优达罗阿叉、罗他阿叉、金刚脐者伐阇罗那婆、宝光者婆苏普拉婆——又有海势者三慕陀罗韦伽,以及同样的山震者室哀罗甘毗。”

Verse 64

वृषो मेष: प्रवाहश्चन तथा नन्दोपनन्दकौ । धूम्र: श्वेत: कलिड्रश्न सिद्धार्थो वरदस्तथा

毗舍波耶那说道:“(有)弗利沙、梅沙与普拉瓦诃;同样有难陀与优般难陀;又有烟色者都摩罗、白色者室韦多、迦利ḍ罗什那、悉达尔他,以及赐福者伐罗陀。”

Verse 65

प्रियकश्नैव नन्दश्न गोनन्दश्न प्रतापवान्‌ । आनन्दश्न प्रमोदश्न स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा

毗舍波耶那说道:“又有普利耶克利、难陀、勇武的瞿难陀;阿难陀、普罗摩陀、吉祥者娑婆斯底迦,以及同样的德鲁瓦迦。”

Verse 66

क्षेमवाह: सुवाहश्न सिद्धपात्रश्न भारत | गोव्रज: कनकापीडो महापारिषदेश्वर:

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,(其间有)克舍摩婆诃、苏婆诃、悉陀钵多罗、瞿弗罗阇、迦那迦毗荼,以及摩诃波利沙提湿伐罗。”

Verse 67

गायनो हसनश्नैव बाण: खड्गश्न वीर्यवान्‌ वैताली गतिताली च तथा कथकवातिकौ

毗湿摩波耶那说道:“有歌者与伎艺之人——伽耶那与哈萨那;亦有勇武的婆那与佉荼伽;又有毗多梨与伽底多梨,并有迦他迦与婆底迦。”

Verse 68

हंसज: पड्कदिग्धाड़: समुद्रोन्मादनश्न ह । रणोत्कट: प्रहासश्न श्वेतसिद्धश्ष नन्दन:

毗湿摩波耶那说道:“有汉萨阇与般迦底伽陀;亦有娑慕德罗恩摩陀那;罗诺特迦吒与钵罗诃娑;并有室吠多悉陀与难陀那。”

Verse 69

कालकण्ठ: प्रभासश्न॒ तथा कुम्भाण्डकोदर: । कालकक्ष: सितश्चैव भूतानां मथनस्तथा

毗湿摩波耶那说道:“又有名为迦罗迦ṇṭha、钵罗婆娑与军婆ṇḍ迦乌陀罗者;亦有迦罗迦迦叉与悉多,并有‘摧碾众生者’布呼多南摩他那。”

Verse 70

यज्ञवाहः सुवाहश्च देवयाजी च सोमप: । मज्जानश्न महातेजा: क्रथक्राथौ च भारत

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,(又有)祭行者耶阇那婆诃与苏婆诃,天祭者提婆耶阇与苏摩波——皆为威光赫奕的勇士——并有摩阇那什那,以及兄弟二人:克罗他与克罗他。”

Verse 71

तुहरश्न तुहारश्न चित्रदेवश्न वीर्यवान्‌ मधुर: सुप्रसादश्चन॒ किरीटी च महाबल:

毗舍波耶那说道:“有图诃罗什那、图诃罗什那,以及勇武的质多罗提婆;又有摩度罗、慈和的苏普罗萨陀,还有力大无比的基利提因。”

Verse 72

वत्सलो मधुवर्णश्ष कलशोदर एव च | धर्मदो मन्मथकर: सूचीवक्त्रश्न वीर्यवान्‌

毗舍波耶那说道:“他性情慈爱;肤色如蜜;腹部隆起;为施与并护持达摩者;能撩动欲念;面容尖削如针;而且确实力大无穷。”

Verse 73

श्वेतवक्त्र: सुवक्त्रश्न चारुवक्त्रश्न पाण्डुर: । दण्डबाहु: सुबाहुश्चव रज: कोकिलकस्तथा

毗舍波耶那说道:“有名为湿吠多伐克特罗、苏伐克特罗、恰鲁伐克特罗、般度罗、檀陀婆呼、苏婆呼、罗阇赫与拘吉罗迦的战马。”

Verse 74

अचल: कनकाक्षश्न बालानामपि य: प्रभु: । संचारकः कोकनदो गृश्रपत्रश्चन जम्बुक:

毗舍波耶那说道:“他坚定不移;号称‘金眼’;即便对少年亦为主宰。他往来如使者;名曰拘迦那陀;又称‘鹫翼’——而他绝非豺狼之辈。”

Verse 75

लोहाजवक्त्रो जवन: कुम्भवकत्रश्न कुम्भक: | स्वर्णग्रीवश्च॒ कृष्णौजा हंसवक्त्रश्न चन्द्रभ:

毗舍波耶那说道:“其中有卢诃阇伐克特罗、阇伐那、俱婆伐克特罗、俱婆迦、苏伐尔那格利婆、克利什瑙阇、汉萨伐克特罗与旃陀罗婆。”

Verse 76

पाणिकूर्चश्न॒ शम्बूक: पञ्चवक्त्रश्न शिक्षक: | चाषवक्त्रश्न जम्बूक: शाकवक्त्रश्न कुडउजल:

毗湿摩波耶那说道:“有些异类名为商布迦(Śambūka)——‘手生簇毛者’;师迦迦(Śikṣaka)——‘五面者’;阇布迦(Jambūka)——‘鸦面者’;以及俱度阇罗(Kuḍūjala)——‘菜面者’。”

