Kārttikeya-Abhiṣecana: Mātṛgaṇa-Nāma Saṃkīrtana and Skanda’s Commission
मायाशतथधरं काम॑ कामवीर्य बलान्वितम् | ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम्,रुद्रर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभु: । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्ू, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान् रुद्रदेव, एकादश रुद्रणण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार--ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान् शंकरने स्कन्दको एक महान् असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था
vaiśampāyana uvāca |
māyāśatadharaṃ kāmaṃ kāmavīrya-balānvitam |
dadau skandāya rājendra surārivinibarhaṇam ||
毗湿摩波耶那说:大王啊,湿婆赐予斯甘陀一位强大的存在——能持有数百种幻力,其力与勇可随意召发,并足以摧灭诸天之敌。此景彰显史诗的道德逻辑:当宇宙秩序受威胁时,神力被托付给配得上的统帅,不为私利,而为护持达摩、约束毁灭之势。
वैशम्पायन उवाच