Verse 77

शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, कुमुद, अनन्त, द्वादशभुज, कृष्ण, उपकृष्ण, प्राणश्रवा, कपिस्कन्ध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्ष, संतर्जन, कुनदीक, तमो<न्तकृत, एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजट, प्रभु, सहसख्रबाहु, विकट, व्याप्राक्ष, क्षतिकम्पन, पुण्यनामा, सुनामा, सुचक्र, प्रियदर्शन, परिश्रुत, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन, अजोदर, गजशिरा, स्कन्धाक्ष, शतलोचन, ज्वालाजिह्न, करालाक्ष, शितिकेश, जटी, हरि, परिश्रुत, कोकनद, कृष्णकेश, जटाधर, चतुर्दष्ट, अष्टजिह्न, मेघनाद, पृथुश्रवा, विद्युताक्ष, धनुर्वक्त्र, जाठर, मारुताशन, उदाराक्ष, रथाक्ष, वज्नाभ, वसुप्रभ, समुद्रवेग, शैलकम्पी, वृष, मेष, प्रवाह, नन्‍्द, उपनन्द, धूम्र, श्वेत, कलिंग, सिद्धार्थ, वरद, प्रियक, नन्द, प्रतापी गोनन्द, आनन्द, प्रमोद, स्वस्तिक, ध्रुवक, क्षेमवाह, सुवाह, सिद्धपात्र, गोव्रज, कनकापीड, महापरिषदेश्वर, गायन, हसन, बाण, पराक्रमी, खड्ग, वैताली, गतितली, कथक, वातिक, हंसज, पंकदिग्धांग, समुद्रोन्मादन, रणोत्कट, प्रहास, श्वेतसिद्ध, नन्दन, कालकण्ठ, प्रभास, कुम्भाण्डकोदर, कालकक्ष, सित, भूतमथन, यज्ञवाह, सुवाह, देवयाजी, सोमप, मज्जान, महातेजा, क्रथ, क्राथ, तुहर, तुहार, पराक्रमी चित्रदेव, मधुर, सुप्रसाद, किरीटी, महाबल, वत्सल, मधुवर्ण, कलशोदर, धर्मद, मनन्‍्मथकर, शक्तिशाली सूचीवक्त्र, श्वेतवक्त्र, सुवक्त्र, चारुवक्त्र, पाण्डुर, दण्डबाहु, सुबाहु, रज, कोकिलक, अचल, कनकाक्ष, बालस्वामी, संचारक, कोकनद, गृध्रपत्र, जम्बुक, लोहवक्त्र, अजवक्त्र, जवन, कुम्भवक्त्र, कुम्भक, स्वर्णग्रीव, कृष्णौजा, हंसवक्त्र, चन्द्रभ, पाणिकूर्च, शम्बूक, पंचवक्त्र, शिक्षक, चापवकत्र, जम्बूक, शाकवक्त और कुंजल ।। ५६-- ७६ || योगयुक्ता महात्मान: सतत ब्राह्मणप्रिया: । पैतामहा महात्मानो महापारिषदाक्ष ये,जनमेजय! ये सब पार्षद योगयुक्त, महामना तथा निरन्तर ब्राह्मणोंसे प्रेम रखनेवाले हैं। इनके सिवा, पितामह ब्रह्माजीके दिये हुए जो महामना महापार्षद हैं, वे तथा दूसरे बालक, तरुण एवं वृद्ध सहस्रों पार्षद कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए

毗湿摩波耶那说道:“阇那美阇耶啊,童子神库摩罗(斯迦陀)的侍从大军浩浩而来——其名号被长长诵列不绝。这些侍从皆以瑜伽自持,心志宏大,并恒常敬奉、扶持婆罗门。除此之外,还有由祖父神梵天(Pitāmaha Brahmā)亲自赐予的尊贵‘大侍从众’(Mahāpārṣada);并且与他们同来者又有千千万万——童子、青年与长者——悉皆列立,供奉斯迦陀。”

Verse 78

यौवनस्थाश्न बालाश्न वृद्धाश्ष जनमेजय । सहस््रश: पारिषदा: कुमारमवतस्थिरे,जनमेजय! ये सब पार्षद योगयुक्त, महामना तथा निरन्तर ब्राह्मणोंसे प्रेम रखनेवाले हैं। इनके सिवा, पितामह ब्रह्माजीके दिये हुए जो महामना महापार्षद हैं, वे तथा दूसरे बालक, तरुण एवं वृद्ध सहस्रों पार्षद कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए

毗湿摩波耶那说道:“阇那美阇耶啊,少年、孩童与长者——成千上万的侍从众——皆侍立在童子神(库摩罗/斯迦陀)之前,整装待命。”

Verse 79

वक्त्रैर्ननाविधैयें तु शूणु ताउज्जनमेजय । कूर्मकुक्कुटवकत्रा श्नव शशोलूकमुखास्तथा

毗湿摩波耶那说道:“阇那美阇耶啊,且听那些面貌各异的存在——有的生龟面、鸡面;有的却具犬口、兔口与鸮口。”

Verse 80

मार्जारशशवत्त्राश्न दीर्घवक्त्राक्ष भारत,भारत! बहुतोंके मुख बिल्ली और खरगोशके समान थे। किन्हींके मुख बहुत बड़े थे और किन्हींके नेवले, उल्लू, कौए, चूहे, बश्वु तथा मयूरके मुखोंके समान थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,许多者面如猫兔;有的口阔异常;又有的面似獴、鸮、乌鸦、鼠、牡牛与孔雀——此等凶兆之相,正映出战场上弥漫的恐惧与伦常的颠倒。”

Verse 81

नकुलोलूकवकत्राश्न काकवक्त्रास्तथा परे | आखुबश्रुकवक्त्राश्चन मयूरवदनास्तथा,भारत! बहुतोंके मुख बिल्ली और खरगोशके समान थे। किन्हींके मुख बहुत बड़े थे और किन्हींके नेवले, उल्लू, कौए, चूहे, बश्वु तथा मयूरके मुखोंके समान थे

毗舍摩波耶那说道:“有的面貌如獴与鸮;有的面貌如鸦。又有的面貌如鼠、如食蛇獴;还有的面貌如孔雀。”在那可怖的战场幻景中,叙述者以兽面之相描绘战士,凸显战争使人性沦丧的骇然:仿佛屠戮之中,道德崩坏,恐惧四起。

Verse 82

मत्स्यमेषाननाक्षान्ये अजाविमहिषानना: । ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्न दीपिसिंहाननास्तथा,किन्हीं-किन्हींके मुख मछली, मेढे, बकरी, भेड़, भैंसे, रीछ, व्याप्र, भेड़िये तथा सिंहोंके समान थे

毗舍摩波耶那说道:“他们之中,有的面貌如鱼、如公羊;有的面貌如山羊、绵羊与水牛。有的虎面熊颜,有的狮面凶猛——皆为世道反常之征兆,映照出战争所释放的道德紊乱。”

Verse 83

भीमा गजाननाश्रैव तथा नक्रमुखाश्न ये । गरुडानना: कड़्कमुखा वृककाकमुखास्तथा

毗舍摩波耶那说道:“又有可怖之类:有的象面,有的鳄口;有的具迦楼罗(Garuḍa)之相,有的喙如鹭;还有的狼面鸦颜。”在战争的阴沉气息中,这般描写以怪异而掠食的形貌加深恐惧,仿佛暴力将世界扭曲成充满惊骇与凶兆的荒原。

Verse 84

किन्हींके मुख हाथीके समान थे, इसलिये वे बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ पार्षदोंके मुख मगर, गरुड़, कंक भेड़ियों और कौओंके समान जान पड़ते थे ।। गोखरोष्टमुखा श्चवान्ये वृषदंशमुखास्तथा । महाजठरपादाज्ञस्तारकाक्षाश्व॒ भारत,भारत! कुछ पार्षद गाय, गदहा, ऊँट और वनबिलावके समान मुख धारण करते थे। किन्हींके पेट, पैर और दूसरे-दूसरे अंग भी विशाल थे। उनकी आँखें तारोंक समान चमकती थीं

毗舍摩波耶那说道:“婆罗多啊,有些随从面貌如牛、如驴、如骆驼、如野猫;又有些面貌如噬牛之兽。其间多人腹大、足巨,诸肢亦异常硕大,而其眼光灿然如星。”此描写凸显那环绕其侧的可怖而反常的侍从之群,使战祸之中凶惧的道德氛围更为浓重,仿佛不祥之力正在暗中运作。

Verse 85

पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखा: परे । कोकिलाभाननाश्षान्ये श्येनतित्तिरिकानना:,कुछ पार्षदोंके मुख कबूतर, बैल, कोयल, बाज और तीतरोंके समान थे

毗舍摩波耶那说道:“在那些随从之中,有的面貌如鸽,有的如公牛;有的面貌似杜鹃,有的则如鹰与鹧鸪。”此乃描绘一支奇异、宛若来自异界的侍从之列,皆以兽禽杂相为记。

Verse 86

कृकलासमुखाश्वैव विरजो<म्बरधारिण: । व्यालवक्त्रा: शूलमुखाश्षण्डवक्त्रा: शुभानना:,किन्हीं-किन्हींके मुख गिरगिटके समान जान पड़ते थे। कुछ बहुत ही श्वेत वस्त्र धारण करते थे। किन्हींके मुख सर्पोंके समान थे तो किन्हींके शूलके समान। किन्हींके मुखसे अत्यन्त क्रोध टपकता था और किन्हींके मुखपर सौम्यभाव छा रहा था

毗舍波耶那说道:“有的面貌如蜥蜴;有的身披洁白无瑕的衣裳。有的生着蛇一般的脸,有的脸如枪矛之锋。某些面孔上,凶怒仿佛滴淌而出;而另一些面孔上,则笼罩着温和吉祥的宁静。”

Verse 87

आशीविषाश्षीरधरा गोनासावदनास्तथा । स्थूलोदरा: कृशाज्श्च स्थूलाड्राश्न कृुशोदरा:

毗舍波耶那说道:“有毒蛇昂起颈罩;也有面貌如‘戈那萨’(一种蝮蛇)者。有的腹大而厚,有的瘦削;有的躯体魁伟而修长,有的则腹细而纤。”

Verse 88

कुछ विषधर सर्पोंके समान जान पड़ते थे। कोई चीर धारण करते थे और किन्हीं- किन्हींके मुख गायके नथुनोंके समान प्रतीत होते थे। किन्हींके पेट बहुत मोटे थे और किन्हींके अत्यन्त कृश। कोई शरीरसे बहुत दुबले-पतले थे तो कोई महास्थूलकाय दिखायी देते थे ।। हस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणा: । गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बरा:,किन्हींकी गर्दन छोटी और कान बड़े-बड़े थे। नाना प्रकारके सर्पोंको उन्होंने आभूषणके रूपमें धारण कर रखा था। कोई अपने शरीरमें हाथीकी खाल लपेटे हुए थे तो कोई काला मृगछाला धारण करते थे

毗舍波耶那说道:他们以种种怪异形相出现——有的如毒蛇,有的披着破布,有的面貌竟似牛鼻之孔。有的腹大如鼓,有的瘦削至极;有的形体枯槁,有的却臃肿魁伟。颈短而耳巨,他们以各类蛇为饰。有人裹以象皮,有人披着黑羚羊皮。

Verse 89

स्कन्धेमुखा महाराज तथाप्युदरतोमुखा: । पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जड्घामुखा अपि,महाराज! किन्हींके मुख कंधोंपर थे तो किन्हींके पेटमें। कोई पीठमें, कोई दाढ़ीमें और कोई जाँघोंमें ही मुख धारण करते थे

毗舍波耶那说道:“大王啊,有些众生的脸生在肩上,有些的脸生在腹中。有些背上有脸,有些在颌下/下巴处有脸,甚至还有些在大腿上也长着脸。”

Verse 90

पार्शाननाश्व बहवो नानादेशमुखास्तथा । तथा कीटपतड्डानां सदृशास्या गणेश्वरा:

毗舍波耶那说道:许多战马的面貌如同猛兽;另有一些,其口吻仿佛出自不同地域、不同种类。又有诸多军旅之长,面貌竟似昆虫与飞禽——一派不祥而反常的群像,更加深了战争末段暴烈杀戮所笼罩的恐惧。

Verse 91

बहुत-से ऐसे भी थे, जिनके मुख पार्श्चभागमें स्थित थे। शरीरके विभिन्न प्रदेशोंमें मुख धारण करनेवाले पार्षदोंकी संख्या भी कम नहीं थी। भिन्न-भिन्न गणोंके अधिपति कीट- पतंगोंके समान मुख धारण करते थे ।। नानाव्यालमुखाश्चान्ये बहुबाहुशिरोधरा: । नानावृक्षभुजा: केचित्‌ कटिशीर्षास्तथा परे

毗湿摩波耶那说:“还有一些人的面孔生在后方。随从之中,也不乏在身体各处生有面孔者。诸多部众之主,竟具如虫豸般的面相。又有他者具种种蛇面,有的多臂多首;有的臂如万树之枝,而有的头却生在腰间。”

Verse 92

किन्हींके अनेक और सर्पाकार मुख थे। किन्हीं-किन्हींके बहुत-सी भुजाएँ और गर्दनें थीं। किन्हींकी बहुसंख्यक भुजाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंके समान जान पड़ती थीं। किन्हीं- किन्हींके मस्तक उनके कटि-प्रदेशमें ही दिखायी देते थे ।। भुजड़भोगवदना नानागुल्मनिवासिन: । चीरसंवृतगात्राश्ष नानाकनकवासस:,किन्हींके सर्पाकार मुख थे। कोई नाना प्रकारके गुल्मों और लताओंसे अपनेको आच्छादित किये हुए थे। कोई चीर वस्त्रसे ही अपनेको ढके हुए थे और कोई नाना प्रकारके सुनहरे वस्त्र धारण करते थे

毗湿摩波耶那说:“其中有的面如蛇类,粗巨的臂膀盘绕其身;有的仿佛栖居于种种灌木藤蔓之间,似被草木蔓生所遮蔽。有人仅以破布蔽体,而有人则身披各色金辉灿然的华服。”

Verse 93

नानावेषधराश्चवैव नानामाल्यानुलेपना: । नानावस्त्रधराश्चैव चर्मवासस एव च,वे नाना प्रकारके वेश, भाँति-भाँतिकी माला और चन्दन तथा अनेक प्रकारके वस्त्र धारण करते थे। कोई-कोई चमड़ेका ही वस्त्र पहनते थे

毗湿摩波耶那说:“他们以种种装束现身,佩戴各色花鬘,涂抹芬芳香膏。衣服亦千般万类;有人甚至只以兽皮为衣。”

Verse 94

उष्णीषिणो मुकुटिन: सुग्रीवाश्च॒ सुवर्चस: । किरीटिन: पञठचशिखास्तथा काज्चनमूर्धजा:,किन्हींके मस्तकपर पगड़ी थी तो किन्हींके सिरपर मुकुट शोभा पाते थे। किन्हींकी गर्दन और अंगकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी। कोई किरीट धारण करते और कोई सिरपर पाँच शिखाएँ रखते थे। किन्हींके सिरके बाल सुनहरे रंगके थे

毗湿摩波耶那说:“有的头缠巾帕,有的戴着闪耀的王冠;有的颈项宽阔,肤色光辉;有的佩戴宝冠,有的头顶五髻;还有的发色金黄。”

Verse 95

त्रिशिखा द्विशिखाश्षैव तथा सप्तशिखा: परे | शिखण्डिनो मुकुटिनो मुण्डाश्व जटिलास्तथा,कोई दो, कोई तीन और कोई सात शिखाएँ रखते थे। कोई माथेपर मोरपंख और कोई मुकुट धारण करते थे। कोई मूँड़ मुड़ाये और कोई जटा बढ़ाये हुए थे

毗湿摩波耶那说:“有的顶上三髻,有的二髻,还有的七髻。有人以羽翎为冠,有人戴着宝冠;有人剃发光头,而有人披着纠结的发绺(结发)。”

Verse 96

चित्रमालाधरा: केचित्‌ केचिद्‌ रोमाननास्तथा । विग्रहैकरसा नित्यमजेया: सुरसत्तमै:,कोई विचित्र माला धारण किये हुए थे और किन्हींके मुखपर बहुत-से रोयें जमे हुए थे। उन सबको लड़ाई-झगड़ेमें ही रस आता था। वे सदा श्रेष्ठ देवताओंके लिये भी अजेय थे

Vaiśampāyana said: Some of them wore wondrous garlands, while others had faces thick with hair. Ever delighting only in strife, they were perpetually invincible—even to the foremost of the gods. The description underscores a terrifying class of warriors whose very nature is bound to conflict, suggesting how war can become an identity rather than a duty.

Verse 97

कृष्णा निर्मासवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठास्तनूदरा: । स्थूलपृष्ठा हस्वपृष्ठा: प्रलम्बोदरमेहना:,कोई काले थे, किन्हींके मुखपर मांसरहित हड्डियोंका ढाँचामात्र था। किन्हींकी पीठ बहुत बड़ी थी और पेट भीतरको धँसा हुआ था। किन्हींकी पीठ मोटी और किन्हींकी छोटी थी। किन्हींके पेट और मूत्रेन्द्रिय दोनों बड़े थे

Vaiśampāyana said: “They appeared dark and ghastly—some with faces stripped of flesh, showing only a framework of bones. Some had unusually long backs with bellies drawn inward; some were broad-backed, others short-backed; and some had distended bellies and enlarged organs of urination.” In the ethical atmosphere of the war’s aftermath, the verse underscores how violence deforms and reduces living beings to pitiable, unnatural states, evoking revulsion and compassion rather than triumph.

Verse 98

महाभुजा हस्वभुजा हस्वगात्राश्व॒ वामना: । कुब्जाश्न॒ हस्वजड्घाश्न हस्तिकर्णशिरोधरा:,किन्हींकी भुजाएँ विशाल थीं तो किन्हींकी बहुत छोटी। कोई छोटे-छोटे अंगोंवाले और बौने थे। कोई कुबड़े थे तो किन्हीं-किन्हींकी जाँघें बहुत छोटी थीं। कोई हाथीके समान कान और गर्दन धारण करते थे

Vaiśampāyana said: Among them, some had mighty arms, while others had very short arms. Some were small-limbed and dwarfish; some were hunchbacked; some had very short thighs; and some bore ears and a head like those of an elephant. The narration underscores the unsettling diversity of forms present in the war’s orbit, reminding the listener that the field of conflict draws in beings of many kinds and conditions, not all of them noble or beautiful, and that outward form is no sure measure of inner worth or dharma.

Verse 99

हस्तिनासा: कूर्मनासा वृकनासास्तथा परे । दीर्घोच्छवासा दीर्घजड़्घा विकराला हाधोमुखा:,किन्हींकी नाक हाथी-जैसी, किन्हींकी कछुओंके समान और किन्‍्हींकी भेड़ियों-जैसी थी। कोई लंबी साँस लेते थे। किन्हींकी जाँघें बहुत बड़ी थीं। किन्हींका मुख नीचेकी ओर था और वे विकराल दिखायी देते थे

Vaiśampāyana said: “Some had noses like elephants, some like tortoises, and others like wolves. Some breathed with long, heavy exhalations; some had exceedingly long thighs. Some were dreadful to behold, with faces turned downward.”

Verse 100

महादंष्टा: हस्वदंष्टा श्षतुर्दष्टास्तथा परे । वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये भीमा राजन्‌ सहस्रश:,किन्हींकी दाढ़ें बड़ी, किन्हींकी छोटी और किन्हींकी चार थीं। राजन्‌! दूसरे भी सहस्रों पार्षद गजराजके समान विशालकाय एवं भयंकर थे

Vaiśaṃpāyana said: Some had enormous tusks, some had short tusks, and others had four tusks. O King, thousands of other attendants too were terrifying—vast in body and formidable—like lordly elephants. The scene underscores the overwhelming, almost inhuman scale of the forces gathered, intensifying the moral weight of the war’s devastation.

Verse 101

सुविभक्तशरीराश्व दीप्तिमन्त: स्वलंकृता: । पिड़ाक्षा: शड्कुकर्णाश्न रक्तनासाश्न भारत,उनके शरीरके सभी अंग सुन्दर विभागपूर्वक देखे जाते थे। वे दीप्तिमान्‌ तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे। भारत! उनके नेत्र पिंगलवर्णके थे, कान शंकुके समान जान पड़ते थे और नासिका लाल रंगकी थी

毗舍摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,他们的战马体态匀称,四肢分明而秀美;精力充沛,光彩照人,并以华美的鞍辔装饰。它们的眼呈黄褐之色,耳如锥形,鼻孔微带红色。”

Verse 102

पृथुदंष्टा महादंष्टा: स्थूलौष्ठा हरिमूर्थजा: । नानापादौष्टदंष्टाश्न नानाहस्तशिरोधरा:,किन्हींकी दाढ़ें बड़ी और किन्हींकी मोटी थीं। किन्हींके ओठ मोटे और सिरके बाल नीले थे। किन्हींके पैर, ओठ, दाढ़ें, हाथ और गर्दनें नाना प्रकारकी और अनेक थीं

毗舍摩波耶那说道:“有的獠牙宽阔,有的獠牙巨大;有的唇厚,头发呈黄褐或带青之色。他们的脚、唇、齿、手与颈千差万别、形态纷纭——这令人不安的罗列,正凸显战争所制造的混乱与去人性化的骇人景象。”

Verse 103

नानाचर्मभिराच्छन्ना नानाभाषाश्न भारत | कुशला देशभाषासु जल्पन्तो<न्योन्यमी श्व॒रा:,भारत! कुछ लोग नाना प्रकारके चर्ममय वस्त्रोंसे आच्छादित, नाना प्रकारकी भाषाएँ बोलनेवाले, देशकी सभी भाषाओंमें कुशल एवं परस्पर बातचीत करनेमें समर्थ थे

毗舍摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,有些人披着各式皮革衣装,说着多种语言。他们精通诸地乡语,彼此交谈从容自若。”

Verse 104

हृष्टा: परिपतन्ति सम महापारिषदास्तथा । दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरो भुजा:,वे महापार्षदगण हर्षमें भरकर चारों ओरसे दौड़े चले आ रहे थे। उनकी ग्रीवा, मस्तक, हाथ, पैर और नख सभी बड़े-बड़े थे

毗舍摩波耶那说道:“他们欢呼雀跃,那些伟大的随从从四面奔涌而来。其颈修长,指甲亦长,足、首与臂皆大得异乎寻常——一支不祥而异界的队伍,在战事叙事之中汹涌向前。”

Verse 105

पिड़ाक्षा नीलकण्ठाश्न लम्बकर्णाक्ष भारत । वृकोदरनिभाश्चैव केचिदज्जनसंनिभा:,भरतनन्दन! उनकी आँखें भूरी थीं, कण्ठमें नीले रंगका चिह्न था और कान लंबे-लंबे थे। किन्हींका रंग भेड़ियोंके उदरके समान था तो कोई काजलके समान काले थे

毗舍摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,有的眼呈黄褐;有的喉间带着一抹青蓝的印记;有的耳长而下垂。有的肤色如狼腹之灰白,有的则黑如眼粉(kohl,kajal)。”

Verse 106

श्वेताक्षा लोहितग्रीवा: पिड़ाक्षाश्ष॒ तथा परे । कल्माषा बहवो राजंश्षित्रवर्णाक्ष भारत,किन्हींकी आँखें सफेद और गर्दन लाल थीं। कुछ लोगोंके नेत्र पिंगलवर्णके थे। भरतवंशी नरेश! बहुत-से पार्षद विचित्र वर्णवाले और चितकबरे थे

毗湿摩波耶那说道:“有的眼白如雪、颈赤如血;有的眼呈黄褐之色。噢,婆罗多族的君王啊,许多随从斑驳杂色、形貌诡异,双目亦各呈异彩。”

Verse 107

चामरापीडकनिभा: श्वेतलोहितराजय: । नानावर्णा: सवर्णाश्व मयूरसदृशप्रभा:,कितने ही पार्षदोंके शरीरका रंग चँवर तथा फूलोंके मुकुट-सा सफेद था। कुछ लोगोंके अंगोंमें श्वेत और लाल रंगोंकी पंक्तियाँ दिखायी देती थीं। कुछ पार्षद एक-दूसरेसे भिन्न रंगके थे और बहुत-से समान रंगवाले भी थे। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति मोरोंके समान थी

毗湿摩波耶那说道:“那些随从中,有的洁白如牦尾拂(chāmara),又如花鬘花冠;有的身上清晰可见白与红的条纹。有的色彩纷呈,各不相同;也有许多色泽一致。更有少数人光辉灿然,宛如孔雀之华彩。”

Verse 108

पुन: प्रहरणान्येषां कीर्त्यमानानि मे शृणु । शेषै: कृत: पारिषदैरायुधानां परिग्रह:,अब शेष पार्षदोंने जिन आयुधोंको ग्रहण किया था, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो

毗湿摩波耶那说道:“再听我一遍,诸人的兵器正被逐一唱名。我将叙述那殿中余下的随从各自取用了何等武具。”

Verse 109

पाशोद्यतकरा: केचिद्‌ व्यादितास्या: खरानना: | पृष्ठाक्षा नीलकण्ठाश्न तथा परिघबाहव:,कुछ पार्षद हाथोंमें पाश लिये हुए थे, कोई मुँह बाये खड़े थे, किन्हींके मुख गदहोंके समान थे, कितनोंकी आँखें पृष्ठभागमें थीं और कितनोंके कण्ठोंमें नील रंगका चिह्न था। बहुत-से पार्षदोंकी भुजाएँ ही परिघके समान थीं

毗湿摩波耶那说道:“有的随从手举绳索套索而立;有的张口大张,狰狞可怖。有的面如驴;有的双目生于背上;有的喉间带着深蓝的印记;而许多人的臂膀粗巨沉重,仿佛铁杵般能碾碎一切。”

Verse 110

शतघ्नीचक्रहस्ताश्व तथा मुसलपाणय: । असिमुद्गरहस्ताश्न दण्डहस्ताश्व भारत,भरतनन्दन! किन्हींके हाथोंमें शतघ्नी थी तो किन्हींके चक्र। कोई हाथमें मुसल लिये हुए थे तो कोई तलवार, मुद्गर और डंडे लेकर खड़े थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊,婆罗多人之所欢悦者!有的手执百杀器(śataghnī)与轮刃之盘(chakra)而立;有的握持棍棒。有的佩剑与钉头槌,有的紧攥长杖——各依其类而武装,皆为战场的暴烈而备。”

Verse 111

गदाभुशुण्डिहस्ताश्व॒ तथा तोमरपाणय: । आयुर्धर्विविधैघोरिर्महात्मानो महाजवा:,किन्हींके हाथोंमें गदा, तोमर और भुशुण्डि शोभा पा रहे थे। वे महावेगशाली महामनस्वी पार्षद नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे

毗湿摩波耶那说道:那些心志宏大、迅疾无比的战士中,有的手执钉锤与“布舒ṇḍi”(重兵器),有的则持长矛。诸般可怖的兵刃齐备,他们列阵待战——这既是武力威势的写照,也映出战争阴沉的道德重负:技艺与备战之周全,竟为一场后果骇人的事业所驱使。

Verse 112

महाबला महावेगा महापारिषदास्तथा | अभिषेक कुमारस्य दृष्टवा हृष्टा रणप्रिया:

毗湿摩波耶那说道:他们力大无穷,冲击如电,亦是诸侯会集之中最为显赫者;嗜战之人见王子受灌顶加冕,皆欢欣鼓舞。此景昭示:王权的正统与公众的承认,足以点燃武人的战意,使政治秩序与战争之势紧紧相系。

Verse 113

उनका बल और वेग महान्‌ था। वे युद्धप्रेमी महा-पार्षदयगण कुमारका अभिषेक देखकर बड़े प्रसन्न हुए ।। घण्टाजालपिनद्धाज्ा ननृतुस्ते महौजस: । एते चान्ये च बहवो महापारिषदा नृप

毗湿摩波耶那说道:那些雄威赫赫的战士,旗帜上缀着铃网,欢腾起舞。大王啊,他们——连同许多王廷议会中的显贵——见王子受灌顶加冕,皆心生大悦;因为他的力量与迅捷早已闻名,而他们的心本就系于战事。

Verse 114

दिव्याश्षाप्यान्तरिक्षाश्ष पार्थिवाश्ञानिलोपमा:

毗湿摩波耶那说道:“有的属天界,有的行于中空,有的则在尘世——迅疾而刚猛,如同疾风。”

Verse 115

तादृशानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अभिषिक्तं महात्मान॑ परिवार्योपतस्थिरे,ऐसे-ऐसे सहस्रों, लाखों और अरबों पार्षद अभिषेकके पश्चात्‌ महात्मा स्कन्दको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये

毗湿摩波耶那说道:“就这样,成千上万,乃至无数亿众汇聚而来。灌顶礼成之后,他们从四面八方环立,围绕着大心的斯坎达,侍立左右。”

Verse 416

सुदर्शनीयौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्लुतौ । भगवान्‌ मित्रने महात्मा कुमारको सुव्रत और सत्यसंध नामक दो सेवक प्रदान किये। वे दोनों ही तप और विद्या धारण करनेवाले तथा महामनस्वी थे। इतना ही नहीं, वे देखनेमें बड़े ही सुन्दर, वर देनेमें समर्थ तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे

毗湿摩波耶那说道:那位可敬的主宰、伟大的圣者,赐予密特罗两名侍从,名为俱摩罗迦(Kumāraka)与苏弗罗多(Suvrata),二人皆坚守真实。其人持戒立誓,具足苦行(tapas)与学识,心志高远。不但容貌俊美,且能赐福施愿,名闻三界。

Verse 426

कार्तिकेयाय सम्प्रादाद्‌ विधाता लोकविश्रुतौ । विधाताने कार्तिकेयको महामना सुव्रत और सुकर्मा--ये दो लोकविख्यात सेवक प्रदान किये

毗湿摩波耶那说道:造物主毗陀塔(Vidhātā),名闻诸世,赐予迦尔蒂凯亚(Kārtikeya)两名举世称颂的侍从——苏弗罗多(Suvrata)与苏迦尔摩(Sukarmā),二人皆大心之士,以奉事于他。

Verse 436

पूषा च पार्षदौ प्रादात्‌ कार्तिकेयाय भारत । भरतनन्दन! पूषाने कार्तिकेयको पाणीतक और कालिक नामक दो पार्षद प्रदान किये। वे दोनों ही बड़े भारी मायावी थे

毗湿摩波耶那说道:噢,婆罗多!普沙(Pūṣā)也赐给迦尔蒂凯亚两名随从,名为帕尼塔迦(Pāṇītaka)与迦利迦(Kālika)。二者皆擅长幻力(māyā),诡变非常。

Verse 453

प्रददौ कार्तिकेियाय वरुण: सत्यसड्गर: । सत्यप्रतिज्ञ वरुणने कृत्तिकानन्दन स्कन्दको यम और अतियम नामक दो महाबली पार्षद दिये, जिनके मुख तिमि नामक महामत्स्यके समान थे

毗湿摩波耶那说道:坚守真实、誓愿不移的伐楼那(Varuṇa),赐予迦尔蒂凯亚两名力大无穷的侍从,名为阎摩(Yama)与阿提阎摩(Atiyama)。他们的面容如同名为提弥(Timi)的巨鱼之面。

Verse 466

हिमवान्‌ प्रददौ राजन्‌ हुताशनसुताय वै । राजन! हिमवानने अग्निकुमारको महामना सुवर्चा और अतिवर्चा नामक दो पार्षद प्रदान किये

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,喜马梵(Himavān)确曾将赠礼赐予火神护塔沙那(Hutāśana,阿耆尼 Agni)之子。大王啊,那位高贵的火神之子得到了两位侍从同伴,名为苏瓦尔叉(Suvarcā)与阿提瓦尔叉(Ativarcā)。”

Verse 476

ददावनुचरो मेरुरग्निपुत्राय भारत । भारत! मेरुने अग्निपुत्र स्कन्‍्दको महामना कांचन और मेघमाली नामक दो अनुचर अर्पित किये

毗湿摩波耶那说道:“噢,婆罗多啊!须弥山将自己的侍从赐与火神之子(斯甘陀)。在这段关于神圣归属与结盟的叙事中,须弥山以奉侍与同伴相献于斯甘陀,昭示一条伦理理想:正当的权柄应由自愿而有序的归附所扶持,而非凭借强迫。”

Verse 483

महात्मा त्वग्निपुत्राय महाबलपराक्रमौ । महामना मेरुने ही अग्निपुत्र कार्तिकेयको स्थिर और अतिस्थिर नामक दो पार्षद और दिये। वे दोनों महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे

毗湿摩波耶那说道:“那位大心者将两名侍从赐与火神之子迦尔蒂凯耶,名为‘坚固’(Sthira)与‘极坚固’(Ati-sthira)。二者皆具非凡神力与英雄般的勇武。此段强调:神圣或崇高之存在,常以能干之辅佐来维系秩序与成事之效,以成其神圣职责。”

Verse 506

प्रददावग्निपुत्राय महापारिषदावुभौ । समुद्रने भी अग्निपुत्रको दो गदाधारी महापार्षद दिये, जिनके नाम थे--संग्रह और विग्रह

毗湿摩波耶那说道:“他将两位卓绝的持钺槌勇士赐与火神之子——皆为大集会之重臣,名为‘摄持’(Saṅgraha)与‘分裂’(Vigraha)。由此,在战事渐次展开之际,他一方得以凭借可信而尊贵的猛将更为强盛。”

Verse 513

प्रददावग्निपुत्राय पार्वती शुभदर्शना । शुभदर्शना पार्वती देवीने अग्निपुत्रको तीन पार्षद दिये--उन्माद, शंकुकर्ण तथा पुष्पदन्त

毗湿摩波耶那说道:“吉祥端丽的女神帕尔瓦蒂,将自己麾下三名侍从赐与火神之子——乌恩玛达(Unmāda)、商库迦耳那(Śaṅkukarṇa)与普什帕丹塔(Puṣpadanta)。由此,以忠诚奉侍而非单凭武力,扩展了神圣的扶持与护佑。”

Verse 793

खरोष्टमवदनाश्षान्ये वराहवदनास्तथा । जनमेजय! उन सबके नाना प्रकारके मुख थे। किनके कैसे मुख थे? यह बताता हूँ, सुनो। कुछ पार्षदोंके मुख कछुओं और मुर्गोके समान थे, कितनोंके मुख खरगोश, उल्लू, गदहा, ऊँट और सूअरके समान थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那美阇耶!他们众人面貌各异,形相万端。我将告诉你他们是什么样的面孔——且听。有人面如龟与雄鸡;有人则面似野兔、猫头鹰、驴、骆驼与野猪。”

Verse 1133

उपतस्थुर्महात्मानं कार्तिकेयं यशस्विनम्‌ | वे अपने अंगोंमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त जालीदार वस्त्र पहने हुए थे। उनमें महान्‌ ओज भरा था। नरेश्वर! वे हर्षमें भरकर नृत्य कर रहे थे। ये तथा और भी बहुत-से महापार्षदगण यशस्वी महात्मा कार्तिकेयकी सेवामें उपस्थित हुए थे

毗湿摩波耶那说道:众多侍从与大随从上前,奉事那位声名显赫、心魂高远的迦尔蒂凯耶。其人身披网纹之衣,四肢缀以细小铃铛,威力充盈。大王啊!他们满怀欢喜,纵情起舞,以虔敬之姿列于左右,恭谨侍立于这位值得拥戴的统帅之前。

Verse 1146

व्यादिष्टा दैवतै: शूरा: स्कन्दस्यानुचराभवन्‌ । देवताओंकी आज्ञा पाकर देवलोक, अन्तरिक्षलरोक तथा भूलोकके वायुतुल्य वेगशाली शूरवीर पार्षद स्कन्दके अनुचर हुए थे

毗湿摩波耶那说道:奉诸天之命,那些迅疾如风、英勇无畏的战士,皆成了斯坎达的侍从。既得神圣许可,他们列入斯坎达的随从之中——以纪律为骨的力量,不随私欲而动,而是遵从更高的宇宙秩序。

Verse 2236

कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये लोककीर्तिता: । महाराज! जैसे पूर्वकालमें जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किया गया था, उसी प्रकार सर्वतोकपितामह भगवान्‌ ब्रह्मा, महातेजस्वी कश्यप तथा दूसरे विश्वविख्यात महर्षियोंने कार्तिकेयका अभिषेक किया

毗湿摩波耶那说道:“大王啊!正如远古之时为水之主伐楼那举行灌顶加冕一般,如今亦然:诸世界之祖父、吉祥的梵天,与光辉炽盛的迦叶波以及其他名闻天下的大仙人一道,为迦尔蒂凯耶举行了灌顶之礼。”

Verse 5536

विविधायुधसम्पन्नाश्चित्राभरणभूषिता: । स्कन्दके जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न और विचित्र आभूषणोंसे विभूषित अन्य सैनिक थे, उनके नाम सुनो

毗湿摩波耶那说道:“如今也请听我道来其余战士之名——他们备具诸般兵刃,身佩奇丽多彩的饰物,光华夺目。”

Frequently Asked Questions

The chapter stages a tension between force and legitimacy: martial power is depicted as effective only when ritually authorized and embedded within a sanctioned moral-cosmological order (abhiṣeka and divine bestowal).

Authority is not merely personal capacity; it is institutional and sacral: leadership becomes stable when supported by consecration, disciplined attendants, and responsibility toward collective protection.

Rather than a formal phalaśruti formula, the chapter provides meta-framing by naming the tīrtha (Aujasa) and emphasizing consecration and worship there, implicitly marking the account as purifying sacred history tied to ritual practice.